राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : यह वक्त न शादी का, न मरने का
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : यह वक्त न शादी का, न मरने का
25-Jun-2020 6:55 PM

यह वक्त न शादी का, न मरने का

कोरोना के चलते हुए आज देश भर में इतने तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं कि कोई समझदार इंसान न इस बीच मरेंगे, और न ही शादी करेंगे। मरने पर कंधा देने वाले इतने कम लोग रहेंगे कि घर के लोगों को छोडक़र बाकी लोग कोसते हुए लौटेंगे क्योंकि जरूरत से अधिक कंधा देना पड़ेगा। दूसरी तरफ शादी का खर्च तो न्यूनतम खर्च तो होगा ही, पचास मेहमानों में से लिफाफे आ भी जाएंगे, तो कितने आएंगे? ऐसे माहौल में हिफाजत से घर में रहना, जिंदगी को बचाकर रखना, और शादी को आगे किसी बेहतर मौके के लिए बचाकर रखना ही बेहतर होगा। लेकिन राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ऐसा हो नहीं पा रहा है। कचरे के निपटारे के प्रोजेक्ट की शुरूआत हुई, तो उसी में भीड़ ऐसी लगी कि तस्वीरों में धक्का-मुक्की दिख रही थी। अब कौन समझाए कि इस धक्का-मुक्की में कोई एक भी कोरोना पॉजिटिव निकल गया, तो तमाम लोग एक पखवाड़े के लिए घर कैद कर दिए जाएंगे। दूसरी जो बात लोगों को समझ नहीं आ रही है, वह यह कि महज खुद मास्क लगाना काफी नहीं है, सामने के लोगों को भी मास्क लगाना जरूरी है, वरना उनके बोलते हुए उनके थूक के छींटे आप पर पड़ सकते हैं। और सबसे अधिक खतरनाक तो है एक मेज पर बैठकर लोगों का खाना जिसमें खाते हुए थूक के छींटे सामने या अगल-बगल वालों के खाने पर गिरना तय सा रहता है। अब खाते हुए तो मास्क भी नहीं लगाया जा सकता, और चबाते हुए बोलने का मतलब छींटे उड़ाना ही रहता है। आगे लोग अपनी जिंदगी की खुद ही परवाह करें क्योंकि यमराज किनारे बैठकर आराम कर रहे हैं, और कोरोना से चार तरकीबें सीख भी रहे हैं।

उइके फिर खबरों में, उम्मीद से, पर...

पूर्व विधायक रामदयाल उइके एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वे विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस छोडक़र भाजपा में चले गए थे। मगर उन्हें पाली-तानाखार सीट से करारी हार का सामना करना पड़ा। वे दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के निधन के बाद से मरवाही में सक्रिय हैं। उइके पहली बार भाजपा की टिकट से मरवाही से विधायक बने थे, लेकिन अजीत जोगी के सीएम बनने के बाद अपनी सीट जोगी के लिए छोड़ दी थी और कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

उइके जोगी परिवार के करीबी रहे हैं। वे अब मरवाही में भागदौड़ कर रहे हैं। मरवाही से सात किमी दूर उनका अपना मकान है जहां हाल ही में मरम्मत कराने के बाद से रह रहे हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि उइके मरवाही से भाजपा प्रत्याशी हो सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि जाति प्रमाण पत्र के उलझनों के चलते अमित जोगी उपचुनाव नहीं लड़ते हैं, तो जोगी पार्टी, उइके का समर्थन कर सकती है। हल्ला तो यह भी है कि उइके देर सवेर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। वैसे भी कई जोगी के कई करीबी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। चुनाव को लेकर अमित जोगी ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। चाहे कुछ भी हो, रामदयाल उइके की सक्रियता चर्चा का विषय बना हुआ है।

जन्मदिन हो, और विवाद नहीं, ऐसा कैसे?

पिछले दिनों सरकार के मंत्री अमरजीत भगत के जन्मदिन के मौके पर बधाई देने अंबिकापुर में समर्थकों की भीड़ उमड़ी, तो सामाजिक दूरी धरी की धरी रह गई। लॉकडाउन के बीच भगत के जन्मदिन कार्यक्रम को लेकर काफी आलोचना हो रही है। हालांकि भगत ने सफाई दी कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए मास्क बांटने का कार्यक्रम रखा गया था, लेकिन यह जन्मदिन के उपलक्ष्य में नहीं था। उम्मीद नहीं थी कि मास्क लेने के लिए इतनी भीड़ आ जाएगी।

मंत्रीजी को कौन समझाए। कोई चीज मुफ्त में बंट रही हो और उसे लेने के लिए लोग न आए, ऐसा कैसे हो सकता है। खैर, सोशल मीडिया में मंत्रीजी के जन्मदिन समारोह को लेकर काफी कुछ लिखा गया। यह भी कहा गया कि मंत्रीजी से जन्मदिन कार्यक्रम को लेकर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। कुछ मंत्रियों के हवाले से यह बात कही गई कि भगत के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मगर ऐसा कुछ नहीं था। किसी ने स्पष्टीकरण नहीं मांगा बल्कि सीएम और अन्य मंत्रियों ने फोन कर भगत को जन्मदिन की बधाई दी।

 विशिष्ट व्यक्तियों के जन्मदिन समारोह में सामाजिक दूरी का पालन हो, यह बेहद कठिन है। बृजमोहन अग्रवाल के पिछले महीने जन्मदिन के मौके पर लॉकडाउन की खुले तौर पर धज्जियां उड़ी। यद्यपि बृजमोहन ने समर्थकों से अपील की थी कि वे जन्मदिन की बधाई देने निवास न आएं । मगर समर्थक कहां मानने वाले थे। बड़ी संख्या में उनके निवास पर जमा हो गए। अब भगत तो सरकार में हैं , और कोई चीज मुफ्त में बांट रहे हैं तो भीड़ आना स्वाभाविक था।

सीनियर और जूनियर अब साथ-साथ

आखिरकार निलंबन और बहाली के छह महीने बाद काबिल आईएफएस अफसर एसएस बजाज की लघुवनोपज संघ में पोस्टिंग हो गई। उन्हें एडिशनल एमडी बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि संघ के एमडी संजय शुक्ला हैं, जो कि कॉलेज के दिनों से ही एक दूसरे से परिचित हैं। आईएफएस के 87 बैच के अफसर संजय शुक्ला वैसे तो कॉलेज में बजाज से एक साल जूनियर हैं। जबकि आईएफएस कैडर में एक साल सीनियर हैं। बजाज 88 बैच के हैं। कॉलेज के जूनियर, संघ में अब बजाज के सीनियर हैं।

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