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ख्वाजा अहमद अब्बास की जयंती पर उनके संग्रह 'मुझे कुछ कहना है' से उनकी कहानी- 'मेरी मौत'
07-Jun-2021 8:43 PM (1195)
ख्वाजा अहमद अब्बास की जयंती पर उनके संग्रह 'मुझे कुछ कहना है' से उनकी कहानी- 'मेरी मौत'

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक, उपन्यासकार, नाटककार, कथाकार और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास  का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था. उनकी मृत्यु मुंबई में 1 जून, 1987 को हुई थी. के. ए. अब्‍बास के नाम से मशहूर ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास ने 40 से अधिक फिल्में, धारावाहिक लिखे और कई फिल्मों का निर्देशन किया. उन्होंने 70 किताबें लिखीं. इनमें नाटक, उपन्यास और लेखों की श्रृंखला शामिल हैं.

राजकमल प्रकाशन ने ख्वाजा अहमद अब्बास कहानियों का संकलन 'मुझे कुछ कहना है' प्रकाशित किया है. यह संकलन काफी चर्चित रहा. उनकी जयंती के अवसर पर 'मुझे कुछ कहना है' कहानी संग्रह से प्रस्तुत है एक कहानी- 'मेरी मौत.'

कहानी- मेरी मौत

लोग समझते हैं कि सरदार जी मारे गए.
नहीं, यह मेरी मौत है.
पुराने 'मैं' की मौत. मेरी साम्प्रदायिकता की मौत. उस घृणा की मौत, जो मेरे दिल में थी.
मेरी मौत कैसे हुई, यह बताने के लिए मुझे अपनी स्मृति में 'मैं' को जीवित करना पड़ेगा.
मेरा नाम शेख़ बुरहानुद्दीन है.

जब दिल्ली व नई दिल्ली में साम्प्रदायिक हत्याओं और विध्वंस का बाज़ार गरम और मुसलमान का ख़ून सस्ता हो गया, तो मैंने सोचा, वाह री किस्मत, पड़ोसी भी मिला तो सिक्ख! पड़ोसी धर्म-निभाव और जान बचाना तो दूर, न जाने कब कृपाण भोंक दे!

बात यह है कि उस वक्त तक मैं सिक्खों पर हंसता भी था, उनसे डरता भी था और काफ़ी नफ़रत भी करता था. आज से नहीं, बचपन से. शायद मैं छह वर्ष का था जब पहली बार मैंने एक सिक्ख को देखा था, जो धूप में बैठ, अपने बालों में कंघी कर रहा था. मैं चिल्ला पड़ा—'अरे, यह देखो, औरत के मुंह पर कितनी लम्बी दाढ़ी?’

जैसे-जैसे उम्र गुज़रती गई, यह 'इस्तिजाब' एक साम्प्रदायिक अरुचि में परिवर्तित होती गई. घर की बड़ी-बूढ़ियां जब किसी बच्चे के बारे में किसी अनिष्ट बात का जि़क्र करतीं, उदाहरणत: उसे निमोनिया हो गया था या उसकी टांग टूट गई थी, तो कहतीं—'अब से दूर किसी सिक्ख या फिरंगी की टांग टूट गई थी.'

बाद में मालूम हुआ कि यह कोसना 1857 की यादगार था. जब हिन्दू-मुसलमानों की जंगे आज़ादी को दबाने में पंजाब के सिक्ख राजाओं और उनकी फ़ौजों ने फिरंगियों का साथ दिया था. मगर उस वक्त ऐतिहासिक तथ्यपरक दृष्टि नहीं थी, सिर्फ़ एक अदृश्य भय था. एक अजीब-सी नफ़रत और एक साम्प्रदायिकतापूर्ण विचार था. भय अंग्रेज़ से भी लगता था और सिक्ख से भी, मगर अंग्रेज़ से अधिक.

उदाहरणत: जब मैं लगभग दस वर्ष का था, एक रोज़ देहली से अलीगढ़ जा रहा था. सफ़र हमेशा तीसरे या ड्यौढ़ा (इंटर) में ही था. सोचा कि इस बार सैकिंड का सफ़र करके देखा जाए. टिकट ख़रीद लिया और एक ख़ाली डिब्बे में बैठकर गद्दों पर ख़ूब कूदा, बाथरूम के आईने में उचक-उचककर अपनी शक्ल देखी. सब पंखों को एक साथ चला दिया. रोशनियों को कभी जलाया, कभी बुझाया. मगर अभी गाड़ी चलने में दो-तीन मिनट बाक़ी थे कि लाल-लाल मुंह वाले चार फ़ौजी गोरे, आपस में 'डैम', 'ब्लडी' जैसी बातें करते हुए डिब्बे में आ गए. उनको देखना था कि सैकिंड क्लास में सफ़र करने का शौक़ ग़ायब हो गया और अपना सूटकेस घसीटता हुआ भागा और एक निहायत खचाखच भरे हुए थर्ड क्लास के डिब्बे में आकर दम लिया. यहां देखा तो कई सिक्ख दाढ़ियां खोले, कच्छे पहने बैठे थे, मगर उनसे डरकर मैं डिब्बा छोड़कर नहीं भागा. सिर्फ़ उनसे कुछ दूर बैठ गया.

Khwaja Ahmad Abbas

हां, तो डर सिक्खों से भी लगता था और अंग्रेज़ों से उनसे भी ज़्यादा मगर अंग्रेज़, अंग्रेज़ थे और कोट पतलून पहनते थे, जो मैं भी पहनना चाहता था और 'डैम', 'ब्लडी-फूल' वाली भाषा बोलते थे, जो मैं भी बोलना चाहता था. इसके अलावा वह हाकिम थे और मैं भी छोटा-मोटा हाकिम बनना चाहता था. इसके अलावा वे कांटे-छुरी से खाना खाते थे और मैं भी कांटे-छुरी से खाना खाने का इच्छुक था, ताकि दुनिया मुझे भी प्रगतिशील समझे. मगर सिक्खों से जो डर लगता था, वे घृणित और कितने विचित्र थे! वे सिक्ख जो पुरुष होकर भी सिर के बाल औरतों की तरह लम्बे-लम्बे रखते थे. यह और बात है कि अंग्रेज़ी फैशन की नक़ल में सिर के बाल मुंड़वाना, ख़ुद मुझे भी पसन्द नहीं था. अब्बा के हुक्म के बावजूद कि हर शुक्रवार को सिर के बाल छोटे-छोटे कटवाए जाएं, मैंने बाल ख़ूब बढ़ा रखे थे, ताकि हॉकी और फुटबॉल खेलते वक्त बाल हवा में उड़ें, जैसे अंग्रेज़ खिलाड़ियों के.

अब्बा कहते—'यह क्या औरतों की तरह पट्ठे बढ़ा रखे हैं?' मगर अब्बा तो थे ही पुराने दकियानूसी ख़याल के, उनकी बात को सुनता कौन था! उनका वश चलता तो सिर पर उस्तरा चलवाकर बचपन में भी हमारे चेहरों पर दाढ़ियां बनवा देते!...

हां, इस पर याद आया कि सिक्खों की इस विचित्रता की निशानी उनकी दाढ़ियां थीं और फिर दाढ़ी-दाढ़ी में भी फ़र्क होता है. उदाहरणत: अब्बा की दाढ़ी, जिसे नाई बड़े क़रीने से फ्रेंच-कट बनाता था या ताया अब्बा की, जो नुकीली और चोंचदार थी. मगर यह क्या कि दाढ़ी को कभी कैंची लगे ही नहीं. झाड़-झंकाड़ की तरह बढ़ती ही रहे बल्कि तेल और दही और न जाने क्या-क्या मलकर बढ़ाई जाए और जब कई फ़ीट लम्बी हो जाए तो उसमें कंघी की जाए, जैसे औरतें अपने सिर के बालों में करती हैं!...औरतें या फिर मुझ जैसे स्कूल के फैशनेबल लड़के, इसके अलावा दादाजान की दाढ़ी भी कई फ़ीट लम्बी थी और वह भी उसमें कंघी करते थे. मगर दादाजान की बात और थी. आखिर वह...मेरे दादाजान ठहरे! और सिक्ख फिर सिक्ख थे.

मैट्रिक करने के बाद मुझे पढ़ने-लिखने के लिए मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ भेजा गया. कॉलेज में जो पंजाबी लड़के पढ़ते थे, उन्हें हम दिल्ली व यूपी वाले मूर्ख, जाहिल व उजड्ड समझते थे. न बात करने का सलीका और न खाने-पीने की तमीज़. सभ्यता व संस्कृति छूकर भी नहीं गई थीं. गंवार, लट्ठ! यह बड़े-बड़े लस्सी के गिलास पीने वाले भला केवड़ेदार फ़ालूदे और लिपटन की चाय की लज़्ज़त क्या जानें! ज़बान बहुत ही गंवारू, बात करें तो मालूम हो, लड़ रहे हैं. असी, तुसी, साड्डे, तुहाड्डे...लाहोल-विला कुव्वत!!

मैं तो हमेशा इन पंजाबियों से कतराता था. मगर ख़ुदा भला करे हमारे वार्डन साहब का, जिन्होंने एक पंजाबी को मेरे कमरे में जगह दे दी. मैंने सोचा, जब साथ हो ही गया है तो थोड़ी-बहुत हद तक दोस्ती भी कर ली जाए. कुछ दिनों में काफ़ी गाढ़ी छनने लगी. उसका नाम ग़ुलाम रसूल था. रावलपिंडी का रहनेवाला था. काफ़ी मज़ेदार आदमी था और लतीफे ख़ूब सुनाता था.

अब आप कहेंगे कि जिक्र शुरू हुआ था सरदार साहब का, यह ग़ुलाम रसूल कहां से टपक पड़ा? मगर असल में ग़ुलाम रसूल का इस किस्से से गहरा ताल्लुक़ है. बात यह है कि वह जो लतीफे सुनाता था, वह आमतौर पर सिक्खों के बारे में होते थे, जिनको सुन-सुनकर मुझे पूरी सिक्ख कौम की प्रकृति व विशेषताएं, उनकी जातिगत विशेषताएं और उनके सामाजिक जीवन का ज्ञान हो गया था.

ग़ुलाम रसूल के अनुसार: सिक्ख तमाम बेवक़ूफ़ और बुद्धू होते हैं. बारह बजे तो उनकी बुद्धि बिलकुल भ्रष्ट हो जाती है. उसके सबूत में कितने ही वाक़यात बयान किए जा सकते हैं. उदाहरणत: दिन में बारह बजे, एक सरदार जी अमृतसर के माल बाज़ार से गुज़र रहे थे. चौराहे पर एक सिक्ख कांस्टेबल ने रोका और पूछा—'तुम्हारी साइकिल की लाइट कहाँ हैं?’ साइकिल सवार सरदार जी गिड़गिड़ाकर बोले—'जमादार साहब, अभी-अभी बुझ गई है, घर से तो जलाकर चला था.’ इस पर सिपाही ने चालान करने की धमकी दी. एक राह चलते सफेद दाढ़ी वाले सरदार जी ने बीच-बचाव करवाया—'चलो, भाई, कोई बात नहीं, लाइट बुझ गई है, तो अब जला लो!’

और इसी किस्म के सैकड़ों किस्से ग़ुलाम रसूल को याद थे, और उन्हें वह पंजाबी भाषा में संवाद के साथ में सुनाता था, तो सुनने वालों के पेट में बल पड़ जाते थे. असल में उनको सुनने का मज़ा पंजाबी ही में था. चूंकि सिक्खों की अजीबो-ग़रीब हरकतों को बयान करने का हक़ कुछ पंजाबी कैसी उजड्ड ज़बान में ही हो सकता था.

सिक्ख न सिर्फ़ बेवक़ूफ़ व बुद्धू थे बल्कि गन्दे भी थे. जैसा कि एक सबूत तो ग़ुलाम रसूल का (जिसने सैकड़ों सिक्खों को देखा था) यह था कि वह बाल नहीं मुंड़वाते थे. इसके विपरीत हम साफ-सुथरे नमाज़ी मुसलमानों के जो हर अठवारे जुमे-के-जुमे नहाते हैं, यह सिक्ख कच्छा बांध के सामने नल के नीचे बैठ नहाते तो रोज़ हैं मगर अपने बालों व दाढ़ी में न जाने क्या-क्या गन्दी व ग़लीज़ चीज़ें मलते हैं, मसलन दही. वैसे तो मैं भी सिर में लाइम जूस व गिलिसरीन लगाता हूं, जो किसी क़दर गाढ़े-गाढ़े दूध से मिलती-जुलती है, मगर उसकी बात और है. वह विलायत की मशहूर इत्र (परफ्यूम) बनाने वाली फैक्टरी से बड़ी ख़ूबसूरत शीशी में आती है और दही किसी गन्दे-संदे हलवाई की दुकान से.

खैर जी, हमें दूसरों के रहने-सहने से क्या लेना? मगर सिक्खों का सबसे बड़ा कुसूर यह था कि ये लोग अक्खड़पन, बदतमीज़ी और मार-धाड़ में मुसलमानों का मुकाबला करने की जुर्रत रखते थे. अब दुनिया जानती है कि अकेला मुसलमान दस हिंदुओं और दस सिक्खों पर भारी होता है. मगर फिर ये सिक्ख मुसलमानों का रौब क्यों नहीं मानते थे?

कृपाणें लटकाए, अकड़-अकड़कर मूंछों, बल्कि दाढ़ी पर भी ताव दे के चलते थे. ग़ुलाम रसूल कहता, उनकी हेकड़ी एक दिन हम ऐसी निकालेंगे कि खालसा जी याद करेंगे.

कॉलेज छोड़े कुछ साल गुज़र गए. विद्यार्थी से मैं क्लर्क और क्लर्क से हेड क्लर्क बन गया. अलीगढ़ का हॉस्टल छोड़ नई दिल्ली में एक सरकारी क्वार्टर में रहना शुरू कर दिया. शादी हो गई. बच्चे हो गए. मगर कितने लम्बे समय के बाद मुझे ग़ुलाम रसूल का वह कहना याद आया, जब एक सरदार साहब मेरे बराबर क्वार्टर में रहने को आए.

यह रावलपिंडी से बदली कराकर आए थे, क्योंकि रावलपिंडी के जिले में ग़ुलाम रसूल की भविष्यवाणी के अनुसार सरदारों की अकड़ अच्छी तरह निकाली गई थी. मुजाहिदों ने उनका सफ़ाया कर दिया. बड़े सूरमा बनते थे. कृपाणें लिये फिरते थे. बहादुर मुसलमानों के सामने इनकी एक न चली. उनकी दाढ़ियां मुंड़वाकर उनको मुसलमान बनाया गया था.

हिन्दू प्रेस अपनी आदत के अनुसार उनको बदनाम करने के लिए लिख रहा था कि सिक्ख औरतों और बच्चों को भी मुसलमानों ने क़त्ल किया है. हालांकि यह इस्लामी रीतियों के खिलाफ़ है! कोई मुसलमान मुजाहिद कभी औरत या बच्चे पर हाथ नहीं उठाता! रही औरतों और बच्चों की लाशों की तस्वीरें जो छापी जा रही थीं, वे या तो जाली थीं, और या सिक्खों ने मुसलमानों को बदनाम करने के लिए, ख़ुद अपनी औरतों और बच्चों का क़त्ल किया होगा.

रावलपिंडी और पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने हिन्दू व सिक्ख लड़कियों को भगाया था. हालांकि वास्तविकता यह है कि मुसलमानों की जवाँमर्दी की धाक बैठी है. अगर नौजवान मुसलमानों पर हिन्दू व सिक्ख लड़कियां ख़ुद ही लट्टू हो जाएं तो उनका क्या क़सूर है कि तबलीग़-ए-इस्लाम के सिलसिले में, इन लड़कियों को अपनी पनाह में ले लें. हां, तो सिक्खों का नामनिहाद (तथाकथित) बहादुरी का भांडा फूट गया था. भला अब तो मास्टर तारा सिंह लाहौर में कृपाण निकालकर मुसलमानों को धमकियां दें? पिंडी के भागे हुए सरदारों की दुर्दशा को देखकर मेरा सीना इस्लाम की महानता से पूर्ण हो गया.

हमारे पड़ोसी सरदार जी की उम्र कोई साठ वर्ष की तो होगी. दाढ़ी बिलकुल सफेद हो चुकी थी. हालांकि मौत के मुंह से बचकर आए थे मगर यह हज़रत हर समय दांत निकाले हंसते रहते थे, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि कितना बेवक़ूफ़ और बेहिस है. शुरू-शुरू में उन्होंने मुझे अपनी दोस्ती के जाल में फंसाना चाहा. आते-जाते ज़बर्दस्ती बातें करनी शुरू कर दीं. न जाने सिक्खों का कौन-सा त्यौहार था, उस दिन प्रसाद की मिठाई भी भेजी (जो मेरी बीवी ने फ़ौरन मेहतरानी को दे दी) पर मैंने मुंह न लगाया. कोई बात हुई टका-सा जवाब दे दिया, और बस!

मैं जानता था कि सीधे मुंह दो-चार बात कर ली तो पीछे ही पड़ जाएगा. आज बातें तो कल गाली-गलौज. गालियां तो आप जानते ही हैं, सिक्खों की दाल-रोटी होती हैं. कौन अपनी ज़बान गन्दी करे, ऐसे लोगों से सम्बन्ध बढ़ाकर? हां, एक इतवार की दोपहर को मैं अपनी पत्नी को सिक्खों की हिमाक़त के किस्से सुना रहा था, उसका अमली सबूत देने के लिए, मैंने अपने नौकर को ठीक बारह बजे सरदार जी के घर भेजा कि पूछकर आए कि क्या बजा है?

उन्होंने कहलवा दिया—'बारह बज कर दो मिनट हुए हैं!’ मैंने कहा—'देखा? बारह बजे का नाम लेते घबराते हैं ये!’ और हम ख़ूब हंसे! उसके बाद मैंने उनको कई बार बेवक़ूफ़ बनाने के लिए पूछा—'क्यों सरदार जी, बारह बज गए?’ वह बेशरमी से दांत फाड़कर जवाब देते—'जी, असां दे तो चौबीस घंटे बारह बजे रहते हैं.’ और यह कहकर ख़ूब हंसे, गोया यह बड़ा मज़ाक़ हुआ.

मुझे सबसे ज़्यादा डर बच्चों की ओर से था. अव्वल तो किसी सिक्ख का एतबार नहीं, कब बच्चे के गले पर कृपाण चला दे! फिर यह तो रावलपिंडी से आए थे. ज़रूर दिल में मुसलमानों की तरफ़ से कीना रखते होंगे, और बदला लेने की ताक में होंगे! मैंने बीवी को ताकीद कर दी कि बच्चे हरगिज़ सरदार जी के क्वार्टर की तरफ़ न जाने दिए जाएं! मगर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं. चन्द रोज़ में मैंने देखा कि सरदार की छोटी लड़की मोहिनी उनके पोतों के साथ खेल रही है. यह बच्ची जिसकी उम्र मुश्किल से दस वर्ष की होगी, सचमुच मोहिनी थी. गोरी चिट्टी, अच्छा नाक-नक़्श, बड़ी ख़ूबसूरत. कम्बख्तों की औरतें काफ़ी सुन्दर होती हैं.

मुझे याद आया कि ग़ुलाम रसूल कहा करता था कि अगर पंजाब से सिक्ख मर्द चले जाएं और अपनी औरतों को छोड़ जाएं तो फिर हूरों की तलाश की ज़रूरत नहीं. हां, तो जब मैंने बच्चों को सरदाजी के बच्चों में खेलते देखा, तो मैं उन्हें घसीटता हुआ अन्दर ले आया. फिर मेरे सामने उनकी हिम्मत न हुई कि उधर की तरफ़ जाएं.

बहुत जल्दी सिक्खों की असलियत पूरी तरह ज़ाहिर हो गई. रावलपिंडी से तो डरपोकों की तरह पिटकर भागकर आए थे, पर पूर्वी पंजाब में मुसलमानों के अल्पसंख्यक होने पर, उन पर ज़ुल्म ढाहना शुरू कर दिया. हज़ारों बल्कि लाखों मुसलमानों को बलिदान देना पड़ा. इस्लामी ख़ून की नदियां बह गईं. हज़ारों औरतों को नंगा करके जुलूस निकाला गया. जब से पश्चिमी पंजाब से भागे हुए सिक्ख इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली आने शुरू हुए थे. इस वबा का यहां तक पहुंचना यक़ीनी था.

मेरे पाकिस्तान जाने में अभी चन्द हफ्तों की देर थी, इसलिए मैंने अपने बड़े भाई के साथ अपने बीवी बच्चों को कराची भेज दिया और ख़ुद ख़ुदा पर भरोसा करके ठहरा रहा. हवाई जहाज़ में सामान तो ज़्यादा जा नहीं सकता था, इसलिए मैंने एक पूरी वैगन बुक करा ली. मगर जिस दिन सामान चढ़ाने वाले थे, उस दिन सुना कि पाकिस्तान जानेवाली गाड़ियों पर हमले हो रहे हैं, इसलिए सामान घर में ही पड़ा रहा.

15 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाया गया मगर मुझे इस आज़ादी में क्या दिलचस्पी थी, मैंने छुट्टी मनाई और दिन भर लेटा डान और पाकिस्तान टाइम्स को पढ़ता रहा. दोनों में निहाद आज़ादी के चिथड़े उड़ाए गए थे और साबित किया गया था कि किस तरह हिन्दुओं और अंग्रेज़ों ने मिलकर मुसलमानों का ख़ात्मा करने की साजि़श की थी. वो तो हमारे कायदे आज़म का ऐजाज़ था कि पाकिस्तान लेकर ही रहे, अगरचे अंग्रेज़ों ने हिन्दुओं और सिक्खों के दबाव में आकर अमृतसर को हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया. हालांकि दुनिया जानती है, अमृतसर ख़ालिस मुसलमानों का इस्लामी शहर है और यहां की सुनहरी मस्जिद दुनिया में प्रसिद्ध है...नहीं, वह तो गुरुद्वारा है और गोल्डन टेम्पल कहलाता है. सुनहरी मस्जिद तो दिल्ली में है. सुनहरी मस्जिद ही नहीं, जामा मस्जिद, लाल किला भी हैं. निज़ामुद्दीन औलिया का मज़ार, हुमायूं का मक़बरा, सफ़दरजंग का मदरसा, गरज़ कि चप्पे-चप्पे पर इस्लामी हुकूमत के निशान पाए जाते हैं. फिर भी आज उसी दिल्ली बल्कि उसी शाहजहानाबाद पर हिन्दू साम्राज्यवाद का झंडा बुलन्द किया जा रहा था—'रो ले अब दिल खोलकर ए दीदये खूंबार.’

और यह सोचकर मेरा दिल भर आया, कि दिल्ली जो कभी मुसलमानों का राज्य-स्तम्भ था, सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र था, हमसे छीन लिया गया था और हमें पश्चिमी पंजाब, सिंध, बिलोचिस्तान जैसे उजड्ड और असभ्य इलाक़ों में ज़बर्दस्ती भेजा जा रहा था जहां किसी को शुद्ध उर्दू भाषा बोलनी नहीं आती. जहां सलवारों जैसी पोशाक पहनी जाती है, जिसे देखकर हंसी आती है. जहां हल्की-फुल्की पाव भर में बीस चपातियों के बजाय दो-दो सेर की नानें खाई जाती हैं. फिर मैंने अपने दिल को यह कहकर और मज़बूत किया कि कायदे आज़म और पाकिस्तान की ख़ातिर हमें यह कुरबानी तो देनी ही होगी. मगर फिर भी दिल्ली छोड़ने के ख़याल से दिल मुरझाया ही रहा.

शाम को जब मैं बाहर निकला, और सरदार जी ने दांत निकालकर कहा—'क्यों बाबूजी! तुमने आज कुछ ख़ुशी नहीं मनाई?’ तो मेरे जी में आया कि उसकी दाढ़ी में आग लगा दूं. हिन्दुस्तान की आज़ादी और दिल्ली में सिक्खशाही आखिर में रंग लाकर ही रही. अब पश्चिम पंजाब से आए शरणार्थियों की संख्या हज़ारों से लाखों तक पहुंच गई. ये लोग दरअसल पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए अपने घर-बार छोड़कर वहां से भागे थे. यहां आकर गली-कूचों में अपना रोना-रोते फिरते थे.

कांग्रेसी प्रोपेगेंडा मुसलमानों के खिलाफ़ ज़ोरों पर चल रहा था और इस बार कांग्रेसियों ने चाल यह चली कि बजाय कांग्रेस का नाम लेने के, राष्ट्रीय सेवक संघ और शहीदी दल के नाम से काम कर रहे थे. हालांकि दुनिया जानती है कि कांग्रेसी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. चाहे दुनिया को दिखाने की ख़ातिर वे प्रकट रूप में गांधी और जवाहरलाल को गोलियां ही क्यों न देते हों.

एक दिन सुबह को ख़बर आई कि दिल्ली में क़त्ल-ए-आम शुरू हो गया. करोल बाग़ में मुसलमानों के सैकड़ों घर फूंक दिये गए. चांदनी चौक के मुसलमानों की दुकानें लूट ली गईं और हज़ारों का सफ़ाया हो गया. यह है कांग्रेस के हिन्दू राज का नमूना! खैर, मैंने सोचा कि नई दिल्ली तो काफ़ी समय से अंग्रेज़ों का शहर रहा है, लॉर्ड माउंटबेटन यहां रहता है. कमांडर-इन-चीफ यहां रहता है. कम-से-कम यहां तो मुसलमानों के साथ ऐसा ज़ुल्म नहीं होने देंगे. यह सोचकर मैं दफ्तर की ओर चला, क्योंकि उस दिन मुझे प्रॉविडेंड फंड का हिसाब करना था और इसीलिए दरअसल, मैंने पाकिस्तान जाने में देर की थी.

अभी गोल मार्किट के पास पहुंचा ही था कि दफ्तर का एक हिन्दू बाबू मिला, उसने कहा—'यह क्या कर रहे हो? जाओ! वापस जाओ. बाहर न निकलना, क्नाट प्लेस में बलवाई मुसलमानों को मार रहे हैं...मैं वापस भाग आया! अपने स्क्वायर में पहुंचा ही था कि सरदार जी से मुठभेड़ हो गई. कहने लगे—''शेख़ जी, फिकर न करना. जब तक हम सलामत हैं, तुम्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता.’

मैंने सोचा, इसकी दाढ़ी के पीछे कितनी मक्कारी छिपी हुई है! दिल में तो ख़ुश हो रहा होगा कि चलो, अच्छा हुआ, मुसलमानों का सफ़ाया हो रहा है. मगर ज़बान से हमदर्दी दिखाकर मुझ पर अहसान कर रहा है; बल्कि शायद मुझे चिढ़ाने के लिए कह रहा है क्योंकि सारे स्क्वायर में बल्कि सारी सड़क पर मैं मात्र अकेला मुसलमान था!

पर मुझे इन काफिरों का रहम-ओ-करम नहीं चाहिए. यह सोचकर मैं अपने स्क्वायर में आ गया. मैं मारा भी जाऊं तो दस-बीस को मारकर मरूं! मैं सीधा अपने क्वार्टर में गया, जहाँ मेरे पलंग के नीचे मेरी दोनाली बन्दूक़ रखी थी. जब से फ़सादात शुरू हुए थे, मैंने कारतूसों और गोलियों का काफ़ी ज़खीरा जमा कर लिया था. पर वहां मुझे बन्दूक़ नहीं मिली. सारा घर छान मारा, पर उसका कहीं पता न चला.
'क्यूं हज़ूर, क्या ढूंढ़ रहे हैं आप?'
यह मेरा वफ़ादार मुलाजि़म ममदू था.
'मेरी बन्दूक़ क्या हुई?'
उसने कोई जवाब नहीं दिया, मगर उसके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर था कि उसे मालूम है. शायद उसने छिपाई है या चुराई है.
''बोलता क्यों नहीं?' मैंने डांटकर कहा.
तब हक़ीक़त मालूम हुई कि ममदू ने मेरी बन्दूक़ चुराकर अपने चन्द दोस्तों को दे दी थी, जो दरियागंज में मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए हथियारों का ज़खीरा जमा कर रहे थे.

'कई सौ बन्दूकें हैं हमारे पास सात मशीनगनें, दस रिवॉल्वर और एक तोप! काफिरों को भूनकर रख देंगे, सरकार, भूनकर.'
मैंने कहा, 'दरियागंज में मेरी बन्दूक़ से काफिरों को भून दिया गया तो इसमें मेरी हिफ़ाज़त कैसे होगी? मैं तो यहां निहत्था काफिरों के घेरे में फंसा हुआ हूं. यहां मुझे भून दिया गया तो कौन जि़म्मेदार होगा?' मैंने ममदू से कहा.

वह किसी तरह छिपता-छिपाता दरियागंज तक जाए और वहां से मेरी बन्दूक़ और सौ-दो सौ कारतूस ले आए. वह चला तो गया मगर मुझे यक़ीन था कि अब लौटकर नहीं आएगा.

अब मैं घर पर बिलकुल अकेला रह गया था और सामने कार्नेस पर मेरे पत्नी और बच्चों की तस्वीर ख़ामोशी से मुझे घूर रही थी. यह सोचकर मेरी आंखों में आंसू आ गए कि अब उनसे मुलाकात होगी भी कि नहीं? लेकिन यह ख़याल करके इत्मीनान भी हुआ कि कम-से-कम वे तो ठीक तरह से पहुंच गए थे. काश, मैंने प्रॉविडेंट फंड का लालच न किया होता और पहले ही चला गया होता. पर अब पछताने से क्या!

'सत श्री अकाल’...'हर हर महादेव'...दूर से आवाज़ें क़रीब आ रही थीं. ये बलवाई थे. ये मेरी मौत के हरकारे थे. मैंने ज़ख्मी हिरण की तरह इधर-उधर देखा, जो गोली खा चुका हो और जिसके पीछे शिकारी कुत्ते लगे हों! बचाव की कोई सूरत न थी. क्वार्टर के किवाड़ पतली लकड़ी के थे और उनमें शीशे लगे हुए थे. अगर मैं बन्द होकर बैठा भी रहा तो दो मिनट में बलवाई किवाड़ तोड़कर अन्दर आ सकते थे.
'सत श्री अकाल! हर हर महादेव!!'
आवाज़ें और क़रीब आ रही थीं. मेरी मौत क़रीब आ रही थी.
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। सरदार जी दाखिल हुए.
'शेख़ जी, तुम हमारे क्वार्टर में आ जाओ! जल्दी करो!' बगैर सोचे-समझे, अगले क्षण मैं सरदार जी के बरामदे में पड़ी चिक के पीछे था. मौत की गोली सन्न से मेरे सिर पर से गुज़र गई क्योंकि मैं वहां दाखिल ही हुआ था कि एक लारी आकर रुकी और उसमें से दस-पन्द्रह नौजवान उतरे, उनके लीडर के हाथ में एक टाइप की हुई फेहरिस्त थी : 'क्वार्टर न. 8 शेख़ बुरहानुद्दीन!'

उसने काग़ज़ पर नज़र डालते हुए हुक्म दिया और यह पूरा दल क्वार्टर पर टूट पड़ा! मेरी गृहस्थी की दुनिया मेरी आंखों के सामने उजड़ गई, लुट गई! कुर्सियां, मेज़ें, संदूक़, तस्वीर, किताबें, दरियां, कालीन, यहां तक कि मैले कपड़े, हर चीज़ लारी पर पहुंचा दी गई।
डाकू!
लुटेरे!!
क़ज़्ज़ाक़!!!
और यह सरदार जी! जो, बज़ाहिर हमदर्दी जताकर मुझे यहां ले आए थे, यह कौन-से कम लुटेरे थे?
बाहर जाकर बलवाइयों से कहने लगे—'ठहरिए साहब! इस घर पर हमारा हक़ ज़्यादा है, हमें भी इस लूट में हिस्सा मिलना चाहिए.' और यह कहकर उन्होंने अपने बेटा-बेटी को इशारा किया और वे भी लूटमार में शामिल हो गए. कोई मेरी पतलून उठाए चला आ रहा है, कोई कोट, सूटकेस. कोई मेरी बीवी-बच्चों की तस्वीरें भी ला रहा है और यह सब माल-ए-ग़नीमत सीधा अन्दर के कमरे में जा रहा था.

'अच्छा रे सरदार! जिन्दा रहा तो तुझसे भी समझूंगा!!’ पर, उस वक्त तो मैं चूं भी नहीं कर सकता था, क्योंकि हमलावर सभी हथियारबन्द थे और मुझसे चन्द गज़ के फ़ासले पर थे। अगर उन्हें कहीं मालूम हो गया कि मैं यहां हूं...
''उरे, अन्दर आओ, तुसी!’’
अचानक मैंने देखा कि सरदार नंगी कृपाण हाथ में लिये मुझे अन्दर बुला रहे हैं. मैंने एक बार उस दढ़ियल चेहरे को देखा, जो लूट-मार की भाग-दौड़ से और भी खौफ़नाक हो गया था और फिर कृपाण को जिसकी चमकीली धार मुझे मौत का न्योता दे रही थी. बहस करने का मौका नहीं था. अगर मैं कुछ भी बोलता और बलवाइयों ने सुन लिया होता, तो एक गोली मेरे सीने के पार होती. कृपाण और बन्दूक़ में एक को पसन्द करना था. मैंने सोचा, इन दस बन्दूक़ वाले बलवाइयों से कृपाण वाला बूढ़ा बेहतर है. मैं कमरे में चला गया झिझकता हुआ, ख़ामोशी से.
'इत्थे नहीं, ओस अन्दर आओ!'
मैं और अन्दर के कमरे में चला गया, जैसे क़साई के साथ बकरा जि़बाहख़ाने में दाखिल होता है. मेरी आंखें कृपाण की धार से चकाचौंध हो रही थीं.
'यह लो जी, अपनी चीज़ें संभालो!' यह कहकर सरदार जी ने वह तमाम मेरा सामान मेरे सामने रख दिया, जो उन्होंने और उनके बच्चों ने झूठ-मूठ की लूट में शामिल होकर हासिल किया था.
सरदारनी बोली, 'बेटा, हम तो तेरा कुछ भी सामान न बचा सके...'
मैं कोई जवाब न दे सका.
इतने में बाहर से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं. बलवाई मेरी लोहे की अलमारी को बाहर निकाल रहे थे और उसको तोड़ने की कोशिश कर रहे थे.
'इसकी चाबियां मिल जातीं तो सब मामला आसान हो जाता!'
'चाबियां तो अब पाकिस्तान में मिलेंगी. भाग गया न, डरपोक कहीं का! मुसलमान का बच्चा था तो मुकाबला करता!'
नन्हीं मोहिनी मेरी बीवी के चन्द रेशमी क़मीज़ और ग़रारे, न जाने किससे छीनकर ला रही थी! उसने सुना तो बोली, 'तुम बड़े बहादुर हो! शेख़जी डरपोक क्यों होने लगे! वह तो कोई पाकिस्तान नहीं गए.'
'नहीं गया तो यहा से कहीं मुंह काला कर गया.'
'मुँह काला क्यों करते, वह तो हमारे यहां...'

मेरे दिल की हरकत एक लम्हे के लिए बन्द हो गई. बच्ची अपनी ग़लती का अहसास करते ही ख़ामोश हो गई. मगर उन बलवाइयों के लिए इतना ही काफ़ी था. सरदार जी पर जैसे ख़ून सवार हो गया. उन्होंने मुझे अन्दर के कमरे में बन्द करके कुंडी लगा दी. अपने बेटे के हाथ में कृपाण दी और ख़ुद बाहर निकल गए. बाहर क्या हुआ, यह मुझे ठीक तरह मालूम न हुआ. थपड़े की आवाज़—फिर मोहिनी के रोने की आवाज़ और उसके बाद सरदार जी की आवाज़. पंजाबी गालियां, कुछ समझ में न आया कि किसे गाली दे रहे हैं और क्यों. मैं चारों तरफ़ से बन्द था. इसलिए ठीक से सुनाई न देता था.

और फिर—गोली चलने की आवाज़—सरदारनी की चीख़, लारी रवाना होने की गड़गड़ाहट और फिर तमाम स्क्वायर पर जैसे सन्नाटा छा गया.
जब मुझे कमरे की कैद से निकाला गया, तो सरदारजी पलंग पर पड़े थे और उनके सीने के क़रीब सफेद क़मीज़ ख़ून से सुर्ख हो रही थी. उनका लड़का पड़ोसी के घर से डॉक्टर को टेलीफोन कर रहा था.
'सरदार जी, यह तुमने क्या किया?' मेरी ज़बान से न जाने यह वाक्य कैसे निकला! मैं सकते में था...
मेरी बरसों की दुनिया, ख़यालात, भावनाएं, साम्प्रदायिकता की दुनिया खंडहर हो गई थी.
'सरदार जी, यह तुमने क्या किया?'
'मुझे क़र्ज़ा उतारना था बेटा!'
'क़र्ज़ा?'
'हां! रावलपिंडी में तुम्हारे जैसे ही एक मुसलमान ने अपनी जान देकर मेरी और मेरे घरवालों की जान व इज़्ज़त बचाई थी!'
'क्या नाम था उसका, सरदारजी?'
'ग़ुलाम रसूल!'
'ग़ुलाम रसूल?'
और मुझे ऐसा लगा, जैसे किस्मत ने मेरे साथ धोखा किया हो! दीवार पर लटके हुए घंटे ने बारह बजाने शुरू किए—एक...दो...तीन...चार...पांच...

सरदार जी की निगाहें घंटे की तरफ़ फिर गईं, जैसे मुस्करा रहे हों और मुझे अपने दादा याद आ गए, जिनकी कई फ़ीट लम्बी दाढ़ी थी. सरदारजी की शक्ल उनसे कितनी मिलती थी! छह...सात...आठ...नौ...
जैसे वह हंस रहे हों, उनकी सफेद दाढ़ी और सिर के खुले बालों ने चेहरे के गिर्द एक चमकदार आभामंडल-सा बनाया हुआ था!
दस...ग्यारह...बारह.
जैसे वह कह रहे हों—'जी असां दे हां, चौबीस घंटे बारह बजे रहते हैं...'
फिर वह निगाहें हमेशा के लिए बन्द हो गईं.
और मेरे कानों में ग़ुलाम रसूल की आवाज़, दूर से, बहुत दूर से आई—
'मैं कहता न था कि बारह बजे इन सिक्खों की अक्ल ग़ायब हो जाती है और वे कोई-न-कोई हिमाक़त कर बैठते हैं. अब इन सरदारजी ही को देखो ना...एक मुसलमान की ख़ातिर अपनी जान दे दी.'
पर यह सरदार जी नहीं मरे थे. मैं मरा था!

पुस्तक- मुझे कुछ कहना है: ख्वाजा अहमद अब्बास
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
[लिप्यांतरण : डॉ. ज़ोया ज़ैदी; ख्वाजा अहमद अब्बास के मुन्ततिब अफ़साने; संकलनकर्ता : राम लाल]

(news18.com)

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