सेहत-फिटनेस
चीन में हर साल एक अस्पताल में ऐसे मरीज़ ज़रूर आते हैं, जिनको एक अजीब बीमारी होती है. इनको बहुत छोटे-छोटे परी जैसे लोग दिखने लगते हैं. ये इन्हें दरवाज़े के नीचे बची हुई जगह से जाते हुए, दीवारों पर चढ़ते हुए और फ़र्नीचर पर चिपके हुए नज़र आते हैं.
अस्पताल में हर साल ऐसे सैकड़ों मरीज़ आते हैं, जिन्हें यह अजीबो-गरीब शिकायत होती है. इसकी वजह एक मशरूम है, जिसका नाम 'लानमाओआ एशियाटिका' है. यह मशरूम जंगलों में पाइन के पेड़ों के साथ मिलता है.
चीन के युन्नान प्रांत में यह मशरूम बाज़ारों में बिकता है, रेस्तरां के मेन्यू में होता है और घरों में जून से अगस्त के बीच के सीज़न में खाया जाता है. आसपास के लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं, क्योंकि खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है.
हालांकि, इस मशरूम को भले पसंद करके खाया जाता हो, लेकिन इससे जुड़ी सबसे ज़रूरी बात ये है कि इसे अच्छे से पकाकर खाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया तो हैलुसिनेशन शुरू हो जाते हैं, यानी भ्रम होना शुरू हो जाता है.
यूटा यूनिवर्सिटी और यूटा नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में बायोलॉजी के डॉक्टरेट छात्र कॉलिन डोमनाउर कहते हैं, "युन्नान में एक मशरूम हॉट पॉट रेस्तरां में सर्वर ने 15 मिनट का टाइमर लगाया और चेतावनी दी, टाइमर बजने से पहले मत खाना, वरना छोटे लोग दिखने लगेंगे."
कॉलिन इस मशरूम पर रिसर्च कर रहे हैं, उनका कहना है कि यहां की संस्कृति में यह मशरूम और इससे जुड़ी हैलुसिनेशन की बीमारी आम है. लेकिन युन्नान और कुछ चुनिंदा जगहों के अलावा, यह मशरूम ज़्यादातर लोगों के लिए एक रहस्य ही है.
क्या है लिलिपुटियन हैलुसिनेशन्स?
कॉलिन डोमनाउर को इस मशरूम के बारे में पहली बार अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान अपनी माइकोलॉजी टीचर से पता चला. वह कहते हैं, "बहुत अजीब लगा कि कोई मशरूम ऐसा हो सकता है जो लोगों को परी-कहानी जैसे भ्रम दिखाए. यह अलग-अलग संस्कृतियों और समय में रिपोर्ट हुआ हो. मुझे हैरानी के साथ जिज्ञासा भी हुई कि इसके बारे में और जानूं."
अब कॉलिन इस मशरूम की दशकों पुरानी पहेलियों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. वह यह जानना चाहते हैं कि कौन-सा केमिकल इसके कारण भ्रम पैदा करता है और इससे हमें इंसानी दिमाग़ के बारे में क्या सीख मिल सकती है.
फ़ंगस को ढूंढने और रिकॉर्ड करने वाली संस्था फ़ंगी फाउंडेशन की संस्थापक और डायरेक्टर गिउलियाना फ़ुरसी कहती हैं, "इस साइकेडेलिक मशरूम के बारे में बहुत सी बातें सुनी गईं, बहुत लोगों ने इसे ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कभी नहीं मिला."
इस मशरूम का कुछ दस्तावेज़ों में ज़िक्र मिलता है. 1991 के एक पेपर में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के दो शोधकर्ताओं ने युन्नान के लोगों के केस बताए जो एक ख़ास मशरूम खाने के बाद 'लिलिपुटियन हैलुसिनेशन्स' देखते थे. इसका मतलब है कि बहुत छोटे इंसान, जानवर या काल्पनिक जीव दिखना. यह नाम गुलिवर ट्रैवल्स किताब के छोटे लोगों वाले लिलिपुट द्वीप से आया है.
शोधकर्ताओं ने लिखा कि इस हैलुसिनेशन का शिकार हो चुके मरीज़ों ने बताया कि ये छोटे लोग हर जगह घूम रहे थे. ये आमतौर पर दस से ज़्यादा दिखते थे. वे कपड़े पहनते समय अपने कपड़ों पर और खाना खाते समय बर्तनों पर भी नज़र आते थे. आंख बंद करने पर ये और भी साफ़ दिखते थे.
पहले भी हुई है ऐसा मशरूम खोजने की कोशिश
इससे पहले 1960 के दशक में गॉर्डन वॉसन और रोजर हाइम ने भी पापुआ न्यू गिनी में कुछ ऐसे ही मशरूम के बारे में जाना था. इन दोनों ने साइलोसाइबिन मशरूम को पश्चिमी दुनिया में पहचान दिलाई थी.
वे एक ऐसे मशरूम की तलाश में थे जिसके बारे में 30 साल पहले आए मिशनरियों ने कहा था कि स्थानीय लोग इससे "पागल" हो जाते हैं. एक एंथ्रोपॉलजिस्ट ने इसे बाद में "मशरूम मैडनेस" कहा.
गॉर्डन और रोजर नहीं जानते थे कि वे जो खोज रहे थे, वह आज चीन से आने वाली रिपोर्टों से बहुत मिलता-जुलता था. उन्होंने मशरूम के सैंपल इकट्ठे किए और स्विस केमिस्ट अल्बर्ट हॉफ़मैन को भेजा. लेकिन हॉफ़मैन को इसमें कोई ख़ास रसायन नहीं मिला. टीम ने सोचा कि ये सिर्फ़ कहानियां हैं और आगे रिसर्च नहीं हुई.
2015 में जाकर शोधकर्ताओं ने इस मशरूम को आधिकारिक तौर पर 'लानमाओआ एशियाटिका' नाम दिया, लेकिन इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं दी कि इन्हें खाने से हैलुसिनेशन हो जाता है.
इन पर रिसर्च कर रहे छात्र कॉलिन डोमनाउर का पहला लक्ष्य इस मशरूम की सही पहचान करना था. 2023 में वह पीक सीज़न में युन्नान गए. उन्होंने बड़े-बड़े मशरूम बाज़ार देखे और विक्रेताओं से पूछा कि कौन-सा मशरूम खाने से छोटे लोग दिखने लगते हैं? विक्रेताओं ने हंसते हुए ये ख़ास मशरूम दिखाए और कॉलिन ने लैब में जाकर उनके जीन की जांच की.
चूहों पर इसका टेस्ट हुआ. चूहों में भी ठीक उसी तरह के बदलाव देखने को मिले, जो इंसानों में देखने को मिले थे. पहले तो चूहे में बहुत उत्तेजना देखने को मिली और बाद में वह सुस्त हो गया और ज़्यादा नहीं हिला.
कॉलिन ने अफ़वाह सुनी थी कि फिलीपींस में भी ऐसे ही मशरूम होते हैं. ये साइज़ में छोटे और रंग में हल्के गुलाबी थे, जबकि चीन में पाए जाने वाले मशरूम बड़े और लाल होते हैं. लेकिन जेनेटिक टेस्ट से पता चला कि दोनों की प्रजाति एक ही है. दिसंबर 2025 में उनके सुपरवाइज़र पापुआ न्यू गिनी गए ताकि गॉर्डन और रोजर वाले मशरूम ढूंढ सकें, लेकिन ये नहीं मिले.
इस मशरूम को समझकर बन सकती हैं हैलुसिनेशन की दवा
खास बात यह है कि इस मशरूम से होने वाले हैलुसिनेशन का असर बहुत लंबा चलता है. आमतौर पर 12 से 24 घंटे और कभी-कभी हफ्ताभर तक अस्पताल में रहना पड़ता है. इतने लंबे असर और साइड इफ़ेक्ट्स (जैसे बेहोशी और चक्कर) की वजह से कॉलिन ने अभी तक खुद कच्चा मशरूम नहीं खाया.
इतने लंबे प्रभाव की वजह से शायद चीन, फिलीपींस और पापुआ न्यू गिनी में लोग इसे नशा करने के लिए खोजते हैं.
इस मशरूम का अध्ययन करने से वैज्ञानिक समझ सकते हैं कि दिमाग़ में ऐसे हैलुसिनेशन कहां से शुरू होता है. इससे शायद नए इलाज भी मिल सकें.
साल 1909 से 2021 तक 226 ऐसे केस रिपोर्ट हुए, जिनमें मरीज़ों ने मशरूम नहीं खाया फिर भी उन्हें छोटे लोग नज़र आ रहे थे. इन मरीज़ों में तिहाई लोग पूरी तरह ठीक नहीं हुए.
एथनो फार्माकोलॉजिस्ट डेनिस मैकेना कहते हैं, "अब हम समझ सकते हैं कि दिमाग़ में ये हैलुसिनेशन कहां से शुरू होते हैं. इससे नई दवाएं बनने की संभावना है. हालांकि, यह अभी देखना बाकी है कि क्या इसका चिकित्सकीय इलाज में इस्तेमाल हो सकता है या नहीं."
वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि दुनिया में अभी तक 5% से भी कम फ़ंगस प्रजातियों की पहचान हुई है. जब ईकोसिस्टम लगातार घट रहा है, तब भी नई खोज की काफ़ी गुंजाइश है.
गिउलियाना फ़ुरसी कहती हैं कि फ़ंगस में बहुत बड़ा रासायनिक और दवा का ख़ज़ाना है. खोजने को और भी बहुत कुछ बाकी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


