संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 सितंबर : तो उसकी बद्दुआ की मार बहुत बुरी होती है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 सितंबर : तो उसकी बद्दुआ की मार बहुत बुरी होती है
Date : 25-Sep-2019

अखबारों में राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं के दफ्तरों के बहुत से स्टिंग छपते हैं। अधिक खोजी रिपोर्टिंग करने वाले अखबारनवीस किसी काम को करवाने का नाटक करते हुए खुफिया कैमरों से लैस होकर जाते हैं, और दफ्तरों में कर्मचारियों की रिश्वत की मांग, या किसी जनसेवा केन्द्र में निर्धारित फीस से कई गुना अधिक की मांग करते हुए लोगों को कैमरों पर या माइक्रोफोन में कैद करके रिपोर्ट छापते हैं। इसके बाद जब बड़े अफसरों से उनके मातहत लोगों के इस काम के बारे में पूछा जाता है, तो एक रटा-रटाया जवाब अखबार में देखने मिलता है कि वीडियो भेज दें, उस पर कार्रवाई की जाएगी। अखबारों में तकरीबन हर दिन ऐसे स्टिंग ऑपरेशन आते हैं जो कि रोजाना के छोटे-छोटे कामों में एक संगठित और नियमित रिश्वत के सुबूत रहते हैं, लेकिन अगर इन पर सच में ही कार्रवाई हुई रहती तो हर दिन के अखबार में पिछले पखवाड़े या पिछले महीने स्टिंग में फंसे लोगों की गिरफ्तारी की खबर भी आती रहती, लेकिन वैसा कुछ देखने में नहीं आता है। 

अब ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि छोटे-छोटे दफ्तरों के छोटे-छोटे कर्मचारियों का ऐसा रोजाना का संगठित अपराध जब एक जगह सामने आता है तो उस विभाग के मंत्री या सचिव अपने मातहत आने वाले बाकी शहरों के वैसे ही दफ्तरों का क्या करते हैं? क्या वे बाकी जगहों पर जांच करवाते हैं? क्या वे स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कोई कड़ी कार्रवाई करते हैं जो कि बाकी भ्रष्ट लोगों के सामने मिसाल बन सके? या वे अधिक संगठित भ्रष्टाचार में लग जाते हैं? आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए जब ऐसी मोटी रिश्वत कदम-कदम पर देनी पड़ती है, तो उसकी नाराजगी चुनाव के वक्त निकलती है, और फिर कितना भी चुनावी खर्च लोगों को उस नाराजगी से नहीं बचा पाता। और चुनावों से परे भी सोचें तो जब लोगों ने संविधान की कसम खाकर काम करना शुरू किया है, तो वे किसी भी अपराध के सुबूत सामने आने पर उसे अनदेखा किस तरह कर सकते हैं? 

जिस तरह अखबार रोजाना के स्टिंग पर रोज अफसरों का पक्ष लेते हैं, क्या उसी तरह हर महीने या हर तीन महीने में उनसे कार्रवाई का हिसाब लिया जा सकता है? यह पूरा सिलसिला सरकार के संवेदनाशून्य हो जाने का है जिसमें लोग खुले भ्रष्टाचार के ठोस सुबूतों को भी अपनी आंखें खोलने के लिए काफी नहीं मानते, और न ही उन्हें यह लगता है कि अपने मातहत व्यवस्था को सुधारना उनकी जिम्मेदारी है। अखबारों में सड़कों की बदहाली, या किसी और तरह के बुरे हाल की तस्वीरों और खबरों में जब अफसरों का पक्ष लिया जाता है, तो वहां भी एक रटा-रटाया जवाब मिलता है कि वे उसे दिखवाएंगे। अगर सब कुछ अखबार के रिपोर्ट के बाद ही दिखवाना है, तो फिर अखबार की रिपोर्ट छपने के पहले वे अफसर अपनी जिम्मेदारियों को लेकर क्या करते हैं? जब अखबार के फोटोग्राफर या रिपोर्टर ऐसे भ्रष्टाचार को आसानी से कैमरों में कैद कर लेते हैं, तो बड़े अफसर ऐसी जगहों पर पहले से खुद होकर कभी दौरा क्यों नहीं करते? राज्य भर में जिस विभाग से ऐसे भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं, वे इस बात का सुबूत भी रहती हैं कि कैमरों में कैद भ्रष्ट लोगों के ऊपर, बहुत ऊपर तक सब कुछ गड़बड़ है। जनता को रोजमर्रा के काम के लिए ऐसी संगठित रिश्वतखोरी के रहमोकरम पर छोड़ देना बहुत ही गैरजिम्मेदारी की बात है, और सरकार को समय रहते जाग जाना चाहिए क्योंकि इतनी भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारना रातों-रात का काम नहीं है, बरसों का काम है, और भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव पांच बरस में नहीं होते हैं, हर कुछ बरस में कोई न कोई चुनाव होते रहते हैं। गरीब और आम जनता जब लुटती है, तो उसकी बद्दुआ की मार बहुत बुरी होती है।
-सुनील कुमार

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