संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : संविधान की नजर में धर्म बदलने वाले दलितों और आदिवासियों में फर्क है..
सुनील कुमार ने लिखा है
25-Mar-2026 6:55 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : संविधान की नजर में धर्म बदलने वाले दलितों और आदिवासियों में फर्क है..

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर कल देश भर में एक खलबली मची। बहुत से लोगों ने जाने किस वजह से खुशियां मनाईं, कुछ राजनीतिक दलों के प्रवक्ता इसे जीत की तरह साबित करने पर उतारू हो गए, कुछ जातियों के संगठन भी खुशियां मनाने लगे। और फैसला महज इतना था कि जो दलित हिन्दू, बौद्ध, या सिक्ख धर्म से परे के किसी भी धर्म में जाते हैं, तो उनका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है। मतलब यह कि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, और अनुसूचित जाति को जुल्म से बचाने के लिए जो एक कानूनी संरक्षण बनाया गया है, उसका लाभ भी नहीं मिलेगा। यह 1950 में भारत में लागू हुए संविधान में ही लिखा हुआ है, और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक, या कि किसी छोटी अदालत तक भी जाने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में इतना लचीलापन है कि संविधान के कई बुनियादी तत्वों को भी लोग चुनौतियां दे सकते हैं, और अदालतें काफी दूर तक उन्हें सुनने-समझने की कोशिश भी करती हैं कि शायद संविधान के किसी पहलू की कोई नई व्याख्या निकल आए।

अब इस मामले को देखें, तो यह आंध्रप्रदेश का एक मामला था जिसमें ईसाई बन चुके एक दलित पादरी ने शिकायत की थी कि उन्हें 2020 में कुछ लोगों ने घर पर प्रार्थना के बीच जाति आधारित गालियां दी थीं। उन्होंने एसटी-एससी एक्ट के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। अभियुक्तों का कहना था कि वे सालों से ईसाई हैं, इसलिए वे एससी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज नहीं कर सकते। इस तर्क के आधार पर मामला आंध्र हाईकोर्ट तक पहुंचा, और पिछले बरस आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत करने वाला पादरी दस साल से ईसाई है, और चूंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं, इसलिए दलितों को जाति के संरक्षण से बाहर कर दिया गया है। यह शिकायत खारिज होने पर यह भूतपूर्व दलित पादरी सुप्रीम कोर्ट गया, और सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि सिर्फ हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध धर्मों में ही जाति व्यवस्था का ऐसा ढांचा है कि उसमें दलितों से भेदभाव की परंपरा है, इसलिए इन धर्मों में जो लोग दलित हैं, वे भी कोई दूसरा धर्म अपनाने पर इस लाभ से बाहर हो जाते हैं।

अदालत के सामने इस मामले में दलितों के इन तीन धर्मों से परे के किसी धर्म में जाने पर सिर्फ कानूनी संरक्षण का मुद्दा था, आरक्षण का मुद्दा तो पहले से ही पूरी तरह तय हो चुका है कि धर्मांतरित दलित इन तीन धर्मों के बाहर जाने पर आरक्षण के भी हकदार नहीं रह जाते। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिना कोई नई बात कहे 1950 की संवैधानिक व्यवस्था को ही दुहराया है, और इस पर जाने क्या-क्या सोचकर कौन-कौन से तबके खुशियां मनाने में जुट गए हैं। एक दिलचस्प दूसरा पहलू यह भी है कि ओबीसी तबकों के जो लोग ईसाई या मुस्लिम बनते हैं, उन्हें अभी तक ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है। जाहिर है कि पिछड़े वर्ग की व्यवस्था हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध से परे के कुछ धर्मों में भी लागू होती हो, और केन्द्र सरकार वहां भी ओबीसी आरक्षण का हकदार उन्हें मानती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 2004 से एक ऐसी याचिका खड़ी हुई है जिसमें कहा गया है कि इस्लाम और ईसाई धर्म में जाने वाले हिन्दू, दलितों को भी अनुसूचित जाति में गिना जाना चाहिए, और उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक केन्द्र सरकार ने इसका विरोध किया है, लेकिन एक कमेटी गठित की है, जो कि यह गौर कर रही है कि क्या मुसलमान और ईसाई हो चुके हिन्दू-दलितों को अनुसूचित जाति के दर्जे में रखा जाना चाहिए? अभी तक इस मामले में कुछ तय नहीं हुआ है, इसलिए 1950 से चली आ रही संवैधानिक व्यवस्था ही जारी है।

अब कुछ लोगों के मन में यह उत्सुकता हो सकती है कि दलितों और आदिवासियों के बीच आरक्षण-संरक्षण के मुद्दे पर संवैधानिक व्यवस्था में फर्क क्यों है। यह समझना जरूरी है कि आदिवासियों को किसी जाति की वजह से आरक्षण नहीं मिला, बल्कि उन्हें अपनी परंपराओं, और अपने संस्कारों का पालन करने की वजह से आरक्षण मिला, और किसी जुल्म-ज्यादती के खिलाफ एसटी-एससी एक्ट का संरक्षण भी मिला। इसलिए जब कोई आदिवासी किसी भी दूसरे धर्म में जाते हैं, तो वे अपने सामुदायिक संस्कारों, और परंपराओं का पालन उस नए धर्म में भी जारी रखते हैं। इसी आधार पर आदिवासियों को किसी भी धर्म में जाने पर आरक्षण और संरक्षण का अधिकार जारी रहता है। बहुत पुराने वक्त से यह मांग भी राजनीति में चल रही है कि आदिवासी अगर ईसाई बनते हैं, तो उनका आरक्षण का हक खत्म कर देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही दक्षिण में बस्तर के आदिवासी इलाके से लेकर उत्तर के सरगुजा के आदिवासी इलाके तक यह मांग कई बार उठती है कि ईसाई बने आदिवासियों की डी-लिस्टिंग की जाए, उनका आरक्षण खत्म किया जाए। यह आंदोलन नया नहीं है, यह मांग इंदिरा गांधी के वक्त से झारखंड के कुछ कांग्रेसी नेता भी उठाते आए हैं, लेकिन संविधान की व्याख्या जितनी भी बार की गई, यही पाया गया कि आदिवासी अगर किसी धर्म में जाते हैं, तो भी वे आदिवासी ही बने रहते हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि देश के आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा अपने को आदिवासी धर्म का ही मानता है, और आदिवासी धर्म के हक पाने के लिए वह देश में सरना-कोड लागू करने की मांग करते आया है। अब सरना-कोड के बहुत अधिक खुलासे यहां देना मुमकिन नहीं है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आदिवासी आज भी यह मांग कर रहे हैं कि जनगणना में आदिवासी धर्म का कॉलम अलग से होना चाहिए। आदिवासियों में से बहुत से लोग अपने आपको किसी भी दूसरे धर्म से अलग का मानते हैं, और वे अपने आपको हिन्दू भी नहीं मानते। दूसरी तरफ हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संगठन, और राजनीतिक दल आदिवासियों को हिन्दू मानकर उन्हें जनगणना में अलग से आदिवासी दर्ज करने के खिलाफ रहते हैं। यह भी एक बड़ी दिलचस्प विसंगति है कि हिन्दू समाज में जिन दलितों की जगह सबसे नीचे रहते आई है, वे दलित तो बड़ी संख्या में बौद्ध बने, और मुस्लिम भी बने। दूसरी तरफ हिन्दू समाज के ही कहे जाने वाले आदिवासी दलितों की तरह छुआछूत और प्रताडऩा के पात्र नहीं थे, और वे काफी हद तक हिन्दू रीति-रिवाज को भी बिना किसी प्रतिरोध के मानने लगे, तब तक, जब तक कि जनगणना में वे अपने को आदिवासी दर्ज करवाना नहीं चाहते। अब अगर जनगणना पत्र में आदिवासी का कॉलम ही नहीं होगा, तो इन आदिवासियों के सामने अपनी पहचान का एक बड़ा संकट रहेगा, पता नहीं उससे राजनीतिक मुद्दा किस तरह बनेगा।

फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बारे में यही कहने की जरूरत है कि यह मामला ही गैरजरूरी और बेबुनियाद था, और सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ यही कहना पड़ा कि 1950 से जो संवैधानिक व्यवस्था चली आ रही है, उसके तहत ईसाई बनने वाले दलितों को कोई आरक्षण-संरक्षण जारी नहीं रह जाता।

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