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मानसिक पीड़ा के मानवीय पहलू को उजागर करता जेरी पिन्टो का उपन्यास 'एम और हूम साहब'
10-Oct-2021 4:39 PM (73)
मानसिक पीड़ा के मानवीय पहलू को उजागर करता जेरी पिन्टो का उपन्यास 'एम और हूम साहब'

आज हम विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मना रहे हैं. भारत में इस विषय पर बहुत कम चर्चा होती है. लेकिन कोरोना काल में मची तबाही और लॉकलाडन के बाद यह विषय तेजी से चर्चा में आया है. लंबे समय से घरों की कैद, रोजगार खोने या फिर अपनों के बिछड़ने से पसरा हुआ अवसाद ना केवल किसी व्यक्ति विशेष बल्कि पूरे समाज पर साफ-साफ देखा जा सकता है.

बदलती जीवन शैली और एकल परिवार की पृष्ठ भूमि से पैदा हुए तनाव ने लोगों का ध्यान मानसिक स्वास्थ्य की ओर खींचना शुरू किया है. लेकिन हिंदी साहित्य की दुनिया में यह विषय अभी भी अछूता है. हालांकि कुछ लोगों ने लिखा भी है और लिखना शुरू भी किया है, लेकिन यह लेखन उतना चर्चा में नहीं आया, जितना अंग्रेजी या अन्य भाषाओं का साहित्य.

साहित्य जगत में जब भी अवसाद या मानसिक विकार पर चर्चा होती है तो अंग्रेजी के लेखक जेरी पिन्टो (जेरी पिंटू) की किताब ‘एम एंड द बिग हूम’ का जिक्र आता है. मुंबई में रहने वाले जेरी पिंटू अंग्रेजी के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, कवि और लेखक हैं. उनकी किताब Em and the Big Hoom भारत ही नहीं बल्कि भारत से बाहर भी चर्चा में रही है. 2012 में इस उपन्यास को द हिन्दू लिटरेरी प्राइज से सम्मानित किया गया. 2016 में अंग्रेजी भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

अब यह उपन्यास ”एम और हूम साहब” नाम से ही हिंदी में छपकर आ रही है. वाणी प्रकाशन ग्रुप द्वारा इस उपन्यास को प्रकाशित किया जा रहा है. अनुवाद प्रभात मिलिंद ने किया है. इस उपन्यास को आगामी विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशित किया जाएगा.

वाणी प्रकाशन समूह की प्रमुख अदिति माहेश्वरी ने बताया कि किसी परिवार में मानसिक पीड़ा को केंद्र में रखते हुए लिखा गया जेरी पिंटू का यह उपन्यास बहुत ही चर्चित रहा है. यह उपन्यास पहली बार 2012 में प्रकाशित हुआ था. अब इसके कई संस्करण आ चुके हैं. वाणी प्रकाशन इस चर्चित उपन्यास को अब हिंदी में प्रकाशित करने जा रहा है. जल्द ही हिंदी पाठकों को यह चर्चित रचना पढ़ने को मिलेगी.

इस उपन्यास में लेखक अपनी मां को प्यार से “एम” बुलाता है और लेखक के पिता कुछ पूछे जाने पर अक्सर “हूम” की आवाज के साथ जवाब देते हैं. उपन्यास लेखक की मां “एम” के साथ के जीवन पर आधारित है. “एम” मानसिक रोग पीड़ित हैं. वह कभी उन्माद में होती है तो कभी गहरे अवसाद में. एम कई बार आत्महत्या की कोशिश करती है.

लेखक ने बड़े ही मार्मिक ढंग से अपने परिवार की कहानी को बयां किया है. लेखक को डर है कि क्या वह भी मां की तरह किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित होगा. लेखक प्यार और अवसाद के बीच जूझता जीवन जीता है.

डॉ. माइकल हमारे जीवन में तभी आये थे जब ‘एम’ स्टेविल क्लिनिक से लौटी थी. वह दोबारा स्टेविल क्लिनिक कभी नहीं गयी. हम उन पर जितना निर्भर थे जितना किसी दूसरे सायकेट्रिस्ट पर कभी नहीं रहे. वे एम पर ख़ास तवज्जो देते थे, या सम्भव है कि ऐसा वे अपने सभी मरीज़ों के साथ करते थे.

‘मैं आपके एक फ़ोन कॉल पर हाज़िर हूं,’ उनका कहना था और अपनी इस बात पर वे कायम भी रहे. पहले एम की दवाओं की खुराक कई-कई हफ़्तों तक एक ही रहती थी, अब इन्हें उसकी ज़रूरतों के मुताबिक़ रोज़ ऊपर-नीचे किया जाने लगा था.

पता नहीं, इससे सचमुच कोई फ़र्क़ पड़ा था? लेकिन हमारे पूरे परिवार को इस बात का भरोसा था कि एम के इलाज में उन्होंने कोई कसर नहीं उठा रखी थी. लेकिन मानसिक दवाएँ लक्षणों के हिसाब से दी जाती थीं. मानसिक उन्माद को शान्त करने के और इंडोरफिन्स के स्तर को बढ़ाने के मक़सद से. लेकिन भीतर ही भीतर चीजें बदस्तूर चलती रहती हैं- बिना किसी तब्दीली के.

भीतर ही भीतर कोई चीज़ होती है जो दिमाग़ी रसायनों को बेध कर उस तक पहुंच पाने से रोकती है. मैं इस बात को लेकर हमेशा जागरुक रहता था, हालांकि मेरे पास भी इस सवाल का कोई उत्तर नहीं था. मेरे पास इस सवाल का कोई सन्तोषप्रद उत्तर भी नहीं था-‘मम्मी कैसी है?’ लिहाज़ा मैं एक राज़ भरी मुस्कुराहट के जरिये इसका जवाब देने की भरसक कोशिश करता. मेरी यह ईजाद कुछ हद तक कारगर भी रही क्योंकि इस मुस्कुराहट के माध्यम से मैं सवाल करने वाले को उस घनीभूत पीड़ा की छाया के भीतर ला पाने में कामयाब हो जाता था जिसे मैंने सुनियोजित तरीक़े से अपने इर्द-गिर्द रच रखा था.

बाहर से दिखने में वह बिल्कुल ठीक-ठाक थी. हमें उसकी कोई शारीरिक चिन्ता नहीं थी. ‘मैं एक टट्टू की तरह मज़बूत हूं और उससे दोगुना अड़ियल भी.’ जब कोई उससे उसका हाल-समाचार पूछता तो उसके पास यही जवाब होता था. उसका पसन्दीदा खाना भजिया और कोई सॉफ्ट ड्रिंक्स हुआ करता था जिसके जायके उसे बेहद पसन्द थे. लेकिन इन दोनों से भी ज़्यादा किसी चीज़ का स्वाद उसे पसन्द था तो वह चीज़ बीड़ी थी.

बहरहाल दो दफा तो उसकी सेहत को लेकर हम सचमुच बुरी तरह डर गये थे. पहली दफा तब जब उसके मुंह में फूलगोभी जैसा कुछ उग आया था और दूसरी दफा तब जब उसके कोई तीन साल बाद उसके गर्भाशय में एक गांठ बन गयी थी.

अपनी ज़िन्दगी के पचास साल पूरे करने के बाद एम अचानक बहुत मोटी दिखने लगी. हम सबने यही सोचा कि इस मोटापे का लेना-देना उसके मेटाबोलिज़्म से है. वह शक्कर भी बहुत खाती थी. एक प्याली चाय में कोई छह चम्मच. बातों-बातों में एक मुट्ठी शक्कर फांक जाना उसके लिए एक साधारण बात थी. वह जब-तब शक्कर का डिब्बा खोलती हुई दिख जाती थी. बृजवासी की जलेबियां और चॉकलेट्स वह किसी भी मात्रा में खा सकती थी. मीठा खाने की उसकी इस प्रवृत्ति में अजीबोग़रीब इजाफ़ा तब और हो जाता था जब उस पर अवसाद के दौरे पड़ते थे. कई बार तो ज़्यादा खपत से बचने के लिए हम शक्कर का डिब्बा उससे छुपा कर रखते थे. लेकिन अमूमन उसकी इस आदत को हम मज़ाक़ में लेते थे. और तो और, एम को भी यह बात पता थी और वह इसका बुरा नहीं मानती थी.

एक दिन अचानक वह नर्स सारा-मे से मिलने चली गयी. वह हमारी दूरदराज की रिश्तेदार थीं इसलिए उनसे कभी-कभार मिलने की औपचारिकता का निर्वाह हमें करना पड़ता था. सारा-मे ने अपने जीवन का सब कुछ खो दिया था क्योंकि उसका नौजवान ब्वॉयफ्रेंड कनाडा भाग गया उसके सारे पैसे लेकर. एम उससे साल में दो बार बान्द्रा के ओल्ड एज होम में मिलने के लिए जाती थी ताकि इस दुनिया में वह ख़ुद को अकेली नहीं समझे.

उस रात मैं अपने एक दोस्त के घर रुका हुआ था कि अचानक हूम साहब का फ़ोन आया था. मैं अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने गया हुआ था. सिनेमा हॉल से निकलने के बाद हमने बढ़िया खाना खाया. एम अपने दौरेपन की हालत से गुजर रही थी लेकिन हूम साहब और सुजन, दोनों उसकी देखभाल के लिए मौजूद थे. इसीलिए मुझे घर के बाहर रात गुज़ारने की इज़ाजत मिल गयी थी.

उस रात मैं बिल्कुल भी नहीं सोया; मुझे किसी दूसरे के घर नींद भी नहीं आती थी. मेरे लिए यह एक नया तज़ुर्बा था और मैं इसके एक-एक पल का मज़ा लेना चाहता था. अपनी यह ख़्वाहिश मैंने एक बार सुजन से भी साझा की थी और बदले में उसने भी मेरा हौसला बढ़ाया था.

जब उस पराये घर में रात गये अचानक फ़ोन की घण्टी बजी तो पता नहीं, मुझे ऐसा क्यों लगा कि फ़ोन मेरे लिए ही आया था.
‘वह नहीं रही,’ हूम साहब की आवाज़ थी जो तक़रीबन भावशून्य थी- किसी खुश्क छिलके की तरह जिसके भीतर कभी अनाज के ताज़ा दाने हुआ करते थे.ह
‘क्या वह…?’
लेकिन मुझे हिम्मत नहीं हुई कि मैं उनसे पूछ सकूं कि क्या उसने ख़ुदकुशी कर ली थी.
‘नहीं,’ हूम साहब ने मेरा सवाल सुने बिना ही उसका जवाब दे दिया था.

मुझे इतनी रात गये अपने मेज़बान को परेशान करना मुनासिब नहीं लगा. मैं चुपचाप उसके घर से निकल पड़ा, और जब मैं बिल्डिंग से बाहर निकला तब भी मैंने ठण्डी-ताज़ा हवा के झोंकों को अपने चेहरे पर महसूस किया. मेरी टैक्सी शहर के उपनगरीय इलाक़ों के सन्नाटे को चीरती हुई, तेज़ी से सड़क से गुज़र रही थी. रास्ते में भीड़भाड़ नहीं के बराबर थी. फ़ुटपाथों पर लाशों की तरह इक्के-दुक्के लोग सोये हुए थे. मैंने सोचा भी नहीं था और देखते-देखते माहिम आ गया. क्या इसके पीछे कोई राज़ छुपा था? इसका क्या मतलब था? एम के लिए मृत्यु क्या थी?

‘आख़िरी बड़ा रहस्य,’ यह बात उसके मुंह से अक्सर निकलती रहती थी.
‘लेकिन मुझे इसका कोई डर भी नहीं है.’ वह दोबारा कहती, ‘मैं तो मौत को आने की चुनौती देती हूं.’
और, आख़िरकार ऐसी स्थिति आ ही गयी.

फ़्लैट का दरवाज़ा पूरा खुला हुआ था और भीतर से रोशनी छन कर बाहर आ रही थी. यह बात बड़े आराम से कोई भी समझ सकता था कि भीतर किसी की मौत हुई है. भीतर से लोगों की खुसफुसाहट साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रही थी. मैं चुपचाप सीधा बेडरूम में घुस गया जहां एम की देह बिस्तर पर पड़ी हुई थी. उसकी देह की ठीक बगल में सुजन बैठी हुई थी. स्थिर और चुपचाप. एम हमेशा बोलती रहती थी या बेवजह चलती-फिरती रहती थी. उसे इस तरह बेजान पड़ा देखना सचमुच ख़राब लग रहा था.

क्राइम नॉवेल्स पढ़ने के बाद मैं मौत के बाद शरीर में आने वाले बदलावों के बारे में थोड़ा-बहुत जानने लगा था- मसलन कैसे बदन की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं, शरीर कैसे शिथिल पड़ जाता है और कोशिकाओं के नष्ट होने से शरीर के आन्तरिक हारमोनों के रिसाव में कैसी तब्दीली आती है.

हूम साहब ने जैसे ही मुझे देखा, उन्होंने एक पल के लिए मुझे सीने से लगा लिया. हालांकि मेरे जीवन में ऐसे गिने-चुने अवसर ही आये थे. लेकिन इससे पहले एम की मौत भी कहां हुई थी और न ही हमारी ज़िन्दगी में कभी मुसीबत का ऐसा पहाड़ ही टूटा था! हमारी ज़िन्दगी की धुरी हमेशा से अपनी जगह कायम रही थी. क्या मृत्यु ने उस धुरी को अपनी जगह से डगमगा दिया था?

मेरा मन शान्त नहीं था, लेकिन मुझे एम की कही हुई बात याद थी. वह चाहती थी कि उसे बेहद साधारण तरीक़े से दफ़नाया जाये. वह मौत के बाद अपनी देह का इस्तेमाल करने के लिए दान में देना चाहती थी. मैं इस बारे में बातचीत करने के लिए सुजन के पास गया.

‘वह अपनी आंखें दान करना चाहती थी.’
‘वे लोग आकर चले भी गये,’ उसने बताया.
क्या वे उसकी आंखों को ले गये? ज़रूर ले गये होंगे. आख़िरकार वह यही तो चाहती थी. मुझे अचानक उसकी आंखें देखने की इच्छा हुई लेकिन मैं जानता था कि अब यह सम्भव नहीं था. अब वे आंखें हमारी स्मृतियों का एक हिस्सा बन चुकी थीं.
मुझे कई लोगों ने यह बात कही थी कि मेरी आंखें बिल्कुल मेरी मां की तरह थीं.

मेरी आंखों से आंसू फिर से गिरने लगे लेकिन मैंने किसी तरह अपनी हिचकियों पर क़ाबू कर लिया. आप अगर सिसक नहीं रहे हों तो लोगों के बीच भी रो सकते हैं. आंसू पारदर्शी होते हैं. अगर आप तेज़ क़दमों से चल रहे हों और धूप बहुत तीखी हो तो आपके आंसुओं पर कोई भी ग़ौर नहीं करता है. सिसकियां इस मौन में रुकावट पैदा करती हैं. वे लोगों की चेतना में गहरे रूप से जा घुसती हैं. लिहाज़ा लोग यह सवाल पूछना अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं कि आपको क्या हुआ है.

मृत-संस्कार करने वाले के यहां पहुंचने के क्रम में मैं रास्ते भर रोता रहा था. ताबूत बेचने वाले के स्टोर में सिर्फ़ एक ही तैयार ताबूत और तीन अलबम थे जिनमें अलग-अलग तरह के ताबूतों के डिजाइन बने हुए थे. उनमें कुछ सफ़ेद ताबूत थे जो ननों, पादरियों और कुंवारे लोगों के लिए थे. ऐसा मुझे स्टोर के कर्मचारी ने बतलाया. लेकिन ज़्यादातर ताबूत लकड़ी के भूरे रंग के बने हुए थे. अलग-अलग क़ीमतों और डिजाइनों के ताबूतों से सभी अलबम भरे हुए थे. कर्मचारी उनके बारे में हमें विस्तार से बताने लगा.

‘…असली रेशम के बने हुए लेस के तकिये वाले, या आप चाहें तो साटन के तकिये का ताबूत भी ले सकते हैं जिनके किनारों पर हाथ से नक़्क़ाशी की गयी है. …पीतल या चादी के काम किये वाले ताबूत भी मिल सकते हैं …पहले आप यह तय कर लें कि आपको सामान्य ताबूत चाहिए या सागवान का बना हुआ. लेकिन क्या आप लोगों की कोई स्थायी क़ब्र है?’
‘मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है लेकिन मेरे ख़याल से शायद नहीं है.’
‘यह ठीक बात नहीं है. आपको यह बात पता होनी चाहिए.’
मैंने घर पर फ़ोन किया. हमारे पास सच में कोई स्थायी क़ब्र नहीं थी.
‘कोई बात नहीं. कई बार ऐसी परेशानियां भी होती हैं. क्या आपने बुकिंग कर दी है?’
मुझे तो यह भी नहीं पता था कि बुकिंग के लिए क्या करना होता है.
‘आप पहले इस बारे में पादरी से बात कर लें. आप कहेंगे तो यह काम हम भी कर सकते हैं, लेकिन आपने क्या सोचा है?’

एक बार जब मृत-संस्कार करने वाले ने यह अनुमान लगा लिया कि धीरे-धीरे आगे ले जाने वाले सागवान के बने रेशमी किनारों वाले ताबूत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है तब उसके भीतर का उत्साह भी ठण्डा पड़ गया और वह मेरी बातों पर कम ध्यान देने लगा था. उसने बस मुझे यह बता दिया कि मुझे क्या करना है और बाक़ी बातें मेरे ऊपर छोड़ दीं.

घर पर परिवार की औरतों ने एम की देह को नहलाने का काम ख़त्म कर लिया था. उन्होंने उसे कपड़े भी पहना दिये थे और उसके पैरों में चमकती हुई गुलाबी जूतियां डाल दी थीं.

अब तक पादरी भी पहुंच चुका था. उसे पहले चाय दी गयी उसके बाद वह अपने मनके की माला निकालकर उसे फेरने लगा. उसने एम की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की. फिर मेरे क़रीब आकर मुझसे पूछा कि क्या मैं कुछ कहना चाहता हूं. मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या कहूं. मैंने मन में कुछ बातें जरूर सोच रखी थीं लेकिन मुझे विश्वास नहीं था कि मैं उन्हें कह भी सकूंगा.

एम को दफ़नाने के रिवाज़ में किसी तरह की कसर रह गयी तो इस बात की ग्लानि जीवन भर मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी. शायद लोगों के लिए एम की मृत्यु सिर्फ़ एक व्यावहारिक सामाजिक दायित्व थी लेकिन उनको पता नहीं था कि हमारी ज़िन्दगी में एम की कितनी अहमियत थी. बहरहाल क़ब्रिस्तान में एम को दफ़न करने के बाद हम घर वापिस लौट गये.

(news18.com)

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