संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 अक्टूबर : खास लोगों ने आम को आम भी नहीं रहने दिया है, उन्हें चूस-चूसकर गुठली बना दिया
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 अक्टूबर : खास लोगों ने आम को आम भी नहीं रहने दिया है, उन्हें चूस-चूसकर गुठली बना दिया
Date : 14-Oct-2019

मद्रास हाईकोर्ट में सार्वजनिक जगहों पर अवैध बैनर, पोस्टर, होर्डिंग लगाने वालों के लिए अधिकतम सजा की मांग करने वाली याचिका पर बहस चल रही है। इस याचिका की जरूरत इसलिए पड़ी कि एक नेता के अवैध पोस्टर के गिरने से उसमें उलझी दुपहिया सवार युवती गिरी, और एक बड़ी गाड़ी के नीचे आकर मर गई। इस मामले में जिस नेता का पोस्टर था, उसे कड़ी सजा देने की मांग भी की जा रही है। इस सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि नेताओं को तमिलनाडु का दौरा अक्सर करते रहना चाहिए ताकि राज्य साफ-सुथरा बना रहे। दो जजों की यह बेंच हाल ही प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति के चेन्नई करीब मुलाकात करने के लिए चारों तरफ की गई भारी सफाई को देखते हुए यह तंज कस रही थी। जजों ने कहा कि नेताओं के आने से अब ये जगहें बहुत साफ हो गई हैं, और जब बड़े नेता आते हैं तभी सरकार ऐसे कदम उठाती है। उल्लेखनीय है कि चीनी राष्ट्रपति के आने के पहले मामल्लापुरम के 7वीं सदी के पल्लव वंश के स्मारकों को साफ-सफाई करके चमकाया गया, और चेन्नई हवाई अड्डे से लेकर मामल्लापुरम तक युद्ध स्तर पर सफाई और सौंदर्यीकरण का काम किया गया। 

इस साफ-सफाई के लिए भारतीय प्रधानमंत्री या तमिलनाडु की राज्य सरकार को तोहमत देना ठीक नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आम और खास के बीच का यह फर्क कदम-कदम पर चीखते हुए बोलता है। बिना चीनी राष्ट्रपति के भी अगर भारतीय प्रधानमंत्री किसी शहर में जाते हैं, तो उनके सड़क सफर के सारे रास्तों की मरम्मत की जाती है, नई सड़कें बनती हैं, सड़क के बीच और किनारों पर रंग-पेंट फिर से होता है, और शहर मानो स्वागत में बिछ सा जाता है। लोगों को याद होगा कि जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार थी, और ब्रिटिश प्रधानमंत्री वहां आए थे, तो राजधानी कोलकाता की सड़कों के किनारे से भिखारियों को हटाकर शहर के बाहर कर दिया गया था, फुटपाथों पर जीने वाले बेघरों को हटा दिया गया था, और आमतौर पर गंदे रहने वाले इस शहर को अंग्रेज प्रधानमंत्री के स्वागत में चमकाकर पेश किया गया था। यह हिन्दुस्तान की आम संस्कृति है कि आने वाले मेहमान के लिए इतनी नकली चमक पेश कर दी जाए कि उनकी आंखें चकाचौंध रहें। इसके लिए अनुपातहीन अधिक खर्च किया जाता है, जो कि राज्य शासन या स्थानीय संस्थाओं के बाकी खर्चों में कटौती करके ही होता है। लेकिन यह तो मानवीय स्वभाव ही है कि किसी के घर पर ही कोई खास मेहमान आते हैं, तो लोग अपनी ताकत से कुछ बाहर जाकर भी घर को सजाते हैं। 

लेकिन हाईकोर्ट के जिन जजों ने तमिलनाडु की सफाई को लेकर यह तंज कसा है, उनके लिए अगर ऐसी सफाई नहीं की जाती, तो भी उनके लिए कुछ दूसरे खास इंतजाम किए जाते हैं जिनको लेकर आम जनता के मन में ऐसा ही तंज उठता है, लेकिन आम जनता की इतनी औकात नहीं रहती कि वह बड़े लोगों पर व्यंग्य कर सके इसलिए बात आई-गई हो जाती है। देश के किसी भी प्रदेश में हाईकोर्ट के जजों को सायरन बजाती हुई पुलिस गाडिय़ों के पीछे आरामदेह कार में रफ्तार से जाते हुए देखा जा सकता है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम लगातार देखते हैं कि एक-एक हाईकोर्ट जज कारों के काफिलों में चलते हैं, कुछ कारें पुलिस की होती हैं, और कुछ जिला अदालत के जजों की। यह देश दरअसल आम और खास के बीच फर्क की एक समंदर सी चौड़ी, और खाई सी गहरी दूरी को लगातार झेलता है। जिन जजों को फैसले सुनाने की ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं रहती कि वे सायरनों के साए में, सड़क पर आम लोगों को रोकते हुए आए-जाएं, वे भी ऐसा करते हैं। भारतीय संविधान सबको बराबरी का हक देता है, और ऐसे में सड़क पर चलने वाले एक खोमचे वाले के समय का महत्व किस तरह एक हाईकोर्ट जज के समय से कम हो सकता है? उसका काम कैसे अदालत के काम से कम महत्वपूर्ण हो सकता है? लेकिन सड़कों पर आम लोगों को रोककर खास जजों के लिए एक तेज रफ्तार राह तैयार करना एक बहुत ही आम बात है। देश को इस तथाकथित वीआईपी और वीवीआईपी संस्कृति से आजाद होना चाहिए क्योंकि राजाओं के वक्त, बादशाहों के वक्त, और अंग्रेजों के वक्त तो सिंहासन पर बैठे लोग और उनके दरबारी आम लोगों से अलग थे, उनके हक भी अलग थे, अब आजाद हिन्दुस्तान में तो प्रधानमंत्री से लेकर आम इंसान तक, और जजों से लेकर अफसरों तक के हक बराबर होने चाहिए, आम नागरिकों के बराबर। जहां कहीं ऐसा फर्क दिखता है, गरीब की सिली हुई जुबान से बद्दुआ निकल तो नहीं पाती है, लेकिन उसके मन से उठती जरूर है, और उसका असर जरूर होता है। देश बिना किसी मेहमान के आए भी साफ रहना चाहिए, और मेहमान के साथ मेजबान प्रधानमंत्री की मौजूदगी में तो उनके डेरे का समुद्रतट निश्चित ही इतना साफ रहना चाहिए कि वहां प्रधानमंत्री एक थैला भरकर कचरा न पा सकें। इसी तरह जजों को आज चुभती हुई इस सादगी के साथ-साथ उनको यह भी देखना चाहिए कि उनके कौन से सामंती काफिलों की शाही सवारी आम जनता को चुभती है। देश में खास लोगों का हाल यह है कि उन्होंने आम लोगों को आम भी नहीं रहने दिया है, उन्हें चूस-चूसकर गुठली बना छोड़ा है। 
-सुनील कुमार

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