संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  10 अक्टूबर : कांग्रेस को आईना देखने का साहस तो जुटाना होगा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 अक्टूबर : कांग्रेस को आईना देखने का साहस तो जुटाना होगा
Date : 10-Oct-2019

कांग्रेस के दो नेताओं के बयान दो दिनों से सुर्खियों में हैं। भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे सलमान खुर्शीद ने कहा कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार का कोई विश्लेषण इसलिए नहीं हो सका कि कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी चुनावी नतीजों के बाद उठे और चल दिए। इसके बाद कल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और पार्टी के एक बड़े नौजवान नेता समझे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि पार्टी को लोकसभा नतीजों पर आत्मविश्लेषण करने की जरूरत है। आज जब कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों से जूझ रही है तब ये बातें चाहे कितनी ही तर्कसंगत और जायज हों, न तो मासूम हैं, और न ही पार्टी का भला करने वाली। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का कुछ हासिल न कर पाना सोचने का मुद्दा था, है, और रहेगा, लेकिन सवाल यह है कि आज दो राज्यों के चुनावों और देश भर के उपचुनावों के बीच क्या इस शिगूफे की जरूरत थी?

कांग्रेस के भीतर कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं को यह एक जायज मौका लग सकता है कि राहुल के छोड़े गए शून्य को वे भी भर सकते हैं। सोनिया गांधी ने अनमने ढंग से, और कामचलाऊ व्यवस्था के तहत पार्टी को संभाला जरूर है लेकिन राहुल का सार्वजनिक बयान तो यही था कि पार्टी गांधी परिवार से परे का अध्यक्ष देखे। यह बात बहुत से कांग्रेस नेताओं में उम्मीद भर चुकी है कि उनका अच्छा वक्त आएगा, लेकिन समझदारी यह रहती कि किसी भी नीयत से दिए गए बयान विधानसभा चुनावों तक टाल दिए जाते तो वह एक औसत राजनीतिक समझ के हिसाब से भी ठीक होता। जो नासमझ नहीं हैं, उन्हें नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती।

लेकिन बेमौके के इन दो बयानों को छोड़ दें तो यह तो लगता ही है कि कांग्रेस पार्टी को कम से कम नाजुक मौके पर तो आत्ममंथन करना था। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद की कांग्रेस कार्यसमिति राहुल के इस्तीफे में ही शुरू और खत्म हो गई और लीडरशिप के फूटे हुए ज्वालामुखी से बिखरे लावे में किसी से कुछ कहते नहीं बना। और बाद के महीनों में तो देश की तमाम गैरवामपंथी पार्टियों के नेता कूद-कूदकर भाजपा में जा रहे हैं, कांग्रेस सहित। पलायन के ऐसे दौर में भी अगर कांग्रेस पार्टी एक अनमने और कामचलाऊ नेता के भरोसे बनी रहेगी तो क्या वह एक अस्थायी संन्यास ले रही है चुनावों से?

आज देश के तमाम गैरभाजपा दलों के सामने अस्तित्व का संकट बना हुआ है, एनडीए के भीतर के भाजपा के सहयोगी-दलों के सामने भी। महाराष्ट्र में तो चुनाव चलते हुए भी भाजपा अपने सहयोगी दलों के नेताओं पर लाईन मार रही है और वे पार्टियां उलझन में हैं कि जब जेठजी ही छोटी बहू का हाथ पकड़ रहे हैं तो वे कहां जाएं। कांग्रेस के भी अनगिनत नेता देश भर में भाजपा में जा रहे हैं क्योंकि पार्टी में लीडरशिप का ठिकाना नहीं है तो उसमें उनको अपने ठिकाने का भरोसा कहां से होगा?

कुल मिलाकर कांग्रेस नेताओं के अच्छी या बुरी नीयत वाले बयान आज चाहे अनदेखा करने लायक हैं लेकिन एक पखवाड़े बाद, चुनाव निपट जाने पर कांग्रेस को आईना देखने का साहस तो जुटाना ही होगा।
-सुनील कुमार

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