राजनीति

सपा, कांग्रेस ने बेरोजगारी के चलते लोगों के आत्महत्या करने का मुद्दा उठाया
15-Sep-2020 1:27 PM (76)

नई दिल्ली, 15 सितम्बर (आईएएनएस)| समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव और कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मंगलवार को राज्यसभा में बेरोजगारी के कारण लोगों के आत्महत्या करने का मुद्दा उठाया। यादव ने मांग की कि नौकरी गंवाने वाले लोगों को प्रति माह 15,000 रुपये दिए जाएं।

यादव की मांग का समर्थन करते हुए, कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि केंद्र को इस मामले को देखना चाहिए और ऐसे लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।

कांग्रेस लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों की मौतों का कोई आंकड़ा नहीं होने के लिए पहले ही सरकार की आलोचना कर चुकी है।

कांग्रेस नेता पी.एल. पुनिया ने भी मनरेगा मजदूरों के मामले को उठाया और मांग की कि मजदूरी को बढ़ाकर 300 रुपये प्रतिदिन किया जाए, जबकि कांग्रेस की एक अन्य सदस्य छाया वर्मा ने मनरेगा में एक साल में काम के दिनों की संख्या बढ़ाकर 200 करने की मांग की।

कांग्रेस ने पिछले हफ्ते एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के हवाले से सरकार पर निशाना साधा था, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि कोरोनावायरस के प्रसार के छह महीने में देश में बेरोजगारी की दर 32.5 प्रतिशत होने की आशंका है। इसके आगे, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन महीनों में युवा बेरोजगारी की दर 29.5 प्रतिशत होगी। 2019 में यह दर 23.3 प्रतिशत थी।

वहीं, सरकार ने दावा किया कि मनरेगा योजना के तहत, जून में देश भर में औसतन 3.42 करोड़ लोगों को रोजाना काम मिला, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 83.87 प्रतिशत अधिक है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मई में मनरेगा के तहत औसतन 2.51 करोड़ लोगों को काम मिला, जो पिछले साल की इसी अवधि के 1.45 करोड़ के औसत आंकड़े से 73 प्रतिशत अधिक है। इसलिए, इस योजना के तहत मई में रोजगार में 73.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

रवि किशन पर खफा जया बोलीं-जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं
15-Sep-2020 12:18 PM (85)

नई दिल्ली, 15 सितंबर। समाजवार्टी पार्टी की सांसद और दिग्गज अभिनेत्री जया बच्चन ने एक्टर-राजनेता रवि किशन के सोमवार को संसद में दिए बयान पर निशाना साधा। जया बच्चन ने कहा कि सोशल मीडिया पर फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम किया जा रहा है। इससे पहले, कल गोरखपुर से बीजेपी सांसद रवि किशन ने कहा था कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। सुशांत सिंह राजपूत मामले की जांच में ड्रग्स का एंगल सामने आने के बाद बॉलीवुड में ड्रग्स की चर्चा तेज हो गई है।

जया बच्चन ने आज राज्यसभा में बीजेपी सांसद के बयान को लेकर कहा, कुछ लोगों की वजह से, आप पूरी इंडस्ट्री की छवि खराब नहीं कर सकते हैं। मुझे कल बहुत बुरा लगा जब लोकसभा के एक सदस्य, जो खुद इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं, ने फिल्म इंडस्ट्री के बारे में खराब बोला। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं।

बॉलीवुड में ड्रग्स के मुद्दे की गूंज सोमवार को संसद में भी सुनाई दी। भोजपुरी सुपरस्टार और बीजेपी सांसद रवि किशन ने इस मुद्दे को सदन में उठाया। मानसून सत्र में कार्यवाही के दौरान रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की तस्करी और युवाओं द्वारा इसका सेवन करना हमारे देश के सामने नई चुनौती बनकर सामने आया है। युवाओं को भटकाने के लिए चीन और पाकिस्तान साजिश के तहत पंजाब और नेपाल के जरिए यह ड्रग्स पूरे देश में फैलता है।
 
सांसद रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। एनसीबी बहुत अच्छा काम कर रहा है। मैं केंद्र सरकार से अनुरोध करुंगा कि दोषियों को जल्द से जल्द पकडक़र सख्त सजा दी जाए ताकि पड़ोसी देशों की साजिश का अंत हो सके।  (khabar.ndtv.com)

मप्र उप-चुनाव: उम्मीदवारों की पहली सूची के साथ कांग्रेस में असंतोष
14-Sep-2020 3:36 PM (53)

संदीप पौराणिक 
भोपाल 14 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होते ही कांग्रेस में असंतोष के स्वर मुखरित होने लगे हैं। प्रमुख नेता मंच से पार्टी के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।

राज्य में 27 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है, इनमें से 15 सीटों के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची कांग्रेस द्वारा जारी कर दी गई है। इस सूची में दो पूर्व कांग्रेसी जो भाजपा से होते हुए वापस आए हैं, उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है, तो वहीं तीन बसपा की पृष्ठभूमि वाले लोगों को मैदान में उतारने का फैसला हुआ है। इसी के चलते पार्टी के भीतर असंतोष पनपने लगा है।

दतिया जिले की भांडेर विधानसभा में आयोजित एक सभा में दावेदारों में से एक पूर्व गृह मंत्री महेंद्र बौद्घ ने पार्टी द्वारा फूल सिंह बरैया को उम्मीदवार बनाए जाने पर सख्त एतराज जताया। उन्होंने बरैया के भांडेर से चुनाव लड़ने पर सवाल उठाए और कहा कि वे भिंड के निवासी हैं, ग्वालियर से चुनाव लड़ चुके हैं, अन्य किसी स्थान से उन्हें लड़ाए जा सकता था क्योंकि वह राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, मगर भांडेर से उम्मीदवार बनाया जाना न्याय उचित नहीं है। इस मंच पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी मौजूद थे।

इसी तरह के मामले कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों से भी सामने आने लगे है, क्योंकि कई नेता दूसरे दल छोडकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं और उन्हें इस पार्टी ने उम्मीदवार बना दिया है और आगामी समय में कई दल-बदल करने वालों को उम्म्मीदवार बनाया जा सकता है।

कांग्रेस के पनप रहे असंतोष के मसले पर प्रदेश इकाई के प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि कांग्रेस लोकतांत्रिक दल है, यहां सभी को अपनी बात कहने की आजादी है लिहाजा नेता अपनी बात कहते हैं। यह स्थिति भाजपा में नहीं है। कोई नेता अपनी बात कह भी नहीं सकता। कांग्रेस पार्टी सर्वेक्षण कराने के बाद उम्मीदवार तय कर रही है और आगामी उप चुनाव में यह नजर भी आएगा कि पार्टी के फैसले कितने सही थे।

राजनीतिक विष्लेशक रवींद्र व्यास का कहना है कि कांग्रेस का बड़ा हथियार भाजपा पर हमला करने का दल-बदल है, अब वह भी दल बदल करने वालों को उम्मीदवार बना रही है, ऐसे में पार्टी के भीतर जहां असंतोष पनपना लाजिमी है वहीं भाजपा को हमला करने का भी मौका मिलेगा, साथ ही कांग्रेस के दल-बदल के हमले की धार भी कमजोर होगी।

यूपी एमपी चुनाव में बसपा की सेंधमारी रोकने की कांग्रेस की खास रणनीति
13-Sep-2020 3:52 PM (83)

संदीप पौराणिक 

भोपाल 13 सितंबर (आईएएनएस)| मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक में बहुजन समाज पार्टी सेंधमारी कर सकती है। इस सेंधमारी को रोकने की कांग्रेस ने बड़ी रणनीति बनाते हुए कभी बसपा मे रहे कई प्रमुख नेताओं को अपना उम्मीदवार बना दिया है।

राज्य के ग्वालियर-चंबल इलाके में बसपा का वोट बैंक है। यहां कई सीटें ऐसी हैं जहां बसपा भले ही चुनाव न जीते, मगर नतीजों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बसपा ने राज्य में होने वाले 27 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में से आठ क्षेत्रों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं यही कारण है कि कांग्रेस ने बसपा की सेंधमारी को रोकने के लिए ऐसे जनाधार वाले नेताओं को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया है, जो कभी बसपा में हुआ करते थे।

राज्य में 27 सीटों पर होने वाले विधानसभा के उपचुनाव में से 15 सीटों के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। इनमें से नौ उम्मीदवार ग्वालियर-चंबल अंचल के है, इन नौ उम्मीदवारों में से तीन विधानसभा क्षेत्र करैरा से प्रागी लाल जाटव, भांडेर से फूल सिंह बरैया और अंबाह से सत्य प्रकाश संखवार को उम्मीदवार बनाया है। यह तीनों नेता कभी बसपा में रहे हैं और उनका क्षेत्र में जनाधार भी है।

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने आगामी चुनाव में बसपा से होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई के लिए कभी बसपा में रहे नेताओं को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया है। इसका कांग्रेस को लाभ मिल सकता है इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह नेता क्या बतौर कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत सकेंगे, यह बड़ा सवाल है। नतीजे आने पर ही सारी तस्वीर सामने आएगी कि कांग्रेस की रणनीति कितनी कारगर रही।

ज्ञात हो कि कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन के लिए तीन बार सर्वे कराया है, जिस भी व्यक्ति के समर्थन में सर्वे रिपोर्ट आई है, उसे कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाने का ऐलान पहले ही किया था। उसी के मुताबिक, कांग्रेस ने अपनी पहली सूची जारी की है। इस सूची में कई नए चेहरों के नाम भी सामने आए है, वहीं बसपा छोड़कर कांग्रेस में आए नेताओं के पक्ष में भी माहौल होने की बात सामने आने पर उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है ।

कांग्रेस की प्रदेश इकाई के सचिव श्रीधर शर्मा का कहना है कि कांग्रेस जनाधार वाले नेताओं को चुनाव मैदान में उतार रही है, उप-चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जनता का रुख है। कमल नाथ एक बार फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे। जहां तक बसपा से आए लोगों को उम्मीदवार बनाने की बात है तो वर्तमान में जो नेता कांग्रेस में है उन्हें ही तो उम्मीदवार बनाया गया है, मीडिया उसका आंकलन किसी भी तरह से कर सकता है, मगर उनके जनाधार को नकारा नहीं जा सकता।

पूर्व मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के नजदीकी और विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान समिति के समन्वयक रहे मनीष राजपूत का कहना है कि सिंधिया और उनके समर्थकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से कांग्रेस के सामने उम्मीदवारों का संकट खड़ा हो गया। कई क्षेत्रों में तो कांग्रेस को उम्मीदवार खोजना मुश्किल हो गया, यही कारण है कि वे बसपा या भाजपा से आ रहे नेताओं को उम्मीदवार बनाने पर मजबूर है। आखिर कांग्रेस को उम्मीदवार तो मैदान में उतारना ही होगा, कई क्षेत्रों में यह महज खाना पूर्ति से आगे ज्यादा कुछ नहीं है।

बीते उप-चुनावों में बसपा ने कभी भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे, मगर इस बार उप-चुनाव में उम्मीदवार उतार रही है, इसे बसपा और भाजपा के आपसी तालमेल से जोड़कर देखा जा रहा है। इस कारण से कांग्रेस की मुश्किलें कुछ ज्यादा हो गई है। इससे उबरने के लिए ही कांग्रेस ने बसपा के पूर्व नेताओं को मैदान में उतारने की रणनीति पर काम किया है, इससे दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में इन नेताओं के प्रभाव को भुनाया जा सकता है।

जो पहले मारे वो मीर, कमलनाथ के अंदाज से भाजपा हिली !
11-Sep-2020 9:40 PM (107)

कांग्रेस के 15 प्रत्याशी घोषित
2018 के चुनाव की तरह इस बार भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने अपने प्रबंधन से भाजपा को चौंकाया, बीजेपी ‘गद्दार’ से परेशान, कांग्रेस ने चुनावी मैदान में मारी बाजी 

-पंकज मुकाती

इंदौर, 11 सितंबर। मध्यप्रदेश में उपचुनाव की सरगर्मी तेज है। कांग्रेस लगातार बढ़त बनाती हुई दिख रही है। भाजपा को लगातार एक के बाद एक मुद्दे पर घेरने वाली कांग्रेस ने शुक्रवार को एक और बाजी मार ली। उप चुनाव वाली 27 सीटों में से 15 पर कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए। इससे नैतिक तौर पर कांग्रेस के प्रत्याशियों को बल मिलेगा। जनता के बीच भी कांग्रेस प्रत्याशी को ज्यादा मौका मिलेगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने 2018 के विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह की रणनीति से भाजपा को परास्त कर दिया था। इस बार भी नाथ उतने ही आक्रामक दिख रहे हैं, और प्रत्याशी चयन इसकी गवाही है। सरकार बनाकर खुद को इक्कीस बताने में जुटी भाजपा अभी अपने प्रत्याशियों की जीत को लेकर संदेह में है। समीक्षा बैठकों में भी ये उभरकर सामने आया है कि भाजपा के पक्ष में उनके चुनाव प्रभारी तक नहीं है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिस चेहरे से भाजपा को बड़ी उम्मीद थी वो भी तमाम सभाओं में गद्दार के नारों का सामना कर रहा है। भाजपा अभी तक सिंधिया कुनबे और भाजपा के बीच तालमेल में ही लगी है। 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने 2018 में भी चौकाने वाले परिणाम निकाले थे, इस बार भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। कांग्रेस की पहली सूची में युवा और अनुभवी दोनों का जोड़ है। सांवेर से राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी प्रेमचंद गुड्डू का मुकाबला तुलसी सिलावट से होगा। ऐसे ही आगर से विपिन वानखेड़े हैं। वानखेड़े जुझारू और युवा चेहरा है।]इलाके में पिछले चुनाव के बाद से ही सक्रिय है। बमोरी में अनुभवी नेता और पूर्व मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल है, उनके सामने सिंधिया समर्थक महेंद्र सिंह सिसोदिया रहेंगे। कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आये सिसोदिया से लोग बेहद नाराज है। सिसोदिया अपने करीबी लोगों में खुद स्वीकार चुके है कि चुनाव जीतना मुश्किल है। कांग्रेस के अग्रवाल पुराने नेता है और इलाके में जड़ों तक पकड़ हैं।  अधिकांश नामों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री और कमलनाथ की सहमति के बाद ही शामिल किया गया है। 

पार्टी का प्रत्याशी चयन कमलनाथ ने खुद बेहद बारीकी से जमीनी रिपोर्ट के बाद किया है। हाटपिपल्या से राजबीर सिंह बघेल मैदान में हैं। ये राजनीतिक परिवार से हैं इनका चुनाव लडऩे और जीतने का तगड़ा अनुभव है। भाजपा में पूर्व मंत्री दीपक जोशी इस सीट पर अपनी ही पार्टी के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं। 

कांग्रेस ने भांडेर से फूलसिंह बरैया को टिकट देकर कई निशाने साधे हैं। बरैया की इलाके में मजबूत पकड़ है, वे कई सीटों पर दलित वोट को कांग्रेस के पक्ष में करने का दम रखते हैं। इसी तरह से साँची से मदनलाल चौधरी मैदान में हैं। चौधरी का मुकाबला प्रभुराम चौधरी से होना है। इस सीट पर भी दूसरी सीट की तरह भाजपा में बगावत है। वरिष्ठ नेता गौरीशंकर शेजवार और इलाके से जुड़े विधायक उमाकांत शर्मा भी कांग्रेस से भाजपा में आये प्रभुराम चौधरी के पक्ष में नहीं है। 

भाजपा भी के पास उम्मीदवार बदलने का  विकल्प नहीं 
भारतीय जनता पार्टी को सिंधिया समर्थकों  टिकट दिन मजबूरी है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशियों को देखकर उनकी ताकत के हिसाब से भी भाजपा अपने प्रत्याशी बदलने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस के पहले टिकट घोषित कर देने से भाजपा के सामने मुश्किलें और बढ़ गई है। खुद शिवराज कई मौके पर कह चुके है कि सरकार चली जाएगी, तो कुछ नहीं बचेगा। इस वक्त भाजपा में जो बगावत है उसका भी  कांग्रेस को बड़ा लाभ मिलेगा। 

उम्मीदवारों की सूची
दिमनी- राघवेंद्र सिंह तोमर
अंबाह (सुरक्षित)- सत्यप्रकाश सिकरवार
गोहद (सुरक्षित)- मेवाराम जाटव
ग्वालियर- सुनील शर्मा
डबरा- सुरेश राजे
भांडेर- फूल सिंह बरैया
करेरा (सुरक्षित)- प्रगीलाल जाटव
बमोरी- कन्हैयालाल अग्रवाल
अशोकनगर- आशा दोहरे
अनूपपुर (सुरक्षित)- विश्वनाथ सिंह कुंजाम
सांची (सुरक्षित)- मदनलाल चौधरी
आगर (सुरक्षित)- विपिन वानखेड़े
हाटपिपल्या- राजवीर सिंह बघेल
नेपानगर  (सुरक्षित)- राम किशन पटेल
सांवेर (सुरक्षित)- प्रेमचंद गुड्डू

(POLITICSWALA.COM)

बिहार : नारों के जरिए चुनावी मैदान फतह करने की तैयारी में जुटे दल
10-Sep-2020 2:32 PM (59)

मनोज पाठक
पटना, 10 सितंबर (आईएएनएस)|
आगामी विधानसभा चुनाव में चुनावी मैदान में उतरने के लिए करीब सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। राजनीतिक दल इस चुनाव में कई ऐसे नए नारे भी गढ़े हैं, जिससे वे ना केवल मतदाताओं को आकर्षित कर सकें, बल्कि इन नारों के जरिए ही खुद को लोगों का सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित कर सकें।

ऐसा नहीं कि कोई एक दल नारों के जरिए खुद को बेहतर साबित करने की तैयारी कर रहा है। सभी राजनीतिक दल ऐसा करने की तैयारी कर रहे हैं।

कहा तो जा रहा है कि कई दलों ने तो इसके लिए बजाप्ता एक अलग से टीम बना रखी है, जो चुनाव के समय के बढ़ने के साथ समय-समय पर नए नारे संबंधित दलों को उपलब्ध कराएंगे।

पिछले कई चुनावों से नारे और कार्यक्रम चर्चा का विषय बनते रहे हैं। राजनीतिक दलों का भी मानना है कि अच्छे और आसान चुनावी नारे और कार्यक्रम लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं, जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ संबंधित पार्टियों को मिलता है।

सूत्रों कहना है कि कोरोना काल में होने वाले इस चुनाव में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के कारण बड़ी रैलियां नहीं होनी है, ऐसे में सभी राजनीतिक दल प्रचार के लिए नारों का सहारा लेने की तैयारी में हैं।

बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (युनाइटेड) पिछले चुनाव 'बिहार में बहार है, नीतीषे कुमार है' जैसे चर्चित नारों की तरह फि र से नए नारों के साथ चुनावी मैदान में उतरने जा रही है।

जदयू ने इस बार नये नारे 'न्याय के साथ तरक्की, नीतीश की बात पक्की' के सााथ चुनावी मैदान में उतरने जा रही है। इसके अलावे जदयू 'नीतीश के काम, नीतीश में विश्वास बिहार में विकास और विकसित बिहार' के पंच लाइन के साथ ही यह सरकार के विकास कार्यक्रमों को भुनाने में जुटी है।

भाजपा अभी तक 'भाजपा है तैयार, आत्मनिर्भर बिहार' लेकर सामने आ चुकी है। भाजपा इसी नारों के साथ चुनावी रथ मैदान में उतारने जा रही है।

सोशल मीडिया प्रदेश प्रमुख मनन कृष्ण कहते हैं कि 12 सितंबर के बाद और कई नारे सामने आएंगे, जो पार्टी की नीतियों और विकास कायरें से जुडे होंगे। जैसे-जैसे चुनाव का दौर बढ़ता जाएगा, नए नारे भी सामने आएंगें। उन्होंने कहा कि नारे से लोग सीधे तौर पर जुड़ते हैं।

इधर, राजद भी इस चुनाव में नारा गढ़ने में पीछे नहीं है। सरकार के खिलाफ कई नारों को गढ़कर राजद निशाना साध रही है। राजद इस चुनाव में 'लौटेगा बिहार का सम्मान-जब थामेंगे तेजस्वी कमान', 'शिक्षा क्षेत्र का हाल-भ्रष्ट सरकार ने किया बेहाल', 'बंद पड़े उद्योग चलाएंगे, नया बिहार बनायेंगे' जैसे नारों के साथ चुनावी मैदान में उतर चुकी है।

कांग्रेस ने इस चुनाव में सरकार के बदलने के आह्वान के साथ 'बोले बिहार- बदलें सरकार' के चुनावी नारे के साथ मैदान फ तह करने में उतर चुकी है।

अब देखना है कि नए नारों के जरिए कौन पार्टी मतदाताओं को पसंद आती है।
 

यूपी से कांग्रेस में एक और लेटर 'बम'
06-Sep-2020 12:09 PM (102)

अमिता वर्मा 

लखनऊ, 6 सितम्बर (आईएएनएस)| कांग्रेस एक और 'लेटर बम' के साथ पार्टी में होने वाले धमाके के लिए तैयार है, इस बार यह उत्तर प्रदेश (यूपी) से है। 

पिछले साल पार्टी से निष्कासित नौ वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र भेजा है, जिसमें कहा गया है कि वह पार्टी को महज 'इतिहास' का हिस्सा बनकर रह जाने से बचा लें। 

प्रियंका गांधी वाड्रा, जो कि यूपी की प्रभारी व पार्टी महासचिव हैं, उन्हें परोक्ष रूप से निशाने पर लेते हुए, चार पन्नों के पत्र में सोनिया गांधी से परिवार से ऊपर उठने का आग्रह किया गया है। पत्र में लिखा गया है, 'परिवार के मोह से ऊपर उठें' और पार्टी की लोकतांत्रिक परंपराओं को पुनस्र्थापित करें । 

पूर्व सांसद संतोष सिंह, पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी, पूर्व विधायक विनोद चौधरी, भूधर नारायण मिश्रा, नेकचंद पांडे, स्वयं प्रकाश गोस्वामी और संजीव सिंह के दस्तखत वाले पत्र में कहा गया है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 

पत्र में कहा गया है, "इस बात की आशंका है कि आपको राज्य मामलों के प्रभारी द्वारा मौजूदा स्थिति से अवगत नहीं कराया जा रहा है। हम लगभग एक साल से आपसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट की मांग कर रहे हैं, लेकिन मना कर दिया जाता है। हमने अपने निष्कासन के खिलाफ अपील की थी जो अवैध था लेकिन केंद्रीय अनुशासन समिति को भी हमारी अपील पर विचार करने का समय नहीं मिला।"

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आगे दावा किया कि पार्टी के पदों पर उन लोगों का कब्जा है जो वेतन के आधार पर काम कर रहे हैं और पार्टी के प्राथमिक सदस्य भी नहीं हैं।

पत्र में कहा गया है, "ये नेता पार्टी की विचारधारा से परिचित नहीं हैं, लेकिन उन्हें यूपी में पार्टी को दिशा देने का काम सौंपा गया है।"

इसमें आगे कहा गया है कि ये लोग उन नेताओं के प्रदर्शन का आकलन कर रहे हैं जो 1977-80 के संकट के दौरान कांग्रेस के साथ चट्टान की तरह खड़े थे। लोकतांत्रिक मानदंडों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, अपमानित किया जा रहा है और निकाला जा रहा है। वास्तव में, हमें मीडिया से हमारे निष्कासन के बारे में पता चला था, जो राज्य इकाई में नई कार्य संस्कृति की बात करता है। 

पत्र में आरोप लगाया गया है कि नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी है।

इन्होंने आगे कहा कि यूपी में एनएसयूआई और युवा कांग्रेस निष्क्रिय से हो गए हैं। 

नेताओं ने कांग्रेस आलाकमान से वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद को बढ़ावा देने का आग्रह किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर यह मौजूदा मामलों की ओर आंख मूंद लेता है, तो कांग्रेस को यूपी में तगड़ा नुकसान होगा, जो कभी पार्टी का गढ़ हुआ करता था।

यह पत्र ऐसे समय में आया है जब पार्टी उत्तर प्रदेश में पहले से ही गुटबाजी, मतभेदों का सामना कर रही है।

नीतीश के दलित दांव पर तेजस्वी का ओबीसी कार्ड -सरकार बनी तो 4.5 लाख पदों पर करेंगे तुरंत बहाली
05-Sep-2020 4:36 PM (63)

पटना, 5 सितंबर। बिहार इलेक्शन 2020 से पहले सूबे में दलित वोटबैंक पर सियासत तेज है। मुख्यमंत्री और जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार के दलित दांव पर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने ओबीसी कार्ड चला है। शनिवार को उन्होंने ऐलान किया कि अगर चुनाव में उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो वे लोग करीब 4.5 लाख पदों पर फौरन बहाली करेंगे। 

तेजस्वी पत्रकारों से बोले, चूंकि, चुनाव नजदीक हैं। नीतीश कुमार ने बिहार में मारे गए एससी/एसटी लोगों के बच्चों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया। पर ओबीसी या फिर सामान्य वर्ग के जो लोग मारे गए, उनकी संतानों को नौकरी क्यों नहीं दी जा रही? यह एससी/एसटी लोगों की हत्या को प्रोत्साहित करने जैसा है। बकौल राजद नेता, बिहार की बेरोजगारी दर लगभग 46 फीसदी है, जो भारत में सबसे अधिक है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में लगभग 4.5 लाख पद रिक्त हैं। अगर मौका दिया जाता है, तो हमारी सरकार सभी रिक्त पदों को भरेगी और जनसंख्या के अनुपात में नई रिक्तियों का निर्माण करेगी।  इससे पहले, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम के तहत लंबित मामलों को 20 सितंबर तक निपटाने के आदेश दिए। 

साथ ही उन्होंने अधिकारियों को असमय मृत्यु से संबंधित मामलों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी एवं एसटी) के आश्रितों को अनुकंपा आधार पर नौकरी देने के लिए नियम बनाने के भी निर्देश दिए। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, कुमार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सचिव प्रेम कुमार मीणा को मामलों के त्वरित निपटान के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ संपर्क में रहने का भी निर्देश दिया। 

मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम 1995 के अंतर्गत गठित राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की बैठक को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। इस दौरान, वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री रमेश ऋषिदेव, सांसदों विजय मांझी, पशुपति कुमार पारस, प्रिंस राज और आलोक कुमार सुमन के अलावा विधायकों और अन्य जन प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। (jansatta.com)
 

इनके हिसाब-किताब का समय अब आ गया है, लोभ-बहकावे में फंसना मत नीतीश के प्रस्ताव पर माया ने खोला मोर्चा
05-Sep-2020 4:30 PM (58)

पटना, 5 सितंबर। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने शुक्रवार को ऐलान किया था कि राज्य में एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति की हत्या होने पर उसके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। इस संबंध में सीएम ने तुरंत नियम बनाने के निर्देश दिए थे। अब नीतीश कुमार के उस ऐलान पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने निशाना साधा है। मायावती ने ट्वीट कर लिखा कि बिहार विधानसभा आम चुनाव के पहले वर्तमान सरकार एक बार फिर एससी/एसटी वर्ग के लोगों को अनेकों प्रलोभन/आश्वासन आदि देकर उनके वोट के जुगाड़ में है, जबकि अपने पूरे शासनकाल में इन्होंने इन वर्गों की घोर अनदेखी/उपेक्षा की व कुंभकरण की नींद सोते रहे, जिसके हिसाब-किताब का अब समय। (jansatta.com)
 

 

बिहार में चुनाव के पूर्व माहौल बदलने में जुटे नीतीश !
05-Sep-2020 12:37 PM (59)

मनोज पाठक 
पटना, 5 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार में इस साल होने वाले चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। बिहार में सत्ताधारी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) भी इसमें पीछे नहीं है। जदयू के प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सधे राजनीतिक चालों से न केवल चुनाव के पहले माहौल बदलने में जुटे हैं बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी साधने में जुट गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहचान राजनीति में एक मंझे खिलाड़ी के रूप में होती है, जिन्हें 'सोशल इंजीनियरिंग' में भी दक्ष माना जाता है। बिहार में करीब 15 साल सत्ता में रहने के बाद इस चुनाव में भी नीतीश ने चुनाव के पहले ही माहौल को बदलने प्रारंभ कर दिए हें। 

पिछले कई सालों से अपनी मांगों को लेकर कई बार सड़कों पर उतर चुके नियोजित शिक्षकों के लिए नई सेवाशर्त नियमावली को मंजूरी देकर नीतीश ने चार लाख शिक्षकों को खुश करने की कोशिश की है बल्कि इनके जरिए सरकार के प्रति इनकी नराजगी को भी दूर करने का प्रयास किया है। 

इसी तरह कोरोना की जांच की संख्या में वृद्धि कर विपक्ष के इस मुद्दे को भी छीन लिया है। बिहार में फिलहाल प्रतिदिन औसतन एक लाख से अधिक कोरोना की जांच की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि जांच बढ़ाए जाने के बाद रिकवरी रेट में भी वृद्धि हुई है। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को महागठबंधन से तोड़कर अपने पक्ष में कर ना केवल दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, बल्कि मांझी के जरिए राजग में लोजपा के दबाव की राजनीति को भी कुंद करने की राजनीतिक चाल चली है। 

उल्लेखनीय है कि हाल में राजग के दो घटक दलों लोजपा और जदयू में शीत युद्ध की स्थिति बनी हुई है। लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान विभिन्न मुद्दों पर नीतीश कुमार पर निशाना साधते रहे हैं। 

इसके अलावा, मुख्यमंत्री ने चुनाव की घोषणा के पूर्व शुक्रवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत गठित राज्य स्तरीय सतर्कता और मॉनीटरिंग समिति की हुई बैठक में किसी एससी या एसटी समुदाय के व्यक्ति की हत्या होने पर उसके परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी देने से संबंधित नियम तुरंत बनाने का निर्देश देकर दोनों समुदायों को साधने का प्रयास किया है। 

दीगर बात है कि यह चुनाव के पूर्व संभव नहीं दिख रहा है। 

इधर, चर्चा है कि वरिष्ठ समाजवादी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव भी जल्द ही जदयू के साथ आ सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो इसका लाभ भी नीतीश की पार्टी को लाभ मिलना तय माना जा रहा है। 

जदयू के वरिष्ठ नेता और सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री नीरज कुमार कहते भी हैं कि नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद ही न्याय के साथ विकास को मूलमंत्र बनाया। समाज के अंतिम पंक्ति पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि यहां के लोगों की पसंद नीतीश कुमार बने हुए हैं। 

इसके अलावा, हाल के कुछ दिनों में नीतीश कुमार ने राजद के कई विधायकों और नेताओं को तोड़कर अपने पक्ष में लाकर भी उसे जोरदार झटका दिया है। ऐसे में कुछ महीने पहले तक कई परेशानियों में घिरे नीतीश कुमार अपनी सधी राजनीतिक चालों से माहौल बदलने में सफल दिखने लगे हैं। 

डॉ. कफील कांग्रेस में हो सकते हैं शामिल
04-Sep-2020 3:32 PM (89)

लखनऊ, 4 सितम्बर (आईएएनएस)| योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में मुस्लिमों पर अत्याचार के लिए पोस्टर ब्वॉय बनकर उभरे डॉक्टर कफील खान आने वाले दिनों में राजनीतिक करियर चुन सकते हैं। कफील को कुछ विपक्षी पार्टियों से सहानुभूति मिल रही है। उन्होंने हालांकि कांग्रेस के प्रति अपने झुकाव को दिखाया है।

उन्होंने कहा, "मुश्किल समय में, प्रियंका गांधी वाड्रा ने मेरा समर्थन किया। मथुरा जेल से मेरी रिहाई के बाद उन्होंने फोन करके मुझसे बातचीत की।"

पूर्व कांग्रेस विधायक प्रदीप माथुर कफील खान की जेल से रिहाई के वक्त वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा, "वरिष्ठ पार्टी नेताओं के दिशानिर्देश पर, मैं काफिल की रिहाई के लिए औपचारिकताओं को पूरा करने लगातार मथुरा और अलीगढ़ के जिला प्रशासन के संपर्क में था। मैं उन्हें राजस्थान बॉर्डर तक ले गया।"

कांग्रेस नेता ने कहा, "प्रियंका ने मानवता के लिए उनके समर्थन में और योगी सरकार द्वारा राज्य के निर्दोष लोगों के खिलाफ अत्याचार का विरोध करने के लिए अपनी आवाज बुलंद की । यह कफील पर निर्भर करता है कि वह कांग्रेस के साथ काम करना चाहते हैं या नहीं।"

डॉक्टर ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह बिहार, असम, केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने के लिए जांएगे।

अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि कफील के पास महत्वपूर्ण 2022 उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का मुस्लिम चेहरा बनने की काबिलियत है, जिसके लिए पार्टी अपनी खोई जमीन वापस करने के लिए काम कर रही है।

उन्होंने कहा, "राज्य सरकार के खिलाफ उनकी लड़ाई ने उत्तरप्रदेश और अन्य राज्यों में समुदाय के लोगों के बीच बड़ी संख्या में समर्थन हासिल किया है।"

इस बीच, परिवार के एक सूत्र ने कहा कि क फील ने बीते तीन वर्ष से काफी कुछ झेला है और शायद उसके पास राजनीति में शामिल होने के सिवाय और कोई उपाय नहीं बचा।

परिवार के सदस्य ने कहा, "कई पार्टियों की ओर से ऑफर है, लेकिन उन्हें निर्णय करना है कि वे किसमें शामिल होना चाहते हैं। यह शायद कांग्रेस हो सकता है।"

डॉ. कफील खान को पहली अगस्त 2017 में बार बी.आर.डी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में ऑक्सीजन हादसे के बाद गिरफ्तार किया गया था, जिसमें तीन दिन के अंदर 70 बच्चे की मौत हो गई थी।

विभागीय जांच में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई, लेकिन उन्हें फिर से बहाल नहीं किया गया है।

मांझी की राह चलेंगे शरद, आ सकते हैं जदयू के साथ
04-Sep-2020 3:26 PM (54)

मनोज पाठक 

पटना, 4 सितम्बर (आईएएनएस)| बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (युनाइटेड) के प्रमुख नीतीश कुमार इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में विपक्षियों को मात देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं। यही कारण है कि विपक्ष को घेरने के लिए वह सारी रणनीतियां तैयार की हैं, जिससे विपक्ष को चुनाव में नुकसान पहुंचाया जा सके। इस बीच, समाजवादी नेता शरद यादव के भी फिर से जदयू में लौटने की चर्चा प्रारंभ हो गई है। 

सूत्रों के मुताबिक, पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकतांत्रिक जनता दल के प्रमुख शरद यादव कुछ दिनों पहले बीमार थे और 30 अगस्त को स्वस्थ होने के बाद अस्पताल से वापस घर लौटे हैं। जल्द ही इनके बिहार आने की संभावना है। 

लोकतांत्रिक जनता दल (लोजद) के प्रदेश महासचिव राजेंद्र सिंह यादव ने बताया कि शरद यादव बीते दिनों बीमार हो गए थे, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपने घर को लौट आयें। वे जल्द ही बिहार आयेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका भी अहम होने वाली है। 

सूत्रों का दावा है कि इस बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शरद यादव को फोनकर हालचाल जाना है। इसके बाद शरद यादव के जदयू में फिर से शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं। 

इधर, सूत्रों का दावा है कि जदयू के बड़े नेता भी शरद यादव से जाकर मिल चुके हैं। इसके बाद जदयू में उनके लौटने की संभावना को और बल मिला है। 

उल्लेखनीय है कि शरद यादव ने जदयू से नाता तोड़कर 2018 में अपनी नई पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल का गठन किया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे महागठबंधन का हिस्सा थे और इसी के बैनर तले मधेपुरा से चुनाव भी लड़े लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

इधर, जदयू के सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार राजद से गठबंधन टूटने के बाद नाखुश यादव मतदाताओं को फिर से अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। यही कारण है कि वे शरद यादव को फिर से जदयू में लाना चाहते हैं। 

इस संबंध में जदयू के नेता हालांकि खुलकर कुछ भी नहीं कह रहे हैं। जदयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि शरद यादव वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं। उनकी राजनीति में अलग पहचान है। 

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा भी जदयू के साथ हो गई है। अब देखने वाली बात होगी कि पूर्व केंद्रीय मंत्री यादव की लोकतांत्रिक जनता दल मांझी के रास्ते चल कर जदयू के साथ आती है या लोजद का विलय होगा। 

मप्र के उप-चुनाव में अब 'राम' की एंट्री
03-Sep-2020 2:42 PM (73)

संदीप पौराणिक 
भोपाल 3 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में विधानसभा के उप-चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही जीत के लिए राजनीतिक दल और संभावित उम्मीदवारों ने बिसात बिछानी शुरू कर दी हैं। कोई बात विकास की कर रहा है, दल बदल को लेकर हमले बोले जा रहे हैं और अब तो मतदाताओं को लुभाने के लिए भगवान राम की भी एंट्री हो गई है। 

राज्य में 27 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है। यह चुनाव राज्य की सियासत के लिहाज से काफी अहम माना जा रहे है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन चुनावों की हार-जीत का असर सीधे सरकार के भविष्य पर पड़ने वाला है। 27 विधानसभा क्षेत्रों में से 25 विधानसभा क्षेत्र वे हैं जहां से कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित होने वाले विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफो देकर भाजपा में शामिल हुए हैं। संभावना इस बात की है कि इन सभी 25 पूर्व विधायकों को भाजपा उम्मीदवार बनाने वाली है।

उप-चुनाव में जहां कांग्रेस दल-बदल को बड़ा मुद्दा बनाए हुए है, वहीं भाजपा द्वारा विकास और पूर्ववर्ती सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर हमले कर रही है। सागर जिले के सुरखी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के संभावित उम्मीदवार परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने तो भगवान राम का सहारा लिया है। वे अपने विधानसभा क्षेत्रों में पांच रामशिला पूजन यात्राएं निकाल रहे हैं। यह यात्राएं लगभग 300 गांव तक पहुंचेंगीं।

राजपूत इन यात्राओं को सीधे तौर पर राजनीति से जोड़ने को तैयार नहीं है। वे यही कह रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनना है और इन शिलाओं को शिला पूजन के बाद अयोध्या राम मंदिर निर्माण के लिए भेजा जाएगा। 

वहीं कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि दल-बदल कर भाजपा में जाने वाले राजपूत सहित अन्य पूर्व विधायकों के प्रति जनता में नाराजगी है क्योंकि उन्होंने जनमत को बेचा है और यही कारण है कि अब इनको जनता को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं, मगर जनता उनके छलावे में आने वाली नहीं है।

वहीं राजनीतिक विश्लेषक विनेाद आर्य का कहना है कि चुनाव जीतना है तो राजनेता सारे रास्ते अपनाएंगे ही, ग्रामीण इलाकों के लोगों में भगवान के प्रति आस्था ज्यादा ही होती है और धर्म के सहारे मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है। उसी रणनीति के तहत यह शिलापूजन यात्राएं निकाली जा रही हैं। साथ ही सवाल यह भी उठ रहा है जो लेाग पहले भाजपा पर राम के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाते थे, अब वही लोग भाजपा में आकर रामशिला पूजन यात्राएं निकालकर राम मंदिर की बात कर रहे हैं। इन कोशिशों का मतदाताओं पर कितना असर होगा यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे। 

भाजपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने रथयात्राएं निकालने की कोई आधिकारिक योजना नहीं बनाई है। क्षेत्रीय नेता अपनी योजना बनाकर रामशिला पूजन यात्राएं निकालने के साथ अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे है, यह सब कार्यकर्ताओं को जोड़ने और मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए है। 

उप्र में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में अंदरूनी कलह जोरों पर
30-Aug-2020 5:30 PM (65)

लखनऊ, 30 अगस्त। उत्तर प्रदेश (यूपी) में साल 2022 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए जहां सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां करनी शुरू कर दी है और चीजों को व्यविस्थत करने में लगे हैं, वहीं यूपी में कांग्रेस खुद से ही लड़ने में व्यस्त है। पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह जोरों पर है। पिछले हफ्ते हुई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक के बाद, जहां पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखे गए एक पत्र ने भारी विवाद खड़ा कर दिया था, पार्टी आलाकमान के प्रति अपनी निष्ठा जताने के लिए अब कांग्रेस के नेता 'असंतुष्टों' को निशाना बना रहे हैं।

सबसे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को निशाने पर लिया गया। लखीमपुर खीरी इकाई ने विवादास्पद पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता करने के लिए पार्टी से उनके निष्कासन की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया।

डीसीसी प्रमुख प्रहलाद पटेल ने दावा किया कि यह राज्यस्तरीय कांग्रेस नेतृत्व के एक पदाधिकारी के दबाव में पारित किया गया।

बगावत की आग की लपटों को बुझाने के बजाय, यूपीसीसी नेतृत्व ने इस मुद्दे पर जानबूझकर चुप्पी साध रखी है। दो स्थानीय कांग्रेस नेताओं के बीच बातचीत के एक असत्यापित ऑडियो क्लिप से पता चला कि प्रसाद के खिलाफ प्रदर्शन एक वरिष्ठ पार्टी नेता के इशारे पर किया गया था और कुछ मजदूरों को नारे लगाने के लिए भाड़े पर लिया गया था।

यूपीसीसी के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने दिलचस्प रूप से इस मामले में पार्टी का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के कुछ कार्यकर्ता अपनी भावनाओं को पार्टी आलाकमान तक पहुंचाना चाहते हैं।

इसके तुरंत बाद, पूर्व कांग्रेस एमएलसी नसीब पठान ने एक वीडियो संदेश डाला, जिसमें दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद को पार्टी से बाहर करने की मांग की गई थी। पठान ने कहा, "जैसा कि उन्होंने पार्टी के अनुशासन को तोड़ा है, उन्हें 'आजाद' कर दिया जाना चाहिए और पार्टी से निकाल दिया जाना चाहिए।"

नसीब पठान संयोग से, एक समय यूपी कांग्रेस में आजाद के कट्टर वफादारों में से एक हुआ करते थे।

अब, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष निर्मल खत्री ने आजाद पर उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र सात सीटें जीत सकी थी।

खत्री ने सोशल मीडिया पर आजाद पर निशाना साधते हुए कहा, "जहां तक मुझे पता है, राहुल गांधी भी गठबंधन के विरोध में थे, लेकिन आजाद की अड़ियल और पराजयवादी राजनीतिक सोच के कारण शायद चुप रहे। राजनीति विज्ञान के उनके सिद्धांत गठबंधन की राजनीति पर केंद्रित हैं।"

यूपीसीसी के पूर्व प्रमुख ने कहा, "आजाद ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि पिछले 23 सालों से कांग्रेस कार्यकारिणी समिति (सीडब्ल्यूसी) का चुनाव नहीं हुआ है। सवाल यह है कि जब इन 23 सालों में वह समिति के खुद एक मनोनीत सदस्य थे, तब उन्होंने सवाल क्यों नहीं उठाया?"

खत्री ने कहा, "मुझे यह भी लगता है कि चुनाव हर स्तर पर होने चाहिए। लेकिन, आप जैसे नेताओं का मानना था कि नामांकन का तरीका बेहतर है।"

इसके अलावा, युवा कांग्रेस नेताओं का एक समूह पहले से ही समावेशी आधार पर पार्टी की विफलता को लेकर राज्य के नेतृत्व पर निशाना साध रहा है।

इन नेताओं ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप में, यूपीसीसी प्रमुख पर ऊंची जातियों की अनदेखी करने और पार्टी में ओबीसी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

इन नेताओं का यह भी दावा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को उनके सहयोगी यूपी कांग्रेस की स्थिति के बारे में गुमराह कर रहे हैं।

इस बीच, पार्टी ने 10 वरिष्ठ नेताओं के निष्कासन को रद्द करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है, हालांकि यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता शकील अहमद के निष्कासन को रद्द कर दिया था।

गौरतलब है कि बिहार में मधुबनी से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद अहमद को पिछले साल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था। हालांकि अब कांग्रेस में उनकी वापसी हो गई है।(IANS)

बिहार : वाम दल महागठबंधन से तालमेल कर अपनी पुरानी जमीन तलाशने में जुटे
29-Aug-2020 4:00 PM (66)

मनोज पाठक 
पटना, 29 अगस्त (आईएएनएस)|
बिहार में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों ने अपनी सीटें बढ़ाने के लिए विपक्षी दलों के महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में है। ऐसे में हालांकि अब तक सीट बंटवारे को लेकर पत्ते नहीं खोले जा रहे हैं, लेकिन प्रभाव वाले क्षेत्रों में तैयारी शुरू कर दी गई है।

वामपंथी दलों के भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक, वामपंथी दल के नेताओं ने राज्य के 18 जिलों के विधानसभा क्षेत्रो में चुनाव लड़ने की मंशा जताते हुए राजद को सीटों की सूची सौंप दी है।

एक राजद नेता ने बताया कि वामपंथी दलों के नेताओं के साथ दो चरणों की बात हो चुकी है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि सीट इस दोस्ती के आड़े नहीं आएगी। राजद के सूत्रों का कहना है कि महागठबंधन में शामिल सभी दल बात कर अपनी इच्छा वाली सीटों की सूची सौंपेंगे, उसके के बाद मिल-बैठकर रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भाकपा (माले) के शिष्टमंडल ने चुनावी रणनीति पर राजद के साथ चर्चा की है।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाकपा (माले) के तीन विधायक जीतकर आए थे। पिछले चुनाव में माले ने 99 सीटों पर, भाकपा ने 98 और माकपा ने 43 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से मात्र माले के ही तीन प्रत्याशी विधानसभा पहुंच सके थे।

वर्ष 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों में भाकपा 56, माकपा 30 और माले ने 104 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उस चुनाव में इन दलों को सिर्फ एक सीट मिली थी। इस अनुभव के आधार पर वामपंथी दल आगामी चुनाव में अपनी स्थिति को सुधारने में जुटी है।

माकपा के राज्य सचिव अवधेश कुमार ने कहा, "हमें उम्मीद है कि महागठबंधन से तालमेल होगा। बहुत जल्द ही स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। सीट को लेकर कोई टकराव नहीं होगा। जदयू और भाजपा को हटाने के लिए यह समय की मांग है कि सभी मिलकर चुनाव लड़ें।"

इधर, राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी भी कहते हैं कि वामपंथी दल के नेताओं ने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। महागठबंधन मजबूत हो रहा है और कई दल इससे जुड़ने की इच्छा रखते हैं।

इससे पहले भी भाकपा और माकपा ने राजद या जनता दल के साथ गठबंधन में रहे हैं, लेकिन यह पहली बार होगा जब भाकपा (माले) भी राजद के इस गठबंधन में होगी।

भाकपा (माले) के राज्य सचिव कुणाल कहते हैं कि हमलोग भी महागठबंधन से चुनाव लड़ने को तैयार हैं। बिहार विधानसभा में राजद से अगर तालमेल होता है तो यह विधानसभा का पहला चुनाव होगा।

सोनिया के हाथ कमान, पर्दे के पीछे राहुल कप्तान... इसी वजह से घमासान-दिग्विजय
26-Aug-2020 2:46 PM (110)

मौसमी सिंह

नई दिल्ली, 26 अगस्त। अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस में हलचल जारी है। पार्टी नेता दिग्विजय सिंह के एक बयान ने इसमें और तेजी ला दी है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि पार्टी के अंदर असंतोष एक दिन में नहीं फैला। यह विवाद उसी दिन तेज हो गया था जिस दिन सोनिया गांधी पिछले साल पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनाई गई थीं। राहुल गांधी ने अध्यक्ष का पद छोड़ तो दिया लेकिन पार्टी पर उनका नियंत्रण बना रहा। इसका सबूत पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति से मिलता है।

ऐसा लगता है कि पार्टी के नेताओं में असंतोष का एक कारण यही बना कि राहुल गांधी भले ही अध्यक्ष नहीं रहे लेकिन पर्दे के पीछे वे पार्टी पर नियंत्रण जारी रखे हुए थे। पार्टी में बागी नेताओं की संख्या राज्यसभा चुनाव के बाद और बढ़ गया। मुकुल बनानी या केसी वेणुगोपाल की जगह राजीव सातव के नामांकन के लिए राहुल गांधी ने हामी भरी। इस फैसले के बाद पार्टी में विरोध बढ़ गया।   

बागी नेताओं के एक सूत्र ने ‘इंडिया टुडे’ से कहा कि पार्टी के 25 सांसद पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले थे। कांग्रेस पार्टी के खिलाफ जारी पत्र पर पूरे देश के लगभग 100 नेता दस्तखत करने वाले थे लेकिन आधे से ज्यादा इसमें पीछे हट गए क्योंकि उन्हें कार्रवाई का डर था। एक नेता ने बताया, लोकसभा और राज्यसभा से 12-12 नेता पत्र के समर्थन में थे। इन नेताओं ने कहा कि वे जो कर रहे हैं वह सही है लेकिन वे पीछे इसलिए हट गए क्योंकि उन्हें अपने खिलाफ कार्रवाई का डर था। उन्हें डर था कि पार्टी से निकाल दिया जाएगा।

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले एक नेता ने बताया कि चि_ी में गांधी और नेहरू परिवार के योगदान की तारीफ की गई है, खासकर सोनिया गांधी के कार्यों की सराहना है। इसके बावजूद पत्र पर दस्तखत करने वाले नेताओं को बागी माना जा रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि पार्टी के कई बड़े नेता इसमें शामिल हों लेकिन उन्होंने दस्तखत नहीं किए और चुप्पी साध ली। कई प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्रियों ने बागी नेताओं के इस रुख को गलत बताया। एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि सीडब्ल्यूसी के बाद मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों ने फोन किया और माफी मांगी। उन्होंने बताया कि ऐसा करने के लिए कहा गया था। हमें इस बात के लिए खेद है लेकिन पत्र दिल्ली से भेजा गया था। 

इस पत्र से पार्टी की छवि पर क्या असर पड़ेगा? इसके जवाब में राज्यसभा सांसद अहमद पटेल ने कहा, मामला नेताओं और उनके अध्यक्ष के बीच का है। हमलोग एक लोकतांत्रिक पार्टी हैं और पार्टी के अंदर लोकतंत्र है। नेताओं में असंतोष हो सकता है लेकिन इसे पार्टी के मंच पर उठाना चाहिए था। सोनिया गांधी के कार्यकाल के बीच राहुल गांधी पर आरोप लगा हैं कि वे पार्टी का संचालन कर रहे हैं। लेकिन वे फैसले लेने की बात नकारते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वे सिर्फ सांसद हैं।

राजस्थान के पार्टी प्रभारी अजय माकन राहुल गांधी की पसंद बताए जाते हैं। पूर्व में भी कुछ नियुक्तियां हुईं जिसके लिए राहुल गांधी जिम्मेदार बताए जाते हैं। यूपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी जैसे नेता राहुल गांधी की पसंद हैं। कर्नाटक के पार्टी अध्यक्ष डीके शिवकुमार और सीएलपी नेता भूपिंदर हुड्डा की इसलिए हुई क्योंकि दूसरा कोई विकल्प नहीं था। (aajtak.in)

चिट्ठी लिखने वाले नौ नेताओं की बैठक, कहा- सार्वजनिक करें हमारा पत्र
25-Aug-2020 3:10 PM (65)

नई दिल्ली, 25 अगस्त। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की घंटों चली बैठक में तीखे हमलों का जवाब देते हुए गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक और जितिन प्रसाद ने जोरदार तर्क दिया। सोमवार (24 अगस्त) को हुई मीटिंग में इन्होंने बताया कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर चर्चा और निवारण की आवश्यकता क्यों है। चारों नेता सीडब्ल्यूसी सदस्य हैं और उन 23 कांग्रेसी नेताओं में भी शामिल हैं जिन्होंने पत्र लिखा था।

द इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि मीटिंग के तुरंत बाद पत्र में हस्ताक्षर करने वालों में आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी और शशि थरूर सहित कम से कम नौ नेता गुलाम नबी आजाद के आवास पर मिले। शर्मा ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पत्र के सह-हस्ताक्षरकर्ता मीटिंग में हुए विचार-विमर्श के बारे में जानने के इच्छुक थे और हर कोई इससे संतुष्ट है। 

उन्होंने कहा कि सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में स्वतंत्र और स्पष्ट रूप से चर्चा हुई। दस्तावेज (पत्र) सभी सीडब्ल्यूसी सदस्यों के लिए उपलब्ध नहीं थे। बहुत सी अशुद्धियां और गलत व्याख्या थीं, जिसके कारण हमारे खिलाफ कुछ अभद्र टिप्पणियां की गईं। मैंने मांग की कि पत्र को सभी के लिए उपलब्ध कराया जाए और जनता के लिए भी जारी किया जाए, ताकि लोगों को पता चले की मुद्दे क्या हैं।
 
वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए हुए सीडब्ल्यूसी मीटिंग का हवाला देते हुए आनंद शर्मा ने कहा कि आजाद, वासनिक और मैंने अपने विचार रखे। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष का निष्कर्ष बहुत शालीन था। उन्होंने सुलह का स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि जो कुछ हुआ उसे पीछे छोड़ो और एकजुट होकर आगे बढ़ो। उन्होंने (सोनिया गांधी) कहा कि भले ही मैं पत्र का कुछ हिस्सा लीक होने से आहत हूं, मगर ये मेरे मूल्यवान सहयोगी हैं। हम (शर्मा) उनका सम्मान करते हैं और उनके बयान में हमें बहुत अधिक सौहार्दपूर्ण स्थिति में ला दिया है। पत्र में हस्ताक्षर करने वाले एक अन्य नेता ने कहा, हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि ये सब कैसे खत्म होता है। बता दें कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में हस्ताक्षरकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि वो सोनिया या राहुल गांधी के खिलाफ नहीं थे। बताया गया कि पांच पन्नों के पत्र में दोनों नेताओं के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा गया था। (jansatta)

गांधी परिवार से ही होना चाहिए अध्यक्ष-दिग्विजय
25-Aug-2020 2:36 PM (76)

नई दिल्ली, 25 अगस्त। कांग्रेस में गुटबाजी पर दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि जो पार्टी के नेतृत्व से असंतुष्ट हैं उन्हें सामने आकर अपनी बात रखनी चाहिए थी। उन्हें चिट्ठी लिखने की जरूरत नहीं थी। जब उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती नहीं दी तो आखिर वो कहना क्या चाहते हैं इसको लेकर स्थिति साफ करनी चाहिए। मैं नहीं मानता कि जो अपनी बात रखना चाहते हैं उन्हें सोनिया गांधी या राहुल गांधी समय नहीं देते।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि सोनिया गांधी अगर अध्यक्ष पद से हटना चाहती हैं तो राहुल गांधी को राजी करें या फिर प्रियंका गांधी को राजी करना चाहिए। वो पहले भी इस्तीफे की पेशकश कर चुकी हैं. नेहरू-गांधी परिवार ही कांग्रेस को जोड़े रखने की शक्ति है और पार्टी अध्यक्ष गांधी परिवार से ही होना चाहिए। मनमोहन सिंह की तरह अगर कोई पद किसी और को देना चाहें तो दिया जा सकता है। अगर कोई अध्यक्ष बनना चाहता है तो वो इसका चुनाव लड़ ले।

दिग्विजय सिंह ने साफ कहा कि जो राहुल गांधी के खिलाफ हैं उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए. दिग्विजय सिंह ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया कि चिट्ठी लिखने के पीछे पार्टी के नेताओं का क्या मकसद रहा होगा. दिग्विजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी में सबकी बातें सुनी जाती हैं और चिट्ठी लिखने की बजाए पार्टी के नेताओं को सीडब्ल्यूसी के उपयुक्त मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए थी. 2019 के चुनाव के बाद राहुल गांधी को सीडबल्यूसी भंग कर देनी चाहिए थी क्योंकि जिम्मेदारी सबकी थी।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी, संघ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सभी चाहते हैं कि कांग्रेस पार्टी को खत्म कर दिया जाए और इसीलिए वो अक्सर इस तरह की कोशिशें करते रहते हैं लेकिन कांग्रेंस पार्टी का आधार बेहद मजबूत है और इसे वो हिला नहीं सकते।
राहुल गांधी वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 12 फरवरी को कोरोना के खतरे से देश को आगाह किया था और इसके लिए मैं उनका आभार मानता हूं. राहुल गांधी ने जो-जो शब्द कहे वो पूरी तरह सत्य रहे हैं। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है, ये सत्य हुआ। उन्होंने चीन के बारे में जो चेतावनी दी जिसपर ध्यान नहीं दिया गया लेकिन उसका अंजाम सबके सामने है। राहुल गांधी ने कोरोना के खतरे पर सरकार और देश को आगाह किया लेकिन सरकार ने नहीं सुनी।

दिग्विजय सिंह ने ये भी कहा कि राहुल गांधी ने शुरुआत से लेकर राफेल के मामले पर देश को सच्चाई बताने का प्रयास किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल सौदे में सारे नियम-कायदों को ताक पर रख दिया और इस मामले में देश के सामने सच आना चाहिए लेकिन सरकार ने पूरी कोशिश की जिससे ऐसा ना हो सके।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि कपिल सिब्बल ने जिस तरह से अदालत में जरूरत पडऩे पर कांग्रेस का पक्ष रखा और कई मामलों में कांग्रेस को मजबूती प्रदान की इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं. पार्टी के प्रति उनके कमिटमेंट पर कोई शक नहीं है। (abplive.com/news)

मप्र की सियासत के 'केंद्र' में फिर सिंधिया
24-Aug-2020 3:25 PM (71)

संदीप पौराणिक 

भोपाल, 24 अगस्त (आईएएनएस)| मध्यप्रदेश की सियासत में एक बार फिर पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया 'केंद्र' बनते जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव के समय जहां भाजपा का नारा था 'हमारे नेता तो शिवराज, माफ करो महाराज' वहीं अब नारा भी बदलकर 'साथ चलो शिवराज-महाराज' हो गया है। वहीं कांग्रेस के निशाने पर भी सिंधिया ही हैं। 

राज्य में आगामी समय में 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, इनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके से आती हैं और यह क्षेत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाला माना जाता है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में इस इलाके से कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी और कांग्रेस की डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी हुई थी।

सिंधिया ने कांग्रेस का साथ छोड़ा तो कमल नाथ की सरकार गिर गई और सिंधिया ने भाजपा का दामन थामकर सत्ता में भाजपा की वापसी करा दी। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के निशाने पर सिंधिया ही थे, यही कारण है कि भाजपा ने नारा दिया था 'हमारे नेता तो शिवराज, माफ करो महाराज'। अब स्थितियां बदली हैं और नारा हो गया है, 'साथ चलो शिवराज-महाराज'।

सिंधिया भाजपा में शामिल होने और राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद पहली बार ग्वालियर-चंबल अंचल के दौरे पर आए हैं और इस मौके पर भाजपा ने तीन दिवसीय सदस्यता अभियान चलाया। इस सदस्यता अभियान के दौरान सिंधिया ने अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया है, क्योंकि कई हजार कार्यकर्ता भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं।

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने को लेकर कहा, "सिंधिया ने प्रदेश में दुरावस्था लाने वाली कांग्रेस की सरकार को गिराकर देश को जो संदेश दिया है, वो संदेश कई साल पहले ज्योतिरादित्य की दादी विजयराजे सिंधिया ने डी़ पी़ मिश्रा की सरकार को उखाड़कर पूरे देश को संदेश दिया था। इतना ही नहीं, जब कांग्रेस राम मंदिर का विरोध कर रही थी, तब भी सिंधिया ने मंदिर का समर्थन किया था, कश्मीर से धारा 370 हटाने और नागरिकता संशोधन कानून का भी समर्थन किया और इसकी वजह यह है कि उनकी दादी विजयराजे ने उनके मन-मस्तिष्क में राष्ट्रवाद का बीजारोपण किया था।" 

सिंधिया स्वयं कांग्रेस पर हमलावर हैं। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ और दिग्विजय सिंह पर हमले बोले। सिंधिया ने कमल नाथ सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा, "राज्य में 15 महीनों के शासनकाल में कमल नाथ सरकार ने जो भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी की, उसके कारण हमें यह कदम उठाना पड़ा। कमल नाथ ने मुख्यमंत्री रहते कभी इस क्षेत्र में चेहरा नहीं दिखाया। दूसरी तरफ, शिवराज सिंह चौहान हैं, जिन्होंने यहां आने से पहले 250 करोड़ के कामों को मंजूरी दे दी। कमल नाथ हमेशा पैसों का रोना रोते रहते थे, लेकिन अब शिवराज ने जनता के लिए खजाना खोल दिया है।"

एक तरफ जहां भाजपा की ओर से कांग्रेस पर हमले बोले जा रहे हैं, वहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ग्वालियर की सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया। 

पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ ने सिंधिया पर हमला बोलते हुए कहा, "अपने ईमान का सौदा करना, जनादेश को धोखा देना, पीठ में छुरा घोंपना, जनता व लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विश्वास को तोड़ना, वह भी सिर्फ सत्ता की चाह के लिए, पद प्राप्ति के लिए, चंद स्वार्थपूर्ति के लिए, वो भी उस पार्टी के साथ जिसने मान-सम्मान, पद सब कुछ दिया, आखिर यह सब क्या कहलाता है? दल छोड़ना व जनता के विश्वास का सौदा करने में बहुत अंतर है। राजनीतिक क्षेत्र में आज भी कई लोग सिर्फ अपने मूल्यों, सिद्धांतों व आदर्शो के लिए जाने जाते हैं और कइयों का तो इतिहास ही धोखा, गद्दारी से जुड़ा हुआ है।"

ग्वालियर-चंबल में भाजपा के सदस्यता अभियान के चलते सिंधिया एक बार फिर सियासत के 'केंद्र' में आ गए हैं। भाजपा जहां उनके बचाव में खड़ी है तो दूसरी ओर कांग्रेस की ओर हमले बोले जा रहे हैं। इस क्षेत्र के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी समय में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव में सिंधिया के इर्दगिर्द ही सियासत घूमती नजर आएगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि सिंधिया का सियासी भविष्य यहां मिलने वाली हार जीत पर जो निर्भर करेगा। इसके चलते भाजपा और कांग्रेस देानों ही अपना सारी ताकत लगाने में चूक नहीं करेगी। 

थम नहीं रही है तकरार, गहलोत गुट के विधायक के पीछे पड़े पायलट समर्थक
21-Aug-2020 12:50 PM (111)

जयपुर, 21 अगस्त। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व पीसीसी चीफ सचिन पायलट गुट के बीच करीब एक महीने लंबा चला सियासी संघर्ष अभी थमा नहीं है। दोनों गुटों के बीच मतभेद की चिंगारियां रह रहकर उठ रही हैं। बाड़ाबंदी के दौरान जहां पहले नेताओं के बीच सोशल मीडिया पर ट्विटर वार चल रहा था, वहीं अब एक दूसरे का क्षेत्रों में भी विरोध किया जाने लगा है। सियासी मतभेद की इस लड़ाई का एक नजारा गुरुवार को भरतपुर जिले में देखने को मिला। वहां अशोक गहलोत गुट के एक विधायक के पहुंचने पर सचिन पायलट गुट के समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की।

दरसअल, अशोक गहलोत गुट के विधायक जोगिन्द्र सिंह अवाना गुरुवार को अपने विधानसभा क्षेत्र नदबई गए थे। वहां पहुंचने पर सचिन पायलट समर्थकों ने अवाना के सामने पायलट के समर्थन में जमकर नारेबाजी कर हूटिंग की। हालात ये हो गये कि अवाना जिस तरफ भी गए पायलट समर्थक उनके पीछे चलते गए और नारेबाजी करते गए। इससे अवाना खुद को असहज महसूस करने लगे, लेकिन पायलट समर्थकों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अवाना बीएसपी से कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायकों में शामिल हैं। अवाना को गहलोत गुट पूर्वी राजस्थान में गुर्जर बहुल इलाकों में पायलट के विकल्प के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। इससे पायलट समर्थक अवाना से खफा हैं।

जयपुर पहुंचते ही सचिन पायलट बोले-किसका इस्तेमाल कहां करना है, कमेटी तय करेगी।
उल्लेखनीय है कि गहलोत-पायलट के बीच चले लंबे सियासी संग्राम के बाद दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप से दोनों के बीच सियासी सुलह तो हो गई, लेकिन मनभेद अभी मिटे नहीं हैं। यही कारण है कि दोनों गुटों के नेताओं को जब भी और जहां भी मौका मिलता है वे एक-दूसरे पर तंज कसने से बाज नहीं आते हैं। हालांकि, मीडिया के सामने दोनों गुट अब मतभेद और मनभेद की बात सीधे तौर पर स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन वो उनके बयानों और व्यवहार में साफ नजर आ जाता है।

दो दिन पहले दिल्ली से जयुपर लौटते ही सचिन पायलट ने सरकार और संगठन में भागीदारी को लेकर जो बयान दिया था, उससे गहलोत खेमे में हलचल बढ़ गई थी। वहीं, अब पायलट के प्रदेश दौरे के प्लान से भरतपुर जैसे कई नजारे देखने को मिल सकते हैं। (hindi.news18.com)

अमरिंदर हटाएं, पंजाब में कांग्रेस बचाएं : बाजवा
21-Aug-2020 9:34 AM (47)

एक खास इंटरव्यू में पूर्व प्रदेश कॉग्रेसाध्यक्ष ने कहा 

नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)| राज्यसभा सांसद और पंजाब में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिह को तानाशाह करार दिया है और उनके काम करने के तरीकों पर निशाना साधा है। बाजवा ने मुख्यमंत्री पर स्मगलर और मादक पदार्थ की तस्करी करने वालों को बचाने का आरोप लगाया है।

दरअसल यह मतभेद हाल ही में जहरीली शराब पीकर 121 लोगों की मौत के बाद उभरे हैं। राज्यसभा सांसद ने कहा कि कैप्टन कुछ बाबुओं के सहारे सरकार चला रहे हैं।

यहां प्रताप सिंह बाजवा के साथ साक्षात्कार के कुछ अंश पेश हैं।

प्रश्न : आपके और कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच झगड़े का क्या कारण है?

उत्तर : मेरे और कैप्टन के बीच कोई निजी दुश्मनी नहीं है। यह मैं था, जिसने चुनाव से पहले पीसीसी अध्यक्ष के रूप में काम किया। बीते 3 वर्षो में यह मेरा ही कठिन परिश्रम था, जिसके अच्छे नतीजे रहे। इसलिए कोई निजी एजेंडा नहीं है।

समस्या यह है कि चुनाव के दौरान वादे किए गए , लेकिन यह वादे पूरे नहीं किए गए और हम मूक दर्शक बने नहीं रह सकते।

अमरिंदर ने कहा था कि उन्हें चुनाव के दौरान 4 हफ्तों का समय चाहिए। उन्होंने कहा था, "मैं सबकुछ ठीक कर दूंगा और उन पांच माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करूंगा। लेकिन कोई भी कार्रवाई नहीं की गई और मैं उनसभी का नाम ले सकता हूं, लेकिन सभी इन माफियाओं का नाम जानते हैं।"

प्रश्न : और अन्य मुद्दे जो विवाद के केंद्र में हैं?

उत्तर : मुख्यमंत्री के साथ मतभेद के अन्य मुद्दे गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी को लेकर है, क्योंकि इससे पहले की अकाली सरकार राजनीतिक स्वार्थ के लिए डेरा सच्चा सौदा के साथ हाथ मिला रही थी और गलत कार्यो में फंस गई और बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए, जिसमें दो युवा मारे भी गए।

अमरिंदर सिंह ने मामले को देखने का वादा किया था और जिन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की थी, उन्हें कटघरे में लाने का भी वादा किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि दोनों युवाओं को न्याय दिलाया जाएगा। लेकिन वह भी नहीं हुआ।

प्रश्न : क्या आप यह संकेत दे रहे हैं कि सरकार स्मगलिंग और मादक पदार्थो की तस्करी में शामिल लोगों के साथ बराबर की भागीदार है?

उत्तर : यह वही है जो मैंने उन्हें कहा था, निश्चित तौर पर अगर आप उन्हें समाप्त नहीं करेंगे तो यह क्या दिखाता है?

मुख्यमंत्री खुद आबकारी मंत्री और गृहमंत्री हैं, और बीते तीन साल में जहरीली शराब की वजह से पंजाब को करीब 2700 करोड़ रुपये की हानि हुई है और आबकारी विभाग उस लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं।

यह पहली बार है कि इस बाबत लक्ष्य पूरा नहीं होगा और इससे खजाने में हानि होगी, जहां पहले से ही त्रासदी हुई है और इसमें 121 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

प्रश्न : इससे पहले क्या प्रक्रिया थी?

उत्तर : पहले बोली लगती थी। पहले से ही एक निश्चित लक्ष्य था-यह वह पैसा था, जिसे आप शराब से हासिल कर सकते थे। यह पहली बार है जब लक्ष्य पूरा नहीं होगा और राज्य पहले ही 2700 करोड़ रुपये की हानि झेल रहा है और राज्य में अगस्त के पहले सप्ताह में जहरीली शराब पीने से तीन जिलों में 121 लोगों की मौत हो गई। पूरी चीजें किसी आबकारी माफिया की ओर इशारा करती हैं।

प्रश्न : लेकिन पार्टी ने कहा है कि आपको पार्टी के अंदर मामला उठाना चाहिए। आप सीधे राज्यपाल के पास क्यों गए?

उत्तर : हम मामला उठाते रहे हैं। इसे कई बार उठाया गया है।

यहां तक की दो महीने पहले, कैप्टन ने पंजाब के सभी विधायकों की बैठक बुलाई। मेरे सहयोगी व विधायक शमशेर सिंह डुल्लो और मैंने यह मामला उठाया। और भी कुछ विधायक थे, जिन्होंने हमारा इस मुद्दे पर समर्थन किया और उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि सरकार इस तरह के तत्वों को समर्थन देती है।

वे कहते हैं, "आप उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते"

प्रश्न : फिर क्या हुआ?

उत्तर : जब मीडिया पंजाब के मुख्यमंत्री से हमारे पत्रों के बारे में पूछती है तो वह कहते हैं कि 'मुझे ये पत्र नहीं मिले हैं और अगर मुझे यह मिलता भी है तो इसका जवाब देना जरूरी नहीं है। यह मेरा कोई निजी काम नहीं है।' वह मीडिया को कहते हैं, 'हम एक एजेंडा सेट करने के बारे में बात करते हैं।'

हम राज्यपाल के पास क्यों गए? क्योंकि जांच के आदेश जालंधर कमिश्नर को दिए गए हैं और कैसे जालंधर के कमिश्नर उन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दे सकते हैं जो शक्तिशाली हैं और उसका क्या हो जो मुख्यमंत्री के कार्यालय में मौजूद हैं।

हम माननीय राज्यपाल के पास सीबीआई जांच या ईडी की जांच के लिए गए थे, क्योंकि ये सर्वोच्च संस्थाएं हैं और दोषी को पकड़ा जा सकता है।

प्रश्न : तो फिर आप क्या सोचते हैं कि पार्टी आपके और मुख्यमंत्री के बीच निर्णय लेगी?

उत्तर : यह बात सही नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं कहा कि मैं मुख्यमंत्री पद का दावेदार हूं।

मुद्दा यह है कि काफी सारा समय बीत गया, जनादेश का सम्मान नहीं किया गया और पंजाब के लोग यह सोचते हैं कि हमने जनादेश का अपमान किया है।

कैप्टन वादे के ठीक विपरीत काम कर रहे हैं।

लेकिन आप अगर पार्टी को बचाना चाहते हैं तो, कांग्रेस को अमरिंदर सिंह और प्रदेश पार्टी अध्यक्ष को हटाने का निर्णय लेना होगा। बदलाव के लिए ऐसे व्यक्ति को लाना होगा, जो कांग्रेसमैन है। पहले वरिष्ठता दूसरा इमानदारी और तीसरा क्षमता पर विचार करना होगा।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि अमरिंदर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की नहीं सुन रहे हैं?

उत्तर : यह पसंद गलत थी, क्योंकि 1984 से 1998 के बीच अमरिंदर अकाली दल के साथ थे और इसलिए वह पार्टी की विचारधारा से जुड़े नहीं हैं और कांग्रेस कार्यकर्ता पूरी तरह से निराशा महसूस कर रहे हैं।

ऐसा लगता है कि पंजाब में राज्यपाल का शासन है। ऐसा लगता ही नहीं है कि राज्य में लोकप्रिय कांग्रेस शासन है।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर है, जो मुख्यमंत्री को और इस तरह के विभेदों पर काबू नहीं कर पा रहा है।

उत्तर : मैं इसपर कुछ नहीं कहना चाहता हूं और हम राज्य में इस संकट पर काफी चिंतित हैं।

प्रश्न : क्या वह तानाशाही स्टाइल में काम कर रहे हैं?

उत्तर : उन्हें पटियाला के महाराज की तरह व्यवहार करना बंद करना चाहिए और अगर वह लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री की तरह कार्य का संचालन नहीं करते हैं तो फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।

वह पांच महीने बाद अपने फार्महाउस से बाहर आए, जब हमने जहरीली शराब के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। अगर कोई मुख्यमंत्री अपने घर से पांच महीने बाद बाहर आएगा तो उस राज्य की हालत क्या होगी।

नेहरू से राजीव तक की उदार हिंदुत्व सोच को सामने लाकर कमलनाथ ने भाजपा को मुश्किल में डाला
21-Aug-2020 9:09 AM (94)

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राजीव गांधी की जयंती पर राजीव के हिंदुत्व और मंदिर निर्माण में बड़ी भूमिका का विज्ञापन देकर हिंदुत्व की राजनीति का रुख मोड़ दिया, कमलनाथ वैसे भी पुराने हनुमान भक्त हैं।

-कुमार दिग्विजय

हनुमानभक्त कमलनाथ राम मंदिर को लेकर इतने खुले तौर पर सामनेआयेंगे,इसकी कल्पना भाजपा ने कभी नही की होगी। दरअसल राम मंदिर को मुद्दा बनाकर सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय करने वाली भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ दिनों से हैरान हैऔर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के तेवरों को देखकर परेशान भी है। राम मंदिर के भूमिपूजन के ठीक पहले 4 अगस्त को हनुमान चालीसा का उद्घोष मध्यप्रदेश के कोने कोने में सुनाई दिया।

कमलनाथ ने राम मंदिर को लेकर साफ कहा था कि इसकी शुरुआत तो राजीव गाँधी के कार्यकाल में ही हो गई थी और इसका श्रेय राजीव गाँधी को ही दिया जाना चाहिए। इसका असर पूरे मध्यप्रदेश में दिखाई दिया, कांग्रेस  कार्यकर्ताओं ने एकजुटता से गाँव गाँव समारोहपूर्वक हनुमान पाठ करवाए। इस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा पर कांग्रेसने बढ़त ले ली।

अब राजीव गाँधी की जयंती पर एक बार फिर कमलनाथ की फोटो के साथ जो विज्ञापन जारी हुआ है,उसमे कांग्रेस ने राम राज्य की कल्पना को लेकर खुले तौर पर अपनी भावनाओं का इजहार किया है। विज्ञापन में राजीव गाँधी को याद करके लिखा गया है कि राजीव गांधी के समय में ही रामराज्य की नींव रखने की कवायद शुरू हो चुकी थी। उस समय ही राजीव गांधी ने भारतीयों की आस्था और धार्मिकता का सम्मान किया था। कांग्रेस ने इस बात को भी विज्ञापन में शामिल किया है कि महात्मा गांधी के रामराज्य की भावना का प्रभाव राजीव गांधी पर पड़ा था जिसके कारण ही 1985 में दूरदर्शन पर रामायण का टेलीकास्ट शुरू हुआ था।

इसके बाद ही 1986 में यूपी के तत्कालीन सीएम वीरबहादुर सिंह को राम जन्मभूमि के ताले खोले थे और 1989 में राममंदिर शिलान्यास को इजाजत मिली तथा तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह को इसके लिए भेजा गया। इतना ही नहीं यह भी बताया गया है कि चेन्नई में राजीव गांधी ने अपनी अंतिम प्रेस कांफ्रेस में कहा था कि अयोध्या में ही राममंदिर बनेगा।

कांग्रेस ने राजीव गांधी को नवोदय स्कूल खोलने का श्रेय देते हुए बताया है कि राजीव गांधी रामराज्य की गतिशील यात्रा के कुशल सारथी थे जो आधुनिक भारत में राम राज्य का सपना देखते थे। विज्ञापन को लेकर कांग्रेस का राम मंदिर और राम राज्य को लेकर खुले तौर स्वीकारोक्ति से यह भी साफ हो गया है कि अब कांग्रेस हिंदुत्व को लेकर भाजपा के सामने है।

पुराने हनुमान भक्त है कमलनाथ

ऐसा भी नही है कि कांग्रेस यह सिर्फ दिखावे के लिए कर रही है क्योंकि कमलनाथ हनुमान भक्त है और उन्होंने अपने गृह जिला छिंदवाड़ा में भगवान हनुमान की एक विशाल मूर्ति स्थापित की हुई है। यह देश की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमाओं में से एक है जो प्रदेश के छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय से 15 किमी सिमरिया के मंदिर में  है।

इस हनुमान प्रतिमा की ऊंचाई लगभग 101 फीट की  है। मंदिर के रखरखाव के लिए छिंदवाड़ा मंदिर ट्रस्ट भीबनाया,जिसकी मुख्य ट्रस्टी सांसद कमलनाथ की पत्नी अलका नाथ हैं।

कमलनाथ जब मुख्यमंत्री बने तब भी उन्होंने हनुमान भक्ति को लेकर अपनी भावनाओं का खुलकर इजहार किया था और इस साल जनवरी में हनुमान जयंती पर भोपाल के मिन्टों हाल में एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन कर इसका सीधा प्रसारण दुनिया के कई देशों में किया गया था।

इसके पहले 2018 विधानसभा चुनाव के समय से ही कमलनाथ को हनुमान भक्त बताया गया था और सरकार बनने के बाद राम वन गमन पथ योजना हो, गौशालाओं के निर्माण की योजना हो या मंदिरों के सौंदर्यीकरण की योजना हो, कांग्रेस ने खुद को हिंदुत्व से दूर नहीं होने दिया

नेहरू ने सोमनाथ का जीर्णोद्धार कराया, पर कांग्रेस ने कभी प्रचार नहीं किया

अभी तक कांग्रेस नेताओं का धर्म को लेकर सार्वजनिक प्रदर्शन और बयानबाज़ी नकरने का एक कारण यह भी रहा कि आज़ादी के आन्दोलन में सबकी भागीदारी रही और इसीलिए सबका सम्मान करने के लिए कांग्रेस नेताओं ने आस्था कोउदारता पूर्वक स्वयं तक सीमित रखा। महमूद गजनवी द्वारा तोड़े गये सोमनाथमंदिर का जीर्णोद्धार पंडित नेहरु के कार्यकाल में ही हो गया था,लेकिन कांग्रेस ने कभी इसे चुनावी मुद्दा नही बनाया। कुल मिलाकर अभी तक हिंदुत्व को लेकर कांग्रेस पर हमलावर रहनेवाली भाजपा हैरान है की यदि यह मुद्दा उनके हाथ से निकल गया तो मुकाबले में कांग्रेस बहुत आगे निकल जायेगी।(politics)

बिहार में टूटा महागठबंधन, जीतन राम मांझी की पार्टी हुई अलग
20-Aug-2020 3:53 PM (118)

पटना, 20 अगस्त। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने महागठबंधन से अलग होने का निर्णय ले लिया है। महागठबंधन में लगातार नाराज चल रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने आखिरकार आज महागठबंधन छोडऩे का फैसला कर लिया। इससे पहले पटना में मांझी ने आज अपनी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के कोर ग्रुप की बैठक बुलाई थी जिसमें ये फैसला लिया गया।

पार्टी प्रवक्ता दानिश रिजवान ने न्यूज 18 से बात करते हुए इस फैसले की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि राजद का बहुत अपमान हमारी पार्टी ने सहा है। महागठबन्धन में आरजेडी की दादागिरी चल रही है। हालांकि मांझी एनडीए में जाएंगे या नहीं इसपर कोई फैसला अभी नहीं बताया गया है। इसका फैसला लेने के लिए जीतन राम मांझी को अधिकृत किया गया है। हालांकि यह साफ कर दिया गया है कि किसी भी हालत में जदयू में विलय नहीं होगा।

सीएम नीतीश देंगे मांझी को सम्मान
माना जा रहा है कि मांझी ने महागठबंधन से बाहर जाने का निर्णय सीएम नीतीश से मिले इस आश्वासन के बाद लिया है कि उनकी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को विधानसभा चुनाव में करीब 7 से 10 टिकट जेडीयू के कोटे से देंगे। सूत्र यह भी बताते हैं कि एनडीए में वापसी को लेकर जीतन राम मांझी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच फोन पर बातचीत हो चुकी है और महागठबंधन में किनारे कर दिए गए मांझी ने आखिरकार चुनाव के ठीक पहले नए विकल्प की तरफ कदम बढ़ाने का मन फिर से बना लिया। (hindi.news18.com)

जेडीयू से आर-पार के मूड में एलजेपी, चिराग सहित पूरी पार्टी का नीतीश पर हमला
18-Aug-2020 2:26 PM (89)

साकेत कुमार

पटना, 18 अगस्त। जेडीयू और नीतीश कुमार को लेकर लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के तेवर में कोई नरमी नहीं आई है। सोमवार को उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में स्पष्ट कर दिया कि वे आगे भी राज्यहित के मुद्दे उठाते रहेंगे, अब इसे कोई आलोचना समझ ले तो उन्हें कुछ नहीं कहना। चिराग के इस तेवर के बाद पार्टी के दूसरे नेता भी नीतीश कुमार और उनके मंत्रियों पर हमलावर हो गए हैं।

चिराग पासवान ने सोमवार को वर्चुअल माध्यम से प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक बुलाई। इसमें पार्टी के सभी एमपी, एमएलए सहित जिलाध्यक्ष, प्रदेश पदाधिकारी और प्रकोष्ठों के अध्यक्ष मौजूद रहे। इस बैठक में चिराग एक बार फिर राज्य सरकार पर हमलावर दिखे। उन्होंने बैठक में कोरोना जांच में बरती जा रही लापरवाही का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने बिहार में टेस्टिंग बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन आज भी बिहार में आरटीपीसीआर टेस्ट काफी कम हो रहे हैं। उन्होंने बैठक में ये भी कहा कि जब हमने प्रधानमंत्री की बात दोहराई तो मुझ पर ही हमले शुरू हो गए। चिराग ने बैठक में यहां तक कहा कि जेडीयू ने मेरा नहीं प्रधानमंत्री का अपमान किया है।

एलजेपी नेताओं के निशाने पर जेडीयू
चिराग पासवान के तल्ख़ तेवर के बाद पार्टी के दूसरे नेताओं ने भी नीतीश कुमार और उनके मंत्रियों पर करारा हमला बोल दिया। लोजपा प्रवक्ता अशरफ अंसारी ने नीतीश कुमार को कृपा पर बना मुख्यमंत्री बताते हुए कहा कि ये लोग जो खुद कृपा पर सीएम बने हैं, उनका बोलना अपने मालिकों के लिए जायज है। ये लोग प्रधानमंत्री का अनादर करते हैं और कोई सच बोले तो ये लोग वफादारी दिखाने में कंपीटिशन करते हैं।

बिहार के मंत्रियों का खो चुका है मानसिक संतुलन
लोजपा के प्रधान महासचिव शाहनवाज अहमद कैफी ने तो यहां तक कह दिया कि जदयू के मंत्रियों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। मेरे राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के बारे में टिप्पणी करने से पहले कृपा पात्र अपने नेता के बारे में विजेन्द्र यादव को सोचना चाहिए। 15 वर्ष किसी का साथ लिए एक कदम न चलने वाले भी बोलने लगे हैं। चिराग समेत लोजपा नेताओं के इन बयानों से ये साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में जेडीयू और लोजपा के रिश्ते और तल्ख होने वाले हैं। (hindi.news18.com)

पार्टी की शर्मिदगी का कारण बना भाजपा विधायक का सवाल
17-Aug-2020 4:54 PM (62)

लखनऊ, 17 अगस्त (आईएएनएस)| ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण राजनीति पहले से ही उबाल पर है, सुल्तानपुर के भाजपा विधायक देवमणि द्विवेदी ने आगामी विधानसभा सत्र के लिए एक सवाल उठाकर अपनी ही पार्टी को शर्मिदा कर दिया है। उन्होंने पिछले तीन वर्षों में मारे गए ब्राह्मणों की संख्या को लेकर सवाल किया है। 20 अगस्त से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र के लिए विधायक ने रविवार को विधानसभा सचिवालय को अपनी 'अल्पसूचित' (अल्पकालिक) प्रश्न पेश किया।

अपने प्रश्न में, द्विवेदी ने यह जानने की मांग की है कि पिछले तीन वर्षों में कितने ब्राह्मण मारे गए हैं और इस अवधि में कितने आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश की है कि कितने मामलों में पुलिस आरोपियों को सजा दिलाने में सफल रही है।

विधायक ने आगे पूछा है कि क्या राज्य सरकार ने ब्राह्मणों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई योजना बनाई है या नहीं और क्या सरकार प्राथमिकता के आधार पर ब्राह्मणों को हथियार लाइसेंस प्रदान करेगी।

उन्होंने सरकार से उन ब्राह्मणों की संख्या के बारे में भी पूछा है, जिन्होंने शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया है और उनमें से कितने को अनुमति दे दी गई है।

विधायी इतिहास में यह संभवत: पहली बार हुआ है कि किसी विधायक ने ऐसा सवाल किया है जो पूरी तरह जातिवादी है।

सुल्तानपुर की लम्भुआ सीट से पहली बार विधायक बने द्विवेदी हाल ही में तब खबरों में आए थे, जब वह स्थानीय भाजपा विधायक राजकुमार सहयोगी के समर्थन में अलीगढ़ गए थे, जो कि पुलिस के साथ विवाद में शामिल थे।

द्विवेदी ने यहां तक कहा था कि यदि बात विधायकों के सम्मान पर आएगी तो वह अपना इस्तीफा सौंपने में भी संकोच नहीं करेंगे।

जाहिर सी बात है कि उनके द्वारा उठाया गया ये सवाल विधानसभा में राज्य सरकार पर विपक्ष के हमले को तेज करेगा।