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 चाटुकारिता और भ्रष्टाचार बनाम शासकीय सेवा!
चाटुकारिता और भ्रष्टाचार बनाम शासकीय सेवा!
Date : 12-Aug-2019

एक शासकीय कर्मचारी होने के नाते शीर्षक में अंकित शब्दावली से न केवल बहुत अच्छी तरह परिचित हूं, बल्कि प्रताडि़त होने के कारण इसकी संवेदनशीलता और प्रभाव भी जानती हूँ! मेरे कई साथियों को शायद यह नागवार गुजऱे, कष्ट हो , खिसियाहट हो पर जो इस वेदना से गुजऱ चुके हैं या गुजऱ रहे हैं उनके रिसते हुए जख्मों पर ये मलहम ज़रूर लगाएगा ठंडक पहुंचाएगा। क्योंकि सीसीए  रूल की मर्यादा के कारण सबकी ज़ुबान बंद रहती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी सिफऱ् ब्लैकमेलर पत्रकारों को, फि़ल्मी भांड को ही मिली हुई है। बाक़ी देशवासी किसी न किसी रूप से अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते ही किसी न किसी कानूनी शिकंजे में फंस जाते हैं और फिर भागते हैं उनके मित्र और परिजन कोर्ट की ओर उनको जमानत दिलाने को! 

हाल ही में एक मीम ट्वीटर पर डालने के कारण एक लडक़ी को हवालात की हवा खानी पड़ी थी सभी को स्मरण होगी वो घटना ! ख़ैर! मैं सिर्फ शासकीय कर्मचारियों की बात कर रही हूं। सच ये भी है कि सीसीए रूल का प्रतिबंध भी सीधे-साधे नियमानुसार काम करने वाले कर्मचारियों को ही प्रताडि़त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। चाटुकार और भ्रष्ट कर्मचारियों के लिए उसके मायने बदल दिए जाते है!
 हमारे कैडर की बात करें-मेरे एक साथी तहसीलदार पर लोकायुक्त के 59 केस दर्ज हैं, पर वो सदा मुख्यालय तहसीलदार के पद पर ही सुशोभित रहते हैं । सारे नियम दरकिनार क्योंकि सबसे बड़ा गुण वरिष्ठ अधिकारियों की चाटुकारिता और भ्रष्टाचार में निपुणता उनके सारे दुर्गुनों पर भारी पड़ती है! हम लोगों ने अकादमी में जो ट्रेनिंग की थी वो विभागीय परीक्षा के लिए और काम करने की क्षमता बढ़ाने के लिए की थी। पर पिछले 2-3 नायब तहसीलदारों के बैच को अपने साथ काम करते देख कर लगता है कि अकादमी में अब कार्य के प्रति निष्ठा और अनुशासन की ट्रेनिंग नहीं चाटुकारिता और भ्रष्टाचार की ट्रेनिंग दी जा रही है। हम वरिष्ठ तहसीलदारों को परे हटाकर इन नवनियुक्त साहबानो को मुख्यालय तहसीलदार के पद पर नवाज़ा जा रहा है। 
जिले के वरिष्ठतम अधिकारी, तहसील के वरिष्ठतम अधिकारी इन्हें अपने साथ गाड़ी में बैठा कर हमेशा घूमते नजऱ आएंगे।  आज भी वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष सीधे बैठने वाले हम लोगों के सामने ये नव नियुक्त अधिकारी बड़े साहब की बाज़ू में कुर्सी डालकर कानाफुसी करके बात करते हैं। आज तक समझ नहीं आया कि ऐसा क्या गुण हैं इन नए-नए साहिबान में?
सारे प्रदेश के जिलों में देख लीजिए। तहसीलदार होते हुए भी नायब तहसीलदार को कहीं मुख्यालय का प्रभार दिया गया है, कहीं बड़ी तहसीलों का प्रभार और ये हालात हैं कि तहसीलदारों को दरकिनार कर वरिष्ठतम साहिबान सीधे इन छोटे प्रभावशाली साहिबान से बात करते हैं। सारे नियम-क़ायदे ताक पर रखकर इनको ही प्राथमिकता दी जा रही है पता है क्यों ? क्योंकि ये साहिबान ट्रेनिंग में वरिष्ठों को पटाने की कला और चाटुकारिता सीखकर आए हैं, इसमें पारंगत हैं। काम से कोई लेना-देना नहीं। क्योंकि वरिष्ठतम साहिब ख़ुश तो किसी शिकवा-शिकायत पर किसी तरह की कार्रवाई होने का डर ही नहीं है। 
सीसीए रूल की बात करें तो सिर्फ ईमानदार और कार्य के प्रति निष्ठा रखने वालों पर ही यह लागू होता है, चाटुकारों पर क़तई नहीं! जिले में पदस्थापना में कोई वरीयता नहीं सिर्फ चाटुकारी में पारंगतता देखी जाती है ! वरिष्ठतम साहिब के पास इसका कोई तर्कयुक्त जवाब नहीं मिल सकेगा कि आपके द्वारा की गई जिले की पदस्थापना का नियमानुसार औचित्य क्या है ?? मेरे कई साथियों को लगेगा कि अपनी बात कहने के लिए इतनी बात की है मेने, सहीं भी है जब इतना कुछ बोला तो अपनी बात तो की ही जाएगी न !!!
हाल ही में मेरी पदस्थापना जि़ला शयोपुर हुई है, सारी 6 तहसील हैं जिसमें 2 पर तहसीलदार पदस्थ हैं वो भी दूरस्थ तहसील जहाँ कोई क्रढ्ढ भी उस तहसील के सारे कार्य सम्पादित कर सकता है वहाँ तहसीलदार पदस्थ हैं ।  मुख्यालय पर छोटे साहब तहसीलदार बने बैठे हैं ! मुझे निर्वाचन शाखा का प्रभारी बना कर कलेक्टर ओफिस में बैठा दिया गया है जहाँ कि तहसीलदार का कोई पद ही नहीं है, मेरी समस्या ये हैं कि महीना पूरा हो जाने पर मुझे वेतन कहाँ से मिलेगा ??कनिष्ठ साहिबान पर दो दो तहसील का प्रभार है कार्य में अत्यधिक निपुण जो ठहरे !! न न न जनता के काम नहीं वरिष्ठ साहिबान के काम !! अब कोई हमारे वरिष्ठतम साहिब से पूछेगा कि तहसीलदार के होते हुए नायब साहब क्यों बैठे हैं तहसीलदार कि कुर्सी पर ? और तहसीलदार को निर्वाचन शाखा में क्यों रखा गया है ?? बहुत सारे एसे तर्क दिए जाएँगे जिनका कोई सही लोजिक नहीं है पर मानना ही पड़ेगा वरिष्ठतम साहब जो कह रहे हैं उस तर्क की तह में जाएँगे तो बिलकुल आधार हीन होगा पर है तो है, कोई क्या कहा सकता ष्टष्ट्र रूल ज़ुबान पर ताला जो डाल कर रखता है ! घिन आती है इस व्यवस्था पर बहुत क्लेश होता है पर क्या करें कोई और रास्ता भी तो नहीं हैं न ‘नौकरी क्यों करी गरज पड़ी तो करी ‘वाली कहावत जो चरितार्थ होती है चुप हूँ !
हद तो ये है कि परिविक्षाधीन नायब साहब को ही तहसील का प्रभार दे दिया गया है शायद विभागीय परीक्षा भी पास की है या नहीं पता नहीं ! पर वरिष्ठ साहिबान की कृपा दृष्टि हो तो सब सम्भव है यहाँ !! मेरी एक साथी हैं प्रदेश के एक बड़े महानगर में तहसीलदार , मुझे लगता हैं सेवा का 90त्न उसी जिले में काटा है और अभी भी काट रहीं हैं अगर डिबेट करा ली जाए तो कई धाराओं में स्पष्टीकरण नहीं दे पाएँगी पर महानगर का पट्टा वरिष्ठ अधिकारियों ने बना दिया है तो बना दिया ! 
काहे का ष्टष्ट्र रूल काहे का निर्वाचन आयोग का नियम ! सब दरकिनार उनको मेरी पोस्ट से सबसे ज़्यादा मिर्च लगती है सो फिर लगेगी !! इसीलिए जानबूझकर जि़क्र किया है उनका मेने, ख़ुद समझे कौन हैं वो ?? ख़ैर ...!! कुछ लिखकर थोड़ी सी कुछ मानसिक क्लेश और व्यथा से राहत मिली है शेष फिर लिखूँगी क्योंकि ष्टष्ट्र रूल के अंतर्गत इस पोस्ट का स्पष्टीकरण भी देना होगा न ! उसके लिए भी मानसिक रूप से ख़ुद को तैयार कर रही हूँ क्योंकि सच कड़वा होता है जिसका स्वाद सबको पसंद नहीं आता ! आए न आए सच कहने की आदत ना कभी गई न जाएगी !! शेष अगली कड़ी में ! जय ष्टष्ट्र रूल ! जय हिंद 

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