राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : देखे परखे खरे
16-Sep-2021 5:50 PM (373)
छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : देखे परखे खरे

देखे परखे खरे

आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद 47 टीआई प्रमोट होकर डीएसपी हो गए। अब इनकी नए सिरे से पोस्टिंग की प्रक्रिया चल रही है। सरकार, और पीएचक्यू इस बात पर एकमत दिख रहे हैं कि रायपुर में टीआई के रूप में बेहतर काम कर चुके पुलिस अफसरों को बतौर डीएसपी यहीं पोस्टिंग दे दी जाए। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पिछले कुछ समय से राजधानी की कानून-व्यवस्था बिगड़ रही है। राज्य बनने के बाद पहली बार कुछ दिन पहले ही शहर के मध्य में स्थित पुरानी बस्ती थाने के भीतर मारपीट की घटना हुई थी।

थाने के भीतर मारपीट की घटना से सीएम बेहद खफा हैं, और इसी वजह से एसएसपी अजय यादव को हटना पड़ा। इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति न हो, और कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर हो, इसके लिए अनुभवी पुलिस अफसरों की रायपुर में पोस्टिंग देने पर विचार चल रहा है। इनमें नवनीत पाटिल, वीरेन्द्र चतुर्वेदी, राजेश चौधरी, हेमप्रकाश नायक शामिल हैं। ये सभी रायपुर में लंबे समय तक अलग-अलग थानों में पदस्थ रहे हैं, और इन सभी की साख ठीक-ठाक है। ऐसे में इन सभी की पोस्टिंग रायपुर में होती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालांकि कई और प्रभावशाली डीएसपी रायपुर आने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। देखना है कि किसे रायपुर आने का मौका मिलता है।

लम्बी लिस्ट का राज

पिछले दिनों राज्य प्रशासनिक सेवा के 96 अफसरों की एकमुश्त तबादला सूची जारी हुई, तो हडक़ंप मच गया। इतनी लंबी सूची राज्य बनने के बाद पहली बार निकली थी। अब अंदर खाने से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक तबादले के लिए फार्मूला तय किया गया था। इसमें यह था कि एक ही जिले में तीन साल से अधिक समय तक रहने वालों की दूसरे जिले में पोस्टिंग की जाए। इस क्राइटेरिया में 40 से अधिक अफसर आ गए।

इससे परे कुछ के खिलाफ शिकायतें भी थी, और प्रफुल्ल रजक जैसे एक-दो अफसर थे जो कि स्थानीय नेताओं के साथ विवाद के बाद जिला छोडऩा चाहते थे। भारी भरकम सूची जारी होने के बाद कई अफसर ऐसे हैं जिन्होंने तबादले के लिए काफी कुछ किया था, लेकिन उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। ऐसे अफसरों ने तबादले की आस नहीं छोड़ी है, और वो अभी भी जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं। इन सबके चलते एक और सूची जारी हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सडक़ के रास्ते से कोरोना की नई लहर?

महाराष्ट्र उन राज्यों में है जहां कोरोना की स्थिति छत्तीसगढ़ से कहीं ज्यादा चिंताजनक है। 1 से 14 सितंबर के बीच वहां 39 हजार 271 नये मरीज मिले। यहां डेल्टा प्लस वेरिएंट मरीजों की पुष्टि भी हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में पिछले 15 दिनों के दौरान नये मरीजों का प्रतिदिन औसत सिर्फ 33 रहा।

इधर, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से जुड़े शहरों-कस्बों में लोगों की आपस में काफी नाते-रिश्तेदारी है। कोरोना वायरस का प्रकोप थोड़ा थमने के बाद दोनों राज्यों के बीच लोगों की सडक़ मार्ग से आवाजाही बढ़ी है। इन दिनों छुईखदान, डोंगरगढ़, कवर्धा, खैरागढ़ आदि के लोग तीज-त्यौहार मना कर भी लौट रहे हैं। कोरोना संक्रमण के बाद सारी बसें शुरू हो नहीं सकी हैं, इसलिये जितनी बसें चल रही है उनमें खचाखच भीड़ है। 

रेलवे स्टेशनों में तो कम से कम पूछा जा रहा है कि वे छत्तीसगढ़ के बाहर से तो नहीं आ रहे हैं? यदि ऐसा है तो जांच करा लें। पर अंतरराज्यीय बसों में बेफिक्री से सफर हो रहा है। न तो सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा है और न ही ज्यादातर लोग मास्क की जरूरत समझ रहे हैं।

अभी त्योहारों का सीजन बाकी है, बल्कि लगातार कई पर्व आ रहे हैं। सडक़ मार्ग से लोगों का आना-जाना इसी तरह आने वाले कई दिनों तक बना रहेगा, इसके पूरे आसार है। ऐसे में अपने राज्य को कोरोना की किसी नई लहर से बचाए रखना एक बड़ा चैलेंज है।  

बारिश भरपूर पर सब तरफ नहीं...

बीते तीन दिनों की बारिश से छत्तीसगढ़ के नदी नाले उफन गये और जलाशयों में पानी इतना भरा कि गेट खोलने पड़े। मकान ढह गये, कुछ लोग बह गये, कई परिवारों को रेस्क्यू कर बचाया गया। रायपुर, गरियाबंद, धमतरी, मुंगेली, गौरेला, बिलासपुर जैसे शहरों में तो घरों में कई-कई फीट पानी घुसा। पर यह पूरे छत्तीसगढ़ की स्थिति नहीं है। राज्य में अब भी बारिश औसत से कम है। इस वर्षा के बाद भी यह आंकड़ा 95.8 प्रतिशत तक पहुंच पाया है। प्रदेश की 75 तहसीलों में 76 से 100 प्रतिशत बारिश तो दर्ज हो चुकी है, पर 28 जिलों में 50 से 75 फीसदी ही पानी गिरा है। इनमें सूखा पडऩे की आशंका है। राजस्व विभाग ने सितंबर के पहले हफ्ते तक सूखे के कारण फसलों को होने वाले नुकसान की रिपोर्ट कलेक्टर्स से मांगी थी, अब एक पत्र फिर निकला है जिसमें भारी बारिश के कारण हुई जनहानि, मकान, फसल, पशुओं को हुई क्षति की जानकारी मांगी गई है।

मंत्री, कलेक्टर गांव में रुके रात

कोरोना संक्रमण के बाद जनता की जनप्रतिनिधियों और अफसरों से जो दूरी बढ़ी है वह अब तक खत्म नहीं हो पाई है। गांवों में समस्या निवारण शिविरों का लगना बंद है, जिलों में जन-दर्शन शुरू नहीं हो रहा है। इस तरह के आयोजन अधिकारियों तक पहुंचकर आम लोगों को सीधे अपनी समस्या बताने का मौका देते हैं।

पर इससे आगे बढक़र थोड़ी शुरुआत हुई है। स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह और सूरजपुर कलेक्टर गौरव कुमार सिंह ने प्रतापपुर इलाके के एक गांव जजावल के सरकारी छात्रावास में रात बिताई। जब वे रुके तो जिले के दूसरे अधिकारी भी पहुंच गये थे। यह गांव कभी नक्सली गतिविधियों के लिये जाना जाता था। रात में चौपाल लगाकर कलेक्टर और मंत्री ने ग्रामीणों से इत्मीनान से समस्याओं को सुना और सुबह एक शिविर भी लगाया। आसपास के गावों से सैकड़ों लोगों ने पहुंचकर अपनी समस्या गिनाईं, जिनके लिए जिला मुख्यालय पहुंचना मुश्किल होता है। हाथों-हाथ कई मांगों को पूरा भी किया गया। पूर्व की सरकारों में, अविभाजित मध्यप्रदेश के दौरान भी देखा गया है कि मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल के साथियों को और चीफ सेक्रेटरी कलेक्टर को गांवों में रात रुकने का फरमान जारी करते थे। यह अलग बात है कि इसमें अधिकारी और मंत्री रुचि नहीं दिखाते थे, जबकि अंतिम छोर तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की मंशा रखने वाली हर सरकार को इस तरह का काम करते रहना चाहिये।

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