राजपथ - जनपथ

Date : 25-Dec-2018

खबर है कि भाजपा के एक खेमे ने विधानसभा चुनाव में करारी हार के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया है। आप चौंक गए होंगे कि जिसकी बुनियाद पर भाजपा खड़ी है वह हार के लिए जिम्मेदार कैसे हो सकती है। हार से नाराज नेता आरएसएस की व्याख्या रमन,  सौदान और सरोज के रूप में कर रहे हैं। और तीनों को ही हार के लिए दोषी मान रहे हैं।
सुनते हैं कि पार्टी के कई नेता पिछले दिनों राष्ट्रीय नेताओं से मिले थे। उन्हें विस्तार से बताया कि आरएसएस ने पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र खत्म कर दिया था। सरकार के कामकाज का फीडबैक पार्टी स्तर पर लेना बंद हो गया था। आरएसएस ने चंद नौकरशाहों को फ्री-हैंड दे दिया था। इसके कारण सरकार आम जनता से दूर होते चली गई और इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ा। पार्टी का यह खेमा दबे स्वर में सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग रखने की मांग कर रहा है। बहरहाल, पार्टी में अंदरूनी लड़ाई तेज हो गई है। 

समाजवादी सिफारिश
कांग्रेस और समाजवादियों का हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। 90 के दशक में दोनों के बीच में दूरियां कम हुई और अब राष्ट्रीय राजनीति में आज एक-दूसरे के साथ नजर आते हैं। प्रदेश में मोतीलाल वोरा जैसे कई नेता हैं जो पहले समाजवादी थे बाद में कांग्रेस की मुख्य धारा में आए। समाजवादी नेताओं की पूछपरख अभी भी होती है। 
सुनते हैं कि समाजवादी नेता रघु ठाकुर की सिफारिश पर कांग्रेस ने नवागढ़ से गुरूदयाल बंजारे को प्रत्याशी बनाया और वे भारी मतों से चुनाव जीते। गुरूदयाल, रघु ठाकुर के करीबी माने जाते हैं। रघु ठाकुर के मोतीलाल वोरा और प्रदेश के अन्य नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं। यही वजह है कि इस समाजवादी नेता की सिफारिश को महत्व दिया गया। 

सबसे सीधे से चिपक गए?
मंत्रिमण्डल के शपथ ग्रहण समारोह में रायपुर के एक नेता की सक्रियता चर्चा का विषय रही। कभी विधानसभा चुनाव लड़ चुके इस नेता की पहचान अब रायपुर से लेकर दिल्ली तक काम करवाने के लिए होती है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले इस नेता ने पार्टी छोडऩे का मन बनाया था। भाजपा सरकार के एक मंत्री के साथ उनकी बैठक भी हो चुकी थी। भाजपा संगठन ने भी उन्हें पार्टी में शामिल करने के लिए सहमति दे दी थी, पर सत्ता परिवर्तन की आहट से यह कांग्रेस नेता ठिठक गया और पार्टी छोडऩे का इरादा बदल दिया। यह नेता शपथ ग्रहण समारोह में एक सीधे-साधे मंत्री के आगे-पीछे होते देखा गया। 
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Date : 24-Dec-2018

सीएम भूपेश बघेल कई दफा कह चुके हैं कि अफसरों के खिलाफ बदले की भावना से कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। उन्होंने जो कहा था उस पर कायम दिख रहे हैं। रविवार की मध्यरात्रि में अफसरों के फेरबदल के आदेश जारी किए गए। इसमें दुर्ग कलेक्टर उमेश अग्रवाल का नाम नहीं होने से लोगों को काफी अचरज हुआ। जबकि उमेश के खिलाफ कांग्रेस चुनाव आयोग में भी गई थी। हालांकि दंतेवाड़ा, बिलासपुर और जशपुर कलेक्टर के खिलाफ भी चुनाव आयोग में शिकायत हुई थी उन्हें हटाया भी गया, लेकिन कोई पनिशमेंट पोस्टिंग नहीं दी गई। सिर्फ दंतेवाड़ा कलेक्टर रहे सौरभ कुमार की पोस्टिंग होना बाकी है। वैसे अभी जिला स्तर पर कुछ और कलेक्टरों के तबादले होना तय है क्योंकि कांग्रेस ने चुनाव आयोग से आठ कलेक्टरों के खिलाफ शिकायत की थी कि वे भाजपा एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। रायगढ़ कलेक्टर को जिले से हटाने के पीछे एक वजह यह भी है कि आईएएस छोड़कर खरसिया से चुनाव लडऩे वाले ओपी चौधरी ने शम्मी आबिदी के कलेक्टर रहने को अपने चुनाव के लिए जरूरी बताया था। पिछली सरकार ने जब कलेक्टरों में फेरबदल किया था तब शम्मी आबिदी को इसी वजह से वहां रहने दिया गया था। लेकिन सरगुजा में बहुत अच्छा काम करने के बावजूद छत्तीसगढ़ की माटी संतान किरण कौशल को बालोद जैसे अपेक्षाकृत कम महत्व के जिले में इसलिए भेज दिया गया था कि सरगुजा में टीएस सिंहदेव उनके काम से खुश थे, और वे चाहते थे कि उनका तबादला न हो। सरकार में बैठे लोगों ने नेता प्रतिपक्ष के मुंह से तारीफ सुनते ही किरण कौशल को एक छोटे जिले में भेज दिया था। 

कुछ अफसरों के दिन बदले
रमन सरकार में अच्छा काम करने वाले कई अफसर दुर्भावना के चलते हाशिए पर रहे। इन्हीं में यशवंत कुमार का नाम भी लिया जाता है। वे सीएम सचिवालय में बेहद ताकतवर रहे अफसर की नापसंदगी के शिकार रहे, लेकिन सरकार बदलने के बाद फिर उनकी क्षमताओं का उपयोग होना शुरू हो गया है। उन्हें रायगढ़ कलेक्टर बनाया गया है। ऐसी ही दुर्भावनापूर्वक पोस्टिंग 95 बैच की आईएएस अफसर श्रीमती डॉ. मनिन्दर कौर द्विवेदी की की गई थी। उन्हें दिल्ली में सीएसआईडीसी का ओएसडी बनाया गया था, जबकि यहां सीएसआईडीसी एमडी के पद पर उनसे काफी जूनियर आईएफएस अफसर पदस्थ हैं। सरकार बदलने पर उनकी पोस्टिंग को दुरूस्त किया गया और उन्हें दिल्ली में आवासीय आयुक्त के पद पर पदस्थ किया गया है। दरअसल गौरव द्विवेदी और मनिंदर कौर द्विवेदी से सरकार के एक ताकतवर अफसर की नाराजगी यह थी कि केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद वे जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से शिष्टाचार की मुलाकात करने गए थे, तब वे मुख्यमंत्री सचिवालय के भीतर के एक ऐसे अफसर के मार्फत समय लेकर गए थे जिसे किनारे करने की कोशिश चल रही थी, और कामयाब भी थी। मुलाकात के इसी चैनल को लेकर यह तय कर लिया गया था कि इस आईएएस जोड़े को किनारे ही रखना है।
 छत्तीसगढ़ में लोगों ने मुख्यमंत्री-सचिवालय की ताकत भी पिछले बरसों में देखी है, और वहां की महल सरीखी राजनीति भी। इसलिए नई सरकार ऐसी नौबत न ही आने दे, तो ही उसके लिए भला होगा। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 23-Dec-2018

भाजपा के दिग्गजों के चुनाव हारने के बाद पता लगा है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने ऐसे लोगों के चुनाव क्षेत्र का एक सर्वे करवाया, और उनकी हार के कारणों को बताते हुए उन्हें चि_ी लिखी। दसियों करोड़ का चुनाव लडऩे वाले और बुरी तरह हारने वाले एक मंत्री को जब यह पता लगा कि उसने अपने निजी सहायक और खास कार्यकर्ताओं को लोगों को बांटने के लिए जो रकम दी थी, वह पूरी की पूरी दबा दी गई, तो मंत्री ने ऐसे पुराने करीबी लोगों को पीट-पीटकर घर से निकाल दिया। अब इनमें से एक के भाई ने तीस लाख रूपए की एक कार खरीद ली है जो कि लोगों की नजरों में खटक भी रही है। इसमें से एक मोटी रकम जनमत और जनधारणा तैयार करने वाले तबके के लिए भी रखी गई थी, और उसका कोई हिस्सा लोगों तक पहुंचा नहीं। ऐसे कुछ बड़े और हारे हुए दिग्गजों को सावधान इसलिए भी होना पड़ रहा है कि  इनमें से कुछ को पार्टी लोकसभा का चुनाव भी लडऩे कह सकती है। 

सुपारी दी थी, पर बात बनी नहीं
कांग्रेस के बीच इस बात की बड़ी जमकर चर्चा है कि पिछले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कुछ करीबी लोगों ने दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े नेता से इस बात का सौदा किया था कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री और चाहे जो भी बन जाए, भूपेश बघेल न बने। अब यह सौदा इतनी बड़ी रकम का सुनाई पड़ रहा है कि यह किसी एक आदमी के बस की नहीं दिखती, इसलिए यह भी अंदाज है कि कुछ अलग-अलग लोगों ने मिलकर इक_ा करके यह रकम दिल्ली पहुंचाई थी। इसके एवज में वहां पर भूपेश से परे तगड़ी कोशिश भी हो गई थी, लेकिन आखिर में भूपेश और सिंहदेव एक हो गए तो बात इन्हीं दोनों में से एक पर तय हुई, और भूपेश मुख्यमंत्री बन गए। 
अब जिसने दिल्ली में यह सौदा किया था, उससे खफा, सुपारी देने वालों के बीच से यह बात निकल रही है, पता नहीं कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच पाएगी या नहीं। 
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Date : 22-Dec-2018

सीएम के पद पर रहते डॉ. रमन सिंह आधा दर्जन विभागों के मुखिया भी थे। वे एक शालीन राजनेता माने जाते हैं, पर उनके विभागों में बाकी विभागों की तुलना में ज्यादा अनियमितता देखने को मिल रही है। स्वाभाविक तौर पर विभागों के रोजमर्रा का काम देखने की उन्हें फुर्सत नहीं थी। वे अपने भरोसे के नौकरशाहों पर ही निर्भर थे, लेकिन उन्होंने रमन सिंह की व्यस्तता का फायदा उठाकर खूब खेल खेला।
सुनते हैं कि उनके एक-दो विभागों में तो इतनी अनियमितता हुई है, जिसका जवाब देने में उन्हें मुश्किल हो सकती है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि एक-दो विभाग में तो सामान्य कामकाज के बजाए कुछ लोगों को उपकृत करने का खेल चल रहा था और करोड़ों की अनियमितता हुई है। विधानसभा चुनाव में रमन सरकार की बुरी हार हुई है। लोकसभा के चुनाव निकट है, ऐसे में अनियमितता के ये मामले सामने आते हैं, तो रमन सिंह के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। 

नक्सलियों ने साथ दिया?
बस्तर में भाजपा की बुरी हार की अंदरूनी समीक्षा हो रही है। यह कहा जा रहा है कि हार के लिए अन्य कारणों के साथ-साथ वामपंथी रूझान के लोगों के कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। सुनते हैं कि कांग्रेस नेता राजेश तिवारी बस्तर संभाग के पिछले तीन साल से अंदरूनी इलाकों में दौरा कर रहे थे। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से वामपंथ समर्थकों को कांग्रेस का सहयोग करने के लिए तैयार किया। चर्चा तो यह भी है कि पहले मनीष कुंजाम भी कांग्रेस नेताओं को कुछ जगहों पर सहयोग कर रहे थे, लेकिन चुनाव के कुछ महीने पहले वे अलग हो गए, और जोगी पार्टी के साथ उनका गठबंधन हो गया। तब तक कांग्रेस बस्तर के अंदरूनी इलाकों में मजबूत हो गई थी। और जब नक्सलियों ने मतदान के बहिष्कार का आव्हान किया तो इसका कोई असर नहीं पड़ा। जमीनी स्तर पर मेहनत से कांग्रेस को बस्तर में अभूतपूर्व सफलता मिली। 
एक दूसरी चर्चा यह भी है कि नक्सलियों ने पूरे बस्तर में मतदाताओं को कांगे्रस का समर्थन करने को कहा, सिवाय देवती कर्मा की दंतेवाड़ा सीट के। देवती के पति महेंद्र कर्मा पूरी जिंदगी नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाते रहे और उन्हें झीरम हमले में नक्सलियों ने छांटकर मारा था। इसी एक सीट पर उन्होंने कांगे्रस को नहीं जीतने दिया। अब यह बात महज चर्चा है, इसका कोई सुबूत तो है नहीं।
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निराशा इतनी है कि...
विधानसभा चुनाव में बुरी हार से भाजपा में निराशा का माहौल है। हाल यह है कि हार की समीक्षा नहीं हो पा रही है। कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ्तर जाना बंद कर दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को हार को भूलकर लोकसभा चुनाव में जुटने के लिए कहा है। कौशिक खुद विधानसभा चुनाव जीत गए हैं, इसलिए वे तो हार को भूलकर दौरे पर निकल गए हैं, लेकिन निचले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना उनके लिए चुनौती बन गया है। 
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Date : 21-Dec-2018

शपथ लेने के बाद सीएम भूपेश बघेल ने जब आईएएस के वर्ष-95 बैच के अफसर गौरव द्विवेदी को अपना सचिव चुना, तो प्रशासनिक बिरादरी में हलचल मच गई। क्योंकि पिछली सरकार में गौरव हाशिए पर रहे हैं। उनका कोई पॉलिटिकल कनेक्शन भी नहीं रहा है। सिवाय इसके कि वे बेहद काबिल अफसर माने जाते हैं। बिलासपुर में जन्मे गौरव छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यहां आए। वे पहले केरल कैडर के थे बाद में उन्हें और उनकी पत्नी डॉ. मनिन्दर कौर द्विवेदी को एक साथ छत्तीसगढ़ कैडर आबंटित हो गया। 
जोगी सरकार में वे डायरेक्टर बजट के पद पर रहे। उनकी कार्यशैली के दिवंगत वित्तमंत्री डॉ. रामचंद्र सिंहदेव मुरीद रहे हैं। रमन सरकार की सबसे सफल रियायती चावल स्कीम के मास्टर माइंड रहे और पूरी योजना के कम्प्यूटराइजेशन का श्रेय उन्हें जाता है। उन्हें इसके लिए प्रधानमंत्री अवार्ड भी मिला। बाद में केन्द्र सरकार में आईटी की कई सफल योजनाओं के सूत्रधार रहे हैं। सात साल बाद यहां आए, तो उन्हें 15 दिनों तक कोई काम नहीं दिया गया, मंत्रालय में बैठने की जगह नहीं मिली, और कार भी नहीं मिली। 
बाद में उन्हें प्रशासन अकादमी भेजा गया। वे सीएम सचिवालय के अफसरों की नापसंदगी के शिकार रहे, और यही नापसंदगी दिखाने के लिए उन्हें कई हफ्ते बिना काम बिठाया गया। अफसरों की कमी हुई, तो उन्हें स्कूल शिक्षा का दायित्व मिला। इस विभाग में उन्होंने बेहद कम समय में शिक्षाकर्मियों का संविलियन कर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। जबकि घोषणा के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार में अफसरों की फौज संविलियन को लेकर उलझी पड़ी थी। वे प्रचार-प्रसार से दूर खामोशी से काम करने वाले अफसर माने जाते हैं। सीएम की पहली प्रेस काफ्रेंस में भी वे सुरक्षाकर्मियों के बीच दूर खड़े रहकर सबकुछ व्यवस्थित हो जाए, इस कोशिश में जुटे थे। यह देखकर कई जानकार लोग कहने को मजबूर हो गए कि यही है राइट च्वाइस। 

इन कलेक्टरों का क्या होगा?

तबादलों पर रोक के चुनाव आयोग के आदेश से कई कलेक्टर-एसपी ने राहत की सांस ली है। इनमें से एक-दो कलेक्टरों ने तो पार्टी कार्यकर्ताओं की तरह काम किया। चार कलेक्टरों की शिकायत चुनाव आयोग में भी की गई थी। एक कलेक्टर ने तो बस्तर में एक कांग्रेस प्रत्याशी के घर में ही झगड़ा करा दिया। गृहकलह की वजह से कांग्रेस प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस की सरकार बन गई है और अब कलेक्टर निशाने पर हैं। 26 जनवरी के बाद उन्हें घर में झगड़ा कराने के मामले पर सफाई देनी पड़ सकती है। और जिन कलेक्टरों की शिकायत कांगे्रस ने चुनाव आयोग को की थी, उनके खिलाफ तो कार्रवाई अब सरकार की नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है।

ये भूपेश बघेल और कमलनाथ भी अजीब मुख्यमंत्री हैं। 
जब 10 दिन का टाइम था तो शपथ ग्रहण के 2 घण्टे के अंदर किसानों के कर्ज माफ करने की क्या जल्दी थी? 
यूपी वाले बाबाजी ने तो सबसे पहले मुख्यमंत्री आवास का शुद्धिकरण करवाया था। 
कालू कुत्ते को बिस्किट और गाय को गुड़ खिलाई थी। 
इसके बाद अपने ऊपर चल रहे मुकदमो को वापस लेने की फाइल में दस्तखत किए थे। 
आप भले ही भूल गए लेकिन हमें तो याद है।
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पति-आज सब्जी ठीक नहीं बनी है!!
पत्नी-चुप चाप खा लो...
इसी सब्जी को फेसबुक पे 61 लोगों ने लाइक किया है??
और 25 लोगों ने तो कॉमेंट में यम्मी भी लिखा है आपके तो नखरे ही अलग है।
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मप्र की बेरोजगारी के लिए यूपी-बिहारी जिम्मेदार; कमलनाथ 
रीयली?
बंगाल से छिंदवाड़ा का सांसद बन मुख्यमंत्री बनने वाले का क्या करें ?
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बदलते परिवेश मे अब यूपीएससी, पीएससी को भावी अफसरो से नौकरी के पहले ही पूछना चाहिए, पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
-सुभाष मिश्रा
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बेकार ही कहते हैं लोग 
कि पत्नियाँ कभी अपनी गलती नहीं मानती
मेरी वाली तो रोज मानती हैं...
गलती हो गई तुमसे शादी कर के...
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Whosoever called it the Idiot Box must have anticipated Arnab . 
 -Madhup Mohta
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पता नहीं ठंड का असर है या चुनाव परिणाम का ...
अकड़ के बैठने वाले लोग भी सुकड़ के बैठ रहे है
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दिग्विजय सिंह के घर पहुँचे शिवराज सिंह, वहाँ दिग्विजय ने की शिवराज की जोरदार अगवानी..राजा साहब के बेटे ने शिवराज के छुए पैर...
जो लोग नेताओं के चक्कर में आपसी सम्बंध खराब करते हैं, उनके लिए सबक है इस तरह की तस्वीरें...

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Date : 19-Dec-2018

वयोवृद्ध कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा के दांव-पेंच से प्रदेश के बाकी नेता परेशान हैं। पहले सीएम पद के लिए ताम्रध्वज साहू का नाम अड़ाकर बाकी दावेदारों को उलझा दिया था। विवाद बढ़ता देख हाईकमान ने भूपेश बघेल को सीएम बनाकर बीच का रास्ता निकाला। सबकुछ ठीक चल रहा था कि मंत्रिमंडल के गठन को लेकर कई तरह की समस्या पैदा हो गई। पार्टी के दूसरे नेता वोरा के रूख पर नजर रखे हुए हैं। कुछ नेताओं का अंदाजा है कि वोरा अपने बेटे अरूण को मंत्री बनाने के लिए पार्टी हाईकमान के जरिए दबाव बना सकते हैं। 
वोरा ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि उन्होंने अपने कुछ करीबियों के बीच यह कहा बताते हैं कि रविन्द्र चौबे को विधानसभा अध्यक्ष अथवा प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहिए। चौबे का नाम आगे कर इस दिग्गज नेता ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सात बार के रविन्द्र चौबे को मंत्री पद के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल है। वेे दिग्विजय और जोगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का भी दायित्व संभाला। पर वोरा के कथन के कई मायने हैं। एक तो चौबे को कोई दूसरा अहम दायित्व दिलवाकर अपने बेटे अरूण को मंत्रिमंडल में स्थान सुनिश्चित करना चाहते हैं। क्योंकि एक ही जिले से दो ब्राम्हण को मंत्रिमंडल में जगह मिलना मुश्किल है। रविन्द्र को पूरी तरह किनारे लगाकर अरूण को पद दिया गया तो छत्तीसगढ़ी-गैर छत्तीसगढ़ी का मुद्दा हावी हो सकता है। ऐसे में वोरा के रूख पर निगाहें टिकी हुई हैं। 

जितने बरस नौकरी, उतने तबादले
नई सरकार के आने के बाद एक छोटे से प्रशासनिक फेरबदल में भारतीय प्रशासनिक सेवा अफसर चंद्रकांत उइके भी प्रभावित हुए हैं। वे जनसंपर्क संचालक से संस्कृति संचालक के साथ-साथ उप सचिव आबकारी, वाणिज्यिक कर बनाए गए। वे राज्य प्रशासनिक सेवा से पदोन्नत होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए। भाप्रसे के वर्ष-08 बैच के अफसर उइके का कुल 23 साल की सेवा में 20 बार तबादला हुआ है, इतनी बार कि एक-दो तबादले उन्हें खुद को ठीक से याद नहीं। उइके नियम-कायदे पसंद अफसर माने जाते हैं और उनका तबादला किसी शिकायत वजह से भी नहीं होता है। बल्कि कई बार तो सीनियर अफसर उनके नियम पसंद होने के कारण तबादला करवा देते थे। खास बात यह है कि उइके को कभी इसका मलाल नहीं रहा। उन्होंने कभी तबादला रूकवाने की भी कोशिश नहीं की। उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिली, हंसते-हंसते निर्वहन किया। सुनते हैं कि पीएससी सचिव के पद पर पदस्थापना के दौरान गोपनीयता के नाम पर होने वाली अनियमितता पर सख्ती से अंकुश लगाया। जिससे वहां के कर्ता-धर्ता परेशान हो गए और एक बार फिर उनका तबादला हो गया। ऐसे समय में जब कई अफसर मलाईदार विभाग पाने के लिए नेताओं के आगे-पीछे होते देखे जा रहे हैं, उन्हें उइके से सीख लेनी चाहिए। जनसंपर्क में भी वे एक साल से कम ही रहे, लेकिन फिर दूसरे विभाग में भेज दिया गया, तो भी हँसते-हँसते ही गए। कुर्सी से मोह इतना ही रहना चाहिए कि तबादले के अगले दिन उसे छोड़ते कोई दिक्कत न हो। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Dec-2018

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा संगठन के ताकतवर नेता सौदान सिंह के खिलाफ मुहिम शुरू हो गई है। सौदान सिंह के पास छत्तीसगढ़ और तेलंगाना का प्रभार था। पर दोनों ही जगह पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 
सुनते हैं कि पार्टी के एक दिग्गज आदिवासी नेता सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग करने के लिए माहौल बना रहे हैं। वे इस सिलसिले में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ-साथ आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारियों से चर्चा करने वाले हैं। पार्टी के दिग्गजों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि प्रदेश में सामूहिक नेतृत्व की परंपरा खत्म हो गई। पहले हर दो महीने में कोरग्रुप की बैठक होती थी, जिसमें सरकारी योजनाओं के फीडबैक पर चर्चा होती थी। 
यह भी कहा गया कि निगम-मंडलों और आयोगों में पोस्टिंग भी कोरग्रुप तय करती थी, लेकिन पिछले 5 सालों में कोरग्रुप की गिनती की ही बैठकें हुई हैं, इसमें भी सिर्फ पार्टी की संगठनात्मक गतिविधियों पर ही बात हुई। पार्टी नेता कह रहे हैं कि सरकार में अफसरशाही हावी हो गई थी। और यह हार का प्रमुख कारक रही है। पिछले दिनों एक पूर्व मंत्री के शंकर नगर निवास पर कई प्रमुख नेता जुटे, जिसमें तमाम बिंदुओं पर चर्चा हुई और इसमें भी कहा गया कि प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता फैल गई थी। कुल मिलाकर पार्टी के एक बड़ा तबका डॉ. रमन सिंह से खफा चल रहा है। संकेत है कि हार की समीक्षा बैठक में कुछ लोग अपना गुबार निकाल सकते हैं। 


आज हिन्दुस्तान से लेकर फ्रांस तक जो लड़ाकू विमान बिना बम बरसाए भी धमाके कर रहा है, उस राफेल विमान का छत्तीसगढ़ से गहरा रिश्ता है। जब भारत सरकार ने उसे खरीदा भी नहीं था, तब भी छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सरायपाली के पास यह गांव बसा हुआ है और इसी के नाम पर फ्रांस की कंपनी ने अपने लड़ाकू विमान का नाम रखा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 16-Dec-2018

कांग्रेस में सीएम के चयन को लेकर दिनभर ड्रामेबाजी चलती रही। दिल्ली से यह खबर उड़ी कि ताम्रध्वज साहू को सीएम बनाया जा सकता है। रायपुर और दुर्ग में उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। घंटेभर बाद यह खबर आई कि ताम्रध्वज का स्थानीय बड़े नेताओं ने विरोध कर दिया है। और उनका सीएम पद खटाई में पड़ गया है। इससे उनके समर्थक मायूस हो गए। इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा के लोग टकटकी निगाह लगाए हुए थे उन्हें मौका मिल गया। उन्होंने तुरंत साहू समाज के लोगों को आगे कर दिया। 
हड़बड़ी इतनी थी कि भाजपा के साहू समाज के नेता ही टिकरापारा स्थित समाज के भवन साहू सदन पहुंच गए और पूरे प्रदेशभर में विरोध की रणनीति बनाने लगे। इसी बीच कई टीवी चैनल भी वहां पहुंच गए, फिर क्या था। वे इधर-उधर घूमने लग गए। लेकिन टीवी चैनलों पर उनका चेहरा तो आ चुका था। विरोध की अगुवाई भाजपा से रायपुर ग्रामीण से टिकट के दावेदार रहे एक नेता कर रहे थे, लेकिन उनके पीछे प्रदेश भाजपा के बड़े लोग थे। दो-तीन घंटे बाद विरोध के स्वर धीमे पड़ गए, और इसको लेकर बड़ा विवाद करने की कोशिश को झटका लग गया। 

नेता प्रतिपक्ष कौन?
सीएम पद से हटने के बाद डॉ. रमन सिंह के लिए राहें आसान नहीं दिख रही है। उनका नेता प्रतिपक्ष बनना तकरीबन तय माना जा रहा है, लेकिन विधायक दल के सदस्यों में ज्यादातर बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक माने जाते हैं। बृजमोहन के नजदीकी अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल, शिवरतन शर्मा जीतकर आ गए हैं। इसके अलावा धमतरी की रंजना साहू, विद्यारतन भसीन, डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी भी इसी खेमे से जुड़े हैं। 
जलकी प्रकरण के बाद सीएम और बृजमोहन में दूरियां बढ़ गई है। हालांकि इस प्रकरण के पीछे सीएम न होकर उनके करीबी अफसरों की भूमिका ज्यादा रही है। ऐसे में सदन के भीतर बृजमोहन की राय  के बिना सीएम सदन में ज्यादा कुछ कर पाएंगे, ऐसा नहीं लगता। अब जब डॉ. रमन सिंह सरकार नहीं चला रहे, और अफसरों की टीम उनके साथ नहीं है, तो ऐसे में पार्टी के लोगों की तरफ देखकर और उनके साथ ही उन्हें आगे बढऩा होगा। राज्य में भाजपा की जैसी बुरी शिकस्त हुई है, उसमें रमन सिंह किसी को कुछ अधिक बोलने की हालत में भी नहीं हैं, और वैसे भी वे लोगों को कुछ बोलते नहीं हैं।

व्हाट्सएप से
- शिवराज सिंह चौहान ने बंगला छोडऩे में 24 घंटे भी नहीं लगाए, स्टाफ से लेकर माली तक का व्यक्तिगत रूप से शुक्रिया अदा किया, मुख्यमंत्री निवास जैसा मिला था उससे बेहतर छोड़ कर गए..बाथरूम की टोटी क्या बाग़ से एक फूल भी नहीं तोड़ा..पद से थोड़े नीचे ज़रूर आए..पर क़द से बहुत ऊपर उठ गए।

- 11 दिसंबर को ईशा अंबानी की विदाई के समय मोदी जी बुरी तरह रो रहे थे। उन्हें देखकर मुकेश अंबानी – 'अरे भाई ठीक है... इतना रोने की जरूरत नहीं है।Ó
मोदी जी : 'भाई, तुम्हें पता नहीं है। आज मैं ये चौथी विदाई देख रहा हूं।Ó

- कांग्रेसी मित्रों से अपील है कि वे अपने चार-पांच साल के अनुभव से भाजपाई मित्रों को हार सहन करना सिखाएं। आपका तजुर्बा किसी की जान बचा सकता है।

- चलो चारों ना सही, हमारी दो धाम की यात्रा तो हो गयी...एक बद्रीनाथ की दुलहनिया और दूसरी केदारनाथ...
पैसे होने से कुछ नहीं होता दिल भी बड़ा होना चाहिए

- ईशा अम्बानी के शादी में बूंदी का रायता नहीं था बताओ 
क्या करोगे इतने पैसे का...

- आज घरवाली ने तुनक कर कह ही दिया कि
अखबार और न्यूज चैनलों के चक्कर में आकर ये मत सोचने लग जाना कि सरकार बदल गयी है..

-औरतों के लिए मेकअप किट मिलनी  चाहिए..!!

कब तक देश के नेता बस दारू बाटेंगे..!!
एक मतदाता महिला की आवाज...!! (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Dec-2018

सोशल मीडिया में यह खबर फैली कि रमन सरकार के ताकतवर प्रमुख सचिव अमन सिंह प्रदेश छोड़कर भाग गए हैं। अमन सिंह कांगे्रस और भाजपा के कई नेताओं की आंखों की किरकिरी रहे हैं। ऐसे में इस तरह का हल्ला उडऩा स्वाभाविक था। क्योंकि जोगी सरकार में भी सलाहकार रहे आरएलएस यादव को लेकर नेताओं में नाराजगी रही है और सरकार बदलने के अगले दिन प्रदेश छोड़कर चले गए। पर अमन सिंह कहीं नहीं गए। वे छत्तीसगढ़ में ही हैं और जल्द प्रदेश छोडऩे का उनका इरादा भी नहीं है। वे इस्तीफा देने के तुरंत बाद मंत्रालय गए और सभी विभागों के कक्ष से होकर गुजरे। संकेत साफ था कि सरकार बदलने के बाद उनकी हैसियत भले ही पहले जैसी नहीं रह गई, लेकिन रूतबा बरकरार रहेगा। क्योंकि भूपेश बघेल को छोड़कर बाकी सीएम पद के दावेदारों से उनके ताल्लुक अच्छे हैं। यह एक अलग बात है कि जब अफसरों ने उन्हें विदाई देने के लिए उनसे समय मांगा, तो उन्होंने किसी विदाई पार्टी से मना कर दिया। केंद्र सरकार में आज भी बड़े-बड़े पब्लिक सेक्टरों से लेकर कई दूसरी महत्वपूर्ण जगहों पर उनके लिए पूरी संभावना है, और वे अगला कोई काम या जिम्मा संभालने के पहले डॉ. रमन सिंह का बकाया काम पूरा करने में लगे हैं। 

बाबाराज जारी
अगले मुख्यमंत्री का नाम इस अखबार के छपने तक तय हो जाएगा। अभी जिन चार नामों पर चर्चा चल रही है उनमें से एक सरगुजा राजघराने के भूतपूर्व शासक परिवार के टी.एस. सिंहदेव हैं। वे राजसी पृष्ठभूमि से आए हैं, लेकिन वहां के लोगों की उनसे मोहब्बत ऐसी है कि हर आम व्यक्ति भी उन्हें बाबा कहकर बुलाता है, या बाबा कहकर उनका जिक्र करता है। जो लोग अधिक सम्मान से बोलना चाहते हैं वे बाबा साहब कहते हैं, लेकिन कोई बाबा कहे, तो भी वे उसका कोई बुरा नहीं मानते। अब अगर डॉ. रमन सिंह के बाद टी.एस. सिंहदेव मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह बाबाराज की निरंतरता जारी रहेगी। रमन सिंह को सस्ते चावल देने की वजह से चाऊरवाले बाबा कहा जाता था, कुछ तो जनता ने भी यह नाम उछाला, और कुछ इसे खुद भाजपा ने आगे बढ़ाया। यह एक अलग बात है कि सस्ते चावल के कई बरस गुजर गए थे, और छत्तीसगढ़ी वोटर उसे अपना हक मान चुके थे, जान चुके थे, और उसके बाद जब सरकार दारू बेचने लगी तो रमन सिंह का नाम उनके आलोचक दारूवाले बाबा भी रख चुके थे, और कुछ आलोचकों ने चुनाव के मौके पर उनके खिलाफ, ओ दारूवाले बाबा गाना भी रिकॉर्ड किया था। 
अब टी.एस. सिंहदेव अगर मुख्यमंत्री बनते हैं तो उन्हें चाऊर की जगह कोई और जनकल्याणकारी फैसला लेना होगा, और दारू बेचने से बचना होगा। वे बाबा तो हैं, लेकिन नाम के साथ यह तय होना बाकी है कि वे किस चीज के बाबा रहेंगे।

पुराने पापियों से परहेज

भाजपा सरकार के मंत्रियों के निज सचिव-सहायक अब नई सरकार में अपना ठिकाना ढूंढ रहे हैं। मंत्री स्टॉफ में संलग्न अधिकारियों-कर्मचारियों को उनके मूल विभाग में भेजने के आदेश दे दिए गए हैं। ज्यादातर मंत्रियों के सचिव-सहायक के खिलाफ गंभीर शिकायतें रही हैं। कुछ के खिलाफ जांच भी हुई थी, लेकिन उनका बाल बांका नहीं हुआ। गृह मंत्री रामसेवक पैकरा के पीए भाया के खिलाफ अश्लील वीडियो वाट्सऐप ग्रुप में डालने का प्रकरण सुर्खियों में रहा है। इस पीए के बारे में ऐसी चर्चा रही कि मंत्री के विधानसभा क्षेत्र से  आने वाले लोगों का काम भी उसी तरकीब से हो पाता था जिस तरकीब से ठेकेदार, सप्लायर, और ट्रांसफर-पोस्टिंग के लोग अपना काम करवाते थे। अपने पीए के कारण जो लोग डूबे हैं उनमें पैकरा के अलावा केदार कश्यप का नाम भी गिना जाता है। उनके पीए आरएन सिंह के खिलाफ शिकायतों की लंबी फेहरिस्त रही है। अजय चंद्राकर के साथ के प्रवीण शर्मा, दिलीप अग्रवाल जैसे कई नाम हैं जो कि अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहे हैं। मंत्रियों के स्टाफ की कारगुजारियों की वजह से उनकी दुर्गति हुई है। यह सब देखकर प्रदेश कांग्रेस संगठन के एक बड़े नेता ने साफ कर दिया है कि पुराने मंत्रियों के स्टाफ को कांग्रेस के मंत्रियों के यहां जगह नहीं दी जाएगी। 

टेक्नॉलॉजी के तिलस्म के नतीजे
प्रदेश में भाजपा ने मिस्ड कॉल के जरिए करीब 25 लाख सदस्य बनाए। जबकि पार्टी को चुनाव में कुल 47 लाख वोट मिले। ऐसे में सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या भाजपा के सदस्य अपने परिवार के लोगों का वोट नहीं डलवा पाए। जानकारों का कहना है कि सदस्य अपने परिवार के कम से कम तीन वोट पार्टी के पक्ष में डलवा पाने में कामयाब रहते, तो चुनाव में तस्वीर एकदम उल्टी होती। यानी भाजपा 70 सीट तक हासिल कर सकती थी। चुनाव नतीजे के बाद सदस्य संख्या को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। दरअसल टेक्नॉलॉजी दिखती एक तिलस्म की तरह है, लेकिन उस पर अंधविश्वास किसी को भी डुबा सकता है, बल्कि अधिक सही यह कहना होगा कि डुबा देता है। और इन दिनों टेक्नॉलॉजी के विशेषज्ञ होने का दावा करने वाले बाजारू लोग ठीक उसी तरह लोगों को ठगते हैं जिस तरह कल तक तांत्रिक ठगा करते थे।

इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला विश्व ज्ञान कोश विकीपीडिया है। इस पर भूपेश बघेल का नाम ढूंढे तो पहली ही लाईन में दूसरे वाक्य में यह लिखा दिखता है कि वे छत्तीसगढ़ के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। अब विकीपीडिया के काम करने का तरीका यह है कि लोग उस पर जानकारी पोस्ट करते रहते हैं, दूसरे लोग उस जानकारी का संपादन भी करते रहते हैं, और जानकारी लगातार कम ज्यादा होते रहती है। ऐसे में यह जरूरी नहीं है कि यह जानकारी भूपेश के समर्थकों ने ही डाली है, इसे कोई भी डाल सकते हैं। लेकिन फिलहाल विकीपीडिया उन्हें निर्वाचित मुख्यमंत्री बता रहा है, और छत्तीसगढ़ के अंगे्रजी हिज्जे गलत बता रहा है। ( rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 14-Dec-2018

चुनावी चंदे को लेकर राजनीतिक हल्कों में चर्चा हो रही है। यह भी खबर आई है कि भाजपा की महिला प्रत्याशी पैसे के लिए तरस गईं। जबकि प्रत्याशियों को फंड की कोई कमी नहीं होने देने का भरोसा दिलाया गया था। चर्चा तो यह भी है कि तखतपुर सीट से भाजपा प्रत्याशी हर्षिता पाण्डेय को बाकी प्रत्याशियों के बराबर फंड तक नहीं दिया गया, जबकि  प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक पड़ोस की बिल्हा सीट से उम्मीदवार थे, और कौशिक को पार्टी फंड के अलावा भी रकम की कोई कमी नहीं थी। यह सब होते हुए भी हर्षिता संसाधनों की कमी के चलते मामूली वोटों से हार गईं। यही हाल भटगांव से प्रत्याशी रजनी त्रिपाठी और मानपुर-मोहला से प्रत्याशी  कंचनमाला भूआर्य का भी रहा। सुनते हैं कि कंचनमाला को अपने कार्यकर्ताओं को पैसे देने के लिए चुनाव संचालकों से मिन्नतें करनी पड़ती थी, जबकि पुरूष प्रत्याशियों के इलाकों में तो शराब भी भेजी गए थे। कई जगह गाडिय़ां पकड़ी भी गई। चर्चा तो यह भी है कि खरसिया का किला ढहाने के लिए  इतना फंड भेजा गया कि यह छत्तीसगढ़ के इतिहास में किसी भी दल ने अब तक किसी भी एक सीट पर नहीं किया। पार्टी प्रबंधकों के इस दोहरे व्यवहार की अंदरखाने में जमकर चर्चा हो रही है।  

कांग्रेस तंगहाली में लड़ती रही
कांग्रेस पूरे चुनाव में फंड की कमी से जूझते रही है। मीडिया मैनेजमेंट के लिए प्रदेश संगठन ने करीब 18 करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। जिसमें इलेक्ट्रॉनिक-प्रिंट मीडिया के विज्ञापन का खर्चा मुख्य रूप से था। पर हाईकमान ने फंड की कमी का हवाला देकर प्रस्ताव अमान्य कर दिया और खुद दिल्ली की विज्ञापन एजेंसी के जरिए गिने-चुने छोटे-छोटे विज्ञापन जारी किए। 
इन सबके बीच एक खबर यह भी उड़ी है कि कांग्रेस के प्रबंधकों ने दो बड़े उद्योगपतियों का फंड लेने से मना कर दिया। चर्चा है कि ये दोनों उद्योगपति सरकार के बेहद करीबी रहे हैं। शासन-प्रशासन में इनकी खूब दखल रही है। यही वजह है कि दोनों विपक्ष की आंखों की किरकिरी बने रहे। ऐसे में प्रदेश में परिवर्तन की बयार बह रही थी तब उन्होंने विपक्ष को साधने के लिए चुनावी फंड देने का प्रस्ताव दिया, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने साफ तौर पर मना कर दिया। अब देखना है कि कांग्रेस सरकार इन दोनों उद्योग घरानों से कैसा सलूक करती है, जिनमें से एक तो महज सरकार की दारू-खरीद मोनोपोली के चलते जमीन से आसमान तक पहुंच चुकी है। कांगे्रस ने पूरी शराब बंदी का चुनावी वायदा किया है, और ऐसे में राज्य के उन शराब उत्पादकों को दिक्कत होना तय है जो अभी तक इस राज्य में बिक्री में मोनोपोली चलाकर कारखाना चला रहे थे। अब राज्य के बाहर खुले बाजार में ब्रांड के मुकाबले में निकलना पड़ेगा। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 13-Dec-2018

प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने अभी शपथ नहीं ली है, लेकिन ज्यादातर अफसरों और नेताओं के मिजाज में परिवर्तन आ रहा है। ये लोग अब सुकून महसूस कर रहे हैं। विशेषकर सरकारी अफसर और नेता अब मोबाइल से बात करने में नहीं हिचक रहे हैं। पहले जरूरी होने पर वाट्सएप से ही बात करते थे। यह चर्चा आम रही कि बड़े पैमाने पर सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों और अफसरों के  मोबाइल टेप करा रही है। खुद नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव विधानसभा में अपने भाषण में यह बात कह चुके हैं।
सिंहदेव का दर्द यह था कि मोबाइल से बात करना जोखिम भरा हो गया है और वाट्सएप कॉल से ठीक से बात नहीं हो पाती है। दूर-दराज इलाकों में वाट्सएप कॉल नहीं लग पाता था। यह हाल सिंहदेव जैसे नेता का था, जिन्हें मुख्यमंत्री का करीबी भी माना जाता रहा है। वे मुख्यमंत्री को अपना बड़ा भाई बताते रहे हैं। न सिर्फ विपक्ष बल्कि सरकार के कुछ मंत्री भी मोबाइल से गोपनीय चर्चा करने में हिचकते थे। 
सुनते हैं कि सरकार के कुछ करीबी अफसर निजी स्तर पर टेपिंग  करा रहे थे। जबकि सरकारी स्तर पर टेलीफोन टेपिंग के लिए गृह विभाग की अनुमति जरूरी होती है। चर्चा तो यह भी है कि इसमें कुछ कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी। इसके अलावा निजी डिटेक्टिव एजेंसियों का सहारा लेने का भी हल्ला है। अब जो लोग यह सब काम करा रहे थे, वे खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में लोगों का मिजाज बदलाव समझ में आ रहा है। फिलहाल राज्य में राहत की बात यह है कि लोग फोन पर एक-दूसरे से बात करने के लिए तैयार हो रहे हैं।
दीवारों के कान
कल छत्तीसगढ़ के सबसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा ने दिल्ली से आए हुए पर्यवेक्षक और लोकसभा में कांग्रेस सांसद दल के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े से अलग से मुलाकात की। पूरी बात अकेले में हुई, और जाहिर है कि किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए इस पर भी बात हुई। दीवारों का कहना है कि वोराजी ने अपनी कोई पसंद नहीं बताई, महज अपनी नापसंद बता दी, और चले गए। अब दीवारें कितनी भरोसेमंद हैं, यह शाम तक पता लग जाएगा।
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Date : 12-Dec-2018

चुनाव सिर्फ प्रबंधन से नहीं जीते जाते। प्रत्याशियों की छवि जीत-हार में अहम रोल अदा करती हंै। कई भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ एंटी इंकमबेंसी के बावजूद उनकी आर्थिक ताकत, प्रबंध क्षमता और पार्टी के भीतर उनकी हैसियत को देखकर शीर्ष नेतृत्व टिकट काटने का हौसला नहीं दिखा पाया।   इनमें विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, अमर अग्रवाल, लाभचंद बाफना और केदार कश्यप का नाम प्रमुखता से चर्चा में रहा है। 
सुनते हैं कि कसडोल में गौरीशंकर के बजाए जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष योगेश चंद्राकर को लड़ाने पर पार्टी और सरकार के अंदरखाने में चर्चा भी हुई थी। पार्टी के एक-दो रणनीतिकारों को गौरीशंकर के खिलाफ उनके इलाके में भारी नाराजगी का अंदाजा था। चर्चा है कि उन्होंने अपने भांजे के खिलाफ हिट एंड रन केस में बचाव के लिए जिस तरह प्रशासन पर दबाव बनाया था, उससे इलाके के लोग उबल रहे थे। परंतु पार्टी के लोगों को उनकी प्रबंध क्षमता पर पूरा भरोसा था। स्थानीय प्रशासन-पुलिस में गौरीशंकर के भरोसे के लोगों की पदस्थापना की गई। उनके मुकाबले कांग्रेस ने शकुंतला साहू को चुनाव मैदान में उतारा था। कांग्रेस का कोई बड़ा नेता वहां प्रचार के लिए नहीं गया। इन सबके बावजूद एक साधारण महिला प्रत्याशी के हाथों प्रदेश के एक सबसे संपन्न उम्मीदवार गौरीशंकर की सबसे बुरी हार हुई। 
यही हाल अमर अग्रवाल और केदार कश्यप का भी था। केदार की जगह उनके बड़े भाई दिनेश को उतारने पर विचार किया गया था। दोनों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर वातावरण था। इसी तरह लाभचंद बाफना परिवार के अवैध खनन की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर होती रही है। उनके विरोधी भाजपा नेता उन्हें रेतीचंद तक कहते रहे हैं। लाभचंद का भाई एक आरटीओ इंस्पेक्टर को पीटने के बावजूद मुकदमे से बच गया, और इंस्पेक्टर को लाइन अटैच कर दिया गया था। छोटे से लेकर बड़े तक ज्यादातर पदाधिकारियों ने उन्हें टिकट न देने की वकालत की थी, लेकिन पार्टी ने अमान्य कर दिया। इसके बाद जो परिणाम आया वह सबके सामने है। लाभचंद को 32 हजार से  अधिक वोटों से हार का सामना करना पड़ा।  
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Date : 10-Dec-2018

भाजपा के कई नेता मानते हैं कि कांग्रेस नेताओं के हाथ में गंगाजल लेकर किसानों को बकाया बोनस-समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने के वादे ने चुनाव में हलचल पैदा कर दी और एक तरह से किसानों के बीच कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन गया। यह एक टर्निंग पाइंट था। 
सुनते हैं कि चुनावी वादे को पूरा करने के लिए गंगाजल की सौगंध खाने का विचार पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह का था। उन्होंने राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल और राधिका खैरा के साथ राजीव भवन में प्रेस कॉफ्रेंस से पहले एक होटल में इसकी योजना तैयार की। इसकी जानकारी प्रदेश कांग्रेस के संचार विभाग के नेताओं को भी नहीं थी। आरपीएन सिंह ने बिना कुछ बताए प्रदेश प्रवक्ता विकास तिवारी को गंगाजल लाने के लिए भेजा। तिवारी गंगाजल के 8-10 डिब्बे लेकर सीधे राजीव भवन पहुंचे और प्रेस कॉफ्रेंस से पहले सभी के टेबल पर जमा दिया। थोड़ी देर बाद शैलेष नितिन त्रिवेदी वहां पहुंचे, तो गंगाजल के डिब्बे देखकर भड़़क गए और उन्होंने विकास तिवारी से डिब्बों को अंदर रखने के लिए कह दिया। बाद में आरपीएन सिंह प्रेस कॉफ्रेंस के लिए पहुंचे, तो उन्होंने विकास तिवारी से गंगाजल फिर मंगा लिया। इसके बाद आरपीएन सिंह और प्रेस कॉफ्रेंस में मौजूद नेताओं ने हाथ में गंगाजल धान बोनस- समर्थन मूल्य के चुनावी वादे को पूरा करने की कसम खाई, तो रायपुर से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। 
चर्चा है कि शैलेष नितिन इसको लेकर असहज थे उन्होंने बाकी नेताओं के गंगाजल हाथ में लेने के बाद आखिरी में लिया। उन्हें बड़े विवाद की आशंका थी। यहां किसी भी तरह की अव्यवस्था और विवाद होने की दशा में पहली जिम्मेदारी संचार विभाग के प्रमुख होने के नाते उनकी ही बनती थी। हाईकमान ने उन्हेें चुनाव से पहले ही इसको लेकर दिशा निर्देश दिए थे। पर कांग्रेस नेताओं का गंगाजल की सौगंध खाने की रणनीति कामयाब हो गई। धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ चुनाव आयोग में कांग्रेस की शिकायत करने के बजाए सीएम से लेकर पीएम तक भाजपा के छोटे-बड़े नेता अपने भाषणों में गंगाजल की सौगंध खाने को लेकर कोसते रहे। और कांग्रेस खूब प्रचार मिल गया। चूंकि इसकी चर्चा आम मतदाताओं के बीच खूब हुई। चुनाव नतीजों के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि गंगाजल की सौगंध खाना कितना फायदेमंद था। अब यह एक अलग बात है कि असल जिंदगी में गंगा ऐसी मैली हो चुकी है कि उसके किनारे अपनी प्रतिमा बनने की बात सुनकर राम भी बहुत फिक्रमंद हैं कि रात-दिन इतने गंदगी कैसे बर्दाश्त करेंगे? (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 09-Dec-2018

सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का। प्रदेश में सरकार है तो मतगणना में धांधली की आशंका भाजपा प्रत्याशियों को नहीं है। तभी तो पिछले दिनों पार्टी दफ्तर में मतगणना को लेकर प्रेजेंटेशन दिया जा रहा था, तब  भाजपा प्रत्याशी आपसी चर्चा में मशगुल थे। एक-दो बार टोककर प्रत्याशियों को शांत कराने की कोशिश की गई, लेकिन फिर भी चर्चा जारी रही। तब सौदान सिंह ने माइक हाथ में लेकर प्रत्याशियों से कहा कि आप लोगों की दिलचस्पी मतगणना के प्रेजेंटेशन में नहीं है, यह समझ में आ रहा है, लेकिन कोई व्यक्ति अगर कुछ बता रहा है तो उसे सुन लेना चाहिए।
दरअसल, प्रत्याशियों को उम्मीद थी कि चुनाव प्रचार के उनके अनुभव सुने जाएंगे। कुछ को भीतरघात की शिकायत करनी थी, लेकिन बैठक से पहले यह साफ कर दिया कि सिर्फ मतगणना की तैयारियों पर होगी। बाकी बातें बाद में सुनी जाएगी। इसके बाद प्रत्याशियों की बैठक को लेकर दिलचस्पी ही खत्म हो गई थी।

सीएम पद को लेकर दौड़

सुत न कपास, जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा। अभी चुनाव नतीजे घोषित नहीं हुए हैं और कांग्रेस में सीएम पद को लेकर चर्चा चल रही है। कांग्रेस के अंदरखाने में इसको लेकर जोरदार लॉबिंग भी हो रही है। टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू और डॉ. चरणदास महंत के नाम चर्चा में हैं, लेकिन अब आदिवासी नेताओं ने रामपुकार सिंह का नाम उछाला है। रामपुकार प्रदेश कांग्रेस के सबसे सीनियर नेता हैं और सबसे ज्यादा समय तक रहने वाले विधानसभा के सदस्य भी। 
सुनते हैं कि कांग्रेस को बहुमत मिला तो विधायकों की संख्या बल देखकर हाईकमान कोई फैसला लेगा। यदि विधायकों की संख्या 46-47 तक ही रह पाता है, तो फिर सबको साथ लेकर चलने की क्षमता का मूल्यांकन कर कोई फैसला लिया जाएगा। इसमें वरिष्ठता को तरजीह दी जा सकती है, लेकिन संख्या 50 पार हुई तो हाईकमान के पास विकल्प खुले होंगे। फिर पार्टी लोकसभा चुनाव और अन्य बिन्दुओं को ध्यान में रखकर कोई फैसला लेगी। फिर भी सीएम पद के दावेदार अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 08-Dec-2018

चुनाव नतीजे घोषित नहीं हुए हैं, लेकिन दो मंत्रियों ने अपने सामान पैक कर लिए हैं। वैसे मंत्री पद नहीं रहने पर बंगला खाली करने के लिए एक माह का समय रहता है। हड़बड़ी में पैकिंग को लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है। एक का बंगला खाली करने की तैयारी करना तो समझ में आता है, क्योंकि उन्हें टिकट नहीं मिली। पर दूसरे मंत्रीजी की हालत खराब है और चुनाव नतीजे पक्ष में आने की उम्मीद भी कम दिख रही है। ऐसे में सरकार बन भी गई, तो भी उन्हें बंगला खाली करना पड़ेगा। लिहाजा, वे तैयारी में जुट गए हैं। 

सीआर की दिक्कत
सीआर लिखवाने के लिए आईएएस अफसरों में आपाधापी मची हुई है। विधानसभा भंग होने से पहले अफसरों का 30 नवंबर तक का सीआर लिखा जाना है, लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग से एक बड़ी चूक हो गई। सुनते हैं कि साप्रवि ने इसकी सूचना ही 6 दिसंबर को विभाग के वेबसाइट में डाली। कई मंत्री-सीनियर अफसर बाहर हैं। ऐसे में सीआर लिखवाने के लिए अफसरों को भाग-दौड़ करना पड़ रहा है। सीआर में कई तरह का ब्योरा देना होता है, इस वजह से अफसरों को परेशानी उठानी पड़ रही है।  

ट्विटर पर अनिंद्य चक्रवर्ती ने लिखा है- अभी भाजपा के जीवीएल नरसिंह राव को कहते सुना कि 2014 से अभी तक हर एक्जिट पोल में भाजपा की संभावित सीटों को कम आंका जाता है। यहां पर मैं सामने रख रहा हूं 2014 से अब तक हुए प्रमुख राज्यों के एक्जिट पोल के, पोल ऑफ पोल्स डाटा को जिनमें यूपी के अलावा हर राज्य में भाजपा की सीटों को अधिक आंका गया था और वे कम निकलीं। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 06-Dec-2018

भाजपा के रणनीतिकार रायपुर उत्तर की सीट को कमजोर मानकर चल रहे हैं, पर पार्टी प्रत्याशी श्रीचंद सुंदरानी ऐसा नहीं मानते। सुंदरानी से जुड़े लोगों का दावा है कि अंतिम तीन दिनों में विशेषकर बस्तियों के वोटरों को अपने पाले में करने के लिए काफी कुछ किया गया। इससे माहौल बदल गया। सुनते हैं कि पिछले दिनों पार्टी के एक बड़े नेता ने सुंदरानी की जीत पर संदेह जता दिया। इसके बाद सुंदरानी अपने अध्यात्मिक गुरू गुलाब बाबा का आशीर्वाद लेने सतना निकल गए। उन्हें बाबा पर भरोसा है और उम्मीद है कि मतगणना के बाद पार्टी के बड़े नेताओं की धारणा बदलेगी। 

मैत्रीपूर्ण मैच?
रायपुर दक्षिण के प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल की बड़ी जीत के दावे किए जा रहे हैं। उनके समर्थकों का अंदाजा है कि पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक वोटों से जीत हासिल होगी। यानी करीब 40 हजार वोटों से जीत का दावा किया जा रहा है। रायपुर दक्षिण में करीब एक लाख 47 हजार वोट पड़े हैं। इसमें से बृजमोहन को 80 हजार के आसपास वोट मिलने की उम्मीद जताई गई है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल को 35 हजार के आसपास वोट मिलने का आंकलन किया गया है। बाकी वोट निर्दलियों के खाते में जा सकते हैं। 
हालांकि रायपुर और आसपास में कुछ हद तक बदलाव की हवा चलने का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद इतनी बड़ी जीत के दावे को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही है। हल्ला यह भी है कि रायपुर दक्षिण में एक तरह से मैत्री मैच खेला गया। इस विधानसभा क्षेत्र के एक हिस्से में दोनों ही दलों के लोग जिस तरह मिलकर प्लॉटिंग कर रहे हैं, उससे मैत्रीपूर्ण मैच की चर्चाओं को बल मिला है। खैर, चुनाव नतीजे के बाद सारी तस्वीर साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है।  

स्टिंग बाजार का सन्नाटा
चुनाव के पहले तरह-तरह के स्टिंग ऑपरेशनों में जितनी खलबली मचाई थी, वह सब अचानक शांत हो गई है। लोगों को समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। कई और लोगों के नाम स्टिंग ऑपरेशनों में गिनाए गए थे, तस्वीरें भी दिखाई गई थीं, लेकिन उनमें से कम से कम तीन ऐसे बड़े नाम रहे जिनका स्टिंग कभी सामने आया ही नहीं। इसके अलावा राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि बड़ी संख्या में अफसरों के स्टिंग मौजूद थे, और वे एक साथ दफन करवा दिए गए। एक भी अफसर का स्टिंग बाद में नहीं आ पाया। चर्चाओं के सिर-पैर तो होते नहीं, इसलिए वे कितने नंबर का जूता पहनती हैं, यह कैसे पता लगेगा, लेकिन जो भी हुआ हो, बहुत से अफसर राहत से हैं, चाहे सरकार जो भी आए वे कम से कम स्टिंग को लेकर महफूज हैं। अब यह राहत सामग्री कैसे जुटाई गई इसे लेकर जितने मुंह, उतनी बातें। 

दिल बड़ा हो, तो दोस्त बनते हैं और, अक्ल बड़ी हो तो दुश्मन!

घमंड शराब जैसा होता है साहब,
खुद को छोड़कर सबको पता चलता है कि इसको चढ़ गई है।

छोटे शहर के अखबार जैसा हूं मैं जनाब...
दिल से लिखता हूं इसलिए कम बिकता हूं...

23 साल पहले पूजा भट्ट की फिल्म आई थी 'सड़कÓ, और अब उसकी बहन आलिया भट्ट की फिल्म आई है 'हाईवे'।

भारत के दिमागी तौर से बीमार और मूर्ख लोग ही भगवान के करोड़ों रूपये के धंधे का साधन है

पेट्रोलियम कीमतों को लेकर फ्रांस में व्यापक आगजनी हो रही है 
हम लोग यहां 4 साल से ख़ुशी-ख़ुशी अपनी राहजनी करवाते रहे

बजरंग बली हनुमान क्षत्रिय थे और उनका ताल्लुक जैन धर्म से था - जैन मुनि आचार्य निर्भय सागर

क्या हनुमानजी के सभी मंदिरों में पुजारी का पद दलित वर्ग के लिए आरक्षित होगा ? 
ऐसी मांग अब जगह जगह से उठ रहीं है।


तीनों राज्यों में आ सकती है कांग्रेस की सरकार..?
बस कर पगले रुलाएगा क्या..

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Dec-2018

खबर है कि भाजपा के एक दिग्गज नेता की फाइल तैयार है।  नेताजी ने बंगले का निर्माण कराया है। बंगला बनाना गलत नहीं है, लेकिन नेताजी ने बंगले को भव्य रूप देने के लिए सड़क को ही गायब करा दिया। संबंधित विभाग ने इसकी फाइल तो तैयार कर ली थी, पर नेताजी के रसूख के चलते कार्रवाई नहीं हो पाई। इस प्रकरण पर कार्रवाई होगी या नहीं, इसको लेकर विभाग में चर्चा हो रही है। सुनते हैं कि फिर भाजपा सरकार बनी, तो यथास्थिति बरकरार रहेगी लेकिन कांग्रेस सरकार आई तो प्रकरण की जांच-पड़ताल शुरू हो सकती है। वैसे नेताजी के कांग्रेसी मित्र भी कम नहीं है। पर कार्रवाई इस बात निर्भर होगी कि सीएम कौन बनता है। यदि फाइल खुली तो नेताजी की मुश्किलें बढ़ सकती है। 

संपर्क के रास्ते कई हैं...
मंत्रालय में प्रशासनिक अफसर ज्यादा समय चुनाव नतीजों की चर्चा में गुजार रहे हैं। चुनाव नतीजे 11 तारीख को आएंगे, लेकिन नौकरशाहों में उत्सुकता ज्यादा दिख रही है। सुनते हैं कि सरकार बदलने की संभावना को देखते हुए ज्यादातर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसर कांग्रेस के बड़े नेताओं के संपर्क में आ चुके हैं। कुछ अफसर  जो नेताओं से सीधे संवाद करने में शरमा रहे हैं, वे नेताओं के पीए और अन्य करीबियों से हालचाल ले रहे हैं। कांग्रेस नेताओं से सीधे चर्चा न करने की एक वजह और भी है। कहा जा रहा है कि सट्टा बाजार में कांग्रेस और भाजपा दोनों को बराबर सीटें मिलने का दावा किया गया है। यानी सरकार किसी भी दल की बन सकती है। अफसरों की निगाहें सट्टा बाजार पर भी है, जिसका अनुमान अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। अब जब सट्टा बाजार में ही नई सरकार को लेकर ऊहापोह है तो ऐसे में अफसर सीधे संवाद कायम करने का जोखिम भी नहीं उठाना चाह रहे हैं। 

औरत को आदमी के पैरों तले दबाकर रखने के लिए अलग-अलग धर्मों में और अलग-अलग समाजों में तरह-तरह के पाखंड को विज्ञान का दर्जा भी दे दिया जाता है। हिन्दी की अनगिनत वेबसाईटों पर लक्ष्मी-विष्णु के एक पोस्टर सहित कुछ लाईनें चारों तरफ फैलाई जा रही हैं। इसमें लिखा है- स्त्री को अपने पति का पांव क्यों दबाना चाहिए, इसके पीछे ग्रहों का कारण छिपा है। पुरुष के घुटने से लेकर पिंडली तक का भाग शनि का होता है, तथा स्त्री की कलाई से लेकर ऊंगली तक का भाग शुक्र का होता है। और जब भी शनि पर शुक्र का प्रभाव पड़ता है, तो धन प्राप्ति का योग बनता है। इसलिए स्त्री को प्रतिदिन अपने पति का पैर दबाना चाहिए। इसीलिए हमेशा लक्ष्मीजी भगवान विष्णु का पैर दबाती रहती हैं, और इसी कारण वे धन की देवी हैं। सभी मित्र, भाई अपनी पत्नी तक यह संदेश पहुंचाएं, फायदा हो सकता है।
अब ऐसी एक वेबसाईट में लक्ष्मी के विष्णु के पैर दबाते हुए एक वीडियो भी पोस्ट किया गया है। लेकिन इसी वेबसाईट पर इसी पाखंड के बगल में जो दूसरे लिंक पोस्ट किए गए हैं, वे जिंदगी का दूसरा और असल सच बताते हैं। ये लिंक हैं, सर्दियों में ऐसे सेक्स करने से होते हैं सेहत को अत्याधिक लाभ। इस पोर्न स्टार के फोटोशूट ने पूरी दुनिया में मचाया तहलका, तस्वीरें पागल कर देंगी आपको। ऐसी लड़कियों में हमेशा होती है सेक्स में कुछ नया करने की चाह। महिलाओं के वजानिया से जुड़ी ऐसी बातें जिसे पुरुष जानकर हो जाएंगे पागल। इस तरह के सेक्स करने से बहुत ज्यादा बढ़ती है सेक्स स्टेमिना, जरूर करें ट्राई। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 04-Dec-2018

जोगी समर्थक विधायक आर के राय, सियाराम कौशिक और अमित जोगी की सदस्यता खत्म करने की याचिका पर फैसला पेंडिंग हैं। कहा जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल की टेबल पर फाइल पड़ी है, लेकिन इस पर वे फैसला नहीं ले पाए हैं। नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव और अन्य कांग्रेस विधायकों ने तीनों विधायकों की सदस्यता खत्म करने के लिए विधानसभा सचिवालय को आवेदन दिया था। 
कांग्रेस विधायक दल की याचिका पर तीनों विधायकों को नोटिस जारी किया गया था और काफी पहले तीनों जवाब भी दे चुके हैं। हालांकि दलबदल के फैसले का अब कोई ज्यादा महत्व भी नहीं है, क्योंकि चुनाव हो चुके हैं और 11 तारीख के बाद नए विधायक शपथ लेंगे। फिर भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि विधानसभा चुनाव परिणाम के पहले तीनों विधायकों की सदस्यता को लेकर कोई फैसला आता है या नहीं। 
अलग-अलग किस्म के भीतरघात
भाजपा ने 7 तारीख को अपने प्रत्याशियों की बैठक रखी है। कहा जा रहा है कि इस बैठक में भाजपा के कई प्रत्याशी भीतरघात की शिकायत कर सकते हैं। धमतरी में कुछ अलग ही तरह की शिकायत सामने आ रही है। सुनते हैं कि यहां के जिला पदाधिकारियों ने कांग्रेस का काम किया। जबकि कांग्रेस के बड़े पदाधिकारियों ने भाजपा प्रत्याशी का साथ दिया। भीतरघात से बड़े नेता भी जूझते रहे हैं। चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष, नगरीय प्रशासन मंत्री सहित कई नेताओं के खिलाफ भी पार्टी के कुछ नेताओं ने मोर्चाबंदी की थी। पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी को कई कांग्रेस नेता मदद पहुंचा रहे थे, तो कुछ दिग्गज भाजपा नेताओं की सद्भावना कांग्रेस प्रत्याशी उमेश पटेल के साथ थी। चूंकि चार महीने बाद लोकसभा के चुनाव हैं, ऐसे में दिग्गजों के खिलाफ शिकायतें सुनी जाएगी, इसकी संभावना कम है। फिर यह बात भी अपनी जगह है कि भीतरघात करके विपक्षी को मदद पहुंचाने के मामले में दोनों ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं के बीच जिस तरह का भाईचारा (चूंकि महिलाओं का नाम सामने नहीं आया है इसलिए बहनचारा लिखना ठीक नहीं है) सामने आया है, उसमें अब मामले को न कुरेदा जाए तो ही बेहतर है।
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Date : 03-Dec-2018

अब दस दिन भी नहीं बचे हैं कि छत्तीसगढ़ में नई सरकार की शक्ल साफ हो जाएगी। वैसे तो 11 दिसंबर की शाम तक सत्तारूढ़ पार्टी तय हो जाने की एक संभावना है, लेकिन किसी वजह से अगर किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तो उसके बाद दो-चार दिन लग सकते हैं कि किसी जरूरी और संभावित गठबंधन का रास्ता साफ हो सके। अभी कांग्रेस के प्रदेश के सबसे बड़े नेता टी.एस. सिंहदेव ने एक कैमरे के सामने जोगी के साथ किसी संभावित गठबंधन से अपने सौ फीसदी परहेज की बात को दुहराने से इंकार किया, और कहा कि उन्हें कहा गया है कि वे इस मुद्दे पर कहने से बचें। इसका एक मतलब यह है कि अगर जरूरत पड़ी तो कांग्रेस शायद जोगी से भी हाथ मिला ले। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी जोगी से परहेज पर अब कुछ नर्म पड़े हैं। हफ्ते भर का असमंजस आज निपटाना किसी को ठीक नहीं लग रहा है क्योंकि राजनीति में अटपटे हमबिस्तर होते ही रहते हैं। और तो और बड़बोला मीडिया भी चुप्पी मारकर बैठा है, और हवा के रूख की अटकल लगाने के बजाय 11 तारीख की शाम का इंतजार कर रहा है ताकि नतीजों के मुताबिक चुनिंदा कतरनों या वीडियो क्लिपों को निकालकर यह साबित कर सके कि उसने तो कई हफ्ते पहले ही यह कह दिया था। 


इस चुनाव के बाद लोकसभा पर नजर
भाजपा के मुख्यमंत्री तो पहले से घोषित और तय हैं, लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्री को लेकर पसंद बड़ी लंबी-चौड़ी हैं। चुनाव जीतने में सबसे अधिक मेहनत करने वाले को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, या सबसे धीर-गंभीर को, या सबसे सीधे-सरल को, या मंत्री के कामकाज के सबसे तजुर्बेकार को? यह सवाल कांग्रेस के सामने आसान नहीं होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि 6 महीने बाद के लोकसभा चुनाव की चुनौती इस प्रदेश में मुख्यमंत्री के साथ-साथ सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष के लिए भी होगी, और इन दोनों के बीच तालमेल और संतुलन पर भी होगी। यह भी हो सकता है कि कांग्रेस अगर अपने दावे के मुताबिक 50 से अधिक सीटें जीत ले, तो उसके कुछ विधायकों को लोकसभा चुनाव में उतारा जा सकता है, और उनका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस अगर सरकार बनाने से दूर रहती है, और खासी दूर रहती है, तो भी कांग्रेस के कुछ विधायकों को आम चुनाव में लड़ाया जा सकता है, और यही बात भाजपा के साथ भी है। पैंतालीस के निर्धारक-आंकड़े से पार्टी जितनी अधिक अधिक होगी, या जितनी अधिक कम होगी, उतनी ही संभावना कुछ विधायकों के लोकसभा चुनाव लडऩे की रहेगी। कुल मिलाकर 18 बरस के अपने अस्तित्व में छत्तीसगढ़ में ऐसी अनिश्चितता कभी देखी न थी। फिलहाल हर पार्टी और हर उम्मीदवार को अपनी जीत के दावे इसलिए भी करने पड़ रहे हैं कि कुछ लोगों से चंदा और मिल जाए, कुछ और लोगों से चंदा मिल जाए, और चुनावी बिल लेकर खड़े हुए लोग कुछ और इंतजार कर लें। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Dec-2018

राहुल गांधी की खासियत है कि वे मिलने आए नेताओं से कुछ न कुछ सवाल जरूर पूछते हैं। उनकी आदत से कुछ नेता परेशान भी रहते हैं। वे सरगुजा में कुछ महीने पहले किसान सम्मेलन में आए, तो उन्होंने रामदयाल उइके से पूछ लिया कि भाजपा और कांग्रेस में क्या फर्क है? तब उइके प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष थे। वे वर्ष-2001 में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। जोगी के लिए उन्होंने मरवाही विधानसभा सीट छोड़ी थी। 
सुनते हैं कि राहुल के सवाल पर उइके हड़बड़ा गए थे फिर उन्होंने संभलकर कहा कि भाजपा, भाजपा और कांग्रेस, कांग्रेस है। भाजपा कभी कांग्रेस की तरह नहीं बन सकती और कांग्रेस कभी भाजपा नहीं बन सकती। राहुल को उइके का जवाब समझ में नहीं आया। वे अन्य नेताओं की तरफ देखने लगे। तभी उइके ने अपने जवाब को स्पष्ट करते हुए कहा कि भाजपा को आरएसएस चलाती है और भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बहुत है। बाद में उइके फिर पलट गए और जिस पार्टी की सरकार में भ्रष्टाचार अधिक होने की बात कही थी, उसमें वे शामिल हो गए। गनीमत यही है कि भाजपा में जाने के बाद अब उन पर से यह खतरा हट गया है कि कभी राहुल से सामना होगा और वे पुराने जवाब को याद दिलाते हुए नया सवाल करेंगे।
मंडल की पहली पसंद
एसीएस आरपी मंडल और जितेंद्र शुक्ला का चोली दामन का साथ रहा है। मंडल जब बिलासपुर कलेक्टर थे तब जितेंद्र वहां एसडीएम थे। बाद में मंडल मंत्रालय आए, तो पीछे-पीछे जितेंद्र भी आ गए। पहले नगरीय प्रशासन में दोनों साथ काम कर चुके हैं। बाद में आईपीएल आयोजन के लिए मंडल पर क्रिकेट स्टेडियम को तैयार करने की जिम्मेदारी थी, तो उन्होंने सहयोग के लिए संचालक खेल के रूप में जितेंद्र को ही पसंद किया। इसके बाद मंडल को एसीएस वन का दायित्व सौंपा गया, तो जितेंद्र शुक्ला वन विभाग के संयुक्त सचिव बन गए। अब जब मंडल ने पंचायत विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, तो जितेंद्र डायरेक्टर हैं। पिछले दिनों राकेश चतुर्वेदी को पीएमजीएसवाय सीईओ के दायित्व से मुक्त किया गया, तो जितेंद्र को उनकी जगह सीईओ का अतिरिक्त प्रभार मिल गया। यानी मंडल, जितेंद्र की पहली पसंद रहे हैं। 
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