खेल
(मोना पार्थसारथी)
नयी दिल्ली, 15 जनवरी तोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर 41 साल का इंतजार खत्म करने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम इस बार ओडिशा में चल रहे विश्वकप में खिताब के प्रबल दावेदारों में से है। भारत ने 1975 में एकमात्र विश्वकप जीता था और पिछले 48 साल से यह सेमीफाइनल में भी नहीं पहुंचा है लेकिन राउरकेला में 15वें विश्वकप के पहले मैच में स्पेन को 2-0 से हराकर भारत ने शानदार आगाज किया। इस संबंध में कुआलालम्पुर में 1975 में भारत की खिताबी जीत के नायकों में शामिल रहे असलम शेर खान से भाषा के पांच सवाल और उनके जवाब सवाल -क्या आपको लगता है कि ओलंपिक के बाद इस बार विश्वकप में भी भारत का पदक के लिए 48 साल का इंतजार खत्म होगा।
जवाब-निश्चित तौर पर। मुझे लगता है कि यह टीम शीर्ष चार में जरूर रहेगी और पदक जीत सकती है। तोक्यो ओलंपिक में हम तीसरे स्थान पर रहे और विश्व रैंकिंग में भी शीर्ष पांच-छह में हैं। तैयारी अच्छी है और पूल भी कमोबेश आसान लग रहा है। पहले मैच में टीम आत्मविश्वास से भरपूर नजर आई और दोनों गोल अच्छे हुए।
सवाल-क्या भारत को घरेलू मैदान पर खेलने का फायदा मिलेगा।
जवाब-घरेलू मैदान पर खेलने का फायदा जैसी बातें मैदान के बाहर ही होती हैं। मैदान पर उतना असर नहीं होता क्योंकि अगर होता तो पिछला विश्वकप भी भुवनेश्वर में हुआ था और भारत तभी जीत सकता था। भारत को प्रबल दावेदारों में गिना जा रहा है क्योंकि पिछले चार साल में टीम ने शानदार प्रदर्शन किया है और यह काफी आगे बढ़ी है।
सवाल-किन भारतीय खिलाडय़िों पर इस बार नजरें रहेंगी।
जवाब-भारत के पास कई विश्वस्तरीय खिलाड़ी है मसलन कप्तान हरमनप्रीत सिंह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रैग फ्लिकर में से हैं। उनके अलावा मनप्रीत सिंह मिडफील्ड को संभाल सकते हैं और गोलकीपर पी आर श्रीजेश के रूप में भारत के पास काफी अनुभवी खिलाड़ी है जो गोल के
सामने चट्टान की तरह अडिग रहते हैं।
सवाल-आठ बार की ओलंपिक चैम्पियन भारतीय टीम विश्व कप में उस सफलता को दोहरा क्यों नहीं सकी। पिछले 48 साल में सिर्फ एक खिताब ही जीत पाए और सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंचे।
जवाब-यह कहना बिलकुल दुरुस्त है कि ओलंपिक की सफलता विश्वकप में नजर नहीं आई। ओलंपिक या एशियाई खेल जैसे बहु-खेल आयोजनों में और विश्वकप में काफी फर्क होता है। बहु-खेल आयोजनों में आप अपने देश के दल का एक हिस्सा होते हैं लेकिन विश्व कप में फोकस एक ही खेल पर रहता है और यह अधिक प्रतिस्पर्धी होता है।
सवाल-क्या आपको लगता है कि क्रिकेट की तरह हॉकी में विश्वकप विजेताओं को वह दर्जा नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।जवाब-क्रिकेट में खिलाडय़िों को हमेशा सर्वोपरि रखा गया और समय-समय पर नवाब पटौदी, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, एम एस धोनी जैसे नायक निकले जिनकी वजह से खेल की लोकप्रियता और बढ़ी। इसके उलट हॉकी प्रशासन ने खिलाडय़िों पर कई तरह की पाबंदियां लगाए रखीं और उन्हें प्रशंसकों से, मीडिया से जुड़ऩे ही नहीं दिया। हॉकी प्रशासन ने खुद को खिलाडय़िों से ऊपर रखा जिससे उन्हें वह लोकप्रियता नहीं मिल सकी जो बाकी खेलों के खिलाडय़िों को मिली। (भाषा)


