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तृणमूल कांग्रेस का संकट बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को कैसे फ़ायदा पहुंचा सकता है?
09-Jun-2026 7:35 PM
तृणमूल कांग्रेस का संकट बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को कैसे फ़ायदा पहुंचा सकता है?

तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सांसद कल्याण बनर्जी को पार्टी चीफ़ व्हिप बनाया है. टीएमसी सांसदों के बग़ावती रुख़ पर कल्याण बनर्जी ने उन्हें निशाने पर लिया है.

कल्याण बनर्जी ने "बाग़ी सांसदों के बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव और शुभेंदु अधिकारी से मिलकर बीजेपी के साथ" होने का आरोप लगाया है.

इससे पहले तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया था कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठाने की मांग की है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी विधायकों के अलग गुट के बाद अब लोकसभा में टीएमसी के लिए समस्या खड़ी हो सकती है.

मंगलवार को टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने एक प्रेस कॉफ़्रेंस में कहा, "मुझे नहीं पता कौन क्या दावा कर रहा है लेकिन चौबीस घंटे हो गए हैं और जिस चिट्ठी का ज़िक्र काकोली घोष दस्तीदार ने किया है, वह अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है. यह चिट्ठी अभी तक किसी ने नहीं देखी है."

कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि कल (सोमवार को) लोकसभा स्पीकर के ऑफ़िस में सांसदों की कोई चिट्ठी नहीं दी गई है और टीएमसी के सांसद एंटी डिफ़ेक्शन लॉ के तहत पार्टी नहीं छोड़ सकते.

उन्होंने सुखेंदु शेखर रे के इस्तीफ़े के बारे में कहा, "उन्हें कई शिकायतें थीं. उन्होंने इस्तीफ़ा देकर अच्छा काम किया है. उन्होंने राजनीतिक आचरण और नैतिकता स्थापित की है."

पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है.

टीएमसी के अंदर कलह

इसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में टीएमसी के बाग़ी सांसदों पर निशाना साधते हुए टीएमसी सांसद कीर्ति आज़ाद ने कहा, "लोकसभा में टीएमसी के 29 सांसद जीतकर आए थे, एक के देहांत के बाद 28 सांसद रह गए. जिन्हें तकलीफ़ हो रही थी उन्होंने चुनाव के बाद यह तकलीफ़ क्यों ज़ाहिर की, चुनाव के पहले करना चाहिए था."

कीर्ति आज़ाद ने कहा, "चुनाव के बाद सुखेंदु शेखर ने अनेकों आरोप लगाए और इस्तीफ़ा दे दिया. उनका आरोप सही है या ग़लत यह अलग बात है, लेकिन कम से कम उन्होंने एक राजनीतिक आचरण दिखाया. तुम में अगर एथिक्स है तो इस्तीफ़ा दे दो और बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आ जाओ."

उन्होंने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा, "जिस थाली में खाया, उसी थाली में छेद. आप भूपेंद्र यादव (बीजेपी नेता) के पास बैठे थे. वहां शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे, जिस आदमी को कैमरे पर देखा गया (पैसे लेते) और नरेंद्र मोदी ने भाषण में इसका ज़िक्र किया. आप किस भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं. ज़रा भी ग़ैरत हो तो कहना कि तुम लोग तृणमूल के नहीं हो."

कीर्ती आज़ाद कोट
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में बग़ावत की ख़बरों के बीच पार्टी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने 'चुनाव हारने और नेताओं के पाला बदलने' से जुड़ा बयान दिया है.

उन्होंने मंगलवार को एक्स पर लिखा, "मुझे यह सबसे अजीब लगता है कि कोई व्यक्ति एक पार्टी के चुनाव चिह्न और एक ख़ास नेता के नाम पर चुनाव जीतता है, लेकिन जैसे ही उस पार्टी को हार का सामना करना पड़ता है, वह उसी पार्टी और नेता का साथ छोड़ देता है."

टीएमसी सांसद ने सवाल किया कि "अगर आपके विचार चुनाव परिणाम के साथ बदल जाते हैं, तो क्या वे वास्तव में आपके विचार थे?"

उन्होंने कहा, "आप किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ते हैं. आप मतदाताओं से पार्टी पर भरोसा करने की अपील करते हैं. आप उस पार्टी के समर्थन और उसके नेताओं की अपील के आधार पर जीतते हैं. और फिर पार्टी हार जाती है और आप तुरंत पाला बदल लेते हैं."

इससे पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से निकाले गए बाग़ी विधायक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गए.

विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बाग़ी विधायकों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार करते हुए विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी.

इसके लिए 58 बाग़ी विधायकों ने विधानसभा में बैठक की और ऋतब्रत को विधायक दल का नेता चुने जाने की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष को दी थी.

टीएमसी में कुछ इसी तरह का संकट अब लोकसभा सांसदों को लेकर दिख रहा है.

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के 28 सांसद हैं. 20 सांसदों के समर्थन का मतलब है कि अलग होने वाला कथित गुट दल-बदल विरोधी क़ानून के तहत कार्रवाई से बच सकता है.

हालात ऐसे भी हो सकते हैं कि अलग हुए गुट को असली तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता मिल जाए. महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इस तरह के हालात देख चुके हैं, जब अलग हुए गुट को ही मूल पार्टी के तौर पर मान्यता मिल गई.

हालाँकि काकोली घोष के दावे में कितना दम है या टीएमसी के बाग़ी सांसदों की तादाद कितनी है, इसकी अभी तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.

क्या है दल-बदल विरोधी क़ानून
कीर्ति आज़ाद ने कहा, "आपने बताया नहीं कि आपके नंबर कितने हैं. दो तिहाई हुए या नहीं.. नहीं तो अभी तक आपने नंबर निकाल दिया होता.. स्पीकर को क्या चिट्ठी दी, ये बाहर निकाल दिया होता. अगर आपके झूठ को मान भी लें कि आपके साथ 20, 21 या 22 सांसद हैं तो आपको बीजेपी में विलय करना होगा."

इस मुद्दे पर कल्याण बनर्जी ने कहा है कि अगर एंटी डिफ़ेक्शन लॉ है, तो ये सांसद अलग नहीं हो सकते हैं.

साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने 52वें संशोधन अधिनियम के ज़रिए संविधान में 10वीं अनुसूची को जोड़ा था.

इसी अनुसूची को आमतौर पर दल-बदल विरोधी क़ानून या एंटी डिफ़ेक्शन लॉ के तौर पर जाना जाता है. इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.

विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल विरोधी क़ानून में आता है. अगर कोई सांसद या विधायक ऐसा करता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है.

हालांकि इसमें अपवाद भी हैं. अगर कोई पार्टी दो तिहाई विधायक या सांसदों के साथ दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहे, तो सदस्यता ख़त्म नहीं होगी.

लेकिन जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी मूल पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक या सांसद एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.

लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया गया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया.

इन परिस्थितियों में नहीं लागू होता दल-बदल क़ानून

साल 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. इसके बाद संविधान में 91वां संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल-बदल को असंवैधानिक क़रार दिया गया.

विधायक-सांसद कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गंवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी दो तिहाई सदस्यों के साथ मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाती है, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.

ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.

संविधान की 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा.

पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवैधानिक क़रार दे दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.

केंद्र सरकार को कितना फ़ायदा

2024 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 240 सीटों पर जीत मिली थी. ऐसा पहली बार हुआ कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार में बीजेपी के पास अपना बहुमत नहीं है.

फ़िलहाल लोकसभा में एनडीए के पास लगभग 293 सांसद हैं, जबकि विपक्षी इंडिया ब्लॉक के पास 234 सांसद हैं.

अप्रैल महीने में ही महिला आरक्षण क़ानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा सरकार का 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया था.

संसद में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाले क़ानून में संशोधन और डीलिमिटेशन से जुड़े बिलों के समर्थन में 298 मत पड़े जबकि इसके विरोध में 230 मत पड़े थे. यह संख्या केंद्र सरकार के सामने एक बड़ा संकट है.

लोकसभा में इस बिल को पास कराने के लिए केंद्र सरकार को 362 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत थी.

अगर टीएमसी में टूट होती है तो उनके जितने सांसद अलग होंगे, विपक्ष की ताक़त उतनी ही कम हो जाएगी और टीएमसी के बाग़ी सांसदों के रुख़ से दिखता है कि इससे बीजेपी और केंद्र सरकार को संख्या के आधार पर मज़बूती मिलेगी.

इसके अलावा नरेंद्र मोदी की मौजूदा केंद्र सरकार की जेडीयू और टीडीपी जैसे दलों पर निर्भरता कम होगी.

मौजूदा हालात में बीजेपी के लिए चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और नीतीश कुमार की जेडीयू काफ़ी अहम हैं. टीडीपी को 2024 लोकसभा चुनाव में 16 और जेडीयू को 12 सीटों पर जीत मिली थी.

यही हाल राज्यसभा का है जहां एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत से कम सीटें हैं. ऐसे में विपक्ष में हुई कोई भी टूट उसे राज्यसभा में मज़बूत कर सकती है और इसका फ़ायदा केंद्र सरकार को कई विधेयकों को पास कराने में मिल सकता है.

टीएमसी के पास लोकसभा में 28 सांसद हैं, जबकि सुखेंदु शेखर रे इस्तीफ़े के बाद राज्यसभा में उनके आठ सांसद हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


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