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पुस्तक समीक्षा: धुंधली पड़ चुकी यादों को साफ करती रशीद किदवई की किताब 'भारत के प्रधानमंत्री'
11-Oct-2021 8:27 AM (86)
पुस्तक समीक्षा: धुंधली पड़ चुकी यादों को साफ करती रशीद किदवई की किताब 'भारत के प्रधानमंत्री'

-राजकुमार पांडेय

Book Review: देश के प्रधानमंत्रियों के बारे में जानने का मन बहुत से लोगों का होता है. जानकारी अलग-अलग तरीकों से मिल भी जाती है. फिर भी, सूचनाओं के उथल-पुथल के दौर में पक्की और सही जानकारी हासिल करना किसी शोध से कम नहीं है. ऐसे में पत्रकार और लेखक रशीद किदवई की पुस्तक “भारत के प्रधानमंत्री: देश, दशा, दिशा” उपयोगी हो सकती है.

तकरीबन ढाई सौ पेज की इस किताब में आज़ाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की नीतियों और कार्यशैली का जिक्र है. वैसे रशीद साहेब का सत्ता के गलियारों में खूब आना-जाना रहा है. लिहाजा स्वाभाविक तौर पर उम्मीद हो आती है कि वे अपनी ओर से जानकारियां लिखेंगे.

लेकिन लेखक ने इस किताब में अलग-अलग सत्ताधीशों-नौकरशाहों की पुस्तकों से संदर्भ दिया है. शायद अपनी बात को और पुष्ट करने की कोशिश की है. छोटे-छोटे अध्याय होने के कारण पढ़ते हुए ऊबन नहीं होती और रुचि कायम रहती है.

पंडित जवाहर लाल नेहरू 
जैसा कि होना चाहिए किताब की शुरुआत नेहरू से हुई है. इस अध्याय में नेहरू के बारे में तो जानकारी दी ही गई हैं. आज के दौर में नेहरू पर जिन मसलों को लेकर आरोप लग रहे हैं, उन मुद्दों पर अच्छे से लिखा गया है. उस दौर की परिस्थितियों पर भी रोशनी डाली गई है.

कहा जा सकता है कि लेखक ने बड़ी खूबसूरती से अन्य लेखकों की किताबों का जिक्र करके आज के तमाम आरोपों को खारिज कर दिया है. नेहरू-विरोधी उन्हें अन्य बातों से ज्यादा, कश्मीर मामले को उलझाने के लिए, दोषी ठहराते हैं.

रशीद किदवाई ने इस किताब में तकरीबन दो से ढाई पन्नों में कश्मीर मसले का जिक्र किया है. कई लेखकों, चिट्ठियों का हवाला दिया है. हां, ये जरूर लिखा है कि शेख अब्दुल्ला को समझने में नेहरू से कहीं चूक हुई और उससे मामला और उलझ गया.

वे लिखते हैं, “शेरे काश्मीर की जन-उपाधि से विभूषित शेख अब्दुल्ला पक्के धर्मनिरपेक्ष व जनतांत्रिक मूल्यों पर आस्था रखने वाले व्यक्ति थे. कश्मीरी राष्ट्रवाद व स्वतंत्रता का उन्हें जुनून चढ़ा हुआ था, जिस समझने में नेहरू से कहीं चूक हो गई. इससे कश्मीर समस्या की गुत्थी और उलझ गई.”

नेहरू के अध्याय में उनके बहुत सारे नेताओं और काम-काज को लागू करने वाले अफसरों के साथ उनके संबंधों का तो जिक्र है ही, साथ में “भारत के आर्थिक ढांचे का निर्माण” और “भाखड़ा नांगल से भिलाई तक आधुनिक भारत के पूजास्थल” का जिक्र भी कम रोचक नहीं है. नेहरू अध्याय की आखिरी लाइन में लेखक ने बहुत करीने से लिखा है – “27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू चल बसे, लेकिन वे आधुनिक भारत के निर्माण की एक महती यात्रा का शुभारम्भ कर चुके थे.

गुलजारीलाल नंदा 
दूसरा अध्याय गुलजारीलाल नंदा का है. दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने वाले इस नेता को पुस्तक में वैसे तो कम स्थान दिया गया है, लेकिन उनके महत्व को बाखूबी रेखांकित किया गया है. बहुत से लोगों को तो याद भी नहीं होगा कि इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में गृहमंत्री रहे नंदा को गोरक्षकों-साधुओं पर संसद भवन मार्च के दौरान फायरिंग के बाद हटाया गया था. सिद्धांतवादी, ईमानदार और निःस्वार्थ भाव से काम करने वाले नंदा के इस अध्याय में लेखक ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फिर कार्यकारी प्रधानमंत्री का जिक्र करते हुए ये भी जोड़ दिया है- “कई लोगों का मानना है कि सन 2012 में प्रणब ने खुशी-खुशी राष्ट्रपति बनना इसलिए स्वीकार कर लिया कि वे दूसरे गुलजारीलाल नंदा नहीं बनना चाहते थे.”

इस अध्याय में नंदा की सादगी के बारे में लेखक पहले ही लिख चुका है कि वे दिल्ली में सरकारी बस का इंतजार करते दिख जाते थे और उनसे किराया न मिलने पर किराए का घर खाली करा लिया गया था. खैर नंदा के सादगी के बारे में पढ़ना निश्चित तौर पर अच्छा लगेगा.

लालबहादुर शास्त्री 
निर्विवाद रहे लालबहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए लेखक ने ये जरूर साफ किया है कि शास्त्री सादगी वाले राजनेता थे लेकिन ऐसा नहीं था कि राजनीतिक दांव-पेंच से अनजान थे. इसके लिए रशीद किदवई ने शास्त्री और मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर की बातचीत का हवाला दिया है. इस अध्याय में शास्त्री जी की सादगी में उनकी चट्टानी ताकत को भी लेखक सामने लाने में सफल रहा है. साथ ही एक नई जानकारी दी है कि लाठियों से भीड़ को भगाने की जगह, उस पर पानी की बौछार करने की युक्ति भी शास्त्री जी की है. और हां खास बात ये है कि लेखक ने शास्त्री जी की मौत के रहस्य पर भी, जैसा होना चाहिए, उसी तरह का उल्लेख किया है. शास्त्री जी के सहायकों के हवाले से लिखा है कि ताशकंद से लाए जाने पर शास्त्री जी का शरीर नीला पड़ गया था. हालांकि नैयर और मोरारजी के संवाद के जरिए ये भी साफ कर दिया है कि शास्त्री जी की मौत स्वाभाविक थी.

इंदिरा गांधी 
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने की कहानी को आज-कल वंशवाद के तौर पर ही देखने वालों को रशीद किदवई ने याद दिलाया है कि इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे कामराज जैसे वरिष्ठ नेता थे. वे लोग मोरारजी को रोकना चाहते थे. ये अलग बात है कि फिर भी चुनाव हुआ था और मोरारजी हारे थे.

नरसिंहराव के हवाले से लेखक का कहना है- “तब इंदिरा को वोट खींचने वाली मशीन के तौर पर देखा गया, जिसे दबाव डाल कर अलग कर दिया जाएगा तथा किसी अनुभवी व्यक्ति को प्रभार सौंपा जाएगा.” बाद के बहुत सारे घटनाक्रम का जिक्र शायद विस्तार से बचने के लिए लेखक ने न करते हुए के. कामराज के हवाले एक लाइन लिखी है – “कामराज ने एक मौके पर इंदिरा के व्यक्तित्व को यूं प्रस्तुत किया – एक बड़े आदमी की बेटी, एक छोटे आदमी की गलती.”

साथ ही इस हत्या के बाद के रक्तपात पर बहुत अच्छी लाइन है – “नादिरशाह दुर्रानी जब दिल्ली पर विजय प्राप्त की थी उस समय हुए नरसंहार के बाद दिल्ली एक बार फिर खून से नहला दी गई.”

मोरारजी देसाई
मोरारजी देसाई के बारे में जिक्र करते हुए लेखक ने उनके योगदान की भी बहुत अच्छे से चर्चा की है. अब भले ही भारत-पाकिस्तान एकता का कोई जिक्र ही नहीं होता, लेकिन एक समय इसका बहुत जोर था. मोरराजी भाई ने इस दिशा में बहुत काम किया था. वे अकेले पीएम हैं जिन्हें दोनों देशों का सर्वोच्च सम्मान हासिल है.

चौधरी चरण सिंह 
चरण सिंह का आजाद भारत की राजनीति में बहुत अहम स्थान है. आज के गठबंधन के दौर की राजनीति के संस्थापकों में भी उनका नाम आएगा. लेखक ने अपनी किताब में किसानों को राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाने का श्रेय चरण सिंह को दिया है, जो काफी हद तक सही भी है. साथ ही लेखक का ये कहना कि “चरण सिंह का सम्यक मूल्यांकन अभी होना है”- बहुत सही लगता है.

राजीव गांधी 
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने और उनके कार्यकाल को बहुत सारे पाठकों ने खुद भी देखा है. शुरूआत में ही लेखक ने लिख दिया है कि इंदिरा गांधी के सचिव रहे पीसी अलक्जेंडर ने राजीव को पीएम का पद स्वीकार करने के लिए कैसे एम्स में सोनिया से दूर करके रखा, जिससे सोनिया राजीव को इस पद को स्वीकार करने से रोक न दें.

इंदिरा गांधी की हत्या से सोनिया गांधी वास्तव में सदमे में थीं. इसी हत्याकांड की सहानुभूति से उपजी 1984 की राजीव गांधी की ऐतिहासिक जीत, उनकी बेदाग छवि और फिर बोफोर्स के काले धब्बे का जिक्र भी बाखूबी किया गया है.

लेखक ने राममंदिर का ताला खुलवाने में राजीव के नजदीकी अरुण नेहरू, इंदिरा के करीबी फोतेदार वगैरह की भूमिका को ज्यादा अहमियत दी है. इसके अलावा शाहबानो मामले में कानून बनाने, असम गण परिषद वाले मसले को भी अच्छी जगह दी गई है. लेकिन राजीव गांधी के सूचना टेक्नॉलॉजी और सूचना के अधिकार वाले बिल, पंचायतीराज बिल जैसे मसलों के लिए ज्यादा याद किया जाएगा.

विश्वनाथ प्रताप सिंह
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने निश्चित तौर पर देश में एक नए दौर की शुरुआत की थी. मंडल को लागू किया, लेकिन उनके जीवन के कई और भी पक्ष रहे जिस पर अच्छे से चर्चा की गई है. खासतौर से किस तरह उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कब्जा किया था उस प्रकरण को भी लेखक ने ठीक से याद किया है.

चंद्रशेखर 
प्रधानमंत्री के तौर पर चंद्रशेखर का चित्रण भी लेखक ने बहुत प्रभावशाली तरीके से किया है. कैसे मनमोहन सिंह ने उनसे बैठक में आने के लिए कार मांग ली थी वो प्रसंग भी रोचक है. लेकिन चंद्रशेखर का जिक्र इंदिरा गांधी के प्रसंग में आया होता तो और रुचता. वे चंद्रशेखर ही थे जिनके जरिए इंदिरा गांधी ने अपने विरोधी पुराने कांग्रेसियों को किनारे लगाया था. खैर, ज्योति बसु के कथन से चंद्रशेखर सरकार की स्थिति को ठीक तरह से बता दिया है- “जनादेश के विरुद्ध काम करना अनैतिक गठबंधनों की मजबूरी बन जाती है. यह गठबंधन ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है.” हुआ भी वही. हां चंद्रशेखर ने मंदिर मसले को हल कराने में जो कोशिशें की थीं वे अहम हैं और उनका अच्छे से जिक्र भी है.

पीवी नरसिंह राव 
किताब में पीवी नरसिंह राव के बारे में भी कई उन बातों का जिक्र है जो कई कारणों से सामने नहीं आ सकी हैं. राव के प्रति सोनिया के सम्मान और फिर सोनिया से विवाद पर भी अच्छी जानकारियां दी गई हैं. सोनिया के सचिव जॉर्ज की भूमिका का भी ब्योरा है. राव की पुस्तक के हवाले से राममंदिर की उलझन पर भी रोशनी डाली गई है.

एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल 
अलग सी परिस्थितियों में प्रधानमंत्री बने एचडी देवेगौड़ा के दौर की राजनीति पर भी गौड़ा के अध्याय में अच्छे से प्रकाश डाला गया है. उनके बाद प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल के बारे में तो निश्चित तौर पर लेखक ने कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं. कैसे संजय गांधी के कहने पर गुजराल को मंत्री पद से हटाया गया और कैसे वे देश की राजनीति में फिर महत्वपूर्ण बने इस पर कुछ जानकारियां बहुत से पाठकों को नई सी लगेंगी.

अटल बिहारी वाजपेयी 
अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में लेखक ने शुरू में ही कह दिया है कि अगर आगरा वार्ता सफल हो जाती तो अटल उस वर्ष के नोबल पुरस्कार के बड़े दावेदार होते. अटल बिहारी के बारे में लिखते हुए लेखक एक बड़े मार्के वाली बात अंत में लिखी है- “… उन्होंने भाजपा जैसी पार्टी को जिसे कभी अछूत माना जाता था, ऐसी ऊंचाई प्रदान की कि वो आज देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है.”

मनमोहन सिंह 
मनमोहन सिंह के बारे में लिखते हुए रशीद किदवाई ने फिर वाई. के. अलघ की मदद से बहुत अहम बात कह दी है. बकौल अलघ – “मनमोहन सिंह बेहद कम करके आंके गए राजनीतिज्ञ और बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किए गए अर्थशास्त्री हैं. खैर मनमोहन सिंह की खूबियां भी अच्छे से किताब में हैं और कैसे उन्होने प्रधानमंत्री पद पर दस साल बिता लिया और खुद बेदाग भी हैं इस पर भी खूब चर्चा है.”

नरेंद्र मोदी के अध्याय में लेखक ने उनके कार्यकाल में बीजेपी और संघ के चुनावी मुद्दों पर अच्छी चर्चा की है.

वैसे भी देश के प्रधानमंत्रियों का आंकलन इतना दुरूह और जटिल होता है कि उसे किसी छोटी सी किताब में समेट पाना बेहद कठिन है. फिर भी लेखक की सफलता है कि वो विस्तार से बचा और पाठक ऊबने से. फिर भी रशीद किदवई की किताब सारे प्रधानमंत्रियों की एक झलक देती है और कुछ ऐसे तथ्य अलग-अलग लेखकों, आला ओहदेदारों की किताबों के हवाले से ले आती है जो नए कहे जा सकते हैं.

किताब के बहुत से पन्नों पर प्रधानमंत्रियों के खास कामों का जिक्र बॉक्स में प्वाइंटर्स के तौर पर किए जाने से रूचि और बढ़ जाती है. प्रतिष्ठित राजकमल प्रकाशन के सहयोगी- सार्थक, से छपी ढाई सौ पृष्ठों की किताब के मूल्य (रु.299) को भी तार्किक ही कहा जा सकता है. (news18.com)

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