राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कारोबार की बेइज्जती बुरी बात...
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कारोबार की बेइज्जती बुरी बात...
29-May-2020 8:11 PM

कारोबार की बेइज्जती बुरी बात...

किसी देश-प्रदेश की सरकार कारोबारियों से मिले हुए टैक्स से भी चलती है। आमतौर पर अधिकतर सरकारें अपने को उद्योग-व्यापार की हिमायती साबित करती हैं, देश के दूसरे प्रदेशों में जाकर वहां से राज्य में पूंजीनिवेश लाने की कोशिश करती है, और इस पर खासा खर्च भी करती है। लेकिन लॉकडाऊन के चलते जिस तरह से उद्योग धंधों को बंद करवाया गया, उसने देश में एक ऐसा माहौल बनाया है जैसा पहले कभी देखने में नहीं मिला था। आज हालत यह हो गई है कि व्यापारी अपनी ही दुकान को खोलते हुए ऐसा महसूस कर रहा है कि मानो वह किसी दूसरे की दुकान चोरी करने के लिए खोल रहा है।

अभी छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ से व्यापारियों की एसडीएम और एसडीओपी को लिखी हुई  चि_ी इस अखबार को मिली है। जाहिर है कि वह दुकान खोलने के बारे में है, लेकिन उसकी भाषा, उसके शब्द अगर देखें, तो लगता है कि व्यापारी अपने ही घर-शहर में चोर सा महसूस कर रहा है। इस चि_ी में इन अधिकारियों को माननीय, महोदयजी, हर पैरा में लिखा गया है। इसके बाद निवेदन है, आपसे करबद्ध निवेदन है, अनुमति प्रदान करें, निवेदन को स्वीकार करते हुए दुकान खोलने की अनुमति प्रदान करें, आपके कार्यालय से निकलने वाली हर गाईड लाईन का पालन करने के लिए बाध्य रहेंगे, विश्वास है कि , इस निवेदन पर विचार कर, अनुमति प्रदान करेंगे, निवेदक... !

सरकार और कारोबार के बीच इस तरह का फासला खतरनाक है। प्रवासी मजदूरों का देश की सरकारों पर से विश्वास वैसे भी उठा हुआ है। इसके बाद अब अगर कारोबारियों का विश्वास भी देश और प्रदेश की सरकारों पर से खत्म हो जाएगा, तो क्या इस देश के धंधों को सिर्फ विदेशी कंपनियां चलाएंगी? इसी कॉलम में हमने कई बार पहले भी लिखा कि अफसरों को प्रतिबंध का तरीका ही आता है, और इसलिए उन्होंने बाजार पर अंधाधुंध प्रतिबंध लगाए। छत्तीसगढ़ में तो जब लॉकडाऊन में ढील दी गई तो पंक्चर बनाने वाले को सुबह 11 से दोपहर 1, महज दो घंटों की छूट दी गई थी, मानो उसकी दुकान पर कतार लगती हो, धक्का-मुक्की होती हो। सरकार को बाजार को बिना जरूरत हिकारत की नजर से नहीं देखना चाहिए, और एक सबडिविजन मुख्यालय के चेंबर को अफसरों से ऐसी भाषा में गिड़गिड़ाना पड़े, यह नौबत बहुत खराब है।

नए मियां सुभान अल्लाह

वो दिन बीत गए, जब ईमानदार-मेहनती अफसरों को जिले की कमान सौंपी जाती थी। देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवा से आए ये अफसर इतने जमीनी भी होते थे कि ट्रांसफर होने पर जनता विरोध स्वरूप सडक़ों पर भी उतर आती थी। मगर प्रशासन में ऐसे अफसर नहीं के बराबर रह गए हैं। अब दागी-बागी टाइप के अफसरों की भरमार हो गई है। हाल यह है कि कई अफसरों के तबादले पर जनता-जनप्रतिनिधि धन्यवाद देने लगी  है। हुआ यूं कि दो दिन पहले डेढ़ दर्जन से अधिक कलेक्टरों के तबादले  हुए। कुछ के हटने पर स्थानीय लोगों में काफी खुशी देखी गई।

 ऐसे ही एक जिले के कलेक्टर के तबादले पर कुछ स्थानीय नेता, प्रभारी मंत्री के घर पहुंचे और उन्हें कलेक्टर को हटवाने के लिए धन्यवाद दिया। इन नेताओं ने कहा कि जो भी नए आए हैं, वे कम से कम पुराने से तो बेहतर ही रहेंगे। नेताओं के जाने के बाद वहां कुछ लोगों ने मंत्रीजी को बता दिया कि स्थानीय नेताओं की खुशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली है। क्योंकि नए कलेक्टर, पुराने से ज्यादा अव्यावहारिक है। नए आए कलेक्टर, इससे पहले जिस जिले में भी रहे हैं, वहां के नेता और तो और सहयोगी अधिकारी-कर्मचारी परेशान रहते थे। एक बार तो विदाई समारोह में ही उनकी जमकर खिंचाई हुई थी। अब सरकार के सामने दिक्कत यह है कि कलेक्टरों के तबादले तो जल्दी-जल्दी नहीं किए जा सकते।

मुंगेली नया हॉटस्पॉट

छत्तीसगढ़ में प्रवासी मजदूरों के आने से कोरोना का कहर बरपा है।  छोटे जिलों में से एक मुंगेली हॉट स्पॉट बन गया है। यहां अब तक 75 से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें से तकरीबन सभी क्वॉरंटीन सेंटरों में थे। मगर इतनी बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव प्रकरणों के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी जिम्मेदार माना जा रहा है।

सुनते हैं कि मुंगेली के बाहरी हिस्से में एक स्थान पर कई प्रवासी लोग क्वॉरंटीन पर थे। मगर कुछ नेताओं ने स्थानीय प्रशासनिक अफसरों से मिलकर 14 दिन पूरा होने से पहले ही उन्हें घर भिजवा दिया। इसके बाद कुछ लोग कोरोना पॉजिटिव निकले। इसके चलते एकाएक कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ गई। कुल मिलाकर क्वॉरंटीन सेंटरों में अव्यवस्था को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। चूंकि किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो रही है, इसलिए व्यवस्था में सुधार भी नहीं हो रहा है।

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