श्रद्धा धरी रही
कुछ लोगों को इस बात का बड़ा मलाल है कि चुनाव की घोषणा दीवाली के पहले हो गई। अब जिस सीट पर चुनाव है, वहां के दो बड़े उम्मीदवारों पर ही दीवाली का सालाना शिष्टाचार निभाने की जिम्मेदारी आकर टिक गई है। अगर उम्मीदवारों के नाम दीवाली के बाद घोषित होते, तो इन दो के मुकाबले दर्जन भर उम्मीद लगाए संभावित उम्मीदवारों को शिष्टाचार निभाना पड़ता। लेकिन अब दीवाली में असरदार लोगों तक पहुंचने वाले तोहफों की गिनती गिर गई है।
एक बड़े अखबारनवीस इस मलाल में जी रहे हैं कि एक पार्टी के उम्मीद लगाए एक नेता उनसे अपने बड़े नेताओं तक यह सिफारिश करवाना चाहते थे कि वे सबसे काबिल उम्मीदवार रहेंगे। लेकिन जब उम्मीदवार किसी और को बना दिया गया, तो उन्होंने मिठाई का एक छोटा सा डिब्बा पहुंचाने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया। वक्त निकल जाए तो कौन किसे गिनते हैं? और समय रहे तो लोग किसी का हाथ अपने सिर पर रखकर श्रद्धा जताते हैं।
इस बार तस्वीर अलग
रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव पिछले कई चुनावों से अलग है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल यहां का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, और अब पहली बार उनकी गैरमौजूदगी में चुनाव हो रहा है। वैसे तो बृजमोहन अग्रवाल, भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस से अब तक वैसा सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जो उन्हें खुद के चुनाव में मिलता रहा है।
बृजमोहन के चुनाव में कई कांग्रेस पार्षद औपचारिकता निभाते रहे हैं, लेकिन इस बार वो वार्ड में ही मेहनत करते दिख रहे हैं। इसकी वजह यह है कि एक महीने के भीतर उन्हें खुद चुनाव लडऩा है। यदि उनके अपने वार्ड में प्रदर्शन खराब रहता है, तो कांग्रेस उन्हें प्रत्याशी बनाने पर पुनर्विचार कर सकती है। ऐसे में पार्षदों के लिए खुद की परीक्षा की घड़ी भी है। खास बात यह है कि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज लगातार बूथ कमेटियों की बैठक में खुद जा रहे हैं। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है। यह पहला मौका है जब पहली बार बृजमोहन की गैर मौजूदगी में भाजपा को कड़ी टक्कर देते दिख रही है।
मगर मुश्किलें बरकरार
एस आई भर्ती के 975 अभ्यर्थी बाल-बाल बचे। 28 की सुबह दो घंटे की देरी होती तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका लग चुकी होती कि यह कहकर आगामी आदेश तक प्रक्रिया रोकी जाए। रायपुर से चार अभ्यर्थी अपनी याचिका लेकर दिल्ली जा/भेजे जा चुके थे। इस बात कि सरकार को पिछले शुक्रवार को भनक लग चुकी थी। सो मंत्रालय से पीएचक्यू तक आसमान-जमीन एक कर आदेश की नस्तियां लाल- पीली बत्तियां इतनी तेजी से दौड़ाई गई। और सुबह 10.30 बजे चयन सूची जारी करने की खबर वायरल कर दी गई। सारी चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो काम छह वर्ष से रुका पड़ा था।
हाईकोर्ट ने आदेश जारी करने दिए अल्टीमेटम के बाद भी सरकार ने दीपावली बाद का समय देने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट की याचिका में चयनित नामों पर उंगली उठाते हुए याचिका तैयार कर ली गई थी। यह सूची भी बघेल सरकार की पीएससी सूची की ही तरह होने के आरोपों और तथ्य लिए हुए है। कोई किसी, कार्यरत और रिटायर्ड पुलिस अफसर का बेटा बेटी, भांजा भतीजा आदि आदि बताए गए हैं। इन्हें चुनौती देने के लिए पांच लाख की एडवांस फीस देकर कुछ अभ्यार्थी भेजे गए। वकालतनामा भी तैयार था। इससे पहले कि याचिका लिस्ट होती यहां सूची जारी कर दी गई। इस तरह से मोदी की एक और चुनावी गारंटी पूरी हो गई। खतरा अभी टला नहीं है।
अभी इनमें से कई के कैरेक्टर पुलिस वेरिफिकेशन शेष हैं। इसमें यह आवश्यक है कि किसी पर व्यक्तिगत या सामूहिक अपराध, आंदोलन करने, लॉ एंड आर्डर के मामले दर्ज न हो। और ये सभी तो अपने चयन के लिए सीएम हाउस वाले वीआईपी सुरक्षा वाले क्षेत्र में धारा 144 लागू होने के बाद भी धरना प्रदर्शन, गिरफ्तार भी हो चुके हैं। ऐसे में क्लीन कैरेक्टर देने पर भी प्रश्न चिन्ह उठाए जाएंगे। इनमें से जिसके कैरेक्टर पर दाग होगा वो मुश्किल में पड़ जाएंगे।
सत्ता बदली और बोर्ड जख्मी
सत्ता बदलते ही नेताओं की तस्वीरों का गायब होना कोई नई बात नहीं, पर छत्तीसगढ़ के धनवंतरी मेडिकल स्टोर्स पर लगे कुछ होर्डिंग्स में यह परिवर्तन अनूठे ढंग से देखा जा सकता है। ये मेडिकल स्टोर्स पूर्व सरकार द्वारा आम जनता को सस्ते दामों पर दवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से खोले गए थे, जिन पर तत्कालीन मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री की तस्वीरें लगी थीं। लेकिन अब, सरकार बदलने के बाद भी इन होर्डिंग्स को हटाया नहीं गया, बल्कि तस्वीरों को खुरच कर मिटाने की अधूरी कोशिश जरूर हुई है।
बिलासपुर के एक धनवंतरी मेडिकल स्टोर के बाहर लगे इस बोर्ड पर नाम और उद्देश्य का हिस्सा जस का तस बना हुआ है, जबकि तस्वीरों को मिटाने के प्रयास में उसे खुरच दिया गया है। सरकारों के बदलने के साथ ही कई बार योजनाओं और चेहरे भी बदल जाते हैं, पर यहां तस्वीरों के साथ जो सलूक किया गया है उस पर विवाद हो सकता है।
लक्ष्य की होड़ में अनदेखी
मोतियाबिंद का पता चलने पर जल्द ऑपरेशन आवश्यक है, मगर सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर दबाव बनाकर लक्ष्य थोपना एक गंभीर जोखिम है। दंतेवाड़ा जिला अस्पताल में 10 अक्टूबर के बाद ऑपरेशन कराने वाले 39 मरीजों में से 17 में संक्रमण फैल गया, जिसमें से दो मरीजों की आंखों की रोशनी जा चुकी है। अब पता चल रहा है कि यहां के स्टाफ को हर सप्ताह 20 ऑपरेशन करने का लक्ष्य दिया गया था।
कुछ साल पहले तखतपुर में भी इसी तरह के लक्ष्य-निर्धारण ने नसबंदी कांड का रूप लिया था, जिसमें 16 महिलाओं की जान चली गई थी। उस समय शिविर में 200 से अधिक महिलाओं को लाकर जल्दी-जल्दी ऑपरेशन कर घर भेज दिया गया। जांच में पाया गया कि एक ऑपरेशन में मुश्किल से तीन मिनट ही लगे थे। नसबंदी कांड के बाद सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों ऐसे लक्ष्यों को जोडऩे पर रोक लगाई गई थी, मगर अब मोतियाबिंद ऑपरेशनों में वही गलती दोहराई गई।
दंतेवाड़ा अस्पताल में चार ऑपरेशन थिएटर तो हैं, मगर आई वार्ड एक भी नहीं है। अगर ऑपरेशन के बाद मरीजों को डॉक्टरों की निगरानी में कुछ दिन रुकने की सुविधा दी जाती, तो शायद संक्रमण को टाला जा सकता था। जैसे-जैसे इस मामले की जांच आगे बढ़ेगी, इसके पीछे की कई परतें खुलेंगी। फिलहाल दोषी ठहराकर सिर्फ ऑपरेशन करने वाली डॉक्टर और उनकी टीम को निलंबित कर दिया गया है। यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि आखिर बिना पर्याप्त सुविधाओं के दबाव में इतनी जल्दी-जल्दी ऑपरेशन कराने का आदेश किसके द्वारा और क्यों दिया जा रहा था।
यह जीत मामूली नहीं
सब इंस्पेक्टर पद पर 959 चयनित उम्मीदवारों की सूची आखिरकार जारी कर दी गई है। मगर यह अब तक रहस्य बना हुआ है कि सफल अभ्यर्थियों को इंतजार क्यों कराया जा रहा था। रिजल्ट जारी नहीं करने पर मई महीने में हाईकोर्ट ने 90 दिन के भीतर चयन प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। मगर, इस आदेश को सरकार टाल रही थी। 90 दिन बीतने के बाद अभ्यर्थियों ने दबाव बनाना शुरू किया। दो बार उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने आश्वासन दिया कि सूची जल्दी निकाल दी जाएगी। पहली बार उन्होंने 15 दिन की मोहलत मांगी, दूसरी बार उन्होंने समय बताने से मना कर दिया। सरकार के सामने एक विकल्प यह भी था कि वह हाईकोर्ट के आदेश पर रिव्यू पिटिशन ले आती या फिर सुप्रीम कोर्ट चली जाती। मगर, इन दोनों ही स्थितियों में युवाओं के बीच सरकार के खिलाफ संदेश जाता। चयन 959 का हुआ है लेकिन इन चयनित लोगों को उन सैकड़ों दूसरे अभ्यर्थियों का भी कृतज्ञ होना चाहिए, जो आंदोलन में इसलिये शामिल थे कि उन्हें भी अवसर मिल सकता है। अब चयनित युवाओं की मांग मान लेने के बाद सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि फैसला लेने में इतनी देर क्यों हुई?
उल्लू का दिवाली पर दिख जाना
उल्लू को रहस्यमयी और बुद्धिमान पक्षी भी माना गया है, जो अंधकार में देखने की अद्वितीय क्षमता रखता है। यही विशेषता उसे अन्य पक्षियों से अलग बनाती है, और इसके चलते उसे ज्ञान और विवेक का प्रतीक भी माना जाता है। दीपावली की रात, जब सभी लोग रोशनी से अपने घरों को सजाते हैं और लक्ष्मी पूजा करते हैं, यदि उल्लू दिख जाए तो उनका यह विश्वास मजबूत करता है कि मां लक्ष्मी की कृपा बरसने वाली है। कुछ वाइल्डलाइफ फोटोग्रॉफरों पर यह कृपा बरसी है। हाल ही में यह तस्वीर बिलासपुर में नरेंद्र वर्मा ने खीचीं है।
कौन आईपीएस कहां?
छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अफसर अभिषेक शांडिल्य केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट रहे हैं। आईपीएस के वर्ष-07 बैच के अफसर अभिषेक शांडिल्य सीबीआई में रहे हैं, और प्रतिनियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद उन्हें रिलीव भी कर दिया गया है।
शांडिल्य संभवत: नवम्बर में जाइनिंग दे देंगे। इस बैच के अफसर अभी डीआईजी हैं, जो कि जनवरी में आईजी के पद पर प्रमोट हो जाएंगे। इसी बैच के अफसर रामगोपाल गर्ग भी सीबीआई में रहे हैं। वे करीब 7 साल सीबीआई में थे। वर्ष-2007 बैच के अफसरों में दीपक झा, और बालाजी राव भी हैं। गर्ग, और दीपक झा अभी आईजी के प्रभार में हैं। दूसरी तरफ, बस्तर आईजी सुंदरराज पी का केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना टलता दिख रहा है। सुंदरराज एनआईए में जाने वाले थे। मगर केन्द्र सरकार उन्हें बस्तर से फिलहाल हटाने के इच्छुक नहीं दिख रहा है। केन्द्र सरकार ने वर्ष-2027 तक नक्सलियों के खात्मे के लिए टारगेट फिक्स किया हुआ है। इसमें बस्तर आईजी के रूप में सुंदरराज प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
सुंदरराज की बस्तर में पोस्टिंग के बाद से राज्य पुलिस का केन्द्रीय बलों से तालमेल बेहतर हुआ है। केंद्र और राज्य के बेहतर तालमेल से नक्सल मोर्चे पर बड़ी सफलता मिली है। इन सबको देखते हुए सुंदरराज को फिलहाल बस्तर में ही रखने पर सहमति बन रही है। फिर भी आईजी स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं।
बकाया लेन-देन
जैसे जैसे निकाय पंचायत चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, एक नेताजी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। कारण और कुछ नहीं पार्टी फंड की एक बड़ी रकम जो लौटाना है। बड़े ओहदेदार नेताजी से पार्टी नेतृत्व तगादा भी करने लगा है। एक नहीं कई बार-नेताजी जब, जहां मिल जाए। हर बार नेताजी यह कहते बच निकलते हैं, दे दूंगा भाई साहब। फंड सुरक्षित रखा हूं। कुछ हजार, लाख दो लाख होते तो पार्टी नेतृत्व भूल जाता माफ कर देता। लेकिन रकम इससे कहीं अधिक है। एक बड़े निगम से अनुबंधित कंपनियों से मिली इतनी बड़ी रकम से संगठन ने निकाय पंचायत चुनाव की नैया पार लगाने की तैयारी कर रखी है। अब देखना है कि नेताजी से पार्टी फंड वापस लेने में संगठन सफल होता है या नहीं। वैसे नेताजी पर नाइन फिगर में ही एक और लेनदारी की चर्चा आम है। हालांकि वो पुराने बिल पास कराने के लिए व्यक्तिगत रूप से दिए गए थे।
मिठास के इंतजार में गन्ना किसान
छत्तीसगढ़ के शक्कर कारखानों में गन्ना बेचने वाले किसानों का भुगतान कारखाना प्रबंधन द्वारा किया जाता है, जबकि बोनस का भुगतान सरकार की ओर से होता है। हाल ही में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में किसानों को 62 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने का निर्णय लिया गया, जिसके लिए 60 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है।
इधर, कुछ शक्कर कारखानों से खबरें हैं कि कई किसानों के खातों में अभी तक यह राशि नहीं पहुंच पाई है। बैठक में यह भी कहा गया था कि गन्ना किसानों को उनके उत्पाद का 100 प्रतिशत भुगतान पहले ही किया जा चुका है। किसानों को आशा थी कि दीपावली से पहले बोनस भी मिल जाएगा, जिससे वे दोहरी खुशी के साथ त्योहार मना सकें। लेकिन मंत्रिमंडल का बोनस देने का फैसला भी देरी से आया है। अगस्त में हुई बैठक में कृषि पर चर्चा के दौरान निर्णय हुआ था कि गन्ना उत्पादक किसानों को 50-50 किलो शक्कर रियायती दर पर उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन बोनस पर उस समय कोई चर्चा नहीं की गई थी।
यह बोनस वितरण कृषि विभाग के माध्यम से किया जाना है, और हो सकता है कि प्रक्रियाओं में समय लग रहा हो। सरकार की मंशा है कि किसान धान की खेती का रकबा घटाकर अन्य फसलों की ओर बढ़ें। परंतु जिस तरह गन्ना बोनस में देरी हो रही है, उससे लगता है कि कृषि विभाग इस समय 14 नवंबर से शुरू हो रही धान खरीदी की तैयारियों में अधिक रुचि ले रहा है।
कितना लूटोगे सरकार को?
एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देशभर में सक्षम लोगों ने घरेलू गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी का त्याग कर दिया था। इस मुहिम में कई राजनेताओं और समाज के प्रतिष्ठित लोगों ने भागीदारी की, जिससे उनकी समाज में इज्जत और बढ़ी। उस समय आम जनता के लिए त्याग करना मुश्किल था, क्योंकि उस वक्त सब्सिडी का लाभ लगभग 200 रुपये तक होता था।
इधर, वक्त के साथ गैस सिलेंडर की कीमतें लगभग तीन गुना बढ़ गईं और सब्सिडी का लाभ घटते हुए केवल दहाई तक आ पहुंचा। सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी से यह सामने आया कि कुछ लोगों को सब्सिडी में अब मात्र 4-5 रुपये ही मिल रहे हैं। अगर आप आशावादी हैं, तो मान सकते हैं कि एक दिन सब्सिडी की राशि पुराने स्तर पर वापस आ सकती है। अन्यथा, आप चाहें तो गैस कंपनी के पोर्टल या कस्टमर केयर पर एक फोन करके अपनी भी सब्सिडी का त्याग भी कर सकते हैं। ([email protected])
पुनर्वास के रास्ते
विधानसभा चुनाव के बाद से भाजपा में अलग-थलग हो चुके कई नेता अब रायपुर दक्षिण में काम कर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं। ये नेता पार्टी प्रत्याशी का प्रचार करने के इच्छुक हैं। इन्हीं में से एक जगदलपुर के पूर्व विधायक संतोष बाफना को शैलेन्द्र नगर बूथ का प्रभारी बनाया गया है।
बाफना ने विधानसभा आम चुनाव में जगदलपुर से किरणदेव को टिकट देने की खिलाफत की थी, और क्षेत्र छोडक़र चले गए थे। किरण देव अब प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन चुके हैं। इससे परे बाफना को किरणदेव के विरोध की कीमत चुकानी पड़ रही है। उनकी पार्टी में पूछ परख नहीं रह गई है, मगर बृजमोहन अग्रवाल से उनके अच्छे संबंध हैं।
बृजमोहन ने बाफना को बूथ का काम दे दिया है। इसी तरह बड़े व्यापारी नेता, और पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी विधानसभा टिकट नहीं मिलने से काफी खफा रहे हैं। उन्होंने भी आम चुनाव के बीच सुनील सोनी, और बृजमोहन अग्रवाल से मिलकर अपने गुस्से का इजहार भी कर दिया था। सुंदरानी की नाराजगी के बाद भी सभी सीटें रायपुर की चारों विधानसभा सीटेें भाजपा की झोली में चली गई।
सुंदरानी को भी सिविल लाइन इलाके में प्रचार का जिम्मा दिया गया है। इसी तरह महासमुंद के पूर्व विधायक डॉ. विमल चोपड़ा भी रायपुर दक्षिण में सक्रिय हो चुके हैं। रायपुर दक्षिण में इन नेताओं का काम बेहतर रहा, तो संभव है कि कुछ को निगम-मंडल में जगह मिल जाए। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नेताजी की अगली तैयारी
कहा जाता है कि भाजपा, पिछला चुनाव जीतने या हारने के एक वर्ष बाद अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। अपनी इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए संगठन ने काम शुरू कर दिया है। संगठन, हर विधायक, मंत्री सांसद के इलाके में टोह ले रही है कि अगला प्रत्याशी कौन होगा। इसी दौरान संगठन प्रमुखों को पता चला एक अजेय पूर्व मंत्री भी तैयारी में जुट गए है।
भाजपा की यह परंपरागत,पारिवारिक सीट रही है। कहा जा है 2028 के लिए नेताजी, अपनी बेटी को तैयार कर रहे हैं। कर्नाटक के प्रोफेशनल कॉलेज से पढक़र आई बेटी इन दिनों ट्रेनिंग ले रही हैं। इसमें भाषण कला, मांग लेकर आई भीड़ से चर्चा, पहनावे, एप्टीट्यूड आदि-आदि सीख रही हैं। इसकी सूचना पर संगठन प्रमुखों का कहना था कि नेताजी को आभास हो गया है कि अगली बार उनकी संभावना कम ही रहेगी। कहा जा रहा है कि नेताजी अपनी बेटी को लता उसेंडी, अंबिका सिंहदेव, भावना बोहरा, ओजस्वी मंडावी, संयोगिता जूदेव की कतार में लाना चाहते हैं । अब इसके लिए पूरे चार वर्ष इंतजार करना होगा। वैसे नेताजी के दो बेटे हैं लेकिन दोनों ही राजनीति से दूर सफल कारोबारी हैं, उनकी इच्छा भी नहीं हैं।
एक माकूल अवसर और खेमेबाजी
कांग्रेस के लिए इससे माकूल अवसर नहीं हो सकता था। पता नहीं क्यों इसका लाभ उठा नहीं पाई। वह यह कि देश की राष्ट्रपति दो दिनों तीस घंटे तक राजधानी में रहीं। लेकिन छोटे-छोटे मुद्दे पर राजभवन कूच करने वाले कांग्रेस नेतृत्व ने महामहिम से मिलकर प्रदेश की स्थिति पर ध्यानाकृष्ट क्यों नहीं कराया? जबकि पहले दिन तो महामहिम जनसंगठनों से मिली भी। महामहिम से मुलाकात को लेकर संगठन के नेता खेमे के अनुसार जवाब दे रहे। बैज समर्थक कह रहे हैं कि मिलने का समय मांगा था, नहीं मिला।
राजीव भवन में सक्रिय रहने वाले विरोधी इसे खारिज कर रहे। सच्चाई और मन की बात बैज ही जानते हैं। लेकिन एक अवसर चूक गए। प्रदेश की राजनीतिक, प्रशासनिक कानून व्यवस्था पर एक असरदार ज्ञापन देकर माइलेज तो लिया ही जा सकता था। खैर कांग्रेस की ओर से कल नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने प्रोटोकॉल पूरा किया। राष्ट्रपति के सम्मान में आयोजित दोपहर भोज में आमंत्रण पर वे गए। वहां प्रोटोकॉल की व्यवस्था न देख डॉ. महंत, सबसे पीछे भाजपा संगठन के नेताओं के साथ जा खड़े हुए। उन पर नजर पड़ते ही महामंत्री संगठन पवन साय ने पास गए। और महंत से पीछे के बजाए प्रथम पंक्ति में खड़े होने का आग्रह किया। महंत जी मान नहीं रहे थे। इस पर महामंत्री ने प्रोटोकॉल के तहत व्यवस्था कराई और महंत प्रथम पंक्ति में शामिल हुए।
हाथियों की मौत के लिए कौन जिम्मेदार?
छत्तीसगढ़ में खासकर रायगढ़ और सरगुजा जिले में हाथी हाईटेंशन तार की चपेट में आकर अकाल मौत के मुंह में समा रहे हैं। पराकाष्ठा तब हुई जब तमनार क्षेत्र में 25 अक्टूबर की रात एक शावक सहित तीन हाथियों को एक साथ जान गंवानी पड़ी। बीते 10 सालों में 70 हाथी इसी तरह बेमौत मारे जा चुके हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार के ही दो विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। बिजली विभाग चाहता है कि तार ऊंचा और सुरक्षित करने का खर्च उठाए। वन विभाग का कहना है कि बिजली तार को विद्युत विभाग ने बिछाया है, खर्च उसे ही करना चाहिए। इस आनाकानी को लेकर हाईकोर्ट में कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने जनहित याचिका दायर की थी। जिसका निराकरण इसी अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह में हाईकोर्ट ने किया। इसमें वन विभाग और बिजली विभाग दोनों ने ही शपथ-पत्र दिया है। बिजली विभाग तारों को कम से कम 20 फीट ऊंचा उठाएगा। तीन हाथियों की मौत जिस जगह पर हुई है, ग्रामीणों के मुताबिक वहां तार की ऊंचाई बहुत कम थी। 20 फीट ऊंचा होने से हाथी सूंड उठाकर भी तार को नहीं छू सकेंगे। बिजली पोल पर भी 3 से 4 फीट तक चौड़ी कांटेदार तार खींची जाएगी। तारों को कवर्ड कंडक्टर में बदला जाएगा या फिर अंडरग्राउंड केबल बिछाया जाएगा। यही सब करने की मांग वन्यजीव प्रेमी लगातार कर रहे थे। मगर, सरकारी विभागों ने हामी भरने में 7 साल लगा दिए। याचिका पर सात साल से सुनवाई हो रही थी। अभी भी इन तीन मौतों के बाद दोनों ही विभागों ने चुप्पी साधी हुई है कि हाईकोर्ट में उन्होंने जो शपथ दिया है उसके लिए क्या करेंगे। क्या कोई टाइम लाइन तैयार किया है? या फिर हाईकोर्ट में भरी गई हामी केवल रस्मी है? इस रवैये से तो लगता है कि अभी और हाथियों के जान गंवाने की प्रतीक्षा की जा रही है।
ऐसा होता है डिजिटल अरेस्ट
वीडियो कॉल कर रहा व्यक्ति कितना साफ-सुथरी वर्दी में सौम्य चेहरे वाला पुलिस ऑफिसर जैसा दिखाई दे रहा है। पीछे थाने का पूरा सेटअप भी है। टेबल पर ध्वज लगा है। जो व्यक्ति इस कॉल को अटेंड कर रहा है उसे 12 घंटे के भीतर थाना पहुंचने या फिर वीडियो कॉल पर ही बयान दर्ज कराने कहा जा रहा है। जुर्म यह बताया गया है कि उसके फोन का इस्तेमाल महिला उत्पीडऩ और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया गया है। आप भयभीत हो जाएंगे और मामला रफा-दफा करने के लिए 5-10 लाख कॉलर के बताए गए अकाउंट में ट्रांसफर कर देंगे। यही डिजिटल अरेस्ट है। एक शख्स ने कॉल आते ही पहचान लिया था कि यह स्कैम चल रहा है। फिर भी भयभीत होने का नाटक करते हुए कॉलर से लंबी बातचीत की है। सोशल मीडिया पर उसने पूरा वृतांत लिख डाला है और बताया है कि किस तरह से डरा-धमकाकर ये जालसाज वसूली करते हैं।
खराब दौर में 2010 बैच के डीआईजी
राज्य के आईपीएस बिरादरी में डीआईजी स्तर के अफसरों के लिए हाल ही के महीने काफी बुरे साबित हो रहे हैं। पिछले तीन महीनों के भीतर राज्य में हुई घटनाओं के लिए सीधे डीआईजी स्तर के अफसरों को निलंबित अथवा जिले से हटाया गया।
एक बड़ी घटना में बलौदाबाजार हिंसा के मामले में 2010 बैच के आईपीएस डीआईजी सदानंद कुमार पर निलंबन की गाज गिरी। उनके खिलाफ अभी भी विभागीय जांच चल रही है। पिछले दिनों आईजी-एसपी व कलेक्टर कान्फ्रेंस के फौरन बाद मुंगेली एसपी गिरजाशंकर जायसवाल को भी हटा दिया गया। उनकी भी कार्यशैली पर सवाल उठ रहे थे।
इसी बैच के अफसर अभिषेक मीणा पीएचक्यू में डीआईजी हैं। उनके पास भी कोई प्रभार नहीं है। जबकि पिछली सरकार में मीणा राजनांदगांव और रायगढ़ व कोरबा जैसे जिले के एसपी रहे हैं। सरकार बदलने के बाद से वो लूपलाईन में हैं। अब एक ताजा मामले में डीआईजी स्तर के अफसर सूरजपुर एसपी एमआर अहिरे को भी पुलिसकर्मी की पत्नी और बेटी की जघन्य हत्या के मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए पीएचक्यू पदस्थ किया गया है। यह संयोग है कि अहिरे भी 2010 बैच के आईपीएस हैं। वह प्रमोटी आईपीएस हैं।
बताते हैं कि आईपीएस बिरादरी में डीआईजी स्तर के अफसरों पर हो रही सिलसिलेवार कार्रवाई से कई करीबी अफसर हँसी-मजाक में उन्हें पूजा-अर्चना और मंदिरों में माथा टेकने की नसीहत भी दे रहे हैं।
दक्षिण और मुस्लिम
रायपुर दक्षिण में मुस्लिम समाज से कुल 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। मुस्लिम समाज को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। यही वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस में हडक़म्प मचा हुआ है।
वर्ष-2023 के विधानसभा आम चुनाव में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे लेकिन ढेबर बंधु आखिरी दिन तीन-चार को छोडक़र बाकी सभी के नामांकन वापस करवाने में सफल रहे। कुछ इसी तरह की कोशिश इस बार भी हो रही है लेकिन ऐसा कर पाना कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए आसान नहीं है। कांग्रेस सत्ता में नहीं है, और चर्चा है कि ज्यादातर प्रत्याशी भाजपा के लोगों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में वो आसानी से मान जाएंगे इसकी संभावना कम दिख रही है।
रायपुर दक्षिण में मुस्लिम वोटरों की संख्या सर्वाधिक है, और तकरीबन 25 हजार के आसपास मुस्लिम वोटर हैं। हालांकि पहले भी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरते रहे हैं, लेकिन सारे मुस्लिम प्रत्याशी मिलाकर पांच हजार के आसपास ही वोट हासिल कर पाते रहे हैं। इस बार क्या तस्वीर बनती है यह तो नाम वापिसी के बाद पता चलेगा।
बड़े-बड़ों को छोटा-छोटा जिम्मा
रायपुर दक्षिण में कांग्रेस, और भाजपा के दिग्गज नेता वार्डों में प्रचार के लिए जा रहे हैं। भाजपा ने तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और मोतीलाल साहू को एक-एक मंडल की जिम्मेदारी सौंप दी है। हरेक मंडल में पांच-पांच वार्ड आते हैं। इन सबके अलावा जिन विधायकों को झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के लिए नहीं भेजा गया है वो सभी रायपुर दक्षिण में प्रचार के लिए जुट रहे हैं।
दूसरी तरफ, कांग्रेस में पूर्व सीएम भूपेश बघेल और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज रोज चुनाव प्रचार की मानिटरिंग कर रहे हैं। इसके अलावा पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू भी प्रचार में जुटेंगे। धनेन्द्र साहू का निवास रायपुर दक्षिण में है, वो सक्रिय भी हैं। इन सबके बीच प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट भी जल्द प्रचार में यहां आएंगे और हरेक मोहल्ले में जनसंपर्क करेंगे। ये सब कार्यक्रम दीवाली के बाद होगा। कुल मिलाकर दीवाली के बाद दक्षिण का चुनावी माहौल गरमाने के आसार हैं।
स्टेशन चकाचक हो जाए तो भी क्या?
295 किलोमीटर लंबी कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल लाइन के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम उठा है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में खनिज विकास निधि सलाहकार समिति की बैठक में भू अर्जन और प्रारंभिक कार्य के लिए 300 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। इस लाइन के लिए आजादी से पहले से मांग उठ रही है। अंग्रेजों ने इसका नक्शा बनाकर काम भी शुरू कर दिया था। यह रेल लाइन कवर्धा, मुंगेली, लोरमी, तखतपुर जैसे इलाकों से गुजरने वाली है, जहां से अभी भाजपा के कई कद्दावर मंत्री और विधायक प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि पूरी परियोजना करीब 5950 करोड़ रुपये की है पर एक शुरूआत हुई है, जिसका श्रेय जनप्रतिनिधि ले सकते हैं।
मगर, एक दूसरी परियोजना और है, जिसके लिए इंतजार लंबा होता जा रहा है। वह है बस्तरवासियों को रेल के जरिये राजधानी पहुंचना सुगम बनाना। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की समिति में कुछ रेल परियोजना के लिए राशि मंजूर की गई, लेकिन उसमें बहुप्रतीक्षित रावघाट-जगदलपुर शामिल नहीं है। मोदी की मौजूदगी में करीब 10 साल पहले 9 मई 2015 को दंतेवाड़ा में इस रेल लाइन के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके लिए बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी गठित की गई थी, जिसमें सेल, एनएमडीसी, इरकॉन और सीएसडीसी शामिल हैं। लंबे समय तक तो इसी बात पर विवाद होता रहा कि किस उपक्रम की कितनी हिस्सेदारी रहेगी। संभवत: यह अब तक हल भी नहीं हुआ है। अभी स्थिति यह है कि इस परियोजना पर सिर्फ दुर्ग से ताड़ोकी तक काम हुआ है। उसके बाद सब ठंडे बस्ते में है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस साल केंद्रीय बजट के बाद एक वृहद प्रेस कांग्रेस वीडियो कांफ्रेंस के जरिये ली थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि छत्तीसगढ़ के लिए 6000 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी गई है, जो अब तक कभी नहीं मिली थी। जब उनसे रावघाट परियोजना पर पूछा गया तो उनकी ओर से अधिकारियों ने यही बताया कि यह अकेले रेलवे का प्रोजेक्ट नहीं है, बाकी निगम, उपक्रमों से बात करनी पड़ेगी। तो स्थिति यह है कि बस्तर को राजधानी से रेल लाइन के जरिये जुडऩे में अभी भी शायद एक दशक या उससे ज्यादा लग जाए। मजे की बात यह है कि अमृत भारत योजना में जगदलपुर रेलवे स्टेशन को शामिल कर यहां 17 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब रेल लाइन की सुविधा ही नहीं देनी है तो इस खर्च का क्या मतलब?
असली घी, नकली घी
गुजरात के गांधीनगर में एक फैक्ट्री में छापा मारकर नकली अमूल घी पकड़ा गया है। इसके बाद लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालकर बता रहे हैं कि बाजार में अमूल ही नहीं कई ब्रांड्स के नकली घी भरे पड़े हैं। इस तस्वीर में एक पैकेट असली है, एक नकली।
बन पाएंगे सक्रिय सदस्य ?
भाजपा का संगठन महापर्व सदस्यता अभियान का पहला और अहम चरण पूरा हो गया है। इसमें 50 लाख से अधिक पुराने सदस्यों का नवीनीकरण और नए सदस्य बनाने का दावा है। दूसरा चरण भी शुरू हो गया है, इसमें एक लाख सक्रिय सदस्य बनाए जाने हैं। संगठन के 404 मंडलों में से हरेक में 200 सक्रिय सदस्य बनेंगे। उसके बाद बूथ समितियों, मंडल, जिला समिति और फिर प्रदेश समिति सदस्य और अंत में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होगा। सक्रिय सदस्य बड़े कांट-छांट के बनाए जाते हैं।
सबसे अहम यह कि सदस्य कितने वर्षों से भाजपा का प्राथमिक सदस्य है। उसकी सक्रियता कितनी रही है। चुनाव के दौरान का आया- राम, गया-राम तो नहीं। यदि है तो वह वेटिंग में रहेगा। विधानसभा चुनाव के पहले से अब तक प्रवेश करने वाले कांग्रेस से आए नेताओं को अभी इंतजार करना होगा। क्योंकि इनकी रेफरल आईडी से कितने नए सदस्य बने होंगे यह भी संदिग्ध हैं।
इनमें राज्यसभा,लोकसभा के पूर्व सांसद, नेता प्रतिपक्ष, एमपी- सीजी में प्रदेश अध्यक्ष, कोर ग्रुप के सदस्य के रूप में जनसंघ, और बाद में स्थापना काल से भाजपा में रहे नंदकुमार साय भी शामिल हैं। वर्ष 22 में भाजपा छोड़ भूपेश बघेल का हाथ थामने वाले साय ने विधानसभा बाद कांग्रेस छोड़ा और पिछले दिनो भाजपा की प्राथमिक सदस्यता का फार्म भरा। उसके बाद उन्हें सक्रिय सदस्य बनाने को लेकर जशपुर जिला संगठन सहमत नहीं है। इसमें सबसे बड़ा रोड़ा, उनके संगठन और सरकार विरोधी बयान बाजी को बताया जा रहा है। चाहे वह रमन सिंह हो या कांग्रेस छोडऩे से पहले बघेल सरकार, वे बयान देते रहे। और अब सक्रिय सदस्य बनने के बाद कुछ दिन महीने शांत रहने के बाद मुंह खोलने लग जाएंगे। जशपुर से लेकर राजधानी तक के संगठन नेता उन्हें नहीं चाहते। सीएम और महामंत्री संगठन दोनों ही जशपुर से ही आते हैं। वे दोनों नंदकुमार साय से ज्यादा जानते हैं। अब देखना है कि नंदकुमार साय सक्रिय सदस्य बनते हैं, या नहीं।
देवतुल्य कार्यकर्ता और बेरुखी
भाजपा ने देश भर में अपने कार्यकर्ताओं को देवतुल्य उपनाम दिया है। संगठन की बैठकों में उनके सुख दुख में सहभागी बनने विधायक, मंत्रियों को विशेष निर्देश दिए जाते हैं। इसके लिए सहयोग (सहायता) केंद्र की भी व्यवस्था की गई है। जहां सरकार के मंत्रियों को बैठकर कार्यकर्ताओं की मांग-समस्या सुनकर दूर करने की जिम्मेदारी दी गई। इसके गवाह के रूप में संगठन ने उपाध्यक्ष,मंत्री आदि भी बिठाए जाते हैं। इस केंद्र में कार्यकर्ता के दो ही मुद्दे बहुतायत में आते हैं। एक, मोहल्ले-वार्ड में सडक़ कांक्रीटीकरण और एक-दो तबादले के आवेदन। मगर कार्यकर्ताओं के ये दोनों काम नहीं हो रहे। कांक्रीटीकरण के प्रस्ताव संबंधित निगम आयुक्तों, सीएमओ महापौरों को भेज दिए जाते हैं।और ट्रांसफर एप्लीकेशन पर मंत्रियों का सीधा जवाब रहता है कि अभी रोक लगी हुई, हटने पर कर देंगे। यह कहकर पीए को आवेदन थमा देते हैं। और अगले ही दो-तीन दिनों में मंत्री के विभाग से तबादला आदेश निकलते हैं लेकिन देवतुल्य कार्यकर्ता का दिया नाम नहीं होता।
यही देवता जब बंगले या फिर साप्ताहिक केंद्र में मंत्री के सामने प्रकट होता है तो समन्वय समिति में होने के जवाब दे कन्नी काट लिया जाता है। यह पुराने ही नहीं नए नवेले मंत्रियों का भी हाल है। ऐसी बेरुखी से कार्यकर्ता भरे पड़े हैं, न जाने किस दिन फट पड़े। आने वाले दिनों में बड़े चुनाव भी है। जो इन मंत्रियों की जमीनी पकड़ का आईना होंगे। कार्यकर्ता आइना लेकर खड़े हैं।
इस बार बदली हुई तस्वीर
दीवाली के बीच रायपुर दक्षिण के चुनाव से भाजपा और कांग्रेस में कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है। हालांकि भाजपा नेता थोड़े ज्यादा उत्साहित थे क्योंकि उन्हें बृजमोहन अग्रवाल के चुनाव प्रबंधन के तौर तरीके मालूम है। बृजमोहन अपने कार्यकर्ताओं की हर जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। वो अपने विरोधी दल के नेताओं का भी ख्याल रखते आए हैं। लेकिन इस बार संशय की स्थिति बन गई है। वजह यह है कि पार्टी संगठन के एक प्रमुख नेता ने भरी बैठक में हिदायत दे रखी है कि इधर-उधर से पैसे नहीं आएंगे। जितना जरूरी होगा, उतना ही खर्च करें। दूसरी तरफ, कांग्रेस में प्रत्याशी ने बैठक में कह दिया कि कार्यकर्ताओं की किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है। त्यौहार नजदीक है, ऐसे में देखना है कि दोनों दलों के नेता अपने कार्यकर्ताओं की इच्छाओं को पूरा कर पाते हैं या नहीं।
उप चुनाव क्यों हो, कब हो?
यदि रायपुर दक्षिण सीट से भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी चुनाव जीतते हैं तो वे एक विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि बन जाएंगे। पिछले चुनाव में इस सीट पर बृजमोहन अग्रवाल ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी और केबिनेट मंत्री भी बने। लेकिन, उन्हें विधानसभा से हटाकर लोकसभा चुनाव में भेजा गया, जहां नियमों के अनुसार 15 दिन में इस्तीफा देना पड़ा, जिससे उपचुनाव की स्थिति बनी। यह निर्णय भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया गया। क्या विधायक और मंत्री के रूप में बृजमोहन अग्रवाल का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था? मगर लोकसभा भेजकर उनकी काबिलियत पर तो पार्टी ने मुहर लगाई है? क्या उन्हें विधानसभा से हटाकर लोकसभा भेजना दक्षिण रायपुर के जनादेश का अनादर नहीं है? सुनील सोनी को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाना यह दर्शाता है कि भाजपा ने उनकी जनप्रतिनिधि के रूप में क्षमता को स्वीकार किया है। फिर टिकट काटने की नौबत क्यों आई?
विधानसभा चुनाव 2023 में भाजपा ने अरुण साव, गोमती साय और रेणुका सिंह को सांसद रहते हुए विधानसभा टिकट दी, पर वहां उपचुनाव की जरूरत नहीं पड़ी। इसके विपरीत, 2019 में कांग्रेस ने दीपक बैज को विधानसभा टिकट दी, तो उनकी विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा था। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जा रही है। उत्तर प्रदेश की 9 सीटों पर उपचुनावों का कारण भी यही है, जहां कई विधायकों को सांसद की टिकट दी गई। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव भी विधायकी छोडक़र संसद पहुंचे हैं। राहुल गांधी ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ा। उन्होंने वाराणसी सीट बरकरार रखी, वायनाड में उप चुनाव हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी और वडोदरा से चुनाव लड़ा और बाद में वडोदरा से इस्तीफा दिया, जिससे उपचुनाव कराना पड़ा।
दो सीटों पर चुनाव लडक़र एक सीट छोड़ देना या एक सदन से दूसरे सदन में जाने के लिए इस्तीफा देना, यह प्रवृत्ति राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन आम जनता के लिए यह समझ पाना कठिन है कि इसमें उनका क्या लाभ है। 1996 से पहले एक व्यक्ति कई सीटों से चुनाव लड़ सकता था, लेकिन अब अधिकतम दो सीटों पर ही चुनाव की अनुमति है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33(7) को सुप्रीम कोर्ट में भाजपा से ही जुड़े अश्विनी उपाध्याय ने चुनौती दी थी, जिसमें दो जगहों से चुनाव लडऩे का प्रावधान है। चुनाव आयोग ने भी ‘एक व्यक्ति, एक सीट’ की नीति का समर्थन किया, पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून में बदलाव संसद द्वारा होना चाहिए।
दूसरे सदन में जाने के लिए एक सदन से इस्तीफा देना और उपचुनाव की आवश्यकता उत्पन्न करना एक ऐसी स्थिति है जिस पर अभी तक कोई चुनौती नहीं आई है। क्या खर्च उन्हें उठाना चाहिए, जिनकी वजह से उपचुनाव की नौबत आ जाती है? चुनाव खर्च को नियंत्रित करने और वन नेशन वन इलेक्शन की बात करने वाले लोग इस तरह के उपचुनाव से होने वाले संसाधनों और सरकारी धन के अनावश्यक खर्च पर क्या कहेंगे? यह सवाल अभी नहीं तो कभी न कभी उठेगा ही।
हो कहीं भी आग, जलनी चाहिए..
रायपुर के एक शॉपिंग मॉल का यह रेस्टॉरेंट है। गौर से देखें यहां काम करने वाली यह युवती किताब पढ़ रही है। जब ग्राहकों को सर्विस देने के बीच समय मिलता है तो वह बुक पढ़ती रहती है। यह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी कर रही हो, या फिर उसकी दिलचस्पी की कोई किताब हो सकती है। मगर यह उन्हें जरूर सीख दे रही हैं जो पढऩे के नाम कहते हैं, क्या करें समय नहीं मिलता।
नाम भी सही नहीं
छत्तीसगढ़ राज्य गठन को 25 साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन अभी भी कुछ संस्थानों में राज्य के नाम को लेकर मात्रात्मक त्रुटियां सामने आ जा रही है। इन्हीं में से एक रायपुर के सबसे पुराने कॉलेज शासकीय जे योगानन्दम् छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में आंतरिक/प्रायोगिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में छत्तीसगढ़ का नाम गलत छपा है।
छत्तीसगढ़ महाविद्यालय की जगह छत्तसीगढ़ महाविद्यालय छप गया है। हाल यह है कि हजारों उत्तर पुस्तिकाओं में नाम गलत छपे हैं, लेकिन इसको सुधारने के लिए कॉलेज प्रबंधन ने कोई कदम नहीं उठाया है। ऐसा नहीं है कि कॉलेज के प्राचार्य, और अन्य प्रोफेसरों को इस बड़ी चूक की जानकारी नहीं है। कुछ विद्यार्थियों ने भी कॉलेज प्रबंधन का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया है, लेकिन किसी ने इसको गंभीरता से नहीं लिया।
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमिताभ बनर्जी भी रायपुर में पले-बढ़े हैं, और रायपुर विज्ञान महाविद्यालय से स्नातक हैं। वो पूर्व सीएम भूपेश बघेल के कॉलेज के सहपाठी रहे हैं। अब जब उत्तरपुस्तिकाओं में त्रुटि सामने आई है, तो कई ने अलग-अलग स्तरों पर इसकी शिकायत भी की है। देखना है कि त्रुटि सुधारने के लिए कोई पहल होती है, अथवा नहीं।
निगम मंडल की बैलेंस शीट
भाजपा के गलियारों में फिर चर्चा चल पड़ी है कि निगम मंडलों में नियुक्तियां फरवरी के बाद। निकाय-पंचायत चुनावों में नेताओं के परफार्मेंस देखकर सरकारी कुर्सियां भरी जाएंगी। यह तो हुई कार्यकर्ताओं और मीडिया सबको बताने वाली बात। जो न बताने वाली बात है वो यह है कि भार साधक मंत्री ही नहीं चाहते कि अपने विभाग के बड़े बजट के उपक्रमों पर दूसरा सक्षम प्राधिकार बैठे। सही है, उपक्रमों की गाडिय़ां, निजी घरेलू, काम के लिए स्टाफ खर्च के लिए बजट आदि-आदि। जो हाथ से निकल जाएगा। ऐसे बड़े उपक्रम हैं-भवन सन्निर्माण कर्मकार मंडल, श्रम कल्याण मंडल, आबकारी निगम, ब्रेवरेज निगम, पर्यटन मंडल, बीज निगम नान, मार्कफेड, सडक़ विकास निगम, क्रेडा, वन विकास निगम आदि। इसलिए जब जब प्रभारी जी के साथ नियुक्ति पर रायशुमारी होती मंत्री तपाक से औचित्य के प्रश्न उठा देते हैं। और भार साधक मंत्री होने के नाते काम करने से हो रहे स्थापना व्यय की बचत का लाभ हानि का बैलेंस शीट, पटल पर रख देते। वह भी कांग्रेस शासन काल का। ऐसी तीन बैठकें हो चुकी हैं और हर बार मंत्रियों की जीत होती रही।
तबादले और इमोशनल जस्टिफिकेशन
पिछले दशक में एक फिल्म आई थी देव-डी। इस फिल्म को हीरो अभय देयोल (सुपुत्र धर्मेन्द्र ) एक गाना गाते हैं तौबा तेरा जलवा तौबा तेरा प्यार, तेरा इमोशनल अत्याचार। यह पंक्ति इसलिए याद कर रहे कि आज सरकार के मंत्रियों की हालत, गिटार लेकर गाने वाले अभय देयोल जैसी ही है। बस वे गा नहीं पा रहे। सभी मंत्री, एक सचिव मैडम से कुछ ऐसे ही परेशान हैं। मंत्री तबादले की बात या हुए तबादले रद्द करने कॉल करते हैं तो मैडम के इमोशनल स्पीच, तर्क सुनकर स्विच आफ करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। पड़ोस के जिले के पहली बार बने एक मंत्री के साथ ऐसा ही हुआ। मंत्रीजी ने डीईओ साहब का तबादला रद्द करने मैडम को कॉल किया। शुरूआती शिष्टाचार के बाद मंत्री ने कॉल करने का मुख्य सबब बताया। इस पर मैडम ने जो कहा, उसे यहां पढ़ें और महसूस करें--
सर मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूं। आप कांग्रेस की लहर जैसे माहौल में जीतकर आए। जनता आप में विकास पुरुष देखती है। आपने चुनावों में वादे (निर्माण कार्य गिनाते हुए) भी किए हैं। इनमें से एक महिलाओं को सुरक्षा और राहत देने शराब की अवैध बिक्री, कोचियों को समाप्त करना भी है। सीएम साहब इसी पर प्लानिंग के साथ काम कर रहे हैं। ये तबादले पूरी जांच के बाद किए गए हैं। डीईओ पर बहुत सी शिकायतें रहीं, मैने स्वयं छापेमारी में पकड़ा है। ऐसे ही अवैध धंधे को खत्म कर खजाने में राजस्व लाना है। अप्रैल से सितंबर तक खजाने को 200-200 करोड़ की चपत लग चुकी है। ये पैसे आते तो आपके क्षेत्र में सडक़, पुल पुलिया, सीसी रोड़, व्यपवर्तन योजना,आगजनी के शिकार भवन बन जाते। आपके किए कुछ वादे अभी 6-8 महीने में ही पूरे हो जाते। लेकिन डीईओ की वजह से राजस्व हानि हुई, और वित्त विभाग ने आपके प्रस्ताव अगले बजट के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब आप ही बताइए ऐसे विकास रोधी अफसर का तबादला रद्द करना ठीक रहेगा क्या?
इसके बाद तो मंत्री जी के पास कोई किंतु-परंतु का भी अवसर नहीं रह गया था। मैडम को अब तक अलग-अलग डीईओ के तबादले रुकवाने सरकार के आधे मंत्री ऐसे कॉल कर चुके हैं।
तकनीक से पीछे हटने का सवाल
डिजिटल क्रांति आने के बाद अनेक नए काम धंधे लोगों को मिले हैं तो कई का कामकाज चौपट भी हो गया है। ऐसा ही खतरा जमीन का पंजीयन कराने वाले दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प वेंडर्स के सामने मंडरा रहा है। छत्तीसगढ़ देश का दूसरा राज्य होगा जहां जमीन, मकान, दुकान की रजिस्ट्री घर बैठे करने की सुविधा दी जा रही है। सारे दस्तावेज, शुल्क ऑनलाइन जमा हो जाएंगे, यहां तक कि गवाहों को भी रजिस्ट्री दफ्तर जाने की जरूरत नहीं। इसी महीने 10 अक्टूबर को मध्यप्रदेश में यह सुविधा वहां के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक समारोह में किया था। वहां इसे संपदा 2.0 नाम दिया गया है। छत्तीसगढ़ में सुगम ऐप लॉंच किया गया है। दस्तावेज लेखकों, स्टांप वेंडरों की चिंता जायज है लेकिन जब इंटरनेट और स्मार्ट फोन आने के बाद पेपरलेस काम सभी क्षेत्रों में बढ़ रहा है। बहुत सी सरकारी सेवाएं अब ऑनलाइन हो चुकी है। पटवारी रिकार्ड डिजिटली उपल्ध हैं। लोगों के खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर हो रहे हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मितानिन अपनी रिपोर्ट ऑनलाइन जमा कर रहे हैं। कुछ जगहों पर शिक्षकों की उपस्थिति भी ऑनलाइन दर्ज की जा रही है। उनके विभागीय आवेदनों को तो पूरी तरह ऑनलाइन कर ही दिया गया है। पिछली सरकार के समय बताया गया था कि करीब 100 तरह की सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं। एक समय एसटीडी-पीसीओ बूथ में कतारें लगती थीं लेकिन सस्ती मोबाइल कॉलिंग सुविधा मिलने के बाद यह कारोबार बैठ गया। अब जब लोग टीवी चैनल सेटअप बॉक्स में देखने के आदी हो रहे हैं तो केबल तार का जाल सिमट रहा है। प्रदेश में करीब 25 हजार वेंडर और दस्तावेज लेखक हैं। कुछ लोग तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही काम करते आ रहे हैं। कुछ इतने बुजुर्ग हो चुके हैं कि नया काम शुरू नहीं कर सकते। हड़ताल के बावजूद इस बात के आसार कम दिख रहे हैं कि सरकार अपने कदम वापस लेगी। वेंडरों की एक मांग जरूर है कि ऑनलाइन रजिस्ट्री के लिए भी लाइसेंस सिस्टम हो और आईडी देकर उनके माध्यम से काम कराया जाए।