<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>Daily Chhattisgarh - Sthayi Stambh</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh.php</link><description>Daily Chhattisgarh - Sthayi Stambh</description><item><title>राजपथ-जनपथ : साव की टिप्पणी से हलचल</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15325&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15325&amp;path_article=7 ]]></link><description>साव की टिप्पणी से हलचल

प्रदेश भाजपा कार्यसमिति में डिप्टी सीएम अरूण साव की एक टिप्पणी ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। साव ने कहा था कि भाजपा अब बनिया-जैन पार्टी नहीं रही, बल्कि उसकी स्वीकार्यता व्यापक हो चुकी है और देश के 73 फीसदी हिस्सों में पार्टी का विस्तार हो चुका है। उनकी इस टिप्पणी को लेकर संगठन के भीतर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। खासकर बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेता इसे गैरजरूरी टिप्पणी मान रहे हैं।

दरअसल, अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा को अक्सर बनिया-जैन पार्टी कहकर निशाना बनाते थे। उस समय सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे और लखीराम अग्रवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। सरकार जाने के बाद भी पार्टी की यह छवि लंबे समय तक बनी रही। हालांकि भाजपा को केवल बनिया-जैन पार्टी ही नहीं, बल्कि सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी के तौर पर भी देखा जाता रहा, जहां ओबीसी और दूसरे वर्गों को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा होती थी।

महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार को कभी सेठजी-भट्टजी की सरकार कहा जाता था। शरद पवार ने उस दौर में मुख्यमंत्री मनोहर जोशी पर लगातार जातीय समीकरणों को लेकर निशाना साधा था। इसके बावजूद मौजूदा समय में देवेन्द्र फडणवीस जैसे ब्राह्मण नेता मराठा बहुल महाराष्ट्र में लंबे समय तक प्रभावशाली बने रहे। इससे परे पिछड़े तेली समाज से आने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने ओबीसी और अन्य वर्गों में भी मजबूत पकड़ बनाई।

छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन की कमान समय-समय पर ताराचंद साहू, लखीराम अग्रवाल, डॉ. रमन सिंह, शिवप्रताप सिंह, विष्णुदेव साय, धरमलाल कौशिक और अरूण साव जैसे नेताओं के हाथों में रही है। रमन सरकार के दौरान बनिया-जैन समाज से आने वाले बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और गौरीशंकर अग्रवाल जैसे नेता कैबिनेट मंत्री और स्पीकर रहे। आबादी के अनुपात में इस समाज को मिले बड़े प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सवाल भी उठते रहे, लेकिन इन नेताओं की संगठन और सरकार में मजबूत पकड़ तथा स्वीकार्यता के कारण यह मुद्दा ज्यादा नहीं उभरा।

अब हालात बदल चुके हैं। मौजूदा सरकार में बनिया समाज से अकेले राजेश अग्रवाल मंत्री हैं, जबकि संगठन में दूसरे वर्गों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। ऐसे माहौल में अरूण साव की टिप्पणी ने पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेताओं की नाराजगी भी सामने आ रही है। उनका कहना है कि पार्टी को खड़ा करने और विस्तार देने में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में कांग्रेस की पुरानी टिप्पणियां एक बार फिर चर्चा में आ गई है।

देखें छत्तीसगढ़ के कितने अनुकरणीय

अब राज्यों में गुड गवर्नेंस या नवाचार के नाम पर सचिव के विभाग में रहते या कलेक्टर के जि़ले में पोस्टिंग रहते तक नहीं चलेंगे। उनकी कंटीन्यूटी के लिए भी केंद्र सरकार मेकेनिज्म बनाने जा रही है। इसके लिए पहले राज्यों में चल रही ऐसी योजनाओं या कार्यक्रमों को केंद्र ने मंगाया है।

केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी डॉ. टी वी सोमनाथन ने सभी केंद्रीय सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिव को एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सीलेंस को इंस्टीट्यूशनल बनाने और क्रॉस-स्टेट लर्निंग को बढ़ावा देने इनोवेटिव गवर्नेंस प्रैक्टिस को डॉक्यूमेंट करने का निर्देश दिया है। नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी ) की अगुवाई में, इस स्टडी का मकसद देश भर में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की अलग-अलग सफलता की कहानियों को मॉडल के रूप में बदलना है।

भारत सरकार के सेक्रेटरी और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी को लिखे एक लेटर में, सोमनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑल इंडिया, सेंट्रल और स्टेट सर्विसेज़ में अधिकारियों का बहुत ज़्यादा अनुभव देश के लिए बहुत कीमती है। सभी अधिकारियों को आगामी 31 मई, तक अपनी एंट्री जमा करने के लिए कहा गया है। अधिकारी इंग्लिश, हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में नोट्स जमा कर सकते हैं। हालांकि फ़ॉर्मेट फ्लेक्सिबल है, लेकिन नोट्स टाइप किए हुए होने चाहिए (हाथ से लिखे नहीं) और ज़्यादा से ज़्यादा सात पेज के होने चाहिए। एंट्री पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के किसी भी एरिया को कवर कर सकती हैं, जिसमें आसान वर्कफ़्लो में बदलाव से लेकर बड़े डिजिटल बदलाव तक शामिल हैं। सरकार ने एक सख्त मल्टी-टियर वेटिंग प्रोसेस बताया है ताकि यह पक्का हो सके कि सिफऱ् सबसे असरदार प्रैक्टिस ही आर्काइव की जाएं।

एनसीजीजी पहले नोट्स की रेलिवेंस और इंपॉर्टेंस की जांच करेगा।सबमिशन में किए गए क्लेम का इंडिपेंडेंट वेरिफिकेशन किया जाएगा। कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में सीनियर अधिकारियों का एक हाई-लेवल पैनल फाइनल रिव्यू करेगा। चुनी हुई प्रैक्टिस को कैबिनेट सेक्रेटेरिएट और एनसीजीजी के ऑफिशियल पोर्टल पर साथियों के लिए रेफरेंस गाइड के तौर पर अपलोड किया जाएगा। यह पत्र महानदी भवन को भी मिला है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ से कितनी एंट्रियां जाती हैं और कितने एनसीजीजी की फेहरिस्त में शामिल होती हैं। क्योंकि यहां भी हर जिले में कई नवाचार चल रहे हैं और उन्हें अनुकरणीय बताया जा रहा है।

राजधानी के लिए कब तक होगी ईंधन की बर्बादी

छत्तीसगढ़ की राजधानी अटल नगर-नया रायपुर को विकसित हुए लगभग 20 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे न तो मंत्री और न ही अफसर राजधानी मानते हैं। पुरानी राजधानी रायपुर से नया रायपुर की 17 से 28 किलोमीटर है, जो एक्सप्रेसवे पर 30-45 मिनट का सफर है। रोजाना हजारों कर्मचारी, अधिकारी और मंत्रालयीन स्टाफ निजी वाहनों, सरकारी गाडिय़ों तथा काफिलों के साथ आना-जाना करते हैं। ईंधन संकट के इस दौर में भी इस बर्बादी को रोकन के का उपाय नहीं सोचा जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और लोग पैनिक हो रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मितव्ययिता आह्वान पर अपने काफिले को कम किया है और सरकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने की घोषणा की है। मंत्रियों ने भी प्रतीकात्मक कदम उठाए, लेकिन निचले स्तर पर अफसरों से अभी काफी कुछ अमल कराना बाकी है। कुछ अफसरों ने साइकिल पर दफ्तर जाते हुए फोटो खिंचवाई है लेकिन जिनका घर दफ्तर से 25 किलोमीटर दूर हो, वह कैसे कर पाएगा।

इधर भाजपा के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल ने कहा है कि अधिकारियों को कार पूलिंग का निर्देश दिया जाए। हर रोज सैकड़ों गाडिय़ां 40-50 किमी राउंड ट्रिप करती हैं। यदि औसतन 10-12 किमी प्रति लीटर माइलेज मानें तो एक गाड़ी प्रतिदिन 5 लीटर ईंधन खपत करती है। हजारों वाहनों को जोडक़र देखें तो लाखों रुपये का ईंधन रोजाना बर्बाद हो रहा है।

वैसे समस्या की जड़ गहरी है। नया रायपुर में मंत्रालय, सचिवालय और अन्य सरकारी इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी पुराने रायपुर में ही रहते हैं। मंत्रियों का शिफ्ट होना हुआ, पर उनका स्टाफ और अफसर नहीं। आवासीय कॉलोनियों का विकास हुआ है, लेकिन आवंटन और रहना जरूरी नहीं किया। शाम होते ही नया रायपुर जगमगाती रोशनी के बीच घोस्ट सिटी बन जाती है। असल में पेट्रोल डीजल की खपत तब घटेगी जब आवंटित बंगलों, आवासों में अधिकारियों, कर्मचारियों को रहना अनिवार्य किया जाएगा। जिनको आवास नहीं मिले हैं, उन्हें जल्दी आवंटित किया जाना चाहिए। तब तक कार पूलिंग जरूरी करना चाहिए। जिन अफसरों को फिर भी अपनी गाड़ी से ही 50 किलोमीटर आना जाना हो, उनके इंधन और गाड़ी का खर्च सरकार मत उठाए। अधिकारियों, कर्मचारियों के फेडरेशन ने वर्क फ्रॉम होम का सुझाव दिया है, या कहें मांग रखी है। मगर, बहुत सी फाइलें अब भी डिजिटल नहीं हैं, सरकारी दफ्तरों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है जो कर्मचारी- अधिकारी से मिलकर ही संतुष्ट हो पाते हैं। पर, सप्ताह के कुछ दिनों के लिए लागू हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आजमाया जा सकता है कि किन कामों को घर से किया जा सकता है। इन सबके बीच, छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से नवा रायपुर, काम के लिए आने वालों की परेशानी कम नहीं हुई है। वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर इनकी संख्या और स्टापेज कम हैं। इनके लिए नि:शुल्क और रियायती बसें अधिक संख्या में होनी चाहिए। बैटरी चलित बसों का छत्तीसगढ़ के कई शहर इंतजार कर रहे हैं। घोषणा पूरी ही नहीं हुई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778941795hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15325&amp;path_article=7</guid><pubDate>16-May-2026 7:59 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 16 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15324&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15324&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778930483eewar_16_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15324&amp;path_article=1</guid><pubDate>16-May-2026 4:51 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 16 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15323&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15323&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778930373av-Kav_16_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15323&amp;path_article=2</guid><pubDate>16-May-2026 4:49 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : अगली पीढ़ी की बारी?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15322&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15322&amp;path_article=7 ]]></link><description>अगली पीढ़ी की बारी?

प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर चुनावी गतिविधियां शुरू हो रही हैं। चुनाव सीनियर कांग्रेस का नहीं, बल्कि युवक कांग्रेस के पदाधिकारियों का होना है। इसमें पार्टी के सीनियर नेता भी खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं। चर्चा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपनी पसंद के युवा चेहरे को बैठाने के लिए मंथन कर रहे हैं।

युवक कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष आकाश शर्मा और उनकी टीम का कार्यकाल खत्म हो रहा है। जल्द ही चुनाव प्रक्रिया शुरू होने वाली है। आकाश शर्मा भी निर्वाचन के जरिए ही अध्यक्ष बने थे। चर्चा है कि युवक कांग्रेस चुनाव को लेकर देवेन्द्र यादव खास दिलचस्पी ले रहे हैं। आकाश शर्मा को भी उनका करीबी माना जाता है।

सुनत हैं कि देवेंद्र यादव, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वर शरण सिंहदेव (आदी बाबा) को युवक कांग्रेस का चुनाव लड़ाने के लिए प्रयासरत हैं। चर्चा है कि इस सिलसिले में उन्होंने टीएस सिंहदेव से बातचीत भी की है। बताया जाता है कि सिंहदेव ने कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सहमति होने पर ही आदित्येश्वर शरण सिंहदेव को चुनाव लडऩे की अनुमति दी जाएगी। हालांकि भूपेश बघेल ने अब तक अपने इरादे साफ नहीं किए हैं। युवक कांग्रेस का चुनाव लडऩे के इच्छुक कई नेता उनसे मुलाकात कर रहे हैं।

इसी तरह नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत के पुत्र सूरज महंत को भी आगे लाने की कोशिशें चल रही हैं। पूरे घटनाक्रम पर महंत भी फिलहाल खामोश बताए जा रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य नेता पुत्र भी चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।

कमी नहीं फिर भी दिक्कत!



प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कमी का हल्ला है। सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ कर दिया है कि पेट्रोल-डीजल के स्टॉक में कोई कमी नहीं है। बावजूद इसके अफवाह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पेट्रोल-डीजल के लिए पंपों में गाडिय़ों की कतार देखी जा सकती है।

पेट्रोलियम कंपनियों का दावा है कि स्टॉक में कोई कमी नहीं है, तो सवाल उठ रहा है कि किल्लत क्यों है? पेट्रोल पंप डीलर्स कंपनियों पर तोहमत लगा रहे हैं। इन सबके बीच रायपुर कलेक्टर डॉ गौरव कुमार सिंह ने गुरुवार को बैठक रखी। बैठक में पेट्रोलियम कंपनियों और डीलर्स को आमने-सामने बिठाकर कमी पर चर्चा की गई। पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ किया कि स्टॉक में कमी नहीं है, जबकि डीलर्स ने कहा कि उन्हें मांग के अनुरूप पेट्रोल-डीजल उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।

कंपनी प्रतिनिधियों की तरफ से यह भी कहा गया कि शहर में दोपहर के समय टैंकर नहीं पहुंच पाते हैं। इस पर कलेक्टर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अब टैंकर 24 घंटे पहुंचेंगे। इसके लिए उन्होंने यातायात पुलिस को भी निर्देश दिए।

चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि अफवाह के चलते लोग अधिक मात्रा में पेट्रोल-डीजल खरीद रहे हैं और इस वजह से स्टॉक जल्दी खत्म हो रहा है। कलेक्टर ने कंपनियों और डीलर्स को सख्त हिदायत दी कि किसी तरह की किल्लत नहीं होनी चाहिए।

दीपावली भेंट में मानहानि की नोटिस



अब तक अमुमन मानहानि के दावे, केस और वकील की नोटिस दलीय नेताओं, बड़े बिजनेस मैन के बीच होते सुनते और पढ़ते रहे हैं। आज हम सरकारी कर्मचारियों के बीच मानहानि नोटिस और उसके असर की जानकारी दे रहे हैं। राज्य मंत्रालय में खानपान से जुड़े एक विभाग से ऐसी ही खबर गलियारों में सुनी जा रही है। बड़े स्टाफ वाले इस विभाग के कर्मचारी अलग अलग विभागों में तबादले कराने लगे हैं। दरअसल बात कुछ छमाह से चल रही है। दीपावली के समय सौजन्य भेंट का विवाद, इस स्तर तक पहुंच गया है।

विभाग के निगम, और उसके काम में हिस्सेदार ठेकेदारों ने दीपावली पर भेंट दिया था। कर्मचारी कहते हैं कि यह भेंट अकेले एक ही अधिकारी ने रख लिया। इस संदेह के पीछे छिपा संदेश साहब तक पहुंचा। वे परेशान कि उधो का लेना न माधव का देना। बेवजह बदनामी का तनाव अलग। काफी पड़ताल के बाद साहब ने उन कर्मचारियों की फेहरिस्त बनाई जो यह प्रचार कर रहे थे। फिर वकील से संपर्क, सलाह ली। फिर क्या था एक दिन सूचीबद्ध कर्मचारी के हाथ मानहानि की नोटिस पहुंची। ऐसी नोटिस अभी प्रचार में शामिल अन्य के लिए भी स्पीड पोस्ट हो चुकी है। बस इसी से घबराए दुष्प्रचारक विभाग से तबादला कराने में सक्रिय हो गए हैं। इनके तबादले से प्रभावित दूसरे कर्मचारियों ने तहकीकात की तो पूरा खुलासा हुआ। अब वे ही कहने लगे हैं कि प्रचार करो जब पूरे तथ्य हों। वर्ना एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना ही बेहतर होगा।

एआई से बनी अखबार की कतरन



सोशल मीडिया पर इन दिनों पुराने अखबारों की ऐसी तस्वीरें खूब साझा की जा रही है, जिनको पहली असली लगती है। तस्वीर में अंग्रेजी अखबार द हिंदू की हेडिंग और 1967 की तारीख दिखाई गई है। इसमें एक बच्चे को मगरमच्छ पकडऩे वाला बहादुर बच्चा बताया गया है, जबकि बाद में उसे छिपकली निकाला जाना दर्शाया गया है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन और उनके पुराने दावों से जोडक़र व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

यह तस्वीर एआई से तैयार की गई फर्जी सामग्री है। तस्वीर में कई ऐसी कमियां हैं, जिनसे इसकी वास्तविकता आप तुरंत पकड़ सकते हैं। सबसे पहले, अखबार के डिजाइन और फॉन्ट का संतुलन पुराने द हिंदू के वास्तविक संस्करणों से मेल नहीं खाता। हिंदी और अंग्रेजी टेक्स्ट की शैली अलग-अलग और अस्वाभाविक है। कई जगह अक्षरों का आकार असमान है तथा शब्दों के बीच की दूरी भी अनियमित है,

इसके अलावा खबर के भीतर प्रयुक्त भाषा भी कृत्रिम और हास्य-प्रधान है, जबकि उस दौर में समाचार लिखने की शैली अधिक औपचारिक होती थी। तस्वीर में छपी कुछ छोटी हेडिंग और टेक्स्ट धुंधले तथा अर्थहीन नजर आते हैं। फोटो और लेआउट में भी अस्वाभाविक चमक है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778846499ajeev-bhawan.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15322&amp;path_article=7</guid><pubDate>15-May-2026 5:31 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 15 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15321&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15321&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778844684av-Kav_15_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15321&amp;path_article=2</guid><pubDate>15-May-2026 5:01 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 15 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15320&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15320&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778844520eewar_15_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15320&amp;path_article=1</guid><pubDate>15-May-2026 4:58 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 14 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15319&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15319&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778765349eewar_14_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15319&amp;path_article=1</guid><pubDate>14-May-2026 6:59 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 14 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15318&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15318&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778765264av-Kav_14_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15318&amp;path_article=2</guid><pubDate>14-May-2026 6:57 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : सांसद-विधायक कार्यकर्ताओं संग बिताएंगे रात</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15317&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15317&amp;path_article=7 ]]></link><description>सांसद-विधायक कार्यकर्ताओं संग बिताएंगे रात

भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक गुरुवार को प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में आयोजित हुई। बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश विशेष रूप से मौजूद रहे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस भी मंच के बजाय आम सदस्यों के बीच बैठे नजर आए, जिसकी कार्यकर्ताओं के बीच काफी चर्चा रही।

कार्यसमिति में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में पार्टी की जीत पर चर्चा हुई तथा वहां प्रचार के लिए गए नेताओं को बधाई दी गई। इस दौरान शिव प्रकाश ने संगठन पदों को लेकर कार्यकर्ताओं को नसीहत देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को पद देना संभव नहीं है, लेकिन पार्टी के लिए निरंतर काम करते रहना चाहिए।

बैठक में जिला स्तर पर चिंतन शिविर आयोजित करने का फैसला भी लिया गया। इन शिविरों में सांसद, विधायक और संबंधित जिले के मंत्री शामिल होंगे। दो दिन तक जिला पदाधिकारी एक साथ रहकर संगठन, आगामी कार्यक्रमों, स्थानीय समस्याओं और आपसी विवादों पर मंथन करेंगे।

रायपुर जिले का चिंतन शिविर 23 और 24 मई को अग्रसेन धाम में प्रस्तावित है। इसमें सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल होंगे। खास बात यह रहेगी कि सांसद-विधायकों को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ रात्रि विश्राम करना होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन शिविरों से संगठन को लेकर क्या नए संकेत और फैसले सामने आते हैं।

टॉपर मॉडल का भय तोडऩे वाला रिजल्ट

बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।

इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।

दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।

नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।

दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।

इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।

दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।

नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।

दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।

श्रीनगर स्टेशन पर रुकी एक उम्र की यात्रा

पिछली बार आया था तो श्रीनगर तक रेल नहीं आई थी। इस बार श्रीनगर रेलवे स्टेशन को अपने कैमरे में सहेज कर साथ लेता आयाज् साथ में उसकी अनुभूति भी।

तस्वीर में बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार, 80 वर्षीय सतीश जायसवाल श्रीनगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं। सामने हिमालय की पहाडिय़ां हैं, ऊपर खुला आसमान और बीच में चमचमाती रेल पटरियां। सतीश के शब्द उस पीढ़ी की स्मृति है जिसने कश्मीर को कभी दूर, कठिन और लगभग दुरूह यात्रा की तरह देखा था। अभी इसी महीने कश्मीर रेल के जरिए देश के कोने-कोने से जुड़ रहा है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग या छत्तीसगढ़ के किसी छोटे शहर में बैठा एक साधारण यात्री अब यह सोच सकता है कि वह भी कुछ ही घंटों में श्रीनगर की वादियों तक पहुंच सकता है।

लगे हाथ इस नई सुविधा के बारे में आपको बताते चलें। जम्मू-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस शुरू हो चुकी है, दो ट्रेनें हैं। एक सुबह छूटती है दूसरी दोपहर में। शुरुआती दस दिनों में लगभग 45 हजार यात्रियों ने सफर किया। भीड़ इतनी है कि 20 कोच वाली दोनों ट्रेनें भी लगभग पूरी क्षमता से चल रही हैं।

इस ट्रेन से सफर करके लौटे एक पर्यटक का कहना है कि लंबी जोखिम सडक़ यात्रा भी नहीं करनी है, महंगी हवाई उड़ानों पर निर्भरता भी नहीं रही। जम्मूतवी से वंदे भारत ट्रेन लगभग पांच घंटे में यात्रियों को घाटी तक पहुंचा रही है। रास्ते में चेनाब और अंजी जैसे अद्भुत पुल मिलेंगे। लंबी सुरंगें और पहाड़ों के बीच रेल गुजरती है। मान लो कि यह यात्रा ही रोमांचक पर्यटन है।

कश्मीर हमेशा सुंदर था, लेकिन अब वहां तक पहुंचना भी सुंदर हो गया है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778760148hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15317&amp;path_article=7</guid><pubDate>14-May-2026 5:32 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15316&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15316&amp;path_article=7 ]]></link><description>लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत

छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सोमवार को बिलासपुर प्रवास के दौरान लगरा स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने आम नागरिकों की तरह अपनी ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी कराई। बिना किसी विशेष व्यवस्था के उन्होंने निर्धारित नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं और पांच वर्षों के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया।

दोपहर करीब दो बजे शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान डॉ. महंत ने अपनी बारी आने का इंतजार किया। इसके बाद उन्होंने फोटो खिंचवाने से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर तक की सभी जरूरी प्रक्रियाएं सामान्य आवेदक की तरह पूरी कीं। कुछ ही समय में उनका ड्राइविंग लाइसेंस अगले पांच साल के लिए रिन्यू हो गया।

काम पूरा होने के बाद उन्होंने आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों का सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सादगी और नियमों के पालन को लेकर चर्चा होती रही। डॉ. महंत ने अपने इस अनुभव को सोशल मीडिया पर भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि वे नियमों का पालन करें और अपने जरूरी दस्तावेज समय-समय पर अपडेट रखें। उन्होंने आरटीओ कार्यालय की व्यवस्था और कर्मचारियों के सहयोग की भी सराहना की।

कांग्रेस में बदलाव अगस्त से पहले या...

प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। इसी बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया है। वह बिलाईगढ़ गए थे और फिर रायगढ़ पहुंचकर कोयला खदान प्रभावितों से भी मिले। वह पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के घर जाकर मेल-मुलाकात भी कर रहे हैं। सिंहदेव की सक्रियता को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है। वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी रुचि प्रदेश अध्यक्ष बनने में है।

दीपक बैज का कार्यकाल अगस्त में खत्म हो रहा है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें बदला जा सकता है। सिंहदेव के दौरों को इससे जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा है कि सिंहदेव यूं ही सक्रिय नहीं हुए हैं। करीब दो माह पहले उनकी राहुल गांधी से डेढ़ घंटे तक अकेले में चर्चा हुई थी। इसके बाद ही वह ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे।

हालांकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पूर्व सीएम की दखल के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बालोद विधायक संगीता सिन्हा की नियुक्ति हुई। जबकि टीएस सिंहदेव ने पूर्व विधायक छन्नी साहू का नाम आगे बढ़ाया था। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व सीएम की ओर से अभी कोई नया नाम सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि वह पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। फिलहाल नई नियुक्ति तक कांग्रेस में खींचतान जारी रहने के आसार हैं।

घोटाले जब लोक अदालत जाने लगें...



सन् 2003 के सीजी पीएससी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुलह की पहल ने वंचित याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पुराने जख्म फिर कुरेद दिए हैं। यह याद रखना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पहले लोक सेवा आयोग के खिलाफ जो फैसला दिया था, उसके पीछे साफ-साफ भर्ती घोटाला पाया जाना था। अदालत में यह साबित हुआ था कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई, अंकों में हेराफेरी हुई, अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और पात्र उम्मीदवारों को या तो चयन से बाहर कर दिया गया या फिर छोटे पदों पर समायोजित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने स्केलिंग प्रक्रिया को दोबारा निर्धारित करते हुए पूरी चयन सूची नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन इस फैसले पर अमल हो पाता, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से उन अभ्यर्थियों को स्थगन मिल गया, जिनकी स्थिति नई चयन सूची बनने के बाद प्रभावित हो रही थी। कई लोगों को निचले पदों पर जाना पड़ता या चयन सूची से बाहर होना पड़ता। सन् 2007 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक अंतिम फैसला नहीं आ सका है।

आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर उस समय सवाल उठे थे, वे सवाल आज भी कायम हैं। कई अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बन चुके हैं। कुछ जिलों में कलेक्टर हैं तो कुछ मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी, जो खुद को वंचित मानते हैं, छोटे पदों पर वर्षों से सेवा कर रहे हैं। उनकी सेवा अवधि अब इतनी हो चुकी है कि वे चाहें तो वीआरएस लेकर पेंशन के हकदार बन सकते हैं।

ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से लोक अदालत का सुझाव सामने आया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है, लोक सेवा आयोग ने की है या फिर किसी पक्षकार ने इसका सुझाव दिया है। लेकिन मूल याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उनका कहना है किहमें सुलह नहीं, न्याय चाहिए।

दिलचस्प बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में थी और यह लगभग तय माना जा रहा था कि फैसला सीजी पीएससी के खिलाफ जाएगा, तब भी आयोग की ओर से समझौते की पेशकश की गई थी। जिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे डिप्टी कलेक्टर पद के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें याचिका वापस लेने की शर्त पर वही पद देने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उस समय भी याचिकाकर्ताओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्हें कथित भ्रष्ट चयन प्रक्रिया ने बाहर कर दिया।

वैसे, लोक अदालत में भी न्याय ही होता है। वहां दोनों पक्षों की सहमति से समाधान निकलता है और तभी आदेश पारित होता है जब सभी पक्ष संतुष्ट हों। लेकिन यदि इस मामले में लोक अदालत के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाता है, तो उसकी शक्ल क्या होगी?

एक संभावना यह हो सकती है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा की बची हुई अवधि के लिए वही अवसर दिया जाए, जो हाईकोर्ट के फैसले से पहले प्रस्तावित था। इसके लिए राज्य शासन और लोक सेवा आयोग दोनों की सहमति जरूरी होगी।

दूसरा सवाल उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों को लेकर है, जिन्होंने कथित रूप से गलत आधार पर चयन किया। क्या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की बात भी समझौते का हिस्सा होगी? अब तक वे कानून के शिकंजे से लगभग बाहर ही रहे हैं।

सबसे जटिल प्रश्न उन अधिकारियों को लेकर है, जो वर्षों से कथित गलत चयन के आधार पर सेवा लाभ लेते रहे हैं। क्या उन्हें पद से हटाया जाएगा? क्या पदावनत किया जाएगा? व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन और जोखिम भरा कदम होगा। संभव है कि लोक अदालत में वे पक्षकार ही न हों, और यदि कोई प्रतिकूल निर्णय हुआ तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

ऐसे में समझौते का स्वरूप शायद कुछ ऐसा हो सकता है, अतीत को पीछे छोडक़र भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करो। जिन अभ्यर्थियों को पीडि़त माना जा रहा है, उनकी सेवा के अभी भी कुछ वर्ष शेष हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर ले लिया जाए। लेकिन क्या उन्हें एरियर सहित पिछला वेतन, वरिष्ठता और पेंशन गणना का लाभ भी मिलेगा? स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।

एक बड़ा सवाल और भी खड़ा होता है, क्या सरकारी भर्तियों में हुए घोटालों का समाधान लोक अदालत के जरिए किया जा सकता है? यदि सीजी पीएससी-2003 मामले में लोक अदालत कोई रास्ता निकालने में सफल होती है, तो फिर क्या सीजी पीएससी-2021 में हुए घोटाले के लिए भी ऐसे ही समाधान का रास्ता निकल जाएगा?


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778674070ahant-RTO-office.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15316&amp;path_article=7</guid><pubDate>13-May-2026 5:37 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15315&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15315&amp;path_article=7 ]]></link><description>मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?

ईडी ने अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की जांच तेज कर दी है। ताजा खबर यह है कि जांच एजेंसी ने बैंक के आधा दर्जन ऐसे खातों का पता लगाया है, जिनमें करोड़ों का लेनदेन हुआ है। इन खातों का ब्यौरा मांगा गया है। यह भी जानकारी सामने आई है कि बैंक से जुड़ी शाखाओं में वर्ष 2013-14 से गड़बड़ी शुरू हो गई थी और करीब 10 साल बाद इसका खुलासा हुआ।

बताते हैं कि बैंक में करोड़ों की गड़बड़ी की जानकारी विभाग के आला अफसरों को पहले से थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस ने धोखाधड़ी के प्रकरण में बैंक अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, तब जाकर राज्य स्तरीय जांच टीम बनाई गई। यह टीम कई बार अंबिकापुर गई, लेकिन गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी नहीं जुटा पाई। अब ईडी ने जांच शुरू की है, तो राज्य स्तरीय जांच टीम से भी पूछताछ हो सकती है।

भारतमाला परियोजना में राज्य की एजेंसी ने पहले छोटी मछलियों पर ही कार्रवाई की थी, लेकिन ईडी ने कई बड़े लोगों को भी घेरे में लिया, जो अब तक जांच से बचे रहे थे। हालांकि बैंक घोटाले में अभी तक ईडी की ओर से कोई नई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन चर्चा है कि कई प्रभावशाली लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।

छत्तीसगढ़ की गलती केरल में दोहराती कांग्रेस

पांच राज्यों के नतीजे आए एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके, शपथ-ग्रहण भी हो चुका, लेकिन एक राज्य, केरल जहां कांग्रेस को सरकार बनानी है, अभी तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल नहीं हुआ है। वैसे तो वहां के विधायक दल ने कांग्रेस हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया है, पर विधायकों के तीन गुट हैं, जो अलग-अलग नामों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि समर्थक शक्ति प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अतीत से पता चलता है कि ऐसे मामले में भारतीय जनता पार्टी के उलट कांग्रेस हाईकमान मजबूती से और जल्दी फैसला नहीं ले पाता। सन् 2018 में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई तो पार्टी नेतृत्व के सामने यही संकट था। अंत में दोनों दावेदारों को ढाई-ढाई साल का टर्म देने की बात हुई। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया था और सिंहदेव अपने टर्म के लिए हाईकमान के फैसले की प्रतीक्षा करते रहे। बघेल खेमे को दिल्ली में विधायकों की परेड कर बताना पड़ा कि बहुमत उनके साथ है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डी. शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल का समझौता हुआ, प्रचारित था, पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं है और शिवकुमार के समर्थकों में असंतोष देखा जा रहा है। केरल में अजीब स्थिति है। यहां ढाई-ढाई साल की सांत्वना से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यहां तीन दावेदार हैं। पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे बीडी सतीसन, वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आईयूएमएल ने सतीसन के नाम का समर्थन किया है, लेकिन उन्हें वेणुगोपाल के नाम पर आपत्ति है। उसका कहना है कि उन्होंने तो विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस समय वे सांसद हैं। मगर, दिलचस्प यह है कि केरल में अधिकांश टिकट वेणुगोपाल ने ही फाइनल किए हैं, और 40 से अधिक विधायक उन्हें सीएम बनाना चाहते हैं। कांग्रेस यहां 63 सीटों पर विजयी रही, गठबंधन के साथ उसे 102 सीटें मिली हैं।

याद कीजिए सन् 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया। सीएम बनने की कतार में जिन नामों की चर्चा थी, उनको भी निराश होना पड़ा। उसके पहले के लोकसभा चुनाव में सारे सीटिंग सांसदों की टिकट काट दिया था। पर, कांग्रेस के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार होने के दौरान छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई ने एक दूसरे को निपटा दिया। ऐसा ही कुछ ढुलमुल रवैया कांग्रेस हाईकमान का मध्यप्रदेश और राजस्थान के मामले में देखा गया। मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे कर दिया, जबकि वे सीएम के दावेदार थे। उनके समर्थक विधायकों ने मिलकर सरकार ही गिरा दी। सन् 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक झटके में शिवराज सिंह चौहान के टर्म को समाप्त कर दिया, मगर सिंधिया को भी मौका नहीं दिया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बीच में तो नहीं गिरी, पर छत्तीसगढ़ की तरह 2023 के चुनाव में गिर गई। यहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जबरदस्त खींचतान है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मामले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, अभी अगला विधानसभा चुनाव दूर है। दरअसल, कांग्रेस के पास यह समस्या तब से है, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है। प्रदेश के असंतुष्ट नेताओं को वैकल्पिक किसी बड़े ओहदे में बिठा देने का विकल्प नहीं है।

जब रायपुर की बैलगाडिय़ों में भरती थी हवा



एक ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद कहानी समझे ( गोकुल सोनी )

आज मैं आपको रायपुर का एक ऐसा किस्सा सुनाना चाहता हूं, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद सुनकर हंस भी दे और हैरान भी हो जाए।

जब महापौर जीप में बैठकर करते थे शहर का दौरा...........

सत्तर के दशक की बात है। उन दिनों तरुण दादा एक बार पहले भी रायपुर के महापौर रह चुके थे। शायद तब महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का हुआ करता था। उसी दौर में आर.एन. मूर्ति जी और स्वरूपचंद जैन जी भी महापौर बने थे। उस समय नगर निगम के पास एक पेट्रोल से चलने वाली सफेद रंग की जीप हुआ करती थी। तरुण दादा उसी जीप में सामने बैठकर पूरे शहर का दौरा किया करते थे।

आज की तरह न बड़ी-बड़ी गाडिय़ों का काफिला होता था और न चमक-दमक। शहर छोटा था, लोग सीधे थे और काम भी धीरे मगर टिकाऊ होता था।

जब सडक़ बनाना किसी तपस्या से कम नहीं था..........

आज तो रातों-रात मशीनें आकर सडक़ बना देती हैं। लेकिन उस समय एक किलोमीटर सडक़ बनने में तीन-चार दिन लग जाते थे।

सडक़ किनारे भ_ी बनाई जाती थी। उसमें लकडिय़ां जलती रहती थीं। ऊपर डामर के खाली ड्रम को काटकर बड़ी कढ़ाई जैसी बनाई जाती थी, जिसमें डामर पिघलाया जाता था।

फिर मजदूर रेत, गिट्टी और डामर का घोल तैयार करते और हाथों से सडक़ बिछाते थे। बाद में स्टीम इंजन वाली भारी-भरकम रोड रोलर उसे दबाकर समतल करती थी। उस दौर में सडक़ बनाना केवल काम नहीं, मेहनत और धैर्य का इम्तिहान था।

बैलगाडिय़ां बनीं नई समस्या............

चूंकि सडक़ें इतनी मेहनत से बनती थीं, इसलिए उनकी देखरेख भी बहुत जरूरी मानी जाती थी। उसी समय शहर में बड़ी संख्या में बैलगाडिय़ां चलती थीं। खासकर गुढियारी के थोक बाजार से सामान दुकानों तक पहुंचाने के लिए हमाल और व्यापारी बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करते थे।

उन बैलगाडिय़ों के पहियों पर मोटे लोहे का पट्टा चढ़ा होता था, जिसे छत्तीसगढ़ी में च्च्बाटज्ज् कहते हैं। यही लोहे की बाट नई डामर वाली सडक़ों को जल्दी खराब कर देती थी। अधिकारियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।

बैलगाड़ी बंद करें या लोगों की रोजी बचायें ?.............

कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि शहर में बैलगाडिय़ों के चलने पर रोक लगा दी जाए। लेकिन परेशानी यह थी कि सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी उन्हीं बैलगाडिय़ों पर टिकी थी। उन्हें बंद करना आसान नहीं था।

फिर किसी ने एक अनोखा सुझाव दिया  क्यों न बैलगाड़ी के पुराने लकड़ी और लोहे वाले पहियों की जगह ट्रक के टायर लगा दिए जाएं ? बस, यहीं से रायपुर में एक नया प्रयोग शुरू हुआ।

नगर निगम के सामने लग गई भीड़..........

नगर निगम से आदेश निकला कि जिसके पास भी बैलगाड़ी है, वह अपना पंजीयन कराए। फिर क्या था, नगर निगम कार्यालय के सामने बैलगाड़ी वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने गाड़ों का रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचे।

धीरे-धीरे पुरानी लोहे की बाट वाले पहिए हटाए गए और उनकी जगह ट्रक के टायर वाले पहिए लगाए जाने लगे। उस समय रायपुर की सडक़ों पर बैलगाड़ी और ट्रक के टायर का यह अनोखा मेल लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया था।

जब बैलगाड़ी में भी भरती थी हवा..........

अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए, एक तरफ बैलगाड़ी खड़ी है, सामने बैल बंधे हैं और दूसरी तरफ पंचर दुकान वाला मशीन से उसके टायर में हवा भर रहा है। आज यह सुनने में सामान्य लगेगा, लेकिन उस समय यह दृश्य इतना अनोखा था कि लोग रुक-रुककर देखते थे।

जब मैं नया-नया फोटो जर्नलिस्ट बना था, तब मैंने पहली बार ऐसा दृश्य देखा। देखा तो पहले भी था तब एक फोटोजर्नलिसट का नजरिया नहीं था। मुझे वह इतना अलग लगा कि मैंने तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली। बाद में वह फोटो नवभारत अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।

धीरे-धीरे खत्म हो गया वह दौर............

फिर समय बदला। शहर में तीन पहिया ऑटो आये, मेटाडोर आये और धीरे-धीरे ट्रक के टायर वाली बैलगाडिय़ां सडक़ों से गायब होने लगीं। बताते हैं कि कुछ साल पहले तक कन्हैया साहू नाम के एक गाड़ीवान ऐसी बैलगाड़ी चलाते दिखाई दे जाते थे। लेकिन उनके निधन के बाद रायपुर से यह दृश्य भी हमेशा के लिए खत्म हो गया।

अब केवल यादों में बची

हैं वे बैलगाडिय़ां..........

आज की पीढ़ी शायद यकीन भी न करे कि कभी रायपुर में ऐसी बैलगाडिय़ां चलती थीं जिनमें ट्रक के टायर लगे होते थे और पंचर दुकानों पर उनमें हवा भरी जाती थी। लेकिन यही तो पुराने रायपुर की खूबसूरती थी। यह शहर हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा किस्सा छुपाकर बैठा है, जिसे सुनते ही पुराना दौर आंखों के सामने चलती तस्वीर की तरह जीवंत हो उठता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778588034hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15315&amp;path_article=7</guid><pubDate>12-May-2026 5:43 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 12 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15314&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15314&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778581570av-Kav_12_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15314&amp;path_article=2</guid><pubDate>12-May-2026 3:56 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15313&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15313&amp;path_article=7 ]]></link><description>पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर

गरियाबंद के माडागांव के समाधान शिविर में पीएम आवास के लिए एक कमार दंपत्ति ने जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैर पकडक़र गुहार लगाई, तो हडक़ंप मच गया। इसकी खबर सोशल मीडिया के जरिए सीएम हाउस तक पहुंची, तो मामले को संज्ञान में लिया गया। कमार जनजाति राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं। जब कमार दंपत्ति ने प्रखर चंद्राकर के पैर पकड़े, तो वो हड़बड़ा गए। प्रखर धमतरी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने तुरंत इसकी पड़ताल करवाई। यह पता चला कि परिवार का नाम पूर्व के आवास सर्वे में शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि वे लंबे समय तक उड़ीसा में निवासरत थे।

यह बात सामने आई, कि वर्ष 2011, 2018 और 2024 के सर्वेक्षण के दौरान भी परिवार गांव में मौजूद नहीं था। हाल ही में परिवार के छत्तीसगढ़ लौटने के बाद पीएम जनमन योजना के तहत उनका सर्वे पूरा कर लिया गया है और जल्द ही आवास स्वीकृत करने का भरोसा दिलाया गया।

चूंकि सीएम हाउस ने मामले को संज्ञान में लिया, तो प्रशासन ने समाधान शिविर में परिवार का राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी बना दिए। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अफसरों ने परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। परिवार को तुरंत राहत देने की कोशिश की गई।

व्यापारी कल्याण बोर्ड को लेकर हलचल

पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब प्रदेश के निगम-मंडलों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की चर्चा तेज हो गई। इन्हीं में व्यापारी कल्याण बोर्ड के गठन की भी तैयारी है। भाजपा के संकल्प पत्र में व्यापारी वर्ग के लिए बोर्ड के गठन का वादा किया गया था। अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए व्यापारी नेताओं में होड़ मची है।

भाजपा के कई व्यापारी नेता अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में उन्हें भी बोर्ड अध्यक्ष के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, पार्टी के दो पूर्व विधायक लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी की भी दावेदारी है। दोनों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली थी।

यही नहीं, कई और व्यापारी नेताओं के नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें सुभाष अग्रवाल, और सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा का नाम भी लिया जा रहा है। बरलोटा चैम्बर के अलग-अलग पदों पर रहे हैं। इन सबके बीच निगम मंडलों में उपाध्यक्ष, और संचालक मंडल के सदस्यों के पदों पर भी नियुक्तियां हो सकती हैं। ऐसे करीब सौ से अधिक पद रिक्त हैं जिन पर नियुक्तियां होनी है। नामों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। देखना है सूची कब तक जारी होती है।

स्टेशनों से मिटेंगे अंग्रेजों के निशां मगर...

एक तरफ सरकार घर घर से ऐतिहासिक पांडुलिपियां, और सनातनी प्रतीक चिन्हों के संग्रह का देशव्यापी अभियान छेड़े हुए है और दूसरी ओर

मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के रखे गए नाम बदलने, उनके बनाए गए भवनों को तोडऩे का सिलसिला जारी रखे हुए है। राजभवन को लोक भवन किया जा चुका है तो अब सिविल लाइन बदलने वाला है। इस श्रृंखला में रेलवे ने भी अपने कदम बढ़ाएं हैं। वह भी मोस्ट अर्जेंटलि।

रेलवे बोर्ड ने देशभर के सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल के बीएनआर (बंगाल नागपुर रेलवे)रेलवे के उन तमाम प्रतीकों, प्रथाओं और अवशेषों को हटा दिया जाए, जो गुलामी की याद दिलाते हैं। इसके बाद से रेलवे का हर छोटा- बड़ा कर्मचारी -अधिकारी निशां ढूंढने में जुट गया है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन के रेलवे स्टेशनों में वैसे तो ऐसे निशां नहीं के बराबर हैं। जो है उसे हटाने के लिए तोड़ा जाना होगा। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर स्टेशन भवन की। यह स्टेशन बिल्डिंग लगभग 135 से 137 साल पुरानी है, जिसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान 1889-1890 में हुआ था। कुछ इतना ही नागपुर स्टेशन भी इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन भी बिलासपुर जोन में आता है। पूर्व के वर्षों में इन पुरानी इमारत को अभी भी एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की भी योजना रेलवे ने बनाई थी। अब तोडऩे का तो नहीं अंग्रेजों की यादें मिटाने का आदेश आया है। निकट भविष्य में तोड़ा नहीं जाता है तो अमृत भारत स्टेशन योजना में स्वरूप बदला जाएगा। रायपुर स्टेशन में भी प्लेटफार्म नंबर एक के दाहिने सिरे में रेल डाक दफ्तर के पास अंग्रेज़ों का बनाया एक छोटा सा केबिन हुआ करता था।जो रेल मंडल बनने के बाद प्लेटफॉर्म विस्तार में तोड़ दिया गया था। इसके अलावा यहां कोई निशान बाकी नहीं रह गए हैं। अब यह सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि निशां मिटाने के बाद अफसरों से अंग्रेजियत मिट पाएगी। इससे सहमत, असहमत होकर रेलवे बोर्ड के इस आदेश की जानकारी शेयर करने वाले एक अफसर ने कहा कि रेलवे अब ब्रिटिश विरासत के बोझ से मुक्त होकर विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।

सरकारी छात्रावास का ऐसा प्रचार

सरकारी मदद से चलने वाले संस्थानों का इस तरह का प्रचार कम ही देखने को मिलता है। बिलासपुर के आदिवासी विकास विभाग ने अपने छात्रावासों में दाखिले का रंग बिरंगा पर्चा कराया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि छात्रावासों में साफ-सुथरा भवन, लगातार बिजली, बिस्तर की पूरी व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अलग कमरा, अच्छा खाना, खेलकूद, योग, संगीत और कला जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी मुफ्त मिलेगा।

इतना ही नहीं, पर्चों में अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं, ताकि छात्र-छात्राएं सीधे संपर्क कर प्रवेश ले सकें। अच्छी पहल लगती है। अगर सचमुच छात्रावासों में ऐसी सुविधाएं मिलें, तो बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह राहत की बात होगी। कौन पालक नहीं चाहेगा, यहां उनके बच्चों को मौका मिल जाए। फिर, अगर कोई कमी भी रही, तो छात्र सीधे शिकायत भी कर सकेंगे, क्योंकि विभाग ने खुद इन सुविधाओं का वादा किया है।

लेकिन इस पूरे प्रचार का दूसरा मतलब भी निकल जाता है। सवाल है कि क्या सरकारी छात्रावासों में अब पर्याप्त संख्या में छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों की तरह आदिवासी छात्रावासों में भी बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। कल इनको भी बंद नहीं करना पड़ जाएगा?

याद कीजिए, पिछले दो साल में कई सरकारी स्कूल- जिनमें शहरी स्कूल, आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूल भी थे-यह कहकर बंद कर दिए गए कि वहां बच्चों की संख्या कम हो गई है। यदि सरकारी स्कूल भी इसी तरह लोगों को बुलाते नजर आते, हमारे यहां आइए, अच्छे शिक्षक हैं, बढिय़ा भवन है, खेल का मैदान है, अच्छी पढ़ाई होती है, तो शायद उनको बंद करने की नौबत नहीं आती।

पुराना वीडियो, नया हंगामा

एमसीबी जिले के कांग्रेस नेता और चिरमिरी के पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बना है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो। वीडियो में वे सडक़ पर कार की बोनट पर केक काटते नजर आ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे वीडियो सामने आते ही पुलिस तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है, खासकर तब से जब हाईकोर्ट ने सडक़ पर केक काटने और सार्वजनिक जगहों पर हुड़दंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

लेकिन इस मामले में कहानी थोड़ी अलग है। डॉ. जायसवाल खुद थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि वायरल किया जा रहा वीडियो नया नहीं, बल्कि साल 2021 का है। इसे हाल का बताकर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तारीख का वीडियो बताया जा रहा है, उस दिन वे शिर्डी में थे, जिसके सबूत हैं उनके पास।

डॉ. जायसवाल का तर्क है कि सडक़ पर केक काटने जैसे मामलों पर सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश हाईकोर्ट ने साल 2025 में दिए। अदालत के निर्देश आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया।

हो सकता है उनका स्पष्टीकरण सही हो। उन्होंने भी खुद मान लिया है कि वीडियो 2021 का है। उस समय वे विधायक थे और संभव है कि समर्थकों के उत्साह में ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बने हों।

मगर, यह भी याद रखना चाहिए कि सडक़ पर इस तरह आयोजन करना 2025 से पहले भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन था। ट्रैफिक बाधित करना, सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति कार्यक्रम करना और शांति भंग करना, इन सबको लेकर कानून तब से मौजूद थे। फर्क सिर्फ इतना है कि बाद में जब पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के कई मामलों में कार्रवाई नहीं की, तब हाईकोर्ट को सख्त टिप्पणी कर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नसीहत दी गई।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778502362hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15313&amp;path_article=7</guid><pubDate>11-May-2026 5:56 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 11 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15312&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15312&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778497483eewar_11_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15312&amp;path_article=1</guid><pubDate>11-May-2026 4:34 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 11 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15311&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15311&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778497345av-Kav_11_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15311&amp;path_article=2</guid><pubDate>11-May-2026 4:32 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : तारीफ और महत्व</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15310&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15310&amp;path_article=7 ]]></link><description>तारीफ और महत्व

पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा खेमे में भी उत्साह का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा शनिवार को कोलकाता पहुंचे और नए सीएम सुवेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए।

समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। मंच पर विजय शर्मा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ठीक पीछे खड़े नजर आए। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने तंज कसते हुए पोस्ट किया कि बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले गृहमंत्री को मंच पर कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, पीएसओ की जगह खड़े हैं।

इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया। भाजपा समर्थकों ने पलटवार करते हुए लिखा कि बड़े नेताओं के भरोसेमंद लोग अक्सर मंच के पीछे रहकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तस्वीरों से ज्यादा अहमियत भूमिका की होती है।

इसी बीच विजय शर्मा की ओर से जारी एक वीडियो ने चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में सीएम विष्णुदेव साय, अरुण साव और विजय शर्मा, सुवेन्दु अधिकारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई देते नजर आ रहे हैं। इस दौरान सुवेन्दु अधिकारी, विजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं कि विजय ने नामांकन रैली में खूब मेहनत की है।

अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि जब मेहनत की खुलकर सराहना हो रही हो, तब मंच पर कौन बैठा और कौन खड़ा रहा, यह बहस ज्यादा मायने नहीं रखती।

ऑक्सीजन के जंगल पर विकास की कुल्हाड़ी

नवा रायपुर जाने के रास्ते के माना-तूता इलाके में फैला करीब चालीस-पैंतालीस बरस पुराना जंगल इन दिनों बेचैन है। जिन दरख्तों ने बरसों तक इस शहर को सांसें दीं, तपती हवाओं को थामा, मिट्टी को जिंदा रखा और परिंदों को आशियाना दिया, आज उन पर कुल्हाडिय़ां चल रही हैं। वजह है सरकार का महत्वाकांक्षी चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी और ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर प्रोजेक्ट। इसके लिए तकरीबन सौ एकड़ वन भूमि को विकास के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है।

स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक डेढ़ सौ से दो सौ पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में लगभग पांच हज़ार और पेड़ों को गिराने की तैयारी है। रायपुर और नवा रायपुर के बीच मौजूद यह जंगल केवल हरियाली का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे शहर का ऑक्सीजन जोन माना जा सकता है। शहर जिस तेजी से सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा है, उस दौर में यह वन इलाका एक नेमत की तरह बचा हुआ है।

सरकार का कहना है कि चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ को मूवी प्रोडक्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनाएगी। परियोजना में अत्याधुनिक स्टूडियो, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जैसे सेट, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, होटल, कन्वेंशन सेंटर, मल्टीप्लेक्स और व्यापारिक ढांचे को विकसित किए जाने की योजना है। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को रोजगार और नए मौके मिलेंगे।

अब यहीं पर जो दूसरी परियोजना लाई जा चुकी है , वह है- ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर। उसका भी हिसाब छोटा-मोटा नहीं है। इस परियोजना को फिल्म निर्माण वाली चित्रोत्पला परियोजना से ही जोड़ा गया है। पर्यटन, संस्कृति और इनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों का विकास किया जाएगा।

दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 95 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। छत्तीसगढ़ सरकार को स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट, डेवलपमेंट ऑफ ग्लोबल लेवल ऑइकॉनिक टूरिज्म सेंटर्स योजना के तहत वित्तीय सहायता मिली है। चित्रोत्पला के लिए करीब 96 करोड़ और कन्वेंशन सेंटर के लिए 52 करोड़ की मदद केंद्र ने की है। हमारे आपके टैक्स की इतनी रकम खर्च होने के बावजूद यह पीपीपी, यानि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप मॉडल में है। पीपीपी वाले लोग इसे तैयार कर रहे हैं और यही लोग उन ग्रामीणों को धमका रहे हैं, जो जंगल काटने के विरोध में उतरे हैं। कह रहे हैं, जंगल को बर्बाद करने की हमको सरकार से मंजूरी मिली हुई है। नवा रायपुर में कितनी ही खाली जमीन पड़ी हुई है, वहां क्यों नहीं एलॉट किया?

छागल से अनजान पीढ़ी

इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे छागल कहते थे। 4-5 दशक पहले ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था, और न कोई कैम्पर थे न मिल्टन की बोतलें थीं। गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था। गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था, जिसका सिरा एक और बोतल के मुंह जैसा होता था और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन, बस,जीप के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे,बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के अंदर भरे पानी को ठंडा करती थी। वो प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी। यह हमारे पूर्वजों की पानी की व्यवस्था थी। सबसे बड़ी बात यह है अगर रास्ते में किसी राहगीर ने छागल देखकर ठंडा पानी पीने के लिए मांग लिया तो कोई उसे मना नहीं करता था क्योंकि भीषण गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना ईश्वर की आज्ञा होती है। पानी खरीदा जा सकता है या बेचा जा सकता है-यह कल्पना भी नहीं थी। अब 20 रूपए में एक लीटर पानी खरीदने वाली पीढ़ी छागल को नहीं जानती। मल्टिनैशनल वाटर कंपनियों ने अपने कारोबार के लिए छागल के पानी को सेहत के लिए नुकसानदायक जो बता रखा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778419587hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15310&amp;path_article=7</guid><pubDate>10-May-2026 6:56 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 10 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15309&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15309&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778409296av-Kav_10_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15309&amp;path_article=2</guid><pubDate>10-May-2026 4:04 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 10 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15308&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15308&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778409169eewar_10_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15308&amp;path_article=1</guid><pubDate>10-May-2026 4:02 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : आईबी में गए आंजनेय वार्ष्णेय</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15307&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15307&amp;path_article=7 ]]></link><description>आईबी में गए आंजनेय वार्ष्णेय

छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अधिकारी आंजनेय वाष्र्णेय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। वर्ष-2018 बैच के आईपीएस वाष्र्णेयकी पोस्टिंग इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में हुई है। वे हाल तक सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी के रूप में पदस्थ थे और शुक्रवार को उन्हें रिलीव कर दिया गया।

आंजनेय वाष्र्णेय इससे पहले बीजापुर और धमतरी जिले के एसपी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद राज्य पुलिस महकमे में सीमित स्तर पर फेरबदल की चर्चा तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि कोंडागांव जिले में भी एसपी का पद फिलहाल खाली चल रहा है। वहां एएसपी को एसपी का प्रभार दिया गया है, जबकि एसपी पंकज चंद्रा प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद गए हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कुछ जिलों के एसपी बदलने की संभावना जताई जा रही है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर जयदीप सिंह पहले ही आईबी में सेवाएं दे रहे हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778333834hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15307&amp;path_article=7</guid><pubDate>09-May-2026 7:07 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 9 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15306&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15306&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778326085av-Kav_9_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15306&amp;path_article=2</guid><pubDate>09-May-2026 4:58 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 9 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15305&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15305&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778326000eewar_09_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15305&amp;path_article=1</guid><pubDate>09-May-2026 4:56 PM</pubDate></item><item><title>सोशल मीडिया के मजे</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15304&amp;path_article=10</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15304&amp;path_article=10 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778307584ocial_media_par_maj.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15304&amp;path_article=10</guid><pubDate>09-May-2026 11:49 AM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15303&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15303&amp;path_article=7 ]]></link><description>धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?

छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन जैसे ही चालू हुआ, शराब की दुकानों का माल खत्म हो गया। लोग भटक रहे हैं। बंधु, वित्तीय वर्ष बदल चुका है। अब इस मौके पर अफसरों ने सोचा नहीं कि ये शादी का भी सीजन है। बड़ी संख्या में बाराती भटक रहे हैं, चेहरे उतरे हुए हैं-क्या खाक डांस करेंगे।

सुशासन में शराब न मिले, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उन शराब प्रेमी रसूखदारों को छोड़ दें, जिनके पास अनाप-शनाप कमाई हैं, मगर आम जनता की हालत को महसूस करिये। परिवार में कलह का, हिंसा का, सडक़ों पर उत्पात का, सडक़ दुर्घटनाओं का कारण यही शराब बनती है।

इन दिनों अंग्रेजी के जान-पहचान वाले ब्रांड की केवल बोतल मिल रही है, लिटिल गायब है। लोग बार्टर करके खरीद रहे हैं, चार लोग मिलकर पौवा-पौवा बांट रहे हैं। देसी की तो बात ही छोड़ दीजिए, शटर गिरा हुआ है। अकेले रायपुर में रोजाना साढ़े 12 हजार पेटी का नुकसान। पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हर रोज 180 हजार पौवा। निर्माताओं और सरकार को मिलाकर रोजाना 50 करोड़ से ज्यादा की क्षत्ति।

सुशासन में कोई घोषित योजना नहीं थी कि शराब की किल्लत पैदा की जाएगी, मगर सुशासन दिख रहा है।

इस हालात को देखते हुए यह तो कह ही सकते हैं कि व्यक्ति परिस्थितिजीवी होता है। शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग जरूर इधर-उधर देसी-महुआ तलाश करते हुए भटकेंगे, बाकी ज्यादातर लोग घर में पत्नी और बच्चों के साथ दाल रोटी खाएंगे। शराब से बचे पैसे का बढिय़ा सा सप्लीमेंट खाना- चिकन, अंडा, आमलेट, चॉकलेट, आइसक्रीम वगैरह घर लेकर जाएंगे।

अब, असल में शराब की किल्लत क्यों खड़ी हुई, उसे समझ लेते हैं। सुशासन वगैरह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह नई आबकारी नीति 2026-27 का हिस्सा है। आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन ने इसे आर्थिक दक्षता और व्यवस्था में सुधार का कदम बताया है। प्लास्टिक बोतल अपनाने की वजह यह बताई गई है कि इससे कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकेगा। परिवहन के दौरान लोड कम पड़ेगा, तो भी खर्च कम होगा- क्योंकि प्लास्टिक बोतल हल्की होंगीं। बाकी राज्यों से तस्करी के जरिये जो दारू आती है, वह कांच की बोतलों में आती है, इससे सच का तुरंत पता चल जाएगा। दावा किया गया है कि इससे मिलावट के मामले भी कम मिलेंगे।

सरकार का तर्क सुनकर लगता है, जैसे किसी योगी ने अचानक संन्यास ले लिया हो। मगर, यह फेयर डिसीजन नहीं है। प्लास्टिक को बढ़ावा देने के सरकार के फैसलों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने एक याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लगाई है। सिंघवी की याचिका विशेषत: शराब की प्लास्टिक बोतलों को लेकर नहीं है, इस पर सुनवाई 13 मई को होने वाली है। मगर, प्लास्टिक वाली नई आबकारी नीति के खिलाफ ऋषि एंटरप्राइजेज ने सीधे-सीधे एक अलग याचिका दायर कर रखी है। पिछले एक अप्रैल को उसकी सुनवाई हुई थी, जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, पर सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके आगे का डेवलपमेंट अभी मालूम नहीं है। मामला लंबित है।

इधर, डिस्टिलरीज अलग ना-नुकुर कर रहे हैं। जैसे ही सरकार ने प्लास्टिक बोतलों का फरमान निकाला, खाली बोतलों की कीमत उत्पादक कंपनियों ने 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी। आबकारी नीति में प्रावधान किया गया है कि केवल फूड ग्रेड और रियूजेबल प्लास्टिक बोतल हों। बोतलें मजबूत भी हों और हल्की भी हों, ब्रैकेज प्रूफ हों। मैटेलिक कैप की अनुमति नहीं है, कैप भी प्लास्टिक की ही होनी चाहिए। ऋषि कंपनी ने जो हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, उसमें उनकी ओर से दावा किया गया है कि इतने कड़े नियम को फॉलो करना तो किसी शराब निर्माता के लिए संभव ही नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे रहे लोगों का की ओर से दावा यह भी किया गया है कि सालाना करीब 16 हजार टन प्लास्टिक कचरा छत्तीसगढ़ में बढ़ जाएगा, बोतल सिर्फ डस्टबिन में डालें, इस नियम का पालन शराब पीने वाला कोई आदमी नहीं करने वाला।

तो सुशासन में इस सूखे का आनंद लीजिए।

...कौन बनेगा नया वन प्रमुख?

वन विभाग के शीर्ष पद हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए प्रस्तावित डीपीसी अपरिहार्य कारणों से टल गई है। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी. श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उनके उत्तराधिकारी के चयन को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह पद मुख्य सचिव और डीजीपी के समकक्ष वेतनमान वाला होता है और परंपरा रही है कि सबसे वरिष्ठ पीसीसीएफ को ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है।

हालांकि पिछली सरकार में यह परंपरा तब टूटी थी, जब वी. श्रीनिवास राव को पांच वरिष्ठ पीसीसीएफ को सुपरसीड कर इस पद पर पदोन्नत किया गया था। अब डीपीसी टलने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है? मौजूदा सरकार में मुख्य सचिव अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा को पहले ही सेवा विस्तार मिल चुका है। हालांकि देश में अब तक किसी भी राज्य में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को एक्सटेंशन मिलने का उदाहरण नहीं है।

मंगलवार को वन विभाग की एसीएस ऋचा शर्मा का तबादला कर उन्हें पंचायत विभाग भेज दिया गया। उनकी जगह एसीएस मनोज पिंगुआ को वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इसी प्रशासनिक बदलाव के कारण डीपीसी टली है।

दूसरी तरफ लघुवनोपज संघ के एमडी अनिल साहू वरिष्ठता सूची में सबसे ऊपर हैं, लेकिन वे जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय और पीसीसीएफ कौशलेन्द्र कुमार के नाम पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। विभागीय गलियारों में अरुण पाण्डेय को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) का पद विभाग में दूसरे नंबर का अहम पद माना जाता है। अब सबकी नजर नई डीपीसी तारीख पर टिकी है।

...क्या ऐसा संभव है?

अब प्रशासनिक अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोडक़र सम्मान करना पड़ेगा। यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से राज्यों को भेजे गए निर्देशों में कही गई है। छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों को भेजे गए इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिवों को दी गई है।

दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग भी लगभग हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में इसी तरह का परिपत्र जारी करता रहा है, लेकिन इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ था। लिहाजा दिल्ली से ही आदेश आ गया।

निर्देशों में साफ कहा गया है कि सांसद-विधायक कार्यालय या बैठक में आएं तो अधिकारी उठकर उनका अभिवादन करें, हाथ जोड़े और पानी तक पूछें। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल उठाना और जवाब देना भी अनिवार्य बताया गया है। यदि बैठक में होने के कारण कॉल रिसीव नहीं हो पाए तो बाद में कॉल बैक करना होगा। उनके पत्रों और प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण कर जानकारी भी देनी होगी।

डीओपीटी ने यह भी माना है कि तमाम निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इसलिए अब इसे आचरण नियमावली से जोड़ दिया गया है। यानी उल्लंघन पर कार्रवाई भी संभव है।

हालांकि अफसरशाही इसे हर साल जारी होने वाला रूटीन रिमाइंडर मान रही है। मगर हाल के दिनों में कुछ घटनाओं ने इस आदेश को और चर्चा में ला दिया है। खाद्य मंत्री ने एक अधिकारी, विधायक रोहित साहू ने एक पटवारी को जूते से मारने की घटना और प्रतापपुर विधायक शकुंतला पोर्ते द्वारा मंच से राजस्व अधिकारियों को गुरूर छोडऩेकी चेतावनी अभी भी चर्चा में है। अब देखना यह है कि यह आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित रहता है या वास्तव में अफसरों के व्यवहार में भी बदलाव दिखता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778245549hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15303&amp;path_article=7</guid><pubDate>08-May-2026 6:35 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 8 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15302&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15302&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778245161eewar_08_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15302&amp;path_article=1</guid><pubDate>08-May-2026 6:29 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 8 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15301&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15301&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778245000av-Kav_8_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15301&amp;path_article=2</guid><pubDate>08-May-2026 6:26 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 7 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15300&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15300&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778157997av-Kav_7_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15300&amp;path_article=2</guid><pubDate>07-May-2026 6:16 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 7 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15299&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15299&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778157856eewar_07_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15299&amp;path_article=1</guid><pubDate>07-May-2026 6:14 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : प्रकृति हमें पुकार रही है, आइये इसे सुनें..</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15298&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15298&amp;path_article=7 ]]></link><description>प्रकृति हमें पुकार रही है, आइये इसे सुनें..

छत्तीसगढ़ शायद केवल 36 गढ़ों की भूमि नहीं है। इससे अधिक गढ़ों का साक्षात स्वरूप है, यदि जंगलों की ओर निकल जाएं। अनगिनत घने साल-बांस के जंगलों को, लहराती नदियों, झरनों, गुफाओं और पठारों को किन गढ़ों में गिना जाएगा? दूसरे राज्यों का भ्रमण करने के पहले अपने छत्तीसगढ़ को ही ठीक से घूम लेना चाहिए, सरगुजा से लेकर बस्तर के छिपे दूरस्थ इलाकों तक। अपने यहां लगभग 44 प्रतिशत इलाका वनाच्छादित है, जो देश के कुल वनों का लगभग 12 प्रतिशत है। अनेक जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों का आश्रय है। देशभर में राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की भरमार है, मगर सेंट्रल इंडिया को जोडऩे वाली कड़ी छत्तीसगढ़ ही है। अचानकमार, इंद्रावती, कांगेर, उदंती-सीतानदी, तमोर पिंगला में दूसरे राज्यों से पहुंचने वाले बाघ बताते हैं कि यह उनके लिए स्वर्ग है। बाघ ही नहीं, तेंदुआ, भालू, जंगली भैंस-बायसन, गौर और हिरणों का यह इलाका है। सैकड़ों पक्षी प्रजातियों, सरीसृपों और कीट-पतंगों का भी घर है। अब तो बारनवापारा काले हिरणों की बढ़ती आबादी के चलते राष्ट्रीय वन्यजीव-मानचित्र में अलग स्थान बना चुका है।



ऐसे मौके पर छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार और वन्यजीव प्रेमी प्राण चड्ढा, जो एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं, ने फेसबुक पर एक पोस्ट दर्ज की है। ऑरेंज ओक लीफ- हम आप शायद इसे नहीं समझ पाएंगे, यदि इस नाम से कोई पुकारेगा। यह तितली की एक दुर्लभ प्रजाति है। आंतरिक रूप से अनंत सौंदर्य और जीवन लिप्सा से भरपूर। सूखे पत्ते की तरह यह जीव दिखता है। मगर, जैसे ही पंख खोलती है- नीले, नारंगी और काले रंगों की चकाचौंध बिखेर देती है। शिकारियों से बचने के लिए वह प्राय: अपने पंखों को बंद रखती है। यह तस्वीर अचानकमार अभयारण्य से ली गई है। यह तितली छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यभारत के अन्य जंगलों में भी पाई जाती है। हम हाथी जैसे विशालकाय जानवरों की बात करते हैं लेकिन ऐसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, कीट और तितलियों का भी अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, वन कटाई और मानवीय अतिक्रमण के चलते संकट में है। कार्बन संग्रहण, जल संरक्षण और आदिवासी संस्कृति के भी संरक्षण में इन छोटे-छोटे कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है।

महिला अफसरों पर भरोसा, विकास कार्यों पर फोकस



सीएम विष्णु देव साय ने बुधवार को 43 आईएएस अफसरों के तबादले कर प्रशासन में बड़ा फेरबदल किया। इस बदलाव में सरकार ने एक तरफ लंबे समय से एक ही विभाग संभाल रहे अफसरों की जिम्मेदारियां बदलीं गईं। दूसरी तरफ, कुछ अहम विभागों में नए प्रयोग भी किए हैं।

सबसे चर्चित फैसला गृह विभाग को लेकर रहा। राज्य गठन के बाद पहली बार किसी महिला आईएएस अफसर को गृह विभाग की कमान सौंपी गई है। 1997 बैच की सीनियर आईएएस निहारिका बारिक सिंह को गृह विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया है। इससे पहले एके विजयवर्गीय, राबर्ट हरंगडोला, आरपी बगई, एनके असवाल और बीवीआर सुब्रमण्यम जैसे वरिष्ठ अफसर इस विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

फेरबदल में एसीएस ऋचा शर्मा, मनोज पिंगुआ, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आर संगीता, बसवराजु, डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुकेश बंसल समेत कई अफसरों के प्रभार बदले गए हैं। इनमें अधिकांश अफसर दो साल से ज्यादा समय से एक ही विभाग में कार्यरत थे। सीएम सचिवालय में पदस्थ मुकेश बंसल से वित्त विभाग लेकर लोक निर्माण विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार निर्माण कार्यों, खासकर सडक़ों और अधोसंरचना परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। सुशासन तिहार के दौरान सरगुजा क्षेत्र में खराब सडक़ों को लेकर मुख्यमंत्री की नाराजगी भी सामने आई थी। ऐसे में पीडब्ल्यूडी में यह बदलाव सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।

यही नहीं, आबकारी विभाग की जिम्मेदारी दुबारा एक महिला अफसर को सौंपी गई है। पहले यह विभाग आर संगीता संभाल रही थीं, जबकि अब खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले को आबकारी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। एक और उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 33 में से 10 जिलों में महिला कलेक्टर बनाई गई हैं।

मनिंदर कौर ऐसी तीसरी अफसर...



केंद्र सरकार ने श्रीमती डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी की प्रतिनियुक्ति दो वर्ष बढ़ा दी है। वह कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। वह अगस्त 28 तक केंद्र में बनी रहेंगी। इस वृद्धि के साथ वह छत्तीसगढ़ कैडर की ऐसी तीसरी अफसर हो गई हैं जो एक दशक से अधिक समय से केंद्र में सेवाएं दे रहीं हैं।

केन्द्रीय अधिकारी-कर्मचारी ही सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष है। ऐसे में एक अधिकारी कर्मचारी की कुल सेवावधि 30-38 वर्ष रहती है। प्रदेश में सबसे ज्यादा पहले सबसे ज्यादा समय तक बीवीआर सुब्रमण्यम ने दो से तीन चरणों में 15-16 वर्ष तक पीएमओ, वर्ल्ड बैंक, जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के रूप में सेवाएं दी है। वे रिटायर भी दिल्ली से ही हुए। उनके बाद अमित अग्रवाल को भी 12 वर्ष से अधिक हो रहे हैं। इसी तरह से स्व. एम. गीता भी राज्य गठन के बाद मप्र, फिर केंद्र में सेवाओं के 15 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ आईं थीं। मनिंदर कौर को भी दो चरणों में 12 वर्ष हो गए हैं। तीन वर्ष के कूलिंग ऑफ पीरियड के बाद कोई भी अभा सेवा का अफसर फिर से प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। वैसे भी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस केंद्र के अफसर होते हैं वह जब चाहे बुला सकता है। एक तरह से वे राज्य में प्रतिनियुक्ति पर माने जा सकते हैं। और फिर केंद्र रिजल्ट ओरिएंटेड अफसरों को ही बुलाता है।

बहरहाल मनिंदर के अतिरिक्त उनके पति गौरव द्विवेदी को भी दो चरणों में 10 वर्ष बीत रहे हैं। गौरव द्विवेदी भी केंद्रीय प्रसार भारती में सीईओ हैं। इनके अलावा एसीएस ऋचा शर्मा भी 7 वर्ष केंद्र में सेवाएं दे चुकी थीं। सीएस विकासशील भी 7 वर्ष केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रहे। उनकी पत्नी निधि छिब्बर भी, अभी नीति आयोग में प्रतिनियुक्ति पर हैं। इनके अलावा पूर्व सीएस अमिताभ जैन, एसीएस मनोज पिंगुवा, सुबोध सिंह, सोनमणि बोरा, निहारिका बारिक, रोहित यादव,पी. संगीता, अमित कटारिया,रजत कुमार आदि भी 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लौटे हैं।

उधर, आईपीएस अधिकारियों में स्वागत दास, बिनय कुमार सिंह, रवि सिन्हा तो केंद्र में 20-25 वर्ष रहकर रिटायर हुए। दिवंगत पूर्व डीजीपी विश्वरंजन जरूर छत्तीसगढ़ लौटे। इन अफसरों के अलावा अमित कुमार ऐसे अकेले आईपीएस हैं जो 7 वर्ष से अधिक डेपुटेशन पर रहे। वहीं आईएफएस कैडर में छत्तीसगढ़ का ऐसा अफसर नहीं जो 5 वर्ष से अधिक प्रतिनियुक्ति पर रहा हो।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778156793utterfly.gif" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15298&amp;path_article=7</guid><pubDate>07-May-2026 5:56 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 6 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15297&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15297&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778076038eewar_06_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15297&amp;path_article=1</guid><pubDate>06-May-2026 7:30 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 6 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15296&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15296&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778075649av-Kav_6_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15296&amp;path_article=2</guid><pubDate>06-May-2026 7:24 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15295&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15295&amp;path_article=7 ]]></link><description>सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री

अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक घोटाला प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। करीब सात साल पुराने इस मामले में विभागीय जांच अब भी धीमी रफ्तार से चल रही है, जबकि पुलिस अपनी कार्रवाई कर चुकी है। इसी बीच ईडी की एंट्री से बैंक में हडक़ंप मच गया है। ईडी ने प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए हैं और माना जा रहा है कि जांच में ऐसे कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जो अब तक पुलिस जांच से बाहर रहे हैं।

घोटाले का खुलासा उस समय हुआ था, जब तत्कालीन कलेक्टर संदीपन विलास भोसकर को बैंक के प्राधिकृत अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। खातों में हेराफेरी की शिकायत मिलने पर उन्होंने जांच कराई और मामला पुलिस को सौंप दिया। इस मामले में बलरामपुर, सूरजपुर समेत विभिन्न शाखाओं के 12 अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ को सेवा से बर्खास्त भी किया जा चुका है।

घोटाले की वास्तविक राशि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। थर्ड पार्टी ऑडिट में 142 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई थी, जबकि बैंक से जुड़े लोगों का अनुमान है कि यह आंकड़ा करीब 300 करोड़ रुपए तक हो सकता है। कलेक्टर की अनुशंसा पर विभागीय जांच टीम तो गठित की गई, लेकिन जांच की गति अब तक सुस्त ही बनी हुई है। अब ईडी की सक्रियता से मामले में नई परतें खुलने की उम्मीद जताई जा रही है।

बताया जाता है कि घोटाले की शुरुआत पिछली सरकार के शुरुआती दौर में हुई थी। किसानों के नाम पर फर्जी कृषि ऋण लिए गए और बाद में कर्ज माफी योजना का लाभ उठाकर रकम हड़प ली गई। कई किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इसी तरह बैंक कर्मचारियों ने रैकेट बनाकर फसल बीमा की राशि भी हड़प ली। कर्मचारियों के खातों में करोड़ों रुपए ट्रांसफर होने की बात सामने आई है। चर्चा है कि इस पूरे खेल को कुछ प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। फिलहाल कर्मचारी जेल में हैं, लेकिन ईडी की जांच में उन सभी लोगों के नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जिन्हें इस घोटाले से फायदा हुआ।

भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर सरगर्मी

पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने के बाद भाजपा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। नितिन नबीन की नई टीम में छत्तीसगढ़ से किन नेताओं को जगह मिलेगी, इसको लेकर अटकलों का दौर जारी है।

चर्चा है कि कार्यकारिणी में उन नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है जिन्होंने पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान प्रभावी भूमिका निभाई थी। यह भी कहा जा रहा है कि नितिन नवीन स्वयं चुनाव प्रबंधन से सीधे जुड़े रहे हैं, जिससे उन्हें छत्तीसगढ़ के नेताओं के कामकाज की अच्छी जानकारी है।

चर्चा यह भी है कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर एक-दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। राज्य सरकार के मंत्री अरुण साव, विजय शर्मा, ओपी चौधरी और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने भी अपने-अपने प्रभार वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसके चलते उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिल सकता है।

निवर्तमान उपाध्यक्ष लता उसेंडी का कद बढऩा लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह का नाम भी चर्चा में है। चुनाव के दौरान टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद चर्चा में रहे हैं। अब यह देखना है कि नितिन नवीन की टीम में छत्तीसगढ़ से किन-किन नेताओं को जगह मिलती है।

प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन पीछे नौकरीपेशा

अगले 10 साल में स्नातक और हम उम्र कम पढ़े-लिखे दो युवकों की आय पर नजऱ डालें तो व्यंग्य में कहा जा सकता है कि भारत में 80 प्रतिशत कॉलेज और विश्वविद्यालय अगले 10 वर्षों में बंद हो जाएंगे..? यह अतिशयोक्ति भी लगती है..? अब आंकड़ों को देखें-

प्लंबर 1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन।

रु.30,000 - रु.50,000 प्रति माह

इलेक्ट्रीशियन

1,500रु. - 2,500रु. प्रति दिन

35,000रु. - रु.60,000रु. प्रति माह।

टाइल वर्कर / मिस्त्री

1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन

30,000रु. - 50,000रु. प्रति माह।

जोमैटो / स्विगी राइडर

25,000रु. - 35,000रु. प्रति माह।

अमेजन / फ्लिपकार्ट डिलीवरी पार्टनर

28,000रु. - 40,000रु. प्रति माह।

छोटा दुकानदार

नेट आय 30,000रु.-70,000रु. प्रति माह।

ये आय कौशल, गति और मांग के साथ बढ़ती हैं।

कोई दीक्षांत समारोह आवश्यक नहीं।

अब डिग्री धारकों की स्थिति देखें-

बी.कॉम फ्रेशर

12,000रु. - 18,000रु.

बीए फ्रेशर

10,000रु. - 15,000रु.

बीएससी फ्रेशर

12,000 - 18,000रु.

एमएससी फ्रेशर

15,000रु. - 22,000रु.

एमबीए फ्रेशर (टियर 2 / 3 कॉलेज)

18,000रु.-30,000रु.

नॉन टेक इंजीनियर

12,000रु. - 20,000रु.

टेक इंजीनियर

20,000रु.-35,000रु.

(शीर्ष 5 प्रतिशत को छोडक़र)

ये वेतन तब तक स्थिर रहते हैं जब तक कौशल नहीं जोड़े जाते।

कुशल कामगार तुरंत कमाते हैं। डिग्री धारक अवसरों का इंतजार करते हैं।

कौशल मासिक रूप से बढ़ता है।

डिग्रियां वार्षिक रूप से घटती हैं।

एक प्लंबर अपस्किल करता है तो आय बढ़ती है। एक डिलीवरी पार्टनर मार्गों का अनुकूलन करता है आय बढ़ती है।

एक दुकानदार मांग को समझता है ,आय बढ़ती है।

एक डिग्री धारक, इंतजार करें...आवेदन करें...

इंटर्न करें...पुन: कौशल सीखे..दोहराएं...

आशावादी रहें। क्योंकि यह शिक्षा प्रणाली छात्रों के लिए नहीं बनी है। यह लाभ के लिए बनी है।

डिग्रियां अभी भी बांटी जा रही हैं।

जैसे कि उनका कोई मतलब हो। मध्यवर्गीय माता-पिता के पास कोई विकल्प नहीं है।छात्रों के पास कोई बचाव नहीं है। डिग्रियां अनुमोदनों से जुड़ी हैं।अनुमोदन नौकरियों से जुड़े हैं। तो चक्र चलता रहता है।जिस

एनईपी 2020 को आधुनिक शिक्षा प्रणाली बता कर लागू किया गया है वह 4 साल में ही पुराना लगने लगा है। दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है। आज, दुनिया चाहती है...

सिस्टम थिंकर...

डेटा तर्क।जब कौशल हर दो साल में समाप्त हो जाते हैं, तो एक स्थिर डिग्री क्या बनाएगी ? कुछ भी नहीं।आज स्कूल में प्रवेश करने वाला बच्चा, लगभग 2040 - 2045 में स्नातक होगा।

तब दुनिया कैसी दिखेगी..?हर जगह ऑटोमेशन।हर तीन साल में करियर का पुनर्लेखन। डोमेन पार करने वाली नौकरियां।

हर दो साल में कौशल की समाप्ति।मानव मशीनों के साथ काम कर रहे हैं। सिस्टम में सोच रहे हैं। अस्पष्ट समस्याओं को हल कर रहे हैं। लगातार सीख रहे हैं।

अब हमारे कक्षाओं को देखें-पुराने...

स्थिर पाठ्यक्रम...अनचाही प्रायोगिक व्यवस्थाएं।

सभी के लिए एक ही डिग्री। हमारी शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी कें मानवों को तैयार नहीं कर सकती। तो मूल कारण कहाँ है?

ब्यूरोक्रेट्स। हमारे बाबू सिस्टम चलाते हैं।वे नीति सलाह देते हैं। वे क्रियान्वयन डिजाइन करते हैं।और वे एक ही द्वार से आते हैं।

यूपीएससी।

यूपीएससी 1940 के दशक के लिए डिजाइन किया गया था। बाबू अपनी पदोन्नति को आपके बच्चे के भविष्य से ज्यादा महत्व देते हैं।

वैसे भी अब देश में शासकीय प्राथमिक शाला/ उच्चतर माध्यमिक शाला/ शासकीय कॉलेज/ बंद होने की स्थिति में है क्योंकि राज्य और केंद्र स्तर की सरकार ऐसी शिक्षा प्रणाली चल रही है जिसे सिर्फ प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज फल फूल रहे हैं।

(हाल में रिटायर हुए एक प्राचार्य का आकलन)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1778069968hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15295&amp;path_article=7</guid><pubDate>06-May-2026 5:49 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15294&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15294&amp;path_article=7 ]]></link><description>सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...

पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव और छत्तीसगढ़ के 2023 विधानसभा नतीजों में कई समानताएं नजर आती हैं। तब भाजपा ने अपन व्यापक संसाधनों और कैडर के जरिये कांग्रेस के खिलाफ लगभग उसी तरह का माहौल बनाया था, जैसा पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ। भ्रष्टाचार, एंटी-इनकंबेंसी, कानून-व्यवस्था और महिलाओं, युवाओं व संप्रदायों के बीच असंतोष जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। पश्चिम बंगाल में 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में महज पांच साल में ही माहौल बदलने में भाजपा को सफलता मिल गई। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा कभी सत्ता में नहीं रही और वहां अपना कैडर तैयार करने में उसे एक दशक से अधिक समय लगा। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत बनी रही, जो विधानसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी दिखा।

कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के फॉर्म भरवाने के अभियान ने भाजपा के पक्ष में माहौल पलट दिया। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की ओर से इसी तरह के डायरेक्ट बेनिफिट से जुड़े फॉर्म भरवाने का अभियान चला, लेकिन वह छत्तीसगढ़ की तरह घर-घर तक नहीं पहुंचा। इसके बावजूद भाजपा को बड़ी सफलता मिली, जिसका मतलब है कि टीएमसी की पराजय के कारण और भी थे।

छत्तीसगढ़ में भाजपा ने सीजीपीएससी भर्ती, कोयला, शराब और डीएमएफ घोटाले के साथ महादेव सट्टा ऐप जैसे मुद्दों को इस तरह उछाला कि सरकार के कई सकारात्मक काम पीछे छूट गए। इन कामों में वादे के अनुरूप देश में सबसे ऊंची धान कीमत देना, तेंदूपत्ता सहित अन्य वनोपजों का बेहतर भुगतान, शिक्षाकर्मियों का नियमितीकरण और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देना शामिल थे। पश्चिम बंगाल में भी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने कल्याणकारी योजनाओं, खासकर महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को पीछे धकेल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाला, शारदा चिटफंड मामला, परिवारवाद, विशेषकर भतीजे अभिषेक बेनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने असर डाला। छत्तीसगढ़ में भी बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी चयन प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवालों ने इसी तरह की धारणा को जन्म दिया। बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी- 2021 के चयन में आप परिवारवाद का वर्चस्व देख सकते हैं।

जैसे छत्तीसगढ़ में कुछ मंत्रियों और विधायकों की छवि घोटालों से प्रभावित हुई, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भी हुआ। साख बचाने के लिए ममता बेनर्जी ने 33 प्रतिशत यानी 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल और चुनाव के ठीक पहले डिप्टी सीएम बने टीएस सिंहदेव ने मिलकर यहां भी लगभग 33 प्रतिशत ही, यानी 22 विधायकों के टिकट काट दिए।

भाजपा के कुछ प्रमुख राजनीतिक हथियार ऐसे हैं, जो भावनात्मक स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। आदिवासी क्षेत्रों, खासकर बस्तर में, धर्म परिवर्तन को लेकर माहौल गरमाया गया और हिंसक घटनाएं भी हुईं। हालात ऐसे बने कि कई जगह अंतिम संस्कार के लिए जमीन तक को लेकर विवाद खड़ा हुआ, और अब यह स्थायी समस्या बन चुकी है। बेमेतरा-साजा को लेकर सीबीआई रिपोर्ट अभी कुछ माह पहले आई है। केंद्र की ही एजेंसी ने इसे आपसी विवाद बताया, न कि सांप्रदायिक, पर भाजपा ने इस मुद्दे पर कई सीटों पर धाक जमा ली। कवर्धा में रोहिंग्या मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विमर्श होता रहा। सरकार बनते ही रोहिंग्या गायब हो गए। पर, इन मुद्दों पर कांग्रेस की चुप्पी और निष्क्रियता ने भाजपा को बढ़त दिलाई और कई सीटों पर नतीजे पलट गए।

पश्चिम बंगाल में भी घुसपैठियों का मुद्दा इसी तरह का है। तृणमूल बचाव में रही और भाजपा हमलावर। यह धारणा बनाई गई कि 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट एकतरफा हैं, जबकि इन वोटों के बंटवारे के लिए हुमायूं कबीर और औवेसुद्दीन कुरैशी के उम्मीदवार भी मैदान में थे।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अंतर्कलह उसी तरह दिखी, जैसी तृणमूल कांग्रेस में नजर आई। एक व्यक्ति केंद्रित नेतृत्व की छवि दोनों जगह उभरी। कांग्रेस शासन के दौरान किन विधायकों के काम प्राथमिकता से होते थे, कौन मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार की आलोचना करता रहा, और किन नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश हुई, छत्तीसगढ़ में सबने देखा। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा के प्रमुख चेहरे बन गए, जबकि मुकुल रॉय जैसे नेताओं की वापसी के बावजूद प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। तापस रॉय और कुणाल घोष जैसे नेताओं की नाराजगी भी टिकट वितरण में सामने आई। कारण यह बताया गया कि अभिषेक बेनर्जी युवा कैडर पर अधिक भरोसा कर रहे थे और पुराने नेताओं को पीछे कर दिया गया।

छत्तीसगढ़ में भी सत्ता संभालने के बाद बघेल ने वरिष्ठों को किनारे लगाकर अपना अलग कैडर तैयार किया, जो चुनावी मैदान में खुद तो निपटे, पार्टी को भी निपटा गए। कई टिकट व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर बदले गए और जहां बदलाव नहीं हुआ, वहां हार का माहौल बनने दिया गया। सिंहदेव खेमे की अपनी संतुष्टि सरगुजा तक सीमित थी। भाजपा ने इस असंतोष का लाभ उठाया। जिस नेता की सिंहदेव ने टिकट काटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, वह आज सांसद है। यह आंतरिक खींचतान कार्यकर्ताओं को रास नहीं आई, जैसा पश्चिम बंगाल में भी देखा गया। दोनों ही जगह संगठन की भूमिका कमजोर रही और निर्णय लेने की ताकत उन्हीं के हाथ में केंद्रित रही, जिनके पास सत्ता थी।

जनता की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। पश्चिम बंगाल की जनता को विकल्प चाहिए था, जबकि कमजोर संगठन वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस उस विकल्प के रूप में उभर नहीं सके। भाजपा ने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर तैयारी कर अपनी पकड़ मजबूत की और उसका परिणाम सामने आया। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने कहा था कि सत्ता को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए, अन्यथा वह जड़ हो जाती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से परिवारवाद, निहित स्वार्थ और भ्रष्टाचार बढऩे का खतरा रहता है। इसलिए सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र को जीवंत, जवाबदेह बनाए रखने के लिए जरूरी है।

बंगाल सीएस का आदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र

पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो तिहाई जीत के बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग में नई सरकार और उसकी शासन व्यवस्था की कवायद तेज हो गई है। बंगाल के मुख्य सचिव ने सभी विभागों के सचिव और कल ही एक आदेश जारी कर दिया है। इसमें उन्होंने फाइलों और दस्तावेजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिना अनुमति कोई फाइल रायटर्स बिल्डिंग से बाहर ले जाने या उसकी कॉपी करने पर रोक लगाई गई है और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बता दें कि चुनाव अभियान के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा था कि दीदी का खेला होने के बाद उनकी सरकार में हुए घोटालों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश ने पहले छत्तीसगढ़ और फिर आंध्र प्रदेश में पूर्व के वर्षों में हुए ऐसे की घटनाओं की यादें ताजा कर दी। 2018 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते ही तत्कालीन गृहमंत्री के बंगले में कई गोपनीय नस्तियों को आग के हवाले किया गया था। इसके बाद यही उपक्रम 2023 में भी कांग्रेस के एक मंत्री के बंगले में भी हुआ। इतना ही नहीं एक मंत्री पर तो सरकारी आवास के महंगे सामान खोल कर ले जाने का भी खुलासा हो चुका था। आंध्र में भी जगन सरकार के मंत्री ने भी बकायदा मंत्रालय परिसर में ही कागजात जलवाए थे। इसे देखते हुए आने वाले हर चुनाव बाद राज्यों में बहुमत के रुझान आते ही आउट गोइंग सरकार के लिए मुख्य सचिवों को ऐसे अंतिम आदेश निकालने की नई परंपरा बन सकती है।

कांग्रेस-भाजपा में माहौल अलग-अलग

पश्चिम बंगाल और असम में जीत के बाद भाजपा खेमे में उत्साह चरम पर है। प्रदेशभर के पार्टी कार्यालयों में जश्न का माहौल रहा, और बंगाल की पहचान बन चुकी झालमुड़ी के साथ जीत का स्वाद लिया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में निराशा है। छत्तीसगढ़ के नेताओं ने दोनों राज्यों में जमकर मेहनत की थी, लेकिन परिणामों ने अब राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया गया था। उनके साथ विकास उपाध्याय और विनोद वर्मा भी क्रमश: प्रभारी सचिव और पर्यवेक्षक थे। असम में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया है और सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि जहां-जहां बघेल को जिम्मेदारी मिली, वहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

सिर्फ बघेल ही नहीं, पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव भी पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके। उन्हें तमिलनाडु और पुडुचेरी में टिकट वितरण की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां कांग्रेस का खराब रहा। हालांकि सचिन पायलट के लिए यह दौर सकारात्मक रहा।केरल में प्रभारी के तौर पर उनकी भूमिका पार्टी की जीत के साथ जुड़ी, जिससे संगठन में उनका कद बढऩा तय माना जा रहा है।

दूसरी ओर, भाजपा खेमे में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भूमिका को लेकर संतोष का माहौल है। संगठन महामंत्री पवन साय को बंगाल में 56 सीटों की जिम्मेदारी मिली थी, और पार्टी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया। इसी तरह असम में डिप्टी सीएम अरुण साव, केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बूथ स्तर तक काम संभाला, जिसका असर नतीजों में दिखा। इन सफलताओं का असर रायपुर तक साफ नजर आया। पार्टी दफ्तरों से लेकर मंत्रियों के बंगलों तक जश्न का दौर चला। दिलचस्प यह रहा कि झालमुड़ी की मांग इतनी बढ़ गई कि बेचने वालों की कमी पड़ गई।

आग बुझाने वाले कहां हैं?

जशपुर जिले के जंगल में आग लगी, वहां से गुजरते हुए कुछ पर्यटकों ने अपनी कोशिश की और आग बुझाने का प्रयास किया। लेकिन यह नाकाफी साबित हुआ। आग फैलने से रोका नहीं जा सका। छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों हर रोज सैकड़ों की संख्या में आग लगने की छोटी-बड़ी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन बीट गार्ड और आग बुझाने वाली वन विभाग की टीम नजर नहीं आती।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777984705hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15294&amp;path_article=7</guid><pubDate>05-May-2026 6:08 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 5 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15293&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15293&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777980862av-Kav_5_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15293&amp;path_article=2</guid><pubDate>05-May-2026 5:04 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 5 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15292&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15292&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777980791eewar_05_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15292&amp;path_article=1</guid><pubDate>05-May-2026 5:03 PM</pubDate></item><item><title>फन कॉर्नर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15291&amp;path_article=10</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15291&amp;path_article=10 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777904036un_corner.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15291&amp;path_article=10</guid><pubDate>04-May-2026 7:43 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 4 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15290&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15290&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777899159eewar_04_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15290&amp;path_article=1</guid><pubDate>04-May-2026 6:22 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 4 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15289&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15289&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777899076av-Kav_4_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15289&amp;path_article=2</guid><pubDate>04-May-2026 6:21 PM</pubDate></item><item><title>राजपथ-जनपथ : विधायक की अनदेखी पर बवाल</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15288&amp;path_article=7</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15288&amp;path_article=7 ]]></link><description>विधायक की अनदेखी पर बवाल

कवर्धा जिले की भाजपा राजनीति इन दिनों अंदरूनी खींचतान को लेकर चर्चा में है। विवाद की वजह भोरमदेव जंगल सफारी के शुभारंभ कार्यक्रम को माना जा रहा है। यह सरकारी आयोजन रविवार को हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में डिप्टी सीएम विजय शर्मा शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता वन मंत्री केदार कश्यप ने की, जबकि सांसद संतोष पाण्डेय विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

हालांकि पूरे विवाद की जड़ पंडरिया विधायक भावना बोहरा का नाम आमंत्रण सूची से गायब होना है। जिले की विधायक होने के बावजूद उन्हें न तो निमंत्रण दिया गया और न ही कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति रही। इससे उनके समर्थकों में नाराजगी खुलकर सामने आई है।

कवर्धा जिले में दो विधानसभा सीटें हैं, कवर्धा से खुद विजय शर्मा प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि पंडरिया से भावना बोहरा विधायक हैं। ऐसे में स्थानीय जनप्रतिनिधि के रूप में उनका नाम आमंत्रण पत्र में होना स्वाभाविक माना जा रहा था। नाम छूटना महज त्रुटि थी या जानबूझकर किया गया, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन समर्थक इसे राजनीतिक उपेक्षा बता रहे हैं।

मामला अब सोशल मीडिया तक पहुंच गया है, जहां समर्थक खुलकर विरोध जता रहे हैं। 24 घंटे के भीतर कलेक्टर और डीएफओ से जवाब मांगने की चेतावनी दी गई है, और इस सिलसिले में पोस्टर भी जारी किए गए हैं।

खुद भावना बोहरा ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनका और विजय शर्मा का कुछ मुद्दों को लेकर पहले से मतभेद रहा है। हल्ला है कि सीएम विष्णुदेव साय से भी इस मामले की शिकायत की है और पार्टी संगठन में आपत्ति दर्ज कराई है। फिलहाल सरकार या संगठन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विवाद के और बढऩे के संकेत मिल रहे हैं।

केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का ट्रेंड

राज्य पुलिस सेवा में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। वर्ष-2021 बैच के आईपीएस अधिकारी चिराग जैन भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की तैयारी में हैं। वर्तमान में वे एडिशनल एसपी के पद पर हैं और हाल ही में पीएचक्यू में पदस्थ हुए हैं।

इससे पहले 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा चुके हैं। उनकी पोस्टिंग हो चुकी है और उन्हें रिलीव भी कर दिया गया है।

परंपरागत रूप से आईपीएस अधिकारियों के लिए कम से कम एक जिले में एसपी के रूप में कार्य करने के बाद ही केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का चलन रहा है। लेकिन अब यह ट्रेंड बदलता दिख रहा है और अधिकारी शुरुआती दौर में ही केंद्र का रुख कर रहे हैं।

विकास कुमार का मामला थोड़ा अलग रहा। उन्हें कवर्धा के लोहारडीह हिंसा प्रकरण में निलंबित किया गया था, आरोप था कि वे स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहे। हालांकि बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गई। इसके बाद उन्हें पीएचक्यू में एसपी बनाया गया और फिर रायपुर कमिश्नरी में डिप्टी कमिश्नर के रूप में पदस्थ किया गया।

उनके बैच के कई अधिकारी पहले ही जिले के एसपी बन चुके थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुना और अब वे केंद्र में सेवाएं देने रवाना हो चुके हैं।

यह नाम कहाँ से आया?



रायपुर -जबलपुर के बीच चलने वाली ट्रेन नंबर 11701/11702, जिसे अब तक लोग रायपुर-जबलपुर एक्सप्रेस के नाम से जानते थे, उसे जनवरी 2026 में एक नया नाम दिया गया, मूक माटी एक्सप्रेस। कई लोग इस नाम को लेकर हैरान होते हैं, कि यह कहाँ से आया है?

यह नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर महाराज की स्मृति में किया गया है। मूक माटी उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम है, जिसे उनके साहित्यिक और दार्शनिक योगदान के रूप में व्यापक पहचान मिली है। रेलवे मंत्रालय ने 7 जनवरी 2026 के आसपास इस नाम परिवर्तन का आदेश जारी किया। यह बदलाव मुख्य रूप से आचार्य विद्यासागर जी को श्रद्धांजलि देने और उनके विचारों को व्यापक स्तर पर स्मरण में रखने के उद्देश्य से किया गया है।

हालात को हराया, वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज



जीवन जब बार-बार ठोकर देता है, तब कुछ लोग टूट जाते हैं। मगर, कुछ लोग उसी दर्द को अपनी ताकत बना लेते हैं। अंबिकापुर, सरगुजा की शिवानी सोनी की कहानी दूसरे श्रेणी की है। बहुत छोटी उम्र में ही पिता ने परिवार का साथ छोड़ दिया। घर की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। वह आंगनबाड़ी में काम करती हैं। सीमित आय में पूरे परिवार को वह संभालती रहीं। इन परिस्थितियों में शिवानी का बचपन बीता, लेकिन मां ने उसके सपनों को टूटने नहीं दिया, बेटी को आगे बढऩे का हौसला दिया।

शिवानी का एक समय ऐसा भी था जब वह घोर निराशा के करीब पहुंच चुकी थी। उसी दौर में खेल ने उनके जीवन में चमत्कार की तरह प्रवेश किया। शुरुआत बास्केटबॉल से हुई। मां रोज उन्हें मैदान तक लेकर जाती थीं। लेकिन एक चोट ने रास्ता बदल दिया। कोच की सलाह पर उन्होंने मिनी गोल्फ और स्पीडबॉल को अपनाया।

धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदला और जुनून ने उपलब्धियों का रूप ले लिया। शिवानी ने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, 2017 से 2019 तक, फिर 2023 और 2024 में। इस निरंतरता के चलते उनका नाम इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कर लिया गया। वह छत्तीसगढ़ की एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्होंने स्पीडबॉल और मिनी गोल्फ दोनों में देश का प्रतिनिधित्व किया है।

उनकी झोली में वर्ल्ड चैंपियनशिप और इंडो-इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं के कई ब्रॉन्ज मेडल हैं, जबकि एशियन और वर्ल्ड स्तर पर भी उन्होंने शीर्ष स्थान हासिल किए। दुर्भाग्यवश, आज भी आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। शिवानी चाहती हैं कि उन्हें खेल कोटे से सरकारी नौकरी मिले, ताकि वह अपनी मां का सहारा बन सकें।

जरा सी जगह तो दे दी



अब आदिवासी गौरव तो अच्छी बात है, लेकिन आदिवासी प्रतीक चिन्हों के बीच, नाम और जय जोहार से घिरे हुए मोटर सायकिल के नंबर को जरा सी जगह मिल गई है, वह बड़ी मेहरबानी हो गई है!
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777897051hadhi_Chauk_NEW_1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15288&amp;path_article=7</guid><pubDate>04-May-2026 5:47 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 3 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15287&amp;path_article=2</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15287&amp;path_article=2 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777816203av-Kav_3_May_26_Page_6_copy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15287&amp;path_article=2</guid><pubDate>03-May-2026 7:20 PM</pubDate></item><item><title>दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 3 मई 2026</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15286&amp;path_article=1</link><link> <![CDATA[ https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15286&amp;path_article=1 ]]></link><description></description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/sthayi_stambh/1777815982eewar_03_May_2026.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/sthayi-stambh-details.php?article=15286&amp;path_article=1</guid><pubDate>03-May-2026 7:16 PM</pubDate></item></channel></rss>