संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  4 अक्टूबर :  धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ जजों को ही पहल करनी होगी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 अक्टूबर : धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ जजों को ही पहल करनी होगी
Date : 04-Oct-2019

हिन्दुस्तान में धार्मिक त्यौहार आमतौर पर इतना अधिक हल्ला-गुल्ला लेकर आते हैं कि जब सड़क किनारे या सार्वजनिक जगहों पर पंडाल तनने शुरू होते हैं, आसपास के लोगों के मन दहशत से घिर जाते हैं कि अब दस दिन या नौ रात पता नहीं क्या हाल होगा। लेकिन धर्म है कि उसके हिंसक तौर-तरीके बढ़ते ही चले जा रहे हैं, और आम इंसान उसके नीचे कुचलते जा रहे हैं। अभी कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रामलीला के एक कार्यक्रम की जानकारी देने के लिए शहर के सत्तारूढ़ पार्टी के मेयर ने मीडिया से बात की, तो बताया कि पिछले दिनों हुए गणेश विसर्जन में झांकियों के साथ बजाए जा रहे म्यूजिक की आवाज इतनी तेज थी, इतनी तेज थी कि झांकियों के रास्ते में बसे मकानों में दो बुजुर्गों की इस शोर की वजह से हार्ट अटैक से मौत हो गई। इस बात में जरा भी नाटकीयता नहीं लगती है क्योंकि यह शोर हिंसा की सारी सीमाओं को पार कर चुका है, और अदालती आदेशों को अपने पैरोंतले रौंदते हुए बढ़ते चले जा रहा है। इस बात को हम इसी जगह दसियों बार लिख भी चुके हैं कि बूढ़े, बीमार, छोटे बच्चे, और पढऩे वाले छात्र-छात्राओं का जो बुरा हाल धार्मिक शोर से होता है, उससे ऐसा लगता है कि धर्म इंसानों को खत्म करने पर आमादा है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जिन दो लोगों के दिल से दौरे से मौत की बात राजधानी के महापौर ने बताई है, उन मौतों से नीचे कितने लोगों की सेहत धार्मिक शोरगुल से बिगड़ी होगी यह समझ पाना आसान है, आंकड़ों में गिन पाना मुश्किल है। 

और यह सब तब हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट, और तकरीबन तमाम राज्यों की हाईकोर्ट ऐसे शोरगुल के खिलाफ बार-बार आदेश दे चुकी हैं, बार-बार अफसरों को चेतावनी दे चुकी हैं, और अदालतों के आदेश लुग्दी बनकर कागज कारखानों में जाकर फिर से टाइपिंग का कागज बनकर अदालतों के कम्प्यूटर-प्रिंटर तक पहुंच चुके हैं, इनका असर कुछ नहीं हुआ। अभी जो खबर सामने आई है उसके मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने शोरगुल नापने के लिए करोड़ों की मशीनें खरीदी थीं, और बिना इस्तेमाल वे पड़ी-पड़ी खराब हो गईं। आम लोगों को बिना मशीनों के भी यह मालूम है कि सड़कों पर धार्मिक शोरगुल का हाल क्या है। डीजे और लाऊडस्पीकर के साथ चलती झांकियों के बगल से जो निकलते हैं, वे अगर कारों में भी हैं, तो आवाज से पूरी की पूरी कार हिलने लगती है, उसके शीशे टूट जाने का खतरा दिखता है। इसी तरह किसी घर के बगल से जब ऐसी झांकियां निकलती हैं तो खिड़कियों के शीशे चूर-चूर हो जाने का खतरा लगता, लेकिन किसी की मजाल नहीं होती कि धार्मिक-गुंडों से हाथ जोड़कर भी कुछ अपील की जा सके। 

दरअसल जब प्रशासन और पुलिस के अफसर अपनी जिम्मेदारी को छूना भी नहीं चाहते, जब गुंडागर्दी और हिंसा को रोकने का मतलब महज चाकूबाजी रोकने का रह जाता है, तब ऐसे पुलिस-प्रशासन का कोई असर मवालियों पर नहीं बचता, अमन-पसंद आम जनता फिर भी इनको कानून का रखवाला मान लेती है। यह देखना एकदम ही शर्मनाक है कि किसी प्रदेश की राजधानी में मंत्रियों और बड़े अफसरों, राजभवन के इलाके को तो वीआईपी इलाका करार देकर वहां लाऊडस्पीकर रोक दिए जाते हैं, लेकिन बाकी शहर के इंसानों को मुर्दा मानते हुए उनके कानों पर हमले की खुली छूट दे दी जाती है। यह सोच अपने आपमें धिक्कार के लायक है कि शोरगुल से बचाने के लिए भी इंसानों में ऐसे एक तबके को वीआईपी मानकर उसके कानों के लिए राहत का इंतजाम किया जाता है, और बाकी जनता को धार्मिक गुंडागर्दी झेलने का हकदार मान लिया जाता है। शोरगुल को नापना आम जनता के लिए आसान बात नहीं है, और वैसा नापना अदालत में किसी सुबूत की तरह काम भी नहीं आएगा, इसलिए हाईकोर्ट को चाहिए कि वह अपनी जिला अदालतों के जजों को धार्मिक शोरगुल की जगहों पर भेजें जहां वे खड़े रहकर वीडियो रिकॉर्डिंग करवाएं, और देश का कानून, अदालती हुक्म लागू न करवाने वाले अफसरों को कटघरे तक ले जाएं। वोटों से चुनी जाने वाली सरकारें धर्म या जाति, या आध्यात्म की संगठित गुंडागर्दी के सामने लेट जाने का मिजाज रखती हैं, उनसे अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन अदालतों को चूंकि वोटरों के सामने नहीं जाना पड़ता, उनके सामने एक पुख्ता नौकरी रहती है, अदालतों की हिफाजत भी रहती है, इसलिए लोगों को बचाने का काम अब महज जज ही कर सकते हैं। एक निर्वाचित महापौर जब अपने शहर में धार्मिक गुंडागर्दी का यह हाल गिना रहा है, तो हाईकोर्ट को तो चाहिए कि इस महापौर को ही हलफनामे के साथ बुलाए, और उस हलफनामे के आधार पर अफसरों को कटघरे में खड़ा करे। जनता के बीच आज किसी तबके की इतनी ताकत नहीं है कि धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ मुंह भी खोल सके, इसलिए जजों को ही पहल करनी होगी। 
-सुनील कुमार

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