संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 18 अक्टूबर : ...जबरा मारे भी,  और रोने भी न दे
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 18 अक्टूबर : ...जबरा मारे भी, और रोने भी न दे
Date : 18-Oct-2019

महाराष्ट्र के एक बड़े सहकारी बैंक, पीएमसी के डूबने से उसमें जिंदगी भर की कमाई रखने वाले लोगों के मरने की नौबत आ गई है, बल्कि कुछ लोग मर भी गए हैं, कुछ लोगों के पास किडनी-ट्रांसप्लांट के बाद की जीवनरक्षक अनिवार्य दवाओं के लिए भी पैसे नहीं रह गए हैं, लेकिन उनकी याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है, और उन्हें हाईकोर्ट जाने के लिए कहा है। किसी भी मामले के हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचने का मतलब कुछ महीनों से लेकर कुछ बरसों तक की देरी हो सकता है, और जब लोगों को बैंक में जमा अपनी रकम नहीं मिल पा रही है तो क्या वे सचमुच ही यह इंतजार कर सकते हैं? 

देश के कानून की मामूली समझ भी बताती है कि संपत्ति का अधिकार लोगों का बुनियादी अधिकार है, और केन्द्र सरकार से, रिजर्व बैंक से लाइसेंस पाने के बाद उनके प्रति जवाबदेही के साथ, उनकी जांच और निगरानी के तहत काम करने वाले बैंकों में अगर जालसाजी होती है, तो आरबीआई और केन्द्र सरकार को सीधे जवाबदेह रहना चाहिए। आज देश में मोदी सरकार ने अपने बैंकिंग और बाकी नियम-कायदों को ऐसा बनाकर रखा है कि लोग अधिक रकम लेकर चल नहीं सकते, घर पर अधिक रकम रख नहीं सकते, किसी काम के लिए बड़ा भुगतान नगद कर नहीं सकते, इसलिए सरकार ने लोगों को घेरघारकर एक ऐसे कोने में पहुंचाया है जो कि बैंक है। वहां भी एटीएम से एक दिन में रकम निकासी की सीमा तय कर दी है, तरह-तरह की फीस लाद दी है, इन सबके चलते लोग बैंकों में ही जमा रख सकते हैं। ऐसे में जब बैंकों की रकम डूबती है, और बैंक चलाने वालों की जालसाजी से डूबती है, तो उसकी गारंटी सरकार के मत्थे ही रहनी चाहिए। लेकिन सरकार और बैंकों ने अपने हाथ धो लिए हैं कि किसी की कितनी भी रकम जमा रहे, उसमें से बस एक लाख रूपए तक की वापिसी की गारंटी है। 

जो सरकार देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था चाहती है, जो डिजिटल भुगतान को ही अनिवार्य बना देने की कोशिश कर रही है, वह सरकार अगर बैंक-धोखाधड़ी की जिम्मेदारी से कतराती है, तो यह जनता के साथ एक गैरजिम्मेदाराना बर्ताव भी है, और शायद कानूनी रूप से गलत भी है। केन्द्र सरकार चाहे जो कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी से कतराए, हमारी सामान्य बुनियादी समझ यह कहती है कि ऐसे बच निकलने के कानून सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएंगे, और केन्द्र सरकार को बैंकों की डूबत का आम लोगों का पैसा देना ही पड़ेगा, देना ही चाहिए। यह याद रखने की जरूरत है कि बैंकों की कमाई की रकम केन्द्र सरकार ने आरबीआई की बांह मरोड़कर निकाली है, और उसे बैंकों को दिया है ताकि वे नए कर्ज दे सकें। अब सवाल यह है कि जिसने जिंदगी भर की खून-पसीने की कमाई जमा की है, उसके डूबने के खिलाफ सरकार का कोई बचावतंत्र नहीं है, दूसरी तरफ जिन लोगों ने बैंकों से कर्ज लेकर उसे डुबा दिया है, या लेकर भाग गए हैं, उनकी भरपाई करने के लिए केन्द्र सरकार बैंकों को आरबीआई से लेकर रकम दे रही है। कुल मिलाकर सरकार का बैंकिंग का सिलसिला ईमानदार जमाकर्ताओं से छीनकर बेईमान कर्जदारों पर डुबाने का है, और यह सिलसिला महज संसद में कोई बैंकिंग नियम बनाकर जायज नहीं हो जाता, यह सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो जाना तय है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को चाहे तकनीकी आधार पर हाईकोर्ट ले जाने कहा है, लेकिन हाईकोर्ट संसद के बनाए कानून को पलटने की ताकत नहीं रखता है, और बैंकों में लुटे हुए जमाकर्ताओं में से बहुतों की मौत के बाद भी सुप्रीम कोर्ट इसे सुनेगा, और उस वक्त जज जैसे रहेंगे, वैसा इंसाफ होगा। आज तो सरकार नगद रखने नहीं दे रही, और बैंक डूबने पर लोगों को रकम नहीं दे रही है। इसी के लिए कहा गया है कि जबरा मारे भी और रोने भी न दे।
-सुनील कुमार

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