विशेष रिपोर्ट

बीजापुर, जिंदगियां बचाने का ऐसा जुनून, नक्सल इलाके में इस तरह काम कर रहे हैं दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी
बीजापुर, जिंदगियां बचाने का ऐसा जुनून, नक्सल इलाके में इस तरह काम कर रहे हैं दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी
Date : 30-Jul-2019

जिंदगियां बचाने का ऐसा जुनून, नक्सल इलाके में इस तरह काम कर रहे हैं दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी

मोहम्मद ताहीर खान


बीजापुर, 30 जुलाई (छत्तीसगढ़)। यहां स्वास्थ्य महकमे के एक दो नहीं बल्कि तीन दर्जन से ज्यादा स्वास्थ्य कर्मियों पर लोगों की जिंदगी बचाने का ऐसा जुनून है कि वे अपनी मौत की परवाह किए बिना ही हर दिन मौत का सामना करते हुए हजारों लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं। 

सीएमएचओ  डॉंक्टर बी.आर. पुजारी बताते हैं कि इन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। मगर जिले में पदस्थ कर्मचारियों की बदौलत ये काम आसान हो जाता है। डॉ पुजारी का कहना है कि इन कर्मचारियों का हौसला बनाये रखने के लिए वे खुद भी अपने कर्मचारियों के साथ ऐसे इलाकों में पहुंचकर मेडिकल कैंप लगाते हैं।

 बीजापुर जिले के उन इलाकों में जहां लोकतंत्र नहीं बल्कि लालतंत्र का बोलबाला है। ऐसे दुर्गम इलाकों में अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर स्वास्थ्य कर्मी लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा रहे है। कभी उपनते नदी नालों में लकड़ी के बने पतले से नाव पर सवार होकर  तो कभी पहाड़ी रास्ते पर कई किलोमीटर पैदल चलकर हजारों आदिवासियों को मौत के मुंह से बाहार निकालते हैं। पहाड़ी रास्ते पर बड़ी मुश्किल से चढ़ाई करते टै्रक्टर पर सवार होकर जाते हंै तो कभी बाईक तो कभी कई किमी पैदल ही पहुंच कर पेड़ के नीचे मरीजों का ईलाज करते हंै। 
जिले में पदस्थ तीन दर्जन से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन ऐसी ही मुसीबतों का सामना करते हुए नक्सल  इलाके में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाते हैं। दरअसल जिले का करीब 40 फीसदी इलाका ऐसा है जहां सीधे तौर पर माओवादियों की हुकूमत चलती है। ऐसे में इन इलाकों तक पहुंचने के लिए आजादी के सात दशक बाद भी  सरकार सडक़ या नदी नालों में पुल पुलिये का निर्माण नहीं करवा पाई है। नतीजतन ये पूरा इलाका शेष भारत से पूरी तरह से कटा हुआ है। ऐसे में इन इलाकों के बाशिंदों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बहुत कठिन और चुनौती से भरा काम होता है। 

मगर जिले के भोपालपटनम, भैरमगढ, गंगालूर, पामेड, बीजापुर, फरसेगढ, कुटरू, चेरपाल  और मिरतुर में पदस्थ स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर इन इलाकों में पहुंचते हैं। पेड़ के नीचे मेडिकल कैम्प लगाकर ऐसे इलाके के मरीजों का ईलाज करते हैं। 

उल्लेखनीय कि  अशिक्षा और जागरूकता के अभाव में इस इलाके के ग्रामीण अंधविश्वास के कैद से बाहर नहीं निकल पाये हैं।   जब बीमार पड़ते हैं तब ये अस्पताल नहीं पहुंचकर गांव में ही सिरहा-गुनिया या जाड-फूंक का सहारा लेते हैं। इस कारण कईयों दफे छोटी-छोटी बीमारियों की वजह से ये आदिवासी वक्त बेवक्त ही काल के गाल में समा जाते हैं। 

 

 

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