संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 अक्टूबर : यह लोकतंत्र ऐसे माहौल को  बर्दाश्त नहीं कर सकता...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 अक्टूबर : यह लोकतंत्र ऐसे माहौल को बर्दाश्त नहीं कर सकता...
Date : 09-Oct-2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश में बढ़ते हुए हिंसक तनाव के बारे में चिट्ठी लिखने वाले 50 प्रमुख कलाकारों, फिल्मकारों, और साहित्यकारों के खिलाफ बिहार में राष्ट्रद्रोह की एफआईआर दर्ज की गई है। इसके खिलाफ और लोग प्रधानमंत्री को उसी चिट्ठी को दस्तखत करके भेज रहे हैं कि उनके ऊपर भी इसे लेकर एफआईआर दर्ज करा दी जाए। यह सिलसिला उस देश में खतरनाक है जिसमें पार्टियों के भीतर एक वक्त बड़ी कड़ी असहमति रहते आई है, जिसमें राजनीतिक परिवारों के भीतर नेहरू और फिरोज गांधी किस्म की असहमति रहते आई है, और इस देश के आजादी के आंदोलन के दो सबसे बड़े नेताओं, गांधी और नेहरू के बीच भी गंभीर असहमति रहते आई है। ऐसे देश में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने के खिलाफ अगर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा रहा है, तो यह पूरी तरह अलोकतांत्रिक और शर्मनाक बात है। देश के बड़े-बड़े जाने-माने, और पूरी तरह से शांतिप्रिय लोगों के खिलाफ ऐसे मुकदमे दर्ज करने से पूरी दुनिया में भारत की साख खत्म होती है, और यह भी समझ लेना चाहिए कि आज भारत की न्यायपालिका की संदिग्ध हो चली विश्वसनीयता के बीच भी यह जाहिर तौर पर दिखता है कि यह मामला देश की बड़ी अदालत में एक मिनट भी नहीं टिकेगा, लेकिन शायद मामले को किसी नतीजे तक पहुंचाना मकसद भी नहीं है, और इसका मकसद बाकी लोगों को चुप करना अधिक दिखता है क्योंकि पूरी बेगुनाही के बाद भी अदालत में जाकर खड़े होने की ताकत भी हर किसी में नहीं रहती है, देश की अदालतों की भ्रष्ट व्यवस्था लोगों को तन-मन-धन से निचोड़कर रख देती है। 

अभी कुछ ही महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आलोचकों का स्वागत किया था, लेकिन उनका यह बयान उनकी पार्टी और पार्टी की केन्द्र व राज्य सरकारों की कार्रवाई के ठीक खिलाफ साबित हो रहा है। मोदी की सरकार के मंत्री, और पार्टी के बड़े-बड़े पदाधिकारी सार्वजनिक बयान देते हैं कि मोदी की आलोचना करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए, लगातार बयानों से यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि मोदी ही देश हैं। यह सिलसिला खुद मोदी के हित में नहीं है, चाहे इसे मोदी की सहमति ही क्यों न हासिल हो। लोकतंत्र में जब आलोचना को पूरी तरह से दबा दिया जाता है, सत्ता के और लोकतंत्र के सारे पहलुओं पर एक मर्जी लाद दी जाती है, तो नतीजा यह होता है कि खुद सत्ता को देश का माहौल पता नहीं लगता। इस देश में इमरजेंसी के दौर को छोड़ दें, तो और कोई भी ऐसा वक्त नहीं रहा है जब सत्ता की आलोचना, सत्तारूढ़ पार्टी की आलोचना को सजा के लायक जुर्म ठहराया गया हो। जिस बिहार में देश के सबसे प्रमुख विचारकों में से 50 के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का जुर्म दर्ज किया गया है, वह भाजपा की गठबंधन सरकार का राज्य है, और ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता कि महीनों पहले की इस चिट्ठी पर ऐसी बड़ी कार्रवाई सरकार के सोचे-समझे फैसले के खिलाफ हुई होगी, और फैसले के पीछे की यह सोच पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है, और खतरनाक भी है। 

देश के आज के माहौल में यह सिलसिला पता नहीं कहां जाएगा क्योंकि सड़कों के गड्ढों से अधिक संख्या में लोगों को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा रहा है, और लोगों को इस अंदाज में पाकिस्तान भेजने के फतवे जारी हो रहे हैं कि मानो पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा पर्यटन केन्द्र हो, सबसे बड़ा शरणार्थी कैम्प हो। आजाद हिन्दुस्तान में किसी नागरिक को पाकिस्तान भेजने का हक कैसे किसी को मिल सकता है, और खासकर कैसे किसी को गद्दार कहने का हक किसी को मिल सकता है? हमारा ख्याल है कि जब तक देश की अदालत किसी को राष्ट्रद्रोही और गद्दार साबित करके सजा न दे दे, तब तक किसी को गद्दार कहना एक जुर्म से कम नहीं होता है, और आज हवा में तैरते फतवों को देखते हुए यह समझ ही नहीं पड़ता है कि यह गांधी और नेहरू वाला देश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगर इस मुद्दे पर खुलकर सार्वजनिक रूप से नहीं बोलते हैं, तो यह उनकी सहमति से हो रही कार्रवाई लगेगी, और यह उनकी तमाम चुनावी कामयाबी को नुकसान पहुंचाने वाला माहौल रहेगा। यह लोकतंत्र ऐसे माहौल को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
-सुनील कुमार

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