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जॉन एलिया- 'बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी, क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है'
28-Sep-2021 9:01 AM (137)
जॉन एलिया- 'बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी, क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है'

Jaun Elia: मशहूर कवि, शायर और दार्शनिक जॉन एलिया का जन्म 14 दिसंबर, 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोह में हुआ था. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद जॉन एलिया 1957 में स्थायी रूप से कराची में बस गए.

जॉन एलिया को उर्दू के साथ-साथ अरबी, अंग्रेजी, फ़ारसी, संस्कृत और हिब्रू भाषा का अच्छा ज्ञान था.

जॉन एलिया की ‘शायद’ (1991), ‘यानी’ (2003), ‘गुमान’ (2006) और ‘गोया’ (2008) शायरी और कविता की प्रमुख कृतियां हैं. ‘फरनूद’ जॉन एलिया के विचारप्रधान लेखों का संकलन है. इसमें 1958 से 2002 के बीच लिखे गए निबंध और लेख शामिल हैं.

जॉन एलिया का निधन 8 नवंबर, 2002 को हुआ था.

वाणी प्रकाशन से उनकी शायरी का एक संग्रह ‘मैं जो हूँ जौन एलिया हूँ’प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह में जॉन एलिया की रचनाएं का संकलन और लिप्यन्तर प्रसिद्ध शायर शीन काफ़ निज़ाम ने किया है और संपादन प्रसिद्ध कवि डॉ. कुमार विश्वास ने. प्रस्तुत हैं इस संग्रह से जॉन एलिया की चुनिंदा रचनाएं-

बेक़रारी-सी बेक़रारी है

बेक़रारी-सी  बेक़रारी  है
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है

जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है

निघरे क्या हुए  कि लोगों पर
अपना साया भी अब तो भारी है

बिन तुम्हारे  कभी नहीं आयी
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है

आप में कैसे आऊं मैं तुझ बिन
सांस जो चल रही है, आरी है

उस से कहियो कि दिल की गलियों में
रात-दिन   तेरी   इंतज़ारी  है

हिज्र हो या विसाल,,,,,कुछ हो
हम हैं और उस की यादगारी है

इक महक सम्ते-दिल से आयी थी
मैं  ये  समझा  तिरी  सवारी  है

हादसों  का  हिसाब  है अपना
वरना हर आन सब की बारी है

ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी
उम्र  भर  की  उमीदवारी  है

(वस्ल- मिलन, फ़िराक़- वियोग, हिज्र- जुदाई, विसाल- मिलाप, सम्ते-दिल- दिल की तरफ से)

अब भी आ जाओ

वही  हिसाबे-तमन्ना है  अब  भी  आ जाओ
वही है सर वही सौदा है, अब भी आ जाओ

मैं  ख़ुद  नहीं  हूं  कोई  और  है  मिरे  अन्दर
जो तुम को अब भी तरसता है, अब भी आ जाओ

वही  कशाकशे-अहसास  है  ब  हर  लम्हा
वही है दिल, वही दुनिया है, अब भी आ जाओ

तुम्हें था नाज़ बहुत जिस की नामदारी का
वो सारे शहर से रुस्वा है, अब भी आ जाओ

यहां  से  साथ  ही  ख़्वाबों के शहर जायेंगे
वही जुनूं, वही सहरा है, अब भी आ जाओ

वजूद  एक  तमाशा  था  हम  जो  देखते  थे
वो अब भी एक तमाशा है, अब भी आ जाओ

कभी  जो  हम  ने  बड़े मान से बसाया था
वो घर उजड़ने वाला है, अब भी आ जाओ

वो ‘जॉन’ कौन है, जाने जो कुछ नहीं सुनता
है जाने कौन जो कहता है, अब भी आ जाओ

(सौदा- उन्माद, सहरा- जंगल )

 (news18.com)

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