संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 अक्टूबर : ...चुनावी मैदान में उतरा  ठाकरे परिवार पहली बार
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 अक्टूबर : ...चुनावी मैदान में उतरा ठाकरे परिवार पहली बार
Date : 03-Oct-2019

भारत की राजनीति में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का परिवार कुछ मायनों में बड़ा अनोखा रहा है। इस परिवार से अब तक किसी ने चुनाव नहीं लड़ा था जबकि महाराष्ट्र की सरकार और मुम्बई महानगरपालिका में यह पार्टी लंबे समय से सत्ता में भागीदार रही। यह परिवार अमूमन घर के बाहर कम दिखता है, बाल ठाकरे के बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने पार्टी सम्हाली, तो वे भी बहुत ही गिने-चुने समारोहों में घर या मुम्बई के बाहर जाते दिखे। यह पहला मौका है जब बाल ठाकरे की तीसरी पीढ़ी, उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे अब चुनाव लड़ रहे हैं। लोकतंत्र में जनता के बीच से जीतकर आना एक अलग अहमियत रखता है, और इसके बिना लोगों को वह सम्मान नहीं मिल सकता जो कि लड़कर हारे हुए नेता को भी मिलता है। सोनिया गांधी दूसरे देश से ब्याह कर हिन्दुस्तान आई थीं, और यहां की नागरिक होकर एक मजबूर वक्त में वे पार्टी की अध्यक्ष बनीं, बार-बार सांसद बनीं, और जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता को साबित करने से उनका एक अलग महत्व स्थापित हुआ। 

लोकतंत्र में चुनावी राजनीति में उतरने वाली पार्टियों के नेताओं को जनता के बीच अपनी पकड़ साबित करने से परहेज नहीं करना चाहिए। जो लोग घर बैठे राजनीति चलाते हैं, वे लोग पीछे की सीट पर बैठकर ड्राइविंग करने जैसा काम करते हैं। देश में कई प्रदेशों में एक-एक कुनबे के कब्जे वाली पार्टियां हैं, लेकिन उनमें से हर पार्टी के नेता चुनाव लड़ते और जीतते-हारते आए हैं। कुनबापरस्ती भारतीय राजनीति में न कोई अनोखी बात रह गई है, और न ही इसका महज कांग्रेस से कोई लेना-देना रह गया है। बहुत सी पार्टियां एक कुनबे, एक घर, और एक पीढ़ी के कब्जे में इस तरह चलने वाली पार्टियां हैं कि मानो किसी धार्मिक मठ के मठाधीश अपने बाद अपनी अगली पीढ़ी को गद्दी देकर जाएं। चुनाव आयोग के नियम भी इसे कभी काबू नहीं कर पाते क्योंकि आयोग की शर्तों को पूरा करने के लिए कुछ क्लर्क बैठकर पार्टियों के ऐसे कुनबों के चुनाव की रस्म अदायगी करते रहते हैं। धीरे-धीरे देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर अधिकतर पार्टियां ऐसी रह गई हैं जो कि एक घर से चलती हैं, और अब इनमें से आखिरी पार्टी, शिवसेना, भी परिवार को चुनाव में उतार रही है। 

महाराष्ट्र के भी कुछ ऐसे राजनीतिक दल हैं जो कि शरद पवार की एनसीपी जैसे एक परिवार के भीतर चलते हैं, और इनमें शिवसेना सबसे ही बड़ी और ताकतवर पार्टी है जो कि भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी चुनाव के ठीक पहले तक अपनी एक अलग सोच उजागर करने से परहेज नहीं करती है, और एनडीए का हिस्सा रहते हुए भी जिसने मोदी और भाजपा की खुली आलोचना करने, केन्द्र की एनडीए सरकार की खुली आलोचना करने से परहेज नहीं किया था, उस वक्त भी जब यह पार्टी महाराष्ट्र में भी भाजपा के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन में थी। अब महाराष्ट्र मेें आदित्य ठाकरे के चुनाव लडऩे के साथ ही इस प्रदेश में चुनावी गठबंधन की ये दो पार्टियां एक अलग किस्म के तनाव से गुजरने जा रही हैं क्योंकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री एक शिवसैनिक होगा। यह बात एक गठबंधन में किस तरह हो सकती है यह समझना कुछ मुश्किल है क्योंकि आज महाराष्ट्र में भाजपा अधिक सीटों पर लड़ रही है, और शिवसेना कम सीटों पर। ऐसा तभी हो सकता है जब यह गठबंधन सत्ता में आए, और गठबंधन के भीतर शिवसेना की सीटें अधिक आएं। अभी हम चुनावी अटकलों पर जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन अगर महाराष्ट्र की अगली सरकार में शिवसेना किसी भी तरह भागीदार रहती है, तो उसके सबसे नौजवान विधायक सरकार के भीतर अपनी पार्टी के सबसे ताकतवर नेता भी रहेंगे, और ऐसे में ऐसी एक संभावित राज्य सरकार का प्रयोग देखना बड़ा दिलचस्प भी रहेगा। वक्त ने यह साबित किया है कि शिवसेना और भाजपा के बीच तनातनी चाहे कितनी ही चलती रहे, चुनाव के वक्त वे फिर एक-दूसरे के वफादार साथी बन जाते हैं, और भाजपा का यह सबसे पुराना गठबंधन चुनाव में मजबूत ही रहता है। आगे-आगे देखें होता है क्या...
-सुनील कुमार

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