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कहा-नौकरी दिलाने के नाम पर लिया पैसा वैध देनदारी नहीं
बिलासपुर, 24 मई। 73 लाख रुपए के चर्चित चेक बाउंस मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट अंशुल मिंज की अदालत ने कृषि वैज्ञानिक शिल्पा कौशिक को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नौकरी दिलाने के नाम पर लिया गया पैसा वैध कानूनी देनदारी नहीं माना जा सकता, इसलिए ऐसे मामले में परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 लागू नहीं होती।
परिवादी संतराम साहू ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2015 में शिल्पा कौशिक और उनके दिवंगत पति ने सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देकर उनसे 73 लाख रुपए लिए थे। रकम वापस मांगने पर आरोपी की ओर से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का चेक दिया गया, जो बाद में बाउंस हो गया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने हस्तलेखन विशेषज्ञ डॉ. सुनंदा डेंगे की रिपोर्ट अदालत में पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि चेक पर मौजूद हस्ताक्षर और लिखावट आरोपी के वास्तविक हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
कोर्ट ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि अवैध उद्देश्य से किया गया कोई भी लेनदेन प्रारंभ से ही शून्य माना जाता है। इसलिए इस तरह की राशि को कानूनी देनदारी नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के दत्तात्रेय बनाम सरपनप्पा मामले का हवाला देते हुए यह भी कहा कि परिवादी 73 लाख रुपए जैसी बड़ी रकम देने की अपनी आर्थिक क्षमता साबित नहीं कर सका। मामले में न तो कोई लिखित समझौता प्रस्तुत किया गया और न ही आयकर रिटर्न जमा किया गया।
इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने शिल्पा कौशिक को आरोपों से बरी कर दिया।


