संपादकीय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के सिर्फ 14 महीनों में इतनी बार अपनी नीतियां, वादे और फैसले पलट चुके हैं कि अब यह उनकी कार्यशैली का स्थायी चरित्र बन गया है। कुछ लोग इसे लचीलेपन और कल्पनाशील सौदेबाजी कहकर बचाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने कम समय में इतने बड़े-बड़े फैसले उलट-पलट करने वाला कोई निर्वाचित राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में पहले नहीं हुआ। ट्रम्प अब ‘यू-टर्न राष्ट्रपति’ बन चुके हैं। हर हफ्ते नया पलटाव, नई अनिश्चितता, नया विश्वासघात।
ट्रम्प के यू-टर्न की सूची लंबी और चौंकाने वाली है। ईरान पर अधिकतम दबाव का दावा करते हुए उन्होंने ईरानी तेल पर छूट दे दी। रूस पर सख्ती का ऐलान कर रूसी तेल खरीदने का रास्ता खोल दिया। कनाडा-मैक्सिको पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, फिर टाल दिया। यूक्रेन युद्ध 24 घंटे में खत्म करने का दावा किया, फिर मदद जारी रखी। ग्रीनलैंड खरीदने का ड्रामा रचा, फिर चुपचाप पीछे हट गए। टिकटॉक बैन का वादा किया, अब एक अमरीकी कंपनी को जोडक़र चीनी मालिक के साथ समझौता कर रहे हैं। क्रिप्टो पर दुश्मनी का रवैया रखा, अब रणनीतिक स्टॉक बनाने की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला त्याग है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ट्रम्प के इन यू-टर्न से नैटो देशों, यूरोप और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों का भरोसा पूरी तरह टूट गया है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि ‘ट्रम्प की कोई नीति स्थायी नहीं है। आज जो वादा करते हैं, कल पलट देते हैं।’ नतीजा यह कि नैटो देश अब अपनी रक्षा पर खुद ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यूरोप में अमरीका-प्रथम को अब महज-अमरीका के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प ने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे अमरीका की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इसके अलावा, ट्रम्प की कमजोर नब्जों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एपस्टीन से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिशें और इजराइली मोसाद के हाथ में ट्रम्प की कुछ कमजोरियां होने की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। कई रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि नेतन्याहू इन कमजोरियों का इस्तेमाल करके ट्रम्प से वह सब करवा रहे हैं, जो आधी सदी में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं करवा सके। साथ ही ट्रम्प परिवार के कारोबारी हित भी विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी, रेयर मिनरल्स और अन्य क्षेत्रों में ट्रम्प परिवार के हितों की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। कई देशों से जुड़े इन व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभों के कारण अमेरिकी विदेश नीति व्यक्तिगत स्वार्थ की दिशा में मुड़ती दिख रही है।
ट्रम्प की इस अस्थिरता और व्यक्तिगत हितों की नीति ने पूरी दुनिया की चैरिटी, पर्यावरण, कारोबार और रोजगार को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, उतना तो हिटलर भी नहीं कर पाया था। पर्यावरण समझौतों से पीछे हटना, ग्लोबल वार्मिंग पर चुप्पी, कारोबारी युद्ध, टैरिफ की अनिश्चितता और रोजगार के अवसरों का नुकसान, सब कुछ एक साथ हुआ है।
सबसे बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला खतरा यह है कि ट्रम्प का यह मिजाज अगले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नवसामान्य बन सकता है। एक बार जब एक निर्वाचित राष्ट्रपति दिखा देता है कि बड़े-बड़े वादे और नीतियाँ इतनी आसानी से पलटी जा सकती हैं, तो भविष्य के नेता भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, सहयोगी देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अलग गठबंधन बनाने लगेंगे और अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। यह छोटा खतरा नहीं है। यह लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
ट्रम्प का हर हफ्ते यू-टर्न अब कोई छोटी बात नहीं रह गया है। यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को कमजोर कर रहा है, सहयोगियों का भरोसा तोड़ रहा है और दुनिया भर में अनिश्चितता फैला रहा है। कुछ इसे लचीलापन कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह अस्थिरता है, जिसकी कीमत न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया चुका रही है। और सबसे अधिक खुद अमरीका चुका रहा है जिसके भीतर यह पूरी तरह, और बुरी तरह स्थापित हो चुका है कि वहां के संविधान में कुछ बुनियादी दरारें हैं जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति को एक पिशाच-तानाशाह बन जाने का पूरा मौका हासिल हुआ है। इस ट्रंप ने पूरी दुनिया के सामने घटियापन की नई मिसालें कायम की हैं, और इसकी काट किसी भी लोकतांत्रिक देश में आसानी से नहीं निकल पाएगी, इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे घटिया राष्ट्रपति की तरह दर्ज हो जाना तय है।
अभी तक जो इजराइल अमरीका का पिट्ठू बना चल रहा था, आज उसी इजराइल का पालतू बनकर ट्रम्प उसके हुक्म पर ईरान पर एक अभूतपूर्व हमला कर चुका है, और दुनिया में जंग खत्म करवाने के नाम पर वह सत्ता पर आया था, आज वह दुनिया का सबसे बड़ा जंगखोर बन गया है। इस जंग के साथ-साथ उसने मध्य-पूर्व के देशों में अपने सारे पुराने साथियों को एक ऐसी बुरी मुसीबत में डाला है कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प और अमरीका की विश्वसनीयता इन सारे देशों के बीच खत्म हो चुकी है क्योंकि अमरीकी फौजी अड्डों के रहते हुए उन्हें कोई हिफाजत तो नहीं मिली, ईरान के गैरजरूरी हमले जरूर मिल रहे हैं। ईरान की इस पूरी तरह नाजायज जंग की वजह से आज पूरी दुनिया जिस बुरी तरह तेल और गैस की कमी का शिकार हो गई है, वह ट्रम्प को अपने घरेलू मोर्चे पर मध्यावधि चुनावों के ठीक पहले भी समझ पड़ रहा है, इसलिए वह कभी रूस पर से तेल बिक्री की रोक हटा रहा है, कभी ईरान पर से, लेकिन पारे की तरह अस्थिर उसके दिमाग और फैसलों की वजह से पूरी दुनिया एक आर्थिक अस्थिरता और अनिश्चितता में घिर गई है, और पूरी दुनिया अकेले ट्रम्प को गालियां दे रही है।
हम ट्रंप के चुनाव अभियान के वक्त से इसके अस्थिर चित्त को लेकर यह लिखते आए थे कि यह राष्ट्रपति बनने के लायक नहीं है, फिर जब अमरीकी वोटरों ने इसे चुन ही लिया, तो फिर हमने यह लिखना शुरू किया कि इसके दिमागी दिवालियापन को देखते हुए अमरीका की संसद को चाहिए कि इसे महाभियोग लगाकर हटाए। चूंकि संसद में बहुमत ट्रंप की पार्टी का है, इसलिए यह काम आसान नहीं होगा, लेकिन अमरीकी इतिहास इस बात को अच्छी तरह दर्ज करेगा कि ट्रंप के मंत्रिमंडल ने ऐसी दिमागी हालत वाले राष्ट्रपति को भी हटाने के बारे में कुछ नहीं किया। वहां के संविधान में यह प्रावधान है कि अगर राष्ट्रपति की दिमागी हालत दफ्तर संभालने लायक नहीं रहती, तो उपराष्ट्रपति के साथ बाकी मंत्री मिलकर राष्ट्रपति को हटा सकते हैं, और उपराष्ट्रपति को दफ्तर दे सकते हैं। हालांकि हमें इस बात में कुछ अधिक भला नहीं दिख रहा है क्योंकि वहां का उपराष्ट्रपति भी ट्रंप की ही टक्कर का नफरती, युद्धोन्मादी, और बद्दिमाग है। अमरीका ने दुनियाभर के बेकसूर देशों, वियतनाम से लेकर फिलिस्तीन और ईरान तक बमबारी में जितने लोगों को मारा है, उन सबकी बद्दुआ का असर है कि अमरीका को आज ऐसी सरकार मिली है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


