राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : दो लाख रूपए की नौकरी!
09-Jun-2026 6:05 PM
राजपथ-जनपथ : दो लाख रूपए की नौकरी!

दो लाख रूपए की नौकरी!

हमारे अखबार में हम बरसों से, बल्कि दशकों से यह लिखते आ रहे हैं कि कॉलेज निरर्थक पढ़ाई को घटाकर, स्कूली पढ़ाई के तुरंत बाद बच्चों को तरह-तरह के हुनर सिखाकर, और दुनिया की दूसरी भाषाएं सिखाकर देश के दूसरे हिस्सों में और बाकी दुनिया में काम करने लायक तैयार करना चाहिए।

अभी दुर्ग के रोजगार कार्यालय का जारी किया गया एक कागज देखने मिला है, जो कि एक रिटायर्ड आईएएस ने इस अखबार को भेजा है। इसके मुताबिक इजराइल में घरों में देखभाल के काम के लिए होम बेस्ड केयर गिवर की नौकरियां उपलब्ध हैं। भारत और इजराइल के बीच हुए समझौते के मुताबिक ऐसे 35 सौ कामगार वहां पर चाहिए, इन्हें दो-दो लाख रूपए वेतन मिलेगा, और दो साल के अनुबंध पर उन्हें रखा जाएगा, इन्हें रहने-खाने की सुविधा होगी, और चिकित्सा बीमा भी मिलेगा।

इनके लिए जो शर्तें हैं उनके मुताबिक कुल 10वीं पास होना जरूरी है, स्कूली स्तर पर अंग्रेजी भाषा पढ़े हुए रहें, भारतीय नियामक प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त 990 घंटे का केयर गिविंग प्रमाणपत्र जरूरी है। इन लोगों के लिए जनरल ड्यूटी सहायक, नर्स, मिड वाईफ, बीएससी नर्सिंग, फिजियोथैरेपी में से कोई एक प्रमाणपत्र जरूरी है।

अब ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजएट लोग जहां 10-15 हजार की नौकरी के लिए धक्के खाते हैं, वहां 10वीं पास लोग इनमें से कोई भी कोर्स करने के बाद इजराइल में 2 लाख रूपए महीने पा सकते हैं। ये कोर्स भारत में 12वीं के बाद तीन-चार साल में किए जा सकते हैं, और लोगों को यह समझना चाहिए कि इसके बाद वे दूसरे देशों में किस तनख्वाह के लायक बन सकते हैं। बीए, बी.कॉम, बीएससी, और इसके बाद की पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई आमतौर पर किसी किनारे नहीं पहुंचाती है। पूरी दुनिया में इस तरह के होम केयर गिविंग रोजगार बढ़ते ही चलने हैं, क्योंकि संपन्न देशों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ते चल रहा है।

मजदूरी पर कड़वी-मीठी रिपोर्ट

देश में सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का काम केवल लोन देने, जमा करने का व्यापार करना ही नहीं है, वह सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों, श्रम के अधिकारों पर शोध भी करता है। इसका एक अलग विंग है, जिसका नाम एसबीआई इकोरैप है। यह रिसर्च समाज के जमीनी बदलावों को आर्थिक चश्मे से देखकर बताता है कि देश का आर्थिक विकास किस दिशा में जा रहा है। इस रिसर्च से संबंध उनके  बैंकिग व्यवसाय के जोखिम प्रबंधन से है। रिसर्च के जरिये पता चलता है कि किस तरह के व्यवसाय में लोग फूल-फूल रहे हैं, किस तरह के लोन को मंजूर कना जोखिम भरा है। अपराधों की वजह से बैंक के व्यवसाय या एनपीए पर क्या फर्क पड़ रहा है?

हाल ही में इस रिसर्च पर आधारित नई रिपोर्ट आई है, जिसमें छत्तीसगढ़ में महिलाओं की कामकाजी स्थिति को उज्ज्वल बताया गया है। बज देश में महिला सुरक्षा और लेबर मार्केट में उनके योगदान को लेकर चिंता जताई जा रही हो तब छत्तीसगढ़ को लेकर रिपोर्ट में प्रशंसा की गई है। यह भी कहा गया है कि छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के साथ उस अग्रिम पंक्ति में खड़ा है, जहां कामकाजी महिलाओं के प्रति अपराध कम होते हैं। यह माहौल उन्हें घरों से बाहर निकलकर काम करने या आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहरी और अर्धशहरी इलाकों में सीसीटीवी निगरानी बढऩे तथा डिजिटल लेनदेन (यूपीआई से) बढऩे की वजह से चोरी और लूटपाट के वारदात कम हुए हैं।

दूसरी तरफ इसी रिपोर्ट में सामाजिक, आर्थिक न्याय के मोर्चे पर निराशाजनक तस्वीर पेश की गई है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि छत्तीसगढ़ न्यूनतम मजदूरी कानून के उल्लंघन के मामले में हॉटस्पॉट यानि सबसे खराब राज्यों में से एक है। श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन हो, इस पर सरकार और संबंधित विभागों का ध्यान नहीं है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दिहाड़ी मजदूर, कुली-रेजा आदि न्यूनतम मजदूरी से कम पैसे पर काम करने के लए मजबूर हैं। छत्तीसगढ़ इस मामले में अपने पड़ोसी राज्यों से भी बदतर है। झारखंड में 65 प्रतिशत और ओडिशा में 66 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती, वहीं छत्तीसगढ़ में यह 70 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में बताई गई एक और बात कतई चौंकाने वाली नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही स्थापित है। वेज थेफ्ट-यानि मजदूरी की चोरी की सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं होती हैं। वे काम तो करती हैं, पर उनको उनके हक की मजदूरी नहीं दी जाती। कानून के मुताबिक न्यूनतम भुगतान तो होता ही नहीं। रिसर्च में यह भी बताया गया है कि डिजिटल लेनदेन का छत्तीसगढ़ में विस्तार तो हुआ है, पर इसी के साथ साइबर अपराधों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है। ग्रामीण व कम साक्षर लोग इसके ज्यादा शिकार हो रहे हैं।

एसबीआई रिसर्च की यह रिपोर्ट एक तरह से वेकअप कॉल है। आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए महिलाओं को माहौल तो मिला है, पर उनके अधिकार की मजदूरी उनको नहीं मिल रही। 70 फीसदी कुली मजदूर सुबह से शाम तक पसीना बहाने के बाद भी अपने हक की न्यूनतम मजदूरी हासिल नहीं कर पाते।

भाजपा का बस्तर प्लान

भाजपा के अंदरखाने में नगरीय निकाय उपचुनाव की बारीक समीक्षा हो रही है, और विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति भी बन रही है। निकाय उपचुनाव में वैसे तो नतीजे भाजपा के पक्ष में रहे हैं, लेकिन जिस तरह कांग्रेस से टक्कर मिली है, उससे विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से संकेत मिल रहे हैं।

निकाय चुनाव में भाजपा ने पांच नगर पंचायतों में से तीन में जीत हासिल की, लेकिन दो नगर पंचायत अध्यक्ष हार गए। जिन दो निकायों में हार हुई है, उनमें बालोद की पलारी, और राजनांदगांव की घुमका सीट है। इन दोनों जगहों पर भाजपा ने दम लगाया था। दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा प्रचार के लिए गए थे। संगठन के तमाम प्रमुख नेता डटे हुए थे, मगर दोनों जगह अध्यक्ष प्रत्याशी हार गए।

भाजपा अध्यक्ष किरणदेव की विधानसभा सीट जगदलपुर, और पूर्व अध्यक्ष विक्रम उसेंडी की विधानसभा सीट अंतागढ़ के पखांजूर नगर पंचायत में वार्ड चुनाव थे, दोनों जगह भाजपा हार गई। वैसे तो भाजपा को 39, और कांग्रेस ने 30 वार्डों पर जीत हासिल की है। मगर भाजपा के रणनीतिकार अब ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर गंभीर हैं, और अभी से तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी दफ्तर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में इस सिलसिले में बैठकें हो रही हैं।

भाजपा के रणनीतिकारों को लगता है कि बस्तर में नक्सल खात्मे के बाद लड़ाई आसान नहीं रहेगी। यही वजह है कि कुछ प्रमुख नेताओं को विशेष रूप से उन सीटों के लिए जिम्मेदारी दी गई है, जहां मुकाबला कठिन रहने की संभावना है। वन मंत्री केदार कश्यप के बड़े भाई पूर्व सांसद दिनेश कश्यप को बीजापुर विधानसभा का प्रभारी बनाया गया है। बीजापुर में पार्टी को पिछले दो चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है।

यही नहीं, बस्तर विधानसभा सीट तो पिछले चार बार से पार्टी हार रही है। यहां ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन के चेयरमैन श्रीनिवास राव को प्रभारी, और श्रीनिवास मिश्रा को सहप्रभारी बनाया गया है। यही नहीं, राज्य बनने के बाद से लगातार हार रही कोंटा सीट का प्रभार लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष रूपसिंह मंडावी को दिया गया है। इन नेताओं को लगातार क्षेत्र का दौरा कर विकास कार्यों पर नजर रखने के लिए कहा गया है।

नक्सल खात्मे के बाद पार्टी के इन प्रभारियों को अंदरूनी इलाकों का दौरा कर कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करने के लिए भी कहा गया है। इससे पहले के चुनावों में भाजपा अंदरूनी इलाकों में नहीं जाती थी। सडक़ से सटे मुख्य गांवों में ही प्रचार होता था। पार्टी अब इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए हर संभव कोशिश करेगी। देखना है आगे क्या होता है।

डाइनिंग हॉल तय, और बाथरूम?

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी ने फेसबुक पर लिखा है- एक और नई व्यवस्था लागू हो गई है। नगर पंचायत के अनुसार ‘आवारा कुत्तों’ (यह शब्द मेरा नहीं, नगर पंचायत का है) के लिए भोजन करने का स्थान निर्धारित कर दिया गया है। अब आप उन्हें अपनी सुविधा या दया के अनुसार कहीं भी खाना नहीं खिला सकेंगे, बल्कि तय स्थान पर ही भोजन उपलब्ध कराना होगा।

यह निर्णय कितना सही है और कितना गलत, इसका फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं। लेकिन एक बात मन में जरूर आई है जब इनके भोजन का स्थान निर्धारित किया जा सकता है, तो काश इनके शौच का स्थान भी निर्धारित कर दिया जाता। तब शायद सडक़ें, गलियां और पार्क भी कुछ अधिक स्वच्छ दिखाई देते। नगर पंचायत ने कुत्तों के लिए डाइनिंग हॉल तो तय कर दिया, अब अगर वॉशरूम भी तय कर दे तो स्वच्छता अभियान को चार चांद लग जाये।

खैर, व्यवस्था बनाने वाले अपनी जगह सही होंगे और पशु प्रेमी अपनी जगह। अब देखना यह है कि कुत्ते महोदय इस नई व्यवस्था का कितना सम्मान करते हैं और निर्धारित भोजनालय तक पहुंचने का कष्ट उठाते हैं या नहीं।


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