आजकल

Previous12Next
17-Oct-2021 5:12 PM (17)

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अभी एक ऐसी अफ्रीकी अमेरिकी महिला का सम्मान किया है जो 1951 में 31 बरस की उम्र में गुजर चुकी थी। उसे कैंसर था, और डॉक्टरों ने उसकी या उसके परिवार की इजाजत के बिना उसके कैंसर के कुछ सेल निकाल लिए थे। आज से करीब पौन सदी पहले लोगों के अधिकारों की इतनी खुलासे से बात नहीं होती थी, और डॉक्टरों ने उसके कैंसरग्रस्त सेल जब निकाल लिए, तो यह उस वक्त कोई मुद्दा नहीं बना। लेकिन अब जाकर हेनरिटा लैक्स नाम की इस महिला की स्मृति का सम्मान क्यों किया गया इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है।

इन कैंसरग्रस्त सेल को इस महिला के बदन के बाहर प्रयोगशाला में बढ़ाया गया और उन्हें कई गुना किया गया। बाद में दुनिया भर की अलग-अलग प्रयोगशालाओं ने, दवा कंपनियों ने इन सेल्स का इस्तेमाल पोलियो का टीका विकसित करने में किया, जींस का नक्शा बनाने में किया, और कृत्रिम गर्भाधान तकनीक में किया। इस महिला के कैंसरग्रस्त सेल का इतना व्यापक और महत्वपूर्ण इस्तेमाल हुआ कि आज इसे ‘आधुनिक चिकित्सा की मां’ नाम दिया गया।

इस महिला के कैंसरग्रस्त सेल का इस्तेमाल एचआईवी-एड्स की दवाइयां विकसित करने में भी किया गया और अभी कोरोना का इलाज ढूंढने में भी इनका इस्तेमाल हो रहा है। दरअसल इस महिला के सेल ऐसे पहले मानवीय सेल थे जिन्हें शरीर के बाहर क्लोन करके बढ़ाया गया। इसके पहले जितने कैंसर मरीजों के कैंसर सेल अस्पतालों में लिए जाते थे ताकि उन पर कोई शोध हो सके, तो वे तमाम नमूने 24 घंटे के भीतर दम तोड़ देते थे। लेकिन हेनरिटा लैक्स के सेल्स करिश्माई तरीके से जिंदा रहे और हर 24 घंटे में वे 2 गुना होते चले गए, इस तरह वे मानव शरीर के बाहर बढऩे वाले पहले कैंसर सेल थे, और इसलिए रिसर्च में उसका भारी इस्तेमाल हो सका। डब्ल्यूएचओ का हिसाब-किताब बताता है की हेनरिटा लैक्स के सेल अब तक 75000 से ज्यादा स्टडी में इस्तेमाल किए जा चुके हैं।

अभी इस महिला का सम्मान करते हुए स्विट्जरलैंड में डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल ने कहा कि उसके बदन के सेल का खूब दोहन हुआ, और वह अश्वेत या काली महिलाओं में से एक थी जिनके शरीर का विज्ञान ने बहुत बेजा इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि इस महिला ने अपने आपको चिकित्सा विज्ञान के हवाले किया था ताकि वह इलाज पा सके, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था ने उसके बदन के एक हिस्से को उसकी जानकारी और उसकी इजाजत के बिना लेकर उसका तरह-तरह से इस्तेमाल किया। चिकित्सा विज्ञान की खबरें बताती हैं कि इस महिला के नाम पर रखे गए इन कैंसर सेल, ‘हेलो’, का उपयोग उस सर्वाइकल कैंसर के इलाज में भी हुआ, जिस सर्वाइकल कैंसर की शिकार वह महिला थी।

अभी जब इस महिला के वंशजों का सम्मान हुआ, उसके 87 बरस के बेटे सहित कुनबे के कई लोग मौजूद थे, तो दुनिया के कुछ लोगों ने यह भी कहा कि उसके परिवार को इसका मुआवजा मिलना चाहिए क्योंकि दवा कंपनियों ने उसके कैंसर सेल का इस्तेमाल करके टीके या दवाइयां बनाए, उनका खूब बाजारू इस्तेमाल हुआ। कुछ दूसरे लोगों का कहना था कि ऐसे बनाई गई सारी दवाइयों और सारे टीकों को बिना किसी मुनाफे के मानव जाति के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

अभी कुछ हफ्ते पहले इस परिवार ने ऐसी एक कंपनी के खिलाफ एक मुकदमा किया है जिसने हेनरिटा लैक्स के कैंसर ग्रस्त सेल से दवा बनाकर अरबों रुपए कमाए हैं। परिवार का कहना है कि कंपनी इसे अपना बौद्धिक पूंजी अधिकार करार दे रही है। परिवार के वकील ने अदालत में यह मुद्दा उठाया कि किसी के शरीर का कोई हिस्सा कैसे उसकी इजाजत के बिना किसी दवा कंपनी की संपत्ति हो सकता है और इस महिला के सेल से विकसित की गई दवाइयों की कमाई का पूरा हिस्सा इस परिवार को दिया जाना चाहिए।

पश्चिमी दुनिया में चल रहे इस सिलसिले को देखें, तो लगता है कि हिंदुस्तान जैसे देश ऐसी भाषा से किस तरह पूरी तरह छूते हैं। यहां पर महिलाओं को जानवरों की तरह एक हॉल में लिटाकर उनकी नसबंदी कर दी जाती है, उनमें से कितनी जिंदा बचती हैं, और कितनी नहीं, इसकी कोई फिक्र नहीं होती। यहां इलाज के बीमे की रकम हासिल करने के लिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में गांव के गांव की जवान सारी महिलाओं को लाकर उनका गर्भाशय निकाल दिया जाता है, ताकि अस्पताल का बिल बन सके, और बीमा कंपनी से उसे वसूल किया जा सके। यहां कोई पूछने वाले भी नहीं रहते कि उस महिला को ऐसे ऑपरेशन की जरूरत थी या नहीं। किसी के बदन की कोई कीमत हो सकती है, उस पर उसका कोई हक हो सकता है, ऐसे तमाम मुद्दों से हिंदुस्तान मोटे तौर पर बेफिक्र रहता है। यहां बुनियादी इलाज के लिए आज भी सरकारी अस्पताल जाने वाले लोग उसे डॉक्टर और नर्सों का एक एहसान मानते हैं, फिर चाहे वह सरकारी अस्पताल ही क्यों ना हो। लोगों के नागरिक अधिकार इस कदर कुचले हुए हैं कि उनका हौसला ही नहीं होता कि वे कहीं अपने हक की बात गिना सकें। इसलिए हिंदुस्तान में किसी के शरीर के सेल अगर लिए भी जाते होंगे, तो शायद ही उसे इस बारे में कुछ बताया जाता होगा। और यह सिलसिला पश्चिम के पौन सदी पहले के इस सिलसिले जैसा आज भी यहां चल रहा होगा।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


03-Oct-2021 5:18 PM (99)

एप्पल कंपनी के नए मोबाइल फोन के बाजार में आने के पहले ही कंपनी की दी गई जानकारी कुछ घंटे के भीतर ही लोगों की जुबान पर आ जाती है कि अगला फोन किस साइज का आ रहा है, उसमें कौन सी खूबियां रहेंगी, और दाम कितने डॉलर रहेगा, यह हिंदुस्तान में वह कितने का पड़ेगा। शाहरुख खान का बेटा किसी नशे के मामले में पकड़ाता है तो उस बेटे के बारे में लोगों को खासी जानकारी रहती है। लेकिन हिंदुस्तान के एक सबसे बड़े अखबार का खुद का बनाया हुआ एक पॉडकास्ट सुनते हुए अभी समझ आया कि उस अखबार के बड़े-बड़े दिग्गज राजनीतिक रिपोर्टर माइक्रोफोन पर बात करते हुए भी पंजाब के सिलसिले में दलितों को अलग गिन रहे हैं, और हिंदुओं को अलग। एक दलित के मुख्यमंत्री बनने के मामले को एक हिंदू मुख्यमंत्री से अलग गिनकर चल रहे हैं। यह मामला कुछ वैसा ही है कि कश्मीर के बारे में चर्चा करते हुए लोग कश्मीर और इंडिया जैसी बात करते हैं। एक अमरीकी रेडियो स्टेशन के लिए कुछ बरस पहले मैंने देश की एक बड़ी अखबारनवीस का ऑडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था जो कि कश्मीर के मामलों की बड़ी जानकार भी थीं, और उन्होंने बातचीत में एक से अधिक बार कश्मीर और इंडिया जैसी बातें कहीं, जाहिर है कि मेरा अगला और आखरी सवाल यही था कि क्या वे कश्मीर को इंडिया से अलग मानकर चल रही हैं ? और तब जाकर उन्हें अपनी चूक समझ में आई कि वे क्या गलती कर रही थीं।

अभी जब पंजाब में मुख्यमंत्री के बदलने की बात आई और एक दलित विधायक के मुख्यमंत्री बनने की मुनादी हुई तो बहुत से खासे पढ़े लिखे लोगों को हैरानी के साथ यह चर्चा करते हुए सुना कि क्या सिखों में भी कोई जाति व्यवस्था है? लोग यही मानकर चल रहे थे कि जिस तरह गुरुद्वारे की पंगत में बिना जाति धर्म पूछे सबको एक साथ खाना खिलाया जाता है तो उससे शायद सिखों के भीतर कोई जाति व्यवस्था नहीं होगी। सच तो यह है कि भारत के किसी भी दूसरे प्रदेश के मुकाबले पंजाब में दलितों की आबादी का प्रतिशत सबसे अधिक है, वहां 32 फीसदी दलित हैं। लेकिन लोगों की याददाश्त कुछ कमजोर रहती है और मीडिया के बहुत से लोगों ने टीवी चैनलों पर यह कहा, और अखबार की खबरों में भी लिखा, कि यह पंजाब का पहला गैर-सिक्ख मुख्यमंत्री बनने जा रहा है जबकि इसके पहले पंजाब में एक से अधिक गैर-सिक्ख मुख्यमंत्री रह चुके हैं। लोगों की जानकारी असल मुद्दों को लेकर धीरे-धीरे कम इसलिए हो रही है कि फिल्म इंडस्ट्री के एक अभिनेता की खुदकुशी को राजनीतिक बनाने की कोशिशों में वे डूब जाते हैं। खेल सत्तारूढ़ ताकतें करती हैं और लोग स्टेडियम में बैठे दर्शकों की तरह मैच देखने जाते हैं, लेकिन चीयरलीडर्स की तरह नाचने लगते हैं। अफवाहों और झूठ-फरेब के इस बाजार में सच की इज्जत इतनी कम रह गई है कि लोग खबरों में सच पाने की उम्मीद करते, न कोशिश करते।

अभी एक वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है जिसमें किसी महानगर में कॉलेज के छात्र-छात्राओं के बीच एक कैमरा और माइक्रोफोन लिए हुए लोग उनसे हिंदुस्तान के बारे में कई किस्म के सवाल करते हैं। उन्हें हिंदुस्तान के पहले प्रधानमंत्री का नाम नहीं मालूम, पहले राष्ट्रपति का नाम नहीं मालूम, उन्हें किसी अंतरिक्ष यात्री का नाम नहीं मालूम, उन्हें छत्तीसगढ़ के भीतर झारखंड है या झारखंड के भीतर छत्तीसगढ़ है यह भी नहीं मालूम, उन्हें उत्तराखंड, हिमाचल, और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग होने की खबर नहीं है, उन्हें किसी बात की खबर नहीं है, और वे खासे फैशनेबल कपड़े पहने हुए, संपन्न परिवारों के, कॉलेज में पढ़ रहे या पढ़ चुके लोग दिख रहे हैं। जो सामान्य ज्ञान के दसियों सवालों में नाकामयाब हो कर कैमरे से ही यह सवाल करते हैं कि क्या यह उन्हें अपमानित करने के लिए यह किया जा रहा है?

हिंदुस्तान के असल मुद्दों की जानकारी में लोगों की दिलचस्पी बहुत ही कम है। सच तो यह है कि लोगों की अपने आसपास की ऐसी जानकारी में दिलचस्पी नहीं है जिससे उन्हें कोई मजा नहीं मिलता। देश के बड़े-बड़े अखबारों के छत्तीसगढ़ में रहने वाले रिपोर्टरों से कई बार यह कहा जाता है कि वे बहुत दुख-तकलीफ की या नक्सल हिंसा की खबरें बहुत अधिक ना भेजें क्योंकि उनमें किसी की अधिक दिलचस्पी नहीं है। जब मरने वाले गिनती में बहुत अधिक होते हैं, तब तो यह खबर बनती है, लेकिन छोटी-मोटी नक्सल हिंसा की खबरों में किसी अखबार की दिलचस्पी नहीं रहती, छत्तीसगढ़ के अखबारों की भी सीमित दिलचस्पी रहती है। इसके पीछे की वजह यह है कि विज्ञापन देने वाले लोग अखबार या टीवी चैनलों को दुख-दर्द, तकलीफ, और लाशों से भरा हुआ देखना नहीं चाहते। उसकी जगह एक किसी जहाज पर चल रही पार्टी में थोड़ा-बहुत नशा कर रहे लोगों के पकडाने पर शाहरुख खान के बेटे की वीडियो के साथ कई-कई घंटे उसी खबर को दिखाने में टीवी चैनलों की दिलचस्पी अधिक है, और हो सकता है कि अखबार भी वैसे ही निकलें।

फिल्मी दुनिया, सेक्स, क्राइम, और क्रिकेट से जुड़ी हुई खबरें लोगों को गुदगुदाती हैं, और उन्हें कुछ भी सोचने पर मजबूर नहीं करती। यह कुछ वैसा ही होता है कि सोफे पर बैठ कर चिप्स खाते हुए टीवी पर क्रिकेट देखना जितना आरामदेह रहता है, कसरत करना या दौडऩा, साइकिल चलाना तो उतना आरामदेह हो नहीं सकता। इसलिए लोग अपने दिमाग पर अधिक जोर डालना नहीं चाहते, अपने भीतर के सामाजिक सरोकारों को जगाने का खतरा भी उठाना नहीं चाहते। सामाजिक सरोकार अगर जाग गए तो देश-दुनिया के असल मुद्दे उनके दिल-दिमाग को परेशान करने लगेंगे। इसलिए ऐसी खबरों को ही ना पढ़ा जाए कि कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं, कितने बच्चे पिछली शाम के खाने के बाद अगला खाना अगली दोपहर स्कूल में ही पाते हैं। ऐसी खबरों को पढऩे के बाद लोगों के अपने गले से कुछ उतरना मुश्किल होने लगेगा इसलिए लोग सामाजिक सरोकार की तमाम बातों से दूर रहते हैं।

यही वजह है कि दलितों के मुद्दों की जानकारी लोगों को कम है. कश्मीर में एक सैलानी जितनी दिलचस्पी तो है, लेकिन कश्मीर के लोगों की बाकी दिक्कतों से लोग अपने को दूर और अछूता रखते हैं. लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों की दिक्कतों से अपने को दूर रखते हैं, और दिल्ली के बाजारों में उत्तर-पूर्व के लोगों को देखकर उन्हें चिंकी बुलाकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। लोगों को उन लोगों को देख कर भी आत्मग्लानि होती है जो कि बहुत सादगी से जीते हैं, इसलिए ममता बनर्जी की साधारण रबड़ चप्पल और उसकी साधारण साड़ी को लोग मखौल का सामान मानते हैं, और जो नेता दिन में 4 बार, 6 बार महंगे कपड़े बदलते हैं, उनकी वे इज्जत करते हैं। लोग नेताओं से यह पूछना नहीं चाहते कि उनके पास इतना पैसा कहां से आया, और लोग देश के गरीबों की तकलीफ को जानना नहीं चाहते कि बिना पैसों के या इतने कम पैसों के साथ वे जिंदगी कैसे काट सकते हैं।

लोगों का सामाजिक सरोकार से दूर रहना, लोगों की तकलीफों को अनदेखा करना, जमीन की कड़वी हकीकत को नहीं देखना, इन सबसे लोग सुखी रहते हैं, और यही वजह है ये  मुद्दे धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं फीके पड़ते जा रहे हैं। इसे एक और बात से जोडक़र देखा जा सकता है कि किस तरह हिंदुस्तान की संसद में अरबपति बढ़ते चले जा रहे हैं, और हिंदुस्तान की विधानसभाओं में भी करोड़पतियों का अनुपात लगातार बढ़ते चल रहा है। इतनी संपन्नता लोगों को विपन्नता के दर्शन ही नहीं करने देती और बहुत गरीबी से तकरीबन अनजान लोग जब संसद या विधानसभा में बैठकर चर्चा करते हैं, तो जाहिर है कि वह चर्चा गरीबों पर तो टिक नहीं सकती, वहां तक पहुंच भी नहीं सकती। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


26-Sep-2021 2:51 PM (90)

हिमाचल के शिमला की एक खबर है कि वहां एक आदमी अपनी बीवी को व्हाट्सएप पर चैटिंग से रोकता था, और इस बात को लेकर उसकी बीवी खासी खफा थी, झगड़ा बढ़ा तो पत्नी ने डंडा लेकर पति की जमकर पिटाई की और उसके तीन दांत भी तोड़ दिए। पति ने जाकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई और पत्नी के खिलाफ केस दर्ज हो गया है। यह मामला पिटाई और दांत तोडऩे तक पहुंचने की वजह से खबरों में आ गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर जीवनसाथी की सक्रियता को लेकर शादीशुदा जिंदगी के तनाव का यह अकेला मामला नहीं है। आज मोबाइल फोन और कंप्यूटर की मेहरबानी से सोशल मीडिया पर लोग कई किस्म से दुनिया भर के दूसरे लोगों से जुड़ रहे हैं, और उसका नतीजा कई किस्म के जुर्म में भी तब्दील हो रहा है, और कई किस्म के पारिवारिक या सामाजिक तनाव में भी।

हिंदुस्तान में हर दिन किसी न किसी प्रदेश से खबर आती है कि वहां किसी हिंदुस्तानी ने विदेशी बनकर, या किसी एक धर्म के व्यक्ति ने दूसरे धर्म का प्रोफाइल बनाकर किस तरह किसी शादीशुदा महिला को, या किसी महिला ने किसी बुजुर्ग आदमी को फंसाया, शादी का, सेक्स का, प्यार का, या साथ रहने का झांसा दिया, और बात आगे बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ी कि लोग घर के गहने चोरी करके देने लगे, अपनी जमीन-जायदाद बेचकर मांग पूरी करने लगे, और बहुत से मामलों में अपने नाजुक पलों की तस्वीरें या वीडियो एक दूसरे को भेजने लगे, जिन्हें लेकर आगे ब्लैकमलिंग का सिलसिला शुरू हो गया।

दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के मुकाबले हिंदुस्तान में यह नौबत कुछ अधिक इसलिए आ रही है कि यहां का समाज सदियों से औरत और मर्द को दूर रखते आया है, लडक़े लड़कियों को मिलने से रोकते आया है, और अब जब सोशल मीडिया ने या कंप्यूटर और मोबाइल फोन की मैसेंजर सर्विस ने दुनिया भर के लोगों को एक दूसरे से जोड़ दिया है, तो लोग अपने पारिवारिक संबंधों से परे भी एक खुशी ढूंढने लगे हैं, और बहुत से मामलों में पाने भी लगे हैं। यह मान लेना गलत होगा कि सोशल मीडिया और मैसेंजर से बने हुए ऐसे नए रास्तों ने लोगों का महज नुकसान किया है। आज बहुत से लोग ऐसे बाहरी रिश्तों की वजह से एक आत्मसंतुष्टि में जीने लगे हैं, उन्हें यह बाहरी चाह खुश रखने लगी है, निराशा से दूर कामयाबी की तरफ बढ़ा भी रही है। अब फर्क केवल यह पड़ रहा है कि शादीशुदा जिंदगी में भागीदारों की एक दूसरे से जो उम्मीदें रहती हैं, और वफादारी की जो परंपरागत सोच है, उसे परे जाकर ऐसे ऑनलाइन संबंध विकसित हो जाते हैं जो कि शादीशुदा जिंदगी की घुटन से तो लोगों को उबार लेते हैं, लेकिन उनके लिए कुछ दूसरे नए खतरे भी खड़े कर देते हैं।

दुनिया के अधिक विकसित देशों में औरत-मर्द का पहले से बाहर साथ-साथ काम करना चले आ रहा था, वहां पर यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है, लेकिन भारत जैसा समाज जिसमें महिलाओं का एक बड़ा तबका घर पर ही रह जाता है, और देश के कुल कामकाजी लोगों में महिलाएं सिर्फ 15 फीसदी हैं. ऐसे में हिंदुस्तान में अधिकतर महिलाएं घर पर रहती हैं जिन्हें अभी कुछ बरस पहले तक बाहर किसी से संपर्क का जरिया कम ही रहता था, लेकिन अब मोबाइल फोन, दुपहिया गाडिय़ों, थोड़ी बहुत बाहर आवाजाही के चलते हुए लोगों को दूसरों से मिलने का मौका भी मिलता है, और सोशल मीडिया की वजह से लोगों की दोस्ती भी होती है। चूँकि हिंदुस्तान में संचार तकनीक के ये सामान और सोशल मीडिया इन दोनों का इतिहास बहुत लंबा नहीं है, और कम से कम विकसित देशों के मुकाबले तो बहुत ही नया है, इसलिए यहां पर लोग अभी सोशल मीडिया को जरूरत से अधिक महत्व भी देते हैं, और वहां पर मिले हुए नए लोगों से बड़ी तेजी से करीब भी आ जाते हैं।

शिमला की है ताजा घटना एक नए किस्म का सामाजिक माहौल भी बताती है। अगर पति की शिकायत पूरी तरह सच है, और जैसा कि पुलिस ने तुरंत जुर्म कायम किया है, तो उसकी पत्नी एक नए किस्म का अधिकार भी इस्तेमाल कर रही है। हिंदुस्तान में महिलाएं आमतौर पर पिटते आई हैं, और इस मामले में इस महिला ने पति को पीटकर उसके दांत तोड़ दिए हैं। तो यह समानता का माहौल एक नई बात है, और सोशल मीडिया या मैसेंजर पर चैटिंग, फोटो या वीडियो का लेना-देना एक नए सामाजिक तनाव की बात है।

मनोवैज्ञानिक हिसाब से देखें तो यह पूरा सिलसिला इसलिए परिवार के आपसी संबंधों के मुकाबले अधिक महत्व पा जाता है कि परिवार के ढांचे में आने के बाद लोगों के आपसी संबंध परिवार की दिक्कतों से लद जाते हैं, और जब तक लोग महज सोशल मीडिया या मैसेंजर पर एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं, वे अपना सबसे अच्छा रुख सामने रखते हैं जो कि कई बार झूठा भी रहता है, कई बार बनावटी या दिखावटी रहता है। लेकिन फिर भी इंसान का मन है जो उसे सुहाने वाली चीजों को सुनहला सच भी मान लेता है। इसलिए लोग सोशल मीडिया पर बने हुए संबंधों में एक दूसरे को मुखौटों के पीछे से मिलते हैं, और वहां दोनों अपनी अपनी पारिवारिक दिक्कतों से लदे हुए नहीं रहते हैं। यही वजह रहती है कि सोशल मीडिया के रिश्ते बहुत से लोगों को असल जिंदगी के लदे हुए, बोझ बने हुए रिश्तों के मुकाबले अधिक आकर्षक लगते हैं, और अपने-आपको दिया जा रहा है यह धोखा, दूसरे लोगों से धोखा खाने का खतरा भी दे जाता है।

इस मुद्दे पर हमारे पास तुरंत ही कोई राय नहीं है क्योंकि जीवन शैली धीरे-धीरे बदलती है, और धीरे-धीरे बदली जा सकती है। लेकिन जब टेक्नोलॉजी की आंधी आकर जिंदगी की भावनाओं को तहस-नहस कर देती है, तब लोग उस आंधी की रफ्तार से संभल नहीं पाते हैं। लोग शुरुआती वर्षों में एक ऑनलाइन खुशी के दौर में डूब जाते हैं, और अपने परिवार के लोगों के मुकाबले उन्हें बाहर के लोगों का मुखौटा कभी-कभी बेहतर भी लगने लगता है। ऐसे में उन परिवारों में असर अधिक होता है जो पहले से तनाव झेल रहे हैं, जहां जिंदगी पहले से बोझ बनी हुई है। वहां सोशल मीडिया या मैसेंजर पर मिलने वाली राहत एक मरहम की तरह काम करती है, और लोगों को जिंदा रहने का या जीने का एक नया मकसद मिल जाता है।

बहुत से लोग ऐसे भी रहते हैं जिनको सोशल मीडिया पर मिलने वाले महत्व की वजह से उन्हें एक नया आत्मगौरव हासिल होता है जो कि घर में चली आ रही जिंदगी में मिलना बंद हो चुका रहता है। घर के लोगों के लिए घर की मुर्गी दाल बराबर रहती है, और सोशल मीडिया के मुखौटे के पीछे से एक-दूसरे से मिलने वाले लोगों को दाल भी मुर्गी जैसी लगती है, क्योंकि वहां लोग अपना सबसे अच्छा सजाया हुआ चेहरा सामने रखते हैं, और किसी तरह का बोझ है एक दूसरे के लिए नहीं रहता है। असल जिंदगी में तो होता है यह है कि जीवन साथी एक साथ, एक कमरे में रहते हुए, एक-दूसरे के बदन से निकलने वाली तमाम किस्म की आवाज, और तमाम किस्म की गंध को झेलने के लिए मजबूर रहते हैं। दूसरी तरफ ऑनलाइन बने हुए संबंधों में लोग एक-दूसरे को अपना मेहनत से गढ़ा हुआ एक ऐसा चेहरा दिखाते हैं जिसमें सब कुछ अच्छा ही अच्छा रहता है, न वहां डकार की आवाज आती है, और न पसीने की बदबू।

इस मुद्दे पर लिखना अंतहीन हो सकता है, लेकिन आज लिखने का मकसद यह है कि लोगों को ऑनलाइन या सोशल मीडिया के संबंध को एक हिफाजत की दूरी के साथ ही बनाना चाहिए, ताकि वे तबाही का सामान ना बन जाए। लोगों को ऑनलाइन होने वाले धोखे की खबरों को पढऩा चाहिए, और किस तरह लोग ऑनलाइन रिश्तों के बाद ब्लैकमेलिंग के शिकार होते हैं, दूसरे किस्म के जुर्म के शिकार होते हैं इस बारे में भी पढऩा चाहिए। जुर्म की कहानियां हमेशा ही जुर्म के लिए उकसाने वाली नहीं होती हैं, कई बार वे लोगों को सावधानी सिखाने वाली भी होती हैं। इसलिए लोगों को ऐसे मामलों की चर्चा अपने आसपास के दायरे में जरूर करनी चाहिए, ताकि उनके करीबी लोगों में से कोई अगर ऐसे किसी जुर्म का शिकार होने के करीब पहुंचे हुए हों, तो कम से कम वे तो बच जाएं।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


19-Sep-2021 2:22 PM (62)

भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने कर्नाटक के एक जज को श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम में देश की न्याय व्यवस्था को लेकर फिक्र जाहिर की और कहा कि यह अंग्रेजों के दौर से चली आ रही व्यवस्था है, जिसके भारतीयकरण की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की समस्याओं पर अदालतों की वर्तमान कार्यशैली कहीं से भी फिट नहीं बैठती है। उन्होंने कहा कि गुलामी के समय की न्याय व्यवस्था चली आ रही है और अदालतों में अंग्रेजी में कानूनी कार्रवाई चलती है जिसे ग्रामीण या और लोग नहीं समझ पाते, इसलिए भी किसी केस पर उनके अधिक पैसे खर्च होते हैं। उनका कहना है कि न्यायपालिका का काम ऐसा होना चाहिए कि आम आदमी को कोर्ट और जज से किसी भी तरह का डर नहीं लगे।

जस्टिस एनवी रमना लगातार कई किस्म की सकारात्मक बातें कर रहे हैं, और अदालत में भी उनका रुख सरकार के हिमायती किसी जज का न होकर जनता के हित का दिखता है, और ऐसा साफ नजर आता है कि वह सरकार का चेहरा देखकर ठकुरसुहाती के अंदाज में बातें नहीं करते हैं। वे सरकार से कड़े सवाल करके जवाब-तलब करने में नहीं हिचकते हैं। इसलिए उनकी बातों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए क्योंकि पिछले कई वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में ऐसा कम ही हुआ है कि मुख्य न्यायाधीश जनता के हितों के पक्षधर दिखे हैं, और सरकार को खुश करने की कोई नीयत उनकी नहीं दिखी है। लेकिन जिस जज को श्रद्धांजलि देने के लिए वे पहुंचे थे उस जज की कई खूबियों को भी उन्होंने गिनाया और हम उस बारे में भी आज इस कॉलम में लिखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर एक ऐसे असाधारण जज थे, जो बहुत काबिल भी थे लेकिन वे दयालु थे और उदार थे। जस्टिस रमना ने बताया कि किस तरह उन दोनों ने किसी बेंच पर एक साथ रहते हुए कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले लिए थे, जिनमें मौत की सजा पाए हुए दोषियों के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी शामिल रहा।

जस्टिस रमना की कही हुई इन बातों से परे भी भारत की न्यायपालिका में बहुत सारी चीजें हैं जिनमें सुधार की जरूरत है, और हो सकता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए वे इस मामले में दखल दे सकें, और चीजों को बेहतर बना सकें। चूँकि उन्होंने अंग्रेजों के समय की छोड़ी गई गुलामी के दिनों की परंपराओं को लेकर यह चर्चा की है, इसलिए यह याद रखना जरूरी है कि हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्सों में साल के अधिकतर महीनों में गर्मी रहती है, और अदालतों के कमरे, खासकर छोटी अदालतों के, जिला अदालतों के कमरे, वकीलों के चैम्बर, अदालतों गलियारे,  एयर कंडीशंड नहीं रहते हैं। ऐसे में वकीलों और जजों को काले कोट कर पहनकर काम करने के लिए कहना एक बड़ी ज्यादती रहती है। बहुत से गरीब वकील जिनके पास सिर्फ एक कोट रहता है वे अपने काले कोट पर पसीने के दाग लिए हुए काम करते हैं, क्योंकि वे रोज उसे धुलवा भी नहीं सकते।

इससे परे एक दूसरी चीज यह है कि निचली अदालतों में तो हमारे देखने की यह आम बात है कि जजों के ठीक सामने बैठे हुए उनके बाबू किसी तारीख को बढ़ाने के लिए या कोई भी रियायत ना चाहने वाले गवाह या वादी, प्रतिवादी किसी के भी आने पर वहां उसकी हाजिरी भी लगाने के लिए नगद रिश्वत लेते हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन जजों की नजर में यह न आता हो। ऐसे में यह मानने की कोई वजह नहीं है कि ऐसी रिश्वत में उन जजों का हिस्सा नहीं रहता। देश के मुख्य न्यायाधीश गरीब और ग्रामीण लोगों को अदालतों में होने वाली तकलीफ की बात करते हैं तो यह तो एक बहुत बड़ी तकलीफ है जो कि अधिकतर प्रदेशों की निचली अदालतों में खुलकर सामने दिखती है। ऐसा नगद रिश्वत का लेन-देन भी अगर कोई जज अपनी आंखों के सामने नहीं रोक पाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को, और मुख्य न्यायाधीश को इस बारे में सोचना चाहिए।

अदालतों से दहशत की एक बड़ी वजह यह भी है कि कई वकील वादी, प्रतिवादी को बुरी तरह निचोड़ लेते हैं और अदालतों के बाबू तो उनकी हालत खराब कर ही देते हैं। निचली या ऊपर की हर किस्म की अदालतों में जजों के भ्रष्ट होने की आशंका बहुत से लोग समय-समय पर जाहिर करते आए हैं और लोगों को याद होगा कि किस तरह देश के कानून मंत्री रहे हुए शांति भूषण और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण ने एक वक्त सुप्रीम कोर्ट के आधा दर्जन से अधिक जजों के भ्रष्ट होने का आरोप लगाया था। अदालत ने उन पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया था, उन पर कई तरह से दबाव डाला गया था कि वे माफी मांगें, ताकि इस मामले को खत्म किया जा सके, और बाप-बेटे ने किसी भी माफी मांगने से इंकार कर दिया था। लेकिन उनकी बात का नैतिक दबाव इतना था कि शायद अदालत ने आज तक उस मामले का निपटारा ही नहीं किया है, और ऐसा सच आरोप लगाने वाले शांति भूषण और प्रशांत भूषण को सजा देने की हिम्मत शायद अदालत की नहीं पड़ी, और वह मामला अभी तक खड़ा हुआ है। अगर अदालतों में वकीलों से चर्चा की जाए, और अलग-अलग किस्म के अलग-अलग दर्जे के बहुत से वकीलों से चर्चा की जाए, तो यह साफ पता लग जाता है कि कितने जज रिश्वत नहीं लेते हैं। कुछ मौके ऐसे भी आए हैं जब किसी एक हाईकोर्ट के कई वकीलों से चर्चा करने पर यह भी सुनने मिला कि वहां एक भी जज के ईमानदार होने की उन्हें कोई खबर नहीं है। अब अगर देश के मुख्य न्यायाधीश अदालतों को जनता के प्रति दोस्ताना बनाना चाहते हैं, अदालतों की दहशत खत्म करना चाहते हैं, तो भ्रष्टाचार तो एक बहुत ही ठोस मुद्दा है जो कि एक जुर्म भी है, और सजा के लायक जुर्म है। इसलिए उन्हें सबसे पहले न्यायपालिका से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक अभियान चलाना चाहिए। हमारा ऐसा मानना है कि इसके लिए एक मौलिक सूझबूझ की जरूरत भी पड़ेगी क्योंकि यह इतना संगठित काम हो चुका है, इसकी जड़ें इतनी गहरी बैठ चुकी हैं, कि कोई एक मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल में इसे पूरी तरह से खत्म तो नहीं कर सकते, लेकिन किसी भी बात का समाधान उस दिन शुरू होता है जिस दिन उस समस्या के अस्तित्व को मान लिया जाए। इसलिए हम चाहते हैं कि देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में और अधिक खुलकर बोलें, और अधिक खुलकर चर्चा करें। न्यायपालिका और वकीलों के बीच में इस बात को लेकर एक विचार विमर्श शुरू हो कि भ्रष्टाचार को कैसे खत्म, या कम किया जा सकता है। उनकी इस बात से हम सहमत हैं कि अदालत के नाम से ही आम लोगों के मन में दहशत आ जाती है। जो मुजरिम हैं वहीं अदालत में सबसे अधिक आत्मविश्वास से और सबसे अधिक बेफिक्री से घूमते हैं।

भारत की न्यायपालिका को लेकर एक बात जिसे सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बिना किसी नीतिगत फैसले के एक मामूली आदेश से ही सुधार सकते हैं। आज भारत की बड़ी अदालतों में जजों के लिए योर ऑनर, या मी लॉर्ड जैसे सामंती शब्दों का इस्तेमाल चल रहा है जो कि अंग्रेजों के समय से शुरू हुआ है। या सिलसिला पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच में दर्जे का इतना बड़ा फासला खड़ा कर देता है कि नीचे खड़े हुए लोग दहशत में आ ही जाते हैं। इसलिए अदालत की भाषा से ये अलोकतांत्रिक शब्द पूरी तरह से खत्म करना चाहिए। देश के मुख्य न्यायाधीश को यह भी देखना चाहिए कि अभी कुछ बरस पहले प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने पर राष्ट्रपति के लिए संबोधन में महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवा दिया था, जो कि पूरी तरह से अंग्रेजी राज के सामंतवाद का एक प्रतीक था। इसके बाद देश के बहुत से राज भवनों में भी राज्यपाल के लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद हुआ, और अगर कहीं चल रहा होगा तो उसकी जानकारी अभी हमको नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जजों के काले लबादे, जजों के लिए अलग किस्म के राजसी पोशाक वाले चपरासी, इन सब का सिलसिला खत्म करना चाहिए। जजों को अधिक से अधिक इंसान की तरह रहना चाहिए ताकि बाकी इंसान उनसे दहशत ना खाएं।

इस सिलसिले में हमको एक शानदार मिसाल याद पड़ती है जो कि हिंदुस्तान के जजों को थोड़ा सा आहत भी कर सकती है। लेकिन जब कभी हम सुधार की बात करेंगे तो कुछ ना कुछ लोग तो आहत होंगे ही। अमेरिका के एक राज्य रोड आइलैंड में प्रोविडेंस नाम की जगह पर एक म्युनिसिपल कोर्ट के एक जज हैं जिनका नाम फ्रैंक कैप्रियो है। दिलचस्प बात यह है यह स्थानीय अदालत मोटे तौर पर ट्रैफिक के चालान का निपटारा करती है, और यहां तक वही लोग आते हैं जो लोग ट्रैफिक पुलिस, या स्थानीय पार्किंग अधिकारियों के किए गए चालान का जुर्माना जमा नहीं करते हैं, और इस अदालत तक पहुंचते हैं। अब इस छोटी सी अदालत के बारे में हमको जानकारी ऐसे मिली कि इस अदालत की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण अमेरिका में होता है और भारत के लोगों के लिए यह बात अकल्पनीय हो सकती है कि एक स्थानीय म्युनिसिपल कोर्ट के ट्रैफिक मामलों के निपटारे को देखने के लिए अमेरिका में करोड़ों लोग अलग-अलग टीवी चैनलों पर इसका प्रसारण देखते हैं। अमेरिका के सैकड़ों टीवी चैनल अपने-अपने इलाके में इस अदालत की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण करते हैं और वहां के किसी भी दूसरे लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम के मुकाबले फ्रैंक कैप्रियो के निपटारे को देखने वाले दर्शक कम नहीं हैं।

अब इस जज की कार्रवाई देखें तो वे सबसे पहले वहां पहुंचने वाले, चालान पाए हुए लोगों की बेचैनी, घबराहट, और उनके डर को खत्म करते हैं। उनसे दोस्ताना लहजे में बात करते हैं, उनका नाम पूछते हैं, उनका काम पूछते हैं, उनके साथ आए हुए बच्चों या बड़ों से उनका रिश्ता समझते हैं, और अक्सर ही साथ आए हुए बच्चों को ऊपर जज के स्टेज पर बुलाकर उनसे दोस्ती करते हैं, उनको पूरा मामला समझाकर उनसे राय लेते कि उनके परिवार के व्यक्ति से कितना जुर्माना लिया जाए या जुर्माना न लेकर क्या उसे छोड़ दिया जाए? वे उन हालात को समझते हैं जिनमें किसी से ट्रैफिक नियमों के खिलाफ गाड़ी चलाना हो गया है, या गलत जगह पर गाड़ी पार्क करना हो गया है। उनकी वजह को समझकर, उनके काम को समझकर समाज में उनके योगदान को समझकर, या उन पर परिवार के असाधारण बोझ को जानकर वे कई मामलों में जुर्माने से माफी दे देते हैं, और लोगों को हंसी-खुशी वापस रवाना कर देते हैं। कई मामलों में जहां उनको जुर्माना जरूरी लगता है लेकिन यह समझ आता है कि चालान पाने वाले लोग जुर्माना पटाने की हालत में ही नहीं है, वे बेरोजगार हैं, या उन पर बच्चों का और बीमारों का बहुत बोझ है, तो वे दुनिया भर से उनके पास पहुंचने वाले मदद के दान का इस्तेमाल करते हैं, और दानदाता का नाम पढ़ कर उनके भेजे गए चेक से वह जुर्माना जमा करवाते हुए, गरीब या बेबस लोगों को जुर्माने से बरी कर देते हैं, और भेज देते हैं।

जज फ्रैंक कैप्रियो के अदालती वीडियो 2017 में डेढ़ करोड़ लोगों ने देखे थे 2020 में वह बढक़र तीन करोड़ हो गए और यूट्यूब पर उनके वीडियो 4।30 करोड़ से ज्यादा लोग देख चुके हैं, और आगे बढ़ा चुके हैं। उनकी हंसमुख शक्ल में जज की कुर्सी पर बैठा हुआ एक ऐसा इंसान लोगों को दिखता है, जो किसी के किए हुए मामूली ट्रैफिक गलत काम को देखने के साथ-साथ उनकी स्थितियों को समझता है, परिस्थितियों को समझता है, उनकी बेबसी-मजबूरी को समझते हुए उसका बहुत ही मानवीय आधार पर निपटारा करता है। मैंने खुद ने पिछले कुछ महीनों में उनके सैकड़ों ऐसे प्रसारण देखे हैं जो कि फेसबुक पर भी मौजूद हैं, और यूट्यूब पर भी। इनको देख कर लगता है कि एक अदालत में भी कितनी इंसानियत हो सकती है, और अदालत में कटघरे में खड़े किए गए लोगों को भी किस तरह से इंसान समझा जा सकता है, और उनके दुख-दर्द में हाथ बंटाया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश या भारत के दूसरे जजों को इस प्रसारण को देखने की सलाह उन्हें अपना अपमान भी लग सकता है, लेकिन हर जज दिन में कुछ मिनट तो कम से कम टीवी पर कुछ ना कुछ देखते होंगे, तो इसे एक फिल्मी कहानी मानकर ही देख लें, इसे हमारी नसीहत मानकर ना देखें, इसे अपने ऊपर कोई नैतिक दबाव मानकर न देखें, और इसे देखने के बाद अगर उन्हें ठीक लगे तो वे सोचें कि जिस बात को आज भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है, क्या उस बात के साथ अमेरिका की छोटी सी म्युनिसिपल अदालत का कोई तालमेल उन्हें दिखता है?

पिछले कई महीनों से मैं इस कॉलम में इस अदालत के बारे में लिखना चाह रहा था, और इसे भारत की न्यायपालिका के लिए एक मिसाल बनाकर भी सामने रखना चाह रहा था। वह लिखना हो नहीं पाया था लेकिन अभी जिस तरह से भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अपनी भावना सामने रखी है, और हमारा ऐसा मानना है कि देश के मुख्य न्यायाधीश की भावना अदालत के फैसलों को काफी दूर तक प्रभावित भी कर सकती है, इसलिए देखें कि क्या अमेरिका की एक म्युनिसिपल कोर्ट का एक जज जो कि अमेरिका से बाहर भी करोड़ों लोगों का दिल जीत चुका है, क्या वह भारत की न्यायपालिका को भी सोचने का कुछ सामान दे सकता है?

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


12-Sep-2021 2:52 PM (212)

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर कुछ अखबारनवीसों के बीच यह बहस छिड़ी है कि जिन लोगों को सही वाक्य लिखना नहीं आता, उन्हें मीडिया में लिखने का हक है, या नहीं। बहस के शब्द कुछ अलग हो सकते हैं, लेकिन कुल जमा बात भाषा को लेकर है कि उसका सही होना कितना जरूरी है। और यह बहस कोई नई नहीं है, हमेशा से बातचीत में कुछ लोग जब किसी की काबिलीयत को चुनौती देते हैं, तो यही कहते हैं कि उसे एक वाक्य भी ठीक से लिखना नहीं आता। जो लोग अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते हैं, उनके बारे में अंग्रेजी के जानकार कहते हैं कि वे दो वाक्य भी बिना रूके नहीं बोल पाते, और सही तो बोल ही नहीं पाते।

अब अंग्रेजी में इन दिनों एक शब्द का चलन कई जगह दिखाई पड़ता है, ग्रामर-नाजी। ग्रामर तो व्याकरण है, और नाजी है नस्ल के आधार पर नफरत करने वाला, हिटलर का अनुयायी। तो जो लोग ग्रामर की गलतियों को एक नस्लभेदी नफरत के साथ हिकारत से देखते हैं, उन लोगों के लिए ग्रामर-नाजी शब्द गढ़ा गया है। और यह बात हिन्दुस्तान में हिन्दी भाषा में भी है, जो कि देश के बहुत से हिन्दीभाषी राज्यों की स्थानीय बोलियों से मिलकर बनी भाषा है, और जिस पर क्षेत्रीयता या स्थानीयता का प्रभाव भी खासा कायम है। हिन्दी का व्याकरण तो गढ़ लिया गया है, लेकिन क्षेत्रीय बोलियों के शब्द अलग-अलग इलाकों में चलते हैं, जिनके कि कोई विकल्प नहीं हैं, और बहुत से ऐसे क्षेत्रीय बोली के शब्द हैं, जिनके कोई बेहतर विकल्प हो ही नहीं सकते।

इसके साथ-साथ भाषा की एक बड़ी खूबी कहावत और मुहावरा भी होते हैं। ऐसी लोकोक्तियों के बिना कोई भी भाषा अधूरी रहती है, और अधिकतर लोकोक्तियां किसी न किसी क्षेत्रीय भाषा से निकली हुई रहती हैं, और उनकी शब्दावली से लेकर उनके व्याकरण तक में आज की खड़ी बोली कही जाने वाली हिन्दी के पैमाने पर कई गलतियां निकाली जा सकती हैं।

भारत जितने बड़े देश को देखें, और यहां के अलग-अलग हिन्दीभाषी प्रदेशों की मूल और मौलिक बोलियों को देखें, तो आज की आम हिन्दी उन सबका एक उसी तरह का संघीय ढांचा है, जिस तरह का ढांचा अमरीकी राज्यों का मिलकर यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमरीका बनता है, या जिस तरह भारत एक संघीय गणराज्य है, या जिस तरह एक वक्त सोवियत संघ था। आज हिन्दी उसी तरह की एक भाषा है, जिसके भीतर बोलियों के अपने-अपने साम्राज्य अब तक कायम हैं।

आज बिहार के लालू यादव की हिन्दी देखें, और उधर हरियाणा के किसी जाट की हिन्दी देखें, और इधर मुलायम सिंह की हिन्दी देखें, तो ऐसा लगेगा कि हम कई अलग किस्म की जुबानों की बात कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि बहुत से अलग-अलग देशों को मिलाकर यूरोपीय यूनियन बना है।

अब ऐसे में एक सही वाक्य जिसे न आए, वह अखबारनवीसी न करे, या अखबारनवीसी के लायक नहीं है, यह एक ऐसा शहरी, उच्च-शिक्षित, कुलीन और आभिजात्य पैमाना है जो कि आम लोगों को लिखने के हक से बाहर कर देता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे ग्रामर-नाजी लोगों का हक छीन पा रहे हैं, या कि क्षेत्रीय अखबारों में वहां की बोलियों के प्रभाव वाली हिन्दी पूरी तरह से नकार दी गई है। ऐसा होना उन लोगों के साथ बहुत बड़ी ज्यादती भी होगी जिन्होंने हिन्दी के संघीय ढांचे के साथ-साथ अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को भी कायम रखा है, और अपनी क्षेत्रीय बोली की खूबी के साथ वे हिन्दी का इस्तेमाल करते हैं। यह याद रखने की जरूरत है कि खड़ी बोली वाली हिन्दी क्षेत्रीय बोलियों की जिन बातों को हिन्दी में खामी करार देती है, वे तमाम खामियां उन क्षेत्रीय पैमानों पर खूबियां भी हो सकती हैं।

लेकिन यह पूरी बातचीत भाषा पर हो गई। आज की इस बात का मकसद अखबारनवीसी की जुबान पर है। एक अच्छी भाषा और एक सही व्याकरण वाली भाषा में फर्क भी हो सकता है। ये दोनों कहीं-कहीं पर एक भी हो सकती हैं, और कहीं-कहीं अलग भी। बहुत से लोगों की हिन्दी एकदम सही हो सकती है, कुछ लोगों की हिन्दी मेरी तरह कुछ खामियों वाली भी हो सकती है, और कुछ लोगों की हिन्दी खासी खामी वाली होते हुए भी बड़ी असरदार हो सकती है। और ये खामियां अगर क्षेत्रीय-खूबियां हैं, तो उनके सामने सही व्याकरण कोई मुद्दा नहीं है, कोई दिक्कत नहीं है।

अखबार की जुबान में व्याकरण का एक महत्व जरूर होना चाहिए, लेकिन वह महत्व  जुबान की बाकी बातों से ऊपर होना भी जरूरी नहीं है। जुबान का असरदार होना, न्यायसंगत होना, और अखबारी बातों को पाठक तक सही तरीके से पहुंचाने में कामयाब होना व्याकरण से कम महत्वपूर्ण नहीं है, शायद अधिक ही महत्वपूर्ण है।

जिन लोगों को एक वाक्य सही लिखना नहीं आता, उन लोगों को अखबारनवीसी नहीं करना चाहिए, ऐसा पैमाना क्षेत्रीय बोली से सीखकर अखबारनवीसी में आए अधिकतर लोगों को बेरोजगार कर देगा। और यह बहुत बड़ी बेइंसाफी भी होगी। जिन लोगों को हिन्दी के लिए ऐसा दुराग्रह है, या किसी भी भाषा के व्याकरण के लिए जिनकी ऐसी जिद है, उनको यह समझना चाहिए कि दुनिया की बहुत सी भाषाओं में व्याकरण, हिज्जों, और उच्चारण के अनगिनत अपवाद ऐसे रहते हैं जिन्हें स्थानीय इस्तेमाल के आधार पर तय किया जाता है। अंग्रेजी को ही लें, जिसमें इतने अधिक अपवाद हैं कि उसे सीखने वाले लोगों की नानी ही मर जाती है। और ऐसे तमाम अपवादों को न्यायसंगत ठहराने के लिए अंग्रेजी जुबान के जानकार यह तर्क देते हैं- बिकॉज नेटिव्स से सो, (चूंकि स्थानीय लोग ऐसा कहते हैं)।

भारत की हिन्दी को आज की आधुनिक हिन्दी के व्याकरण की कैद में बांधकर, उसके कम जानकार लोगों को हिकारत से देखना एक बड़ी बेइंसाफी है। अगर किसी की हिन्दी ऐसे शहरी-आधुनिक पैमाने पर खरी है, तो वे उस पर गर्व कर सकते हैं। लेकिन जिनकी हिन्दी क्षेत्रीय पैमानों पर खरी है, उनको भी अपनी भाषा पर गर्व करने का उतना ही हक है। हिन्दी को एक संघीय ढांचे की तरह क्षेत्रीय बोलियों का सम्मान करते हुए एक संपर्क-भाषा की तरह काम करना चाहिए, तो ही हिन्दी राष्ट्रभाषा है। अगर वह क्षेत्रीय खूबियों को नीची नजर से देखते हुए व्याकरण का अपना एक फौलादी ढांचा क्षेत्रीय बोलियों पर लादने का आग्रह करेगी, तो वह अपने ही वजन को घटा बैठेगी।

और जहां तक हिन्दुस्तान के हिन्दी इलाके की अखबारनवीसी की जुबान की बात है, तो उसका तो हिन्दी होना भी जरूरी नहीं है। उसकी लिपि देवनागरी हो सकती है, लेकिन उसकी जुबान एक मिली-जुली हिन्दुस्तानी हो सकती है जैसी कि खड़ी बोली के आने के पहले मुगलों के साथ आई उर्दू के चलन के बाद, और फिर अंग्रेजों की जुबान का तडक़ा लगने पर मिलकर चल रही थी। क्षेत्रीय बोलियों का अलग-अलग तरह का मेल अलग-अलग इलाकों में था, और उनमें से कोई भी क्षेत्रीय बोली आज की खड़ी बोली हिन्दी से कमजोर नहीं थी। उन बोलियों में असर हिन्दी से कहीं अधिक था, और भारत की गैरहिन्दी क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में भी हिन्दी के मुकाबले अधिक वजनदार, अधिक पैने, और अधिक असरदार शब्द हैं, और जुमले हैं।

आज सोशल मीडिया पर अंग्रेजी या हिन्दी, या कोई और जुबान, इन सबके इस्तेमाल में भाषा और ग्रामर के तमाम नियम-कायदों को जिस तरह उठाकर फेंक दिया गया है, और ऐसा सोशल मीडिया बड़े-बड़े भाषा-पंडितों के लिखे हुए के मुकाबले अधिक असर का हो गया है, उससे भाषा की शुद्धता के धर्मान्ध लोगों को इस शुद्धता के सीमित महत्व को समझ लेना चाहिए। आज सबसे अधिक इस्तेमाल हो रहे, और सबसे अधिक असरदार सोशल मीडिया पर न ग्रामर रह गया, न हिज्जे रह गए, न उच्चारण रह गए, और न ही परंपरागत शब्द या वाक्य-विन्यास रह गए। कुछ बरसों के भीतर ही लोगों के बीच के संवाद ने एक निहायत ही अलग औजार विकसित कर लिया जिसे कि शुद्धतावादी भाषा भी कहने से इंकार कर देंगे। लेकिन यह समझना चाहिए कि भाषा को गढ़ा ही इसलिए गया था कि लोग एक-दूसरे तक अपनी बात पहुंचा सकें, दूसरों की बात समझ सकें। यह एक बड़ा ही सीमित इस्तेमाल था, और इस सीमित इस्तेमाल के लिए शुद्धतावादियों ने भाषा को आग में तपा-तपाकर चौबीस कैरेट सोने की तरह खरा करने की कोशिश की, कर भी लिया, लेकिन उसके बिना भी लोग बखूबी अपना काम चला ले रहे हैं।

एक वक्त था जब लोकसंगीत और लोकनृत्य को तपा-तपाकर, आग में पकाकर, उसे नियमों में बांधकर, उसकी लय और ताल को शास्त्रीयता के पैमाने तक ले जाया गया, और कला को एक दरबारी दर्जा दिया गया, उसे समझ पाने वाले लोगों को पारखी का दर्जा दिया गया, और उसे आम लोगों के सीखने-समझने के दायरे से बाहर निकाल दिया गया। कुछ ऐसा ही भाषा के व्याकरण की शुद्धता को लेकर किया गया। लेकिन जिस तरह लोककला और लोकसंगीत अब दीवारों को कैनवास बनाने लगे हैं, रेलवे स्टेशनों पर म्यूजिक-बैंड बनने लगे हैं, वे आज भी किसी शास्त्रीयता के मोहताज नहीं हैं।

इसलिए सही व्याकरण वाला वाक्य एक अच्छी बात हो सकती है, एक अनिवार्य बात नहीं हो सकती। और अखबारनवीसी में तो अकेला दुराग्रह सिर्फ सच और इंसाफ के लिए होना चाहिए, जुबान तो निहायत गैरजरूरी है। दो दिन पहले सीरिया से जान बचाकर भागे परिवार का एक बच्चा जिस तरह समंदर के किनारे लाश की शक्ल में कैमरे में कैद हुआ है, और जिसे देखकर पूरी दुनिया हिल गई है, उस तस्वीर में फोटोग्रॉफी के व्याकरण की खूबियों और खामियों की तरफ किसी का ध्यान जाता है? और जिस वक्त यह तस्वीर ली गई होगी, उसी वक्त दुनिया के बहुत से फोटोग्राफर मेहनत करके, फोटोग्रॉफी के पैमानों का ध्यान रखते हुए तस्वीरें ले रहे होंगे, लेकिन उनकी हजार गुना अधिक जानकारी, मेहनत, इस बेमेहनत तस्वीर के मुकाबले इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हो पाएगी।

मायने यह रखता है कि किसी लिखे हुए, कहे हुए शब्द, या दिखाई हुई फिल्म या तस्वीर में सच कितना है, और उसमें इंसाफ की गुजारिश कितनी है। वरना शुद्धता दुनिया के किसी काम की नहीं है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


05-Sep-2021 4:31 PM (180)

अमेरिका में अभी एक नई बहस छिड़ी है कि जिन लोगों ने कोरोना की वैक्सीन नहीं लगवाई है, उन्हें हवाई जहाज में चढऩे दिया जाए या नहीं? वहां सरकार ने वैक्सीन लगवाने का फैसला तो लोगों पर छोड़ा है, लेकिन वहां भारत जैसी हालत भी नहीं है कि विमान में चढऩे के पहले वैक्सीन सर्टिफिकेट दिखाना पड़े या कोरोना नेगेटिव होने का सर्टिफिकेट दिखाना पड़े। अमेरिका में लोग अपनी निजी स्वतंत्रता को लेकर अधिक जागरूक या, बेहतर होगा यह कहें कि, अधिक अडिय़ल है। उनमें से बहुत से लोग तो मास्क लगाने से भी इंकार कर देते हैं कि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। वैक्सीन न लगवाने वाले भी बहुत से जिद्दी लोग हैं जिनका कई किस्म का तर्क रहता है। लेकिन महज अमेरिकी लोगों को ही जिद्दी क्यों कहें, हिंदुस्तान के इतिहास को देखें तो जब कस्तूरबा गांधी की तबीयत बहुत खराब हुई थी, और पुणे के आगा खान महल में वे महात्मा गांधी के साथ रखी गई थीं, तब अंग्रेज डॉक्टर उन्हें देखने आया था। उसने जब पेनिसिलिन का इंजेक्शन लगाने की तैयारी की तो गांधी उससे इस बहस में उलझ गए कि किसी दवा को इंजेक्शन से शरीर में डालना प्रकृति के खिलाफ है। और इनके बीच कुछ बातचीत के बाद वह इंजेक्शन नहीं लग पाया, और दवा मौजूद रहते हुए भी कस्तूरबा चल बसी थीं। तो गांधी की जिद ने कस्तूरबा की जान ले ली थी। आज भी गाँधी होते तो कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाते क्योंकि वह प्रकृति के खिलाफ होती। उसी तरह अमेरिका में बहुत से लोग जिद पर अड़े हुए हैं कि वे वैक्सीन नहीं लगवाएंगे। लेकिन दूसरे लोगों का कहना है कि वैक्सीन न लगवाने वाले लोगों का नुकसान और खतरा वे लोग क्यों झेलें जो कि वैक्सीन लगवा चुके हैं? बात सही भी है, गैरजिम्मेदार लोगों के हिस्से का नुकसान जिम्मेदार लोग क्यों झेलें ?

लेकिन अमेरिका और टीकों से परे की बात देखें तो भी दुनिया भर में यह देखने मिलता है कि किसी कार्यक्रम में समय पर पहुंचने वाले लोग अपने वक्त की बर्बादी करते उन लोगों का इंतजार करने को मजबूर रहते हैं जो देर से आने की आदत रखते हैं और कार्यक्रम जिनके लिए इंतजार करते रहता है। और तो और अपनी खुद की शादी में दूल्हा-दुल्हन कई बार दावत में इतनी देर से पहुंचते हैं कि वहां आए हुए मेहमान उनके इंतजार में खड़े रहते हैं। किसी बैठक में भी यही होता है कि समय पर पहुंचे हुए लोग अपने मन में खुद को और लेट-लतीफ लोगों को कोसते हुए बैठे रहते हैं, और देर से आने वाले लोग मजे से हंसते-मुस्कुराते पहुंचते हैं।

जो लोग सिगरेट-बीड़ी नहीं पीते हैं, उन्हें किसी जगह पर मौजूद दूसरे ऐसे लोग तकलीफ देते हैं, लेकिन ऐसे अनचाहे धुंए को झेलने के लिए मजबूर लोग नुकसान पाते हुए वहां खड़े या बैठे रहते हैं। हिंदुस्तान में यह सिलसिला इतना अधिक है कि बहुत से लोगों को यह अफसोस होता है कि वे इतने असभ्य देश में पैदा क्यों हुए हैं जहां एक काल्पनिक इतिहास के ऊपर तो सबको गर्व है, लेकिन आज मौजूद शर्मनाक वर्तमान पर किसी को शर्मिंदगी नहीं है। अभी छत्तीसगढ़ में भाजपा की एक बड़ी नेता और छत्तीसगढ़ की प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने कहा कि भाजपा के लोग एक बार थूक दें तो भूपेश बघेल की पूरी सरकार बह जाएगी। बात सही भी हो सकता है क्योंकि भाजपा छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक सदस्यों वाली पार्टी होने का दावा करती है, और उसके बहुत से लोग तंबाकू-गुटखा खाकर इतना इतना थूक उगलते हैं कि हो सकता है कि एक सैलाब आ जाए। जो लोग सार्वजनिक जगहों पर नहीं थूकते हैं उन्हें ही दूसरों का ऐसा थूका हुआ अधिक खटकता है। जो लोग हर कुछ देर में किसी ना किसी साफ-सुथरी और सार्वजनिक जगह को देखकर थूकने में लग जाते हैं, उन्हें तो भला क्या बुरा लगता होगा।

किसी संपन्न कॉलोनी में भी रहने वाले लोगों को आसपास के असभ्य पड़ोसियों और उनके मेहमानों की बदतमीजी को झेलना पड़ता है, जिनकी गाडिय़ां आड़ी-तिरछी खड़ी रहती हैं, जो घरों के बाहर जोर-जोर से फिजूल की बात करते हुए मोबाइल फोन लिए टहलते रहते हैं, आते जाते घर की घंटी की जगह हॉर्न बजाते हैं और रास्ता रोकते हैं, और अड़ोस-पड़ोस की दीवार पर पेशाब करने में जुट जाते हैं। ऐसे लोग गिनती में बहुत कम रहते हैं जो अपने घर आने वालों या अपने मेहमानों को तमीज याद दिलाने की जहमत उठाएं। अधिकतर लोग दूसरों के प्रति किसी भी जिम्मेदारी को लेकर पूरी तरह बेफिक्र रहते हैं और अपने अधिकारों का दावा करने के लिए उतने ही चौकन्ने रहते हैं।

हिंदुस्तानी लोगों का यह मिजाज बड़ा ही दिलचस्प है कि हर सुबह अपने घर-दुकान के सामने का कचरा झाड़ू से सडक़ के दूसरी तरफ कर दें, मानो सडक़ एक सरहद है और उसकी दूसरी तरफ कोई दुश्मन देश है। एक बार दुनिया के सभ्य देशों में जाकर जो हिंदुस्तानी लौटते हैं उनका मोटा-मोटा अंदाज यह रहता है कि वहां जैसी सभ्यता, वहां जैसी साफ-सफाई और साफ हवा, तमीज हिंदुस्तान में सैकड़ों बरस तक नसीब नहीं होनी है। यहां पर लोग दूसरे लोगों की गंदगी और गलतियों की तकलीफ भुगतने के लिए मजबूर रहते हैं, और गंदगी फैलाने वाले, परेशानी फैलाने वाले लोग इस हद तक बेशर्म रहते हैं कि उन्हें शायद इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वह कुछ गलत कर रहे हैं।

हिंदुस्तान की सडक़ों पर देखें तो दारु पिए हुए या दूसरे किस्म के नशे में गाड़ी चलाने वाले लोगों की संख्या कम नहीं रहती है। लेकिन लोग उन्हें रोक नहीं सकते क्योंकि रोकने का काम पुलिस का है, और पुलिस उन्हें कई वजहों से नहीं रोकती क्योंकि एक तो उसकी क्षमता इतनी गाडिय़ों और ड्राइवरों को जांचने की नहीं है, दूसरा यह कि इनमें से जो पिए हुए रहते हैं उनसे कुछ कमाई हो जाती है, इसलिए भी वह उन्हें जाने देते हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि सडक़ों पर पिए हुए लोग दूसरों पर खतरा रहते हैं। वे अपनी जान खतरे में डालें न डालें, दूसरों को कुचल सकते हैं। ऐसे में सडक़ों पर जिम्मेदारी से चलने वाले लोगों के क्या अधिकार हैं जिससे वे पिए हुए या नशे में लोगों को रोक सकें ? जो जिम्मेदार हैं उनके कोई अधिकार नहीं है, और जो गैरजिम्मेदार हैं उन पर कोई रोक नहीं है। हिंदुस्तान में सार्वजनिक जगहों का यही हाल है।

लोग अपने बच्चों को महंगी गाडिय़ां खरीद कर देते हैं जिनमें से बच्चे किसी के साइलेंसर फाड़ देते हैं, किसी के हेडलाइट को बदल देते हैं, किसी में प्रेशर हॉर्न लगवा लेते हैं, और दूसरों का जीना हराम करते चलते हैं। कभी-कभार भूले-भटके कोई अफसर ऐसी कुछ दर्जन गाडिय़ों पर कोई कार्यवाही करवा दे तो करवा दे, वरना आमतौर पर किसी को इनमें कोई बुराई नहीं दिखती क्योंकि हमारा मिजाज ही ऐसा हो गया है कि इस देश में तकलीफ पाना लोगों की बदनसीबी है, पिछले जन्मों के कर्मों का नतीजा है,  और इसमें सरकार का या किसी और का दखल देना ठीक नहीं है।

कुल मिलकर जिम्मेदार लोगों की किस्मत में भड़ास में जीने के अलावा और कुछ नहीं है। अगले जन्म में किसी सभ्य देश में पैदा होने के लिए इस जन्म में कुछ नेक काम करते चलें।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


29-Aug-2021 5:09 PM (183)

सुप्रीम कोर्ट ने अभी महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक पत्रकार की याचिका पर जिला प्रशासन का यह आदेश खारिज कर दिया जिसमें इस पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता को जिला बदर किया गया था। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में अमरावती में पुलिस और प्रशासन से मिलकर पत्रकार रहमत खान को अमरावती शहर या अमरावती ग्रामीण जिले में एक साल तक न आने-जाने का आदेश दिया था। जिला बदर के इस आदेश के खिलाफ यह पत्रकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और अदालत ने सरकार के इस आदेश को खारिज करते हुए कहां कि किसी व्यक्ति को देश में कहीं भी रहने या स्वतंत्र रूप से घूमने के उसके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

लोगों को याद होगा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, मजदूर नेताओं को, जिला बदर करने को जिला प्रशासन और पुलिस एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। देश के तकरीबन सभी राज्यों में प्रशासन जिला बदर के अंग्रेजों के समय से चले आ रहे कानून को डराने के लिए भी इस्तेमाल करता है और अपने को नापसंद लोगों को जिले से निकाल देने की एक ऐसी सजा देता है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना हर किसी के बस का नहीं रहता। छत्तीसगढ़ में कई दशक पहले पीयूसीएल नाम के मानवाधिकार संगठन के एक बड़े कार्यकर्ता राजेंद्र सायल ने इस बात को कई जगह उठाया था कि जिला बदर करने का कानून संविधान में बताए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। उन्होंने कई मंचों पर इस बात को उठाया था, और इस बारे में लिखा भी था। लेकिन पुलिस और प्रशासन को प्रतिबंध के सारे तौर-तरीके बहुत सुहाते हैं क्योंकि उन्हें आसानी से लादा जा सकता है, और सत्तारूढ़ नेताओं को उनके फायदे को गिनाया जा सकता है। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ नेता पुलिस और प्रशासन की मदद से अपनी राजनीति चलाते हैं और इसलिए वे तमाम किस्म के प्रतिबंधों की प्रशासन की पहल के हिमायती भी रहते हैं।

इस प्रतिबंध को ही देखें तो अगर कोई व्यक्ति किसी जिले में वहां के लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन जाता है तो उसे उस जिले से बाहर रहने के लिए पर्याप्त कारण मानते हुए उसे जिला बदर कर दिया जाता है। अब कुछ देर के लिए, बहस के लिए यह मान भी लें कि कोई व्यक्ति एक जिले में इतना बड़ा गुंडा हो जाता है, अपराधी हो जाता है कि वहां के लोगों को उससे खतरा रहता है, और उसे जिले से बाहर निकाल देना जिले की हिफाजत के लिए जरूरी लगता है। ऐसे में सवाल यह है कि जो एक जिले के लिए खतरा है उसे उस जिले से निकालकर उसे दूसरे जिले पर खतरा बनाकर क्यों डालना चाहिए? और फिर जिले की सुरक्षा तो अधिकारियों का जिम्मा है, कोई एक व्यक्ति इतना खतरनाक हो सकता है कि वह उस जिले से निकाल देने के लायक हो जाए? दिलचस्प बात यह है कि अभी जिस व्यक्ति को अमरावती से जिला बदर किया गया था उसने सरकार में कई तरह की सूचना के अधिकार की अर्जियां लगाई थीं और कई शैक्षणिक संस्थाओं और मदरसों में हुई आर्थिक अनियमितता के बारे में जानकारी मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट में रहमत खान नाम के इस कार्यकर्ता ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उसने सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को खत्म करने और अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए कदम उठाया था। उसका कहना है कि कलेक्टर और पुलिस से उसने ऐसे दुरुपयोग की जांच का अनुरोध किया था और इसके बाद इन संस्थाओं से जुड़े लोगों ने उसके खिलाफ एक रिपोर्ट लिखाई थी।

अमरावती जिला प्रशासन और पुलिस का यह रुख बताता है कि अफसर अपने अधिकारों का कैसा बेजा इस्तेमाल करते हैं, और हो सकता है कि राजनीतिक ताकतें भी ऐसे भ्रष्टाचार को बचाने के पीछे रहती हों। पुलिस और सत्तारूढ़ नेताओं के बीच का गठबंधन पूरे देश के हर राज्य में इतना खतरनाक हो चुका है कि अभी दो-चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ एक टिप्पणी भी की है। छत्तीसगढ़ के एक आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ऐसी बहुत सी बातें कहीं। अदालत ने देश के कई राज्यों के ऐसे मामलों के बारे में कहा कि जब कोई सरकार जब कोई पार्टी सत्ता में आती है तो पिछली सरकार के करीबी अफसरों के खिलाफ कई तरह के मामले दर्ज होने लगते हैं, यह हिंदुस्तान में एक नया रुख देखने में आ रहा है। देश के बहुत से राज्यों में ऐसा हो रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी को नापसंद लोगों के खिलाफ तरह-तरह के फर्जी मामले दर्ज कर लिए जाते हैं। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देनी पड़ी जिसमें राज्य सरकार द्वारा दंगाइयों के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले लिए गए, और उसके लिए हाईकोर्ट से लेने इजाजत लेने की शर्त भी पूरी नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हाईकोर्ट की इजाजत के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता है।

पुलिस और प्रशासन के हथियार अंग्रेजों के वक्त बनाए गए ऐसे बहुत से कानून हैं जिन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया जाता है, लेकिन जो मोटे तौर पर एक विदेशी जुल्मी सरकार के अत्याचार जारी रखने के लिए अंग्रेजों के वक्त पर बनाए गए थे। आज भी हिंदुस्तान की अफसरशाही, यहां की पुलिस उन्हें जारी रखने के पक्ष में हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ऐसे बहुत से कानूनों को खत्म करने की बात करती है, कई कानूनों को खत्म किया भी गया है, लेकिन नरेंद्र मोदी की पार्टी ही कई प्रदेशों की अपनी सरकारों में लोगों के खिलाफ बड़ी रफ्तार से राजद्रोह के मामले दर्ज करती है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट बरसों पहले फैसला दे चुका है। अभी सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली का ही एक मामला चल रहा है जिसमें जब अदालत ने यह पूछा कि कुछ छात्रों के खिलाफ राजद्रोह का मामला कैसे दर्ज किया गया, तो पुलिस ने कुछ टीवी चैनलों का नाम लिया कि वहां वीडियो देखकर पुलिस ने उन पर राजद्रोह का मामला लगाया। जब इन चैनलों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने ट्विटर पर कुछ ट्वीट में यह वीडियो देखकर उन्हें अपने समाचारों में दिखाया था। और जब उन ट्वीट की जांच की गई तो यह पता लगा कि उन्हें भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख ने ट्वीट किया था, और वहां से लेकर वे समाचार चैनलों में दिखाए गए, और वहां से उन वीडियो को देखकर पुलिस ने राजद्रोह के मुकदमे दर्ज कर लिए थे।

अब यह वक्त आ गया है कि पूरे देश में पुलिस और प्रशासन के ऐसे मनमानी करने के अधिकार खत्म किए जाएं, ऐसे कानून खत्म किए जाएं जिनमें कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे बहुत ही अमूर्त और अस्पष्ट किस्म के बहाने गिनाकर लोगों पर कड़ी कार्यवाही की जाती है, और लंबे समय तक उन्हें परेशान किया जाता है। आज क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि किसी मामूली व्यक्ति को एक साल के लिए जिला बदर कर दिया जाए तो किस तरह वह अपने जिले के बाहर रहेगा, कैसे जिंदा रहेगा, उसे कौन काम देगा, और किस तरह उसका परिवार उसके बिना साल भर जिंदा रह सकेगा? ऐसी नौबत की सोचे बिना सिर्फ सरकारी बहाने बनाकर ऐसी कार्रवाई पूरी तरह पूरी तरह से नाजायज है और इस पर रोक लगनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत अच्छा किया है जो जिला बदर करने की कार्रवाई के खिलाफ एक व्यापक टिप्पणी की है जो कि जिला बदर के बाकी मामलों में भी देशभर मैं इस्तेमाल की जा सकेगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


08-Aug-2021 12:46 PM (356)

पुराने कानूनों और नई टेक्नोलॉजी ने दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए कई किस्म की नई चुनौतियों खड़ी कर दी हैं। अमरीका जैसे कुछ देश जिन्होंने टेक्नोलॉजी बदलने की रफ्तार से ही कानून भी बदल लिए, वे भी आज इन नए कानूनों के कई पहलुओं से रोज जूझ रहे हैं। इंटरनेट ने लोगों की जिंदगी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहुत से ऐसे नए पहलू जोड़े हैं जिनके बारे में कुछ बरस पहले तक मीडिया का एकाधिकार सा बने रहने की वजह से कभी सोचने की नौबत नहीं आई थी। अब बहुत मामूली से खर्च के साथ कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर जाकर वहां अपने मन की बहुत किस्म की बातें लिख सकते हैं, दूसरे लोगों को महान या घटिया बता सकते हैं। इस नई आजादी ने कल तक अखबारों के संपादक नाम की एक सेंसरशिप को खत्म कर दिया है और अब लोग सीधे-सीधे दूसरे लोगों तक पहुंच जाते हैं, पल भर में, सभी सरहदों को चीरकर।

भारत सरकार बीच-बीच में नोटिस देकर इंटरनेट की बहुत सी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को देकर कहती है कि वे वहां से आपत्तिजनक सामग्री हटाएं। दूसरी तरफ देश की कई बड़ी अदालतें भी ऐसे ही नोटिस इन वेबसाइटों को देती रहतीं हैं, जो मोटे तौर पर पश्चिमी दुनिया से चलती हैं, और समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिबंध झेलने की आदी हैं। फेसबुक, ट्विटर और इसी किस्म की दूसरी बहुत सी वेबसाइटें लोगों के बीच बातचीत, विचार-विमर्श और गाली-गलौज का रिश्ता मुहैया कराती हैं। पिछले एक-दो दशकों में भारत की सरकार को अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने किस्म के आंदोलन झेलने पड़े उनमें जनमत को तैयार करने और बात को फैलाने में इन वेबसाइटों ने खासी मदद की। नतीजा यह है कि सरकार इन पर लोगों की लिखी बातों से नाखुश है। लेकिन बात महज इतनी नहीं है। बिना किसी रोक-टोक के जब लोगों को अपनी किसी भी तरह की दिल-दिमाग की हालत के चलते लिखने और नेट पर डाल देने की सहूलियत है, और जब तक कोई कानूनी जांच न हो तब तक लोगों को एक यह छूट भी मिली हुई है कि वे बेनामी, गुमनामी के साथ, किसी नकली नाम से भी यह काम कर सकते हैं, तो नतीजा यह कि लोग किसी की वल्दियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो किसी की मां के चाल-चलन की बात कर रहे हैं।

हमारा अपना अनुभव यह रहा है कि यह बेकाबू आजादी जितना भला कर रही है उतना ही एक ऐसा बुरा भी कर रही है जिसके खिलाफ किसी किस्म की कानूनी कार्रवाई इस टेक्नोलॉजी के बेसरहद होने से मुमकिन भी नहीं है। भारत की सरकार अगर किसी वेबसाइट को रोक भी देगी, तो दुनिया के बहुत से देशों ने ऐसा करके देख लिया है, उससे कुछ नहीं थमता। तो ऐसे में इस मर्ज का इलाज क्या है? अभी मोदी सरकार ने एक नया आईटी कानून बनाकर उन्हीं सोशल मीडिया के पर कतरने की कोशिश की है, जिन पर सवार होकर वह दो-दो बाद सत्ता पर पहुंची है।

दरअसल इंटरनेट लोगों को बिना अपनी शिनाख्त उजागर किए लिखने की एक ऐसी छूट देता है जो कि अब तक किसी ऐसे सार्वजनिक शौचालय के दरवाजे के भीतर की तरफ ही हासिल होती थी। उसमें भी पहले और बाद में उसी शौचालय में जाने वाले लोग तो यह अंदाज लगा ही सकते थे कि यह किसने लिखा होगा, लेकिन इंटरनेट पर जहां भारत के ही करोड़ों लोग हैं, और जहां बेचेहरा बने रहने की पूरी सहूलियत हासिल है वहां पर पखाने की इस दरवाजे के भीतर लिखने वाले का अंदाज भी लगाना मुमकिन नहीं है। कहने को तो यह भी है कि कंप्यूटर, इंटरनेट और फोन पर भेजा गया एक शब्द भी इतनी जानकारियों के साथ दर्ज होता है कि उसे तलाश कर अदालत में साबित किया जा सकता है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के बिना ओर-छोर के अंतहीन फैले हुए बरगद के पेड़ पर टहलती हुई लाखों चीटियों में से किसी एक चींटी को कैसे तो कोई तलाशेगा और फिर कैसे उसके पदचिन्ह अदालत में साबित करेगा? कैसे कोई समंदर में रेत के एक कण को पहचानकर उसे कानून के कटघरे तक ले जाएगा? यह काम डॉन को पकडऩे से भी मुश्किल है।

दूसरी बात यह कि अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता को लेकर कानून अपने आपमें अभी कमजोर है, एक-एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट तक बहस गई हुई है, ऐसे में करोड़ों लोगों की रोजाना की अभिव्यक्ति को पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी कब तक पकड़ते रहेगी और अदालतों में लगी हुई मामलों की कतारों में ऐसे मामलों को कब जगह मिलेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने सम्मान, अपने निजी जीवन के हक, एक की धार्मिक भावनाएं और दूसरे की धार्मिक भावनाएं, एक के नैतिक मूल्य और दूसरे के नैतिक मूल्य, इन सबमें इतने किस्म की विविधता है, टकराव है कि कोई भी दूसरे की कही हुई बात को अपना अपमान मान सकते हैं, और अपने हक का दावा कर सकते हैं। दूसरी तरफ जो कहने वाले लोग हैं, लिखने और इंटरनेट पर डालने वाले लोग हैं उनके अपने ये तर्क हो सकते हैं कि अभिव्यक्ति की यह उनकी अपनी स्वतंत्रता है।

कहने के लिए भारत का मौजूदा, और नया भी, सूचना तकनीक कानून इतना कड़ा है कि वह लोगों को छपी हुई बातों के मुकाबले, इंटरनेट पर डाली गई बातों के लिए अधिक आसानी से अधिक कड़ी सजा दिला सकता है। लेकिन सवाल यह है कि पहले से बोझ तले टूटी कमर वाली जांच एजेंसियों और अदालतों के पास ऐसे नए मामलों के लिए वक्त कहां से निकलेगा? कहने के लिए सरकार के पास पानी की जांच करने के लिए सहूलियत है, लेकिन अगर देश भर के हर नदी-तालाब के पानी की जांच हर हफ्ते करवाई जाए तो क्या इन प्रयोगशालाओं से कोई नतीजे निकल सकेंगे? इसलिए हम इस मौजूदा हाल को किसी आसान इलाज के लायक नहीं समझते। हम यहां पर अपनी तरफ से कोई बात इसलिए सुझाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया के लोगों की अभिव्यक्ति की जरूरतें अलग-अलग हैं। हमें तो आए दिन, या रोज-रोज लिखने का मौका मिल जाता है, जिन लोगों को तकलीफ हमसे ज्यादा है और कहने को जगह कहीं नहीं हैं, वे लोग अपनी भड़ास को, अपनी शिकायत या तकलीफ को अगर इंटरनेट पर नहीं निकालेंगे तो वह भड़ास उनके मन के भीतर इक_ा हो-होकर किसी अलग किस्म का धमाका करेगी।

यहां पर लगे हाथों हम भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक और पहलू पर भी बात करना चाहेंगे। यहां सेंसर हो चुकी फिल्में के पर्दे पर पहुंचने के पहले ही उनके खिलाफ अदालतों में मामले दर्ज होने लगते हैं, किसी की तस्वीर को लेकर मामला चलने लगता है तो किसी गाने को हटाने की मांग होने लगती है। धर्मों को लेकर सामाजिक तनाव इतना है कि खुलकर उस बारे में बात नहीं हो सकती और एक बहुत ही सतही जुर्म की तरह, एक थाने के स्तर पर ही किसी के लिखे के खिलाफ, किसी के कहे के खिलाफ यह जुर्म दर्ज हो जाता है कि उसने किसी और की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाई है। हजारों ईश्वरों वाले भारत जैसे देश में किसी एक के धार्मिक अधिकार भी किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले हो सकते हैं। एक धर्म पूरी तरह अहिंसा पर चलता है और उसके लोग यह दावा कर सकते हैं कि दूसरे धर्म के लोग जब बलि या कुर्बानी देते हैं, तो अहिंसा की उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचती है। किसी धर्म या आध्यात्म के तहत महिलाओं से भेदभाव की व्यवस्था हो सकती है, और कोई दूसरा धर्म यह कह सकता है कि उनके देश में ऐसा भेदभाव उनकी धार्मिक भावना को आहत करता है। आज योरप के कई देशों में यह हो भी रहा है। मुस्लिम महिलाओं के बुर्के के खिलाफ फ्रांस और कुछ दूसरी जगहों पर जिस तरह के कानून बन रहे हैं उन्हें मुस्लिम अपने धार्मिक अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं और दूसरे लोग उसे अपने देश की संस्कृति के खिलाफ मान रहे हैं। तो ऐसे टकराव इंटरनेट के बिना भी चलते हैं जहां पर कि लोगों के चेहरे हैं, उनकी शिनाख्त है।

भारत के मौजूदा हाल में हमें कुछ बहुत ही खतरनाक किस्म की साम्प्रदायिक या आतंकी बातों के अलावा, इंटरनेट पर अधिक रोक-थाम की गुंजाइश इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इस बात पर मतभेद बने रहेगा कि क्या आपत्तिजनक है, और क्या नहीं। लेकिन भारत की सरकार ने और एक अदालत ने यह बात इंटरनेट कंपनियों से कही है, और अब करोड़ों लोग उत्सुकता से यह देख रहे हैं कि आपत्तिजनक और अभिव्यक्ति की कौन सी परिभाषाएं लागू होती हैं। दुनिया का अब तक का अनुभव तो यह रहा है कि कुछ बहुत हिंसक, बहुत आतंकी और बच्चों के सेक्स-शोषण जैसे जाहिर तौर पर पहचाने जा सकने जुर्म तो एजेंसियों के घेरे में आ जाते हैं लेकिन छोटी-मोटी गाली-गलौज और छोटा-मोटा चरित्र हनन रोकने के लायक माना नहीं जाता। लायक न मानने के यहां पर हमारे दो मतलब हैं, एक तो यह कि उन्हें इतनी अहमियत नहीं दी जाती कि उसे रोकने की कोशिश हो, दूसरी बात यह कि उसे रोकना कानूनी-तकनीकी रूप से मुमकिन ही न हो।

भारत में जो लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लेना चाह रहे हैं, ले रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि हजार बरस पहले हिन्दुओं की बनाई नग्न प्रतिमाओं की तरह की कुछ पेंटिंग्स बनाने की वजह से मकबूल फिदा हुसैन को इस किस्म के इतने कानूनी मुकदमे झेलने पड़े कि बची जिंदगी सैकड़ों अदालतों में फेरे लगाने के बजाय उन्होंने इस देश को ही छोड़ देना बेहतर समझा। उन्हें तो दुनिया के कई देशों में जगह मिल गई, लेकिन बाकी लोगों की कही छोटी-छोटी बातों पर भी अगर उन्हें अदालतों में इस तरह खड़ा कर दिया जाएगा तो वे कैसे जिंदा रह पाएंगे? और यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने के तर्क के साथ ही लोग अगर देश भर की हर जिला अदालत में किसी एक के खिलाफ मामले दर्ज करेंगे तो अब कोई कितने जिलों में हर पेशी पर जा पाएगा? हम किसी भी नए कानून के बनाए जाने के पहले मौजूदा कानूनों पर अमल की नाकामयाबी पर सोच-विचार बेहतर समझते हैं। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें आज के कानून का इस्तेमाल न कर पाने वाले नालायक लोग नए कानूनों को बनाने की बात करते हैं ताकि उनकी आज की कमजोरियां, आज के कानून की कमजोरियां साबित की जा सकें।

इंटरनेट पर लोगों की लिखने की आजादी अब एक ऐसी हकीकत है जो वापिस नहीं जा सकती। एक संभावना ने जन्म जब ले लिया, तो फिर उसे मां के पेट में डाला नहीं जा सकता। अब वह कितनी अच्छी है और कितनी बुरी, उसके साथ किस तरह का बर्ताव किया जाए और कैसे निपटा जाए, यही बात हो सकती है और सच तो यह है कि आज इंटरनेट बिना किसी मां-बाप के, बिना किसी पालने वाले के, अपने आप पलने वाला माध्यम बन चुका है और उस पर नामुमकिन रोक-टोक की कोशिश भारत की आज की सरकार को ऐसा बताती है मानो उसके पास लुकाने-छुपाने को बहुत कुछ है।

हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर हमले उन्हीं लोगों पर होते हैं जो जिंदगी में कुछ बने हुए हैं। ऐसे लोग वहां पर झूठ का पर्दाफाश कर सकते हैं बजाय अदालतों के। लेकिन कुछ मामलों में अगर बदनीयत हमलावर, कानून तोड़ते हुए कुछ लिखते हैं, तो वे अपनी मुसीबत का सामान खड़ा कर रहे हैं। अधिकार और जिम्मेदारी को मिला-जुलाकर ही देखा जा सकता है और ऐसा कुछ भी करते हुए हुसैन को याद रखना चाहिए जो अपने वतन लौटने के बजाय परदेस में ही गुजर गए, हिंदुस्तानी जेल के बजाय। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


01-Aug-2021 3:16 PM (301)

सोशल मीडिया पर एक लाइन अभी पढऩे मिली कि एक दुख भरी शादी के मुकाबले बिना दुख वाला तलाक बेहतर होता है। बात एकदम खरी है और उन देशों या समाजों के लिए इसकी अधिक अहमियत है जहां पर तलाक को एक बदनाम शब्द माना जाता है। हम यहां पर ऐसे समाज के तलाक की चर्चा नहीं कर रहे जहां मर्दों को ही इसका आसान हक हासिल और औरतों को यह हक मानो मिला हुआ नहीं है, तमाम लोगों की बात कर रहे हैं, जहां पर तलाक देना दोनों के ही हक की बात होती है. वहां पर एक तकलीफ और यातना भरी हुई शादीशुदा जिंदगी को ढोने के बजाय उससे आजाद होकर अकेले होना और फिर आगे की अपनी जिंदगी को खुद तय करना किस तरह बेहतर होता है इसे समझने की जरूरत है।

हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में जब शादी के बाद लडक़ी को घर से विदा किया जाता है तो उसे रवानगी के तोहफे की शक्ल में एक नसीहत दी जाती है कि डोली मां-बाप के घर से उठ रही है, अब अर्थी ससुराल से उठना चाहिए। इसे एक अच्छी महिला होने का पैमाना माना जाता है कि वह ससुराल में मर-खप जाए, तकलीफ की जिंदगी गुजार ले, या तनाव को बर्दाश्त कर ले, लेकिन उसे छोडक़र कभी ना निकले। बहुत से भाई इस बात के हिमायती अधिक दूर तक होंगे कि लडक़ी लौटकर मां बाप के घर कभी ना आए क्योंकि मां-बाप तो अपना वक्त गुजार कर रवानगी डाल देंगे, और उसके बाद लौटी हुई बहन भाइयों की ही जिम्मेदारी रह जाएगी। उसके बाद उस बहन के अगर बच्चे हुए तो उनकी भी जिम्मेदारी भाइयों के परिवार पर आएगी, और कानून की अगर बात करें तो लडक़ी मां-बाप की दौलत में बराबरी की हकदार भी होती है, इसलिए भी हो सकता है कि भाइयों में बहन के लौटने के नाम से ही दहशत होने लगे। ऐसे में हिंदुस्तान के अधिकतर समाज में लडक़ी से ससुराल की ज्यादतियां बर्दाश्त करने की उम्मीद की जाती है। चाहे वह यातना झेलते-झेलते मानसिक रोगी ही क्यों न हो जाये, वह खुदकुशी ही क्यों न कर ले, या उसकी दहेज हत्या ही क्यों ना हो जाए. आमतौर पर लडक़ी के मां-बाप, उसके भाई इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि वह किसी तरह ससुराल में एडजस्ट हो जाए, वहां उसका तालमेल बैठ जाए।

लेकिन जब हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं और एक नजरी सर्वे सा करते हैं कि कौन सी लड़कियां ऐसी हैं जो तनाव को बाकी जिंदगी झेलने के बजाय, एक सीमा तक झेलने के बाद ससुराल और शादी के बंधन से निकलने की हिम्मत जुटा पाती हैं? ऐसा सोचने पर आसपास दिखता यह है कि या तो बहुत संपन्न परिवारों की ऐसी लड़कियां जिनके मां-बाप, भाई उनके साथ में खड़े हुए हैं, वे बाहर निकलने का हौसला जुटा पाती हैं, या फिर मजदूर तबके की ऐसी महिलाएं जिन्हें घर लौटने के बाद में एक कोठरी में अपनी कमाई पर जीने की हिम्मत रहती है, वह भी शादी को तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत दिखा पाती हैं। लेकिन इनसे परे तलाक के मामलों में बाकी महिलाओं का हौसला कुछ कम दिखाई पड़ता है, और केवल वही महिलाएं तलाक का हौसला कर पाती हैं, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहती हैं. यह निष्कर्ष किसी सर्वे पर आधारित नहीं है केवल आसपास के मामलों को देखते हुए ऐसा लगता है कि आर्थिक रूप से संपन्न महिला यातना के सिलसिले को तोडऩे का हौसला जुटा पाती है। इसलिए यह बात बहुत मायने रखती है कि शादी के पहले ही हर लडक़ी को आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जाए ताकि उसके मायके के लोग अगर उसका साथ न भी दें तो भी वह अपने दम पर जिंदा रह सके।

अपने दम पर जिंदा रह सके यह बात तो सोचने का मतलब किसी कोने से भी यह सुझाना नहीं है कि शादी के बाद लडक़ी को उसके मायके की संपत्ति में हिस्सा ना मिले या तलाक के बाद उसके पति और ससुराल से उसे बराबरी की एक जिंदगी जीने का इंतजाम ना मिले। हम इन दोनों इंतजामों के साथ-साथ यह बात सुझाना चाहते हैं कि हर लडक़ी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना उसके परिवार और समाज इन दोनों के लिए भी जरूरी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसी सरकारें जो कि गरीब लड़कियों की शादी में सरकार की तरफ से समारोह का इंतजाम करती हैं, और घर बसाने के लिए कुछ सामानों का तोहफा भी देती हैं, उन्हें ऐसे लुभावने रस्म-रिवाज का जिम्मा उठाने के बजाय महिलाओं की आत्मनिर्भरता के बारे में कुछ अधिक सोचना चाहिए, और करना चाहिए। सोचने की जरूरत है कि किसी वजह से कोई लडक़ी या महिला अकेले रह जाए, तो उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सरकार क्या कर सकती है?

हिंदुस्तान के ही केरल जैसे प्रदेश को देखें तो वहां ना केवल पढ़ाई-लिखाई बल्कि कई किस्म की पेशेवर ट्रेनिंग का ऐसा इंतजाम है कि केरल के कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं रह जाते। पूरे हिंदुस्तान में मेडिकल ढांचे में जितने किस्म के तकनीकी काम रहते हैं, उनमें केरल से निकले हुए लोग बड़ी संख्या में दिखते हैं। उनके अलावा अंग्रेजी का डिक्टेशन लेने या अंग्रेजी टाइप करने जैसे कामों के लिए भी केरल के लोग बहुत दिखते हैं। फिर बड़ी-बड़ी मशीनों को चलाने में दिखते हैं, उनकी मरम्मत में दिखते हैं। जहां पर पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ हुनर सिखाने का इंतजाम भी होता है, वहां सभी लोग आत्मनिर्भर हो जाते हैं। हमारा यह मानना है कि एक आत्मनिर्भर समाज ही आत्मसम्मान से भरा हुआ समाज हो सकता है, और ऐसा ही समाज यातनामुक्त भी हो सकता है, क्योंकि वहां लोग मजबूरी के संबंधों को ढोने के बजाय बाहर निकलकर अपने दम पर जीने की एक संभावना तो देखते ही हैं।

हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है, वह बताता है कि कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानो लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है, उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ-साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर लाद दिया जाता है, उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है, और उसका आत्मविश्वास, उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं भी रहती हैं कि औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात माना जाता है। मतलब यह कि औरत अपने पति की मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ ही उसके प्रतीकों को उतार हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है कामा वह बताता है की कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानव लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर ला दिया जाता है उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है और उसका आत्मविश्वास उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं सी रहती हैं की औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात मानी जाती है। मतलब यह की औरत अपने पति कि मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ है ही उसके प्रतीकों को उतार दे, तोड़ दे, और पोंछ दे।

एक महिला के दिमाग में यह बैठा दिया जाता है कि शादी सात जन्मों का संबंध रहता है। इसलिए वह एक जन्म के बाद भी इस बंधन से आजाद होने की नहीं सोच पाती। ऐसी मानसिकता के बीच जरा भी हैरानी की बात नहीं रहती कि कोई महिला पूरी जिंदगी शादीशुदा जिंदगी की यातनाओं को ढोते हुए मर-खप जाती है, और शायद ही कभी अपने मां-बाप के घर पर दोबारा अपना हक पाने के लिए लौट पाती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता से परे एक लडक़ी के सामाजिक और पारिवारिक का हक पर भी खुलकर बात होनी चाहिए और इस सोच को जगह-जगह कुचलना चाहिए कि मां-बाप के घर से बस डोली ही निकलती है, और अर्थी तो ससुराल से ही निकलेगी।

हिंदुस्तान के कानून में लडक़ी को मां-बाप की दौलत पर बराबरी का हक दिया गया है, और शादी के खर्च या दहेज को इस हक का विकल्प मान लेना नाजायज बात तो होगी। यह समझने की जरूरत है कि समाज में प्रचलित इस धारणा को भी जगह-जगह धिक्कारना चाहिए कि दहेज के साथ लडक़ी का हक देना पूरा हो जाता है। मां-बाप लडक़ी की शादी पर खर्च अपनी शान शौकत के लिए करते हैं। और दहेज लेना-देना तो वैसे भी जुर्म के दर्जे में आता है और इस सिलसिले को खत्म करना जरूरी है। कोरोना और लॉकडाउन के पूरे दौर में शादियों में 25-50 लोगों का ही बंधन रहा, और वैसे में भी लोगों ने शादियां कर दीं, समारोह कर दिए।

इसलिए अब एक कानून बनाकर प्रदेश सरकारों को भी अतिथि नियंत्रण लागू करना चाहिए ताकि लड़कियों के मां-बाप पर दिखावे की शान-शौकत का जलसा करने का बोझ भी ना रहे। ऐसा करके कानून एक ऐसा माहौल खड़ा करने में मदद कर सकता है जिसमें लड़कियों के नाम पर खर्च दिखाने के लिए शानशौकत की दावत दर्ज कर ली जाए, जिनसे उस लडक़ी को अपनी किसी मुसीबत के वक्त कोई मदद तो मिलती नहीं है। इसलिए लडक़ी के हक और उसकी आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर समाज में व्यापक चर्चा जरूरी है, अलग-अलग कई मंचों पर इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए, और ऐसी बात जब अधिक होती है तो वह नीचे तक भी उतरती है. सामाजिक मंचों को ऐसी बहस छेडऩी चाहिए ताकि लोगों के दिल-दिमाग में बैठे हुए पुराने ख्यालात निकल भी सकें, और नई कानूनी बातें घुस भी सकें।

हिंदुस्तान जैसे समाज में लडक़ी और महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता को उनके बुनियादी मानवाधिकार मानना चाहिए। और उनकी ऐसी आत्मनिर्भरता उनके बच्चों की परवरिश के लिए भी एक बेहतर नौबत रहती है, जब बच्चे रिश्तेदारों से किसी मदद के मोहताज नहीं रहते, और अपनी मां की कमाई पर अच्छे से जिंदा रह सकते हैं. ऐसा समाज ही एक बेहतर समाज भी बन सकता है जिसमें एक महिला आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो, और आत्मविश्वास से भरी हुई हो।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


25-Jul-2021 5:25 PM (145)

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दिल्ली प्रवास की खबर से राजनीति में गर्मी आ गई है कि क्या वे अगले चुनाव को लेकर अपने आपको एक सर्वमान्य विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं? और ऐसी अटकलबाजी के पीछे, अभी हाल में ही तृणमूल कांग्रेस के शहीदी दिवस की रैली में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से गैर एनडीए विपक्षी दलों को एक होने का आह्वान किया था और कहा था कि अब कुल ढाई-तीन बरस बाकी हैं, और लोग अगर भाजपा को हटाना चाहते हैं तो उन्हें गठबंधन बनाकर साथ में काम करना चाहिए। ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी पर हमला करते हुए कहा था कि यह सरकार देश में एक निगरानी राज बनाना चाह रही है। यह बात पेगासस नाम के निगरानी सॉफ्टवेयर को लेकर उन्होंने कही, और निगरानी की ऐसी बातें भाजपा के कुछ बंगाल के नेता भी पिछले दिनों कह गए हैं, जिसमें एक नेता ने सार्वजनिक रूप से एक पुलिस अधीक्षक को धमकी दी कि वह किससे बात करते हैं उसके पूरे कॉल डिटेल्स उनके पास मौजूद हैं, और वह आईपीएस अफसर हैं, और क्या वह कश्मीर तबादला चाहते हैं? बंगाल के बहुत से नेताओं के साथ दिक्कत यह है कि वे जुबानी हमले करते हुए यह नहीं समझ पाते कि उनकी कही हुई बातें कैसे उनके ही लिए आत्मघाती साबित होंगी, क्योंकि ऐसी सार्वजनिक धमकी देकर इस नेता ने खुद ही को एक पुलिस जांच में उलझा लिया है। खैर हम यहां पर बंगाल की राजनीति पर अधिक बात करना नहीं चाहते क्योंकि हम राष्ट्रीय स्तर पर ममता की संभावनाओं पर बात करना चाहते हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर ममता से परे की संभावनाओं पर भी।

दरअसल कुछ दिन पहले जब ममता बनर्जी के विधानसभा चुनाव तक के रणनीतिकार प्रशांत किशोर मुंबई जाकर दो बार शरद पवार से मिले, और उसके बाद दिल्ली आकर 10 जनपथ में उन्होंने जिस तरह से सोनिया, राहुल, और प्रियंका, इन सबसे मुलाकात की, उससे भी ये अटकलें आगे बढ़ीं कि क्या वे भाजपा के खिलाफ देश में कई पार्टियों के मोर्चे के लिए कोशिश कर रहे हैं? और सच तो यही है कि आज जब कभी इस देश में लोग मोदी सरकार से थककर, या नाराज होकर, उसे हटाने के बारे में बात करते हैं, तो पहला सवाल यही खड़ा होता है कि मोदी का विकल्प कौन है? भारत की राजनीति में इसे टीना फैक्टर कहते हैं, टीना का मतलब देयर इज नो अल्टरनेटिव। अब बात एक किस्म से सही भी है कि मोदी ने पिछले करीब 10 बरस में अपने आपको इस देश का ‘एक सबसे बड़ा’ नेता साबित करते हुए, अपने आपको ‘सबसे बड़ा नेता’ स्थापित कर दिया है। हम इसे इतिहास में मोदी की जगह नहीं बता रहे हैं, बल्कि आज की भारतीय चुनावी राजनीति में मोदी की स्थिति को बयान कर रहे हैं।

मोदी के बारे में उनके आलोचक भी जब मूल्यांकन करने बैठते हैं, और इतिहास में मूल्यांकन नहीं, आने वाले अगले आम चुनाव में उनकी चुनावी संभावनाओं के मूल्यांकन में, तो उन्हें भी लगता है कि मोदी जैसा कोई नहीं। उनमें से कुछ लोग लिखते भी हैं कि मोदी को खुद मोदी ही हरा सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जनसंघ से लेकर भाजपा के इतिहास तक के सबसे बड़े नेता रहे अटल बिहारी वाजपेई ने मोदी की गुजरात सरकार को राजधर्म का पालन न करने वाली सरकार माना था, उसके बाद भी मोदी पार्टी के भीतर के मोर्चे पर जीते, और उसके बाद गुजरात में उन्होंने दो-दो चुनाव जीते। इसलिए मोदी को लेकर जल्दी में कोई मूल्यांकन करना गलत होगा क्योंकि हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ है जिसने चुनाव जीतने की मशीन चलाने में ऐसी महारत हासिल की हो। बल्कि यह मशीन भी मोदी की ही बनाई हुई है, जो जानते हैं कि किस तरह भारत में मतदान के दिन भारत के चुनाव आयोग की नजरों और उसके काबू से परे जाकर नेपाल और बांग्लादेश में दिन भर मंदिरों का दौरा करके भी टीवी स्क्रीन के मार्फत हिंदुस्तान में चुनाव प्रचार किया जा सकता है। इसलिए यह बात अपने आपमें सही है कि चुनाव प्रचार के मामले में मोदी जैसा अब तक न कोई था, और न आज कोई है।

जब मोदी के विकल्प के बारे में सोचा जाए तो जो चेहरे सामने दिखते हैं वहीं से बात हो सकती है, ममता बनर्जी ने जिस अंदाज में बंगाल का चुनाव लड़ा और मोदी और शाह की टीम को बुरी शिकस्त दी, उनके सारे दावों को गलत साबित किया, उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया, तो बंगाल के चुनावी नतीजे आने के साथ-साथ ममता की राष्ट्रीय संभावनाओं के बारे में भी चर्चा शुरू होनी थी। वह चर्चा श्रद्धांजलि और अभिनंदन के मंचों से की जाने वाले विशेषण से भरी चर्चा की हद तक तो शुरू हुई, लेकिन फिर लोगों को शायद उसमें कोई दम नहीं दिखा। ममता बनर्जी जिस तरह बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और वामपंथियों दोनों को बुलडोजर से कुचल चुकी हैं, उसके बाद सवाल यह भी उठता है कि ये दोनों पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी को कितना बड़ा नेता बनाना चाहेंगी? और फिर वामपंथी तो ऐसे हैं जिनके पास केरल, बंगाल और त्रिपुरा जैसे गिने-चुने तीन राज्य ही थे, और अगर वामपंथियों की कोई संभावना केरल के बाद बचेगी तो हो सकता है कि उसमें बंगाल को वे गिनकर चल रहे हों, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए भी वामपंथी ममता बनर्जी के साथ किसी एक गठबंधन में आएंगे ऐसा मुमकिन नहीं दिखता है।

दूसरी तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जाहिर तौर पर देश के सबसे बुजुर्ग, और शायद सबसे वरिष्ठ भी, गैर भाजपाई, गैर एनडीए नेता हैं, और उनके बारे में भी ऐसी चर्चा चलती है कि वे मोदी के मुकाबले एक गठबंधन के मुखिया हो सकते हैं। लेकिन मतदाताओं के दिल को रिझाने वाली बातों को देखें तो शरद पवार के साथ भी दिक्कत यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली से परे आम जनता में उनका असर सीमित है। वे ममता के मुकाबले कुछ बेहतर हिंदी भाषी जरूर हैं, लेकिन हिंदी भाषण देना उनकी खूबी में कहीं नहीं है। यही दिक्कत ममता बनर्जी के साथ भी है। इसलिए मोदी के तेजाबी और जलते-सुलगते चुनावी भाषणों के मुकाबले ये दोनों नेता किसी किनारे भी नहीं टिक पाएंगे, इस बात को भूलना नहीं चाहिए।

अब बहुत से लोगों को यह लगता है कि भाजपा के अलावा कांग्रेसी एक ऐसी पार्टी है जो आज की अपनी दुर्गति में भी देश में सबसे अधिक फैली हुई पार्टी है, जिसका हर प्रदेश में अस्तित्व अभी भी बाकी है। हो सकता है कि बंगाल की तरह और राज्य भी हों जहां पर कांग्रेस का कोई भी विधायक न बचा हो, लेकिन उससे पार्टी संगठन खत्म नहीं हो पाया है और कांग्रेस एक पार्टी के रूप में अभी भी बची हुई है। कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आज जो अनिश्चितता बनी हुई है, वह कांग्रेस की संभावनाओं पर भारी पड़ रही है। राहुल गांधी में जो लोग मोदी के मुकाबले एक चेहरा देखते हैं, उनको यह समझने में दिक्कत होती है कि अभी तो राहुल गांधी के अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने का भी ठिकाना नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस के जो दो दर्जन बड़े नेता बागी तेवरों के साथ संगठन चुनाव की मांग कर रहे थे, उनमें से बहुत से लोग राहुल गांधी की फिर से अगुवाई के हिमायती ना हों। ऐसी हालत में राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए जैसे किसी गठबंधन का नेता बनने के पहले कांग्रेस के भीतर कांग्रेस का नेता तय होने की जरूरत रहेगी। इसलिए राहुल गांधी के बारे में मोदी के मुकाबले किसी संभावना को देखना उसी वक्त हो पाएगा जिस वक्त कांग्रेस के भीतर उनकी संभावनाएं औपचारिक रूप से तय और घोषित हो जाएं।

देश की जिन पार्टियों को मोदी के विकल्प के रूप में एक गठबंधन या एक नेता को तय करने के लिए अभी सही समय लग रहा है, उनकी सोच गलत नहीं है। लेकिन हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा पहले भी हो चुका है जब पहले एक गठबंधन बना हो उसने चुनाव जीता हो, चुनाव मुद्दों पर लड़ा और जीता गया हो, चुनाव तानाशाही के खिलाफ लड़ा गया हो और जीता गया हो, चुनाव सेंसरशिप या मनमानी या जुल्म के खिलाफ लडक़र जीता गया हो, और प्रधानमंत्री उसके बाद तय किया गया हो। हिंदुस्तान की राजनीति में चार से ज्यादा प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जिनके प्रधानमंत्री बनने के ठीक पहले तक कोई उनके बारे में अंदाज नहीं लगा सकते थे कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे। चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल, देवेगौड़ा, नरसिंह राव, और मनमोहन सिंह। अपने वक्त में इन सभी की संभावनाएं कभी ऐसी मजबूत नहीं थीं कि इनकी अगुवाई में कोई चुनाव लडक़र, इनके चेहरे को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके, कोई चुनाव जीता जा सकता था। लेकिन वक्त ऐसा आया कि इनमें से हर कोई प्रधानमंत्री बने, और मनमोहन सिंह तो दो-दो बार प्रधानमंत्री बने।

इसलिए हम आज राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के मुकाबले किसी चेहरे के तय होने को लेकर बहुत निराश नहीं हैं, और न ही हमें ममता बनर्जी की कोशिश या उनकी तरफ से प्रशांत किशोर की कोशिश अपरिपच् लग रही है कि अभी उसका समय नहीं आया है। ना सिर्फ अगला चुनाव लडऩे के लिए या कि प्रधानमंत्री बनने के लिए ऐसा गठबंधन होना चाहिए, बल्कि आज देश के सामने जो बहुत से खतरे खड़े हुए हैं, उनसे जूझने के लिए भी ऐसे गठबंधन की जरूरत है, और हो सकता है कि ऐसा कोई औपचारिक गठबंधन न भी बने लेकिन गैरभाजपा गैरएनडीए पार्टियों के बीच एक व्यापक तालमेल बनकर बात आगे बढ़ सके। ऐसे किसी तालमेल की जरूरत आने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी गैरभाजपाई दलों को पड़ सकती है जहाँ अभी तक के माहौल में ऐसे किसी तालमेल की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इसलिए ममता बनर्जी या शरद पवार की पहल हो सकता है भारतीय लोकतंत्र में एक मजबूत मोर्चे के रूप में मुद्दों को लेकर अगले ढाई बरस लडऩे के काम आए, और उसके बाद के चुनाव में काम आए या ना आए यह एक अलग बात रहेगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


18-Jul-2021 1:42 PM (343)

सोशल मीडिया पर हर दिन कई समझदार दिखते लोगों का लिखा हुआ पढऩे मिलता है जिसमें इंसान की घटिया हरकतों, इंसान के तरह-तरह के जुर्म में इनको कोसने के लिए जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है। कहीं भेड़ की खाल ओढ़े हुए भेडि़ए का जिक्र होता है, तो कहीं आस्तीन के सांप का, तो कहीं रंगे सियार की बात होती है, तो कहीं घडिय़ाल के आंसुओं की। जानवरों के बारे में बड़ी मामूली सी जानकारी रखने वाले भी इस बात को जानते हैं कि इंसान अपनी खुद की कमीनगी को जानवरों की कुछ एक काल्पनिक खामियों के साथ जोडक़र मानो अपने पर लगी तोहमत को घटाना चाहते हैं।

अब इंसानों के किए हुए कामों को देखें तो लगता है कि जानवरों में भला कौन हैं जो ऐसे काम करते हैं? एक भी मिसाल जानवरों में ऐसी नहीं मिल सकती जो इंसानों की कमीनगी का मुकाबला कर सके। अब आज की एक खबर है कि उत्तर भारत के किसी एक गांव में एक बाप-बेटी खुले खेत में सेक्स कर रहे थे और लोगों ने घेरकर उनका वीडियो बनाया, उन्हें वहां से भगाया तो वह लोगों पर पथराव करने लगे। अब उनकी हिफाजत के लिए गांव में उनके घर के बाहर पुलिस तैनात की गई है वरना यह खतरा है कि गांव के लोग उन पर हमला कर सकते हैं। कल या परसों एक दूसरी खबर थी कि एक बेटे ने अपनी मां को मारकर उसकी किडनी और अंतडिय़ाँ बाहर निकाल लीं। अखबार में बैठे हुए यह भी समझ नहीं पड़ता कि इस तरह की हिंसा या इस तरह के जुर्म की कितनी खबरें छापी जाएं, उन खबरों में कितना खुलासा किया जाए। क्या उससे समाज को सावधान होने का मौका मिलेगा या इन खबरों का ही समाज पर बुरा असर पड़ेगा, यह तय करने में मुश्किल होने लगती है। जानवरों में कौन से ऐसे हैं जिनमें इस तरह की मिसालें मिल सकें?

इंसान कैसा-कैसा करते हैं, इसकी एक मिसाल कुछ सौ बरस पहले की अभी पढऩे मिली जब कोरोना से बचाव के लिए टीकों की खबर के साथ-साथ वैक्सीन के इतिहास पर भी छपा, और पढऩे मिला। इतिहास का ऐसा ही एक पन्ना 1803 के बरस का है जब दुनिया भर में स्मॉलपॉक्स बहुत बुरी तरह फैला हुआ था, और वह लोगों को बड़ी संख्या में मार भी रहा था, साथ-साथ उनके बदन पर गहरे दाग छोड़ रहा था, कई लोगों की आंखें खराब कर दे रहा था। वैसे में 1796 के आसपास एक ब्रिटिश डॉक्टर ने स्मालपॉक्स के संक्रमण से बचाव की एक तरकीब ढूंढी, और उसने यह पाया कि एक दूसरा संक्रमण कॉउपॉक्स ऐसा है जिससे संक्रमित लोगों को स्मालपॉक्स नहीं हो रहा था। उसने लोगों को स्मालपॉक्स संक्रमण से बचाने के लिए कॉउपॉक्स के वायरस देने शुरू किए, और ऐसे दुनिया की पहली वैक्सीन सामने आई।

इसका तरीका भी बड़ा आसान था, जिन लोगों को कॉउपॉक्स से संक्रमित किया जाता था, उनके बदन पर 9-10 दिनों में कुछ फोड़े हो जाते थे, और दूसरे लोगों के बदन में खरोंच लगाकर उन फोड़ों का पानी निकाल कर उन्हें छुआ दिया जाता था, तो वे लोग भी कॉउपॉक्स से संक्रमित हो जाते थे, लेकिन स्मालपॉक्स के संक्रमण से बच जाते थे जो कि जानलेवा और बहुत अधिक खतरनाक संक्रमण था।

अब इसमें दिक्कत यह आ रही थी कि संक्रमित लोगों के फोड़ों से निकलने वाला पानी बहुत दूर तक नहीं ले जाया जा सकता था। उसे कुछ सौ किलोमीटर ले जाते हुए भी उसका असर खत्म हो जाता था। ऐसे में यूरोप से अमेरिका अगर यह संक्रमण ले जाना हो ताकि अमेरिका में बुरी तरह फैले हुए स्मालपॉक्स का संक्रमण रोका जा सके, तो उसकी कोई तरकीब नहीं निकल रही थी। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है विज्ञान का एक तकनीक से रिश्ता होता है इंसानियत से नहीं, इसलिए स्पेन के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने एक तरीका निकाल लिया। यह अनोखा प्रयोग था लेकिन उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया।

1803 में स्पेन के राजा की इजाजत से वहां के दो दर्जन अनाथ बच्चों को छांटकर एक जहाज पर सवार किया गया। राजा की सोच जनकल्याणकारी थी इसलिए उसने इन बच्चों के खाने-पीने का और इनके रखरखाव का अच्छा इंतजाम किया। जहाज के रवाना होने के ठीक पहले डॉक्टरों ने इनमें से दो बच्चों के शरीर में कॉउपॉक्स का संक्रमण डाल दिया। समंदर में सफर के बीच नौ-दस दिनों में इन दो बच्चों की बाहों पर लगाए गए इस टीके के जख्म फोड़ों में तब्दील हो गए और जहाज पर तैनात डॉक्टरों ने इन्हें फोडक़र इसमें से पानी निकालकर दो दूसरे बच्चों की बाहों में खरोंच लगाकर उसमें इसका संक्रमण डाल दिया। अगले नौ-दस दिनों के बाद ये दो बच्चे अपने संक्रमित फोड़ों के साथ तैयार थे, और फिर यही सिलसिला तब तक चलते रहा जब तक जहाज अमेरिका नहीं पहुंच गया। अमेरिका पहुंचने पर सिर्फ आखिरी बच्चे की बाहों में एक फोड़े में पानी था, और डॉक्टरों ने जहाज से उतरते ही उससे संक्रमित पानी निकाल कर दूसरे बच्चों का टीकाकरण शुरू कर दिया जिन पर कि स्मालपॉक्स का खतरा दूसरी उम्र के लोगों के मुकाबले अधिक था। अब अगर देखा जाए कि ये अनाथ बच्चे बिना किसी की इजाजत के इस तरह से वैक्सीन खच्चर की तरह इस्तेमाल किए गए, और इनमें से कुछ बच्चे जहाज पर मर भी गए। तो आज वैक्सीन के कारखानों से निकलकर फ्रीजर जैसी गाडिय़ों में लदकर वैक्सीन दूर-दूर तक जाती है, और एक वक्त यह काम इन अनाथ बच्चों से करवाया गया जिन्होंने इन वैक्सीन को अपने बदन में ढोया, और अपनी जिंदगी की कुर्बानी दी।

जो लोग बात-बात पर इंसान की खामियों के लिए जानवरों की मिसालें ढूंढ लेते हैं, उन लोगों को चाहिए कि इंसान की इस कमीनगी के टक्कर की कोई मिसाल जानवरों में ढूंढकर बताएं। पंछी भी हजारों किलोमीटर उडक़र कई देश पार करके हर बरस किसी एक देश पहुंचते हैं, और मौसम बदलने पर फिर वापस अपने देश आ जाते हैं, लेकिन न वे इंसानों की तरह किसी दूसरे जानवर की पीठ पर सवार होकर आते हैं, और न ही आते जाते हुए किसी दूसरे का हक का खाते हैं। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि दुनिया के इतिहास में उसके हर दौर में इंसान जितने तरह के बुरे काम करते रहा है, उसकी कोई मिसाल इंसानों से परे कहीं देखने नहीं मिलेगी। दुनिया का इतिहास जुल्म से भरा हुआ है और हर जुल्म के लिए महज इंसान जिम्मेदार रहे हैं।

अपने आसपास के लोगों को कैदी बनाकर गुलाम बनाकर उन्हें बाजारों में नीलाम करना, उनसे जानवरों या मशीनों की तरह काम लेकर उन्हें खत्म कर देना, और उन्हें फेंक कर फिर से दूसरे गुलाम खरीद लेना ऐसे कितने ही काम बड़े आम तरीके से इंसान करते हैं।
 
अभी हाल के बरसों तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तक जापान ने कई दूसरे देशों में अपनी फौज के लोगों के लिए वहां की स्थानीय लड़कियों और महिलाओं को रखकर चकलाघर बना दिए थे, और उनका मनचाहा शोषण करने के बाद सैनिक अपने देश लौट आए वहां पर अपनी एक अगली पीढ़ी छोडक़र। ऐसा ही अमेरिकी फौजियों ने वियतनाम में किया था, ऐसा ही तालिबान आज अफगानिस्तान में कर रहे हैं जहां वे विधवाओं और लड़कियों की लिस्ट बनाकर विधवाओं को अपने सैनिकों के हवाले कर रहे हैं ताकि वे उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकें। खूब बढ़-चढक़र जानवरों के खिलाफ लिखने वाले इंसानों को जानवरों में ऐसी कोई मिसाल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए और नाकामयाब होने पर कम से कम आगे जानवरों के खिलाफ अपनी हैवानियत नहीं दिखानी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


11-Jul-2021 5:35 PM (333)

जनसंख्या नियंत्रण हिंदुस्तान में हमेशा से एक बड़ा नाजुक मुद्दा रहा है और खासकर इमरजेंसी के दौरान देश की आबादी को काबू में लाने के लिए संजय गांधी की अगुवाई में इंदिरा सरकार ने जिस तरह की ज्यादतियां की थीं, उनसे हमेशा के लिए यह एक जुल्म की तरह देखा जाने लगा है। आज हालत यह है कि जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन शब्द का इस्तेमाल भी समझदार सरकारें नहीं करती हैं। लेकिन अभी जनसंख्या नियंत्रण इसलिए चर्चा में है कि भाजपा की सरकारों वाले दो प्रदेशों में जनसंख्या पर काबू पाने के लिए कुछ नियम लागू करने की तैयारी चल रही है, इनमें से एक असम है जहां पर अभी-अभी भाजपा सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में लौटी है और जिसके ऊपर चुनाव का कोई दबाव नहीं है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश है जहां पर भाजपा सरकार अगले बरस चुनाव का सामना करने जा रही है और उसे एक खास राजनीतिक मकसद से अपना यह रुख दिखाना है कि वह बढ़ती हुई आबादी के खिलाफ है, और जनसंख्या को घटाने के लिए जो नियम वहां पर बनाए जा रहे हैं उन नियमों को लेकर हिंदू मतदाताओं के बीच एक धार्मिक ध्रुवीकरण की नीयत भी सरकार की दिख रही है। 

इस मामले को लेकर भाजपा सरकारों के ऊपर यह साफ तोहमत लग रही है कि उसके निशाने पर मुस्लिम समुदाय है जिसमें बच्चों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात के मुकाबले कुछ अधिक रहता है. और फिर एक बात जो मुस्लिमों के खिलाफ राजनीतिक रूप से उठती है वह यह भी रहती है कि इस समाज में एक से अधिक शादियां कानूनी हैं और हर शादी में कई बच्चे पैदा हो सकते हैं. एक लुभावना सांप्रदायिक नारा मुस्लिमों के खिलाफ यह भी चलता है कि चार बीवी और 16 बच्चे इस रफ्तार से एक दिन हिंदुस्तान में मुस्लिम ही बहुसंख्यक रह जाएंगे। जबकि आंकड़ों की हकीकत इसके खिलाफ है और मुस्लिमों के भीतर भी बड़ी रफ्तार से आबादी के बढ़ने में गिरावट आ रही है, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि मुस्लिम समाज में आबादी बढ़ना धीरे-धीरे राष्ट्रीय अनुपात के बराबर पहुंच जाएगा। फिर भी जब धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करना हो तो चार बीवियां और 16 बच्चे की एक संभावना या आशंका जताना एक लुभावना नारा बनता ही है।

उत्तर प्रदेश में एक शादीशुदा जोड़े के 2 बच्चों की नीति लागू करने पर बहस चल रही है और असम लागू कर चुका है। इसमें यह कहा गया है कि 2 बच्चों से अधिक बच्चे पैदा करने वाले जुड़े स्थानीय चुनावों के चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकेंगे, यानी वे पंचायत और म्युनिसिपल के चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य भी है, और इस राज्य में जनसंख्या बढ़ने की दर भी देश में सबसे अधिक 2 राज्यों में से एक है, पहले नंबर पर बिहार है जहां 3.3 फ़ीसदी की जनसंख्या बढ़ोतरी है और उत्तर प्रदेश में 2.9 की जनसंख्या बढ़ोतरी है। आज देश में राष्ट्रीय जनसंख्या बढ़ोतरी 2.2 है जो कि 1950 में 5.9 थी। कुछ और आंकड़ों को देखें तो वे आंकड़े यह बताते हैं कि 1970 से 1980 के बीच के दशक में हिंदुस्तान में जनसंख्या बढ़ोतरी 2.2 से बढ़कर 2.3 से भी अधिक हो चुकी थी और दशक के आखिर तक वहीं पर बनी रही थी। यही वह दौर था जब संजय गांधी ने अपने सारे आक्रामक तानाशाह तेवरों के साथ परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू किया था और सड़कों पर पकड़-पकड़कर गैरशादीशुदा लोगों की भी नसें काट दी जा रही थीं। ऐसा माना जाता है कि इमरजेंसी के बाद कांग्रेस सरकार के खत्म होने और दफन होने के पीछे नसबंदी एक सबसे बड़ी वजह थी।

अब यह समझने की जरूरत है की उत्तर प्रदेश जिस अंदाज में यह जनसंख्या नियंत्रण विधेयक ला रहा है उसके तहत दो बच्चों तक सीमित रहने वाले सरकारी कर्मचारियों को 2 अतिरिक्त वेतन वृद्धि या मिलेंगी छुट्टियां अधिक मिलेंगी और पेंशन में बढ़ोतरी होगी। दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले लोग सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे और किसी परिवार को रियायती राशन सिर्फ सिर्फ चार लोगों के लायक मिलेगा। दो बच्चों से अधिक के मां-बाप म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे और ना ही सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकेंगे, ना ही उन्हें सरकारी सब्सिडी का फायदा मिल सकेगा। उत्तर प्रदेश सरकार इस नई व्यवस्था में यह भी कह रही है कि अगर कोई आम परिवार एक बच्चे की नीति अपनाकर नसबंदी करा लेंगे तो उन्हें एक बेटा होने के बाद एकमुश्त 80 हजार रुपये, और एक बेटी के बाद नसबंदी होने पर सीधे एक लाख रुपये की आर्थिक मदद होगी। असम का मामला भी कुछ इसी तरह का है वहां जनसंख्या बढ़ोतरी बहुत तेजी से तो नहीं हो रही है लेकिन राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा का कहना है कि राज्य के कुछ हिस्सों में जनसंख्या विस्फोट है और यह राज्य के विकास में बाधा हो सकता है।

अब अगर हम भाजपा की साख को 2 मिनट के लिए अलग रखें कि उसके बहुत सारे कार्यक्रम मुसलमानों को निशाने पर रखकर बनाए जाते हैं या हिंदुओं को फायदा देने के लिए बनाए जाते हैं, तो हमें इस बात को देखना होगा कि बढ़ती हुई आबादी से किसका फायदा हो रहा है? क्या उत्तर प्रदेश और असम के, या देश में सबसे अधिक तेज रफ्तार से आबादी बढ़ाने वाले बिहार के मुस्लिम समुदाय में अधिक बच्चे होने से कोई फायदा हो रहा है? मुस्लिमों के बीच पढ़ाई-लिखाई कम है, उनके अधिकतर लोग मिस्त्री-मैकेनिक जैसे छोटे काम में ही सीमित रह जाते हैं, ड्राइवर-कंडक्टर जैसे कम हुनर वाले काम तक उनकी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। मुस्लिम आबादी का कम अनुपात ही उच्च शिक्षा पाकर बेहतर रोजगार तक पहुंच पाता है। और यह बात महज मुस्लिमों तक सीमित नहीं है दूसरे लोगों पर भी लागू है कि अधिक बच्चे होने से उन्हें आज बेहतर शिक्षा देना नामुमकिन सा हो गया है. किसी भी पार्टी के राज वाले प्रदेश में सरकारी स्कूलों में पाई गई शिक्षा बच्चों को उच्च शिक्षा के बड़े मुकाबलों के लायक तैयार नहीं कर पाती हैं और महंगी निजी स्कूलों के बाद महंगे कोचिंग इंस्टीट्यूट से होकर ही बच्चे इन बड़े मुकाबलों के लायक अपने आपको पाते हैं। इस बात के खिलाफ कई किस्म के अपवाद गिनाए जा सकते हैं लेकिन हम अभी व्यापक आंकड़ों से निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर यह कह सकते हैं कि किसी भी जात और धर्म के परिवारों में जितने अधिक बच्चे होते हैं उनके अच्छे पढ़ने की संभावना उतनी ही कम हो जाती है, उनके अच्छे खाने पीने की संभावना भी उतनी ही कम हो जाती है, उनके अच्छे रहन-सहन की संभावना भी उतनी ही कम हो जाती है। इसलिए परिवार में बच्चों की गिनती कम होना हर जाति और धर्म के लिए एक बेहतर नौबत है। 

सवाल यह है कि अगर मुस्लिम समाज में अधिक बच्चों की अभी तक चली आ रही प्रथा पर असम या उत्तर प्रदेश के इन नए नियमों से कोई नया वार होने जा रहा है? यह समझने की जरूरत है कि यह वार है, या इन समुदायों के लिए फायदे की बात है? हम इन समुदायों को, खासकर मुस्लिम समुदाय को जब देखते हैं, तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि एक मुस्लिम महिला की अपनी इच्छा की बहुत अधिक जगह मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के भीतर नहीं है, और एक मुस्लिम महिला से कितने बच्चे पैदा हों, इन्हें आमतौर पर उसके शौहर को ही तय करने दिया जाता है। ऐसे में यह नई व्यवस्था अगर मुस्लिम समाज के कुछ लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित या मजबूर करती है, तो इससे कम से कम उतने परिवारों में मुस्लिम महिला की स्थिति भी बेहतर होगी, जो आज ना केवल अधिक बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर है बल्कि अधिक बच्चों की देखभाल करने के लिए, उन्हें बड़े करने के लिए, और फिर उन बच्चों की बाकी जिंदगी फिक्र करने के लिए भी मजबूर हैं। आज चाहे मुस्लिम समाज में अधिक बच्चों को पैदा करने की आजादी इस नए कानून के तहत कुछ सीमित होने जा रही है, तो भी यह सोचने की जरूरत है कि यह सीमा किसके लिए नुकसानदेह है और किसके लिए फायदेमंद है? 

अगर एक मुस्लिम का परिवार छोटा होगा तो उससे उसी का फायदा है, उसके बचे हुए पैसों से हिंदू समाज का कोई फायदा होने नहीं जा रहा है। अगर मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति को अधिक बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी है, तो उसे पंच-सरपंच का चुनाव लड़ने नहीं मिलेगा, उसे वार्ड या महापौर का चुनाव लड़ने नहीं मिलेगा, उसे सरकारी नौकरी के लिए अर्जी देने नहीं मिलेगा, लेकिन उसके बच्चे पैदा करने पर कोई रोक नहीं है। उसे सीमित बच्चों के लिए लिए रियायती राशन मिलेगा लेकिन यह संख्या हिंदू परिवार के लिए भी लागू होगी जहां पर दो से अधिक बच्चे होने पर कोई हिंदू भी चुनाव नहीं लड़ सकेगा या किसी हिंदू परिवार को भी रियायत राशन 2 बच्चों से अधिक के लिए नहीं मिल सकेगा। आज ऐसे हिंदू परिवार भी कम नहीं हैं, जहां पर बेटे की चाह में चार-चार, पांच-पांच बेटियां हो जाती हैं और उसके बाद बुढ़ापे में जाकर एक बेटा नसीब हो पाता है। ऐसे हिंदू परिवार भी चुनाव लड़ने या रियायती राशन पाने के हक से वंचित रह जाएंगे। इसलिए उत्तर प्रदेश और असम के यह कानून जिन लोगों को मुस्लिम समाज को चोट पहुंचाने वाले लग रहे हैं उन्हें लगते रहे, हम तो इन्हें मुस्लिम समाज के फायदे के कानून मान रहे हैं कि परिवार का आकार सीमित रखकर वे अपने कम बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सकते हैं, बेहतर खानपान दे सकते हैं, उनका इलाज करा सकते हैं और एक मुस्लिम महिला की हालत भी उससे बेहतर ही हो सकती है।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने भी पिछली भाजपा सरकार के दौरान यह व्यवस्था देखी हुई है कि जब पंच-सरपंचों के लिए 2 बच्चों की अनिवार्यता लागू की गई थी, और बहुत से ऐसे मामले हुए थे जिनमें तीसरा बच्चा पैदा होने के बाद पंच सरपंच की पात्रता खत्म कर दी जाती थी, उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता था. बाद में भाजपा सरकार के चलते हुए ही विरोध की वजह से इस व्यवस्था को बदला गया था। हमने उस वक्त भी लगातार इस बात को लिखा था कि यह व्यवस्था कई मायनों में नाजायज है। इसलिए नाजायज थी कि इसे लागू करने वाले विधायकों ने इसे अपने ऊपर लागू नहीं किया था। इसे सिर्फ गांव के पंच-सरपंच पर लागू किया गया था मानो गांव में पढ़ने वाली आबादी सांसदों और विधायकों के रास्ते बढ़ने वाली आबादी से अधिक खतरनाक होती है। 

खैर यह व्यवस्था खत्म हुई और आज उत्तर प्रदेश और असम में इसे लागू करने पर चर्चा हो रही है तो हम इस बात को साफ लिखना चाहते हैं कि यह व्यवस्था आज के बाद पैदा होने वाले बच्चों के परिवारों पर ही लागू होनी चाहिए, और अगर पहले से किन्हीं लोगों के दो से अधिक बच्चे हैं, तो उन पर यह व्यवस्था लागू नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह व्यवस्था स्थानीय संस्थाओं के बजाय देश के हर किस्म के चुनाव पर लागू होनी चाहिए और 9 बच्चों के मां-बाप सांसद या विधायक क्यों बन सकें अगर उन्हें पंच सरपंच बनने के लिए अपात्र माना जा रहा है, या जैसा कि उत्तर प्रदेश में शहरी निकायों में भी चुनाव के लायक नहीं माना जा जा रहा है। हमारा मानना है कि ऐसी असमान व्यवस्था असंवैधानिक होगी और इसे संसद और विधानसभा तक लागू करना ही होगा। सांसद और विधायक को अधिक बच्चे पैदा करने का सुख या मनमर्जी देने का कोई लोकतांत्रिक कारण नहीं हो सकता, और यह व्यवस्था सभी के लिए खत्म होनी चाहिए। 

हम खुद मुस्लिम समाज के हित के लिए यह बात चाहते हैं कि अगर वे अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं तो उन्हें अपने परिवार के आकार को सीमित रखने के लिए यह एक अच्छी वजह मिल रही है कि वह सरकारी नौकरी के हकदार बनने के लिए या किसी चुनाव को लड़ने के लिए अपने परिवार के आकार को सीमित रखें। जिन लोगों को किसी सरकारी रियायत की फिक्र नहीं है और जिन्हें अपने कितने भी बच्चों को पढ़ाने और उनका इलाज कराने की ताकत हासिल है, वह लोग जरूर जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं, और उसके बाद उन्हें कोई शिकायत भी नहीं होनी चाहिए। चुनाव की पात्रता पंचायत से लेकर संसद तक तक तक सब जगह लागू हो, और जनकल्याण की कुछ गरीब केंद्रित योजनाओं के लिए बच्चों की संख्या को कोई सीमा न बनाया जाए। बाकी इस कानून में हमको कोई बुराई नहीं दिख रही है और यह कानून लागू किया जाना चाहिए। जिन लोगों को यह लगता है कि यह कानून मुस्लिम समाज पर एक हमला है और वह मुस्लिमों के हितैषी होने के नाते उनके हक के लिए इस कानून का विरोध करना चाहते हैं तो ऐसे लोगों के लिए हमारा यह मानना है कि यह लोग मुस्लिम समाज के विरोधी हैं और यह मुस्लिम समाज के नुकसान का ही काम कर रहे हैं अगर यह उसके लोगों को बच्चों की संख्या सीमित रखना नहीं समझा पा रहे हैं।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


04-Jul-2021 3:47 PM (189)

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान और किरण राव ने तलाक लेने का फैसला किया है। दोनों ने एक साझा बयान जारी कर इसकी जानकारी दी- 

‘‘इन 15 खूबसूरत वर्षों में हमने एक साथ जीवन भर के अनुभव, आनंद और हँसी साझा की है और हमारा रिश्ता केवल विश्वास, सम्मान और प्यार में बढ़ा है। अब हम अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू करना चाहेंगे- अब पति-पत्नी के रूप में नहीं बल्कि एक-दूसरे के लिए सह माता-पिता और परिवार के रूप में। 

हमने कुछ समय पहले एक प्लांड सेपरेशन शुरू किया था और अब इस व्यवस्था को औपचारिक रूप देने में सहज महसूस कर रहे हैं। अलग-अलग रहने के बावजूद अपने जीवन को एक विस्तारित परिवार की तरह साझा करेंगे। 

हम अपने बेटे आजाद के प्रति समर्पित माता-पिता हैं, जिनका पालन-पोषण हम मिलकर करेंगे। हम फिल्मों, पानी फाउंडेशन और अन्य परियोजनाओं पर भी सहयोगी के रूप में काम करना जारी रखेंगे, जिनके बारे में हम भावुक महसूस करते हैं। 

हमारे रिश्ते में हुए इस विकास को लेकर मिले निरंतर सहयोग और समझ के लिए हमारे परिवारों और दोस्तों का बहुत-बहुत धन्यवाद जिनके बिना हम यह कदम लेने में इतने सुरक्षित महसूस नहीं करते। 

हम अपने शुभचिंतकों से शुभकामनाएं और आशीर्वाद की उम्मीद करते हैं और आशा करते हैं कि हमारी तरह आप इस तलाक को अंत की तरह नहीं बल्कि एक नए सफऱ की शुरुआत के रूप में देखेंगे। 
धन्यवाद और प्यार,
किरण और आमिर’’

फिल्म अभिनेता आमिर खान और उनकी पत्नी किरण राव ने शादी का यह रिश्ता खत्म करने की घोषणा की तो घोषणा की बातों से लोग हैरान हुए, और कुछ लोगों ने इस बारे में कई गंभीर बातें भी लिखीं। एक अखबारनवीस ने सोशल मीडिया पर सवाल किया कि इस बयान में लिखा गया है कि यह रिश्ता केवल विश्वास, सम्मान, और प्यार में बढा है, तो यह कैसे बढ़ा है जब यह तलाक तक पहुंच गया है? पहली नजर में यह सवाल बड़ा जायज लगता है क्योंकि हम आमतौर पर बहुत कड़वाहट और मुकदमेबाजी के साथ तलाक देखते आए हैं। लोगों के दिल-दिमाग में शादीशुदा जिंदगी को लेकर भी आम प्रचलन में चले आ रहा एक खास किस्म का खाका बैठे रहता है और उससे परे शादीशुदा जिंदगी को देखना मुमकिन नहीं रहता। धारणाएं इतनी मजबूत हो जाती हैं कि वे किसी भी किस्म की नई कल्पना को पास फटकने भी नहीं देतीं, इसलिए कोई शादीशुदा जिंदगी विश्वास, सम्मान, और प्यार बढऩे के बाद भी तलाक तक पहुंच जाए इस पर एकाएक भरोसा नहीं होता।

सच तो यह है कि शादीशुदा जिंदगी अपने आपमें एक बड़ी और कड़ी खींचतान के साथ चलने वाला एक बड़ा ही अस्वाभाविक किस्म का बंधन और सिलसिला है जिसे समाज ने गढ़ा है और जिसे समाज ने लोगों पर थोप दिया है, और समाज तलाक से इसलिए खफा रहता है कि समाज का अपना अस्तित्व शादीशुदा लोगों से ही चलता है। जिस तरह किसी धर्म के मानने वाले धर्मालु लोग या किसी आध्यात्मिक गुरु के अनुयायी न हों तो न वह धर्म बच सकेगा न वह आध्यात्मिक संप्रदाय बच सकेगा। इसी तरह अगर शादीशुदा जोड़े खत्म हो जाएंगे, शादी का चलन खत्म हो जाएगा, तो समाज व्यवस्था भी या तो पूरी तरह खत्म हो जाएगी या वह कुछ ऐसी हो जाएगी जो आज की समाज व्यवस्था से बिल्कुल अलग होगी। नतीजा यह होता है कि समाज अपनी सहूलियत के लिए विवाह नाम की संस्था को लोगों पर थोपते चलता है और जो लोग शादीशुदा जिंदगी में पडऩा नहीं चाहते, उनके लिए खासी दिक्कतें खड़ी करते चलता है।

शादीशुदा जिंदगी जाहिर तौर पर जिस तरह की वफादारी का दावा करती है और जैसी वफादारी की खाल ओढक़र वह जीना चाहती है, हकीकत उससे खासी अलग भी रहती है। और फिर दूसरी बात यह कि जब अपने-अपने दायरे के बहुत कामयाब लोग अपने काम के सिलसिले में ही बहुत से दूसरे बहुत ही आकर्षक और होनहार, हुनरमंद और कामयाब लोगों से मिलते हैं, तो शादीशुदा जिंदगी की बंदिशें कई बार दम घोटने वाली लगती हैं। नतीजा यह होता है कि लोग शादी के भीतर छटपटाने लगते हैं, बाहर कोई विकल्प या रास्ता देखने लगते हैं, या पास मौजूद किसी विकल्प की तरफ उनका ध्यान जाता है और शादी खटाई में पड़ जाती है। कई मामलों में ऐसा भी हो सकता है कि शादीशुदा जोड़े के दोनों भागीदार अपने आपमें बहुत हुनरमंद और कामयाब हों, अपने आपमें दौलतमंद भी हों, और उनकी उम्मीदों के आसमान भी बहुत बड़े हों। ऐसे में दोनों अपने-अपने रास्ते अलग तय कर सकते हैं, और हो सकता है कि दोनों एक साथ ऐसी दिमागी हालत में हों कि उन दोनों को ही अलग होना बेहतर लग रहा हो। दरअसल तलाक के सिलसिले में हम कड़वाहट की बुनियाद देखने के आदी हैं। इसी वजह से होता यह है कि बिना कड़वाहट के अगर तलाक हो रहा है तो वह हमें भरोसेमंद नहीं लगता। 

दरअसल आमिर खान और किरण खान अपने परिवारों और अपने बच्चे के अलावा और किसी के लिए इस तलाक को लेकर जवाबदेह भी नहीं हैं। ऐसे में अगर उन्होंने एक सार्वजनिक बयान दिया है तो उस बयान को गलत मानने के पहले लोगों के पास ऐसी वजह रहना चाहिए कि वे गलत क्यों कहेंगे? क्योंकि इस बयान के बाद इसकी वजह से इन दोनों का करियर कामयाबी की तरफ बढ़ेगा ऐसा भी कुछ नहीं है, और तलाकशुदा लोग नाकामयाब होने लगते हैं ऐसा भी कुछ नहीं है। ऐसे में उनकी कही हुई बात के शब्दों को ही हम उनकी भावना भी मानेंगे और यह बात पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगती कि लोगों के बीच प्यार, विश्वास, और सम्मान बढऩे के बाद भी हो सकता है कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रहने को गैरजरूरी मान रहे हों। ये दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं, लोग एक-दूसरे पर अधिक विश्वास भी कर सकते हैं, और अलग रहना बेहतर भी मान सकते हैं। 

दरअसल शादीशुदा जिंदगी को लेकर जो आम जनधारणा चली आ रही है वह इसके मुताबिक कुछ अटपटी साबित होती है और इसलिए लोग सोच पर कोई जोर डालने के बजाय लोगों को ही झूठ बोलता मान लेते हैं। दिलचस्प बात यह है कि आमिर खान की पहली और दूसरी, दोनों पत्नियां हिंदू थीं, और इसे लेकर भी आमिर खान को डबल लव जिहाद का कसूरवार ठहराते हुए लोग गालियां भी दे रहे हैं। जो लोग लगातार सार्वजनिक जीवन में रहते हैं, और जिनका पैसा शोहरत पर भी टिका रहता है, वह ऐसी बहुत सी बातों को सुनने के आदी रहते हैं, और क्योंकि इस जोड़े ने अपने अलग होने की बात को खुद होकर सार्वजनिक किया है, और तमाम बातें लोगों के सामने रखी हैं इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि लोग उस पर तरह तरह की प्रतिक्रिया करेंगे। फिल्मी दुनिया या सार्वजनिक जीवन के हर लोग अपने तलाक को लेकर ऐसे बयान जारी नहीं करते हैं, और अलग होना रहता है, तो अलग हो जाते हैं। इसलिए जब इन्होंने अपनी बातें लोगों के सामने रखी हैं तो लोग उन्हें अपने अपने पैमानों पर आंकेंगे ही। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


27-Jun-2021 12:23 PM (303)

छत्तीसगढ़ में अभी खबर वीडियो के साथ तैर रही है कि एक आदिवासी इलाके में महिला सरपंच का पति किस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, और कैसे एक म्युनिसिपल इलाके में महिला नगर पालिका अध्यक्ष का पति गुंडागर्दी कर रहा है। कानून बनने से महिला आरक्षित सीट पर महिला पंच-सरपंच, या पार्षद-महापौर बन जाती हैं लेकिन उनके नाम पर उनके पति ही दफ्तर चलते हैं, गुंडागर्दी करते हैं। महिला की सहमति बिना किस तरह वसूली-उगाही करते हैं। कानून ने गांव और शहर में तो महिला को बराबरी का दर्जा दे दिया है, लेकिन घर के भीतर वह गुलाम ही है। 

अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की सोच सचमुच ही हो तो कुछ बातों के बारे में सोचना जरूरी है। हममें से हर कोई अपने बचपन से ही स्कूलों में और दूसरे जलसों में यह देखते आए हैं कि किस तरह स्टेज पर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति को माला पहना रहे हैं या शॉल, या उन्हें कोई किताब, स्मृति चिन्ह भेंट कर रहे हैं।  इन सबको एक ट्रे में लेकर वहां सुंदर से कपड़ों में एक लडक़ी या महिला को खड़ा कर दिया जाता है। सौ फीसदी मामलों में इन्हें सजावट के सामान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इनकी और कोई भूमिका नहीं होती, इनका कहीं नाम भी नहीं लिया जाता, और इनकी तरफ कोई गौर से देखते तक नहीं हैं। तो एक मजदूर की ऐसी भूमिका में एक पुतले की तरह सजाकर किसी महिला को ऐसे खड़ा करना तमाम महिलाओं के अपमान से कम नहीं है। इस बारे में सोचना चाहिए कि न तो मुख्य अतिथि की भूमिका में आमतौर पर महिलाएं रहतीं, न ही किसी संस्था या संगठन के प्रमुख के रूप में मुख्य अतिथि का स्वागत करने वाली महिला रहती, और महिलाओं को इस स्टेज पर जगह आमतौर पर सिर्फ ट्रे थामे हुए सजावट के सामान की तरह मिलती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

एक ऐसी तस्वीर की कल्पना क्या की जा सकती है जिसमें मुख्य अतिथि कोई महिला हो, स्वागत करने वाली कोई महिला हो, और कोई पुरुष ट्रे में माला या गुलदस्ता लेकर मदद करने के लिए वहां खड़े हुए हो ? क्या ऐसा किया जा सकता है? इसकी कल्पना भी मुश्किल होगी क्योंकि हमें सांस्कृतिक रूप से यही समझाया गया है कि स्टेज पर दिया जलाने के लिए दीपक लेकर एक लडक़ी को या महिला को खड़े होना है, वह दिया जलाने वाले लोग आमतौर पर पुरुष होंगे। यह एक अलग बात है कि जिस प्रतिमा के सामने दिया जलाया जाएगा वह आमतौर पर एक महिला की होगी सरस्वती की। लेकिन सच तो यह है कि एक महिला को महत्व पाने के लिए हिंदुस्तान में आमतौर पर प्रतिमा बनना जरूरी होता है चाहे वह कोई धार्मिक प्रतिमा हो चाहे वह ओलंपिक से मेडल लेकर या अंतरिक्ष जाकर लौटी हुई भारतवंशी सुनीता विलियम्स हो। प्रतिमा के दर्जे पर पहुंचने के पहले सम्मान की कोई गुंजाइश नहीं है। स्कूल कॉलेज के बच्चों के सामने से स्टेज पर ट्रे थामे महिला का नजारा खत्म करना होगा, तभी इस पीढ़ी का दिमाग ठीक हो पायेगा। 

इन दिनों सोशल मीडिया पर महिलाओं को लेकर बहुत किस्म की बहस चल रही है, और कई महिलाओं ने खुलकर इस बात को लिखा है कि उनके परिवार के बुजुर्ग साफ-साफ यह कहते थे कि उन्हें मिक्सी में बनाई हुई चटनी पसंद नहीं है, उन्हें सिलबट्टे पर हाथों से पीसी हुई चटनी ही अच्छी लगती है, या कुछ बुजुर्ग ऐसे भी रहते थे जो कहते थे कि उन्हें कुकर में बनाया हुआ खाना अच्छा नहीं लगता, उनके लिए अलग-अलग बर्तनों में बिना किसी प्रेशर के खाना पकाया जाए, तो ही वे खा सकते हैं। दुनिया के जितने किस्म के उपकरण रसोईघर में महिला के काम में मदद करने के लिए बने हैं, उनसे लोगों का ऐसा लगता है कि स्वाद फीका आता है। जबकि ऐसी कोई वजह नहीं है और सिलबट्टे की जिद करना या बटलोई में दाल पकाने की जिद करना, इन सबका बोझ सीधा-सीधा महिला के ऊपर जाता है। कुछ लोगों को गैस चूल्हे पर बनी रोटी पसंद नहीं आती और अगर उनके सामने विकल्प रहे तो वे घर की महिला से कहें कि लकड़ी के चूल्हे पर बनी हुई रोटी ही सबसे अच्छी रहती है। यह एक अलग बात है कि अकेले हिंदुस्तान में हर बरस 10 लाख से अधिक महिलाएं घरेलू चूल्हे से होने वाले प्रदूषण से मारी जाती हैं। यह आंकड़ा अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ने पिछले 50 वर्षों में भारत आकर लगातार काम करके वैज्ञानिक जांच-पड़ताल के बाद निकाला है।

एक महिला का शोषण करने के जितने तरीके हो सकते हैं उन सबमें हिंदुस्तान ने एक महारत हासिल की हुई है। विख्यात उपन्यासकार और कहानी लेखिका शिवानी की एक कहानी याद पड़ती है जिसमें पहाड़ी पर बसे एक परिवार में बूढ़ा पति अपनी जवान बीवी के सामने खाना खाने के बाद उसी थाली को उसकी तरफ आगे बढ़ा देता था और उम्मीद करता था कि वह जूठन खाए और उसका चेहरा भी देखते रहता था कि थाली उसकी तरफ बढ़ाने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। घरों में यह आम बात है कि आदमी पहले खा लेते हैं लडक़े खा लेते हैं और लड़कियों और महिलाओं की बारी सबसे आखिर में आती है। घर में अगर एक बच्चे को पढ़ाने की गुंजाइश है तो वह लडक़े को पढ़ाया जाएगा, एक बच्चे के इलाज की गुंजाइश है तो वह लडक़े का इलाज होगा। पहले भी इसी जगह पर हम इस बात को लिख चुके हैं कि किस तरह मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल में एक सर्वे किया था कि वहां पर जिन बच्चों को कैंसर की शिनाख्त होती है उनमें से लडक़ों को तो तकरीबन सभी को इलाज के लिए वापस लाया, लेकिन लड़कियों में से गिनी-चुनी ही ऐसी रहती हैं जिनको मां-बाप इलाज के लिए वापस लाते हैं। लडक़ी को भला खर्च करके क्यों जिन्दा रखें? 

लड़कियों और महिलाओं से गैरबराबरी के बर्ताव, और उन पर हिंसा के बारे में लगातार बात करने की जरूरत है। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


20-Jun-2021 1:09 PM (377)

कुछ वक्त पहले हिंदुस्तान में एक फिल्म आई जिसमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर अपने ही बदन को सेक्स सुख देते हुए दिख रही थी। हिंदी भाषा में लोग बात करते हुए सेक्स से जुड़े बहुत से शब्दों से परहेज करते हैं इसलिए हस्तमैथुन शब्द की जगह तरह-तरह के शब्द जोडक़र काम चलाना पड़ता है। इस फिल्म के इस सीन को लेकर जिसमें कोई अश्लीलता नहीं थी, और जो कि जिंदगी की एक हकीकत बयान करने वाला सीन था, उस पर खूब बवाल खड़ा हुआ। देश भर से उसके खिलाफ लिखा गया। लोग इस सीन के जितने खिलाफ थे, उतने ही इस बात के भी खिलाफ थे कि स्वरा भास्कर ने कुछ किया था। स्वरा अपनी राजनीतिक विचारधारा के चलते हुए और लगातार मुखर बने रहने की वजह से देश के करोड़ों नफरतजीवियों के निशाने पर हमेशा ही बनी रहती हैं। वे अगर सुबह उठकर ट्वीट करें कि आज पूरब की तरफ चलना चाहिए, तो महज उनकी बात को खारिज करने के लिए लाखों समर्पित लोग पश्चिम की तरफ चलने लगेंगे। ऐसी नफरत का केंद्र बनी हुई स्वरा न तो किसी हमले से डरती हैं और न ही सच को बोलने से परहेज करती हैं, इसलिए इस फिल्म के इस सीन से उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी जो कि हस्तमैथुन करने के बुनियादी इंसानी हक को महिलाओं को भी उतना ही देता है जितना कि पुरुषों के पास हमेशा से रहते आया है।

जिन लोगों को यह लगता है कि हस्तमैथुन कोई पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता का ईसाई प्रभाव है जो कि हिंदुस्तानी नौजवानों को बर्बाद कर रहा है तो उन्हें अपने ही देश के इतिहास को पढऩा चाहिए जिसमें दुनिया में सेक्स की सबसे मशहूर किताब तरह-तरह के तरीके बताती है कि कैसे अधिक से अधिक देहसुख हासिल किया जा सकता है, और जो सेक्स के 84 किस्म के आसन बताती है। लोगों को यह भी देखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले बने इस देश के मंदिरों की दीवारों पर इंसानों के सेक्स और इंसानों के जानवरों के साथ सेक्स और हर किस्म के सेक्स की मूर्तियां कैसे बनाई गई थीं। इसलिए यह देश सेक्स से ऐसे बड़े परहेज वाला देश भी कभी नहीं रहा है।

अब देखने की मजेदार बात यह है कि एक फिल्म में एक अभिनेत्री अगर अपने बदन को सेक्स सुख दे रही है तो उसकी एक उंगली से इस देश को इतनी बड़ी तकलीफ हो गई जितनी तकलीफ उसे कभी इस देश की दीवारों पर लिखे इसी बात के इश्तहारों से नहीं हुई थी। हिंदुस्तान की दीवारों को देखें तो वे गुप्त रोग विशेषज्ञों के इश्तहारों से भरी हुई हैं जिनमें से कोई भी शिक्षित या प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं है, और सारे के सारे फर्जी इलाज करने वाले, नीम-हकीम कहे जाने वाले, नीम और हकीम दोनों शब्दों को बदनाम करने वाले लोगों के सेक्स क्लीनिक के हैं। हिंदुस्तानी दीवारों पर ऐसे सेक्स क्लीनिक के इश्तहार उस वक्त से चले आ रहे हैं जब पुरातत्व विभाग को खुदाई में दीवार मिली भी नहीं थी। जो सबसे पुरानी दीवारें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिली होंगी, उन पर भी किसी डॉक्टर मुल्की या डॉक्टर शाह का इश्तिहार लिखा हुआ जरूर रहा होगा जिसे बाद में शर्मीले पुरातत्ववेत्ताओं ने मिटा दिया होगा। एक तरफ तो सेक्स के नाम पर बीमारियों का हौव्वा खड़ा करके उनके इलाज का दावा करने वाले ऐसे इश्तहारों का पहला ही शब्द लिखा रहता है कि बचपन से हस्तमैथुन करने की वजह से जो कमजोरी आ गई है उसका शर्तियां इलाज किया जाता है। इसका मतलब है कि यह समाज सेक्स और हस्तमैथुन इन दोनों के अस्तित्व को तो अनंत काल से देखते आ रहा है। सेक्स क्लीनिक के विज्ञापनों को किसी ने आपत्तिजनक माना हो और उनके खिलाफ आंदोलन छेड़े हों ऐसा तो पिछले 50 साल में कहीं पढऩे में नहीं आया क्योंकि यह इश्तहार मोटे तौर पर आदमियों को खींचने के लिए रहते हैं, लडक़ों को खींचने के लिए रहते हैं जिन्हें यह समाज यह मौलिक अधिकार देता है कि वह हस्तमैथुन भी कर सकते हैं, उसकी वजह से बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं, और फिर ऐसे फर्जी इलाज करने वाले गुप्त रोग विशेषज्ञों के पास भी जा सकते हैं। 

लडक़ों और पुरुषों के ऐसे काम करने पर समाज को कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर एक अभिनेत्री ने एक फिल्मी कहानी की जरूरत को पूरा करने के लिए अपने ही बदन पर अपनी उंगली धर दी तो मान लो यह पूरा देश ही सिहर उठा। सारे के सारे मर्दों को लगा कि यह उंगली तो उनकी मर्दानगी पर उठ गई है, हस्तमैथुन के उनके एकाधिकार पर उठ गई है। सेक्स के अधिकार पर उनकी मोनोपोली खतरे में पड़ गई है, और ऐसे हाल में तो आगे जाकर महिलाएं और भी हक मांगने लगेंगी, और फिर जो महिला अपने बदन को खुद सुख दे पाएगी उसे भला मर्द की जरूरत क्या रह जाएगी? यह समाज तो बहुत ही खतरनाक समाज हो जाएगा जहां औरत बिना मर्द के अपने बदन की जरूरत को पूरा कर लेगी !  

इसलिए ऐसी फिल्म के ऐसे सीन के खिलाफ और इसे करने वाली अभिनेत्री के खिलाफ जमकर लिखा गया उसे हिंदुस्तानी संस्कृति पर हमला मान लिया गया और उसे भारतीयता के खिलाफ मान लिया गया मानो हिंदुस्तानी दीवारों पर इश्तहार करने वाले सेक्स क्लीनिक के गैरचिकित्सक फर्जी डॉक्टर यूरोप और अमेरिका के लोगों का इलाज करते हैं और हिंदुस्तानी संस्कृति में तो मानो कोई हस्तमैथुन है ही नहीं जिसके लिए वे दीवारों पर इश्तहार लिखते हैं। यह अजीब सा पाखंडी समाज है जिसे एक औरत का उसकी देह पर उसका हक देखते भी नहीं बनता। यह देश ऐसे मर्दों का देश है जो कि खुद संतुष्टि पा लेने वाली महिला को देखकर दहशत में आ जाते हैं. जिन्हें किसी महिला की सेक्स की जरूरत मर्द पर आश्रित रहने तक ही अच्छी लगती है। ऐसा कायर देश जो कि स्वरा भास्कर की एक उंगली को देखकर कांप उठा था उसे देश पर मर्दों के लिए दीवारों पर लिखे गए सेक्स क्लीनिक के इश्तहारों के हस्तमैथुन से कोई दिक्कत नहीं दिखती है, ऐसा है मेरा देश!

अब यह वक्त आ गया है कि औरत से जुड़े हुए तमाम मुद्दों पर उनकी बात सुनी जाए, उनकी लिखी हुई बात को पढ़ा जाए, और हिंदुस्तानी मर्द अपनी सोच पर फिक्र करें कि कैलेंडर की 21वीं सदी के 21 साल में भी वे किस तरह हज़ारों बरस पहले की पत्थर की किसी गुफा में जी रहे हैं !  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


13-Jun-2021 2:47 PM (276)

दुनिया के जुर्म और पुलिस के इतिहास की एक सबसे बड़ी घटना अभी पिछले हफ्ते हुई जब अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने कई देशों की जांच एजेंसियों के साथ मिलकर दुनियाभर में फैले हुए संगठित अपराध के गिरोहों के बीच की बातचीत को पकड़ा, और उसके आधार पर करीब 800 बड़े माफिया सरगना को गिरफ्तार किया। दुनिया भर में नशीले सामानों की बहुत बड़ी जब्ती हुई, और एक किस्म से संगठित अपराधों की कुछ वक्त के लिए कमर टूट गई। लोगों का मानना है कि माफिया पर कार्रवाई में यह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई है, और इसे बड़े दिलचस्प तरीके से अंजाम दिया गया।

हुआ यूं कि अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने यह तरकीब सोची कि व्हाट्सएप किस्म का एक दूसरा मैसेंजर एप्लीकेशन ऐसा बनाया जाए जिसकी शोहरत मुजरिमों के बीच में सबसे सुरक्षित मैसेंजर के रूप में फैलाई जाए। उसके बाद इसके ब्लैक मार्केट में मौजूद कुछ खास मोबाइल हैंडसेट पर ही चलने की शोहरत भी मुजरिमों के बीच फैलाई जाए। इस सुरक्षित दिखाए जाने वाले मैसेंजर के लिए हर महीने एक फीस भी ली जाए ताकि वह मुफ्त का ना दिखे। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया की एक जेल में बंद एक बड़े माफिया सरगना को उसका भरोसेमंद बनकर एक अफसर ने एक ऐसा हैंडसेट पहुंचाया जिसमें यह मैसेंजर एप्लीकेशन डाला हुआ था। क्योंकि इतने बड़े सरगना ने इस मैसेंजर एप्लीकेशन की साख का दम भरा तो दुनिया भर में दूसरे मुजरिमों के बीच में जल्द ही उस पर भरोसा कायम हो गया, और वे खुलकर इसका इस्तेमाल करने लगे। जुर्म की अपनी तमाम बातें खुलकर करने लगे। इस एप्लीकेशन पर आने-जाने वाले संदेशों को पढऩे का इंतजाम अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई जांच एजेंसियों ने कर रखा था। इस मैसेंजर पर बड़े-बड़े मुजरिम खुलेआम नशे की आवाजाही की चर्चा करते थे, सामानों की फोटो भेजते थे जिनके भीतर ड्रग्स छुपाकर भेजी जा रही हैं, कत्ल की चर्चा करते थे कि किसका खून किया जाने वाला है, और तमाम किस्म के जुर्म की बातें खुलकर करते थे क्योंकि उन्हें यह भरोसा था कि यह मुजरिमों का अपना मैसेंजर है और इसकी कोई भी बात कहीं नहीं जा सकती। खास मोबाइल हैंडसेट और भुगतान वाला मैसेंजर, इन दो बातों से इसकी साख बढ़ती चली गई और जांच एजेंसियों को ऐसा लगने लगा कि दुनिया का हर बड़ा जुर्म उनकी आंखों के सामने उनकी जानकारी में हो रहा है, ऐसे में एक वक्त, एक साथ कई देशों में छापा मारा गया और 800 बड़े मुजरिमों को गिरफ्तार कर लिया गया।

आज इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आज दुनिया भर में इस बात को लेकर बहस चलती है कि कौन से देश की सरकार किस मैसेंजर सर्विस का गला दबाकर उससे मनचाहे लोगों के मैसेज निकलवाने में लगी हुई है। हिंदुस्तान में भी भारत सरकार का कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ टकराव चल रहा है और व्हाट्सएप के साथ भी। इन सबने दुनिया के लोगों का भरोसा जीता है कि उन पर भेजे गए संदेश पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं, और उन्हें कोई भी सरकार या कोई दूसरी एजेंसी पढ़ नहीं सकती। लेकिन भारत में हाल ही में आईटी कानून में फेरबदल करके यह इंतजाम किया जा रहा है कि ऐसे तमाम सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों से सरकार और अधिक जानकारी ले सकें। भारत में जांच एजेंसियों के पास और राज्य सरकारों के पास, कुल करीब 10 एजेंसियों के पास इस बात के अधिकार रहते हैं कि वे लोगों के मोबाइल पर हो रही बातचीत को सुन सकें, फोन पर आने-जाने वाले संदेश पढ़ सकें, ईमेल में झांक कर सकें और यही वजह है कि आज सामान्य टेलीफोन कॉल और एसएमएस को सबसे कम महफूज माना जाता है। 

अब धीरे-धीरे लोगों का व्हाट्सएप पर से भी भरोसा हट गया है और बहुत से लोगों को आईफोन के फेसटाइम फीचर पर ही भरोसा रह गया है। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका में एक बड़े आतंकी के गिरफ्तार होने पर उसके आईफोन को एफबीआई भी नहीं खोल पाई, और आईफोन बनाने वाली एप्पल कंपनी ने सरकार की कोई भी मदद करने से इंकार कर दिया। अब दुनियाभर के लोगों को लगता है कि जिस फोन को एफबीआई भी नहीं खोल पाई, और जिसे एफबीआई के लिए भी खोलने से एप्पल ने मना कर दिया, वह एक सबसे सुरक्षित फोन और बातचीत करने की सर्विस है। 

राजनीति और सरकार में, मीडिया और खुफिया एजेंसी, या बड़े कारोबार में, जिन लोगों को गोपनीयता की जरूरत होती है, उनके बीच अलग-अलग समय पर अलग-अलग मैसेंजर पर भरोसा दिखता है। जब लोगों को यह लगने लगा कि हिंदुस्तान की खुफिया एजेंसी व्हाट्सएप को तोडऩे वाले इजराइली सॉफ्टवेयर खरीद चुकी हैं, तब लोगों ने किसी ने सिग्नल, किसी ने रॉकेट, और किसी ने और कोई मैसेंजर इस्तेमाल करना शुरू किया। धीरे-धीरे आज के बाजार में सबसे सुरक्षित फेसटाइम को माना जा रहा है और कोई हैरानी नहीं होगी कि साल दो साल बाद जाकर पता लगे कि अमेरिकी या इजराइली खुफिया एजेंसियां फेसटाइम की तमाम बातचीत को सुन रही थीं, उसके सारे वीडियो कॉल को देख रही थीं, और उस पर आने-जाने वाले संदेश अपने कंप्यूटरों पर पढ़ रही थीं।   

यह पूरा सिलसिला फोन या कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों और उनमें घुसपैठ करने वाले लोगों के बीच चलने वाले एक अंतहीन मुकाबले का है इसके अलावा अब मैसेंजर सर्विसों या ईमेल सर्विस का एक ऐसा नेटवर्क भी है जिस पर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग समय में भरोसा रहता है, और खुफिया एजेंसियां या जांच एजेंसियां लगातार इनमें घुसपैठ करने की तरकीब निकालती रहती हैं. मुकाबला अंतहीन है, हमेशा चलते ही रहेगा, और ताकतवर तबकों को किसी न किसी भरोसेमंद मैसेंजर की जरूरत पड़ती रहेगी। किसी ना किसी भरोसेमंद फोन या कंप्यूटर की जरूरत भी लगेगी जिसमें घुसपैठ आसान ना हो, जिसकी जानकारी को कोई ना निकाल सके। दुनिया में ना सिर्फ मुजरिमों बल्कि सरकारों के कामों में भी ऐसी गोपनीयता की जरूरत रहती है कि उपकरणों से लेकर एप्लीकेशन तक को अधिक से अधिक सुरक्षित रखा जाए। ऐसा इसलिए भी है कि हाल के वर्षों में दुनिया के बड़े-बड़े देशों ने अपने नेटवर्क में ऐसी घुसपैठ देखी है जिसमें दुनिया के किसी कोने में बैठा हुआ कोई एक हैकर अमेरिका के एक शहर में पीने का पानी सप्लाई करने वाली कंपनी के कंप्यूटरों में छेडख़ानी करके किसी एक रसायन को इतना अधिक मिलाने की ताकत पा लेता है, जिससे उसे पीने वाले लोग मर जाएं। इसलिए जांच एजेंसियों की ऐसी घुसपैठ भी नाजायज नहीं है क्योंकि अपराधियों की ताकत बढ़ती चल रही है। 

फिलहाल लोगों को यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी मैसेंजर सर्विस दुनिया की जांच एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की नजरों से तभी तक दूर है जब तक वे लोग महत्वपूर्ण नहीं हो जाते। जिस दिन उनकी कोई अहमियत हो जाएगी उस दिन उनके फोन, कंप्यूटर और उनके मैसेंजर पर घुसपैठ होने लगेगी, इसलिए अधिक अच्छा यही है कि किसी किस्म के जुर्म में शामिल ही ना हुआ जाए।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


06-Jun-2021 3:26 PM (701)

थाईलैंड के एक विश्वविद्यालय में लैब्राडोर नस्ल के कुत्तों को ट्रेनिंग दी जा रही है कि वह लोगों को सूंघकर यह पता लगा लें कि वे कोरोना पॉजिटिव हैं या नहीं। अभी वैज्ञानिकों को प्रयोग के स्तर पर जो नतीजे मिले हैं उनके मुताबिक कोरोना की प्रारंभिक जांच, रैपिड टेस्ट से मिलने वाले नतीजों के मुकाबले कुत्तों के पहचाने गए नतीजे अधिक सही निकल रहे हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अगर बड़ी संख्या में कुत्तों को प्रशिक्षित किया जा सका तो उन्हें भीड़ की जगहों पर, स्टेडियम, रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर तैनात करके कोरोना के मरीजों को पहचाना जा सकेगा। अभी थाईलैंड के अलावा फ्रांस, ब्रिटेन, चिली, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, और जर्मनी में भी कुत्तों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 

यह तो लोगों ने पहले से देखा हुआ है कि किसी जुर्म के होने पर मुजरिम की तलाश के लिए पुलिस अपने प्रशिक्षित कुत्ते को लेकर पहुंचती है, जो बहुत से मामलों में मौके को सूंघकर और जाकर मुजरिम को पकड़ भी लेते हैं. इसी तरह एयरपोर्ट और दूसरी जगहों पर प्रशिक्षित कुत्ते सूंघकर विस्फोटकों को पकड़ लेते हैं, और नशीले पदार्थों को पकड़ लेते हैं। हालत यह है कि किसी जुर्म की जगह पर अगर पुलिस पहुंचे तो लोगों को ठीक से भरोसा नहीं होता है कि जांच हो पाएगी या नहीं, लेकिन पुलिस का कुत्ता पहुंच जाए तो लोगों का भरोसा हो जाता है कि मुजरिम पकड़ में आ जाएंगे।

इन बातों से परे बहुत सी दूसरी जगहों पर कुत्तों का इस्तेमाल हो रहा है, वे किसी भूकंप में गिरी इमारतों, या किसी हवाई हमले में गिरी इमारतों के मलबे में से लोगों को तलाशने में भी बचाव कर्मियों की मदद करते हैं, जिंदा या मुर्दा लोगों का पता गंध से ही लगा लेते हैं, ताकि कम मेहनत में उन तक पहुंचा जा सके। बहुत से प्रशिक्षित कुत्ते ऐसे हैं जो नेत्रहीन लोगों के साथ चलते हैं और उनके गाइड का काम करते हैं। इसी तरह बीमार लोगों की पहियों वाली कुर्सी को खींचकर ले जाने का काम भी कुछ कुत्ते करते हैं और दुनिया का इतिहास ऐसी सच्ची कहानियों से भरा हुआ है जहां मालिक के गुजर जाने पर उनके पालतू कुत्ते वर्षों तक उनकी समाधि पर रोज आते रहे या वहां डेरा डालकर बैठे रहे।

दिक्कत यह है कि घर की चौकीदारी करने के मामले में सबसे वफादार प्राणी माना जाने वाला कुत्ता इंसान के लिए सबसे आसान और सहज गाली की तरह भी इस्तेमाल होता है। वैसे तो इंसान अपनी कहावतें और मुहावरों में अनंत काल से अपने से परे तमाम किस्म के प्राणियों को गालियों की तरह इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन कुत्तों के ऊपर इंसानों की कुछ खास मेहरबानी है। ऐसा शायद इसलिए भी है कि कुत्ता सबसे अधिक प्रचलित पालतू प्राणी है, और सबसे अधिक वफादार भी समझा जाता है। जो सबसे अधिक वफादार हो उसे सबसे जल्दी गाली बना लेना इंसान के हिसाब से देखें तो कोई अटपटी बात नहीं है, इंसान होते ही ऐसे हैं कि जो उनके सबसे अधिक काम आए उन्हें वह गालियों की तरह इस्तेमाल करें। 

अब अगर हिंदी भाषा में कहावतें और मुहावरों को देखें तो कुत्ते को लेकर सबसे ही खराब गालियां बनाई जाती हैं। जब किसी को बद्दुआ देनी हो तो कहा जाता कि वे कुत्ते की मौत मरेंगे, और यह कहने के मतलब बूढ़ा होकर स्वाभाविक मौत नहीं होता, यह रैबीज के शिकार तड़पकर मारने वाले कुत्ते होते हैं।  जब किसी इंसान के मां-बाप को गाली देनी हो तो हिंदी फिल्मों में आमतौर पर उन्हें कुत्ते के पिल्ले या कुतिया के पिल्ले कहा जाता है, और धर्मेंद्र तो कुछ अधिक हिंसक होकर यह भी बोलते आए हैं कि कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। एक और फिल्मी डायलॉग तो एक लतीफे में बदल चुका है, फिल्म शोले में धर्मेंद्र हेमा मालिनी से कहते हैं कि बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना। इसे लेकर कई कार्टून बने हैं जिनमें कुत्तों की पूरी टोली जाकर किसी से पूछते हुए दिखती है कि हममें क्या कमी है जो बसंती को हमारे सामने नाचने से मना किया जा रहा है? अब बसंती जिन कुत्तों के सामने ना नाचे और जिन कुत्तों का वीरू खून पी जाए, उनसे अब इंसान यह उम्मीद करते हैं कि वे अपनी जान खतरे में डालकर इंसानों के लिए एक काम और करें, और कोरोना के मरीज पकड़ें। 

अब तक कुत्ते जमीनी सुरंग ढूंढ लेते हैं, दूसरी जगहों पर विस्फोटक ढूंढते हैं, हत्यारे और डकैत ढूंढते हैं, नशे के सौदागरों को पकड़ते हैं, नशीले पदार्थों का जखीरा कहीं हो तो उसे पकड़ते हैं, और बदस्तूर गालियां खाते चलते हैं और नए-नए काम करना सीखते चलते हैं। यानी फौजी, पुलिस, बचाव कर्मी, होने के साथ-साथ अब कुत्ते पैथोलॉजिस्ट,  डॉक्टर का काम भी करने लगे हैं, इसलिए इंसानों को एक बार सोचना चाहिए कि क्या कुत्ते को लेकर बनाई गई गालियों में से कुछ गालियों को कम करना जायज नहीं होगा?

इंसान कुत्तों के ऊपर ही इतनी सारी गालियां क्यों बनाते हैं, और कुत्तों को लेकर ही इतनी सारी कहावतें और मुहावरे क्यों गढ़े गए थे इस बारे में सोचें तो ऐसा लगता है कि कुत्ते अपनी वफादारी से और अपनी दूसरी खूबियों से इंसानों के मन में एक गहरी हीन भावना पैदा कर देते हैं, जो कि पहला मौका मिलते ही वफादारी को फेंककर करीबी लोगों की पीठ में छुरा भोंकने में लग जाते हैं। अब हाल के बरसों में हिंदुस्तान में एक पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में जाने वाले लोगों को देखें, किसी पार्टी या विचारधारा के साथ उनकी बेवफाई देखें, उनकी गद्दारी देखें, तो यह जाहिर है कि किसी भी वफादार प्राणी को देखकर उनके मन में हीनभावना तो आएगी ही। कुछ ऐसा ही सिलसिला जिंदगी के अलग अलग दायरों में अनंत काल से चले आ रहा होगा जब इंसानों को अपनी बेईमानी, अपने धोखे के बाद जब कुत्ता दिखता होगा, तो लगता होगा कि उनसे तो कुत्ता बेहतर है जो आसपास के लोगों को धोखा नहीं देता। शायद उसी वक्त ऐसी कहावतें और ऐसे मुहावरे गढ़े गए होंगे।

हिंदी में कहावत और मुहावरों की सबसे प्रतिष्ठित किताब को देखें तो उसमें कुत्तों पर सैकड़ों लोकोक्तियां बनी हुई हैं, और हर एक के मतलब में यह लिखा हुआ है कि वह नीच व्यक्ति, बुरे व्यक्ति, दुष्ट और पापी के लिए बनाई गई हैं। अब इंसान अपने भीतर के सबसे बुरे लोगों के लिए कुत्तों पर ही दर्जनों कहावत बनाकर बैठा है, और अपनी हर मुसीबत, और अब तो सबसे खतरनाक जानलेवा बीमारी से बचने, के लिए भी वह कुत्तों को झोंक रहा है। सबसे वफादार को इस तरह खतरे में डालकर क्या इंसान को किताबों में दर्ज कुत्तों के खिलाफ किसी भी गाली को इस्तेमाल करने का नैतिक अधिकार बचता है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


30-May-2021 1:56 PM (442)

हाल के बरसों में मैंने अपने बहुत से कॉलम्स में, और दूसरी जगह लिखे, या कहे हुए में कुछ देशों को लेकर बार-बार विकसित लोकतंत्र लिखा है। अभी पिछले कुछ बरस से कनाडा में जो प्रधानमंत्री हैं जस्टिन ट्रूडो, उनकी तारीफ में भी कुछ लिखा है। लेकिन ये खूबियां इन लोकतंत्रों के बहुत ताजा इतिहास को देखते हुए गिनाई गई हैं। थोड़े से और पहले अगर जाएं तो इनका इतिहास इतना खराब भी रहा है कि उनके बारे में विकसित लोकतंत्र जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं हो सकता था। ऐसा ही एक मामला कनाडा को लेकर अभी सामने आया है जिसमें वहां के एक आवासीय विद्यालय के अहाते में 215 बच्चों की एक सामूहिक कब्र मिली है। ये बच्चे 1978 में बंद हुए एक ऐसे स्कूल के रहवासी थे जिसे वहां के मूल निवासियों के बच्चों को शहरी और सभ्य बनाने के नाम पर, शिक्षित बनाने के नाम पर वहां रखा गया था। 

अब ऐसी सामूहिक कब्र देखकर कनाडा की सरकार हिल गई है, और वहां के प्रधानमंत्री ने यह लिखा है कि इसे देख कर उनका दिल टूट गया है। यह जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की सामूहिक कब्र एक साथ मौतों से जुड़ी हुई हो सकती है, और ये बच्चे अपने परिवारों से छीनकर, अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर लाकर, एक ईसाई और शहरी सभ्यता के पुर्जे बनाने के लिए रखे जाते थे, और अब कनाडा के मूल निवासी समुदाय भी बहुत बुरी तरह दुख में डूब गए हैं कि उनके बच्चों के साथ ऐसा किया गया। कनाडा का इतिहास बतलाता है कि 1863 से 1998 तक करीब डेढ़ लाख आदिवासी बच्चों को परिवारों से अलग रखा गया और इन्हीं स्कूलों में लाकर बसाया गया क्योंकि शहरी और ईसाई सत्ता अपनी संस्कृति, अपनी पढ़ाई और अपने तौर-तरीकों को ही सभ्य मानती थी, और आदिवासियों की मूल संस्कृति को असभ्य।

लोगों को याद होगा कि कुछ ऐसी ही किस्म का काम ऑस्ट्रेलिया में वहां की शहरी सरकारों और चर्च ने मिलकर किया था। ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों या जिन्हें मूल निवासी भी कहा जाता है, उनके बच्चों को चर्च और सरकार छीनकर ले आते थे, और उन्हें शहरी, ईसाई पढ़ाई में रखकर उन्हें इंसान बनाने का एहसान किया जाता था। अभी कुछ बरस पहले ऑस्ट्रेलिया की आज की सरकार को समझ आया कि  उसके पुरखे इंसानियत के खिलाफ इतना बड़ा जुर्म कर रहे थे, तो उसने वहां के मूल निवासी समुदायों के लोगों को संसद में आमंत्रित किया और उन्हें सदन के बीच लाकर उनसे पूरे सदन ने माफी मांगी कि आस्ट्रेलिया की सरकार ने, और वहां के शहरी समुदाय ने, मूल निवासियों के साथ ऐसा किया था। ऑस्ट्रेलिया का इतिहास बताता है कि इन बच्चों को 1905 से लेकर 1967 तक उनके परिवारों से छीना जाता रहा। 

इस तरह देखें तो कनाडा की यह ताजा घटना जो कि 1998 तक चल रही थी, और ऑस्ट्रेलिया की स्टोलन जनरेशन (चुराई गई पीढिय़ां) की घटना जो कि 1967 तक चल रही थी, ये हिंदुस्तान की आजादी के काफी बाद तक चलने वाली घटनाएं हैं और पश्चिमी देशों के इतिहास को देखें तो उनमें से कई में सबसे कमजोर तबकों पर जुल्म हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक कानून बनने के बहुत बाद तक कानूनी रूप से जारी रहे। यह एक अलग बात है कि हाल के वर्षों में हिंदुस्तान में इस देश के सबसे कमजोर तबकों के साथ कुछ उसी किस्म का काम चल रहा है और दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक सडक़ों पर पीटे जा रहे हैं उनकी भीड़त्या हो रही है। हिंदुस्तान में जगह-जगह उन पर शहरी, संपन्न, सवर्ण, और सनातनी सांस्कृतिक मूल्यों को लादा जा रहा है, और पीट-पीटकर उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वे खान-पान से लेकर पहनावे तक उन पर थोपी जा रही बातों को मानें। लोकतांत्रिक हिंदुस्तान की 21वीं सदी के 21वें बरस में भी आज दलित को मूंछें रखने पर गुजरात में बुरी तरह पीटा जा रहा है, और मध्य प्रदेश में दलितों दूल्हे को अगर घोड़ी पर चढक़र निकलना है तो उसके लिए जब तक बड़ी पुलिस हिफाजत ना हो जाए तब तक वह मुमकिन नहीं हो पाता। इसलिए हिंदुस्तान के कुछ कागजी कानूनों को लेकर अब विकसित हो चुके पश्चिमी लोकतंत्रों के साथ हम तुलना करना नहीं चाहते।

मुझे याद है कि अपनी रिपोर्टिंग के दिनों की शुरुआत मैं मैंने अपने शहर के वनवासी कल्याण आश्रम के एक कन्या छात्रावास में उस वक्त की जनसंघ की बहुत बड़ी नेता विजयाराजे सिंधिया से मुलाकात की थी वहीं बात हुई थी, और वहीं मैंने उत्तर पूर्वी राज्यों से लाकर यहां रखी गई उन बच्चियों के साथ विजयाराजे सिंधिया की बहुत सी तस्वीरें भी खींची थी। वह दौर मेरे शुरुआती कामकाज का था और उस वक्त इतनी राजनीतिक समझ भी नहीं थी कि उत्तर-पूर्व से लाकर यहां पर कट्टर हिंदूवादी संस्कृति के संस्थान में इन बच्चियों को रखना, पढ़ाना, और इनमें एक अलग धार्मिक संस्कार विकसित करना बहुत मासूम काम नहीं था। इन बच्चियों को वहां पर उत्तर-पूर्व के उन राज्यों से लाकर रखा जा रहा था, जिन राज्यों में आदिवासियों के ईसाई हो जाने का खतरा संघ परिवार को लग रहा था। लेकिन बाद के वर्षों में धीरे-धीरे जब दुनिया के दूसरे देशों में शहरी और संगठित आधुनिक धर्मों द्वारा आदिवासियों के साथ किए जा रहे सुलूक के बारे में पढ़ा, तो धीरे-धीरे एक समझ विकसित हुई कि यह उन गरीब आदिवासी परिवारों पर कोई एहसान नहीं है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की तरह एक पूरी पीढ़ी की चोरी है। यह उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से अलग करके उनके ईसाई होने के खतरे को घटाने की हरकत है। यह पूरा सिलसिला, दुनिया में सत्ता और धर्म की मिली-जुली साजिश, ऐसे ही चलते हैं। 

मध्यप्रदेश के लोगों को यह अच्छी तरह याद होगा कि यह सिलसिला जनता पार्टी सरकार के वक्त आपातकाल के तुरंत बाद शुरू हुआ था जब वनवासी कल्याण आश्रम जैसे हिंदूवादी संगठन को उस वक्त के जनता पार्टी सरकार के, जनसंघ के मुख्यमंत्री की मेहरबानी हासिल थी। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब राजा और पुरोहित एक हो जाते हैं, राज्य और चर्च एक हो जाते हैं, तो जनता को अपार जुल्मों से कोई नहीं बचा सकते। यह जुल्म जब धर्म का नाम लेकर, राज्य की सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करके ढाए जाते हैं, तो उनका कोई अंत नहीं होता। 

कुछ बरस पहले भारत सरकार की तरफ से देश के कुछ अखबारों के संपादकों को उत्तर पूर्व के दौरे पर ले जाया गया था और उस वक्त मिजोरम की राजधानी आइजोल में 3 दिन रहने का मौका मुझे भी मिला था। दिलचस्प यह था कि मैं उस वक्त मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए गुजरात में था। वहीं पर फोन से मिजोरम पहुंचने का न्योता मिला। जब हफ्ते भर एक शराबबंदी वाले राज्य के बाद शराबबंदी वाले दूसरे राज्य मिजोरम पहुंचा, तो बहुत से अखबारनवीसों ने हमदर्दी जताई थी।

मिजोरम एक छोटा सा राज्य था और इन 3 दिनों में, दो या तीन बार तो मुख्यमंत्री ने ही डिनर पर बुला लिया था। मुख्यमंत्री से औपचारिक बातचीत भी हुई थी जिनमें पता लगा था कि यंग मिजो एसोसिएशन नाम का एक संगठन उस राज्य में बहुत सक्रिय है. वह लोगों को नशा करने से रोकता है, नशे के कारोबार को रोकता है, फिर भी कोई नशे में मिले तो उसे चौराहे पर खंभे से बांधकर पीटता है। कोई व्यक्ति अपनी बीवी को पीटे तो इस संगठन के लोग जाकर उसे पीटते हैं, और राज्य में नैतिकता के पैमानों का एक ढांचा लागू करते हैं। जब मुख्यमंत्री से पूछा गया था कि क्या इन्हें कोई कानूनी रियायत मिली हुई है तो उन्हें इस व्यवस्था में कोई जटिलता नहीं दिखी, कोई कानूनी दिक्कत नहीं दिखी कि एक धार्मिक संगठन प्रदेश के लोगों में बुराई को खत्म कर रहा है, तो उसे क्यों रोका जाए। 

उन्होंने बहुत से शब्दों में इस बात को दोहराया था कि सरकार तो इस संगठन का साथ देती है। मिजोरम शायद 87 फ़ीसदी से अधिक ईसाई राज्य है, और वहां चर्च का बहुत बड़ा असर है। देशभर से इकट्ठा संपादकों के स्वागत में जो सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए गए, उसमें भी दोनों-तीनों दिन चर्च में गाए जाने वाले गाने भी शामिल थे। वहां की संस्कृति ही उस तरह की थी और ईसाई धर्म मानो वहां का राजधर्म हो गया था। उस प्रदेश में रहने वालों को इस राजधर्म और लोकतंत्र में कोई टकराव भी दिखना बंद हो गया था। 

हालत यह थी कि जब पत्रकारों को दोपहर के भोजन की योजना दिखाने के लिए ले जाया गया तो मैंने यह सुझाया कि स्कूली बच्चों के साथ ही पत्रकार खा लेंगे उनके लिए अलग से किसी रेस्ट हाउस में खाना रखने की क्या जरूरत है? लेकिन जब स्कूल पहुंचे तो समझ पड़ा कि मेरी राय न मानना बेहतर रहा। उस स्कूल में दोपहर के भोजन में बच्चों के लिए दो तरह के खाने का इंतजाम था एक सूअर के गोश्त के साथ चावल, और एक बीफ के साथ चावल। बीफ लिखना इसलिए जरूरी है कि इसमें गोवंश के साथ-साथ भैंस का गोश्त भी आ जाता है। वहां पर यह पूछने पर कि अगर कोई शाकाहारी हो तो उस बच्चे के लिए खाने को क्या है, किसी स्थानीय अफसर के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि वहां शाकाहार किस्म की कोई चीज चलन में नहीं थी। वहां पहुंचे अखबार वालों में से बहुत से लोग शाकाहारी थे और यह अच्छा ही हुआ कि खाने का इंतजाम कहीं और था जहां पर गोश्त के अलावा शाकाहारी खाना भी था। 

उत्तर पूर्व के इन दो मामलों का जिक्र करने की वजह यह है कि धर्म और राज्य मिलकर कितने खतरनाक हो सकते हैं इसकी मिसाल देखने के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ही जाने की जरूरत नहीं है हिंदुस्तान में ही इसे वनवासी कल्याण आश्रम के शबरी आश्रमों में देखा जा सकता है, या कि मिजोरम जैसे ईसाई बहुल राज्य में देखा जा सकता है जहां पर चर्चा और राज्य में कोई फर्क ही नहीं है, और दोनों एक ही साथ मिलकर काम करते हैं। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की संसद और सरकारें तो आदिवासियों के बच्चों को उनसे दूर लाने के लिए माफी मांग चुकी हैं, मांग रही हैं, हिंदुस्तान में यह चोरी जारी है !  

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


23-May-2021 2:41 PM (649)

छत्तीसगढ़ के एक जिले में लॉकडाउन के दौरान सडक़ पर एक बेकसूर नौजवान को पीटने को लेकर कल से सोशल मीडिया और मीडिया में जितना कुछ चला, तो आज सुबह मुख्यमंत्री ने उस कलेक्टर का वहां से तबादला कर दिया, और खुद मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर जाकर उस परिवार के प्रति खेद जताया, और यह आगाह किया कि किसी भी अफसर का ऐसा बर्ताव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन कल से इस घटना को लेकर जितना कुछ लिखा गया है और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बसे हुए पत्रकारों ने इस पर जो प्रतिक्रिया की है, उसका एक छोटा हिस्सा भी बस्तर के उन आदिवासियों को नसीब नहीं हुआ जो कि अपने इलाके में पुलिस कैंप आने का विरोध कर रहे थे और इस विरोध के चलते पुलिस गोली से 3 आदिवासियों की मौत भी हुई है जिन्हें पुलिस ने अपनी हिकमत से आनन-फानन नक्सली करार दे दिया है। शहरी मीडिया का यह रुख नया नहीं है, क्योंकि विज्ञापनदाताओं को लाशों की खबरें नहीं सुहातीं।

बस्तर जैसे इलाके में जहां रात-दिन पुलिस और नक्सलियों में टकराव चलते रहता है वहां पुलिस अपने शक की बिना पर ही किसी भी आदिवासी को नक्सल समर्थक, नक्सल मददगार, या कुछ और साबित करने की ताकत रखती है। शायद वह बस्तर की पूरी वोटर लिस्ट को लेकर हर आदिवासी नाम के खिलाफ अपना एक शक कागजों में दर्ज करके उन्हें संदिग्ध नक्सली की शक्ल में बनाए रखती है, ताकि कभी भी जरूरत पडऩे पर उनकी लाश के साथ पुलिस का एक पुराना रिकॉर्ड चस्पा किया जा सके कि वह फलाना नक्सली कमांडर था जिस पर इतने का इनाम रखा गया था, जिसे इतने जुल्मों के लिए ढूंढा जा रहा था, और जो मुठभेड़ में मारा गया। सवाल यह है कि जब छत्तीसगढ़ का मीडिया, सोशल मीडिया, और यहां के नेता, शहर के एक थप्पड़ और लाठी के वीडियो से विचलित हो जाते हैं, उस वक्त बस्तर में 3-3 आदिवासियों की लाश गोली खाकर पड़ी हुई हैं, हजारों आदिवासी प्रदर्शन करते हुए पड़े हुए है, और उस पर शहरों में हलचल नहीं हो रही है। बस्तर के जिन जिलों में ऐसा प्रदर्शन चल रहा है या ऐसी पुलिस कार्यवाही चल रही है या ऐसी लाशें गिराई गई हैं वहां पर भी एक पुलिस जिला और एक राजस्व जिला, दो शामिल हैं, वहां भी कलेक्टर होंगे, वहां भी जाहिर तौर पर एसपी तो है ही क्योंकि गोली चलाने के हुक्म पर दस्तखत तो किसी कलेक्टर और एसपी का ही होगा, लेकिन जवाबदेही मानो किसी की नहीं है। 

भाजपा के पिछले 15 वर्षों में जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कांग्रेस ने बस्तर के आदिवासियों पर जुल्म के खिलाफ आंदोलन किए थे, वे कांग्रेसी भी आज खामोश हैं। प्रदेश की कांग्रेस सरकार भी इस पर खामोश है. आज भी मरने वाले तो उन्हीं आदिवासियों में से हैं जिनमें से भाजपा सरकार के समय मरने वालों पर कांग्रेस की हमदर्दी उनके परिवार के साथ रहती थी, उनके समाज के साथ रहती थी। आज जब बस्तर में लाशें गिरी हैं उस वक्त बस्तर के कांग्रेस नेता अगर उसी दोपहर खबरों के बीच ही फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल फोटो बदलने का वक्त निकाल लेते हैं, लेकिन उसी फेसबुक पर आदिवासियों की मौतों को लेकर लिखी जा रही बातों को देखने का वक्त उनके पास नहीं रहता, तो यह एक सोचने की बात है कि क्या सत्तारूढ़ होने से किसी पार्टी की संवेदनशीलता इस हद तक चौपट हो सकती है? 

आज बस्तर में मारे गए आदिवासियों तक पहुंचने के लिए वहां काम कर रही एक सामाजिक कार्यकर्त्ता बेला भाटिया लगातार संघर्ष कर रही हैं लेकिन उन्हें वहां आदिवासियों तक जाने नहीं दिया जा रहा। बेला भाटिया के पति, पूरी दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री, ज्यां द्रेज भी बस्तर पहुंचे हुए हैं वे भी इन आदिवासियों तक जाने की कोशिश कर रहे हैं, और पुलिस उन्हें वहां जाने नहीं दे रही। यह कैसी अजीब बात है कि ज्यां द्रेज यूपीए सरकार के 10 बरस में सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के एक सबसे प्रमुख सदस्य रहे हैं, लेकिन आज वे मानो अवांछित हैं। कई बरस पहले बेला भाटिया की हिमायत करते हुए राहुल गांधी के ट्वीट हवा में तैर रहे हैं, जिसमें राहुल छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के वक्त आदिवासियों के हक के लिए लडऩे वाली बेला भाटिया का साथ देते दिख रहे हैं, और आज सोशल मीडिया पर बार-बार छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार से यह पूछा जा रहा है कि क्या वह आज राहुल गांधी की कही हुई बात का समर्थन करती है या नहीं? 

यह पूरा सिलसिला बड़ा अजीब है, बस्तर में 15 बरस तक भाजपा का राज रहा और भाजपा सरकार ने उसे पूरी तरह एक पुलिस राज्य बना कर रखा। भाजपा ने पूरे बस्तर को मोटे तौर पर बदनाम पुलिस अफसरों के हवाले कर दिया था, और उन्हें वहां की जागीर दे दी थी, कि वे जिसे जिंदा रखना जरूरी समझें उसे जिंदा रखें, बाकी की कोई फिक्र राजधानी रायपुर को नहीं होगी। यह पूरा सिलसिला उस वक्त राहुल गांधी ने बार-बार उठाया भी था और आज के छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी यह बात बार-बार उठाई थी। 

आज सुबह मुख्यमंत्री ने जिस रफ्तार से सूरजपुर के कलेक्टर को हटाया है उसकी निंदा की है और उसके तोड़े गए मोबाइल की सरकार की तरफ से भरपाई करने की बात कही है, क्या इनमें से किसी भी किस्म की भरपाई बस्तर के मारे गए आदिवासियों को लेकर, वहां आंदोलन कर रहे आदिवासियों को लेकर की गई है? और अगर नहीं की गई है तो न सिर्फ बस्तर और छत्तीसगढ़ बल्कि तमाम हिंदुस्तान इस बात की राह देख रहा है कि बस्तर की मौतों को लेकर कांग्रेस पार्टी का क्या कहना है, मुख्यमंत्री का क्या कहना है और क्या आदिवासी मुद्दे आज भी कांग्रेस के दिल के उतने ही करीब हैं, जितने करीब छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के रहते हुए थे? ये तमाम मुद्दे सरकार के लिए बहुत असुविधा के हो सकते हैं क्योंकि नक्सल मोर्चे पर उसे इसी पुलिस के सहारे लडऩा है, लेकिन ऐसा तो कोई कभी सोचता भी नहीं कि सरकार चलाना बहुत सुविधा का काम होता है। 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बस्तर के मामले में कुछ तो बोलना चाहिए क्योंकि कैलेंडर की हर तारीख के साथ उनकी चुप्पी दर्ज होते चल रही है बढ़ रही है। उन्हें बोलने से अधिक कुछ करना भी चाहिए क्योंकि करना उनका अधिकार ही नहीं जिम्मा भी है। बस्तर को पुलिस के भरोसे छोड़ देने का मतलब आदिवासियों को नक्सलियों के भरोसे छोड़ देने के अलावा और कुछ नहीं है। रमन-सरकार के पंद्रह बरसों का इतिहास गवाह है कि हिंसक और हत्यारे अफसरों ने बस्तर का क्या हाल कर रखा है। राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी बस्तर में नामौजूद रहकर अपनी जमीन खो बैठेगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

 


16-May-2021 1:59 PM (371)

जब कभी मेरा साप्ताहिक स्तंभ ‘आजकल’ लिखना होता है, तो लिखने का एक नशा सा छाने लगता है, और एक उत्साह बने रहता है कि लिखा जाए, हर हफ्ते लिखा जाए। लेकिन जब गाड़ी पटरी से उतरती है तो ऐसी बुरी तरह उतरती है कि कई-कई महीनों तक कॉलम लिखना नहीं हो पाता। मेरी एक दिक्कत यह भी हो गई है कि सोशल मीडिया पर रात-दिन इतना अधिक लिखना हो जाता है कि वहां पर खासी गुबार निकलने का जरिया रहता है, और उसके बाद लिखने के मुद्दे भी कुछ कम हो जाते हैं। अखबार का संपादक होने के नाते कोई और टोकने वाले नहीं रह जाते कि कॉलम लिखना नहीं हो रहा है। इसलिए पिछले कुछ बरसों में यह कॉलम लिखना नहीं के बराबर हो पाया। अब बोलकर टाइप करने की एक नई तकनीक हाथ लगी है, जिससे तकरीबन पूरा का पूरा बिना गलती के टाइप किया जा सकता है, और फिर कुछ मिनटों में बकाया सुधार हो सकता है इसलिए एक बार फिर यह कोशिश कर रहा हूं कि हफ्ते का यह कॉलम जारी रह सके। एक वक्त तो यह था कि इस कॉलम पर छपी हुई किताब, वही मेरी पहचान बनी हुई थी और कई नए लोगों से मुलाकात होने पर कभी-कभी यह भी सुनने मिलता था कि अरे आपकी वह किताब हमारी देखी हुई है, पढ़ी हुई है, या संभाल कर रखी हुई है। लिखने के लिए कोई ना कोई ऐसा मुद्दा भी जरूरी होता है जो कि लिखने पर बेबस करे, और आज बाकी वजहों के अलावा एक वजह यह भी है कि दिल्ली ने ऐसा एक मुद्दा पेश किया है। 

दिल्ली में करीब 2 दर्जन मजदूरों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है जिन पर यह तोहमत है कि उन्होंने मोदी की आलोचना के पोस्टर दीवारों पर चिपकाए और कहीं-कहीं खंभों पर उनको टांगा भी है। अब यह पोस्टर क्या है इसे देखें तो इनमें मोदी से सवाल किया गया है मोदीजी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया? इस एक सवाल को दीवारों पर टांगने और चिपकाने के जुर्म में 2 दर्जन से अधिक गरीब मजदूर गिरफ्तार किए गए हैं, जिनमें से कुछ का काम है पोस्टर चिपकाने का, और कुछ खाली बैठे हुए थे और जिंदा रहने की बेबसी ने उन्हें मजदूरी करने के लिए यह काम दिलाया था और इस काम में कोई जुर्म नहीं दिख रहा था इसलिए उन्होंने यह किया। गनीमत यही है कि इन दो दर्जन लोगों में से 2-3 को छोडक़र बाकी सारे के सारे हिंदू नाम दिख रहे हैं वरना ये पोस्टर मुल्क के साथ गद्दारी भी करार दिए जाते। अब अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि इन पोस्टरों को छपवाया किसने है, कुछ लोगों का अंदाज है कि आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों ने इसे छपवाया और टंगवाया, लेकिन अभी तक कोई सुबूत पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं इसलिए महज मजदूर गिरफ्तार हो रहे हैं। यह एक अलग बात है कि जिस रात ये पोस्टर चिपके, उसी शाम या रात आम आदमी पार्टी के ट्विटर अकाउंट पर यही सवाल मोदी से पूछा भी गया।

अब सवाल यह है कि यह सवाल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा गया है, और यह सरकार का किया गया खुद का खुलासा है कि उसने किस तरह कोरोना के करोड़ों टीके उस वक्त विदेश भेजे जिस वक्त इस देश में टीके लगना शुरू ही हुआ था। अब यह वैक्सीन डिप्लोमेसी अच्छी थी या नहीं। यह एक अलग बहस का मुद्दा है, यह हकीकत अपनी जगह साफ है कि जब देश में कुछ करोड़ वैक्सीन नहीं लगी थीं, तब भी कुछ करोड़ वैक्सीन देश के बाहर भी दूसरे देशों को भेजी गई थी। देश के बहुत से लोगों का यह मानना है कि दुनिया के किसी समझदार देश ने अपने देश के हर नागरिक के लिए वैक्सीन पूरी तरह जुटा लेने के पहले किसी दूसरे देश की मदद नहीं की है और हर किसी की जिम्मेदारी पहले अपने लोगों को बचाना होना चाहिए। हालांकि ऐसी नौबत में जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री रहते तो उनका क्या सोचना रहता इसे लेकर मेरी अपनी एक सोच है। लेकिन मैं अपनी सोच को इन दोनों तबकों में से किसी एक को बचाने के लिए या घेरने के लिए क्यों इस्तेमाल करूं। आज तो मोदी और उनकी वैक्सीन डिप्लोमेसी को लेकर सवाल करने वाले लोग आमने-सामने हैं, और क्योंकि मोदी के हाथों पुलिस है इसलिए ऐसे सवाल करने वाले लोगों के पोस्टर चिपकाने वाले मजदूर भी गिरफ्तार हो रहे हैं।

यह भी देखना चाहिए कि दिल्ली पुलिस ने कई थानों में जुर्म कायम करके पोस्टर चिपकाने वाले मजदूरों को जिस तरह गिरफ्तार किया है और उन पर जो दफा लगाई है वह कानून क्या है। आईपीसी की धारा 188 कहती है कि लोक सेवक के आदेश की अवमानना करने पर लोगों पर कार्रवाई की जा सकती है। एक दूसरी धारा जो इन मजदूरों पर लगाई गई है वह धारा 269 है जिसके तहत महामारी के दौर में लापरवाही बरतने और संक्रमण फैलाने की आशंका पर कार्रवाई करने का प्रावधान है। अब सभ्य भाषा में लिखे गए और छापे गए इन पोस्टरों में ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई है जो अफवाह हो जो, अभद्र हो, जो किसी का अपमान हो, या जिसे पूछना लोकतंत्र के दायरे के बाहर की बात हो। 

इस देश की जनता क्या अपने प्रधानमंत्री से यह पूछने की हकदार भी नहीं रह गई है कि इस देश के लोगों को लगे बिना यहां की वैक्सीन दूसरे देशों को क्यों भेजी गई? यह एक बहुत साधारण सा सवाल है जिसे पिछले कई हफ्तों से देश की जनता बार-बार पूछ रही है हजार बार पूछ रही है, और केंद्र सरकार के किसी-किसी स्तर से इसका कोई जवाब भी दिया गया है। अगर उसी सवाल को पोस्टरों की शक्ल में दिल्ली की दीवारों के रास्ते प्रधानमंत्री से पूछा गया है तो इसमें किस लोक सेवक के कौन से आदेश की अवमानना होती है यह बात कानून की हमारी बहुत मामूली समझ में बैठ नहीं रही है। इसके अलावा यह सवाल करना किस तरह महामारी के दौर में लापरवाही बरतना है या संक्रमण फैलाने की आशंका पैदा करना है यह भी हमारे समझ से बिल्कुल परे है। यह तो सवाल ही प्रधानमंत्री से इसलिए किया जा रहा है कि देश के लोग वैक्सीन पाने के लिए बेचैन हैं यह पोस्टर लगाने वाले कहीं भी वैक्सीन के खिलाफ कोई बात नहीं कह रहे, बल्कि वैक्सीन की अपनी चाहत बतला रहे हैं। ऐसे लोगों को तो इस बात को उठाने के लिए सम्मानित करना चाहिए कि वे वैक्सीन की जरूरत साबित कर रहे हैं, लेकिन उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है क्योंकि हिंदुस्तान में आज प्रधानमंत्री से सवाल करना केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस एक जुर्म करार दे रही है। यह सवाल देश के तकरीबन तमाम गैर एनडीए नेता उठा चुके हैं तकरीबन तमाम गैरचापलूस अखबार भी यह सवाल उठा चुके हैं। 

ऐसे में इस सवाल को अगर एक जुर्म जाता है और उस दिल्ली में जुर्म माना जाता है जहां पर संसद बेसुध सोई हुई है, लेकिन जहां पर जागी हुई अदालतें केंद्र सरकार से बहुत से सवाल कर रही हैं। टीकों को लेकर भी सवाल कर रही हैं, और टीके लगाने को लेकर सरकार पर जोर भी डाल रही हैं कि इन्हें किस तरह मुफ्त में तमाम लोगों को लगाया जाना चाहिए। ऐसी दिल्ली में जहां पर कि सरकार के पास अदालत में देने के लिए कोई जवाब नहीं है और जहां पर वह अदालत को कहती है कि उसे सरकार के इस काम में दखल नहीं देना चाहिए उसे अपनी सीमा के भीतर रहना चाहिए, वहां पर एक मासूम सा सार्वजनिक सवाल जेल दिलवा रहा है, तो यह लोकतंत्र का एक किस्म से खात्मा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हीं के बहुत से शुभचिंतक, चेतन भगत से लेकर अनुपम खेर तक, सार्वजनिक रूप से यह बात समझा रहे हैं कि आज के हालात सुर्खियों पर काबू पाने या अपनी छवि को सुधारने-चमकाने के नहीं हैं, आज के हालात जिंदगियों को बचाने के हैं, तो ऐसी हालत में भी जिस किसी ने ऐसे मजदूरों की गिरफ्तारी का फैसला लिया है, हमारा यह मानना है कि यह फैसला लेने वाले लोग केंद्र सरकार या नरेंद्र मोदी के शुभचिंतक नहीं हो सकते। नरेंद्र मोदी की और बहुत सी गलतियां हो सकती हैं, बहुत सी खामियां हो सकती हैं, लेकिन क्या वे इतने नासमझ हो सकते हैं कि इन पोस्टरों पर मजदूरों की गिरफ्तारी की तोहमत और बदनामी अपने नाम आज और मढ़वा लें ? यह बात मुमकिन तो नहीं लगती है, लेकिन हम मोदी के ऐसे करीबी लोगों के, करीबी लोगों के, करीबी लोगों के, करीब भी नहीं हैं कि हमसे पूछ सकें कि आज के हालात में क्या सरकार और पुलिस की प्राथमिकता इस मासूम सवाल वाले पोस्टर को चिपकाने वाले गरीब बेरोजगार मजदूरों को गिरफ्तार करना होना चाहिए? आज हिंदुस्तान में सवाल कौन किससे पूछ सकते हैं? फिर यह है कि एक सवाल लिखकर पोस्टकार्ड भेजा गया हो, और पहुंचाने गए हुए डाकिए को गोली मार दी गई हो, उसे क्या कहा जाए?

आज तो जो मजदूर एक दिन की जिंदगी और गुजार लेने के लिए अपनी तरफ से कोई कानूनी मेहनत कर रहे हैं, उनकी ऐसी गिरफ्तारी हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट में दो मिनट भी खड़ी नहीं हो पाएगी, और जिस दिल्ली में बड़ी-बड़ी अदालतों की भरमार है, इन मजदूरों की तरफ से किसी को एक बड़ी अदालत में जाना चाहिए। अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो पोस्टर चिपकाने की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देख-देखकर ऐसे मजदूरों की गिरफ्तारी में जुटी हुई दिल्ली की पुलिस और कहां तक पहुंचेगी, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। जिस दिल्ली में लाश जलाने को जगह नहीं मिल रही है, जहां अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं मिल रही है, जहां कब्रिस्तान में दफनाने को जगह नहीं मिल रही है, जहां पर इंजेक्शन और दूसरी जीवनरक्षक दवाइयां नहीं मिल रही है, वहां पर ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस के पास वक्त ही वक्त है, वह पोस्टर चिपकाने वाले लोगों तक को पहचानने के लिए उनकी शिनाख्त करने के लिए सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग देखते बैठी है, और फिर उन मजदूरों को ढूंढकर उन्हें पकड़ते गिरफ्तार करते घूम रही है! क्या देश की राजधानी में पुलिस के पास यही आज सबसे महत्वपूर्ण काम रह गया है? और क्या ऐसे सवाल पूछने पर इस देश में क्या गिरफ्तारी के लिए महज मजदूर रह गए हैं? जिन मजदूरों के पास कोई काम नहीं रह गया है, जिनके पास कोई खाना नहीं रह गया है, उन्होंने अगर एक कानूनी काम करने का मजदूरी का जिम्मा लिया, तो उन्हें इस तरह गिरफ्तार किया जा रहा है ! क्या इन पोस्टरों को लगाने से दिल्ली में महामारी का संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ रही है? महामारी अधिनियम के तहत ऐसी गिरफ्तारियां, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लायक हैं ताकि महामारी एक्ट के तहत ऐसी और कार्रवाई ना हो सके और बेकसूर गिरफ्तार न किए जा सकें।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


Previous12Next