संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 अक्टूबर : यह है सद्भावना की मिसालों का  देश, नफरत की मिसाइलों का नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 अक्टूबर : यह है सद्भावना की मिसालों का देश, नफरत की मिसाइलों का नहीं
Date : 07-Oct-2019

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस से दो ऐसी खूबसूरत फिल्म अभिनेत्रियां चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं कि उनकी तस्वीरें अब तक खबरों में रहती हैं। उनमें से एक का नाम नुसरत जहां है जिसने लोकसभा चुनाव के बाद एक जैन नौजवान से शादी की है, और पिछले दिनों बंगाल की दुर्गा पूजा में तरह-तरह की रस्में करते हुए अपनी पति के साथ नुसरत जहां की तस्वीरें भी सामने आई हैं। जब कभी किसी कामयाब मुस्लिम महिला की ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो कुछ कट्टरपंथी लोगों की नींद हराम होती है, और वे बयानबाजी करते हैं, उसे धर्म के खिलाफ बताते हैं। लेकिन बंगाल में दुर्गा पूजा की खूबसूरती और रौनक के पीछे कदम-कदम पर मुस्लिमों का हाथ रहता है, और प्रतिमा बनाने से लेकर प्रतिमा के कपड़े सिलने तक, शामियानों को रौशन करने तक सब जगह मुस्लिम कलाकार और कारीगर बराबरी से काम करते आए हैं। 

हिन्दुस्तान में धर्म का जाहिर तौर पर एक सांस्कृतिक पहलू है जो कि बहुत ही मजबूत है, और धर्म की कट्टरता और हिंसा भी उस पहलू को कमजोर नहीं कर पाती हैं। चाहे शादी-ब्याह की धार्मिक रस्मों के कपड़े हों, चूडिय़ां हों, सिंदूर हो, या दूल्हे की घोड़ी हो, बैंडबाजा हो, या मेहंदी लगाने वाली हो, बिना मुस्लिम शायद ही कोई हिन्दू शादी हो पाए, और शायद ही उसके धार्मिक रीति-रिवाज हो पाएं। धर्मान्ध हिंसा को अगर छोड़ दें, ऐसे हिंसक छोटे-छोटे तबकों को छोड़ दें, तो देश भर में जगह-जगह ऐसी मिसालें बिखरी हुई हैं कि बिना एक भी मुस्लिम वाले गांव में किस तरह हिन्दू ही मस्जिद को जिंदा रखे हुए हैं, या बिना हिन्दुओं वाले गांव में मुस्लिम ही मंदिर को चला रहे हैं, और भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर में एक-दूसरे को लाखों की संख्या में मारने वाले मुस्लिम और सिक्ख भी अब हिन्दुस्तान में जगह-जगह एक-दूसरे के लिए अपने दरवाजे खोलकर रखते हैं। धर्म का सांस्कृतिक पहलू उसकी कट्टरता के मुकाबले अधिक मजबूत है, लेकिन जैसा कि किसी भी अच्छी बात के साथ होता है, वह शांत और चुप रहती है, दूसरी तरफ कट्टरता की नफरत और हिंसा दीवारों पर लिखे नारों की तरह बड़ी-बड़ी लिखावट में फैलाई जाती है, और वह अधिक दिखती है। 

आज जब देश भर में एक लंबा इतिहास सबके मिलजुलकर सबके धार्मिक त्योहारों को मनाने का है, तो कुछ लोग त्योहारों का इस्तेमाल नफरत को फैलाने के लिए करते हैं। नवरात्रि के गरबे को देखें तो वहां पहुंचने वाले लोगों के हिन्दू ही होने का फतवा जारी करते हुए धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठनों ने पिछले कुछ बरसों से यह लादने की कोशिश की है कि गरबा में आने वालों के पहचान पत्र देखे जाएं ताकि कोई गैरहिन्दू वहां न आ सके। यह सिलसिला ताजा-ताजा है, और खबरों में यह जरूर दिखता है लेकिन हकीकत में इसकी कोई हैसियत नहीं है। ऐसी नफरत गिनती में कहीं नहीं टिकती, लेकिन यह एक जवाबी नफरत पैदा करने के काम आती है, और धर्म के सांस्कृतिक पहलू को खत्म करने की कोशिश करती है। हिन्दुस्तान में कट्टर हिंसा और साम्प्रदायिक नफरत को फैलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि जिस देश में शिव के सबसे बड़े मंदिर में बैठकर बिस्मिल्ला खां पूजा की शहनाई बजाया करते थे, जहां मैहर में मां शारदा के मंदिर में अलाउद्दीन खां आरती का संगीत बजाया करते थे, जहां अनगिनत हिन्दू अजमेर और निजामुद्दीन की दरगाहों में कव्वाली गाते हैं, जहां अनगिनत मुस्लिम कवियों ने कृष्ण के गीत लिखे हैं, वहां पर नफरत एक लादी गई हिंसा है जिसे खारिज करने की जरूरत है। मीडिया सहित सामाजिक आंदोलनकारियों को चाहिए कि जहां कहीं धार्मिक उदारता, और धार्मिक सद्भावना की मिसालें खड़ी दिखती हैं, उनके बारे में भी देश के लोगों को बताया जाए क्योंकि यह देश सद्भावना की मिसालों का देश है, नफरत की मिसाइलों का देश नहीं है। 
-सुनील कुमार

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