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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पुण्यतिथि पर 'निराला साहित्य' से गुलजार सोशल मीडिया
15-Oct-2021 12:50 PM (62)
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पुण्यतिथि पर 'निराला साहित्य' से गुलजार सोशल मीडिया

-Shriram Sharma

Suryakant Tripathi Nirala: सांस्कृति कार्यक्रम हो या फिर कोई साहित्यिक उत्सव ज्यादातर कार्यक्रमों की शुरूआत हिंदी साहित्य के ‘महाप्राण’ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की सरस्वती वंदना से होती है. जैसे ही मंच से कोई वक्ता वर दे, वीणावादिनि वर दे वंदना को सुर देता है सारे वातावरण में खामोशी के साथ नई ऊर्जा का संचार होता दिखाई देता है.

आज उसी महाप्राण सरस्वती पुत्र ‘निराला’ की पुण्यतिथि है. आज उनकी पुण्यतिथि असत्य पर सत्य की विजय के पर्व ‘विजयदशमी’ के दिन मनाई जा रही है.

निरालाजी को साहित्य जगत से लेकर राजनीतिक गलियारे, फिल्मी दुनिया समेत समाज के विभिन्न वर्ग अपने-अपने तरीके से स्मरण कर रहे हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म निरालाजी की तस्वीरों, उनकी कविताओं और उनके वाक्यों से निरालामय हो उठा है.

निराला विद्या की देवी सरस्वती ने अपने भारत को स्वच्छ हवा में पुष्पित-पल्लवित होने का वरदान मांगेत हैं-

वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे!

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

चूंकि cनिराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है. खड़ी बोली की इस लंबी कविता में राम और रावण के भीषण युद्ध का वर्णन है.

‘राम की शक्ति पूजा’ काव्य को निराला जी ने 23 अक्टूबर 1936 में पूरा किया था. इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र ‘भारत’ में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था.

रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर
लौटे युग दल, राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न.

‘राम की शक्तिपूजा’ में महाप्राण ने बताया है कि शक्ति की उपासना में लीन राम के सिर उठाते ही पूरा ब्रह्माण्ड कांप उठा और विद्युत् वेग से देवी का वहां पर अभ्युदय हुआ. उन्होंने तुरंत राम का हाथ थाम लिया. राम ने विथकित होकर देखा कि सामने मां दुर्गा अपने पूरे स्वरूप-श्रृंगार में भास्वर थीं. उन्होंने राम को आशीर्वाद दिया – ‘होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन!’ इतना कहकर देवी राम के ही मुख में लीन हो गईं.

‘राम की शक्तिपूजा’ कविता में निराला ने मां दुर्गा की आराधना में भगवान राम द्वारा अपने नेत्र समर्पित करने की घटना को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है-

बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन
“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन
“कहती थीं माता मुझको सदा राजीवनयन
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूं देकर मात एक नयन.”

निरालाजी के व्यक्तित्व और उनकी लेखनी का तमाम विद्वानों ने अलग-अलग वर्णन किया है. सोशल मीडिया पर साहित्यकार से लेकर राजनेता, फिल्मी कलाकार से लेकर आम आदमी तक अपने-अपने भावों में निराला को याद कर रहे हैं.

केंद्रीय मंत्री डॉक्टर जगत प्रकाश नड्डा ने अपने ट्वीटर अकाउंट पर निरालाजी को याद करते हुए लिखा है- ‘मानवीय मूल्यों पर आधारित रचनाओं से जन-जन में नव चेतना भरने वाले निराला जी सदैव स्मरणीय रहेंगे.’

ऑस्ट्रेलिया की एक युनिवर्सिटी में प्रोफेसर ‘इयान वुलफोर्ड’ के हिंदी प्रेम के बारे में दुनिया जानती हैं. उन्होंने अपने ट्वीटर अकाउंट पर निरालाजी की कविता ‘सखि, वसन्त आया’ को गाकर सुनाया है.

हिंदी साहित्य जगत के शीर्ष प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन ने भी एक चित्र के साथ उनकी कविता का उल्लेख करते हुए निरालाजी को अपने श्रृद्धासुमन अर्पित किए हैं.

राजकमल प्रकाशन समूह में संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने निरालाजी की एक तस्वीर शेयर करते हुए उनकी कुछ पंक्तियों का उल्लेख किया है- “धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,

लेखक और आलोचक प्रभात रंजन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रसिद्ध साहित्यकार जानकीवल्लभ शास्त्री की पंक्तियों को प्रदर्शित किया है- ‘आग को धुंआ गन्दा नहीं करता, दिए की लौ को कालिख नहीं लगती, चांद पर आकाश का रंग नहीं चढ़ता. अपने को निःशेष भाव से दिए बिना और जो हो जाए, निराला नहीं हो सकता.’(news18.com)

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