संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 अगस्त : पुलिस को संगठित मुजरिम गिरोह बनने से रोका जाए..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 अगस्त : पुलिस को संगठित मुजरिम गिरोह बनने से रोका जाए..
Date : 17-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की रायपुर पुलिस के तीन सिपाहियों का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे एक छोटे से नाबालिग बच्चे को मिलकर पीट रहे हैं, और पीटते हुए उसका मजा भी ले रहे हैं। रेलवे पटरी के पास की इस हिंसा को ट्रेन में बैठे एक मुसाफिर ने कैमरे में कैद किया, और रेलवे के बोर्ड सहित वीडियो को सोशल मीडिया पर डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि पुलिस को आनन-फानन इन सिपाहियों को निलंबित करना पड़ा। यह एक अलग बात है कि उन्हें राजधानी में ही लाईन अटैच किया गया है, और यहां रहते हुए उन्हें इस बात की पूरी सहूलियत रहेगी कि वे इस गरीब बच्चे के परिवार पर, उस बच्चे पर दबाव बना सकें। अब पुलिस की तरफ से यह कहानी पेश की जा रही है कि यह बच्चा जेब काटते पकड़ाया था, और पुलिस उससे पूछताछ कर रही थी। अगर कोई बच्चा जुर्म करते मिलता भी है, तो उसे किसी सुनसान इलाके में ले जाकर खुले में पीटकर कोई पूछताछ करने की इजाजत कौन सा कानून देता है? इन तीनों सिपाहियों की बर्खास्तगी से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जिनकी सोच ऐसी है, वे मौका मिलते ही फिर ऐसी दूसरी हरकत करेंगे। 

इसी शहर में रेलवे स्टेशन पर पुलिस की कई किस्म की कहानियां हाल के दशकों की दर्ज हैं। रेलवे पुलिस नाम की रेलवे की रहती है, उसमें तैनाती राज्य की पुलिस की होती है। इस राज्य में एक आईपीएस अफसर रमेश शर्मा की जब रायपुर रेलवे पुलिस में एसपी की तैनाती थी, उन्होंने प्लेटफॉर्म पर घूमने वाले बेघर और बेसहारा बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया था जहां पुलिस उन बच्चों को पढ़ाती थी। जब तक वे रहे, तब तक स्कूल चलते रहा, बच्चों से धीरे-धीरे नशे की आदत भी छुड़वाने की कोशिश की गई, रमेश शर्मा ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा और इन बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसा कि किसी भी सरकारी नौकरी में होता है, एक वक्त के बाद उनका तबादला हो गया, और बाद में आए अफसर और उसके मातहत लोगों ने इन बच्चों के साथ वही सुलूक फिर शुरू कर दिया जो कि रमेश शर्मा के आने के पहले तक चलता था। स्टेशन के इलाके में मुजरिमों का एक बड़ा गिरोह चलाने वाली एक कुख्यात सरगना महिला स्टेशन पर पलने वाले बच्चों से जुर्म करवाती थी, और उस कमाई को गिरोह और पुलिस दोनों खाते थे। स्कूल बंद हो गई, और बच्चों को चेतावनी दे दी गई कि या तो वे गिरोह में काम करें, या फिर उन्हें किसी भी मामले में पकड़कर अदालत में पेश कर दिया जाएगा, और सुधारगृह भेज दिया जाएगा। पुलिस ने एक संगठित और पेशेवर मुजरिम गिरोह की तरह बच्चों को पूरी तरह मुजरिम बनाने का काम इतनी खूबी से किया कि स्टेशन के बेघर बच्चे उसके लिए मजबूर कर दिए गए। 

यह बात सुनने में एक फिल्मी कहानी लगती है, लेकिन यह हमारी देखी हुई हकीकत है, और इस बात को लिखने वाले संपादक ने ऐसे दर्जनों बच्चों से रूबरू बात की थी, और इन बच्चों को बचाने में लगे हुए एक सामाजिक संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं से भी पुलिस का यह जुर्म समझा था। अपने खुद के इस तजुर्बे के आधार पर हम यह बात लिख सकते हैं कि इस देश में बेघर और बेसहारा बच्चों को पेशेवर मुजरिम बनाने में, उन्हें सेक्स के धंधे में धकेलने में पुलिस का बड़ा हाथ रहता है। इसलिए अभी जो हिंसा का वीडियो सामने आया है उसे महज एक घटना मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि उसे एक संकेत मानकर पुलिस की पूरी बीमारी का इलाज करना चाहिए। अपने बारे में ऐसी बातें मानना पुलिस के किसी अफसर को अच्छा भी नहीं लगता, अगर ऐसा वीडियो सुबूत के तौर पर लोगों के बीच तैर नहीं गया होता। इसके बाद अगर पुलिस खुद कार्रवाई नहीं करती, तो कोई अदालत कार्रवाई करती और वह महज सिपाहियों तक सीमित नहीं रहती। पुलिस को अपने आपको एक संगठित अपराधी गिरोह बनने से बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसा गिरोह महज मुजरिमों के गिरोह के मुकाबले समाज के लिए कई गुना अधिक खतरनाक होगा। आज छत्तीसगढ़ में पुलिस जगह-जगह तरह-तरह के संगठित अपराध, अपराधी कारोबार बढ़ाने के लिए पेशेवर लोगों पर दबाव बनाते दिखती है ताकि सभी का फायदा हो सके। यह सिलसिला तुरंत थामने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार

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