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फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में फ़लस्तीन का प्रशंसकों में ऐसे चला जादू, बिना खेले बनी '33वीं टीम'
17-Dec-2022 12:53 PM
फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में फ़लस्तीन का प्रशंसकों में ऐसे चला जादू, बिना खेले बनी '33वीं टीम'

फ़लस्तीन भले ही क़तर में हो रहे फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में नहीं खेल रहा है लेकिन फ़ुटबाल के इस महाकुंभ में अरब जगत के साथ लाखों प्रशंसक उसके मुरीद हैं.

फ़लस्तीन का झंडा खेल के मैदान से लेकर क़तर की सड़कों तक पर लहराया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि वर्ल्ड कप में भले ही 32 देशों की टीमें खेल रही हैं लेकिन फ़लस्तीन यहां '33वीं टीम' के रूप में मौजूद है और वर्ल्ड कप का ताज चाहे जिसे मिले, एक विजेता फ़लस्तीन भी है.

राउंड ऑफ़ सिक्सटीन में छह दिसम्बर को स्पेन के ख़िलाफ़ हैरतअंगेज़ जीत के बाद मोरक्को की टीम ने जब मैदान में फ़लस्तीनी झंडा फहराया तो अल रयान का एजुकेशन सिटी स्टेडियम शोर से गूंज उठा.

हालांकि मोरक्को का इसराइल के साथ कूटनीतिक संबंध है, लेकिन उसके खिलाड़ियों ने इसकी परवाह किए बिना फ़लस्तीनी मुद्दे पर अपना खुलेआम समर्थन ज़ाहिर कर प्रशंसकों के बीच वो हीरो बन गए.

मोरक्को की टीम ने ग्रुप स्टेज में कनाडा को हराने के बाद भी फ़लस्तीनी झंडे के साथ जश्न मनाया था.

हालांकि फ़ीफ़ा के नियमों के मुताबिक, पिच पर खिलाड़ियों के लिए बैनर, झंडे, फ़्लायर प्रदर्शित करने पर पाबंदी है और उन पर कार्यवाही भी की जा सकती है.

इसलिए जब मोरक्को की टीम ने जश्न मनाया तो पूरी दुनिया में फ़लस्तीनी समर्थकों ने उनकी हिम्मत की दाद दी और खुशी मनाई. सोशल मीडिया पर फ़लस्तीनी झंडे लिए मोरक्को के खिलाड़ियों की तस्वीर वायरल हो गई.

अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़ अरब देशों के साथ-साथ फ़लस्तीन में भी मोरक्को की जीत का जश्न मनाया गया. गज़ा पट्टी के एक स्पोर्ट्स हॉल में हज़ारों की संख्या में लोग जुटे और ये सभी इस मैच के दौरान मोरक्को का समर्थन कर रहे थे.

इस वर्ल्ड कप में मोरक्को की टीम को भारी उलटफेर करने वाली टीम के रूप में देखा जा रहा था हालांकि सेमीफ़ाइनल में फ्रांस से उसे हार का सामना करना पड़ा और वर्ल्ड कप की दावेदारी से बाहर होना पड़ा.

मोरक्को की टीम भले हार गई लेकिन फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के इतिहास में सेमीफ़ाइनल तक पहुंचने वाली पहली अफ़्रीकी-अरब टीम बनने का उसने इतिहास भी रचा.

जिस दिन मोरक्को टीम जीती, स्टेडियम से लेकर क़तर की सड़कों तक हरा, सफ़ेद, लाल और काले रंगों वाले फ़लस्तीनी झंडे हर तरफ़ दिख रहे थे, जो ये बता रहे थे कि फ़लस्तीन का मुद्दा दुनिया की आंखों से ओझल नहीं हुआ है.

स्टेडियम और फ़ैन ज़ोन में प्रशंसकों ने झंडों के साथ फ़लस्तीनी आर्मबैंड और ब्रेसलेट लगाए हुए थे और 'फ़्री फ़लस्तीन' के नारे लगा रहे थे.

फ़लस्तीनी फ़ुटबॉल टीम के एक अधिकारी राजौब ने समाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा, "वर्ल्ड कप में ये दिख गया कि ये बात झूठ साबित हुई कि हालिया शांति समझौते के बाद फ़लस्तीन का मुद्दा दफ़्न हो चुका है." राजौब फ़तह मुवमेंट के सेक्रेटरी जनरल भी हैं.

वर्ल्ड कप के दौरान फ़लस्तीन को मिले समर्थन को रजौब, इस समझौते पर 'करारा तमाचा' मानते हैं.

फ़लस्तीनी इस समझौते (नार्मलाइजेशन डील) को विश्वासघात के रूप में देखते हैं और पूर्वी येरूशलम में फ़लस्तीनी राज्य स्थापित किए बिना इसराइल को मान्यता देने के दशकों पुराने अरब लीग के स्टैंड से पीछे हटने के तौर पर भी देखते हैं.

फ़लस्तीनी सेंटर फ़ॉर पॉलिसी एंड सर्वे रिसर्च का कहना है कि, 'सालों की निराशा के बाद, क़तर वर्ल्ड कप ने फ़लस्तीनी जनता का अरब जगत के प्रति भरोसे को फिर से बहाल किया है.'

क़तर का रिश्ता
क़तर का इसराइल के साथ कोई रिश्ता नहीं है, वो फ़लस्तीन को देश का दर्जा देने का हामी रहा है. क़तर में बड़े पैमाने पर फ़लस्तीनी रहते हैं.

29 नवंबर को 'फ़लस्तीनी जनता के साथ अंतरराष्ट्रीय एकजुटता दिवस' के दौरान क़तर में सरकारी तौर पर जश्न मनाया गया.

क़तर के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर नाकाबंदी किए गए गज़ा पट्टी को ईंधन और पुनर्निर्माण की मदद का अपना वायदा दुहराया.

गज़ा पर शासन करने वाले इस्लामिक चरमपंथी ग्रुप हमास के प्रवक्ता हाज़ेम क़ासिम ने कहा कि वर्ल्ड कप ने फ़लस्तीन के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय जगत के सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई है. हमास को क़तर का समर्थन प्राप्त है.

इसराइल में मोरक्को मूल के लाखों यहूदी रहते हैं इनमें से बहुतों ने मोरक्को की हैरतअंगेज़ जीत पर जश्न भी मनाया था.

इसराइल के अग्रणी मीडिया घरानों को भी ये मानना पड़ा कि वर्ल्ड कप ने ये साफ़ कर दिया कि अरबों की सहानुभूति किस तरफ़ है.

एक वामपंथी अख़बार हारेत्ज़ ने लिखा कि 'सोशल मीडिया पर वर्ल्ड कप का असली विजेता फ़लस्तीन रहा.'

फ़लस्तीनी फ़ुटबॉल टीम को फ़ीफ़ा ने मान्यता दे रखी है लेकिन वो कभी वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफ़ाई नहीं कर पाई.

फ़लस्तीन-इसराइल विवाद
फ़लस्तीन और इसराइल के बीच विवाद दशकों पुराना है और इसकी बुनियाद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 14 मई, 1948 को इसराइल की स्थापना के बाद से पड़ गई थी.

तब से लेकर अब तक इसराइल और अरब मुल्कों में चार बड़े युद्ध हुए हैं लेकिन इसने मसले को सुलझाने की बजाय उसे और जटिल बनाने का ही काम किया.

पिछले साल गज़ा के चरमपंथियों और इसराइली सेना के बीच चली 11 दिनों की जंग में 200 फ़लस्तीनी और दर्जनों इसराइली लोगों की मौत हुई थी.

इसराइल के कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक इलाक़े में सेना क़रीब-क़रीब रोज़ कार्रवाई करती है. इन अभियानों में इस साल अभी तक 132 फ़लस्तीनी मारे गए हैं. जबकि फ़लस्तीनी हमलों में 19 इसराइली नागरिकों की मौत हो चुकी है.

इसराइल का कहना है कि वो इन अभियानों में चरमपंथियों को निशाना बनाता है लेकिन मारे गए लोगों में फ़लस्तीनी बच्चे भी शामिल हैं. (bbc.com/hindi)


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