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दैनिक 'छत्तीसगढ' का आजकल, 3 जून : सम्मान के झांसे का कारोबार
दैनिक 'छत्तीसगढ' का आजकल, 3 जून : सम्मान के झांसे का कारोबार
Date : 03-Jun-2019

सुनील कुमार

सोशल मीडिया की मेहरबानी से पिछले दो दिनों से अचानक एक खूबसूरत पुलिस अफसर की तस्वीर के साथ यह जानकारी चारों तरफ फैल रही है कि आईपीएस रूपा यादव ने एक सम्मान समारोह में सम्मान लेने से इसलिए इंकार कर दिया कि सम्मान देने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। इस पोस्ट में कहा गया है कि रूपा यादव ने यह कहा कि जो पार्टी ऐसी साध्वी प्रज्ञा को टिकट देती है जो कि शहीद पुलिस अफसर हेमंत करकरे को श्राप देकर मारने की बात कहती है। 
जैसा कि आज किसी भी मामूली समझदार को भी करना चाहिए, इस पोस्ट की हकीकत जानने के लिए इंटरनेट पर सर्च किया गया, तो दिखा कि यह तस्वीर कर्नाटक की एक आईपीएस अधिकारी डी.रूपा की है, और उन्होंने एक गैरसरकारी संस्था द्वारा 2018 में दिए जाने वाले एक बड़े नगद सम्मान को लेने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उनका विवेक उन्हें यह ईनाम मंजूर करने की इजाजत नहीं देता। उन्होंने अपनी चि_ी में लिखा- हर सरकारी कर्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वे अर्धराजनीतिक या राजनीति से थोड़े भी संबंध रखने वाले संगठनों से सामान दूरी बनाए रखें, और साथ ही उनके प्रति तटस्थ रहें, केवल तभी लोकसेवक जनता की नजरों में अपनी निष्पक्ष छवि बनाए रख सकते हैं। 
लोगों को याद होगा कि इस महिला अधिकारी ने डीआईजी जेल रहते हुए उस वक्त खबरों में जगह पाई थी जब उन्होंने प्रभावशाली कैदियों को जेल के भीतर मिलने वाले वीआईपी ट्रीटमेंट का पर्दाफाश किया था। इसके बाद उन्हें उस कुर्सी से हटा भी दिया गया था क्योंकि जिन कैदियों को ऐसी सहूलियत पाने का भांडाफोड़ उन्होंने किया था वे सत्ता के चहेते लोग थे। 
सोशल मीडिया में झूठ के तैरने में कुछ भी नया नहीं है। और केवल गैरजिम्मेदार-लापरवाह लोग ही सोशल मीडिया की बातों को बिना जांचे-परखे आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में इस पोस्ट के झूठे होने पर लिखने का कोई मकसद नहीं है। बल्कि लिखना इस बात पर है कि लोग जिस लापरवाही के साथ बड़ी दिलचस्पी लेते हुए सम्मान स्वीकार करते हैं, क्या वह खुद उनके ही इस सम्मान के पहले के बाकी सम्मान के लायक रहता है? लोग किसी भी राह चलती संस्था के मालिकनुमा एक-दो पदाधिकारियों की मर्जी से तय किए हुए सम्मान पाकर खुशी से फूले नहीं समाते। और लोगों के परिचय के कागज पर ऐसी लंबी लिस्ट रहती है जो उन्हें बड़ा सम्मानित साबित करती है। 
ऐसे सम्मान स्वीकार करने वाले लोग या तो इतने आत्ममुग्ध हो चुके रहते हैं कि वे अपने आपको सचमुच ही भारी सम्मान का हकदार मानने लगते हैं, या फिर उन्हें खबरों में आने के लिए, और बने रहने के लिए ऐसे सम्मान के बूस्टरडोज की जरूरत रहती है। कुछ संस्थाएं सम्मान देने को अपना पेशा बना लेती हैं, और भारत में तो राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी जालसाज संस्थाएं लगातार काम करती हैं जो देश भर में घूम-घूमकर अक्ल से खाली, और जेब से भरे लोगों की तलाश करती है, और उनके लायक कोई न कोई फर्जी सामाजिक योगदान दिखाकर उनका दिल्ली या मुम्बई के किसी समारोह में सम्मान बेच देती है। पिछले बरसों में तो देश के एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति ऐसे सम्मान समारोहों के पेशेवर मुख्य अतिथि होने लगे थे, और देश भर के फिजूल के मालदार लोग ऐसे सम्मान समारोह की तस्वीरें लाकर अपनी दीवारों पर सजाते हैं, और वहां मिलने वाले प्रतीक चिन्ह को सजाने के लिए अलमारियां भी बनवा डालते हैं। 
सम्मान के नाम पर हकीकत में अपमान का यह पेशा समाज के बाकी लोगों की समझ का भी एक मखौल होता है जिन्हें सिरे से बेवकूफ मानकर इस झांसे में लाया जाता है कि झांसेबाज सम्मान के हकदार लोग हैं। यह पूरा सिलसिला इतना गंदा है कि कुछ लोगों को इसकी कीचड़ के बीच कमल की तरह दिखाने के लिए उन्हें भुगतान करके सम्मान लेने के लिए तैयार किया जाता है, ताकि उनके साथ लिस्ट में वे लोग भी चमकदार दिख सकें जो कि अपनी असल जिंदगी के, अपने दायरे में महज अपमान के लायक हैं। 
किसी में जरा सा भी आत्मसम्मान हो तो उन्हें यह देखना चाहिए कि क्या उन्होंने सचमुच ही कोई ऐसा काम किया है जिस पर कोई उनका सम्मान करे? क्या उन्होंने अपने कामकाज के बीच उस कामकाज की सामान्य उम्मीदों से परे जाकर कोई इतनी बड़ी शहादत दी है कि कोई उनका सम्मान करे? लेकिन दिक्कत यह है कि जो सम्मान के लायक नहीं रहते, उन्हें जब मुफ्त में एक नाजायज सम्मान भी मिलने का आसार दिखता है, तो उनकी लार टपकने लगती है। 
जब किसी बड़े नेता, बड़े कारोबारी, या बड़े अफसर को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में अपने महत्व को बढ़ाने की चाह रहती है, या पद्मश्री जैसा कोई सम्मान पाने के लिए वे खबरों में भी रहना चाहते हैं, और अपने बायोडाटा को भी लंबा करना चाहते हैं, तो उनके मुसाहिब और मातहत देश भर में ढूंढ-ढूंढकर ऐसी संस्थाएं निकालते हैं जो भुगतान लेकर उनका सम्मान कर सके। और फिर सम्मान देने के धंधे में लगी हुई पेशेवर संस्थाएं धीरे-धीरे यह जान जाती हैं कि ऐसे कौन से हसरती लोग हैं जो भुगतान करके सम्मान पाने के लिए खड़े हुए तैयार मिलेंगे। 
ऐसे में कुछ लोगों को चाहिए कि सार्वजनिक रूप से ये सवाल भी खड़े करें कि किसी सम्मान के पीछे संस्था की नीयत क्या है, मकसद क्या है, उसका निर्णायक मंडल कौन है, उसके पैमाने क्या हैं, और किन तमाम लोगों के नाम पर सोचा गया, और बाकी नाम किस आधार पर खारिज किए गए। और कुछ नहीं तो कम से कम सूचना के अधिकार में, या सोशल मीडिया जैसे सार्वजनिक मंच पर लोगों से और संस्थाओं से ऐसे सवाल खड़े करने चाहिए, उससे लोगों की हसरतें कम हो या न हो, पक्षपात की हकीकत जरूर उजागर हो सकती है।

 

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