एरोमाथैरेपी या सुगंध चिकित्सा प्राकृतिक चिकित्सा का एक प्रकार है। एरोमाथैरेपी किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य की बेहतरी तथा तंदुरुस्ती के लिए सुगंधित तेलों के प्रयोग को कहा जाता है। यद्यपि पुरातन मिस्र, ग्रीक तथा रोमन कालों में विभिन्न पौधों से निकाले जाने वाले ऐसे सुगंधित तेलों का उपयोग किया जाता रहा है, जिनमें कि अत्यधिक विशिष्ट सुगंध होती है, तथापि इन तेलों में अनगिनत अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं तथा विभिन्न तेल प्रतिरोधक, विषाणु विरोधी तथा रोगाणुरोधक होते हैं।
सुगंधित तेलों को सुवास तथा उपचार हेतु हजारों वर्षों से यहां तक कि पुरातन मिस्र काल से पहले से प्रयुक्त किया जाता रहा है। शरीर को सुगंधों से अलंकृत करना सुगंधित तेलों पर ही अत्यधिक निर्भर करता है तथा ग्रीक योद्धा युद्ध मैदान पर जाने से पूर्व स्वयं को तेलों द्वारा अभ्यंजित करने के लिए मशहूर थे। दो हजार वर्ष पहले मध्य पूर्व में जो बहुमूल्य उपहार भेंट स्वरूप दिए जाते थे, उनमें गंधरस तथा लोबान भी शामिल थे। यूरोप में मध्यकाल के समय प्लेग जैसी बीमारी को नियंत्रित करने के लिए लौंग, सरू तथा रोजमेरी को जलाया जाता था।
सुगंध तथा उपचार दोनों उद्देश्यों से नैसर्गिक तेलों का उपयोग उन्नीसवीं सदी के आरंभ से तब समाप्त होना आरंभ हुआ, जब वैज्ञानिकों ने यह जान लिया कि सुगंध तथा औषधियों के लिए पौधों के तेलों को किस तरह संश्लेषित किया जाता है। तब यह सोचा जाता था कि नए संश्लेषित उत्पाद नैसर्गिक, ज्यादा महंगी सुगंधित सामग्रियों का स्थान ले लेंगे। इसी कारण उनका उपयोग घटता चला गया, लेकिन कृत्रिम गंध प्राकृतिक सुवास का स्थान नहीं ले पाई।