    
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>Daily Chhattisgarh Thoughts-Articles</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com</link><description>Daily Chhattisgarh Feed Thoughts-Articles</description><item><title>आरएसएस नेता के ‘पाकिस्तान के साथ संवाद’ वाले बयान पर पाकिस्तान में ऐसी प्रतिक्रिया</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324720&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324720&path_article=11]]></link><description>भारत की अहम हस्तियों की ओर से आईं हाल की दो टिप्पणियों ने भारत-पाकिस्तान संबंधों के भविष्य पर चर्चा को फिर से जि़ंदा कर दिया है।

दोनों ने ये संकेत दिया है कि संवाद के रास्ते खुले रखना महत्वपूर्ण है।

आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को पाकिस्तान के साथ संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिएं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के प्रति कड़े रुख़ में कोई नरमी नहीं बरतनी चाहिए।

होसबाले के बयान के बाद पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज नरवणे ने भी संपर्क बनाए रखने के विचार का समर्थन किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं और उनकी रोज़मर्रा की चिंताएं समान हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच संपर्क बने रहने चाहिए क्योंकि इससे संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

इसके जवाब में, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन टिप्पणियों को सकारात्मक बताया और कहा कि तनावपूर्ण संबंधों के बीच संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार करना स्वागत योग्य है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाज मजबूत होगी। पिछले कई महीनों से, बल्कि वर्षों से जो युद्ध भडक़ाने वाली बयानबाज़ी और आक्रामकता देखने को मिल रही है, वह ख़त्म होगी और इस तरह की और आवाज़ों के लिए रास्ता साफ़ करेगी। बेशक, अब देखना यह है कि भारत में इन बातों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान बैकचैनल संपर्कों को लेकर किसी भी अटकल पर टिप्पणी नहीं करेगा।

उन्होंने कहा, अनौपचारिक बातचीत या बैकचैनल के बारे में- मुझे कोई जानकारी नहीं है और मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। अगर मुझे इस पर टिप्पणी करनी होती तो फिर कोई बैकचैनल नहीं रहेगा। बैकचैनल या अनौपचारिक बातचीत, नाम अपने आप में स्पष्ट है।

पाकिस्तान में आरएसएस को व्यापक रूप से एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जो भारत की सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था के साथ कऱीब से जुड़ा हुआ है।

पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रियाएं

बीबीसी से बात करते हुए, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने इस बयान के अधिक अर्थ निकालने को लेकर सावधान रहने की सलाह दी।

उन्होंने कहा, पाकिस्तान को इससे बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा, जहाँ तक भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने का सवाल है, यह याद रखना ज़रूरी है कि भारत जम्मू-कश्मीर पर अब भी अडिग है। मैं इस विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए भारत की ओर से कोई प्रतिबद्धता नहीं देखता।

बासित ने कहा कि इस्लामाबाद को द्विपक्षीय संवाद की ऐसी एक और प्रक्रिया से बचना चाहिए, जो भारत को कश्मीर के अपने विलय को और मज़बूत करने में मदद करती है।

उनके अनुसार, दोनों देश बैकचैनल कूटनीति के ज़रिए बातचीत कर सकते हैं, लेकिन कश्मीर और आतंकवाद पर चर्चा केंद्र में बनी रहनी चाहिए।

वह यह भी तर्क देते हैं कि आरएसएस का यह बयान, अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए पहले से सोचा-समझा लगता है और इसका उद्देश्य ऐसे समय में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को परखना भी हो सकता है, जब उनके मुताबिक भारत पाकिस्तान और अमेरिका के बढ़ते आपसी तालमेल से असहज महसूस कर रहा है।

पाकिस्तान और अमेरिका के बीच हाल में संबंधों में आई गर्मजोशी के संकेतों के साथ-साथ अमेरिका चीन संबंधों का जि़क्र करते हुए, बासित कहते हैं, चीन-अमेरिका शिखर बैठक भी एक तरह से भारत की तुलना में पाकिस्तान के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। क्वॉड भी ख़तरे में पड़ सकता है।

ध्यान देने योग्य है कि क्वॉड- अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक समूह है- जिसे आम तौर पर चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव का मुक़ाबला करने के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जाता है।

भारत की इन वरिष्ठ हस्तियों के इन बयानों पर राजनेताओं, विश्लेषकों और टिप्पणीकारों की ओर से सावधानी भरी लेकिन काफ़ी हद तक सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आई हैं।

पाकिस्तान में आरएसएस की छवि को देखते हुए, कई लोगों ने अप्रत्याशित बताया। कई राजनेताओं और पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। पूर्व वित्त मंत्री असद उमर ने इन टिप्पणियों को एक महत्वपूर्ण घटना बताते हुए लिखा, भारत के महत्वपूर्ण लोगों की ओर से पाकिस्तान के साथ फिर से जुडऩे की बात करते देखना अच्छा है।

होसबाले और पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे, दोनों की टिप्पणियों का जि़क्र करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों के हित के लिए पाकिस्तान और भारत के बीच मतभेदों का समाधान होना बेहद ज़रूरी है।

पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने इस बयान को रुख़ में स्वागत योग्य बदलाव बताया और कहा कि बातचीत की शुरुआत भी दोनों देशों की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकती है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर संबंध सुधरते हैं तो हिन्दू और मुस्लिम- दोनों तरह के अतिवादी कमज़ोर पड़ेंगे। पाकिस्तानी राजनेता मुशाहिद हुसैन सैयद ने इसे ताजग़ी भरा सकारात्मक बयान बताते हुए स्वागत किया और लोगों के बीच संपर्क की अपील की सराहना की। उन्होंने इसे समय की ज़रूरत बताया।

राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार रज़ा रूमी ने इन टिप्पणियों को वास्तव में उत्साहजनक बताया, ख़ासकर लोगों के बीच संपर्क, संवाद, वीज़ा और शांति स्थापित करने में नागरिक समाज की भूमिका के संदर्भ को।

उन्होंने कहा, अब देखना यह है कि क्या भारतीय सरकार उस वैचारिक ताक़त की सलाह मानती है, जिसके सहारे उसकी सत्ता कायम है।

वरिष्ठ पत्रकार कामरान यूसुफ़ ने कहा कि इन टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि सीमा के उस पार कुछ समझ और सोच विकसित हो रही है कि भारत का मौजूदा रुख़ टिकाऊ नहीं है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आरएसएस की प्रभावशाली भूमिका के बावजूद भारत के भीतर प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही है।

हालांकि, कुछ पर्यवेक्षक इस बयान से बहुत अधिक अर्थ निकालने को लेकर अब भी सतर्क बने हुए हैं। पत्रकार शहज़ाद इक़बाल ने कहा कि भारतीय विदेश नीति में तत्काल बदलाव के कोई संकेत नहीं हैं और निकट भविष्य में दोनों देशों के संबंधों में बदलाव की संभावना कम है।

पूर्व शिक्षा मंत्री शफक़त महमूद ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि भारत से आने वाली ऐसी आवाज़ों का स्वागत करते समय पाकिस्तान का विदेश कार्यालय स्वाभाविक रूप से सतर्क रहा है, क्योंकि अतीत में ऐसी कई पहलें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचीं।

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर भारत में गंभीरता का इरादा दिखाई देता है, तो उसे पाकिस्तान में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778951059t_hosbole_(1).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324720&amp;path_article=11</guid><pubDate>16-May-2026 10:34 PM</pubDate></item><item><title>कर्नाटक में हिजाब, कलावा, पगड़ी  पहनकर स्कूल जाने की अनुमति</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324719&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324719&path_article=11]]></link><description>कर्नाटक में सरकार ने ना केवल स्कूल-कॉलेजों में 2022 में हिजाब पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है बल्कि नए आदेश के तहत स्टूडेंट्स को हिजाब के अलावा कलावा, रुद्राक्ष और जनेऊ जैसे धार्मिक प्रतीकों को भी पहनने की अनुमति दी है।

 डॉयचे वैले परसमीरात्मज मिश्र​कीरिपोर्ट

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 13 मई को स्कूलों और कॉलेजों में धार्मिक प्रतीकों को पहनावे के रूप में शामिल करने संबंधी एक नया आदेश जारी किया। इस नए आदेश के तहत छात्रों को स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म के साथ सीमित पारंपरिक और प्रथा-आधारित प्रतीक पहनने की अनुमति दी गई है। इन पारंपरिक प्रतीकों में हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, हाथ में पहने जाने वाले कलावा और रुद्राक्ष जैसी चीजें शामिल हैं।

फरवरी 2022 में कर्नाटक की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनकर स्कूल-कॉलेज जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। राज्य सरकार का नया आदेश सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, सहायता प्राप्त संस्थानों और राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले निजी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होगा।

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूनिफॉर्म अब भी अनिवार्य रहेगी, लेकिन इन प्रतीकों को अतिरिक्त वस्तुओं के रूप में पहना जा सकेगा। आदेश के मुताबिक, किसी भी छात्र को इन प्रतीकों को धारण करने की वजह से प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा और न ही उसे ऐसे प्रतीक पहनने या हटाने के लिए मजबूर किया जाएगा।

क्यों आया ये आदेश?

कर्नाटक सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने मीडिया को बताया कि ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब छात्रों को धार्मिक प्रतीकों की वजह से उनकी पढ़ाई-लिखाई में बाधा पहुंची है। उनका कहना था, धार्मिक रीति-रिवाज छात्रों की शिक्षा और भविष्य के बीच बाधा नहीं बनने चाहिए। 24 अप्रैल की उस घटना से मुख्यमंत्री को बहुत दुख हुआ था जब बेंगलुरु में केसीईटी (कर्नाटक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा में हिजाब और जनेऊ पहनकर आए छात्रों को परीक्षा में प्रवेश देने से रोक दिया गया था। इस तरह की बातें बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। हमें यह फैसला बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था।

हिजाब और पगड़ी की अनुमति, लेकिन बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पर रोक भारत में कंपनियों के नियम क्या कहते हैं?

कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व में मई 2023 में सरकार बनी थी और सत्ता में आने के बाद ही दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया ने कहा था कि उन्होंने राज्य में हिजाब पर प्रतिबंध के आदेश को वापस लेने का निर्देश दिया है। उस वक्त उन्होंने कहा था कि पोशाक और भोजन का चुनाव व्यक्तिगत है और किसी को भी इसमें दखल नहीं देना चाहिए।

क्या था 2022 का हिजाब विवाद

कर्नाटक में पांच साल पहले हिजाब को लेकर विवाद उस वक्त सामने आया जब उडुपी जिले के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में हिजाब पहनकर आने वाली लड़कियों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोक दिया गया। छात्राओं का कहना था कि हिजाब उनकी आस्था और पहचान का हिस्सा है, जबकि कॉलेज प्रशासन ने ड्रेस कोड का हवाला देते हुए उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। छात्राओं के हिजाब पहनने के जवाब में कॉलेज में हिंदू विद्यार्थी भगवा गमछा पहनकर आने लगे और धीरे-धीरे यह विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैल गया। कई शिक्षण संस्थानों में इसकी वजह से सांप्रदायिक तनाव जैसी स्थिति आ गई।

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली तत्कालीन बीजेपी सरकार ने स्कूल-कॉलेज में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार ने अपने आदेश में कहा था कि समानता, अखंडता और सार्वजनिक कानून व्यवस्था को बिगाडऩे वाले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

सरकार के इस आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरकरार रखा। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां यह अभी भी लंबित है। सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था लेकिन दोनों न्यायाधीशों की राय इस पर बंटी हुई थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता (अब सेवानिवृत्त) ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया था, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इसकी अनुमति दी थी।

जस्टिस गुप्ता ने कहा था कि यह केवल एकरूपता को बढ़ावा देने और एक धर्मनिरपेक्ष वातावरण को प्रोत्साहित करने के लिए था लेकिन जस्टिस धूलिया ने राज्य और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर कक्षाओं में हिजाब पहनने के अधिकार को पसंद का मामला और मौलिक अधिकार बताया था।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778950642W-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324719&amp;path_article=11</guid><pubDate>16-May-2026 10:27 PM</pubDate></item><item><title>बिहार में सबसे ज्यादा क्यों बढ़ रहे हैं किशोरों के अपराध</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324650&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324650&path_article=11]]></link><description>बिहार में जघन्य अपराध एक साल में दोगुने से अधिक तो हो ही गए, जुवेनाइल क्राइम के मामले में भी राज्य पूरे भारत में शीर्ष पर पहुंच गया है.

डॉयचे वैले परमनीष कुमार कीरिपोर्ट

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इंडिया-2024 की रिपोर्ट के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि देश भर में जुवेनाइल क्राइम के मामले सबसे ज्यादा बिहार में क्यों बढ़ रहे हैं। जुवेनाइल क्राइम का अर्थ है 18 साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया अपराध। इसके साथ ही, राज्य में नाबालिगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी वृद्धि हुई है। जहां देशभर में जुवेनाइल क्राइम के मामलों में 2024 में 11।2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देश भर में सबसे अधिक किशोर अपराधी बिहार में हैं।

चिंता की बात यह है कि राज्य में विभिन्न श्रेणियों के अपराध में भी सौ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। बिहार में 2023 में हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे जघन्य अपराध के 52,165 मामले दर्ज हुए, वहीं 2024 में यह संख्या 1,07,303 पर पहुंच गई। हालांकि, बिहार में अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से कम है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रति एक लाख की आबादी पर औसत अपराध दर 406.8 है, वहीं बिहार में यह 272.6 है। खासकर अगर बच्चों के प्रति अपराध की बात करें तो देश में 2024 में 1,87,702 केस दर्ज किए गए, जो पिछले साल के 1,77,335 की तुलना में 5।8 प्रतिशत अधिक रहे।

किशोर कर रहे हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण

एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में बिहार में 5.037 आपराधिक वारदातों को किशोरों ने अंजाम दिया। जो पिछले साल के दर्ज 1,818 मामलों से 177 प्रतिशत अधिक है। 2024 में 42,633 नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 33,129 यानी 77.7 प्रतिशत 16 से 18 आयु वर्ग के थे। राज्य में किशोरों पर सबसे अधिक हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण के मामले हैं। 2024 में देशभर में किशोरों पर हत्या के प्रयास के 2004 मामले सामने आए, इनमें सर्वाधिक 673 मामले बिहार में दर्ज हुए। इसी तरह शादी की नीयत से किशोरों द्वारा अगवा किए जाने के सर्वाधिक 257 मामले प्रदेश में सामने आए।

सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय प्रकाश जुवेनाइल क्राइम में वृद्धि को सीधे बेरोजगारी की वजह से हुए पलायन से जोड़ते हैं। वे कहते हैं, इसका मूल समझिए। घर का मुखिया रोजी-रोटी के जुगाड़ में परदेस चला जाता है। गांव-घर में महिलाएं रह जाती हैं। उन्हें भी भरण-पोषण के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। अब बच्चों को कौन देखेगा कि वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं?

चिन्मय कहते हैं, उनका मार्गदर्शन करने वाला तो गरीबी का शिकार होने के कारण घर से बाहर है या फिर पारिवारिक कलह या अन्य वजहों से साथ नहीं रह रहा। परिवार आर्थिक दबाव भी झेल रहा। ऐसी परिस्थिति में बच्चे राह भटकते हैं और अंतत: अपराध की ओर उनका झुकाव हो जाता है या इसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इससे साफ होता है कि यह केवल कानून व व्यवस्था की समस्या नहीं रही, बल्कि यह भविष्य में और गहराने वाले गंभीर पारिवारिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।

शराब माफिया और नशे के सौदागर भी जिम्मेदार

दबी जुबान से ही सही, लेकिन इसे स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं है कि शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है। इसके कर्ता-धर्ता शराब माफिया और उसके सिंडिकेट के लोग हैं। पत्रकार अक्षय बाजपेयी कहते हैं, शराब के धंधेबाज बच्चों-किशोरों से कैरियर का काम लेते हैं। कई ऐसे मामले सामने भी आ चुके हैं। कुछ तो गरीबी के कारण जल्द से जल्द पैसा कमाने की ललक में इनके साथ हो जाते हैं, तो कई ऐश-मौज के लिए पैसे की चाह में उनका साथ देते हैं। अनाप-शनाप धन की चाह में वे अपराध करने से भी परहेज नहीं करते।

अपने फायदे के लिए माफिया आपसी प्रतिद्वंदिता में उन्हें शह देते हैं और यहीं से उनका आपराधिक सफर शुरू हो जाता है। वे कहते हैं, आजकल किशोरवय के लडक़े शराब या सूखे नशे के लती हो जा रहे और फिर इसके लिए जब कहीं से पैसा नहीं मिलता है तो वे अपराध का सहारा लेते हैं। किशोर अपराधियों के खिलाफ गंभीर अपराध के कम, जबकि अधिकतर मामले चोरी, छीन झपटी, वाहन चोरी और बलात्कार के होते हैं। पेशेवर संगठित गिरोह भी नाबालिगों का इस्तेमाल करते हैं। सूखे नशे या ड्रग्स के सौदागर भी इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए महिलाओं-नाबालिगों का सहारा लेते हैं।

ऐसे ही एक मामले में पकड़े गए एक किशोर का कहना था, मेरे एक दोस्त ने बताया था कि पैकेट पहुंचाने का एक काम है। जो जगह बताई जाएगी, उसे वहां किसी को दे देना है। इसके बदले में उसे उतने पैसे मिलेंगे, जो घरवाले नहीं दे सकते। इसी लोभ में यह करने लगा, लेकिन दूसरी बार में ही पकड़ लिया गया। अगर मुझे कोई और काम यहां मिल जाता तो गलत काम क्यों करता।अब यह किशोर अपने परिजन के साथ बिहार के बाहर काम कर रहा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778864761W-3.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324650&amp;path_article=11</guid><pubDate>15-May-2026 10:36 PM</pubDate></item><item><title>इस सादगी पे कौन मर न जाए?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324648&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324648&path_article=11]]></link><description>-मोहन गुरुस्वामी

नेतृत्व में आज सबसे कमतर आंकी जाने वाली गुणवत्ता है सादगी। और वह एक पेन और नोटबुक लेकर तमिलनाडु विधानसभा में चली आई।

तस्वीर देखिए। मुख्यमंत्री। पहले दिन। विपक्ष उन पर मज़ाक उड़ा रहा है। कैमरे चल रहे हैं। और वह नोट्स ले रहे हैं। न तो बीच में बोल रहे हैं, न मेज़ थपथपा रहे हैं, न अपनी बेंचों को संकेत दे रहे हैं। बस लिख रहे हैं। पॉइंट बाय पॉइंट। चुपचाप।

ध्यान दीजिए कि यह कार्य स्वयं क्या है। पेन। कागज़। सुनना। लिखना। बस इतना। कोई आईपैड नहीं। कोई सहायक कान में फुसफुसा नहीं रहा। कैमरों के लिए कोई नाटकीय प्रतिक्रिया नहीं।

आलोचना होने पर सबसे सरल संभव प्रतिक्रिया, वास्तव में आलोचना सुनना, और वह भी एक ऐसे राज्य के सामने, जिसने राजनीतिक नाटक की हर किस्म देख ली है।

हम सन् दो हजार छब्बीस में प्रशिक्षुओं को नौकरी देते हैं जो समीक्षा बैठक में नोटबुक तक नहीं लाते। और यहाँ इक्यावन वर्षीय मुख्यमंत्री, तीन दशक की स्टारडम के बाद, अपनी पहली विधानसभा सत्र में नोट्स ले रहे हैं। इसे दोबारा पढि़ए।

तस्वीर के पीछे के आंकड़े यह हैं, तमिलनाडु, दो हजार चौबीस-पच्चीस। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि ग्यारह दशमलव उन्नीस प्रतिशत। भारत में सबसे ऊँची। चौदह वर्षों में पहली दहाई अंकों वाली वृद्धि। भारत की चार प्रतिशत भूमि। इसकी पाँच दशमलव छियालीस प्रतिशत आबादी। लगभग नौ प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद। तमिलनाडु वेत्की की सीटें एक सौ आठ। विश्वास मत जीत लिया गया, तेरह मई को।

यह कोई छोटा मंच नहीं है। फिर भी वह इसे छोटा-सा ही समझकर चल रहे हैं।

यह दक्षिण भारत और खासकर तमिलनाडु में क्यों काम करता है। दक्षिण भारतीय और खासकर तमिल डीएनए में कुछ ऐसी चीज़ है जो सादगी पर प्रतिक्रिया करती है। कृपया ध्यान दें कि यह शैली की अनुपस्थिति नहीं है, तमिल सिनेमा, तमिल संगीत, तमिल साहित्य में शैली की कोई कमी नहीं, बल्कि दिखावे की अनुपस्थिति है। सादा सफ़ेद वेष्टी में करुणानिधि। कुरता और चप्पलों में वोटिंग बूथ पर राजनिकांत। सादगी को अपनी महत्ता को कम आंकना माना जाता है, कि जो महत्ता आप मुझे दे रहे हैं, वह मुझ पर हल्के से बैठती है। मुझे पता है मैं कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ, यह एक मूल भाव है। राज्य ने पीढ़ी दर पीढ़ी उन लोगों के लिए सबसे गहरी स्नेह रखा है जिन्हें महत्वपूर्ण दिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

फ़्लैश बर्दाश्त किया जाता है। सादगी को प्यार किया जाता है।

विजय, भारत के सबसे व्यावसायिक फिल्म सितारों में से एक होने के बावजूद, हमेशा अपने सार्वजनिक जीवन में इसी रजिस्टर को लेकर चले हैं। कोई एयर-किसिंग नहीं। कोई डिज़ाइनर स्टबल इंटरव्यू नहीं। परिवार के इर्द-गिर्द कोई मैनेज्ड मीडिया सर्कस नहीं। जब भाजपा ने चुनाव के दौरान जोसेफ विजय नाम का अभियान उनके खिलाफ चलाया, तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। चुप रहे और इसे गुजऱ जाने दिया। करूर में एक हजार आठ सौ इक्कीस वोटों से हारने के बाद भी वही चुप्पी। अपनी शक्ल, बालों, नृत्य मुद्राओं पर मज़ाक उड़ाए जाने के बाद भी वही चुप्पी।

नोटबुक उसी प्रवृत्ति का प्रतीक है, कि मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूँ और मैं इसे सिर झुकाकर करूँगा। मैं प्रदर्शन नहीं करूँगा। मैं प्रतिक्रिया नहीं दूँगा। मैं सुनूँगा। नोट करूँगा। प्रक्रिया करूँगा।

यह ठीक वही तरीका है जिससे टेस्ट क्रिकेट का ओपनर नई गेंद खेलता है। वह पहली गेंद पर स्विंग नहीं करता। तीन छोड़ देता है। दो ब्लॉक करता है। सीम देखता है। कलाई देखता है। लंबाई देखता है। जब वह शॉट खेलता है, तब तक उसके पास डेटा होता है। शॉट सरल लगता है। होता नहीं है। वह पहले तीस मिनट की नोटबुक है।

विजय गेंदों को जाने दे रहे हैं। सीम देख रहे हैं। और बाकी सब कुछ। अगर आप धैर्य रखकर गहराई में देखें तो यह उनके अब तक के व्यवहार से पूरी तरह सुसंगत है।

उन्होंने दो दशक पहले सामाजिक कार्य शुरू किया। उनके माता-पिता ने इसे समय से पहले राजनीतिक वाहन में बदलने की कोशिश की। उन्होंने मुकदमा दायर किया। अपने ही माता-पिता के खिलाफ। संगठन बंद कर दिया। अभी तैयार नहीं।

उन्होंने इसे तभी पुनर्जीवित किया जब वे तैयार थे। स्थानीय निकाय चुनावों में मशीनरी परीक्षण किया। जीते। जबकि हम उनकी फिल्में देख रहे थे, उन्होंने बूथ-स्तरीय नेटवर्क बनाए।

हर चुनाव विश्लेषक के अलावा प्रदीप गुप्ता, एक्सिस माय इंडिया, वह व्यक्ति जो लोकसभा दो हजार चौबीस गलत बताकर लाइव टीवी पर रो पड़ा था, दो हजार छब्बीस में भी गलत। वह इतना शांत था।

जीतने के बाद वे एमके स्टालिन के अलवरपेट आवास पर गए। फूलों का गुच्छा। शॉल। गले मिलना। हाथ मिलाना। स्टालिन उनके शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आए थे। फिर भी विजय गए। स्टालिन ने इसे राजनीतिक शिष्टाचार कहा।

एक ऐसे राज्य में जिसकी राजनीतिक डीएनए कड़वाहट पर बनी है, एमजीआर बनाम करुणानिधि, अम्मा बनाम करुणानिधि, तमिल बनाम हिंदी, दक्षिण बनाम उत्तर, गोरे बनाम काले, पहले दिन ही एक मुख्यमंत्री का बदले की भावना के बजाय शिष्टता चुनना एक अलग तरह का शासन परिवर्तन है। और फिर, कृपया इस इशारे की सादगी पर गौर करें। उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति नहीं निकाली। बस उनके घर चले गए।

क्या उन्होंने सब कुछ सही किया? नहीं। सार्वजनिक वेतन पर ज्योतिषी की नियुक्ति गलती थी। उम्मीद की मुद्रा पर चुने गए नेता को फैसले अंधविश्वास को सौंपने नहीं चाहिए। उनकी तारीफ़ यह कि नियुक्ति वापस ले ली गई। तेज़ी से, सार्वजनिक रूप से दिशा सुधार, यह स्वयं एक संकेत था। उन्होंने स्पष्टीकरण नहीं जारी किया। बस उलट दिया। इसे नौसिखिए की गलती कह लीजिए। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि रस्सी लंबी नहीं होगी।

जैसा मैं देखता हूँ, उनकी कार्य प्रणाली सादा, स्वयं के प्रति जागरूक, स्पष्ट, सिर झुकाकर, विस्तार करने से पहले परीक्षण, बोलने से पहले सुनना, गलती होने पर दिशा सुधार करना है।



यह ठीक उसी कार्य प्रणाली जैसी है जो चेन्नई से जुड़े एक और व्यक्ति की है, जिन्होंने दशकों तक चुपचाप शहर, राज्य और देश के लिए कार्य किया है। अलग क्षेत्र। एक ही प्रक्रिया। कोई दिखावा नहीं। कोई शोर नहीं। परिणाम बोलते हैं।

वह व्यक्ति भी तमिलनाडु के लोगों के करीब रहा है। इसलिए नहीं कि उन्होंने खुद को उन पर प्रचारित किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने खुद को बिल्कुल प्रचारित नहीं किया।

एक और बात। तस्वीर में जो व्यक्ति है, उसका लगातार मज़ाक उड़ाया जाता है। उनकी शक्ल का, बालों का, नृत्य मुद्राओं का, उनकी जनछवि का। ठीक है। मज़ाक उड़ाइए। मैं भी अतीत में इसमें दोषी रहा हूँ।

लेकिन अगर पहले बहत्तर घंटे कोई प्रमुख संकेत हैं, तो तमिलनाडु और अगर मैं कह सकता हूँ, भारत को भी, शायद एक ऐसे नेता की प्राप्ति हुई है जो सत्ता के साथ धैर्य, ध्यान और लिखित रिकॉर्ड के साथ व्यवहार करता है।

राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, अपने पहले दिन, कमरे में सबसे सरल काम कर रहा है।

नोटबुक ही संदेश है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778864137ijay_.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324648&amp;path_article=11</guid><pubDate>15-May-2026 10:25 PM</pubDate></item><item><title>सनातन क्या है ?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324552&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324552&path_article=11]]></link><description>-ध्रुव गुप्त

इन दिनों सनातन का हर तरफ शोर है। इस शोर में अनेक देवी -देवताओं और कुछ पौराणिक प्रसंगों की मेरी मानवीय और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं से नाराज होकर कुछ लोगों ने मुझे सनातन-द्रोही घोषित किया हुआ है। मैं नहीं जानता कि उन्हें सनातन की कितनी समझ है। हमारी संस्कृति में सनातन अर्थात शाश्वत वेदों को कहा गया है। वेदों को मानने वाले लोग सनातनी कहे जाते हैं। इन वेदों का सूत्र वाक्य है - एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति नेह ना नास्ति किंचन। अर्थात एक ही ईश्वर है और उसके सिवा कोई दूसरा नहीं है -नहीं है, नहीं है, किंचित भी नहीं है। इस एक सत्य के सिवा वेदों में कोई पूजनीय नहीं है। वेदों में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों की प्रशंसा या स्तुति गाई गई हैं। जैसे अग्नि, वायु, नदी, सूर्य, उषा, पृथ्वी, सोम, अदिति, पूषा, वनस्पति आदि। स्तुति के पात्र तब के प्रतापी योद्धा इंद्र और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता अश्विन कुमार जैसे लोग भी हैं। वेदों के सार उपनिषदों में भी शक्तिपुंज के रूप में एक ही ईश्वर की मान्यता है। हम सब उसके अंश हैं। उपनिषदों के अनुसार यदि स्वयं के ऊर्जा की पहचान हो जाय तो ईश्वर की पहचान हो जाएगी। जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। समुद्र की एक बूंद को जान लो तो समुद्र को जान लोगे। आज के कई देवी-देवता, उनके असंख्य मंदिर और मूर्तियां वेदों की नहीं, पुराणों की उपज हैं। पुराण संभवत: हमारे इतिहास के गुप्त काल से लेकर मध्यकाल तक लिखे गए हैं। हमने जो धर्म और पूजा पद्धति आज अपनाई हुई है वह सनातन नहीं, बल्कि पौराणिक धर्म और पूजा पद्धति है।मैं यह नहीं कहता कि पुराणों के सभी देवी -देवता काल्पनिक हैं। इनमें कुछ ऐतिहासिक पात्र भी रहे होंगे जिनके उज्ज्वल चरित्र या कारनामों के कारण उन्हें देवता या भगवान का दर्जा दिया गया है।

मैं सनातन वेद और उपनिषद वाले ईश्वर को मानता हूं। विशुद्ध और निराकार ब्रह्मांडीय ऊर्जा। उसे जानने या उससे एकाकार होने का रास्ता यह है कि हमें इस सोच को अपने भीतर गहरे उतारना होगा कि हमसब एक ईश्वर या ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अंश हैं और इसीलिए यह समूची सृष्टि ही हमारे परिवार का विस्तार है। सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उस एकत्व से उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही ईश्वर से एकाकार होने का एकमात्र रास्ता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778776917hruv_Gupt_LEKH_PHOTO.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324552&amp;path_article=11</guid><pubDate>14-May-2026 10:11 PM</pubDate></item><item><title>समुद्री रास्ते बनेंगे ताकत का अखाड़ा?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324551&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324551&path_article=11]]></link><description>कुछ संकरे समुद्री रास्ते अब व्यापार ही नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बन गए हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ताइवान और मलक्का के जलडमरूमध्य अब दबाव की इस नई रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं।

डॉयचे वैले परकैस्र्टन क्निप​कीरिपोर्ट

क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोडऩे वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है।

बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी। इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है।

फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है।

खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं। यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।

समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम

मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया। इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं। नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता चुन रही हैं, जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है।

ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं। उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी इन तीन बातों पर टिकी होती है: ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति। जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है।

भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार

होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है। लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में भूगोल की वापसी हो रही है। होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं। इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है। इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं।

विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में फ्री ट्रांजिट यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं। इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा।

समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं। इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती। यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे क=त्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778776618W-11.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324551&amp;path_article=11</guid><pubDate>14-May-2026 10:06 PM</pubDate></item><item><title>कर्नाटक में स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब, जनेऊ पहनने की अनुमति पर कैसी है चर्चा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324496&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324496&path_article=11]]></link><description>कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने पिछली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार के 2022 के आदेश को रद्द करते हुए स्कूल और कॉलेज के छात्रों को हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, शिव माला और रुद्राक्ष पहनने की अनुमति दे दी है.

सरकारी आदेश में सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सीमित सामुदायिक या आस्था-आधारित प्रतीकों की अनुमति दी गई है. यह नया नियम आगामी शैक्षणिक वर्ष से लागू होगा.

आदेश में कहा गया है, हालांकि, ऐसे पारंपरिक और रीति-रिवाज आधारित प्रतीक यूनिफॉर्म के साथ सामंजस्यपूर्ण होने चाहिए और वे यूनिफॉर्म की मूल भावना या मक़सद को प्रभावित, परिवर्तित या कमज़ोर नहीं करने चाहिए.

इसमें यह भी कहा गया है कि इससे अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए. परीक्षाओं में उपस्थिति से जुड़े नियम पहले जैसे ही रहेंगे.

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने पत्रकारों से कहा, कई घटनाएं हुई हैं. 24 अप्रैल को एक छात्र से जनेऊ हटाने के लिए कहा गया था. ऐसी बातें हमारे बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए. मुझे लगता है कि हमें यह फ़ैसला बहुत पहले कर लेना चाहिए था.

उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद फ़रवरी 2022 में कर्नाटक और देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का कारण बना था. हाई कोर्ट की विभाजित पीठ के फ़ैसले के बाद यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

रुख़ में बदलाव क्यों?

कांग्रेस का यह क़दम ऐसे समय आया है, जब बेंगलुरु के एक कॉलेज ने मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश के लिए आयोजित सीईटी परीक्षा में जनेऊ पहनकर आए छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया था.

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह आदेश उस समय आया है, जब दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं केकांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को समर्थन न देने से पार्टी को झटका लगा था.

समुदाय की मांग थी कि सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा जाए क्योंकि वहां 60 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम समुदाय से थे. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने समर्थ शमनूर के पक्ष में फ़ैसला किया.

यह सीट समर्थ के दादा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमनूर शिवशंकरप्पा के पास थी. समर्थ के पिता एसएस मल्लिकार्जुन सिद्धारमैया सरकार में मंत्री हैं और उनकी मां लोकसभा सदस्य हैं.

इस विवाद के बाद पार्टी ने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रमुख और एमएलसी अब्दुल जब्बार को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया. वहीं मुख्यमंत्री ने अपने राजनीतिक सलाहकार और एमएलसी नसीर अहमद को भी हटा दिया.

समर्थ ने 5,708 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की लेकिन एसडीपीआई को 18,975 वोट मिले. इस उपचुनाव ने मुस्लिम समुदाय के भीतर काफ़ी बहस छेड़ दी.

सरकार का यह ताज़ा क़दम ऐसे समय आया है, जब राज्य मुस्लिम संगठनों के महासंघ की ओर से शनिवार को बेंगलुरु में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया जाना है.

उडुपी था केंद्र

हिजाब विवाद दिसंबर 2021 के अंत में उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ था. तब छह मुस्लिम छात्राओं को नई यूनिफॉर्म नीति का उल्लंघन करते हुए हिजाब पहनने के कारण क्लास में प्रवेश नहीं दिया गया.

दो छात्राओं को हिजाब पहनने पर क्लास छोड़ने के लिए कहा गया. 12 छात्राओं ने विरोध किया लेकिन आख़िरकार चार छात्राएं नई नीति के अनुसार, चलने को तैयार हो गईं.

चिक्कमंगलुरु ज़िले के कोप्पल सरकारी फर्स्ट ग्रेड कॉलेज में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई, लेकिन वहां यह विरोध के रूप में सामने आई. तब लड़के भगवा शॉल पहनकर कॉलेज पहुंचे.

हालांकि कॉलेज ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं, अभिभावकों और अन्य स्थानीय नेताओं की बैठक बुलाकर मामले को सुलझा लिया. वहां हिजाब और भगवा शॉल दोनों पर प्रतिबंध लगाया गया जबकि लड़कियों को यूनिफॉर्म से मेल खाने वाला दुपट्टा या स्कार्फ से सिर ढकने की अनुमति दी गई.

लेकिन यह मुद्दा धीरे-धीरे राज्य के कई अन्य ज़िलों में फैल गया. मंड्या ज़िले में हिजाब पहने छात्रा मुस्कान ख़ान के साथ नारेबाज़ी और विरोध की घटना हुई. उनके धार्मिक नारे लगाने के बाद कई हिस्सों में विरोध और प्रतिवाद शुरू हो गए, जिसके कारण कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद करने पड़े.

तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद सरकार के आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरक़रार रखा. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ यह अब भी लंबित है.

हिजाब पर कांग्रेस सरकार के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता आर. अशोक ने कहा, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार दावणगेरे उपचुनाव के परिणामों और अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक के भीतर बढ़ते असंतोष से घबरा गई है.

अपनी गिरती हुई वोट बैंक राजनीति को बचाने और डैमेज कंट्रोल करने की हताश कोशिश में सिद्धरमैया सरकार ने एक बार फिर हिजाब विवाद को ज़िंदा कर दिया है. यह कांग्रेस की पुरानी रणनीति है, जब शासन में विफल हो जाओ तो ध्रुवीकरण का सहारा लो.

उन्होंने आगे कहा, सिद्धरमैया की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की सच्चाई अब सबके सामने आ गई है. इस सरकार में हिजाब को स्वतंत्रता के नाम पर हरी झंडी दी जाती है जबकि भगवा शॉल पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाता है.

यह भेदभावपूर्ण नीति, जिसमें एक धर्म की पहचान को अधिकार और दूसरे की पहचान को नियमों का उल्लंघन माना जाता है. इससे साबित होता है कि कांग्रेस के लिए सेक्युलरिज्म केवल हिंदुओं को निशाना बनाने और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का एक साधन भर है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778754042mages.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324496&amp;path_article=11</guid><pubDate>14-May-2026 3:50 PM</pubDate></item><item><title>ईरान युद्ध क्या खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के गठबंधन का अंत कर देगा?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324445&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324445&path_article=11]]></link><description>-सुमैया नस्त्र

दशकों से फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा भरोसे को स्वाभाविक और गारंटीशुदा माना जाता था, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल की जंग इस समीकरण को बदलते दिख रहे हैं।

जंग के दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने अपने महत्वपूर्ण ठिकानों को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से निशाना बनाए जाने से पैदा हुई रक्षा चुनौतियों को न केवल मिसाइलों के रास्ते की निगरानी की बल्कि अमेरिकी मदद पर भी सावधानीपूर्वक नजऱ रखी।

उन्होंने ख़ुद को एक ऐसी जंग में खिंचा पाया जिसके बारे में उनके अधिकारियों का भी मानना था कि इस जंग से पहले उनसे सलाह तक नहीं ली गई।

क्या इस संकट ने अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के बीच सुरक्षा समझौतों की सीमा को सामने ला दिया है?

क्या यह युद्ध अमेरिकी सैन्य शक्ति पर उनकी निर्भरता को कम करेगा या इसके उलट इसे और मज़बूत करेगा?

ब्रिटेन का विकल्प और सोवियत संघ का डर

गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के सभी देशों का अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग है। अमेरिका सऊदी अरब, क़तर, बहरीन और कुवैत को नेटो के बाहर के प्रमुख सहयोगी देश मानता है और संयुक्त अरब अमीरात को प्रमुख रक्षा साझेदार समझता है।

फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई, जब उसने इस क्षेत्र में एक प्रमुख विदेशी शक्ति के रूप में धीरे-धीरे ब्रिटेन की जगह ले ली।

फारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली दो फैक्टर पर आधारित थी- इलाके की भौगोलिक अहमियत और इसका विशाल तेल भंडार, साथ ही सोवियत प्रभाव का मुकाबला करने का रणनीतिक लक्ष्य।

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से दो साल पहले ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने देश के लिए तेल और फारस की खाड़ी क्षेत्र के भविष्य की अहमियत को भांप लिया था।

साल 1943 में उन्होंने एलान किया था, अमेरिका की रक्षा के लिए सऊदी अरब की रक्षा बहुत अहम है। रूजवेल्ट ने ये टिप्पणी सऊदी अरब को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करने और देश के साथ संबंधों को मज़बूत करने की जरूरत को सही ठहराने के लिए की थी।

साल 1945 में फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने मिस्र की स्वेज़ नहर में स्थित ग्रेट बिटर लेक के जलक्षेत्र में युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर किंग अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से मुलाक़ात की। हालांकि उनकी चर्चाओं के आधिकारिक रिकॉर्ड में तेल का कोई जिक़्र नहीं है, फिर भी इस मुलाकात को आम तौर पर दोनों देशों के बीच खास रिश्तों की शुरुआत माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और लेखक जेफरी एफ. गर्श ने बीबीसी अरबी को बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका के पास दुनिया में सैन्य अड्डों और रसद सहायता का सबसे व्यापक और विस्तृत नेटवर्क था।

उन्होंने आगे कहा कि उस समय अमेरिकी सेना ने अपने विमर्श और नीतियों को विशेष रूप से फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर केंद्रित किया था। 1949 तक, जर्मनी में हवाई अड्डे के बाद, दहरान सबसे सक्रिय अमेरिकी विदेशी हवाई अड्डा बन गया था और युद्ध के बाद के समय में अमेरिकी वैश्विक अभियानों और तालमेल के लिए महत्वपूर्ण था।

गर्श बताते हैं कि उस दौरान सैन्य अड्डे के समझौतों पर हस्ताक्षर करवाने में अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहायता के वादों ने अहम भूमिका निभाई। उनका कहना है कि अमेरिका सऊदी अरब के गोला-बारूद और सैन्य हथियारों की मांग को मानने के लिए तैयार था क्योंकि उसे डर था कि अगर वह इनकार करता है, तो सऊदी अरब सोवियत संघ से हथियार खरीदने लगेगा।

उनके मुताबिक़, बाहरी और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ जंग के बाद के दशक में सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी समझौतों को बढ़ाने का मुख्य कारण बनी रहीं। हालाँकि अमेरिका के साथ गठबंधन का सऊदी अरब के भीतर विरोध था, यह विरोध इसराइल के लिए अमेरिकी समर्थन और फ़लस्तीन के विभाजन की वजह से पैदा हुआ था।

80 में दशक में अमेरिकी दबदबे का एलान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से लेकर 1980 के दशक तक, अन्य खाड़ी देशों के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग सीमित पैमाने पर ही सही जारी रहा। इस सहयोग में सुरक्षा समझौतों और सैन्य प्रशिक्षण से लेकर घरेलू ठिकानों पर अमेरिकी सेनाओं की मेज़बानी तक शामिल थे।

उदाहरण के लिए 1971 में बहरीन के साथ हुए समझौते ने अमेरिका को जुफ़ैर में बंदरगाह बनाने के लिए पूर्व ब्रिटिश नौसैनिक ठिकाने के इस्तेमाल करने की अनुमति दी।

1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने फ़ारस की खाड़ी के प्रति ऐसी नीति अपनाई जिसमें ईरान और सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के दो स्तंभ और अमेरिकी तेल हितों के रक्षक के रूप में देखा गया। क्योंकि अमेरिका शीत युद्ध में सोवियत संघ पर अपने दबदबे के लिए इसे ज़रूरी मानता था।

इस नीति के चलते अमेरिका ने इन दोनों देशों को हथियार मुहैया कराए और उनकी सेनाओं को व्यापक सैन्य प्रशिक्षण दिया।

साल 1973 के खाड़ी जंग के दौरान अमेरिका-खाड़ी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे क्योंकि अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने इसराइल का समर्थन करने वाले देशों, विशेष रूप से अमेरिका को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।

साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने ईरान के शाह और अमेरिका के कऱीबी सहयोगी मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर दो-स्तंभ नीति का अंत कर दिया।

उसी साल सोवियत संघ ने अफग़़ानिस्तान पर आक्रमण किया। इन दो घटनाओं ने फ़ारस की खाड़ी में सोवियत प्रभाव की संभावना को लेकर अमेरिकी चिंताओं को बढ़ा दिया और अमेरिका को इस क्षेत्र में अपने तेल हितों की रक्षा के लिए एक पुख़्ता सैन्य ढांचा तैयार करने के लिए प्रेरित किया।

साल 1980 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने घोषणा की, किसी भी विदेशी ताक़त द्वारा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के किसी भी कोशिश का सैन्य बल समेत सभी ज़रूरी साधनों से मुकाबला किया जाएगा।

कई अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के शासनकाल में भी यही नज़रिया जारी रहा।

ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान 1981 में गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की स्थापना ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और ओमान के बीच सामूहिक सुरक्षा के लिए एक ढांचा दिया।

जीसीसी का मक़सद रक्षा तालमेल था, लेकिन इसका असर सीमित रहा और आखऱिकार अमेरिकी गारंटी क्षेत्रीय ख़तरों के ख़िलाफ़ मुख्य प्रतिरोध रणनीति बन गई।

साल 1980 के दशक में इराक़ और फ़ारस की खाड़ी के देशों के बीच तनाव बढ़ गया और 1990 में इराक़ ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया।

1990 और 1991 के साल, अमेरिकी नीति में कार्टर डॉक्ट्रिन के लागू होने का चरम काल था।

खाड़ी युद्ध के दौरान, अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सऊदी अरब की रक्षा और कुवैत को मुक्त कराने के घोषित लक्ष्य के साथ डेजर्ट शील्ड और डेज़र्ट स्टॉर्म अभियान शुरू किए।

इस जंग ने जीसीसी देशों में बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की शुरुआत को पुख़्ता किया। यह एक ऐसी मौजूदगी थी जो इराक पर नो-फ्लाई जोन को लागू करने के लिए 1990 के दशक में भी जारी रही और इसे खाड़ी देशों की रक्षा करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करने की अमेरिका की क्षमता के प्रदर्शन के रूप में देखा गया।

वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के वरिष्ठ फ़ेलो सुल्तान अलामेर ने बीबीसी अरबी को बताया, 1980 के दशक में फारस की खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था इराक के कुवैत पर किए गए आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए अमेरिकी सहयोग ने यह सुनिश्चित किया कि इन देशों को किसी भी ज़मीनी आक्रमण या अन्य सैन्य ख़तरे से बचाया जाएगा।

2003 में अमेरिका के इराक़ पर आक्रमण और सद्दाम हुसैन का तख्तापलट फ़ारस की खाड़ी में अमेरिका की भूमिका में एक और महत्वपूर्ण मोड़ था।

फारस की खाड़ी के अरब देशों ने अपनी सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखा और अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया। इस दौरान अमेरिका ने बहरीन, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अपने ठिकानों को मज़बूत किया।

साथ ही, सद्दाम हुसैन के पतन ने ईरान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को ख़त्म कर दिया और तेहरान को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर दिया।

इसने जीसीसी देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया।

उसी साल अमेरिका ने घोषणा की कि वह सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान हवाई अड्डे से अपने विमान और अधिकांश सैन्य बलों को वापस बुला रहा है और फ़ारस की खाड़ी में स्थित अपने हवाई संचालन केंद्र को कतर के उदैद हवाई अड्डे पर ट्रांसफऱ कर रहा है।

इस बदलाव का दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ा।

इसके बाद के वर्षों में अमेरिका ने जीसीसी देशों के साथ कई सैन्य, रक्षा और आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें उन्नत हथियार प्रणालियों की बिक्री और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।

उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने पिछले साल अमेरिका में निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई थी।

पहले कहा गया कि सऊदी अरब 600 अरब डॉलर का निवेश करेगा और फिर व्हाइट हाउस ने पिछले नवंबर में घोषणा की कि ये निवेश एक ट्रिलियन डॉलर होगा। इसमें 142 अरब डॉलर का हथियार बिक्री कॉन्ट्रेक्ट भी शामिल है। इसे इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा बताया गया है।

हालांकि, हाल के वर्षों में, खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई ने चीन और यूरोप जैसी अन्य शक्तियों के साथ अपने संबंधों और साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश की है।

कुछ घटनाओं के एक साथ होने से खाड़ी देशों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ये सवाल है कि क्या अमेरिका पर निर्भरता अभी भी एक टिकाऊ विकल्प है?

उदाहरण के लिए, 2019 में सऊदी अरब के तेल भंडारों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों पर अमेरिका की सीमित प्रतिक्रिया ने निराशा का माहौल पैदा कर दिया।

सुल्तान अलामेर कहते हैं, ईरान पर हमला करने के बजाय, अमेरिका ने सऊदी अरब को कुछ एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजने का फ़ैसला किया। इस घटना से सऊदी अरब को यह स्पष्ट हो गया कि तेल भंडारों की रक्षा करने या फ़ारस की खाड़ी को ईरानी हमलों से बचाने के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता मज़बूत नहीं है।

उनके मुताबिक़, इस मुद्दे के कारण सऊदी अरब ने एक नई क्षेत्रीय नीति की ओर क़दम बढ़ाया।

2022 में अबू धाबी हवाई अड्डे पर हुए हूती हमलों की निंदा करने तक ही अमेरिका की सीमित भूमिका के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने भी इसी तरह की निराशा व्यक्त की थी।

2025 में ईरान और फिर इसराइल के कतर पर किए गए हमलों ने अमेरिका के साथ संबंधों की उपयोगिता के बारे में बहस को और भी हवा दी।

फ़ारस की खाड़ी में ग़ुस्सा और निराशा

28 फऱवरी को ईरान के साथ इसराइल-अमेरिकी युद्ध शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले, ओमान के विदेश मंत्री बदर बुसैदी ने घोषणा की कि ईरान-अमेरिका वार्ता में महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रगति हुई है और एक समझौता होने ही वाला है।

जीसीसी के देशों ने ख़ुद को एक ऐसे युद्ध में उलझा हुआ पाया जिसने ईरान के साथ उनके संबंधों को वर्षों के प्रयासों के बाद टूटने के कगार पर ला दिया।

इन रिश्तों को बनाने के लिए इन देशों ने कड़ी मेहनत की थी। अतीत को भुलाते हुए ईरान और अधिकांश जीसीसी देशों के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली हुई थी।

ईरान के हमलों के बाद अरब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी गंभीर नुक़सान पहुंचा। पर्यटन, विमानन, निवेश और डेटा सेंटर्स को निशाना बनाने की वजह से सऊदी अरब, यूएई और क़तर जैसे देश ख़ासे प्रभावित हुए।

18 मार्च को ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित एक लेख में बदर बौसेदी ने अमेरिका पर अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खोने का आरोप लगाया और युद्ध को आपदा बताया।

कई अरब और पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने 9 मार्च को अमीराती अरबपति खलफ हबतूर के एक्स पर किए गए (बाद में हटाए गए) पोस्ट को खाड़ी देशों के अभिजात वर्ग के बीच अमेरिका के प्रति आक्रोश और युद्ध के परिणामों को लेकर उनकी चिंताओं का प्रतिबिंब माना।

ये पोस्ट रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणियों के जवाब में थे। लिंडसे ग्राहम ने खाड़ी देशों से अमेरिका और इसराइल का साथ देने का आग्रह किया था और इनकार करने पर उनके साथ रक्षा समझौतों पर पुनर्विचार करने की धमकी दी थी।

खलफ हबतूर के पोस्ट के एक हिस्से में लिखा था: हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है और हम यह भी जानते हैं कि किसने अपने तथाकथित सहयोगियों से सलाह लिए बिना पूरे क्षेत्र को इस ख़तरनाक टकराव में घसीटा है।।। हमें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत नहीं है जो मध्य पूर्व में हमें बचाने का दावा करे। हम इस बात से इनकार नहीं करते कि ईरान इस क्षेत्र के लिए कितना बड़ा ख़तरा है।।। लेकिन यह एक गंदा खेल है जिसमें कई शक्तियां हमारे क्षेत्र की क़ीमत पर आपस में लड़ रही हैं। हम दूसरों के हितों की रक्षा के लिए इस युद्ध में शामिल नहीं होंगे।

क़तर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता नायेफ़ बिन नाहर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवाद से निपटने के तरीक़े की आलोचना की।

उन्होंने 23 मार्च को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, आज ट्रंप ने अमेरिकी बाज़ार में क़ीमतों पर इसके प्रभाव के डर से ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमले को स्थगित कर दिया, लेकिन 20 दिनों से अधिक समय से खाड़ी देश ईरानी मिसाइलों के निशाने पर हैं और खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का नुक़सान हुआ है, लेकिन इससे उनका मन नहीं बदला है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778691404t.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324445&amp;path_article=11</guid><pubDate>13-May-2026 10:26 PM</pubDate></item><item><title>अराजक चरमपंथी लगते कृष्णमूर्ति</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324444&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324444&path_article=11]]></link><description>-चैतन्य नागर

कृष्णमूर्ति पूरी दुनिया में जन सभाएं करते रहे, छोटे बड़े समूह में लोगों से बातें करते रहे। ईश्वर या भगवान जैसे शब्दों से हमेशा परहेज किया। किसी धर्म ग्रन्थ की पवित्रता या सत्ता को मानने से इंकार किया। नोबेल विजेता ऑल्डस हक्सले ने कृष्णमूर्ति की किताब फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम की भूमिका में कहते हैं कि कृष्णमूर्ति को सुनना बुद्ध को सुनने के सामान है। उन्होंने मृत्यु के बाद जीवन, आत्मा और इस तरह की अस्पष्ट बातों पर कभी कुछ नहीं कहा, और बुद्ध की तरह अपने आतंरिक कलह, दु:ख और समाज में उसकी अभिव्यक्ति को समझने और ख़त्म करने के बारे में ही बोलते रहे। कुछ लोग उन्हें रेशनलिस्ट मानते हैं; कम्युनिस्ट उन्हें अधार्मिक रहस्यवादी कहते हैं। पर सच्चाई यह है कि कृष्णमूर्ति के दर्शन और चिंतन को किसी श्रेणी में रखा ही नहीं जा सकता। किसी भी मत या वाद को वह विभाजन का कारण मानते थे।

उनका मानना था कि वैश्विक संकट की जड़ें वास्तव में मानव चेतना में हैं, और बदलाव वहीँ होना चाहिए। बाहरी अव्यवस्था एक अपरीक्षित, अव्यवस्थित चेतना की ही अभिव्यक्ति है और वाह्य भले ही कितना ही व्यवस्थित क्यों न कर दिया जाए, यदि आतंरिक पर ध्यान न दिया जाये, तो वह वाह्य को नष्ट कर सकता है और अभी तक हुई सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियों का यही हश्र हुआ है। इन आंदोलनों ने संस्थागत, व्यवस्थागत परिवर्तन को अपनी ऊर्जा दी, पर इंसान की बेतरतीब, अव्यवस्थित चेतना को नहीं छुआ। कृष्णमूर्ति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की दिशा और दशा वास्तव में चित्त की आड़ी-तिरछी रेखाएं ही तय करती हैं। इस चित्त की दशा को न समझ कर यदि कोई बाहरी परिवर्तन किया जाए, तो न सिर्फ वह सतही और अस्थायी होगा, बल्कि एक बहुत बड़े भ्रम को भी जन्म देगा।

एक तरफ तो कृष्णमूर्ति भारतीय दार्शनिक परंपरा से कहीं जुड़े हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि प्राच्य दर्शन हमेशा से व्यक्तिगत चेतना में परिवर्तन की बात करता आया है, पर दूसरी ओर कृष्णमूर्ति अलग से कई ऐसे बिंदु उठाते हैं, जो उन्हें हर तरह की परंपरा से अलग भी करते है, और किसी नई परंपरा का निर्माण भी नहीं करते। हिन्दू धर्म की मुख्यधारा और इसकी बागी परंपरादोनों से छिटक कर वह दूर खड़े होते हैं और नए सिरे से जीवन और उसके बुनियादी सवालों पर संवाद करते प्रतीत होते हैं।

क्या कृष्णमूर्ति नास्तिक हैं? क्या वह मूल रूप से एक मनोवैज्ञानिक हैं? क्या उन्होंने दर्शन, धर्म और मनोविज्ञान का एक मिला जुला मिश्रण हमारे सामने प्रस्तुत किया? क्या कृष्णमूर्ति की शिक्षाएं बौद्धिकता में इतनी डूबी हुई हैं, कि वह बुद्धिजीवियों के सामने एक नयी तरह की चुनौती प्रस्तुत करते हैं और आखिर में बुद्धि को भी नकार देते हैं ? ऐसे कई सवाल हैं जो कृष्णमूर्ति के बारे में लोग उठाते हैं। यह तो जरुर कहा जा सकता है कि संगठित धर्मों का, गुरु शिष्य परंपरा का, धर्म ग्रंथों का इतना कठोर विरोध धर्म के इतिहास में किसी ने नहीं किया।

कुछ लोगों का मानना है कि कृष्णमूर्ति एक तरह से चरमपंथी या अब्सोल्युटिस्ट थे। वह अनर्किज़्म के अंतिम छोर पर खड़े प्रतीत होते हैं। इसलिए सतही समाज सुधार में उनका कोई भरोसा नहीं था। न ही वह किसी धार्मिक संगठन के थे, न ही राजनैतिक समूह के, न ही संप्रदाय के, न किसी देश के। अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी ने उनसे जब कहा उन्हें तो कम्युनिस्ट पार्टी में होना चाहिए, तो उन्होंने साफ़ कहा कि वह किसी भी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनका मानना था कि मत और वाद, संगठन और संप्रदाय विभाजन और युद्ध का कारण हैं। वह बार बार कहते रहे कि हम हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई नहीं बल्कि मानव हैं, शेष मानवता का हिस्सा हैं, एक दूसरे से बिलकुल भी अलग नहीं। उनका सवाल था: क्या हम इस धरती पर सहज होकर चलते फिरते रह सकते हैं, बगैर उसे नष्ट किये, खुद को और पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचाए बगैर?
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/17786907381+LqFLRmeL._SY466_.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324444&amp;path_article=11</guid><pubDate>13-May-2026 10:15 PM</pubDate></item><item><title>क्या पीएम मोदी का बयान भारतीयों के लिए चेतावनी है?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324323&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324323&path_article=11]]></link><description>-क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?

क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?

पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था।

पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था।

यानी फिलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाजार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है।

पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा

पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने के निर्देश दिए। साथ ही एक साल तक सोना न खऱीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की। और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की।

भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया। कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है।

वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया।

आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं। और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?

पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का जिक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी।

उन्होंने कहा, भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं। हमें अपनी जरूरत के पेट्रोल-डीजल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं। युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फ़र्टिलाइजऱ के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं। आसमान को भी पार कर गए हैं। पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है।

पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?

ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाजों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है। ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है। भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफी हद तक निर्भर है।

ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं। भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीजल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और एलएनजी गैस के दाम भी बढऩे की आशंका है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है।

द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है। यह साफ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं। भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफर मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए।

विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए गंभीर ख़तरे की आहट है, क्योंकि अगर होर्मुज की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की कीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी। वित्तीय घाटा बढ़ेगा। और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

सोना ना खऱीदने को क्यों कहा?

उन्होंने कहा, सोने की खऱीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है। एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे। आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे।

सोना नहीं खऱीदेंगे। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी

क्यों कहा?

कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है। ऐसे में इन्हें खऱीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की जरूरत पड़ेगी। और जिसकी वजह से रुपया कमजोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा। इससे महंगाई बढऩे की आशंका है।

फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है।

कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर। विशेषज्ञों के मुताबिक इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना खरीदने की भी सलाह दी है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था। 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था। यानी 2024-25 में यह 13.7 फीसदी बढ़ गया।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्वस यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था।

वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए। यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है। भारत में सोने की भारी मांग है। देश हर साल लगभग 800-900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है। कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है। वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24त्न ज़्यादा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है। साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है। और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778599459M-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324323&amp;path_article=11</guid><pubDate>12-May-2026 8:54 PM</pubDate></item><item><title>पत्रकारिता का अर्थ ‘मजे ले लो डॉट कॉम’ नहीं होता!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324322&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324322&path_article=11]]></link><description>-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

(भोपाल के भारत भवन में हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने पर प्रणाम उदन्त मार्तंड के नाम से तीन दिन चले शानदार आयोजन के समापन समारोह में अध्यक्षता करने का मौका मिला। अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने जो कुछ कहा, उसकी खास-खास बातें)

* 30 मई 1826 को, 200 साल पहले हिन्दी का पहला समाचार पत्र शुरू हुआ था, जिसका नाम था उदन्त मार्तंड. साप्ताहिक अखबार था। संपादक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल।

* जिस जगह से अखबार शुरू हुआ, वह जगह थी कोलकाता। कोलकाता में लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं, हिन्दी बोलने वाले कम हंै, इसलिए उदन्त मार्तण्ड जैसा अखबार निकालना और चलाना बहुत बड़ी चुनौती थी।

* उदन्त मार्तंड हिन्दी का पहला अखबार था, लेकिन भारतीय भाषाओं में और भी अखबार पहले से छप रहे थे।

* बांग्ला भाषा में दिग्दर्शन नाम का अखबार 1818 से छप रहा था। अखबार ईसाई मिशनरीज़ वाले निकाल रहे थे और उनका लक्ष्य धर्म प्रचार था।

* बांग्ला में ही का एक और अखबार था समाचार दर्पण। वह भी ईसाई धर्म प्रचार के लिए था।

* 1821 में राजा राममोहन राय ने सम्वाद कौमुदी शुरू किया था. राजा राम मोहन राय बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति थे और उन्होंने महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ जमकर लिखा, बोला और काम किया था.

* 1822 में ही चन्द्रिका नाम का अखबार शुरू हुआ और उसकी खास बात यह थी कि वह राजा राममोहन राय के क्रांतिकारी विचारों का विरोध करने वाला अखबार था। यह भी बांग्ला में ही था।

* राजा राममोहन राय ने 1822 में फारसी में एक अखबार शुरू किया था, जिसका नाम था विरात-उल-अखबार यानी अखबार का दर्पण! 1822 में ही फारसी में एक और अखबार निकला जाम-ए-जहांनुमा मतलब दुनिया को दिखाने वाला दर्पण।

* गुजराती भाषा में 1822 में मुंबई समाचार (पहले नाम था बम्बई समाचार) शुरू हुआ था। यह अखबार आज भी छप रहा है और इसका नाम मुंबई समाचार कर दिया गया है।

* राजा राममोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर ने1822 में यानी आज से 204 साल पहले बंग दूत नाम का अखबार शुरू किया था। मजेदार बात यह है कि यह अखबार चार भाषाओं में था- अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और हिन्दी । अंग्रेजो की हुकूमत थी, इसलिए अंग्रेजी जरूरी थी, अखबार बंगाल से निकला था, इसलिए बांग्ला जरूरी थी। अदालतों की भाषा फारसी हुआ करती थी, उसके लिए फारसी जरूरी थी और सबसे अंत में हिन्दी थी, क्योंकि हिन्दी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा तब भी थी।

* * *

उदन्त मार्तण्ड 30 मई 1826 को शुरू हुआ साप्ताहिक अखबार था, लेकिन डेढ़ साल के बाद ही 4 दिसंबर 1827 को उसका 79वां अंक निकलते ही बंद कर देना पड़ा।

उदन्त मार्तण्ड को बंद क्यों करना पड़ा? क्योंकि वह अखबार अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हिंदुस्तानियों के हित के हेत था उसके पाठक देश भर में थे और वह अखबार डाक से पूरे भारत में भेजा जाता था. डाकखाने सरकारी थे और नीतियां अंग्रेजों की थी, उन्होंने डाक से समाचार पत्र भेजने का जो शुल्क रखा था वह इतना ज्यादा था कि उदन्त मार्तण्ड जैसे अखबार के लिए सर्वाइव करना मुश्किल हो गया. उदन्त मार्तण्ड की तरफ से बार-बार इस बारे में अपील की गई कि अगर अंग्रेजी के और मिशनरीज के अखबारों को भेजने का शुल्क नाम मात्र का है, तो हिन्दी के अखबार को डाक से भेजने पर इतना शुल्क क्यों लिया जाता है? अंग्रेजी हुकूमत उनकी बात क्यों सुनती, क्योंकि उदन्त मार्तण्ड का तो लक्ष्य ही था- हिंदुस्तानियों के हित के हेत।

उदन्त मार्तण्ड को विज्ञापन का सपोर्ट नहीं था. हिंदुस्तानियों की पर्चेसिंग पावर कम थी। हिन्दी भाषा में साक्षरता का प्रतिशत भी बहुत सीमित था, जाहिर है अखबार का प्रचार-प्रसार आसान काम नहीं था।

डेढ़ साल के संघर्षों के बाद उदन्त मार्तण्ड बंद करना पड़ा। जो सुविधाएँ ईसाई मिशनरीज के अखबारों को थीं, हिन्दी के पहले अखबार को बार-बार की अपील के बाद भी नहीं मिली थी।

हिन्दी का पहला अखबार निकलना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी, और उसका बंद होना उससे बड़ी ऐतिहासिक दुर्घटना!

* * *

आज 200 साल में हालात बहुत बदल चुके हैं। उदन्त मार्तण्ड से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का सफर कई मंजिलें तय कर चुका है। भारत की आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता परवान चढ़ी और आज अपने पूरे शबाब पर है।

आज से 40 साल पहले तक देश के टॉप टेन सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में छह अखबार अंग्रेजी के हुआ करते थे, आज टॉप टेन बिकने वाले अखबारों में पांच अखबार हिन्दी के, दो मलयालम के, एक तमिल का, एक तेलुगु का और एक अंग्रेजी का है। टॉप 10 अखबारों में भी शुरू के टॉप चार यानी पहले नंबर से लेकर चौथे नंबर तक के, अखबार हिन्दी के हैं और और अंग्रेजी का सबसे बड़ा अखबार सातवें नंबर पर है।

***


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778598735rakash_-1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324322&amp;path_article=11</guid><pubDate>12-May-2026 8:42 PM</pubDate></item><item><title>बीजेपी के उभार से क्षेत्रीय पार्टियों की पहचान की राजनीति पर कैसा असर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324229&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324229&path_article=11]]></link><description>-जुगल पुरोहित

चार मई को आए चुनावी नतीजों ने इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि बीजेपी का विस्तार क्या क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए ख़तरा है?

पश्चिम और मध्य भारत में झारखंड स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को छोडक़र, बाकी सभी राज्यों में बीजेपी का दबदबा है। पूर्वोत्तर भारत में, मिजोरम को छोडक़र, बाक़ी सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सत्ता है।

दक्षिण भारत में हालांकि यह दबदबा कायम नहीं है। वहाँ बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की सरकार सिफऱ् आंध्र प्रदेश में है।

उत्तर भारत में, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब ही विपक्ष के गढ़ बचे हैं जबकि बाकी सभी राज्यों में बीजेपी की सत्ता है।

ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के अलावा, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव (केसीआर), तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और मायावती जैसे कई पूर्व शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों के नेता सत्ता से बाहर हैं।

क्षेत्रीय दलों ने भारत की राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रूप से 1989 में शुरू हुए गठबंधन के दौर के बाद अपनी जगह बनाई। 2014 से पहले तक दिल्ली में सत्ता की चाबी इन्हीं दलों के हाथों में रही है। वाजपेयी के समय में बीजेपी ख़ुद भी मज़बूत क्षेत्रीय ताक़तों के साथ गठबंधन करके ही उभरी थी।

लेकिन उनकी बढ़ती कमज़ोरी से अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या क्षेत्रीय दल बीजेपी के डबल इंजन वाली सरकार के नारे के सामने कमज़ोर पड़ रहे हैं? या यह बीजेपी के प्रभुत्व का चरम है, जिसका मतबल है कि क्षेत्रीय राजनीति फिर से मज़बूत होगी?

क्या क्षेत्रीय पहचान अब काफ़ी नहीं है?

तीन दशकों से पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रहीं नीरजा चौधरी देश की चुनावी राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को रेखांकित करती हैं। उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, इन चुनावों ने दिखाया है कि सामाजिक कल्याण और क्षेत्रीय पहचान जीत के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मेरा मानना ??है कि युवा मतदाता, जो बहुत महत्वाकांक्षी हैं, राजनीतिक समीकरणों को पुराने मतदाताओं की तरह नहीं देखते।

वे सामाजिक उन्नति का रास्ता देखने पर प्रयोग करने के लिए ज़्यादा खुले हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु में विजय और पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चुना गया।

लेकिन एक और अहम कारण भी है। रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने कहा, वे किसी राजनीतिक दल से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि एक ऐसी कॉर्पोरेट संस्था से लड़ रहे हैं, जिसके पास अत्याधुनिक तकनीकी संसाधन हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की पहुंच से परे हैं।

सरकार कहते हैं, वे पैसे और नवीनतम एआई तकनीक के गठजोड़ से लड़ रहे हैं। क्षेत्रीय दलों को यह समझना होगा कि उनका दुश्मन एक ही है, यानी बीजेपी। लेकिन बीजेपी उन सभी से एक साथ नहीं लड़ेगी, बल्कि एक-एक करके उन्हें ख़त्म करेगी।

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को परिवारवाद वाली पार्टी नहीं बल्कि जमीनी स्तर की पार्टी बताया है। पीएम मोदी का कहना है कि बीजेपी ने विकास के प्रति नज़रिए और कोशिशों से लोकप्रियता हासिल की है।

लेखक और वरिष्ठ पत्रकार निलंजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मा और हिंदुत्व की अपील अब भी कायम है।

बीजेपी की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषक क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी की प्रगति के लिए उसकी गठबंधन रणनीति की ओर भी इशारा करते हैं।

बीजेपी आज सहयोगियों को किस नज़रिए से देखती है, इसके बारे में निलंजन मुखोपाध्याय एक उदाहरण देते हैं।

वह बताते हैं, यह 2012 की बात है, जब मैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था। मेरी उनसे मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे पूछा कि बीजेपी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सहयोगी दलों को कैसे अपने खेमे में लाने की योजना बना रही है?

उन्होंने इसका जवाब एक शब्द में दिया- जीतने की क्षमता। असल में, उनका कहना था कि सहयोगी दल बीजेपी से तभी जुड़ेंगे, जब उन्हें लगेगा कि पार्टी चुनाव में जीतने के क़ाबिल है।

इससे व्यावसायिक दृष्टिकोण दिखता है। आज, उदाहरण के लिए जेडीयू को ही देख लीजिए, या हरियाणा में बीजेपी के मित्र बनाए गए छोटे दलों या शिवसेना को। बीजेपी ने उन्हें अपनी पहचान में ही शामिल कर लिया। जिससे इन दलों की नाममात्र की उपस्थिति के अलावा उनकी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं बची है। वहीं सरकार ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, अगर हम तुलना करें कि बीजेपी ने सहयोगी दलों को कैसे गले लगाया और फिर उन्हें ख़त्म कर दिया।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/177851082500.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324229&amp;path_article=11</guid><pubDate>11-May-2026 8:17 PM</pubDate></item><item><title>सीएम की कुर्सी पर पहला दिन, क्या ये 5 बातें विजय की भविष्य की राजनीति तय करेंगी?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324228&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324228&path_article=11]]></link><description>-ए. नंदकुमार

तमिलगा वेट्री कडग़म यानी टीवीके के नेता विजय ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद अपने पहले भाषण और पहले दिन की गतिविधियों के ज़रिए कई तरह के राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

विजय का पहला भाषण एक बहुआयामी राजनीतिक बयान था। इसमें सरकारी योजनाओं की घोषणाओं से लेकर पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की आलोचना, धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों से किए गए वादे और गठबंधन की राजनीति पर रोशनी डाली गई।

साथ ही मैं एक आम आदमी हूं वाले नज़रिए के साथ, इसमें एक भावनात्मक अपील भी थी। भाषण के अलावा, उनके पहले दिन के कामों को भी राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।

शपथ ग्रहण समारोह के बाद, विजय अपने आधिकारिक काम को शुरू करने के लिए सचिवालय गए और बाद में पेरियार स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। विजय ने लगभग साठ सालों तक डीएमके और एआईएडीएमके के शासन में रहे तमिलनाडु के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ा है।

उन्होंने अपने पहले ही दिन यह दिखाने की कोशिश की है कि राज्य की अगली राजनीतिक दिशा क्या होगी।

डीएमके पर पहला राजनीतिक हमला

मुख्यमंत्री के रूप में अपने भाषण में विजय का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की सीधी आलोचना थी।

विजय ने कहा कि पिछली सरकार ने खज़़ाना ख़ाली कर दिया और चली गई, और इस पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए।

साथ ही उन्होंने कहा कि अगर लोग उन्हें कुछ समय दें तो यह मददगार होगा।

पत्रकार कुबेंद्रन कहते हैं, विजय को तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति को पूरी तरह समझने में कुछ समय लगेगा। उन्होंने इसके लिए खुलकर अनुरोध किया है।

राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, विजय ने अपने शासन की शुरुआत में ही पिछली सरकार को आर्थिक चुनौतियों के लिए जि़म्मेदार ठहराने का राजनीतिक रुख़ अपनाया है। इसे भविष्य में संभावित वित्तीय संकटों या वादों को पूरा करने में देरी के लिए पहले से ही एक राजनीतिक स्पष्टीकरण तैयार करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

वो कहते हैं, टीवीके कोई वैचारिक पार्टी नहीं है, बल्कि यह बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके जैसी अन्य पार्टियों की आलोचना करके उभरी है। इसने इन पार्टियों के ख़िलाफ़ वोट हासिल करके चुनाव जीता। विजय के भाषण से पता चलता है कि पार्टी अपनी विपक्ष की राजनीति जारी रखेगी।

अब तक डीएमके विरोधी राजनीति का नेतृत्व एआईएडीएमके कर रही थी। अब विजय ने वह जगह ले ली है। यह रुख़ व्याप्त असंतोष से निपटने में मददगार साबित हो सकता है।

डीएमके नेता एमके स्टालिन की इस पर तुरंत दिए गए बयान से पता चलता है कि विजय के भाषण का राजनीतिक प्रभाव पड़ा था।

स्टालिन ने कहा, तमिलनाडु का कज़ऱ् निर्धारित सीमा के भीतर है। हमने पिछले फऱवरी के बजट में तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति स्पष्ट रूप से बताई थी। क्या आपको यह बात नहीं पता? उसके बाद ही आपने जनता से कई वादे किए। जिन लोगों ने आपको वोट दिया है, उन्हें धोखा न दें और गुमराह न करें।

क्या बीजेपी का विरोध रहेगा जारी?

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की शपथ ग्रहण समारोह में भागीदारी ने काफ़ी ध्यान आकर्षित किया।

विजय ने राहुल गांधी को भाई कहकर संबोधित किया, जो यह दिखाता है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों के साथ अच्छे राजनीतिक संबंध बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की टीवीके की इच्छा थी। अब यह संभव हो पाया है।

रामू मणिवन्नन कहते हैं, विजय ने सत्ता बचाने और अपने भविष्य के राजनीतिक मार्ग को सुरक्षित रखने की ज़रूरत को देखते हुए बीजेपी के ख़िलाफ़ रुख़ अपनाया है।

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर राजा का कहना है, भविष्य में बीजेपी विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन में विजय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

उन्होंने कहा, राजनीति में विजय का पहला दिन तमिलनाडु के उन मतदाताओं के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला था, जो बीजेपी विरोधी हैं। बीजेपी विरोधी दलों पर ज़ोर देना और पेरियार स्मारक का उनका दौरा, ये सभी संकेत हैं कि विजय द्रविड़ राजनीतिक परंपरा को पूरी तरह से नकारने के रास्ते पर नहीं हैं।

रामू मणिवन्नन कहते हैं, मैं विजय की पेरियार स्मारक यात्रा को नीतिगत बयान के रूप में नहीं देखता। तमिलनाडु में कोई भी पार्टी पेरियार के बिना राजनीति नहीं कर सकती। विजय को भी पेरियार की ज़रूरत है।

उनका कहना है कि विजय ने अन्य गठबंधन दलों को जो महत्व दिया है, वह समय की ज़रूरत है और इस रुख़ का रुझान भविष्य में और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

राजा का कहना है, हालांकि विजय लगातार बीजेपी को वैचारिक शत्रु कहते रहे हैं, लेकिन उन्होंने डीएमके का जितना विरोध किया, उतना बीजेपी की सीधी और गंभीर आलोचना ज़मीनी स्तर पर नहीं की है।

ऐसे में यह देखना होगा कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट और वीसीके जैसी बीजेपी विरोधी दलों के समर्थन से सरकार बनाने वाले विजय बीजेपी की आलोचना को और तेज़ करेंगे या केंद्र सरकार से सीधे टकराव से बचते हुए प्रशासनिक संतुलन की राजनीति का रास्ता अपनाएंगे।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778509786BC-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324228&amp;path_article=11</guid><pubDate>11-May-2026 7:59 PM</pubDate></item><item><title>क्या पीएम मोदी की अपील भारतीयों के लिए चेतावनी है?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324182&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324182&path_article=11]]></link><description>क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?

क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?

पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था.

पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव कोपूरी तरह अस्वीकार्यबताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था.

यानी फ़िलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाज़ार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है.

पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा

पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने को कहा है. साथ ही एक साल तक सोना न ख़रीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की. और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की.

भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया. कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की ज़िम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है.

वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.

आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?

वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.

आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?

पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का ज़िक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी.

उन्होंने कहा, भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं. हमें अपनी ज़रूरत के पेट्रोल-डीज़ल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं. युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और फ़र्टिलाइज़र के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं. आसमान को भी पार कर गए हैं. पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है.

पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?

ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाज़ों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है. ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है. भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा ज़रूरतों के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफ़ी हद तक निर्भर है.

ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं. भारत को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) गैस के दाम भी बढ़ने की आशंका है. साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है.

द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर नेकहा, पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है. यह साफ़ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं. भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफ़र मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है.

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल(पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए.

विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए एक चेतावनी जैसी है, क्योंकि अगर होर्मुज़ की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की क़ीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी. वित्तीय घाटा बढ़ेगा. और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

सोना ना ख़रीदने को क्यों कहा?

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लोगों से एक साल तक सोना ना ख़रीदने की भी अपील की.

उन्होंने कहा, सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे.

सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी.

कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है. ऐसे में इन्हें ख़रीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की ज़रूरत पड़ेगी. और जिसकी वजह से रुपया कमज़ोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा. इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है.

फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है.

कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर. विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना ख़रीदने की भी सलाह दी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था. 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था. यानी 2024-25 में यह 13.7 फ़ीसदी बढ़ गया.

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई)के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व्स यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था.

वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स परलिखा, पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए. यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है. भारत में सोने की भारी मांग है. देश हर साल लगभग 800900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है. कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है. वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24% ज़्यादा है.

विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है. साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है. और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है.

वर्क फ़्रॉम होम के लिए क्यों कहा?

साथ ही पीएम मोदी ने वर्क फ़्रॉम होम का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि हम वर्क फ़्रॉम होम और ऑनलाइन मीटिंग जैसी सेवाओं को फिर शुरू करें.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये बयान भी पेट्रोल और डीज़ल की किफ़ायत से जुड़ा है.

क्योंकि उम्मीद जताई जा रही है कि इस से फ़्यूल का इस्तेमाल कम होगा. लोगों की घर से दफ़्तर आवाजाही कम होगी. बिजली और तेल का कुल इस्तेमाल कम होगा. और बचत होगी.

खाने के तेल के इस्तेमाल को कम करने को क्यों कहा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ऐसे ही खाने के तेल का भी है. इसके आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ती है. हर खाने में तेल के उपयोग में कुछ कमी करें तो वो भी देशभक्ति का काम है. इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी. इससे देश के ख़ज़ाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के लोगों का भी स्वास्थ्य सुधरेगा.

भारत खाने के तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक है. भारत पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ़्लॉवर ऑयल को आयात करता है. भारत इंडोनेशिया, मलेशिया अर्जेंटीना और ब्राज़ील जैसे देशों से खाने के तेल (कुकिंग ऑयल) को आयात करता है.

सरकारी आंकड़ोंके मुताबिक़ भारत अपनी कुल खाद्य तेल (कुकिंग ऑयल/एडेबल ऑयल) ज़रूरत का लगभग 55% से 60% आयात करता है. और इस क्रम में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा ख़र्च करना पड़ता है.

फ़र्टिलाइज़र्स को लेकर क्या कहा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से अपील की कि केमिकल फ़र्टिलाइज़र्स पर अपनी निर्भरता कम करें. भारत दुनिया के सबसे बड़े फ़र्टिलाइज़र्स (उर्वरक) उपभोक्ताओं में है.

यूरिया, डीएपी, पोटाश, और इनके कच्चे माल का बड़ा हिस्सा भारत आयात करता है. इनकी कीमतें जुड़ी होती हैं- प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल, और वैश्विक सप्लाई चेन से.

यानी अगर पश्चिम एशिया संकट से तेल महंगा होता है, गैस महंगी होती है, शिपिंग प्रभावित होती है, तो उर्वरक भी महंगे हो जाते हैं. भारत में किसान सस्ती कीमत पर खाद खरीदते हैं क्योंकि सरकार भारी सब्सिडी देती है. ऐसे में अगर फ़र्टिलाइज़र्स यानी खाद की क़ीमतें बढ़ती हैं तो सरकार का सब्सिडी बिल बहुत बढ़ जाता है.

समर्थन और आलोचना

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीएम मोदी के इस भाषण के बाद कहा कि ये नाकामी का सबूत है, अब जनता को यह बताना पड़ रहा कि क्या ख़रीदें और क्या नहीं.

राहुल गांधी ने एक्स परलिखा, मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे- सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम इस्तेमाल करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं, ये नाकामी के सबूत हैं.

उन्होंने लिखा, 12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है- क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहां जाएं, कहां न जाएं. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें. देश चलाना अब कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम के बस की बात नहीं.

शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स परलिखा, मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष से निपटने में नीतिगत विफलता के बाद अब चुनावी फ़ैसलों का बोझ नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता और उनसे तेल बचाने, यात्रा कम करने या ख़रीदारी घटाने की अपील नहीं की जा सकती.

उन्होंने सरकार को समझाइश देते हुए कहा कि मंत्रियों और नेताओं के लंबे चौड़े मोटर काफ़िलों पर रोक लगाकर, बड़ी-बड़ी रैलियों को एक साल के लिए बंद करके और भव्य शपथ ग्रहण समारोहों को बंद करके, उन्हें वॉच फ़्रॉम होम (घर से देखकर) भी पेट्रोल और डीज़ल बचाया जा सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदरकहती हैं, चुनाव ख़त्म हो गए हैं और इसके साथ ही पीएम मोदी ने लोगों से ईंधन की बचत करने को कहा है और विदेश यात्रा पर ना जाने की सलाह दी है. वो शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और इटली के दौरे पर जा रहे हैं.

वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने लिखा, वैश्विक संकट के इस दौर में मोदी जी ने देशवासियों से एक दूरदर्शी अपील की है. पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी-सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है. यह वैश्विक चुनौतियों के बीच देश को एक स्थिर, सशक्त और अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक सिद्ध होगा.

वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा तेल और गैस को लेकर की गई अपील पर देशवासी अमल करें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778484850ownload_(1).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324182&amp;path_article=11</guid><pubDate>11-May-2026 1:04 PM</pubDate></item><item><title>कितना खतरनाक है चूहों से फैलने वाला हंटावायरस?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324131&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324131&path_article=11]]></link><description>हंटावायरस संक्रमण की नई रिपोर्ट के बाद चिंता बढ़ी है। कैसे फैलता है यह वायरस और इससे बचाव के उपाय क्या हैं?

डॉयचे वैले परस्तुति लालकीरिपोर्ट

अटलांटिक महासागर में होंडियस नामक क्रूज शिप पर सात लोगों के बीमार पाए जाने और तीन लोगों की मौत होने की खबर सामने आई है। इसका कारण शिप पर संदिग्ध हंटावायरस का फैलना बताया जा रहा है। इस जहाज पर करीब डेढ़ सौ यात्री और चालक दल के सदस्य मौजूद थे। हंटावायरस से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद यह जहाज अब स्पेन के कैनरी आईलैंड्स की ओर अपना रुख करेगा। यहां मरीजों को मेडिकल मदद उपलब्ध करवाई जाएगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि केप वर्डे इस ऑपरेशन को पूरा करने में सक्षम नहीं है। उनके मुताबिक, कैनरी द्वीप सबसे नजदीक और सुविधाओं वाला ठिकाना है, और इन लोगों की मदद करना स्पेन का नैतिक व कानूनी कर्तव्य है। वह भी तब, जब उस जहाज पर कई स्पेनिश नागरिक भी मौजूद हैं।

इस नए मामले से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रेस रिलीज के मुताबिक सामान्य जनता के लिए खतरा अभी भी कम है और घबराने या यात्रा प्रतिबंध लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

हंटावायरस कैसे फैलता है?

हंटावायरस का नाम कोरियाई नदी हंतान से लिया गया है। दरअसल, 1950 के दशक में कोरिया के इस इलाके में कई सैनिक इस वायरस से बीमार हुए। लेकिन सन् 1977 में पहली बार इस वायरस की पहचान हुई। हंटावायरस वायरस का एक ऐसा समूह है जो आमतौर पर चूहों और उनकी प्रजातियों में पाया जाता है। अगर यह इंसानों में फैल जाए तो जानलेवा भी साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक हर साल इस संक्रमण से 10,000 से लेकर एक लाख लोग तक प्रभावित होते हैं।

जर्मनी के रॉबर्ट कॉख इंस्टिट्यूट के मुताबिक, हंटावायरस संक्रमित चूहों के लार, मूत्र और मल के जरिए बाहर निकलता है। जब यह पदार्थ सूखकर धूल बन जाता है और हवा में उड़ता है, तो इंसानों में सांस के जरिए उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है। फिर यही वायरस इंसान के शरीर में संक्रमण पैदा करता है और अलग-अलग लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

यह वायरस कई तरह से इंसानों में फैल सकता है। खासकर जब कोई इंसान बाहरी गतिविधियों के दौरान चूहों के मल-मूत्र के संपर्क में आता है जैसे बागवानी करते हुए, लकड़ी काटते हुए या जॉगिंग करते हुए इसके संपर्क में आए। इसके अलावा, वायरस के संपर्क में आने का खतरा तब भी अधिक होता है जब हम ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां चूहों की संख्या बहुत ज्यादा है।

आम तौर पर इसका संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं होता है। कभी-कभी एक दूसरे के काफी पास-पास और लंबे समय तक साथ रहने पर यह एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। यही कारण है कि इसका संक्रमण खासकर घर के सदस्यों या करीबी लोगों में ज्यादा फैलता देखा गया है। साथ ही, संक्रमण के शुरुआती दिनों में इस बीमारी के फैलने का खतरा सबसे अधिक होता है।

कैसे होते हैं हंटावायरस संक्रमण के लक्षण

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हंटावायरस से संक्रमित होने के लक्षण आमतौर पर वायरस से संपर्क के एक से आठ सप्ताह के भीतर शुरू होते हैं। आम लक्षणों में बुखार, सिर दर्द, शरीर दर्द और पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे पेट दर्द, जी मिचलाना या उल्टी होना शामिल है।

यह वायरस इंसानों में दो तरह की बीमारी पैदा कर सकते हैं। पहली बीमारी हंटावायरस कार्डियोपल्मोनरी सिन्ड्रोम (एचपीसीएस) के नाम से जानी जाती है, जिसे ज्यादातर अमेरिका में देखा गया है। यह बीमारी फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है। इससे खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है।

वहीं, दूसरी बीमारी को हेमरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (एचएफआरएस) का नाम दिया गया है। हंटावायरस से होने वाली इस बीमारी को ज्यादातर यूरोप और एशिया में देखा गया है। इस बीमारी में गुर्दे को नुकसान पहुंचता है। बीमारी के आखिरी चरणों में लो ब्लड प्रेशर और खून बहने की समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, कई बार तो गुर्दे अचानक काम करना भी बंद कर देते हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778424265w-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324131&amp;path_article=11</guid><pubDate>10-May-2026 8:14 PM</pubDate></item><item><title>जोसेफ विजय के नाम एक खुला पत्र</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324057&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324057&path_article=11]]></link><description>-गोपालकृष्ण गांधी

प्रिय मुख्यमंत्री-निर्वाचित

सी. जोसेफ विजय,

आपकी शानदार जीत पर हार्दिक बधाई।

मैं उन लगभग 35 फीसदी लोगों में शामिल नहीं था जिन्होंने आपको वोट दिया। लेकिन जैसे ही नतीजे सामने आए, मैं सचमुच चौंक गया। और मेरे मन में यह विचार आया: यह व्यक्ति नया है, यानी अनुभवहीन है, और इसका मतलब यह भी है कि यह ताजा है, साफ है।

मैंने खुद से कहा, इसे कुछ सच्ची बातें बताई जानी चाहिए। यह समझेगा। इसकी युवावस्था के दरवाजे पर मध्य आयु की समझ दस्तक दे रही है। और इसलिए, माननीय मुख्यमंत्री-निर्वाचित महोदय, कृपया इन बातों पर विचार करें:

1. आपने वोट की लड़ाई जीत ली है; अब आपको विधानसभा में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण फ्लोर टेस्ट की लड़ाई जीतनी है। यह जरूरी है कि आप भारत के संघीय और धर्मनिरपेक्ष ढाँचे की रक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं। राज्य को संविधान की मूल संरचना के प्रति अपनी मरियादै (सम्मान) के तहत खड़ा रहने दें। अपनी कुर्सी बचाने के लिए किसी तरह की घबराहट में उस पर समझौता न करें।

2. हर मायने में विजय बनकर सदन में प्रवेश कीजिए, लेकिन याद रखिए कि विजयोल्लास अच्छा वस्त्र नहीं बनाता, वह अहंकार पैदा करता है।

एम.के. स्टालिन, जिनकी जगह आप ले रहे हैं, एक आदरणीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं-ऐसी परंपरा, जिसमें पेरियार द्वारा समुदाय के आत्मसम्मान को जागृत करने का प्रयास और महिलाओं की समानता के लिए उनका संघर्ष शामिल है, एक ऐसे समाज में जो पूर्वाग्रहों से संचालित रहा है। उनका अंदाज अलग था। सदन में उनकी अनुपस्थिति महसूस की जाएगी। आपके पास जो है, वह एक खाली स्लेट नहीं है। आपके पास वह है जो उनके पास नहीं था: एक अनुभवी स्टाइलिस्ट जो आपके लिए लिख सकता है। कृपया द्रविड़वाद क्या है और क्या नहीं, इसकी शब्दाडंबरपूर्ण बहस को अपने ऊपर हावी न होने दें। वे आपके पूर्ववर्ती हैं, शिकारी नहीं। आप उनके उत्तराधिकारी हैं, उनके स्थानापन्न नहीं। और सदन में उदयनिधि स्टालिन की मौजूदगी को एक कठिन द्वंद्व नहीं, बल्कि एक शानदार युगलबंदी बनने दें। जैसा कि केंद्र ने नाडाल का सामना करते हुए फेडरर में देखा है-कौशल का संतुलन।

3. पूछा जा सकता है, आपकी विचारधारा क्या है? इससे घबराइए मत। उनसे कहिए, मेरी विचारधारा है-मेरी मनसाची (अंतरात्मा)।

4. कृपया अधिकारियों को सहयोगी मानिए, अधीनस्थ नहीं। वे यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि चाटुकारिता ही सेवा है। उस भ्रम को दूर कीजिए। उन्हें यह कहकर बिना भय अपनी स्पष्ट राय देने के लिए प्रोत्साहित कीजिए-जैसे सरदार पटेल ने गृह मंत्री रहते हुए अधिकारियों को किया था और निवर्तमान मंत्रियों की आलोचना करने का साहस भी बढ़ाइए।

5. अंत में, मुख्यमंत्री महोदय, कृपया याद रखिए कि राज्य के भीतर आपको पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता बनाते हुए सुशासन और आर्थिक प्रगति कायम रखनी है। लेकिन उससे आगे बढक़र, एक ऐसे भारत के प्रतीक बनिए जो नफरत से मुक्त, निडर और न्यायपूर्ण हो। अगर मैं व्यक्तिगत टिप्पणी पर समाप्त करूँ, तो यह पहली बार है कि आप जैसे एक ईसाई इस राज्य की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं।

नियति के उस उपहार को ईश्वर के हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार कीजिए, जो तमिलनाडु की धर्मनिरपेक्ष पहचान के लिए आया है। किसी को यह मत कहने दीजिए कि आप उस विरासत को कम करके आँकें या दबाएँ। वल्लुवर भी ऐसा नहीं चाहेंगे।

मैं आपको केवल सफलता नहीं, मुख्यमंत्री महोदय, पूर्णता की कामना करता हूँ।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778345715VK_11.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324057&amp;path_article=11</guid><pubDate>09-May-2026 10:25 PM</pubDate></item><item><title>एआई और डीपफेक कैसे बन रहे हैं महिलाओं  के लिए खतरा और कैसे इससे बचें</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324056&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324056&path_article=11]]></link><description>-शुभांगी मिश्रा

एक पॉडकास्ट के वायरल होने के बाद मराठी अभिनेत्री गिरिजा ओक पूरे इंटरनेट पर छा गई थीं। इंटरनेट पर उन्हें लोगों ने नेशनल क्रश भी बुलाना शुरू कर दिया। लेकिन इसके बाद उनकी तस्वीरों का दुरुपयोग जिस तरह से हुआ, और जिस स्तर पर हुआ, उससे वो भी हैरान रह गईं।

मुंबई में एक इंटरव्यू में गिरिजा ने इस बारे में बीबीसी हिन्दी से विस्तार में बात की। उन्होंने बताया, मुझे एक फोटो भेजी गई, जिसमें एक बहुत ही कम कपड़ों वाली औरत के धड़ पर मेरी शक्ल चिपकाई गई, औरत के बराबर में एक बहुत ही कम कपड़ों में आदमी बैठा नजर आ रहा था, जिसके धड़ पर मेरे 12 साल के बेटे का चेहरा लगा हुआ था। वो बहुत बुरा था, मुझे बहुत गुस्सा आया। इस फोटो को देखने के बाद गिरिजा ने दिसंबर 2025 में ओशिवारा पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज करवाई, जिसके बाद काफी फोटो और वीडियो हटा लिए गए हैं।

एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 79 (महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाना), 356 (2) (मानहानि), और आईटी एक्ट की उपयुक्त धाराएं लगाई गई थीं। गिरिजा ओक ने बताया, ये एआई नाम का टूल किसी के भी हाथ में हो सकता है और ये बहुत ही डरावना है।

गिरिजा की कहानी

गिरिजा ओक मराठी सिनेमा की एक जानी-मानी अभिनेत्री हैं। साथ ही वे तारे जमीन पर, शोर इन द सिटी और जवान जैसी हिन्दी फिल्मों में काम कर चुकी हैं।

हम उनसे मुंबई के कार्टर रोड पर मिले जहाँ लोग उन्हें सेल्फी के लिए रोक रहे थे, और गिरिजा मुस्कुराकर अपने प्रशंसकों के साथ फोटो खिंचवा रही थीं।

नवंबर 2025 में सौरभ द्विवेदी के साथ एक पॉडकास्ट सिरीज करने के बाद, गिरिजा इंटरनेट पर वायरल हो गईं। नीली साड़ी में बैठी गिरिजा जिस कॉन्फिडेंस से बात कर रही थीं, उसे लोगों ने बहुत पसंद किया।

लेकिन जहां एक ओर गिरिजा के प्रशंसक थे वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे थे जिन्होंने उनकी फ़ोटो के साथ छेड़छाड़ की और उन्हें पोस्ट कर दिया।

गिरिजा बताती हैं कि शायद इंटरनेट को एक नया चेहरा मिल गया था जिस पर उन्होंने सोचा कि एआई का प्रयोग किया जाए।

उन्होंने कहा, कुछ ऐसी फोटो हैं जिनमें मैंने साड़ी पहनी हुई है वो एकदम से बिकिनी में तब्दील हो गई या मेरा टॉप हटा दिया गया था। लोग ऐसी फ़ोटो में एनीमेशन भी डाल देते हैं, जैसे मेरा आगे झुककर जीभ बाहर निकालना, या अचानक से किसी आदमी का फ्रेम में आ जाना और हम फिर किस करने लगते हैं।

गिरिजा ने काफी कंटेंट नजरअंदाज किया, लेकिन जब उन्हें उनके बेटे के साथ एक एआई फोटो भेजी गयी, तो उन्होंने मुंबई के ओशिवारा थाने में कंप्लेंट दर्ज करवाई जिसके बाद उनकी फ़ोटो सोशल मीडिया से हटाई गईं।

एआई का दुरुपयोग

एआई हम सबकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। ये समझा जाता है कि ये हमारी मदद के लिए हैं लेकिन यहां देखा जा रहा है कि इसका दुरुपयोग हो रहा है और इसके निशाने पर हम सब हैं।

ये भी देखा जा रहा है कि एआई के ज़रिए ख़ासकर महिलाओं और बच्चों के आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो बनाए जाते हैं और उन्हें सर्कुलेट कर दिया जाता है। इसमें एआई की मदद से डीपफेक जैसे कई टूल्स हैं जिनका इस्तेमाल किया जा रहा है।

हाल ही में तमिलनाडु में लड़कियों के फ़ेक वीडियो बनाए जाने का एक मामला सामने आया था।

यहां एक छात्र ने कुछ छात्राओं की फ़ोटो एआई के ज़रिए मॉर्फ करके ऑनलाइन पोस्ट कर दी थी। इस मामले में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की और 20 वर्षीय छात्र को गिरफ्तार भी किया।

वहीं ये भी देखा गया है कि लोग बदले की भावना से भी ऐसे वीडियो बनाते हैं। ऐसा एक मामला असम में सामने आया था।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला के पूर्व में रहे बॉयफ्रेंड ने बदले की भावना से महिला की एआई के ज़रिए फ़ोटो में बदलाव किए और उन अश्लील फ़ोटो को ऑनलाइन पोस्ट कर दिया। ये तस्वीरें पोस्ट करके उसने लाखों रुपये भी कमाए।

विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि न्यूडिफिकेशन ऐप्स, यानी जिन ऐप्स के जरिए फोटो से छेड़छाड़ की जाती है, आजकल बहुत आम हो गए हैं।

गृह मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि 2025 में नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर क्राइम्स अगेंस्ट वीमेन के 76,657 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में ऐसे 48,335 मामले सामने आए थे।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778344826BC-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324056&amp;path_article=11</guid><pubDate>09-May-2026 10:10 PM</pubDate></item><item><title>अर्थव्यवस्था की ताकत और विकास के वाहक हैं प्रवासी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323948&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323948&path_article=11]]></link><description>-रिचर्ड महापात्रा

आप्रावसन (इमिग्रेशन) दुनिया भर में राजनीतिक संघर्ष का एक प्रभावशाली हथियार बन चुका है। पिछले एक दशक से अधिक समय से यूरोप से लेकर उत्तरी अमेरिका तक और एशिया से लेकर अफ्रीका तक, देशों की आंतरिक चुनावी राजनीति ने प्रवासी-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया है। अब यह स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक एजेंडा बन गया है और लगातार अप्रवासी-विरोधी विजिलेंटिज्म (कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति) को भी उकसा रहा है।

वर्ष 2015-2016 के दौरान, जब शरणार्थी संकट चरम पर था, तब यूरोप में इस तरह की कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं व्यापक रूप से देखने को मिली थीं। वर्तमान में यह प्रवृत्ति आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अनेक देशों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।

21वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में आप्रवासन को लेकर भारी आक्रोश देखा गया, विशेष रूप से उन समृद्ध देशों में जिन्होंने वैश्विक संपदा के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। लोगों के एक देश से दूसरे देश में जाने पर रोक लगाने के लिए प्रतिबंध लगाए गए, नीतियां बनाई गईं और यह सब स्थानीय अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय हितों की रक्षा के नाम पर किया गया।

आज के इस बंटे हुए और अलग-थलग पड़ते वैश्विक परिदृश्य में एक अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी होना ऐसी पहचान बन गया है, जो किसी भी समय राजनीतिक हमलों और उथल-पुथल का निशाना बन सकता है।

हालांकि आप्रवासियों के खिलाफ गढ़ी जा रही धारणाओं के विपरीत सांख्यिकीय रूप से अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अब भी अल्पसंख्यक हैं। 2024 के मध्य तक उनकी संख्या लगभग 30.4 करोड़ थी, जो दुनिया की कुल आबादी का केवल 3.7 प्रतिशत है, हालांकि इसमें लगातार वृद्धि हो रही है।

फिर भी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अपवाद ही हैं, क्योंकि अधिकांश लोग अपने-अपने देशों के भीतर ही पलायन करते हैं (आंतरिक प्रवासी)। अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी श्रमिकों का है, जो मेजबान देशों की श्रमशक्ति का महत्वपूर्ण आधार हैं।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) की नवीनतम वल्र्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026 में स्थानीय और व्यापक विकास में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में उन्हें वैश्विक रणनीतिक संपदा बताया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है, इक्कीसवीं सदी में प्रवासन मानव विकास को आकार देने वाली एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा है।

इसे दुनिया के बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य के संदर्भ में समझना चाहिए। कुछ देशों की आबादी अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है; कुछ देशों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार तेज है, जबकि कुछ देश अब उस जीवन प्रत्याशा स्तर तक पहुंच रहे हैं जिसे आधुनिक दुनिया में स्वस्थ माना जाता है। इसलिए देशों की जरूरतों के अनुसार मानव संसाधनों अथवा जनशक्ति के संतुलित वितरण की आवश्यकता होती है।

मानव इतिहास में प्रवासन हमेशा एक महत्वपूर्ण रणनीति रहा है, जिसने मानव समाज को आज के स्वरूप तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) का कहना है कि प्रवासन वैश्विक स्तर पर मानव विकास को आगे बढ़ाने वाली एक प्रमुख शक्ति है। अपनी रिपोर्ट में संस्था ने प्रवासियों के सामाजिक और आर्थिक योगदान का विस्तृत विश्लेषण किया है।

अंतरराष्ट्रीय आप्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि (रेमिटेंस) वर्ष 2025 में 913 अरब डॉलर तक पहुंच गई है और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों को इस विदेशी धन प्रवाह का सबसे बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है।

इसका महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इन देशों के लिए रेमिटेंस की राशि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) की संयुक्त राशि से भी अधिक है। वर्ष 2023 में भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 656 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ, जबकि एफडीआई और ओडीए की संयुक्त राशि 638 अरब डॉलर थी।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778248904own-to-earth_import_library_large_2020-05-06_0.59739200_1588744545_migrants2.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323948&amp;path_article=11</guid><pubDate>08-May-2026 7:31 PM</pubDate></item><item><title>हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है और क्या होगा इसका असर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323947&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323947&path_article=11]]></link><description>-उमंग पोद्दार

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने हेट स्पीच यानी नफरती भाषण के मामले में बुधवार 29 अप्रैल को एक अहम फैसला दिया है। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने कई याचिकाएँ थीं।

कुछ याचिकाओं में माँग थी कि हेट स्पीच के मुद्दे पर कानून में संशोधन होना चाहिए। ऐसे नए प्रावधान लाने चाहिए जिससे हेट स्पीच को रोका जा सके।

कुछ की माँग थी कि कोर्ट को विशेष जाँच टीम बना कर हेट स्पीच की घटनाओं पर जाँच की निगरानी रखनी चाहिए। वहीं, कई याचिकाएँ कुछ कथित हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ थीं। इसमें याचिका दायर करने वालों की माँग थी कि ऐसे नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के लिए क़ानून में फिलहाल कई प्रावधान मौजूद हैं और कोर्ट इसमें कोई नया संशोधन लाने के लिए आदेश नहीं दे सकता।

कई मामलों में कार्रवाई की भी माँग थी। इनमें अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के भाषणों, हरिद्वार और दिल्ली में धर्म संसद से जुड़े केस, कोरोना काल में तबलीग़ी जमात के बारे में दिए गए बयान जैसे मामले शामिल हैं। कोर्ट ने इन सभी मामलों को भी ख़ारिज कर दिया। सिर्फ चार याचिकाओं पर अभी सुनवाई जारी रखी है।

आइए समझते हैं, इस फैसले में क्या हुआ और सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला क्यों अहम है।

कौन-कौन से मामले कोर्ट के सामने थे?

कोर्ट के सामने एक दर्जन से ज़्यादा याच?िकाएँ थीं। इनमें पिछले कुछ सालों के सबसे बड़े मामले भी थे जिनमें आरोप था कि किसी समुदाय, ख़ासकर मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण दिए गए हैं।

एक मामला सुदर्शन टीवी चैनल से जुड़ा था। अगस्त 2020 में सुदर्शन टीवी के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने कथित यूपीएससी जिहाद के बारे में ट्विटर (अब एक्स) पर टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि कुछ दिनों में वे टीवी पर अपने कार्यक्रम में यह बात करने वाले हैं कि संघ लोक सेवा आयोग या यूपीएससी की परीक्षा में मुसलमानों को हिंदुओं के मुकाबले बढ़ावा दिया जाता है।

उन्होंने दावा किया कि उन्हें ज़्यादा उम्र तक परीक्षा देने की इजाजत और परीक्षा देने के ज़्यादा मौके दिए जाते हैं। इसके खिलाफ कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इनका कहना था कि ये सारी बातें झूठी हैं और भारत में टीवी चैनलों से जुड़े नियमों के खिलाफ हैं।

यही नहीं, इस कथित मुद्दे से जुड़े चार एपिसोड टीवी पर प्रसारित हुए थे। इसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए कहा था कि इस कार्यक्रम का प्रसारण रुकना चाहिए या नहीं। हालाँकि, सरकार ने इस प्रसारण को रोका नहीं था।

उसके कुछ वक्त बाद साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने बाक़ी बचे एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। उसके बाद से यह मामला कोर्ट में लंबित था। साथ ही, और भी याचिकाएँ थीं, जो कथित तौर पर कोरोना जिहाद से जुड़ी रिपोर्टिंग के खिलाफ थीं। साल 2020 में कोरोना काल के दौरान कई चैनलों ने खबरें चलाई थीं कि तबलीगी जमात ने भारत में कोरोना वायरस फैलाया है।

बाद में, इस बात को झूठ पाया गया था। इसके खिलाफ भी याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से कार्रवाई की माँग की थी।

इसके अलावा, दिसंबर 2021 में दिल्ली और हरिद्वार में हिंदू धर्म संसद हुए थे। इसमें कई वक्ता धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने, मुस्लिम प्रधानमंत्री न बनने देने, मुस्लिम आबादी न बढऩे देने समेत धर्म की रक्षा के नाम पर विवादित भाषण देते हुए दिखाई दिए।

साथ ही, कुछ याचिकाकर्ताओं ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ आंदोलन के दौरान भाजपा के नेताओं, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के दिए गए बयानों पर कार्रवाई की माँग की थी।

कई ऐसी भी याचिकाएँ थीं जिनका कहना था कि हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच दी गई है।

इन मामलों में द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म की कई कथित टिप्पणी भी शामिल थी।

इनमें कई याचिकाओं में यह माँग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस को एफ़आईआर दायर करने का आदेश दे और उसके बाद तहकीकात और कार्रवाई पर निरंतर निगरानी रखें।

कई याचिकाएं थीं जिनमें कहा गया था कि हेट स्पीच के मामलों में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। यह कोर्ट की अवमानना है। साथ ही, कुछ याचिकाओं की माँग थी कि कोर्ट सरकारों को मॉब लिंचिंग रोकने के साल 2018 के अपने दिशा-निर्देश को लागू करने का आदेश दे।

सुप्रीम कोर्ट ने किन चार मामलों को जारी रखा?

पिछले महीने 29 अप्रैल के फैसले में कोर्ट ने इनमें से कई याचिकाओं को खारिज कर दिया। यानी, अब ये मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं हैं। अब इन मामलों में जहाँ पर पुलिस की तहकीकात या कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया चल रही, वे जारी रहेंगी। फिलहाल केवल चार मामले हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी।

इनमें केरल के स्पीकर ऐन। शमशीर, उदयनिधि स्टालिन समेत कुछ नेताओं के खिलाफ अवमानना याचिकाएँ थीं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि उन्होंने कथित तौर पर हिंदू भगवानों का अपमान किया था। इससे समाज में सांप्रदायिक शांति भंग हो सकती थी।

एक मामला गुंटूर के मेयर कवाती मनोहर नायडू के कुछ बयानों के खिलाफ है। वहीं, एक दूसरा केस अजमेर शरीफ दरगाह के खिलाफ एक व्यक्ति के बयान से जुड़ा है। इन सब याचिकाओं में कहा गया है कि पुलिस ने शिकायत के बाद भी कोई एफ़आईआर दायर नहीं की। यह कोर्ट के दिशा-निर्देश के खिलाफ जाता है।

कोर्ट ने कहा कि इन चार याचिकाओं में प्रशासन ने कोर्ट के सामने अपना जवाब दायर नहीं किया था कि उन्होंने क्या कार्रवाई की। इसलिए वे इन केस में आगे सुनवाई जारी रखेंगे।

बाक़ी मामलों के लिए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने राज्यों से एक स्टेटस रिपोर्ट माँगी थी। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में एफआईआर दायर हो चुकी है।

परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के बयानों पर कोर्ट ने कहा कि उनके भाषणों से किसी प्रकार की हिंसा के लिए उकसाया नहीं गया था।

हालाँकि, कोर्ट ने एक बिंदु पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से असहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दायर करने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि हेट स्पीच से जुड़े प्रावधानों के तहत एफआईआर दायर करने के लिए उचित अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत होती है।

हेट स्पीच से जुड़े इस फैसले के क्या मायने हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के कानून और कोर्ट के पहले के फैसलों से यह साफ है कि अगर किसी संज्ञेय जुर्म (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस) की जानकारी पुलिस को दी जाती है तो पुलिस को एफआईआर दायर करना जरूरी है। संज्ञेय जुर्म यानी ऐसे अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के किसी अभियुक्त को गिरफ़्तार कर सकती है। साथ ही, कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हो तो किसी व्यक्ति के पास अनेक कानूनी विकल्प हैं। वे वरिष्ठ पुलिस अफसर के पास शिकायत कर सकते हैं।

उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं। अगर मजिस्ट्रेट भी मामले में कार्रवाई करने से मना कर दे तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी जा सकते हैं।

पुलिस में एफआईआर दायर करने के बाद मजिस्ट्रेट के पास शक्ति होती है कि वे अलग-अलग पड़ाव में जाँच पर निगरानी रख सकें। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के मुद्दे पर भारत में अनेक कानून हैं। यही नहीं, साल 2017 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कानून में संशोधन लाने के लिए सुझाव दिया था।

लॉ कमीशन के सुझावों पर अमल करना है या नहीं, ये संसद की जिम्मेदारी है और उसमें सुप्रीम कोर्ट को दख़ल नहीं देना चाहिए।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मुद्दे पर कोई क़ानून नहीं है तो कोर्ट कुछ निर्देश जारी कर सकता है, जैसे कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए किया था।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778248292upreme-court_6.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323947&amp;path_article=11</guid><pubDate>08-May-2026 7:21 PM</pubDate></item><item><title>तमिलनाडु के राज्यपाल पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323922&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323922&path_article=11]]></link><description>तमिलनाडु विधानसभा का रिज़ल्ट 4 मई को आ चुका है जिसमें एक्टर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है.

लेकिन अब तक राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उनको सरकार बनाने का न्योता नहीं भेजा है. उनके इस फ़ैसले ने अर्लेकर को सवालों के घेरे में ला दिया है.

234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की ज़रूरत होती है. इस हिसाब से विजय की पार्टी के पास अकेले दम पर बहुमत नहीं है.

राज्यपाल ने विधानसभा भंग तो कर दी है लेकिनराजभवनकी ओर जारी बयान में भी कहा गया है कि टीवीके अब तक विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं जुटा सकी है.

लेकिन आम तौर पर परिपाटी रही है कि चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को राज्यपाल सरकार बनाने का न्योता देते हैं.

विजय ने भी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. उसके बावजूद उनको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करने के राज्यपाल के फ़ैसले पर सवाल उठ रहे हैं.

राज्यपाल की क्यों हो रही है आलोचना?

जब विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया में राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

अतीत में ऐसी परिस्थितियों में राज्यपालों ने अलग-अलग तरीके अपनाए हैं. कई बार सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाया गया, जबकि कुछ मामलों में बहुमत साबित करने वाले गठबंधन को प्राथमिकता दी गई.

इसी वजह से कई बार विवाद भी पैदा हुए. कांग्रेस, लेफ़्ट पार्टियों समेत कई नेताओं ने विजय को सरकार बनाने के लिए ना बुलाने के गवर्नर के फ़ैसले की आलोचना की है.

कांग्रेस नेता और पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम नेलिखा, अगर किसी राजनीतिक गठबंधन या राजनीतिक दल को विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल का कर्तव्य क्या होता है? सबसे बड़े दल के नेता को, विधानसभा सदस्यों की संख्या के आधार पर, सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए. यही राजनीतिक परंपरा है. यही संसदीय मर्यादा है. जिस मंच पर उस दल के नेता को यह साबित करना होता है कि उनके पास बहुमत का समर्थन है, वह विधानसभा है, न कि राजभवन. यही सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. मैं तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की सराहना करता हूँ कि उन्होंने इस नियम को स्पष्ट रूप से सामने रखा और उस पर ज़ोर दिया.

इससे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की तमिलनाडु यूनिट ने भी विजय को बिना किसी देरी के सरकार बनाने का न्योता देने की मांग की है.

एक्स पर पोस्ट करते हुए सीपीआई (एम) नेलिखा, हाल ही में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जनता ने ऐसा जनादेश नहीं दिया है, जिससे कोई एक पार्टी या गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना सके.

ऐसी स्थिति में 108 विधायकों के साथ टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. इसके अनुसार, केवल टीवीके नेता विजय ने ही सरकार बनाने का दावा पेश किया है.

बीजेपी संविधान के ख़िलाफ़ राज्यपाल के माध्यम से काम करने और उन्हें अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करने का रवैया अपनाती रही है. इसी क्रम में तमिलनाडु के राज्यपाल उन्हें पदभार ग्रहण करने के लिए आमंत्रित करने में देरी कर रहे हैं और इनकार कर रहे हैं. यह अस्वीकार्य है.

नियम क्या कहते हैं?

बीबीसी तमिल के मुताबिक सेवानिवृत्त न्यायाधीश हरिपरंथमन कहते हैं, राज्यपाल यह नहीं कह सकते कि वह केवल तभी शपथ ग्रहण की अनुमति देंगे जब पूरी संख्या दिखाई जाए.

उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है. जब किसी (पार्टी) के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तब दावेदार पार्टी से संख्या साबित करने के लिए कहना गलत नहीं है.

उन्होंने आगे कहा, लेकिन साथ ही यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी ताकत दिखाने पर ही शपथ ग्रहण की अनुमति दी जाएगी. बहुमत साबित करने की सही जगह विधानसभा होती है.

सुप्रीम कोर्ट के वकील करपका विनायगम का कहना है, अगर राज्यपाल को दावेदार पार्टी पर भरोसा है, तो वह सरकार बनाने के लिए न्योता देंगे.

उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को जवाब देना चाहिए. इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती, लेकिन साथ ही वह बहुत ज्यादा समय भी नहीं ले सकते.

उन्होंने कहा, विधानसभा भंग होने के बाद उसे लंबे समय तक खाली नहीं रखा जा सकता, इसलिए राज्यपाल को इस मामले में जल्दी फ़ैसला लेना चाहिए.

सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा. राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद की शपथ दिलाएंगे.

राज्यपाल किसे बुलाएं: सरकारिया आयोग के मानदंड

जून 1983 में केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र सरकारों के संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया आयोग का गठन किया था. राज्यपाल की भूमिका पर विचार करते हुए आयोग ने सुझाव दिया था कि मुख्यमंत्री चुनते समय राज्यपाल को कुछ सिद्धांतों का पालन करना चाहिए:

विधानसभा में जिस पार्टी या दलों के गठबंधन को सबसे व्यापक समर्थन प्राप्त हो, उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए.

राज्यपाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार बने- न कि ऐसी सरकार बनाने की कोशिश करना जो उनकी पसंद की नीतियों को आगे बढ़ाए.

अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल को इस क्रम में आमंत्रित करना चाहिए:

चुनाव पूर्व गठबंधन,
सबसे बड़ी एकल पार्टी जो बहुमत का समर्थन जुटा सके,
चुनाव बाद बना गठबंधन जिसके पास आवश्यक संख्या हो,
चुनाव बाद बना ऐसा गठबंधन जिसे बाहर से समर्थन देने वाले सहयोगी मौजूद हों.

राज्यपाल के इस रुख़ को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के एसआर बोम्मई केस के फ़ैसले के विपरीत माना जा रहा है.

उस फ़ैसले में कहा गया था कि सरकार के बहुमत की जांच केवल विधानसभा के पटल पर हो सकती है, राजभवन में नहीं.

इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद से राज्यपाल आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं और सदन में विश्वास मत के लिए तारीख तय करते हैं.

एसआर बोम्मई केस के मुताबिक़ सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का सबसे शुरुआती इस्तेमाल साल 1996 और 1998 में हुआ था, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.

बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार ने संवैधानिक मामलों के जानकार आलोक प्रसन्ना कुमार से बात की. उन्होंने भी 1994 के एस आर बोम्मई केस का ज़िक्र करते हुए कहा, चुनाव के बाद अगर किसी एक दल को या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत नहीं मिलता तो सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना चाहिए.

और अगर बाद में सबसे बड़ा दल (सिंगल लार्जेस्ट पार्टी) भी कहे कि उनके पास बहुमत नहीं है तो पोस्ट पोल अलायंस को बुलाना चाहिए.

हालांकि आलोक प्रसन्ना कुमार ने ये भी कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि यही करना है. गवर्नर कई बार अपने विवेक का इस्तेमाल करके स्थिति को देखते हुए फ़ैसला कर सकता है.

आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं कि सरकार के शपथ ग्रहण करने के बाद सामान्य तौर पर बहुमत साबित करने के लिए 48 घंटों का समय दिया जाता है. ऐसा इसलिए होता है ताकि सरकार बनाने वाले दल को दूसरी पार्टी के विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का मौक़ा ना मिल पाए.

आलोक प्रसन्ना कुमार के मुताबिक़, तमिलनाडु के केस में जब विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया तो गवर्नर को चाहिए था कि उनको सरकार की शपथ दिलाते. फिर 48 घंटे के अंदर कहते कि चलो बहुमत साबित करो. फिर ये विजय का काम होता कि वो विधानसभा के फ़्लोर पर बहुमत साबित करें. तो इस हिसाब से यहां राज्यपाल ने बिलकुल ग़लत किया.

तमिलनाडु की स्थिति

जब किसी विधानसभा चुनाव में कोई भी राजनीतिक पार्टी या गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो उसे हंग असेंबली या त्रिशंकु विधानसभा कहा जाता है.

ऐसे में तमिलनाडु की सियासत में कई सवाल उछल रहे हैं कि क्या राज्यपाल जानबूझकर सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे हैं. या फिर क्या परंपरागत रूप से प्रतिद्वंद्वी रहीं डीएमके और एआईएडीएमके की गठबंधन सरकार की संभावना भी बन सकती है.

टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार बनाने के लिए कुछ विकल्प हो सकते हैं.

इनमें से एक है दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाना, और इसके लिए केवल कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन पर्याप्त नहीं होगा. ऐसे में दो-दो सीटों वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और सीपीआई ने भी टीवीके को समर्थन देने के संकेत दिए हैं.

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने भी दो सीटें हासिल की हैं और उसने भी संकेत दिया है कि वह अगली सरकार को रचनात्मक और आलोचनात्मक समर्थन दे सकती है. इस तरह टीवीके प्लस की कुल संख्या 119 तक पहुंच सकती है, जो बहुमत के आंकड़े से आगे है.

दूसरा विकल्प अल्पमत सरकार बनाने का है.सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्यपाल टीवीके को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, और फिर टीवीके राज्य की सियासी पार्टियों को अपना सहयोगी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है. हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके की तरफ से इस दिशा में अभी किसी तरह के संकेत नहीं मिले हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778234930mil.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323922&amp;path_article=11</guid><pubDate>08-May-2026 3:38 PM</pubDate></item><item><title>भारत में हर घंटे एक किसान की आत्महत्या: 2024 में मामूली कमी के बावजूद 10,546 किसान व खेतिहर मजदूरों ने दी जान</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323900&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323900&path_article=11]]></link><description>एनसीआरबी की भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की, जो कुल आत्महत्याओं का 6.2% है।

इनमें 5,913 कृषि मजदूर (56%) हैं, जो पांच साल में सबसे अधिक है।

हर दिन औसतन 28 किसान व मजदूर जान दे रहे हैं और हर घंटे लगभग एक किसान आत्महत्या कर रहा है।

2022 के बाद से कुल संख्या में मामूली कमी के बावजूद किसानों और कृषि मजदूरों की आत्महत्याएं चिंताजनक स्तर पर बनी हुई हैं।

महाराष्ट्र में 3,824 मामलों के साथ सबसे आगे है, जहां चरम मौसम से 20 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल प्रभावित हुई।

कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पुडुचेरी में भी तेज वृद्धि दर्ज हुई।

खेती से जुड़े 10,546 लोगों में आत्महत्या करने वालों में 5,913 कृषि मजदूर थे। यानी कुल मामलों में उनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत रही, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा आज जारी भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है।

यह संख्या 2023 की तुलना में थोड़ी कम है, जब 10,786 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। फिर भी देश में प्रतिदिन लगभग 28 किसान और कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। वर्ष 2022 में कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक 11,290 दर्ज की गई थी और उसके बाद से इसमें लगातार कमी आई है। लेकिन पिछले पांच वर्षों के रुझान बताते हैं कि जमीनी हालात में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। भारत में अब भी लगभग हर घंटे एक किसान आत्महत्या कर रहा है।

हालिया एनसीआरबी आंकड़ों में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। खेती-किसानी से जुड़े 10,546 व्यक्तियों में से, आत्महत्या करने वालों में कम से कम 56 प्रतिशत (5,913) खेतिहर मजदूर थे, जो पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। साल 2020 में, कृषि क्षेत्र में होने वाली कुल आत्महत्याओं में इनकी हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी।

ख

कृषि मजदूरों में आत्महत्या की हिस्सेदारी पहली बार 2021 में बढ़ी थी और उसके बाद से इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों से औसत कृषि परिवार की आय में खेती से होने वाली मजदूरी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जबकि फसल उत्पादन से आय अपेक्षाकृत कम हो रही है।

किसान भी संकट में

हालांकि किसानों/कृषकों के बीच आत्महत्याओं में पिछले वर्षों में गिरावट देखी गई थी, लेकिन 2024 में इसमें मामूली वृद्धि दर्ज की गई। 2023 में कुल कृषि आत्महत्याओं में किसानों की हिस्सेदारी 43.48 प्रतिशत थी, जो 2024 में बढ़कर 43.93 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि 2021 के बाद लगातार हो रही गिरावट के बाद दर्ज की गई है।

महाराष्ट्र में सबसे अधिक आत्महत्याएं

कृषि क्षेत्र में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए, जहां किसानों और कृषि मजदूरों की कुल 3,824 आत्महत्याएं हुईं। यह न केवल सबसे अधिक संख्या थी, बल्कि देश में कृषि क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं का 36.26 प्रतिशत हिस्सा भी महाराष्ट्र से आया।

हालांकि एनसीआरबी रिपोर्ट इन आत्महत्याओं के कारणों का उल्लेख नहीं करती, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 2024 में महाराष्ट्र में बाढ़ सहित चरम मौसमीय घटनाओं के कारण कम-से-कम 20,37,651 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ था। यह देशभर में चरम मौसमीय घटनाओं से प्रभावित कुल 40,72,523 हेक्टेयर फसल क्षेत्र का लगभग 50 प्रतिशत था।

महाराष्ट्र के बाद सबसे अधिक मामले कर्नाटक (2,971) में दर्ज किए गए। इसके बाद मध्य प्रदेश (835), आंध्र प्रदेश (780), तमिलनाडु (503) और छत्तीसगढ़ (486) का स्थान रहा।

हालांकि आत्महत्याओं में सबसे अधिक वृद्धि कर्नाटक में दर्ज की गई, जहां 2023 की तुलना में मामलों में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद राजस्थान में 14 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 7.46 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी ओर, चौथे स्थान पर रहने वाले आंध्र प्रदेश में 2023 की तुलना में आत्महत्याओं में 15.67 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

पुडुचेरी में सबसे तेज वृद्धि

केंद्रशासित प्रदेशों में पुडुचेरी में 2019 से 2022 के बीच कृषि क्षेत्र में आत्महत्या का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था। लेकिन 2023 में यहां 10 मामले सामने आए, जो 2024 में बढ़कर 33 हो गए। इन सभी मामलों में मृतक कृषि मजदूर थे।

यह सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे तेज वृद्धि रही, जहां एक वर्ष के भीतर कृषि क्षेत्र की आत्महत्याओं में 230 प्रतिशत यानी तीन गुना से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई।

(.downtoearth)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778224455owm_tp_arth.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323900&amp;path_article=11</guid><pubDate>08-May-2026 12:44 PM</pubDate></item><item><title>अबूझमाड़ : पुलिस पहुंच जाती है,  सरकारी योजनाएं नहीं</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323863&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323863&path_article=11]]></link><description>-अनिल अश्वनी शर्मा

केंद्र सरकार ने बस्तर क्षेत्र से लाल आतंक खत्म कर देने का दावा तो किया है, लेकिन क्या कभी वह बस्तर से कुपोषण को भी खत्म करने का दावा करेगी ? यह बात छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिला स्थित अबूझमाड़ छात्र संगठन के अध्यक्ष लक्ष्मण मंडावी ने डाउन टू अर्थ से कही।

वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ अभी तक बाहरी दुनिया के लिए अबूझ रहा है। अब जब यहां थोड़ा-बहुत बाहरी लोगों का आना-जाना हो गया है तो सवाल उठता है कि क्या हमारी समस्याएं भी बाहरी दुनिया तक पहुंच रही हैं?

यहां से लाल आतंक की खबरें तो लगातार प्रकाशित या सुनाई पड़ती हैं, लेकिन इन इलाकों में लाल आतंक की छाया में यहां की बुनियादी जरूरतों से वंचित लोगों की आवाजें कभी बाहर नहीं आ पातीं। वास्तव में अबूझमाड़ के एक युवा आदिवासी की यह बात राज्य व केंद्र सरकार के नुमाइंदों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।

अबूझमाड़ इलाके में कहने के लिए पिछले दो-ढाई दशकों से तो चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी नजर आ जाएंगे, लेकिन आदिवासियों की बुनियादी जरूरतें आज भी इन इलाकों में एक सिरे से गायब है। नारायणुपर जिले में स्थित अबूझमाड़ का कुमुडग़ुंडा भी एक ऐसा ही गांव है, जहां के हालात देखकर लगता है कि यहां के लोगों को केवल मरने के लिए ही जिंदा छोड़ दिया गया है।

गांव के सभी आदिवासी मडिय़ा जनजाति से हैं। ध्यान रहे कि यह एक संरक्षित जनजाति की श्रेणी में आती है। ऐसी जनजातियों की संख्या यहां दिन-प्रति-दिन स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव में कम होती जा रही है। लेकिन इस बात का राज्य सरकार पर कोई असर नहीं दिख पड़ रहा है।

लक्ष्मण मंडावी कहते हैं कि हमारे आदिवासी समुदाय की संख्या दिन-प्रति-दिन कम होती जा रही है। इसका कारण है कि हमारे इलाके में स्वास्थ की कोई भी सुविधा नहीं है। वे कहते हैं कि हमारे गांव से कोयलीबेड़ा कस्बा 35 किलोमीटर दूर है, जहां स्वास्थ केंद्र है।

वहां तक पहुंचने के लिए यह रास्ता भी कोई आम रास्ता न होकर नदी-नाले और पहाड़ों को पार करने में पूरा दिन चला जाता है। अबूझमाड़ के आमाटोला गांव में पीढिय़ों से पारंपरिक ज्ञान के सहारे बीस-पच्चीस गांवों में पैदल ही बीमार लोगों की देखभाल करने वाली सत्तर वर्षीय अमिल मंडावी कहती हैं कि हम तो केवल अपने पुरखों से सीखे गए कुछ पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाएं ही आदिवासियों को दे पाते हैं, अन्यथा अब तो इतनी नई-नई बीमारी पैदा हो गई है कि हम उनका इलाज ही नहीं ढूंढ़ पाते। वे कहती हैं कि पिछले कुछ दशकों में कुपोषण ने तेजी से हमारे इलाके में पैर पसारे हैं।

डाउन टू अर्थ ने अबूझमाड़ के ऐसे ही दो गांवों (कल्पर और कुमुडग़ुंडा) का दौरा किया, जहां कुपोषण की स्थिति बहुत ही भयावह है। इसके अलावा भी इस इलाके में कई ऐसे गांव हैं जहां कुपोषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। राज्य सरकार ने अब तक इनकी सुध नहीं ली है।

कुपोषण प्रभावित कुमुडगुंडा अबूझमाड़ के उन गांवों में शामिल है जहां पहुंचना आज भी एक मुश्किल काम है। गांव में कुल जमा पांच ही घर हैं हालांकि उनकी बसाहट काफी दूर-दूर तक फैली हुई है। इस गांव की जनसंख्या कुल जमा 35 है।

गांव के आदिवासी पंडरन नूरुटी ने बताया कि इतनी कम जनसंख्या होने के बावजूद हम जैसे-तैसे परिवार को जीवित रख पा रहे हैं, हमारे यहां न तो स्कूल है, न स्वास्थ्य केंद्र, न आंगनबाड़ी। यहां तक कि जो सरकारी अनाज माह में पांच किलो मिलता है, उसे लेने जाने के लिए हमें यहां से 30 से 35 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है।

वे कहते हैं कि यह दूरी आसान नहीं होती है, जंगल, पहाड़ और नदी-नालों को पार करने में ही पूरा दिन चला जाता है और बदकिस्मत से यदि राशन की दूकान बंद मिली तो आपकी सारी मेहनत अकारत (बर्बाद) हो गई। ध्यान रहे कि अबूझमाड़ का यह गांव काफी अंदुरुनी इलाके में बसा हुआ है। गांव के हर घर से कोई न कोई बच्चा कुपोषण का शिकार है।

इस संबंध में लक्ष्मण कहते हैं कि जब सरकार की एक भी योजना यहां नहीं पहुंची है तो बच्चे कुपोषित होंगे ही।

ध्यान रहे कि राज्य सरकार ने कुपोषण को आदिवासी क्षेत्रों सहित पूरे राज्य से मिटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया हुआ है। लेकिन सरकारी आंकड़े ही यह बता रहे हैं कि कुपोषण को मिटाने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के लिए स्वीकृत धनराशि पिछले तीन सालों में लगातार कम होती गई है।

उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना में 2022-23 के दौरान 80 लाख रुपए स्वीकृत किए गए थे। यह धनराशि 2023-24 में घटकर 76 लाख पर आ गई और 2024-25 में तो तीन गुना घट कर 23 लाख रुपए ही रह गई है।

इस संबंध में आदिवासी संगठन के सदस्य मनकू नेताम कहते हैं कि ये आंकड़े बता रहे हैं कि जब सरकार ही आदिवासी बच्चों के लिए स्वीकृत धनराशि कम करती जा रही है तो ऐसे में हमारे आदिवासी इलाकों से कैसे कुपोषण खत्म होगा।

राज्य सरकार की एक अन्य योजना में भी इसी प्रकार से धनराशि साल-दर-साल कम होती जा रही है। राज्य के महिला बाल विकास विभाग से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को कम करने के लिए बच्चों के लिए पूरक पोषण आहार योजना में भी 2022-23 में 30 करोड़ रुपए की धनराशि मंजूर की गई थी। यह 2023-24 में घटकर 29 करोड़ रुपए हो गई और 2024-25 में तो इसमें सीधे 33 फीसद कम करते हुए केवल 20 करोड़ रुपए ही स्वीकृत किए गए।

ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को मिटाने के लिए चलाई जा रही योजनाओं की धनराशि में हर साल कमी होती जा रही है। यह सर्वविदित है कि ग्रामीणों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लिए खर्च की जाने वाली धनराशि को प्रतिवर्ष बढ़ाया जाता है क्योंकि प्रतिवर्ष योजनाओं से लाभ पाने वाले लाभार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी होती है न कि घटती है। राज्य सरकार ने कुपोषण को खत्म करने के लिए चलाई जा रही एक और योजना में कमी की है। यह है मुख्यमंत्री सुपोषण योजना।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778173181D.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323863&amp;path_article=11</guid><pubDate>07-May-2026 10:29 PM</pubDate></item><item><title>सोमनाथ : भारत की अजेय आत्मा का प्रतीक!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323822&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323822&path_article=11]]></link><description>-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

जय सोमनाथ !

वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है। इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।

हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है: प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्। अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझाई नहीं जा सकी। कई साम्राज्य आए और गए, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा।

यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था। समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है। उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।

1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी। उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को नए उत्साह से भर दिया।

दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है। उनके विजन को के.एम. मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।

मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर 2001 को, सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और तत्कालीन गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया।

11 मई 1951 को अपने भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।

पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। विकास भी, विरासत भी के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना और सशक्त हो रही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778151736ODI-1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323822&amp;path_article=11</guid><pubDate>07-May-2026 4:32 PM</pubDate></item><item><title>भारत दो-दलीय राजनीति की ओर?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323661&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323661&path_article=11]]></link><description>-दिलीप कुमार पाठक
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी बात निकलकर आई है, जिसे समझना जरूरी हो गया है। कभी कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाने वाली भाजपा का ये सियासी जुमला लगता था, लेकिन आज की हकीकत देखें तो यह क्षेत्रीय दल मुक्त भारत के एक बड़े प्लान की तरह नजर आता है। भाजपा की रणनीति अब स्पष्ट हो चली है, वह पहले बड़े प्यार से किसी क्षेत्रीय दल की बांह पकड़ती है, उसके साथ मिलकर सरकार बनाती है, वहाँ का गुणा गणित समझती है, उसके घर के भीतर तक अपनी पैठ बनाती है और फिर धीरे से उसी साथी को किनारे लगाकर अपना झंडा गाड़ देती है।

नीतीश कुमार हों या उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक हों या बादल परिवार... इन सब की कहानियाँ एक ही पैटर्न पर लिखी गई हैं। बिहार को ही देख लीजिए, जहाँ नीतीश कुमार कभी बड़े भाई हुआ करते थे और भाजपा उनके पीछे चला करती थी। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है; भाजपा बिहार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है और नीतीश अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना ने भाजपा को उंगली पकडक़र हिंदुत्व का रास्ता दिखाया, आज वह खुद दो टुकड़ों में बंटकर अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही है। ओडिशा में नवीन बाबू का 24 साल पुराना अभेद्य किला जिस तरह ढहा, उसने सबको हैरान कर दिया। भाजपा ने वहां पहली बार अपनी सरकार बनाकर साबित कर दिया कि वह किसी की भी विरासत को समेटने का हुनर जानती है। अभी एक दशक पहले बंगाल में भाजपा का अस्तित्व भी न के बराबर था, लेकिन आज वहाँ प्रचंड बहुमत के साथ ही साथ सरकार बन गई है।

अब यह विस्तार की हसरत पंजाब और दक्षिण के राज्यों की ओर मुड़ चुकी है। पंजाब में अकालियों से नाता टूटने के बाद भाजपा ने जो ताकत दिखाई है, वह आने वाले समय में केजरीवाल की आप के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। दक्षिण भारत अब भाजपा के लिए एक ऐसी प्रयोगशाला बन गया है जहाँ वह नए-नए प्रयोग कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से दो ही नाम चलते थे, डीएमके और एआईएडीएमके लेकिन भाजपा ने एआईडीएमके के कमजोर पड़ते ही वहां अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं। केरल में जहाँ कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा किसी तीसरे की जगह नहीं थी, वहाँ भाजपा ने त्रिशूर की सीट जीतकर और अपना वोट शेयर बढ़ाकर सबको चौंका दिया है। कांग्रेस वहां आज भले ही जीत गई हो, लेकिन उसे भी पता है कि भाजपा की नजरें अब उसकी कुर्सी पर हैं।

बंगाल जीतने के बाद पार्टी मुख्यालय के संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का विरोध करना अखिलेश यादव को बहुत भारी पड़ेगा, मतलब साफ है अगला नंबर उत्तरप्रदेश का है। भाजपा जिस आत्मविश्वास के साथ अखिलेश यादव को टार्गेट कर रही है, और जैसे परिणाम आ रहे हैं तो लगता है कि भाजपा यूपी को जीतकर समाजवादी पार्टी को भी नफासत के साथ निपटा देगी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777999921ongress_Panja.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323661&amp;path_article=11</guid><pubDate>05-May-2026 10:22 PM</pubDate></item><item><title>आखिर कैसे पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई बीजेपी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323592&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323592&path_article=11]]></link><description>अंग यानी बिहार और कलिंग यानी ओडिशा का मोर्चा तो बीजेपी ने पहले ही फतह कर लिया था. अब बंगाल में चुनावी जीत के साथ ही अंग, बंग और कलिंग पर काबिज होने का भारतीय जनता पार्टी का सपना पूरा हो गया है.
डॉयचे वैले परप्रभाकर मणि तिवारीकीरिपोर्ट

इस बार के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बदला बनाम बदलाव था. बीजेपी ने जहां बदलाव का नारा देते हुए अपने पारंपरिक जय श्री राम की जगह जय मां काली के नारे को अपनाया था, वहीं ममता बनर्जी ने लोगों से केंद्र, बीजेपी और चुनाव आयोग के कथित सौतेले रवैए के खिलाफ बदला लेने के लिए वोट डालने की अपील की थी.

पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में कई चीजें पहली बार हुई थीं और इसका नतीजा भी पहली बार बीजेपी की जीत के तौर पर सामने आया है. बीते पच्चीस वर्षों में पहली बार कोई चुनाव दो चरणों में कराया गया है. इससे पहले छह से आठ चरणों मेंमतदान करायाजाता रहा है. इसके अलावा भारी तादाद में तैनात केंद्रीय बल, औरएसआईआर के दौरान कटेकरीब 91 लाख नामों में राजनीतिक दलों के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. बंगाल में बीते कई दशकों में पहली बार चुनावी हिंसा नके बराबर हुई है. इससे पहले, यहां पर चुनाव से पहले और बाद में भारी हिंसा होती रही है.

इस बार राज्य में पहली बार रिकार्डतोड़ वोट पड़े थे. उसके बाद से ही सत्ता के दावेदार अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करने में जुटे थे. इस बार चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि एसआईआर के मुद्दे ने अबकी तमाम पारंपरिक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. चुनावी नतीजों से साफ है कि बीजेपी को ममता बनर्जी के मुस्लिम और महिला वोट बैंक में भी सेंध लगाई है. पार्टी को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में कामयाबी मिली. इसी के कारण हिंदू तबके के वोटरों ने एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया.

बीजेपी भी इस बात को स्वीकार करती है. पार्टी के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी ने डीडब्ल्यू से कहा, ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के खिलाफ हिंदू समुदाय ने एकजुट होकर हमारे पक्ष में मतदान किया है.खासकर शहरी तबके के लोगों का सरकार से मोहभंग हो गया था. उन्होंने बदलाव के लिए वोट डाला था.

क्या रही बीजेपी की जीत की वजहें?

करीब दस साल की कोशिश के बाद पहली बार बंगाल में बीजेपी की जीत की आखिर क्या वजह रही? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसमें एसआईआर के दौरान भारी तादाद में कटे नामों की अहम भूमिका रही. इसके अलावा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, बीजेपी के आक्रामक प्रचार, आर.जी. कर कांड के बहानेमहिला सुरक्षा के सवाल, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने भी बदलाव की राह तैयार की.

पश्चिम बंगाल चुनाव: दूसरे दौर में मतुआ समुदाय की भूमिका अहम

खासकर शहरी इलाकों में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के अलावा ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का असर साफ नजर आया. इसके अलावा पहली बार वोटर बने युवाओं ने भी सरकार के कामकाज के खिलाफ वोट डाले. यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले कोलकाता और इसके आस-पास के शहरी इलाको में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा.

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि होने की वजह से बंगाल बीजेपी के लिए काफी अहम था. उनकी 125वीं जयंती के मौके पर मिली इस जीत की पार्टी के लिए काफी अहमियत है. इस चुनाव ने पार्टी के सामने करो या मरो पैदा कर दी थी. यही वजह है कि पिछली बार की गलतियों से सबक लेते हुए उसने चुनाव में अपने तमाम संसाधन तो झोंके ही, ममता पर सीधा हमला करने या ऐसी कोई टिप्पणी करने से बचती रही जिससे बंगालियों की भावनाएं आहत हो सकती थी. इसी वजह से उसने अभियान के दौरान जय श्री राम से ज्यादा जय मां काली के नारे लगाए.

एक अन्य विश्लेषक और सिलीगुड़ी के एक कालेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं शुभांगी चटर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, सिलीगुड़ी में चिकन नेक कॉरिडोर की अहमियत को ध्यान में रखते हुए बीजेपी का सत्ता में आना इस सीमावर्ती राज्य के लिए काफी अहम है. इसकी सीमाएं बांग्लादेश के अलावा नेपाल और भूटान से तो मिलती ही हैं, चीनी सीमा भी ज्यादा दूर नहीं है.

राष्ट्रीय राजनीति पर जरूर पड़ेगा असर

इस जीत का देश की भावी राजनीति की दशा-दिशा पर क्या असर होगा? कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, तृणमूल कांग्रेस अकेली ऐसी राजनीतिक ताकत थी जो अपने बूते बीजेपी को कड़ी टक्कर देते नजर आती थी. अब उसके कमजोर होने का असर 2029 के लोकसभा चुनाव पर भी नजर आएगा.

उनका कहना था कि तृणमूल कांग्रेस की गलतियां भी इस हार की जिम्मेदार हैं. उसके तमाम शीर्ष नेता चुनाव प्रचार के दौरान चार मई के बाद सबको देख लेने की धमकी देते रहे. खुद ममता ने भी कई बार यह बात दोहराई थी. इससे लोगों के मन में डर पैदा हुआ कि शायद चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा हो.इसी वजह से लोगों ने बदलाव के लिए खुलकर मतदान किया.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत महज एक राज्य की जीत नहीं है बल्कि इसके दूरगामी नतीजे होंगे. इस जीत ने पूर्वी भारत में ओडिशा के बाद क्षेत्रीय पार्टी के दूसरे सबसे बड़े किले को ढहाने में कामयाबी दिलाई है. ऐसे में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय है.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777963359w.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323592&amp;path_article=11</guid><pubDate>05-May-2026 12:12 PM</pubDate></item><item><title>नए एमजीआर का उदय?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323542&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323542&path_article=11]]></link><description>-आर.के.जैन
तमिलनाडु के चुनाव नतीजों में बहुत बड़ा उलटफेर हो गया है। वहां एक्टर विजय की पार्टी टीवीके सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके से गठबंधन करना पड़ सकता है।

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ विजय (थलापति विजय) ने फरवरी 2024 में अपनी नई राजनीतिक पार्टी ञ्जङ्क्य की स्थापना की थी। यह पार्टी 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में पहली बार चुनाव में उतरी। मतगणना के नतीजे चौंकाने वाले हैं। सत्तारूढ़ डीएमके तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। लेकिन विजय की पार्टी और एआईएडीएमके ने डीएमके को पीछे छोड़ दिया है। रुझानों में विजय की सरकार बनना तय माना जा रहा है।

विजय ने अपने आखिरी फिल्म जन नायकन (पूर्व में थलापति 69) की घोषणा के साथ ही राजनीति में कदम रखा। विजय को तमिलनाडु का अगला एमजीआर बताया जा रहा है। जिन्होंने एआईएडीएमके की स्थापना की थी और तमिल सिनेमा के महानायक थे।

तमिलनाडु में फिल्म अभिनेताओं के राजनीति में आने की पुरानी परंपरा है (जैसे एमजीआर और जयललिता मुख्यमंत्री बने)। लेकिन कई अन्य अभिनेता जैसे शिवाजी गणेशन, कमल हासन,रजनीकांत आदि को सीमित या मिलीजुली सफलता ही मिली। विजय, आंध्र प्रदेश के एनटीआर (एन. टी. रामाराव) से प्रेरणा ले रहे हैं, जिन्होंने बहुत तेजी से राजनीतिक सफलता हासिल की थी।

विजय की बढ़त के निम्न फैक्टर रहे हैं :
1. विजय की पृष्ठभूमि और तैयारी: उनके फैन क्लब (विजय मक्कल इयक्कम) शुरू में कल्याणकारी संगठन थे, बाद में राजनीतिक रूप लेते गए। डीएमके प्रवक्ता कनिमोझी ने सोमवार 4 मई को स्वीकार किया कि विजय के फैंस ने जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।

2. उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों (किसान, स्वास्थ्य, महिलाओं आदि) पर जोर बढ़ता गया।

3. श्रीलंकाई तमिलों और नीट विरोध जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाया।

चुनौतियाँ: करूर रैली में स्टैंपीड में 41 लोगों की मौत और व्यक्तिगत जीवन में तलाक की घटना की वजह से आलोचना हुई लेकिन उनकी लोकप्रियता ने इन चुनौतियों को धो डाला।

विजय की सरकार बनी तो वह क्या करेंगे ?

टीवीके खुद को गठबंधन-विरोधी बताती रही है। उसने न तो सत्तारूढ़ ष्ठरू्य के साथ और न ही क्चछ्वक्क के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई है। लेकिन नतीजों के बाद नए हालात में वो किसी न किसी पार्टी से समझौता कर सकती है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777901635ijay.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323542&amp;path_article=11</guid><pubDate>04-May-2026 7:03 PM</pubDate></item><item><title>दिये की रौशनी से कमल तक का सफर धीमा, पर चलता ही रहा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323541&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323541&path_article=11]]></link><description>-आशीष कान्ति घोष

वैचारिक संघर्ष के वो कठिन दिन : आशीष कान्ति घोष

भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इतिहास में कई ऐसे दौर आए हैं जिन्हें उनके कठिन दिन कहा जा सकता है। इन कठिन परिस्थितियों ने ही इन दलों को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूती दी। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित इस दल का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रवादी विचारधारा को खड़ा करना था। कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच एक नया विकल्प खड़ा करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।

इसका मुख्य संकल्प और उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक एकता और एक सशक्त भारत का निर्माण करना था।जनसंघ का संकल्प मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित था।

अखंड भारत- जनसंघ का सबसे प्रमुख संकल्प अखंड भारत था। एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान:कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए यह जनसंघ का सबसे बड़ा नारा और संकल्प था।

राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता- यह भारतीय संस्कृति और सभ्यतागत चेतना पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहता था।एकात्म मानववाद: पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद को अपना मूल दर्शन माना, जो सर्वांगीण विकास पर जोर देता है ।

अंत्योदय- समाज के अंतिम व्यक्ति के विकास का संकल्प।

धारा 370 का विरोध-कश्मीर में अलग विधान का कड़ा विरोध और राष्ट्र की एकता के लिए 370 को हटाने का संकल्प। डॉ. मुखर्जी ने इन आदर्शों की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, प्रमुख कठिन समय और संघर्ष के चरण निम्नलिखित हैं:-

भारतीय जनसंघ के शुरुआती संघर्ष सीमित चुनावी सफलता- शुरुआती दौर (1951-1952)

स्थापना- 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुई।

पहला चुनाव (1951-52): जनसंघ ने अपना पहला आम चुनाव दीपक चुनाव चिह्न के साथ लड़ा।

परिणाम- पार्टी को केवल 3 सीटें और लगभग 3.06 फीसदी वोट मिले। डॉ. मुखर्जी खुद कलकत्ता दक्षिण-पूर्व सीट से निर्वाचित हुए थे

डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन (1953)- पार्टी के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन ने पार्टी को नेतृत्व के गहरे संकट में डाल दिया था। उनके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने महासचिव के रूप में संगठन को संभाला।

विस्तार और उदय (1957-1971)

1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की।

1957 का चुनाव- सीटों की संख्या बढक़र 4 हुई। इसी चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार संसद पहुँचे।

1962 का चुनाव- पार्टी ने 14 सीटें जीतीं।

1967 का चुनाव- यह जनसंघ के लिए एक बड़ा मोड़ था, जहाँ पार्टी ने 35 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई।

दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु (1968)- पार्टी के प्रमुख विचारक और तत्कालीन अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुगलसराय स्टेशन पर रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा आघात थी।

1971 का चुनाव- इंदिरा गांधी की गरीबी हटाओ लहर के बावजूद जनसंघ 22 सीटें बचाने में सफल रहा।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777901188odi_kali.jpeg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323541&amp;path_article=11</guid><pubDate>04-May-2026 6:56 PM</pubDate></item><item><title>तमिलनाडु में क्या विजय बनेंगे 'हीरो', रुझानों में उनकी पार्टी निकली डीएमके से भी आगे</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323509&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323509&path_article=11]]></link><description>दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ़ विजय ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबको चौंका दिया है.

विजय, जिन्हें उनके फ़ैंस थलपति के नाम से जानते हैं, की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेट्री कड़गम) ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की डीएमके को भी रुझानों में पीछे छोड़ दिया है.

डेटानेट के मुताबिक़ टीवीके 104 सीटों पर आगे चल रही है जबकि सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं.

विपक्षी एआईएडीएमके भी डीएमके से फ़िलहाल आगे निकल गई है और वो 67 सीटों पर आगे है.

ख़ुद विजय पेरांबुर सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आर डी शेखर से लगभग तीन हज़ार वोटों से आगे चल रहे हैं.

एक्टर विजय तमिलनाडु के साथ-साथ हिंदी भाषी इलाक़ों में भी बेहद लोकप्रिय हैं.

एग्ज़िट पोल में उनके अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जताई गई है लेकिन रुझान चौंकाने वाले आ रहे हैं.

फ़िल्मों में सफलता के बाद अब वह राजनीति में भी सक्रिय हुए.

पिछले साल सितंबर में उनका नाम एक बार फिर सुर्ख़ियों में तब आया था जब तमिलनाडु के करूर में उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की रैली के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 39 लोगों की मौत हो गई थी.

इस घटना पर विजय नेसोशल मीडियापर गहरा दुख और सदमा जताया. साथ ही मारे गए लोगों के लिए 20-20 लाख रुपये और घायलों के लिए दो-दो लाख रुपये की मदद की घोषणा की थी.

विजय की ज़िंदगी भी किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रही, फ़िल्मी माहौल में जन्म, बचपन से ही अभिनय की शुरुआत, संघर्ष के बाद स्टारडम हासिल करना, पिता से मतभेद और फिर राजनीति में उतरना.

चाइल्ड एक्टर के तौर पर शुरुआत और पारिवारिक पृष्ठभूमि

विजय का पूरा नाम जोसेफ़ विजय चंद्रशेखर है. उनका जन्म 22 जून 1974 को चेन्नई में हुआ.

पिता एस.ए. चंद्रशेखर तमिल सिनेमा के जाने-माने निर्देशक रहे हैं और माँ शोभा एक गायिका थीं.

फ़िल्मी माहौल में पले-बढ़े विजय ने बहुत कम उम्र में ही अभिनय शुरू कर दिया था.

उनके पिता ने उन्हें वेट्री फ़िल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने का मौक़ा दिया. बचपन से ही विजय ने तय कर लिया था कि उनका भविष्य सिनेमा में ही है.

कॉलेज में उन्होंने विज़ुअल मीडिया की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन अभिनय के जुनून के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी.

बाद में उनकी माँ शोभा ने एक स्क्रिप्ट लिखी और पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने उस पर फ़िल्म बनाई. इसी फ़िल्म नालैया थीरपू (1992) से विजय ने बतौर हीरो शुरुआत की.

हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकी, जितनी इससे उम्मीद थी. लेकिन इसने विजय के करियर की नींव रख दी.

शुरुआती पहचान से थलपति तक

विजय के शुरुआती करियर की पहचान फ़ॉर्मूला फ़िल्मों से जुड़ी रही, जिनमें एक्शन और रोमांटिक गानों का भरपूर मेल होता था.

लेकिन समय के साथ उनकी यह छवि बदल गई. कॉमेडी, एक्शन और सामाजिक विषयों वाली फ़िल्मों में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और धीरे-धीरे साधारण हीरो से थलपति (सेनापति) बन गए.

गिल्ली जैसी सुपरहिट फ़िल्म ने उन्हें मास हीरो की छवि दी और छोटे बच्चों तक को उनका प्रशंसक बना दिया.

वहीं कथी ने उनके अभिनय को सामाजिक और राजनीतिक संदेशों से जोड़ा, जबकि थेरी, मर्सल और बिगिल जैसी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड बनाए.

अभिनय के साथ-साथ विजय को बेहतरीन डांसर भी माना जाता है.

निजी ज़िंदगी

विजय की निजी ज़िंदगी में अहम मोड़ तब आया जब लंदन में पली-बढ़ी संगीता उनकी फ़िल्में देखकर उनकी फ़ैन बनीं.

धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह रिश्ता आगे बढ़ा.

25 अगस्त 1999 को परिवार की सहमति से विजय ने संगीता से शादी की.

शादी के बाद संगीता उनकी निजी कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर बन गईं और कहा जाता है कि आज भी विजय वही कपड़े पहनते हैं जिन्हें उनकी पत्नी चुनकर देती हैं.

राजनीति में एंट्री

फ़रवरी 2024 में विजय ने राजनीति में औपचारिक रूप से क़दम रखा और अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की घोषणा की.

उन्होंने साफ़ किया कि वह संसद (2024 लोकसभा) का चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही किसी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे, बल्कि उनका ध्यान 2026 के विधानसभा चुनावों पर रहेगा.

इसी एलान के साथ उन्होंने यह भी कहा कि वह सिनेमा छोड़ रहे हैं.

टीवीके की पहली रैली 27 अक्तूबर 2024 को तमिलनाडु के विल्लुपुरम ज़िले के विक्रवंडी में हुई, जहाँ भारी भीड़ उमड़ी.

मंच से विजय ने लोगों को बांटने वाली राजनीति करने वाली पार्टियों को आड़े हाथों लिया और कहा कि ऐसी ताक़तें वैचारिक रूप से उनकी पार्टी की विरोधी हैं.

उन्होंने द्रविड़ मॉडल के नाम पर धोखाधड़ी करने और एक परिवार पर राज्य को लूटने का आरोप भी लगाया.

राजनीति में आने से पहले विजय के परिवार में भी विवाद छिड़ा.

उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर ने पहले ही ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम नाम से एक पार्टी बनाई थी. इसको लेकर विजय और उनके पिता के बीच मतभेद सामने आए.

विजय ने अपने माता-पिता समेत 11 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया था और मांग की थी कि उनके नाम का इस्तेमाल किसी चुनावी गतिविधि या भीड़ जुटाने के लिए न किया जाए.

इंडियन एक्सप्रेसके मुताबिक़ चंद्रशेखर ने इससे पहले भी विजय के फ़ैन क्लब को ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम के तहत एक राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्टर करने की कोशिश की थी.

इस विवाद के बाद विजय ने एक बयान में कहा था, मैं अपने प्रशंसकों और जनता को बताना चाहता हूं कि मेरे पिता की राजनीतिक पार्टी और मेरे बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई भी संबंध नहीं है.

सिनेमा को छोड़ने का एलान

जनसभा को संबोधित करते हुए विजय ने कहा कि राजनीति में आने के लिए उन्होंने अपना अभिनय करियर और कमाई दोनों पीछे छोड़ दिए हैं.

वह पहले ही साफ़ कर चुके थे कि राजनीति में सक्रिय होने के बाद अभिनय छोड़कर पूरी तरह समाजसेवा करेंगे.

सितंबर 2024 में प्रोडक्शन हाउस केवीएन ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि फ़िल्म थलपति 69 विजय की आख़िरी फ़िल्म होगी.

पार्टी की विचारधारा पर क्या कहा था?

अपनी पहली रैली में विजय ने टीवीके की विचारधारा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा था, हम द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं करेंगे. ये दोनों इस मिट्टी की दो आँखें हैं. हमें ख़ुद को किसी ख़ास पहचान तक सीमित नहीं रखना चाहिए.

विजय ने बताया कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होगी.

उन्होंने कहा कि टीवीके पेरियार के दिखाए रास्ते पर चलेगी, जिसमें महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय की बात शामिल है. हालांकि उन्होंने साफ़ किया कि पेरियार के नास्तिकता वाले विचार को वह स्वीकार नहीं करते.

इसके अलावा विजय ने यह भी साफ़ किया कि टीवीके राज्य में दो भाषाओं की नीति को समर्थन देगी. उन्होंने कहा कि सरकारी कामकाज तमिल और अंग्रेज़ी दोनों में होना चाहिए.

विजय का कहना है कि उनकी पार्टी जातिगत जनगणना का समर्थन करती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777882637ijay.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323509&amp;path_article=11</guid><pubDate>04-May-2026 1:47 PM</pubDate></item><item><title>भारत में बीमा कवरेज बढ़ा, फिर भी मरीजों पर खर्च का दबाव क्यों</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323312&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323312&path_article=11]]></link><description>सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में ज्यादा लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद अब भी इलाज का बड़ा खर्च आम लोगों को ही उठाना पड़ रहा है. गरीब राज्यों में इसका बोझ कई गुना ज्यादा है
डॉयचे वैले परशिवांगी सक्सेनाकीरिपोर्ट

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने के सरकारी दावों के बीच एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य रिपोर्ट जारी की है. इसके अनुसार देश में हर 8 में से एक व्यक्ति बीमार है. यानी सर्वे में शामिल हर 100 में से करीब 13 लोगों ने पिछले 15 दिनों में किसी नकिसी बीमारी से पीड़ितहोने की बात कही. यह आंकड़ा 201718 के पिछले सर्वे में 7.5 प्रतिशत था. यानी बीमार लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है.

यह रिपोर्ट नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 80वें राउंड (जनवरीदिसंबर 2025) पर आधारित है. इसके अनुसार पिछले आठ सालों में बीमा कवरेज में बढ़ोतरी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह लगभग तीन गुना बढ़कर 14.1 प्रतिशत से 47.4 प्रतिशत हो गया है. जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 19.1 प्रतिशत से बढ़कर 44.3 प्रतिशत तक पहुंच गया.

इसका मतलब हुआ कि भारत के गांवों में अब करीब 46 प्रतिशत और शहरों में 32 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 2017-18 में यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र में 13 प्रतिशत और शहरों में सिर्फ 9 प्रतिशत था. यह दिखाता है कि अब पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा लोग इंश्योरेंस कवरेज के दायरे में आते हैं. इसके बावजूदअस्पताल का खर्च मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है.

ग्रामीण भारत में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर मरीज औसतन करीब 31,484 रुपये खर्च करते हैं. ये कुल खर्च का लगभग 95 प्रतिशत है, जो उन्हें अपनी जेब से देनेपड़तेहैं. इसी तरह शहरों में अस्पताल में भर्ती होने परकरीब 83 प्रतिशत खर्च यानी औसतन करीब 38,688 रुपये भी मरीजों को खुद देने पड़तेहैं.बच्चे के जन्म (डिलीवरी) के मामलों में भी लोगों को इलाज का ज्यादातर खर्च खुद भरना पड़ता है.

भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था कमजोर

सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आधे से अधिक और शहरी क्षेत्रों में करीब दो-तिहाई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं. अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च सभी प्रकार के अस्पतालों (सरकारी, निजी और चैरिटेबल) को मिलाकर लगभग 34,064 रुपये है जबकि सरकारी अस्पतालों में यह खर्च काफी कम, करीब 6,631 रुपये रहता है. निजी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च बढ़कर लगभग 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है.

दूसरी तरफ अस्पताल में भर्ती होने की दर में खास बदलाव नहीं हुआ है और यह करीब 2.9 प्रतिशत पर ही स्थिर है. सामुदायिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. दिव्यांश सिंह बताते हैं कि वैश्विक तुलना में भारत में स्वास्थ्य बीमा का कवरेज अभी भी सीमित माना जाता है. कई बीमा पॉलिसियों में जिनबीमारियों और इलाजको कवर किया जाता है, उससे कहीं लंबी सूची उन सेवाओं की होती है जिन्हें बाहर रखा गया है. वहीं ब्रिटेन जैसे देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के तहत अधिकांश सेवाएं सीधे सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं, जिससे मरीजों का जेब से खर्च बहुत कम रहता है.

कई दूसरे देशों में बीमा में मरीज पहले एक तय छोटी रकम देता है और उसके बाद बाकी बड़ा खर्च बीमा कंपनी उठाती है. जबकि भारत में स्वास्थ्य बीमा की सीमा तय की जाती है. जैसे आयुष्मान भारत योजना में पांच लाख रुपये तक ही मुफ्त इलाज मिलता है और उसके बाद का पूरा खर्च मरीज उठाता है. इस पर डॉ. दिव्यांश सिंह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, आयुष्मान भारत जैसी बड़ी योजनाओं का लाभ मुख्य रूप से अस्पताल में भर्ती होने पर मिलता है. जबकि भारत में ज्यादातर खर्च ओपीडी और दवाइयों पर हो रहा है. फिर इसके अंतर्गत सभी तरह के इलाज जैसे डेंटल ट्रीटमेंट, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां और ज्यादातर क्रॉनिक बीमारियां पूरी तरह कवर नहीं होतीं. एक आम नागरिक के लिए ओपीडी पर होने वाला खर्च, अस्पताल में भर्ती (आईपीडी) के खर्च से अधिक है. यह एक बार का खर्च 4,000 रुपये तक पहुंच जाता है. यह भी बीमा में शामिल नहीं किया जाता.

वह आगे बताते हैं, निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होता है. सरकार भले ही गांवों में पीएचसी और सीएचसी में डॉक्टर तैनात करती है. लेकिन वहां जरूरी दवाइयों और संसाधनों की कमी बनी हुई है. ऐसे में गांव के लोगों को शहर के निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है. उनका आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है. इसलिए लोग बीमार होने पर घर पर ही इलाज करने लगते हैं.

भारत के राज्यों में भी काफी असमानता

सरकारी अस्पतालों में इलाज बहुत सस्ता नहीं है बल्कि कई गरीब राज्यों में यह खर्च ज्यादा है. बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर जेब से होने वाला औसत खर्च 6,631 रुपये के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है. बिहार में यह 10,553 रुपये उत्तर प्रदेश में 12,878 रुपये और झारखंड में 12,364 रुपये है. पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति भी चिंताजनक है. मणिपुर में औसतन 16,007 रुपये और नागालैंड में 16,342 रुपये खर्च होते हैं.

दक्षिणी राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है. तमिलनाडु में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च केवल 1,357 रुपये और केरल में 9,313 रुपये दर्ज किया गया है. डीडब्ल्यू नेजन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के संयोजक अमूल्य निधिसेबात की. वह सरकारी अस्पतालों के निजीकरण को मुख्य वजह बताते हैं. पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत कई स्वास्थ्य केंद्र निजी हाथों में सौंप दिए जा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर उत्तरप्रदेश के शामली, महराजगंज और संभल में इस मॉडल पर 3 मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा चुके हैं.

भारत: सड़क हादसा होने के बाद क्या करें और क्या नहीं

सर्वे में यह भी पाया गया कि निजी अस्पतालों के मामले में जम्मू-कश्मीर सबसे ऊपर है. यहां औसतन खर्च 77,217 रुपये है. इसके बाद तमिलनाडु में यह खर्च 74,168 रुपये और तेलंगाना में 64,228 रुपये है. ये सभी आंकड़े निजी अस्पतालों के लिए राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से बहुत ज्यादा है.

अमूल्य निधि कहते हैं, हमारे अपने सर्वेक्षण के अनुसार 12 राज्यों में से 106 जिला अस्पतालों का पीपीपी मॉडल के तहत निजीकरण किया गया है. सरकार का अपना डाटा बता रहा है कि बीमारियांऔर मरीज दोनों बढ़ रहे हैं. मगर जनता इलाज के लिए अस्पताल नहीं जा पा रही है तोइसके दो बड़े कारण हैं. पहला, इलाज बहुत महंगा है. दूसरा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है. नियम है कि हर 5 किलोमीटर के अंदर एक सब-सेंटर होना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सिर्फ इमारत है. वहां डॉक्टर, दवाइयां और जरूरी उपकरणों की कमी है.

बीमारी के रुझान में बदलाव

रिपोर्ट दिखाती है कि देश में बीमारी का पैटर्न भी बदल रहा है. पहले जहां ज्यादातर लोग संक्रामक बीमारियों से प्रभावित होते थे. वहीं अब डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों जैसी लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. यह बढ़ोतरी खासकर 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और खासकर बुजुर्गों में देखने को मिल रही है. बचपन और किशोरावस्था में संक्रमण और सांस से जुड़ी बीमारियांअधिक देखी जाती हैं.युवावस्था में मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और पेट से जुड़ी समस्याएं ज्यादा रिपोर्ट की गईं.

भारत में एक आम आदमी को कितना महंगा पड़ता है कैंसर का इलाज

रिपोर्ट के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में बीमारी की दर ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा है. 2025 में जहां शहरी इलाकों के करीब 14.9 प्रतिशत लोगों ने खुद को बीमार बताया, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा लगभग 12.2 प्रतिशत रहा. लिंग के आधार पर भी अंतर साफ दिखाई देता है. महिलाओं में स्वास्थ्य समस्याएं पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज की गई हैं. महिलाओं में बीमारी की दर 14.4 प्रतिशत रही जबकि पुरुषों में यह 11.8 प्रतिशत बताई गई है.

कुछ आंकड़े जो सर्वे ने भी सामने नहीं रखे

ओपीडी सेवाओं पर खर्च की जानकारी सर्वे में नहीं दी गई हैजबकि इसके लिए डाटा एकत्रित किया गया था. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आलोचकों का कहना है कि उन मरीजों की पर्याप्त जानकारी नहीं है जो बीमार तो हुएपर इलाज के लिए अस्पताल नहीं गए. अमूल्य निधि इस आंकड़े को इस तरह समझाते हैं, सर्वे यह बताता है कि लगभग 13.1 प्रतिशत लोग 15 दिनों में बीमार हुए. लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितने लोगों ने इलाज नहीं कराया और इसके पीछे क्या कारण थे. साथ ही, अस्पताल में भर्ती होने की दर सिर्फ 2.9 प्रतिशत है. यह संकेत है कि इलाज की जरूरत कम नहीं, बल्कि सेवाओं तक पहुंच में बाधाएं बनी हुई हैं.

भारत में कम उम्र की महिलाओं में बढ़े ब्रेस्ट कैंसर के मामले

इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. अब लगभग 96.2 प्रतिशत डिलीवरी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में हो रही है. डॉ. दिव्यांश सिंह इस आंकड़े पर सवाल उठाते हैं, शहरों में लोग निजी अस्पतालों पर भरोसा करते हैं. गांवों में अब भी महिलाएं पुराने रूढ़िवादी तरीकों पर निर्भर करती हैं. गर्भावस्था के दौरान जांच लगभग सभी को मिल रही होगी लेकिन डिलीवरी के बाद की देखभाल, खासकर गांवों में, सबको नहीं मिलती.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की जानकारी के अभाव में स्वास्थ्य सेवाओं से बाहर रह जाने वाले लोगों की असली स्थिति पूरी तरह सामने नहीं आ पाती.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777707172w.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323312&amp;path_article=11</guid><pubDate>02-May-2026 1:02 PM</pubDate></item><item><title>माँ ने नहीं देखा उसका विश्व रिकॉर्ड बनते हुए !</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323245&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323245&path_article=11]]></link><description>-अशोक पांडे

केन्या के सेबेस्टियन सावे इन दिनों दुनिया की निगाह में हैं. बीती छब्बीस अप्रैल को उसने दो घंटे से कम समय में मैराथन पूरी कर इतिहास बना डाला. तब से तमाम बड़े-छोटे अखबारों-चैनलों-पत्रिकाओं में उसके संघर्ष, ग़ुरबत में बीते जीवन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बारे में सैकड़ों लेख लिखे-छापे जा चुके हैं. खेत मजदूर पिता की माली हालत ऐसी न थी कि बेटे को अपने साथ रख पाते से सेबेस्टियन के बचपन का बड़ा हिस्सा दादी के पास रहकर बीता जो एक ऐसे घर में रहती थीं जिसमें बिजली भी नहीं थी.

सेबेस्टियन के चाचा केन्या छोड़ कर युगांडा चले गए थे जहां उन्होंने 800 मीटर दौड़ का राष्ट्रीय रेकॉर्ड बनाया था जो अब भी कायम है. वे ही सेबेस्टियन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत थे. उन्हीं के इसरार पर उसने भी इसी दौड़ में अपना करियर बनाने की सोच रखी थी. सात बरस पहले उसे एक प्रतिष्ठित रेस में भाग लेने का मौका था लेकिन वह समय पर नहीं पहुँच सका. आठ सौ मीटर दौड़ के सारे स्लॉट भर चुके थे. बस 5000 मीटर रेस में जगह बची थी. उसने उसी में हिस्सा लिया और रेस जीत ली. यही उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

मार्च 2020 में पैर में चोट लग गयी. दौड़ना मुश्किल हो गया. लेकिन वह उबर गया. फिर उसी साल उसे वेलेंशिया में

पहली मैराथन भागनी थी, उसे कोविड हो गया.


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777639447other....jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323245&amp;path_article=11</guid><pubDate>01-May-2026 6:14 PM</pubDate></item><item><title>शिवपालगंज की आगे की कथा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323159&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323159&path_article=11]]></link><description>-दिनेश चौधरी

रुप्पन बाबू ने अकड़ी हुई गर्दन के साथ कहा, हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। इससे खतरा उन्हें हो सकता है, जिनके पास असली अक्ल होती है। हम ठहरे निपट मूरख। अक्ल के मामले में अपने हाथ बड़े तंग है। जब ऊपर वाले के यहाँ यह बंट रही थी, हम बैद महाराज के पीछे जयकारा लगाने के जरूरी काम में व्यस्त थे। अक्ल न उनके हिस्से में आई न अपने। हमारे पास ठेठ मौलिक किस्म की मूर्खता है, इसलिए हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। अक्ल है ही नहीं तो असल क्या और नकल क्या?

स्थान-शिवपालगंज में ग्राम प्रधान का कार्यालय। समय-सनीचर के हाथों पिसी भंग को छानने के बाद वाला। मुख्य वक्ता-युवा दिलों की धडक़न रुप्पन बाबू। वक्तव्य के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति-भंग की तरंग। मुख्य श्रोता-खन्ना मास्टर, सनीचर, जोगनाथ और बेईमान मुन्नू का भतीजा। मालवीय मास्टर भी होते पर नया सिनेमा लगने के कारण वे छंगामल इंटर कॉलेज के किसी छात्र के साथ नगर-भ्रमण पर थे। बेईमान मुन्नू का भतीजा, जैसा कि आप सब जानते हैं, नवें दर्जे का होनहार विद्यार्थी था और आटा चक्की वाले मास्टर मोतीराम की क्लास में पढ़ता था। मास्टर मोतीराम प्रिंसिपल वाले गुट में थे, इसलिए खन्ना मास्टर गेहूँ पिसवाने के लिए बेईमान मुन्नू की सेवाएँ लेते थे। उनका भतीजा इसी फेर में झोले समेत सभा में शामिल हो गया था, अन्यथा उसके यहाँ होने का कोई औचित्य नहीं था।

रुप्पन बाबू के वक्तव्य को सुनकर सनीचर उनके इस तर्क से बहुत प्रभावित हुआ। न भी होता तो जाहिर तो यही करना पड़ता। सनीचर की इतनी औकात नहीं थी कि रुप्पन बाबू कोई बात कहें और वह प्रभावित न हो। प्रभावित होने के प्रमाण-स्वरूप उसने अपने दाँत बाहर की ओर निकाल लिए, जो पहले से ही बाहर थे और अब वह पहले से भी ज्यादा मूर्ख लगने लगा था। उसे पता था कि परधानी उसे मूर्खता के बल पर ही हासिल हुई है। मूर्ख न होता तो बैद महाराज उसे परधान पद का उम्मीदवार भला क्यों चुनते?

रुप्पन बाबू ने अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए कहा, अब इस तरह समझ लो की नकली अक्ल है क्या? मशीन में हम जो डाटा डालते हैं, उसी की प्रोसेसिंग होती है। जैसे हम बेईमान मुन्नू की चक्की में गेहूँ डालते हैं तो गेंहूँ का आटा निकलता है। चावल डालते हैं तो चावल का आटा निकलता है। सिर्फ फिजिकल प्रॉपर्टी चेंज होती है। अक्ल डालते हैं तो पिसकर अक्ल बाहर निकलती है। अब अगर हम इसमें मूर्खता की बातें डालेंगे तो क्या बुद्धिमानी की बात बाहर निकलेगी? नहीं न! बस यही हमारा मास्टर स्ट्रोक है!

मास्टर स्ट्रोक के नाम पर सनीचर चौकन्ना होकर सीधा खड़ा हो गया। समझ गया कि इसका सम्बन्ध हो न हो बैद महाराज से है। मास्टर स्ट्रोक लगाने का काम शिवपालगंज में अकेले उन्हीं के बस का था। कोई और होता तो सनीचर कॉपीराइट के वायलेशन के नाम पर उससे भिड़ जाता पर रुप्पन तो उसी खानदान के रोशन चिराग थे। सनीचर कोई और बात कहता, इससे पहले ही खन्ना मास्टर मैदान में कूद पड़े, कहा-अक्ल का मुकाबला भला मूर्खता से कैसे किया जा सकता है?

रुप्पन बाबू के दिल में फौरन यह बात आई कि इस मुल्क में मास्टर लोग जब भी कोई बात कहेंगे, मूर्खता की ही कहेंगे। हमारे पास रिसोर्सेज की कमी नहीं है। स्कूल-कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक कच्चा माल इफरात भरा पड़ा है। इनका सही ढंग से दोहन हो तो दुनिया में कोई माई का लाल अपना मुकाबला नहीं कर सकता.. दिल की बात दिल में ही रखते हुए प्रकटत: उन्होंने कहा, अब मास्टर जी बात तो तुम्हारी भी सही है पर मामला होने और न होने का है। इंसान वही चीज इस्तेमाल करेगा जो उसके पास होगी। उनके पास अक्ल है तो वे अक्ल का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे पास नहीं है तो हम क्या करेंगे? जो साधन होगा, वही न काम में लायेंगे! हमारे पास जो है, उसी का बेहतर इस्तेमाल करने में अपनी भलाई है।

रुप्पन बाबू ने अपना वक्तव्य जारी रखा, सब तरफ इसी बात को लेकर बहस छिड़ी है कि असली और नकली अक्ल के फेर में दुनिया का क्या होगा? हम कहते हैं कि ये मुद्दा ही गलत है। असली चीज का मुकाबला असली चीज से ही हो सकता है, भले ही वह मूर्खता क्यों न हो। हमको अपनी रिसर्च इसी तरफ आगे बढ़ानी चाहिए।

खन्ना मास्टर थोड़े कन्फ्यूज हो गये। जब समझदारी का मुकाबला नासमझी से करना हो तो उन्हें समझ में नहीं आया कि वे रुप्पन बाबू की अज्ञानता से प्रभावित हों या उनके ज्ञान से। उन्होंने रुप्पन बाबू से कहा कि वे अपनी बात किसी उदाहरण के साथ सरल भाषा में रखें।

टीचर होने के नाते खन्ना मास्टर का रुप्पन बाबू खूब सम्मान करते थे। वे कॉलेज के प्रिंसिपल का भी उतना ही सम्मान करते थे और चपरासी का भी। वे खन्ना मास्टर, प्रिंसिपल साहब, चपरासी, और सनीचर; उन सबको समभाव से देखते थे जो बैद महाराज की चाकरी करते थे। वे खन्ना मास्टर से उसी सम्मान के साथ सम्बोधित हुए और कहा, सुनो खन्ना मास्टर! इंसान और मशीन का मुकाबला कभी नहीं हो सकता। इंसान, इंसान है और मशीन, मशीन है। जैसे बैद महाराज, महाराज हैं और सनीचर फटीचर है..।

रुप्पन बाबू के इस वाक्य को सनीचर ने प्रशंसा की तरह ग्रहण किया और उनके आगे रखे खाली प्याले को लबालब भर दिया। रुप्पन बाबू ने थैंक्स की मुद्रा में एक घूँट भरते हुए कहा, बात किसी चीज को जानने की नहीं, मानने की है। हम अपने सभी मूर्खतापूर्ण कामों को ही समझदारी बताने लगें तो हमसे कोई क्या खाकर आगे बढ़ जायेगा? आप कितने भी ज्ञानी हों, हम परम-मूर्ख को ही अपना परम-पिता मान लें तो आप क्या कर लेंगे? सच और समझदारी से ज्यादा बड़ी ताकत झूठ और नासमझी में होती है बशर्ते प्रचार तगड़ा हो। जो जितना ज्यादा प्रोपेगंडा कर सके, आज के जमाने में वही सही है। और इस काम में हमारी सहायता कौन करेगा? कोई अक्ल वाला इंसान तो नहीं करेगा। करेगा भी तो लालच में। नि:स्वार्थ सेवा तो हमें असल वालों से ही मिलेगी। इसीलिए हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत नहीं है, हम ओरिजिनल नॉनसेंस से अपना काम बेहतर ढंग से चला सकते हैं।

ओरिजिनल नॉनसेंस से क्या यह मतलब निकाला जाये कि अर्टिफिशियल नॉनसेंस भी हो सकता है? खन्ना मास्टर ने पूछा।

हो सकता है पर इसकी जरूरत ही क्या है? रुप्पन बाबू ने कहा, जब हमारे पास शुद्ध देसी घी है तो हमें वनस्पति तेल की क्यों खाना चाहिए? हम गांधी के चेले हैं और मशीन पर निर्भरता नहीं रखना चाहते। मास्टरजी! तुम्हें तो पता ही है कि हमारे छंगामल इंटर कॉलेज में साढ़े तीन सौ इस्टूडेंट हैं, जो किताबों में अपना समय बर्बाद नहीं करते। प्रिंसिपल साहब इन्हें व्हाट्सएप पर ज्ञान की सामग्री भेज देते हैं। इनका डेटा यही है। जब हमारे पास असली वाले हैं तो हमें मशीन की क्या जरूरत?

अब एक मजे की बात सुनो, रुप्पन बाबू ने अपना व्याख्यान जारी रखा, आज मैं मशीन से बात कर रहा था। वो अपने आप को बड़ा सयाना समझता है तो मैंने भी सोचा कि जरा इसे गंजहों की भाषा समझाई जाये। मैंने उससे पूछा कि -तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर?

उसने खटाक से कहा- तीन!, रुप्पन बाबू बोले, मगर-मैंने कहा कि बीच वाला तीतर भी बोल रहा है कि उसके आगे भी तीन हैं और पीछे भी तीन..यह कैसे हुआ?

मशीन सोच में पड़ गयी। सारी अर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी धरी रह गयी। आखिर में मुझसे ही पूछा कि अच्छा तुम्हीं बता दो।

मैंने कहा, बीच वाला तीतर झूठ बोल रहा था। यह सुनते ही मशीन हैंग हो गई। हम अपने ओरिजिनल नॉनसेंस में थोड़ा-सा झूठ और बहुत सारी बेशर्मी मिला लें तो दुनिया की कोई ताकत हमारा मुकाबला नहीं कर सकती।

इतना सुनते ही सनीचर ने मारे प्रसन्नता के भंग के सारे ग्लास भर दिये। इसके बाद की कार्रवाई का विवरण रिकॉर्ड से निकाल दिया गया है, क्योंकि वह गंजहों की मौलिक, मुहावरेदार, आत्मीय सम्बन्ध बनाने वाली भाषा से होते हुए सर्फरी बोली में पहुँच चुकी थी। शिक्षक होने के नाते खन्ना मास्टर वहाँ से खिसक चुके थे।

(303, राजुल एग्जॉटिका, कजरवाड़ा रोड, बिलहरी, जबलपुर -482020)

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(जबलपुर के लेखक दिनेश चौधरी पिछले कुछ वक्त से सामयिक संदर्भों, और मुद्दों को लेकर श्रीलाल शुक्ल के विख्यात व्यंग्य-उपन्यास राग दरबारी के किरदारों को लेकर उसी तर्ज पर लिख रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़को इन्हें छापने की इजाजत दी है। -संपादक)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777550887ag_darbari.jpeg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323159&amp;path_article=11</guid><pubDate>30-Apr-2026 5:38 PM</pubDate></item><item><title>बुद्ध पूर्णिमा : करुणा का संदेश</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323155&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323155&path_article=11]]></link><description>- सी. पी. राधाकृष्णन

चित्रा पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, जब मंदिर उत्सव मनाए जा रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रत्येक घर में सुख- समृद्धि बढ़े। मुझे सभी भाईयों और बहनों को बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं देते हुए प्रसन्नता हो रही है।

भारत ने विश्व को जो अनेक उपहार दिए हैं, उनमें बौद्ध धर्म सर्वोपरि है। भगवान बुद्ध का जीवन और उनके उपदेश, आज भी दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन को प्रकाशमान कर रहे हैं। भारत ने विश्व को आत्म-साक्षात्कार का महत्व सिखाया। बुद्ध शब्द का अर्थ ही है जाग्रत व्यक्ति। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानवता को आत्मज्ञान की राह दिखाने वाली इस महान आत्मा का जन्म और ज्ञान प्राप्ति, दोनों एक ही दिन हुए।

राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण विलासिता में हुआ। 29 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपना महल, पत्नी, पुत्र और समस्त सांसारिक धन-संपत्ति त्यागकर आध्यात्मिक सत्य की खोज में विचरण किया। छह वर्षों के गहन शोध के बाद, उन्होंने बोधगया के बोधि वृक्ष के नीचे परम ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बन गए। चार आर्य सत्यों और नैतिक आचरण के मार्ग की प्राप्ति ने एक नए दर्शन का आरंभ किया, जिसने विश्व इतिहास में भारत के गौरव को नई ऊंचाई दी। वाराणसी के पास सारनाथ में उन्होंने पांच तपस्वियों को अपना प्रथम उपदेश दिया। धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से प्रसिद्ध यह उपदेश बौद्ध धर्म की नींव बना और बौद्ध परंपरा की औपचारिक शुरुआत का यह प्रतीक था। समय के साथ, अनेक लोग उनके उपदेशों से प्रभावित हुए। मगध के राजा बिम्बिसार ने राजगीर में वेणुवन (बांस उपवन) विहार दान किया। धनी अनाथपिंडिका ने पूरे जेतवन उपवन को स्वर्ण मुद्राओं से ढककर एक विहार(मठ) का निर्माण करवाया। ऐसे कार्य भारत में विद्यमान धर्मपरायणता में गहरी आस्था को दर्शाते हैं।

विहारों के माध्यम से चार आर्य सत्यों का प्रसार होता है: इच्छा दुख का मूल कारण है; इच्छा का त्याग करने से दुख पर विजय पाई जा सकती है, और अष्टांगिक मार्ग का पालन कर दुख से मुक्त जीवन जिया जा सकता है। बुद्ध ने सलाह दी: अतीत पर ध्यान न दें, वर्तमान में जिएं। सत्यनिष्ठा में महान शक्ति होती है। मन सभी कर्मों का मूल है, इसलिए सकारात्मक सोच विकसित करें। कठिन समय में भय से पीछे न हटें। जीवन की यात्रा अंततः व्यक्तिगत होती है, इसलिए इसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाओ। शब्दों में घाव देने की शक्ति होती है, इसलिए मधुर वाणी बोलो। प्रेम और अहिंसा आवश्यक हैं। निरंतर सीखते रहो, कभी रुकें नहीं।

मणिमेकलई और कुंडलकेसी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में बौद्ध दर्शन का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। हालांकि, अनेक प्राचीन ग्रंथ समय के साथ लुप्त हो गए, फिर भी उनका योगदान अमूल्य बना हुआ है।

मदिरा जो मन को भ्रमित करती है, और जीव हिंसा-

बुद्धिमान, मोह से मुक्त होकर, इनका त्याग करते हैं, सुनो:

जन्म और मृत्यु, तथा मृत्यु के बाद पुनर्जन्म,

नींद और जागरण के समान हैं-यही सत्य है।

जो धर्मपूर्ण कर्म करते हैं, वे श्रेष्ठ लोक को प्राप्त होते हैं,

और जो अधर्म करते हैं, वे गहन दुःख में गिरते हैं।

इस सत्य को समझकर विवेकी जन अपने सभी बंधनों को तोड़ देते हैं।

इस प्रकार महाकाव्य मणिमेकलै (आथिरै पिच्चैयिट्टा काथै: 8490) बौद्ध धर्म के सार को स्पष्ट करता है।

उन्होंने पांच नैतिक सिद्धांतों पर विशेष बल दिया-अहिंसा, चोरी न करना, व्यभिचार से दूर रहना, सत्य बोलना और नशीले पदार्थों से परहेज़ करना। धर्म से आगे बढ़कर उन्होंने सिखाया कि मन ही हर चीज़ की जड़ है। सकारात्मक विचार और श्रेष्ठ कर्म ही व्यक्ति तथा समाज में संतुलन और शांति लाते हैं। अशांत मन को ज्ञान और स्पष्टता देने के कारण उन्हें एशिया का प्रकाश कहा जाता है।

मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम के शब्द याद आते हैं-भगवान गौतम बुद्ध के जीवन का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि शांति की शुरुआत हमारे भीतर से होती है, उन्होंने यह एहसास कराया कि स्वयं पर विजय पाना ही सबसे बड़ी जीत है। आज जब दुनिया तनाव और संघर्ष के दौर से गुजर रही है, तब बुद्ध के उपदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777549512qtUl3iXAAEMUyy.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323155&amp;path_article=11</guid><pubDate>30-Apr-2026 5:15 PM</pubDate></item><item><title>खाली होते गाँव, टूटते परिवार  और चुपचाप बिखरता बचपन</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323153&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323153&path_article=11]]></link><description>(छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक असहज सच)

- पीयूष मिश्रा

प्रदेश के अनेक गांवों में सुबह जल्दी निकलें, तो एक दृश्य दुर्भाग्य से आम होता जा रहा है। कुछ घरों के दरवाजे बंद हैं, कुछ आंगन सूने हैं, और कहीं बच्चों की आंखों में है एक स्थायी इंतजार- यह इंतजार केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस जीवंत दिनचर्या का है, जो कभी इन गांवों की रौनक हुआ करती थी।

आज स्थिति यह है कि गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं और शहरों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। सरगुजा, जशपुर, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, बस्तर और कांकेर जैसे जिलों से बड़ी संख्या में लोग हैदराबाद, सूरत, मुंबई और दिल्ली तथा उसके आस-पास के अर्बन कॉंगलोमेरट्स की ओर जाते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव अब पहले से कहीं अधिक गहरा और व्यापक हो चुका है।

शहरों के ग्लैमर को परिभाषित करनेवाली गगनचुंबी इमारतें, कॉर्पोरेट हाइटेक दफ्तर और अपमार्केट मॉल, सभी गाँव से पलायन करनेवाले मजबूर... क्षमा करें... मजदूर ने ही बनाएं हैं। बहुत हद तक भारत में पलायन को एक सामान्य आर्थिक प्रक्रिया मान लिया गया है, परंतु इसके भीतर छिपा सामाजिक यथार्थ कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2020-21 के अनुसार देश में लगभग 28.9त्न जनसंख्या प्रवासी है। 2011 की जनगणना में 45 करोड़ से अधिक लोग अपने मूल स्थान से अलग रह रहे थे और हालिया अनुमान बताते हैं यह संख्या 60 करोड़ के आसपास जा चुकी है। इन प्रवासियों में बड़ी संख्या श्रमिकों की है, जिनके लिए पलायन विकल्प नहीं, परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है। छत्तीसगढ़ में ही लगभग 88 लाख लोग किसी न किसी रूप में प्रवासन से जुड़े हैं। यह संकेत है कि यह मुद्दा अब व्यक्तिगत आजीविका नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को प्रतिबिंबित करता है।

छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य में, जहां बड़ी जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है, यह विषय अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। पलायन व्यक्ति का स्थानांतरण मात्र नहीं, बल्कि गांव की श्रमशक्ति, ऊर्जा और संभावनाओं का विघटन भी है। परिणामस्वरूप एक ओर गांवों की आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ती हैं और दूसरी ओर शहरों में अवसंरचना पर दबाव, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार और असंगठित श्रम का शोषण बढ़ता है। अत: प्रवासन एक साथ ग्रामीण क्षरण और शहरी असंतुलनदोनों की जननी है।

परंतु इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा और अनदेखा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। गांवों में ऐसे असंख्य बच्चे हैं, जिनके पिता, और कुछ के माता-पिता दोनों, महीनों या वर्षों से बाहर हैं। वे दादा-दादी या अन्य परिजनों के साथ रहते हैं लेकिन उनके जीवन में एक स्थायी भावनात्मक रिक्तता धीरे-धीरे आकार लेने लगती है। बच्चा प्रतिदिन किसी संवाद, किसी स्पर्श, किसी उपस्थिति की प्रतीक्षा करता है। वह जानता है कि पिता दूर हैं, फिर भी हर शाम उसके भीतर एक उम्मीद बनी रहती है। समय के साथ यह प्रतीक्षा असुरक्षा में बदल जाती है-वह कम बोलने लगता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और उसका आत्मविश्वास डोल जाता है। यह केवल भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की जड़ में लगने वाली दरार है।

हमारी संस्कृति में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, अपितु जीवन का आधार माना गया है। संयुक्त परिवार, पीढिय़ों के बीच सतत् संवाद, साथ बैठ कर भोजन करना और दिनभर की घटनाओं को साझा करना, ये सब केवल परंपराएं नहीं, बल्कि मनुष्य के मानसिक संतुलन के स्तंभ हैं। जब पलायन इस संरचना को तोड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता। बच्चे अपने माता- पिता के साथ जो संवाद, अनुशासन और स्नेह सीखते, वह उनसे छूट जाता है। यही कारण है कि आज हमें कुटुंब-प्रबोधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, परिवार को पुन: केंद्र में लाने की आवश्यकता है।

स्वयं एक औद्योगिक इकाई के संचालन के अनुभव से यह द्वंद्व अधिक स्पष्टता से समझ आता है। मेरे गांव के समीप उद्योग स्थापित करने का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी था कि स्थानीय लोगों को ऐसी आजीविका मिले, जहां से वे प्रतिदिन अपने परिवार के पास लौट सकें। यहां मजदूरों को मिलने वाली आय शहरी क्षेत्रों की तुलना में कुछ कम हो सकती है, परंतु इसके बदले जो मिलता है, वह है बच्चों के साथ समय, पारिवार के साथ संवाद और सामाजिक संतुलन। दिन कैसा भी गुजरे शाम में घर लौटकर वे और उनका पारिवार एक-दूसरे से वंचित नहीं रहते। यह उनके द्वारा ऐसा अमूर्त निवेश है, जिसका मूल्य किसी मूर्त वेतन से नहीं आंका जा सकता।

लेकिन इसी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है। उद्योग में ऐसे श्रमिक भी हैं, जो दूर-दराज से आकर महीनों तक अपने परिवार से दूर रहते हैं। उनकी आंखों से कमाई की मजबूरी स्पष्ट टपकती है, परंतु जीवन में स्थिरता का अभाव भी उतना ही स्पष्ट दिखता है। दूसरी ओर, कई बार यह भी देखने में आता है कि स्थानीय युवा अपने गांव में उतनी उत्पादकता से कार्य नहीं करते, जितनी वे बाहर जाकर करते हैं। वही व्यक्ति, जो गांव में अनुशासन से कार्य नहीं करता, बाहर जाकर लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में काम करता है और कई बार शोषण तक सहन करता है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि माइन्ड्सेट का संकट है-अपने परिवेश का अवमूलन और बाहरी अवसरों का अति-मूल्यांकन।

प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का एक और पहलू है, जो समाज के लिए चिंताजनक है। परिवार से दूर, अस्थायी, अनियंत्रित और असुरक्षित परिस्थितियों में रहने के कारण कई बार मद्यपान की प्रवृत्ति और पॉर्न की खपत में वृद्धि देखी जाती है, जिसके फलस्वरूप रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराध की घटनाएं भी सामने आती हैं। यह केवल व्यक्तिगत पतन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के विघटन का संकेत है। जब यही व्यक्ति अपने गांव लौटता है, तो यह व्यवहार भी साथ लाता है, जिससे धीरे-धीरे समाज का मूल स्वरूप प्रभावित होता है।

छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य, जिसकी माध्य आयु लगभग 24-26 वर्ष के बीच आँकी जाती है, के लिए यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यह सीधे-सीधे उसकी मानव संसाधन क्षमता पर चोट करती है।

यदि बच्चे भावनात्मक असुरक्षा, सामाजिक असंतुलन और मार्गदर्शन के अभाव में बड़े होंगे और युवाओं को कार्य-व्यवहार की नैतिक चुनौतियाँ से दो-दो हाथ होते रहना पड़ेगा,

तो यह दीर्घकाल में राज्य की उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता दोनों को प्रभावित करेगा। किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसके खनिज संपदा या उद्योग नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी की गुणवत्ता में निहित होती है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777546971SC_0041.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323153&amp;path_article=11</guid><pubDate>30-Apr-2026 4:32 PM</pubDate></item><item><title>अमल खलील की पत्रकारिता से क्या सीखें</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322981&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322981&path_article=11]]></link><description>-अरुण कुमार त्रिपाठी

हिंदी पत्रकारिता जब अपने उद्भव के दो सौ वर्ष पूरा करके विकास की ऐसी अवस्था में पहुंच गई है जब उसके चीखने और उछलने वाले एंकर, संवाददाता और संपादक अपनी कामयाबी इस बात में मानते हैं कि वे समाज में नफरती कहानियां और बहसें चलाते हुए सत्ता के कितने करीब पहुंच जाएं और कितनी जल्दी सूचना आयुक्त या राज्यसभा के सदस्य बन जाएं। वे सत्ताधीशों के साथ कितनी विदेश यात्राएं करें या कितने धार्मिक आयोजनों में मंच पर रहें, या फिर वे अपने निरंतर बढ़ते हुए लाखों के पैकेज का अनंत काल तक आनंद लेते रहें और बार बार परदे पर किसी विपक्षी नेता को डांटते हुए अपना ग्लैमर बिखेरते रहें। ऐसे समय में कोई पत्रकार हाल में शहीद हुई लेबनान की पत्रकार अमल खलील पर क्यों कुछ लिखना और उनसे कुछ सीखना चाहेगा। लेकिन इस स्तंभकार को लगता है कि अमल खलील की पत्रकारिता और उनके छोटे से जीवन से सीखने और उससे पश्चिम एशिया और उसकी जोखिम भरी पत्रकारिता को समझने में बहुत मदद मिल सकती है। उनका जीवन हमारी दो सौ वर्षीय हिंदी पत्रकारिता को आइना दिखाने का साहस भी रखती है।

बयालीस वर्षीय अमल खलील (1984-2026) बेरूत के अरबी अखबार अल-अखबार की पत्रकार थीं। जिन्हें पिछले हफ्ते दक्षिणी लेबनान में इजराइली सेना ने निशाना लगाकर मार डाला। हिंदी के ग्लैमर वाले पत्रकारों के मुकाबले सत्रह साल के अनुभव वाले इस पत्रकार का सैलेरी पैकेज भी बहुत मामूली था। उन्हें पहले से ही धमकियां दी गई थीं कि संभल जाएं नहीं तो मार दी जाएंगी। लेकिन पत्रकारिता उनका जुनून था। वे जिस मलबे में दबी हुई थीं वहां से उन्हें निकाले जाते समय भी उस पर इजराइली सेना मिसाइलें बरसा रही थी ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर बचाया न जा सके। इस बात को रेडक्रॉस के कर्मचारियों ने कहा है, जिसका इजराइली सेना ने खंडन किया है। वे उस दक्षिणी लेबनान की विशेषज्ञ थीं जिस पर इजराइल लगातार हमले कर रहा है और तमाम शांति वार्ताओं के बाद भी वहां से हटने को तैयार नहीं है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अमल खलील युद्ध संवाददाता थीं। वे स्वयं एक इंटरव्यू में इस बात से इंकार करती हैं। उनका कहना है कि उनके पास वैसा कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था जो युद्ध संवाददाता के पास होता है। वे अपने को फील्ड करेस्पांडेंट(क्षेत्र संवाददाता) बताती हैं। इजराइली हमले और लेबनानी प्रतिरोध के बीच उन्होंने जिस तरह की खबरें कीं वे अपने में एक मिसाल हैं। विशेषकर आज अपने परदे पर सनसनीखेज तरीके से मिसाइलों और युद्धों को दर्शाने वाली टीवी पत्रकारिता और युद्ध पर रंग बिरंगे पन्ने सजाने वाले अखबारों को सिखाने के लिए अमल खलील के पास बहुत कुछ है। खलील ने कहा था कि ज्यादातर पत्रकार आग लगाऊ रिपोर्टिंग करते हैं। वे लोग भी जो इजराइली हमले की ओर से कर रहे हैं और वे भी जो लेबनान और फिलिस्तीन जनता की ओर से उनके हमले से होने वाले विनाश को दर्शाते हैं। खलील के अनुसार ऐसे पत्रकार जो लेबनान की ओर से रिपोर्टिंग करते हैं वे एक जवाबी प्रोपेगैंडा चलाते हैं। वे इजरायली हमले से हुए नुकसान को कम करके दर्शाते हैं और प्रतिरोध को बड़ी उपलब्धि के तौर पर बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं। उसके विपरीत अमल खलील ने वस्तुगत रिपोर्ट दिखाने की कोशिश की ताकि पाठक या दर्शक इजराइली हमले के प्रति सावधान रहें। उनकी रिपोर्टिंग के दो पक्ष थे। एक लेबनानी और फिलस्तीनी प्रतिरोध की खबर देना और दूसरा सामान्य नागरिकों के जीवन की सच्चाई बताना।

अमल का कहना था कि वे इजराइली हमलों और उसके बाद की स्थितियों का दस्तावेजीकरण करती थीं। इसमें उनके दो उद्देश्य थे। एक तो साम्यवादी विचार और दूसरा प्रतिरोध। उन्होंने 2006 और 2023 के हमलों को भी विस्तार से कवर किया था। उन्हें अपना गांव छोडक़र भागना भी पड़ा था। फिर भी वे दक्षिणी लेबनान में कवरेज के लिए जाया करती थीं। अखबार में खबरें लिखने के कारण उन्हें कम लोग ही जानते थे। लेकिन उनकी रिपोर्ट को लोग पढ़ते थे। बल्कि उनके संपादक का कहना था कि उन्हें बहुत कुछ सिखाने और बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनमें एक स्वाभाविक किस्म का पत्रकार है। अमल ने 2020 से अपना वीडियो बनाना शुरू किया लेकिन उन्होंने अपने वीडियो में खुद को कभी नहीं प्रस्तुत किया। वे कहती भी थीं कि मैं कहानी कहने के लिए हूं न कि खुद कहानी बनने के लिए। उनकी यह बात आज के हिंदी पत्रकारों के एकदम विपरीत है जो बिना कुछ किए धरे हमेशा कहानी बनने को लालायित रहते हैं।

लेकिन आखिर में अमल खलील खुद कहानी बन गईं क्योंकि अपनी उत्पीडि़त जनता की कहानी कहने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, घर, परिवार, करियर और जीवन भी। अमल जानती थीं कि उनके साथ क्या होने वाला है। उन्हें मालूम था कि पिछले दो सालों में गजा में कितने पत्रकार मारे गए। यहां तक कि उनके अखबार के वरिष्ठ संवाददाता असफ अबू रहल कुछ साल पहले जब दक्षिणी लेबनान के कवरेज के लिए आए थे तो उन्हीं के सामने उन्हें इजरायली सैनिकों ने मार डाला था। थोड़ी देर बाद एक इजरायली सैनिक ने अमल से पूछा था कि क्या वे अल-अखबार की पत्रकार हैं, जब उन्होंने हां कहा तो इजरायली सैनिक ने उन्हें खून से सना हुआ उनका परिचय पत्र पेश किया और कहा कि अब यही बचा है।

अमल खलील के जीवन और उनकी पत्रकारिता के बहाने यह सवाल लाजिमी है कि वे युद्ध संवाददाता थीं या शांति संवाददाता। यहां हम नार्वे के मशहूर समाजशास्त्री और शांति अध्येता जोहान गाल्तुंग के हवाले से कह सकते हैं कि अमल ने शांति की पत्रकारिता की। वैसे जैसे भारत में तमाम पत्रकार नफरत के खिलाफ अपनी जान जोखिम में डालकर दंगों में कूदते रहे हैं। जिनमें सबसे बड़ा नाम है गणेश शंकर विद्यार्थी का। उन्हीं की परंपरा के कई पत्रकार रहे हैं जिन्होंने अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को अपनी जान जोखिम में डालकर भीड़ के उन्माद और उसे भडक़ाने वालों की सच्चाई दर्शाने की कोशिश की थी।

युद्ध की पत्रकारिता और शांति की पत्रकारिता का अंतर स्पष्ट करते हुए गाल्तुंग कहते हैं कि आमतौर पर पारंपरिक पत्रकारिता युद्ध की पत्रकारिता है। वह एक तरफ के विनाशकारी हथियारों के जखीरों और सैन्य शक्ति का गौरवगान करती है और विनाश का प्रचार करती है। वह नेताओं और सैनिक अधिकारियों के चुनौती देने वाले और भडक़ाने वाले बयानों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करती है। उसके वर्णनों में आमजन के दुखों और तकलीफों के लिए बहुत कम जगह होती है और न ही उनके शांति प्रयासों को स्थान दिया जाता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777395384mal_khalil.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322981&amp;path_article=11</guid><pubDate>28-Apr-2026 10:26 PM</pubDate></item><item><title>संग्रहालय में तब्दील होते पुस्तकालय..!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322892&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322892&path_article=11]]></link><description>-देवेन्द्र नाथ शर्मा

छत्तीसगढ़ के एक सरकारी महाविद्यालय में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर अपने ही महाविद्यालय के विद्यार्थियों को महाविद्यालय के ही पुस्तकालय का भ्रमण करवाया गया। विद्यार्थियों को रैक में रखी किताबों को दिखलाया गया, कुछ विद्यार्थियों ने पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं को अपने हाथों में लेकर देखा, पलटाया।

यहां कुछ सवाल खड़े होते हैं; एक तो यह कि विद्यार्थियों में न पुस्तकों के प्रति रुचि है और न ही पुस्तकालय के प्रति। साल भर के सत्र के बीत जाने के बाद में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर यदि वे पुस्तकालय का भ्रमण कर रहे हैं तो यह सोचा जा सकता है कि इसके पहले पुस्तकालय का वे कितना उपयोग वे कर रहे या कर पा रहे होंगे? दूसरा, महाविद्यालयों में अब पुस्तकालय में बैठकर पढऩे की संस्कृति भी खत्म-सी होती जा रही है। न पाठक आते हैं और न ही पाठकों के लिए माकूल व्यवस्थाएं पुस्तकालय में होती है। निजी महाविद्यालयों में स्थिति थोड़ी बेहतर होती है किंतु गिनती के महाविद्यालय को छोडक़र सभी सरकारी महाविद्यालयों में पुस्तकालय अलमारी और रैंक्स में ही बंद या नजरबंद है। अधिकतर महाविद्यालयों में लाइब्रेरियन ही नहीं है, प्राध्यापक को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। बच्चों के लिए बैठने की व्यवस्था का अभाव और पुस्तकालय से पुस्तकों का नियमित नियतकालिक लेन-देन का खंडित तरीके से होना, पुस्तकालय के प्रति विद्यार्थियों में अरुचि उत्पन्न करता है। दो दशकों से परीक्षा की तैयारी हेतु विद्यार्थियों की कुंजियों पर बढ़ी निर्भरता उन्हें पुस्तकालय से दूर करती हैं। महाविद्यालयीन पुस्तकालयों में नई किताबों व शोध पत्रिकाओं का हर वर्ष होने वाला नियमित क्रय लगभग बंद है। ऐसी स्थिति में पुस्तकालय हेतु नियमित आबंटन न होने से समृद्ध पुस्तकालयों वाले पुराने महाविद्यालयों में नई-नई पुस्तकों की खरीद न हो पा रही हैं और शोध व अन्य स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रदाय अवरुद्ध हो गया है। गत कुछ वर्षों में खुले नए सरकारी महाविद्यालयों में तो पुस्तकालय एक-दो अलमारी में ही सीमित है। न बैठने की जगह और न ही पुस्तकों के पढऩे की उपयुक्त व्यवस्था। ऐसी स्थिति में लगता है कि जहां अच्छे पुस्तकालय रहे हैं, उन महाविद्यालय के पुस्तकालय अब एक संग्रहालय में तब्दील होते चले जा रहे हैं। जहां विद्यार्थियों को लाकर बताया जा सकेगा कि ऐसे पुस्तकालय हुआ करते थे जिसमें पुस्तक रखी जाती थी और विद्यार्थी बैठ कर पढऩे आते थे और सप्ताह-दो सप्ताह के लिये पुस्तक अपने घर भी ले जा सकते थे।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/177730156000.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322892&amp;path_article=11</guid><pubDate>27-Apr-2026 8:22 PM</pubDate></item><item><title>भारत में छिड़ी है ऑफिस ड्रेस कोड और धार्मिक प्रतीकों पर बहस</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322891&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322891&path_article=11]]></link><description>सोशल मीडिया पर कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि कार्यस्थल पर अगर हिजाब की अनुमति है, तो हिंदू धार्मिक प्रतीकों की इजाजत क्यों नहीं होनी चाहिए। भारत में कंपनियों के नियम और कानून इस बारे में क्या कहते हैं?

डॉयचे वैले परशिवांगी सक्सेना​कीरिपोर्ट

देश में कार्यस्थल पर धार्मिक प्रतीकों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। हाल ही में लेंसकार्ट और एयर इंडिया की हैंडबुक के स्क्रीनशॉट वायरल हुए। दावा किया गया कि एयर इंडिया के केबिन क्रू को ड्यूटी के दौरान बिंदी, सिंदूर, तिलक, चूड़ा और कलावा पहनने की अनुमति नहीं है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे हिंदू संस्कृति का अपमान बताना शुरू कर दिया। बाद में दोनों कंपनियों ने स्पष्ट किया कि जिन मैनुअल्स को लेकर विवाद उठ रहा है, वे असल में पुराने हैं।

किस चीज की इजाजत है और किस पर रोक है, यह हर संस्था के अपने नियम और परिस्थितियों पर निर्भर करता है, न कि सीधे किसी के धर्म पर। अक्सर ऐसे प्रतिबंध कार्यस्थल पर समानता और एकरूपता बनाए रखने के उद्देश्य से लगाए जाते हैं। हालांकि अदालतें कुछ प्रतीकों को आवश्यक धार्मिक प्रथा मानती हैं। जबकि कई अन्य को वैकल्पिक या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखती हैं, फिर भले ही आस्था रखने वाले इससे असहमत हों।

विवाहित हिंदू महिला का विवाहित दिखना

प्रियंका मित्तल गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं। उनकी शादी पिछले साल राजस्थान के भीलवाड़ा के एक परिवार में हुई थी। प्रियंका सिंदूर, चूडिय़ां और मंगलसूत्र पहनकर दफ्तर नहीं जातीं। इस पर ससुराल ही नहीं, उनके अपने परिवार को भी आपत्ति है। प्रियंका इसके पीछे अपने कारण बताती हैं। चूडिय़ां पहनकर लैपटॉप पर काम करना मुश्किल होता है। गर्मियों में मंगलसूत्र से गर्दन पर रैशेज हो जाते हैं। वह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, मुझे देखकर कोई भी सबसे पहले यही सवाल पूछता है कि मंगलसूत्र कहां है? शादी के बाद मैं अपने घर गई थी। मैं बहुत थकी हुई थी। इसलिए मैंने मंगलसूत्र उतारकर रख दिया। मेरी मां ने तुरंत मुझे वापस पहनने के लिए कहा।

प्रियंका आगे बताती हैं, मेरी अपनी पसंद मायने ही नहीं रखती। मुझे हर समय मंगलसूत्र, बिछिया और सिंदूर पहनकर शादीशुदा दिखना है। ससुराल में तो मुझे हर समय घाघरा पहनने और घूंघट करने को कहा जाता है। लोग तो यह तक कहते हैं कि पत्नी बनना एक सौभाग्य है। ये प्रतीक हमारी पहचान और गर्व हैं।

सायली केतकर मुंबई में स्थित एक निजी बैंक में काम करती हैं। उनके पति कहते हैं कि जैसे मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनती हैं, वैसे ही उन्हें सिंदूर और मंगलसूत्र पहनना चाहिए। शादी में मिले गहनों को लेकर भी उन पर दबाव है। सायली ने बताया, मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं सोने का नथ, मंगलसूत्र और अंगूठी हमेशा पहनकर रखूं। लेकिन इन्हें पहनकर बैंक में काम करना अनकम्फर्टेबल लगता है। वैसे भी नाम से धर्म और उम्र से वैवाहिक स्थिति समझी जा सकती है। इसके लिए प्रदर्शन की जरुरत नहीं।

कई नारीवादी और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों में इन्हें ऐसे प्रतीक माना जाता है जो महिला की पहचान को विवाह से जोड़ते हैं, लेकिन पुरुषों पर समान प्रतीकात्मक दायित्व नहीं डालते। इसी वजह से आधुनिक बहसों में इन्हें धर्म से ज्यादा सामाजिक और पितृसत्तात्मक परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। लेकिन चूंकि बहुत-सी महिलाएं अपनी पसंद से बिंदी, सिंदूर या मंगलसूत्र पहनती हैं इसलिए इनके केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक मायने भी हैं।

ऐसा भी नहीं कि ऐसे प्रतीकों को लेकर बहस सिर्फ भारत में ही है। साल 2017 में यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस ने फैसला सुनाया कि कंपनियां कर्मचारियों के धार्मिक प्रतीकों जैसे हिजाब, पगड़ी, क्रॉस और किप्पा पर रोक लगा सकती हैं, बशर्ते यह नियम न्यूट्रल ड्रेस कोड के तहत सभी पर समान रूप से लागू हो। अदालत ने अपने बयान में कहा, किसी संस्था का आंतरिक नियम, जो किसी भी राजनीतिक, दार्शनिक या धार्मिक प्रतीक को दिखने से रोकता है, उसे सीधे तौर पर भेदभाव नहीं माना जाएगा। कई धार्मिक संगठनों ने इस फैसले पर चिंता जताई और कहा कि इससे कर्मचारियों के धार्मिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

आवश्यक धार्मिक प्रथा का फैसला लेती है अदालत

कार्यस्थल पर ऐसे नियम और शर्तें अक्सर समानता और एकरूपता (यूनिफॉर्मिटी) कायम रखने के लिए बनाए जाते हैं। ताकि किसी के साथ भेदभाव न हो और सभी कर्मचारी एक स्तर पर रहें। भारतीय कानून में आवश्यक धार्मिक प्रथा (एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिस) का सिद्धांत यह तय करने के लिए इस्तेमाल होता है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथाएं वास्तव में उसके लिए अनिवार्य है। यह अधिकार अदालत के पास है। अगर कोई प्रथा महत्त्वपूर्ण मानी जाती है तो उसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलता है। जैसे सिखों के लिए बाल न काटना और पगड़ी रखना उनकी आस्था का अहम हिस्सा माना गया है।

सुप्रीम कोर्ट में वकील शशांक सिंह डीडब्ल्यू से कहते हैं कि कंपनी और कर्मचारी के बीच कॉन्ट्रैक्ट साइन होता है। कर्मचारी कार्यस्थल की नीतियों का पालन करने के लिए सहमति देता है। शशांक अपने अनुभव से बताते हैं, अदालत में वकील कलावा और तिलक लगाकर आने लगे हैं। यह चलन 2014 के बाद से बढ़ गया है। इसे कुछ लोग अपनी धार्मिक पहचान और बहुसंख्यक उपस्थिति जताने के तरीके के रूप में देखते हैं। इसीलिए कार्यस्थलों पर समानता के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए ऐसे नियम बनाए जाते हैं।

शशांक उदाहरण देकर समझाते हैं, अदालतों में वकीलों को रंग-बिरंगे कपड़े और टोपी पहनने की अनुमति नहीं होती। इसी तरह सेना और केबिन क्रू में इस तरह के कई नियम होते हैं, क्योंकि उनके काम की प्रकृति ही ऐसी है। हालांकि, कुछ अपवाद भी होते हैं। जैसे सिखों की पगड़ी, हिजाब और पंडित का शिखा रखना। इन्हें धार्मिक प्रथाओं के रूप में अलग तरीके से देखा जाता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777301049W-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322891&amp;path_article=11</guid><pubDate>27-Apr-2026 8:14 PM</pubDate></item><item><title>पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है....</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322829&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322829&path_article=11]]></link><description>-अजीत साही

राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है। मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है।

2011 में अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया। देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द खत्म हो जाएगा। हज़ारों की भीड़ जमा हो गई। क्रंति को नाम मिला India Against Corruption। नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए। मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं। मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया।

उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाकात होती थी। एक दिन उन्होंने मुझे कहा, अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं।

कुछ हफ्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं। वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हजारे से मिलवाया। उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं। मैं चुप बैठा रहा। फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए।

एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा- मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ। आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख्ता कर लें। कल ये एक पार्टी बनेगा। आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें। आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे। बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवार न खड़ा करें।

बहन को मेरी बात नागवार गुजरी। बोलीं, मुझे अफसोस है कि आप इतने सिनिकल हैं। अन्ना और अरविंद पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकते हैं। हम इंडिया बदलने निकले हैं। आपकी सोच बहुत छोटी है। आप इस माइंडसेट से बाहर निकलिए। ये एक दूसरी आज़ादी है। वी आर मेकिंग हिस्ट्री।

ये सुनकर मुझे बरबस बचपन और जवानी का खयाल आ गया।

मैं ग्यारह साल का था जब इमरजेंसी ख़त्म हुई थी। कुछ महीनों पहले ही मेरे पिता का देहांत हुआ था तो हम इलाहाबाद के रानीमंडी में अपने ननिहाल रहने आ गए थे। 1977 में जब इंदिरा गाँधी चुनाव हारीं और जनता पार्टी चुनवा जीती तो पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में दीवाना हो गया।

ढाई साल बाद 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरी और इंदिरा गाँधी चुनाव जीत गईं। पूरे मुहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया।

फिर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई। दो महीने बाद लोकसभा चुनाव हुआ। इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा। मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। सिविल लाइंस जाकर मैंने खादी का नया कुर्ता पैजामा खरीदा और अमिताभ बच्चन की कैंपेनिंग में लग गया।

चुनाव से चौबीस घंटे पहले एक जीप में छंटे हुए कांग्रेसी गुंडों के साथ मुझे गांवों की ओर भेज दिया गया। मैंने वहाँ बूथ मैनेजमेंट का पावन अनुभव किया।

आधी रात खेतों के बीच घुप अंधेरे में कच्ची सडक़ पर दो जीपें आमने सामने रुकीं। मैं अपनी जीप में बैठा रहा। मेरी जीप के गुंडे और दूसरी जीप के गुंडे जीपों की हेडलाइट में गुटखा खाते बातें करते रहे। फिर दूसरी जीप पर से विपक्षी पार्टी का झंडा उतर गया। आवाज लगाकर मुझे कांग्रेस का झंडा लाने को कहा गया। उसे दूसरी जीप पर लगा दिया गया। फिर दोनों जीपें अपने अपने अपने रस्ते निकल लीं।

राजीव गाँधी ने बंपर जीत हासिल की। अमिताभ बच्चन ने भी। तब तक मेरा परिवार ननिहाल छोड़ कर सरकारी अफसरों के मुहल्ले में रहने लगा था। इस मुहल्ले में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में शामिल हो गया।

फिर 1989 आया। अब मैं दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में रिपोर्टर की नौकरी कर रहा था। देश जान गया था कि राजीव गाँधी भ्रष्ट है। देश ये भी जान गया था कि वी पी सिंह देवता है। राजीव गाँधी हार गया। वी पी सिंह जीत गया। जिस मुहल्ले में मैं रहता था वहाँ भी खुशी की लहर दौड़ गई।

ख़ैर। जैसा कि मैंने अपनी मुंहबोली बहन से कहा था, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड ्रद्दड्डद्बठ्ठह्यह्ल ष्टशह्म्ह्म्ह्वश्चह्लद्बशठ्ठ से पार्टी निकली। उस मकाम पर केजरीवाल ने अन्ना हजारे को थैंक्यू बोल दिया। मेरी बहन गाँधी को छोड़ कर नेहरू के साथ चली गईं। तमाम और लोगों ने भी यही मुश्किल फ़ैसला लिया।

उस दौर में पार्टी के एक दूसरे भारी नेता थे। मैं उनकी तब भी और आज भी इज़्जत करता हूँ। उन्होने मुझे घर बुलाया। केजरीवाल भी थे। दोनों बोले हम पार्टी शुरू कर रहे हैं और एक खोजी पत्रकारिता की वेबसाइट बना रहे हैं। तुम हमारे साथ आ कर उसे चलाओ। विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर मैंने बताया मैं इस नेक काम के काबिल नहीं हूँ। बाद में नेहरू ने उन दूसरे नेता को भी पार्टी से निकाल दिया।

मेरी बहन ने भी वक्त आने पर नेहरू को छोड़ दिया। आज वो पार्टीगत राजनीति की माननीय सदस्या हैं। मेरी मनोकामना है कि देर से ही सही, उनको संसद की सदस्यता मिलनी चाहिए। और ऐसा क्यों न हो?

अगर आप सोच रहे हैं कि इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स है तो मैं माफी चाहता हूँ, इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं है। भारतीय समाज जिस रुआब से अपनी पीठ थपथपाता है दरअसल वो भीतर से उतना ही खोखला और लचर है। हम उस मरीज की तरह हैं जो दुनिया से जानलेवा मज$ छुपाकर सोचता है कि कोई मज$ है ही नहीं।

लेकिन दुनिया जानती है कि मज$ लाइलाज है। पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777218506R-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322829&amp;path_article=11</guid><pubDate>26-Apr-2026 9:18 PM</pubDate></item><item><title>ईरान को भूखा मारने की साजिश</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322762&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322762&path_article=11]]></link><description>-दिमित्री स्क्वोर्त्सोव

अमेरिका ईरान पर अपनी नौसैनिक नाकाबंदी को और सख्त कर रहा है, जिससे तेल टैंकरों को देश छोडऩे और उपकरण एवं खाद्य सामग्री ले जाने वाले जहाजों को प्रवेश करने से रोका जा रहा है। वाशिंगटन अचानक हमले की बजाय तेहरान का गला घोंटने की धीमी रणनीति अपना रहा है। इस नाकाबंदी का ईरानी अर्थव्यवस्था पर पहले से ही क्या प्रभाव पड़ रहा है, ईरान इसके जवाब में क्या कदम उठा सकता है और यह नाकाबंदी कब वास्तव में असहनीय हो जाएगी?

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बावजूद, ईरान के तटों और बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी है। आर्थिक दृष्टि से, यह तेहरान के लिए खुले युद्ध से भी अधिक विनाशकारी है। बमबारी से हुए नुकसान की भरपाई धीरे-धीरे की जा सकती है, लेकिन नौसैनिक नाकाबंदी न केवल नुकसान पहुंचाती है, बल्कि निर्यात राजस्व को भी प्रतिदिन बाधित करती है, आवश्यक वस्तुओं के आयात में बाधा डालती है और आर्थिक स्थिरता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देती है।

ईरान की अर्थव्यवस्था को युद्धविराम से पहले भारी नुकसान हुआ था। मीडिया रिपोर्टों में कारखानों, पुलों, बिजली संयंत्रों, रेलवे और हवाई अड्डों के विनाश, खाड़ी देशों के साथ कुछ आर्थिक संबंधों के टूटने, बढ़ती बेरोजगारी और आसमान छूती कीमतों का जिक्र किया गया है। रॉयटर्स के अनुमान के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान में कुछ वस्तुओं की कीमतों में लगभग 40त्न की वृद्धि हुई है, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए 6.1त्न की आर्थिक गिरावट का अनुमान लगाया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है, लेकिन यह देश की आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में भारी गिरावट को जरूर दर्शाता है।

इस नाकाबंदी से ईरान के विदेशी व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। मौजूदा तनाव बढऩे से पहले, ईरान ने 2025/26 वित्तीय वर्ष में लगभग 109.7 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार किया था, जिसमें 51.66 अरब डॉलर गैर-ऊर्जा निर्यात और 58.02 अरब डॉलर आयात शामिल थे। हालांकि, अमेरिका द्वारा नाकाबंदी लागू किए जाने के बाद, प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल ईरानी तेल का निर्यात खतरे में है। तुलनात्मक रूप से, नाकाबंदी से पहले मार्च में ईरान ने प्रतिदिन 18.4 करोड़ बैरल और अप्रैल में 17.1 करोड़ बैरल तेल का निर्यात किया था, जिसमें से 80 फीसदी से अधिक खेप चीन को भेजी जाती थी।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो, ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें 90-100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होने के कारण, प्रतिदिन 1.7-2.0 मिलियन बैरल के नुकसान का मतलब है कि केवल तेल से ही प्रति माह लगभग 4.5-6 बिलियन डॉलर का सकल राजस्व नुकसान होगाछूट, वैकल्पिक उपायों और अतिरिक्त लागतों को शामिल किए बिना भी। तेल क्षेत्र को लगे इस झटके को पेट्रोकेमिकल क्षेत्र के एक अन्य झटके ने और भी बढ़ा दिया- 16 अप्रैल को ईरान ने पेट्रोकेमिकल निर्यात रोक दिया, जिससे सामान्यत: लगभग 29 मिलियन टन उत्पाद और लगभग 13 बिलियन डॉलर वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। इससे प्रति माह 1.1 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त वार्षिक राजस्व नुकसान होता था। कुल मिलाकर, केवल इन दो मुख्य निर्यात मदों से होने वाला मासिक नुकसान ही कई अरब डॉलर तक पहुंच जाता है।

लेकिन यह नाकाबंदी केवल निर्यात और इसलिए केवल विदेशी मुद्रा को ही प्रभावित नहीं कर रही है। यह आयात को भी कम कर रही हैठीक वही आयात जिनके बिना ईरानी उद्योग और कृषि का दम घुटने लगा है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, ईरान आयातित गेहूं, मक्का, चावल और वनस्पति तेलों पर अत्यधिक निर्भर है; मक्का पर निर्भरता लगभग 95त्न और गेहूं पर लगभग 15त्न है। ईरान के सबसे बड़े आयातों में सोयाबीन मील, सोयाबीन, चावल और मक्का शामिल हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने बुनियादी वस्तुओं के वार्षिक आयात का अनुमान लगभग 25 मिलियन टन लगाया है; वर्तमान नाकाबंदी से पहले के दस महीनों में, बंदरगाहों से 21 मिलियन टन माल आयात किया गया था। इसका मतलब यह है कि दक्षिणी बंदरगाहों के अवरुद्ध होने से ईरान को पशु आहार और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का आधार मिलता है।

इन महत्वपूर्ण आपूर्तियों के स्रोत भी बहुत विशिष्ट हैं। ब्राज़ील मक्का और सोयाबीन का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है; भारत चावल और औषधियों का मुख्य स्रोत है; चीन ईरान का मुख्य व्यापारिक साझेदार और उपकरण एवं मध्यवर्ती वस्तुओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आपूर्तिकर्ता है; तुर्की और जर्मनी औद्योगिक एवं चिकित्सा आपूर्तियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स ने स्पष्ट रूप से बताया है कि ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में चीन, भारत, तुर्की, जर्मनी, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, जबकि इसके मुख्य आयात में मध्यवर्ती वस्तुएं, सब्जियां, मशीनरी और उपकरण शामिल हैं। समस्या यह है कि शांति काल में, इन आपूर्तियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समुद्र के रास्ते और खाड़ी के लॉजिस्टिक्स केंद्रों से होकर, मुख्य रूप से अमीराती बंदरगाहों के माध्यम से ईरान तक जाता था।

इसके क्या परिणाम होंगे? मुख्य रूप से, देश में पशुधन और मुर्गीपालन के चारे, कृषि रसायनों, कुछ उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल, पुर्जों, चिकित्सा सामग्री और कुछ दवाओं की आपूर्ति में भारी कमी आई है। अल्पावधि में, इसका मतलब अकाल नहीं है, बल्कि कुछ वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और कमी है। मध्यम अवधि में, इसका अर्थ है मुर्गीपालन और पशुधन उद्योगों में संकट और खाद्य, यांत्रिक इंजीनियरिंग और रसायन उद्योगों में उत्पादन में कमी।

और फिर एक और भी खतरनाक प्रक्रिया शुरू हो जाती है: उर्वरक की कमी अगली फसल को प्रभावित करती है। यह कोई संयोग नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन वैश्विक खाद्य और उर्वरक बाजारों पर युद्ध के प्रभाव पर अलग-अलग चर्चा कर रहे हैं : यदि फसल के मौसम के दौरान आपूर्ति बाधित होती है, तो वास्तविक कमी दिखने से पहले ही कुछ नुकसान अपरिवर्तनीय हो जाता है।

हालांकि, तेहरान इस स्थिति से अचंभित नहीं था। 2025 की गर्मियों में 12 दिनों के युद्ध के बाद, ईरान ने सावधानीपूर्वक अपनी अर्थव्यवस्था को युद्ध की स्थिति में ढालना शुरू कर दिया।

एक संकट प्रबंधन टीम का गठन किया गया, युद्धकालीन परिस्थितियों में व्यापार सेवाओं के संचालन के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया, और कुछ प्रक्रियाओं को दूरस्थ और रोटेशनल कार्य में परिवर्तित किया गया। उद्योग मंत्रालय ने क्षतिग्रस्त उद्यमों को उत्पादन में बहाल करने के लिए पैकेज तैयार किए। 2025 के पतझड़ तक, ईरानी अधिकारियों ने कच्चे माल और घटकों के आयात को बाधित न करने के लिए जानबूझकर मुद्रा और आयात नियमों में ढील देना शुरू कर दिया था। दूसरे शब्दों में, यह सोवियत-शैली का पूर्ण सैन्य लामबंदी नहीं था, बल्कि अस्तित्व के लिए एक चयनात्मक समायोजन था: आयात का समर्थन करना, बुनियादी वस्तुओं का उत्पादन बनाए रखना और व्यापार तंत्र को ठप होने से रोकना।

हाल के महीनों में, नए युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम के मद्देनजर, ये उपाय काफी सख्त हो गए हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने तत्काल रियायतों का एक पैकेज पेश किया: आवश्यक वस्तुओं की 100त्न सीमा शुल्क निकासी यथाशीघ्र, प्राथमिकता वाले कार्गो की 90त्न त्वरित निकासी, आयात पंजीकरण की अवधि में विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की विफलता की स्थिति में कागजी दस्तावेजों का उपयोग,

और कार्गो को अन्य सीमा चौकियों पर पुनर्निर्देशित करने की विस्तारित शक्तियां। ईरानी राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि आवश्यक वस्तुओं का न्यूनतम स्टॉक 60 लाख टन बनाए रखा जाए। दक्षिणी बंदरगाहों के अवरुद्ध होने से ईरान को पशु आहार और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का आधार मिलता है।

इन महत्वपूर्ण आपूर्तियों के स्रोत भी बहुत विशिष्ट हैं। ब्राज़ील मक्का और सोयाबीन का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है; भारत चावल और औषधियों का मुख्य स्रोत है; चीन ईरान का मुख्य व्यापारिक साझेदार और उपकरण एवं मध्यवर्ती वस्तुओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आपूर्तिकर्ता है; तुर्की और जर्मनी औद्योगिक एवं चिकित्सा आपूर्तियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स ने स्पष्ट रूप से बताया है कि ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में चीन, भारत, तुर्की, जर्मनी, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, जबकि इसके मुख्य आयात में मध्यवर्ती वस्तुएं, सब्जियां, मशीनरी और उपकरण शामिल हैं। समस्या यह है कि शांति काल में, इन आपूर्तियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समुद्र के रास्ते और खाड़ी के लॉजिस्टिक्स केंद्रों से होकर, मुख्य रूप से अमीराती बंदरगाहों के माध्यम से ईरान तक जाता था।

इसके क्या परिणाम होंगे? मुख्य रूप से, देश में पशुधन और मुर्गीपालन के चारे, कृषि रसायनों, कुछ उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल, पुर्जों, चिकित्सा सामग्री और कुछ दवाओं की आपूर्ति में भारी कमी आई है। अल्पावधि में, इसका मतलब अकाल नहीं है, बल्कि कुछ वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और कमी है। मध्यम अवधि में, इसका अर्थ है मुर्गीपालन और पशुधन उद्योगों में संकट और खाद्य, यांत्रिक इंजीनियरिंग और रसायन उद्योगों में उत्पादन में कमी।

और फिर एक और भी खतरनाक प्रक्रिया शुरू हो जाती है: उर्वरक की कमी अगली फसल को प्रभावित करती है। यह कोई संयोग नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन वैश्विक खाद्य और उर्वरक बाजारों पर युद्ध के प्रभाव पर अलग-अलग चर्चा कर रहे हैं : यदि फसल के मौसम के दौरान आपूर्ति बाधित होती है, तो वास्तविक कमी दिखने से पहले ही कुछ नुकसान अपरिवर्तनीय हो जाता है। हालांकि, तेहरान इस स्थिति से अचंभित नहीं था। 2025 की गर्मियों में 12 दिनों के युद्ध के बाद, ईरान ने सावधानीपूर्वक अपनी अर्थव्यवस्था को युद्ध की स्थिति में ढालना शुरू कर दिया।

एक संकट प्रबंधन टीम का गठन किया गया, युद्धकालीन परिस्थितियों में व्यापार सेवाओं के संचालन के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया, और कुछ प्रक्रियाओं को दूरस्थ और रोटेशनल कार्य में परिवर्तित किया गया। उद्योग मंत्रालय ने क्षतिग्रस्त उद्यमों को उत्पादन में बहाल करने के लिए पैकेज तैयार किए। 2025 के पतझड़ तक, ईरानी अधिकारियों ने कच्चे माल और घटकों के आयात को बाधित न करने के लिए जानबूझकर मुद्रा और आयात नियमों में ढील देना शुरू कर दिया था। दूसरे शब्दों में, यह सोवियत-शैली का पूर्ण सैन्य लामबंदी नहीं था, बल्कि अस्तित्व के लिए एक चयनात्मक समायोजन था: आयात का समर्थन करना, बुनियादी वस्तुओं का उत्पादन बनाए रखना और व्यापार तंत्र को ठप होने से रोकना।

हाल के महीनों में, नए युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम के मद्देनजर, ये उपाय काफी सख्त हो गए हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने तत्काल रियायतों का एक पैकेज पेश किया: आवश्यक वस्तुओं की 100त्न सीमा शुल्क निकासी यथाशीघ्र, प्राथमिकता वाले कार्गो की 90त्न त्वरित निकासी, आयात पंजीकरण की अवधि में विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की विफलता की स्थिति में कागजी दस्तावेजों का उपयोग, और कार्गो को अन्य सीमा चौकियों पर पुनर्निर्देशित करने की विस्तारित शक्तियां। ईरानी राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि आवश्यक वस्तुओं का न्यूनतम स्टॉक 60 लाख टन बनाए रखा जाए।

युद्धविराम के बाद, अधिकारियों ने आयात आदेशों के पंजीकरण की अवधि 30 मई तक बढ़ा दी और 2,800 अत्यंत महत्वपूर्ण औद्योगिक वस्तुओं पर लगे कुछ प्रतिबंध हटा दिए। प्रभावित व्यवसायों और परिवारों के लिए सहायता पैकेज भी साथ ही शुरू किए गए। क्या यह कारगर रहा? आंशिक रूप से। ईरानी व्यवस्था ने अब तक तत्काल आर्थिक पतन को रोकने में कामयाबी हासिल की है। युद्ध के 39 दिनों के दौरान, 28 फरवरी से 7 अप्रैल तक, सीमा शुल्क विभाग ने 28.74 करोड़ टन आवश्यक वस्तुओं की निकासी की और ऐसे माल से लदे 112,000 से अधिक ट्रकों को गुजरने की अनुमति दी। नए ईरानी वर्ष के शुरुआती दिनों में भी आवश्यक वस्तुओं की सीमा शुल्क निकासी जारी रही। और 28 फरवरी से 17 अप्रैल तक, देश की सडक़ों पर 6 करोड़ टन से अधिक माल का परिवहन हुआ।

इन सबका मतलब यह है कि झटकों और बाधाओं के बावजूद, घरेलू रसद सेवाएं अभी भी सुचारू रूप से चल रही हैं। लेकिन इससे मूल बात नहीं बदलती: लामबंदी के उपाय लड़ाई को लंबे समय तक जारी रखने में मदद करते हैं, लेकिन वे सामान्य समुद्री निर्यात और पारंपरिक समुद्री आयात के नुकसान की पूरी तरह से भरपाई नहीं कर सकते।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/177713240182310416_27432355833033097_652852656446866638_n.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322762&amp;path_article=11</guid><pubDate>25-Apr-2026 9:23 PM</pubDate></item><item><title>राघव चड्ढा के नेतृत्व में आप में हुई टूट क्या बीजेपी को फायदा पहुँचा सकती है?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322761&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322761&path_article=11]]></link><description>- चंदन कुमार जजवाड़े

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) छोडक़र बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया है। पार्टी छोडऩे के बाद राघव चड्ढा ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की।

शुक्रवार को संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राघव चड्ढा ने कहा, हमने तय किया है कि हम, राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य संविधान के प्रावधानों के अनुसार बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ताज़ा घटनाक्रम को लेकर एक्स पर राघव चड्ढा का नाम लिए बिना सिर्फ इतना लिखा, बीजेपी ने फिर से पंजाबियों के साथ किया धक्का।

इससे पहले दिल्ली में भी आप के कई नेता पार्टी छोडक़र बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इन्हीं में से एक कपिल मिश्रा हैं, जो कभी केजरीवाल सरकार में मंत्री हुआ करते थे और अब दिल्ली में बीजेपी की सरकार में मंत्री हैं।

लेकिन राज्यसभा सांसदों का पार्टी छोडऩा कुछ मायनों में काफी अलग है क्योंकि ये आम लोगों के वोट से चुनकर नहीं आते हैं। ऐसे में इन सांसदों से बीजेपी को क्या कोई फायदा हो सकता है। आगे हम कुछ एक्सपर्ट्स से बातचीत के आधार पर इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे।

राघव चड्ढा ने एक एक्स पोस्ट में कहा, आज, भारत के संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए, राज्यसभा में आप के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया है।

सात सांसदों ने इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे राज्यसभा के माननीय सभापति को सौंपा गया। मैंने दो अन्य सांसदों के साथ मिलकर हस्ताक्षरित दस्तावेज खुद सौंपे हैं।

आम आदमी पार्टी का बीजेपी पर आरोप

वहीं दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा, जो राज्यसभा सदस्य आज बीजेपी के सामने झुक गए, अपनी निजी मजबूरियों, डर और लालच के कारण जिन्होंने पंजाब के लोगों के साथ गद्दारी की है, उन्हें पता होना चाहिए कि पंजाब गद्दारों को कभी माफ नहीं करता है।

आम आदमी पार्टी ने इस महीने की शुरुआत में राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी राघव चड्ढा की जगह अशोक कुमार मित्तल को दे दी थी।

पार्टी के इस फैसले के बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में पार्टी के प्रति नाराजगी जताई थी। इसके बाद आप के कई नेताओं से सोशल मीडिया पर ही उनकी बहस भी हुई थी।

उस समय आप के कई नेताओं ने राघव चड्ढा पर संसद में अपने भाषणों में बीजेपी के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया था।

आम आदमी पार्टी नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय राघव चड्ढा के लंदन में होने पर भी सवाल उठाए थे।

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने बीबीसी न्यूज हिन्दी से बातचीत में मौजूदा घटनाक्रम को बीजेपी की चाल बताया।

उन्होंने आरोप लगाया, यह सब बीजेपी का लिखा हुआ है। राघव चड्ढा को हटाकर अशोक मित्तल को राज्यसभा में उप नेता बनाया तो 15 अप्रैल को उनके घर ईडी पहुंच गई। पहले ईडी भेजो, सीबीआई भेजो, फिर जेल भेजो। इसके बाद चुनाव आयोग लगा दो और वोट कटवा दो।

सोमनाथ भारती दावा करते हैं, बीजेपी पंजाब में अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहती है। उनको लगता है कि इन राज्यसभा सांसदों की मदद से वो पार्टी को फैला पाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इनमें से किसी के पास राजनीतिक अनुभव तो है नहीं। सबकी ताकत अरविंद केजरीवाल हैं।

पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं।

राज्य में साल 2022 में हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो बीजेपी ने उन चुनावों में 73 उम्मीदवार खड़े किए थे। इनमें से महज दो उम्मीदवार ही जीत हासिल कर पाए थे, जबकि पार्टी के 55 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

वहीं आम आदमी पार्टी ने सभी 117 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और उसे 92 सीटों पर जीत मिली थी। यानी आप पंजाब में एक बड़ी पार्टी के तौर पर स्थापित हो गई।

जबकि राज्य में परंपरागत रूप से मजबूत मानी जाने वाली पार्टी कांग्रेस को सभी सीटों पर चुनाव लडक़र 18 सीटों पर जीत मिली थी।

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, बीजेपी पंजाब में ख़ुद को मजबूत करना चाहती है। वो नहीं चाहती है कि अगले साल होने वाले चुनाव में कांग्रेस जीतकर आए। इस लिहाज से आप के सांसदों का बीजेपी में जाना महत्वपूर्ण है।

भले ही वे लोग राज्यसभा से हैं और जनता के नेता नहीं हैं। लेकिन इनकी पृष्ठभूमि देखें तो ये समाज में खास जगह रखते हैं, जो जनता के बीच काफी मायने रखती है। हरभजन सिंह क्रिकेटर रहे हैं। अशोक मित्तल बड़े पैसे वाले हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777132003R-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322761&amp;path_article=11</guid><pubDate>25-Apr-2026 9:16 PM</pubDate></item><item><title>तेंदुलकर क्या इस दौर में भी इतने ही कामयाब होते?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322677&amp;path_article=11</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322677&path_article=11]]></link><description>-शारदा उगरा

आज जब सचिन तेंदुलकर के जन्मदिन पर सोशल मीडिया जश्न में डूबा हुआ है, तो मुझे सचिन से जुड़ा एक दशक से भी ज़्यादा पुराना कि़स्सा याद आ रहा है।

ये बात, उस वक्त की है, जब भारत ने 2011 का वनडे वर्ल्ड कप जीत लिया था। उस वक्त तेंदुलकर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक पूरा करने की कोशिश कर रहे थे।

एक दिन मेरे दोस्त के सात साल के बेटे ने पूछा कि, सचिन ने आईपीएल में कितने शतक लगाए हैं?

ये बड़ा मासूम सा सवाल था, जिस पर न इतिहास का साया था, न विरासत का बोझ। मैंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।।। हम्म...एक। बच्चे ने हैरानी से कहा, सिर्फ एक।

मैं उसके मासूम सवाल पर चौंक ज़रूर गई थी, मगर मुझे ख़ुशी भी हुई थी।

उस स्कूली बच्चे ने 2011 के विश्व कप में सचिन की धुआंधार पारियों को देखा था। फिर भी उसकी नजर में सचिन तेंदुलकर की यही छवि थी जबकि उस वक्त सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट के इतिहास में भारत के सबसे बड़े स्टार थे।

क्रिकेट के भगवान

वो सोशल मीडिया और ख़ुद के प्रचार से पहले का दौर था। आज जब सचिन तेंदुलकर, मुंबई इंडियंस की टीम के डग आउट में पहुंचते हैं, या फिर विज्ञापनों में और इंस्टाग्राम पर दिखते हैं, तो मेरे ज़हन में सवाल उठता है कि अब सात साल के बच्चे सचिन तेंदुलकर को किस नजर देखते होंगे?

इस साल नवंबर में सचिन तेंदुलकर को सक्रिय क्रिकेट से संन्यास लिए हुए 13 साल पूरे हो जाएंगे।

टीनएजर्स के लिए वो महज़ एक ऐसे पूर्व खिलाड़ी हैं, जिनके बारे में सयाने लोग कहते हैं कि वो बहुत शानदार खिलाड़ी थे।

उनके लिए सचिन तेंदुलकर, 1989 से 2013 के दौर वाले क्रिकेट के भगवान नहीं, जैसा उन्हें करोड़ों क्रिकेट फ़ैन याद करते हैं। आज के नौजवानों के लिए वो 2023 वाले पूर्व क्रिकेटर हैं।

आज के युवा धोनी, कोहली और रोहित शर्मा के दौर में बड़े हुए हैं, जो मैदान के चारों और शॉट लगाने वाली बैटिंग करते हैं।

टी-20 के दौर में इन नौजवानों ने इन खिलाडिय़ों को हर गेंद पर ज़बर्दस्त शॉट लगाते देखा है, जो कई बार मैदान के उन कोनों तक पहुंच जाती है, जिसके बारे में उन्हें मालूम है कि तेंदुलकर ऐसा शॉट नहीं खेलते थे।

जादुई आंकड़े

ऐसा नहीं है कि सचिन तेंदुलकर ने टी-20 मैच नहीं खेले। वो छह सीजऩ तक मुंबई इंडियंस के लिए खेले थे।

78 मैचों में सचिन ने 2334 रन बनाए थे। इनमें 13 अर्धशतक और एक सेंचुरी थी। ढ्ढक्करु के इन 78 मैचों में सचिन तेंदुलकर का स्ट्राइक रेट 119।31 और औसत 34.83 रनों का था। जब आईपीएल शुरू हुआ था, तो सचिन तेंदुलकर अपने इंटरनेशनल करियर के 19वें बरस में थे।

आईपीएल के पहले सीजऩ के दौरान वो 35 साल के हुए थे। आईपीएल में सचिन तेंदुलकर का सबसे बढिय़ा सीजऩ 2010 का रहा था।

तब मुंबई इंडियंस की टीम पहली बार फ़ाइनल में पहुंची थी। हालांकि, वो फ़ाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स से हार गई थी।

उस वक्त 37 साल के तेंदुलकर ने टी20 मैचों में 180 के जादुई आंकड़े को पार कर लिया था।

ये टी-20 में किसी बल्लेबाज़ के औसत और उसके स्ट्राइक रेट का जोड़ होता है, जिसे टी20 मैचों में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

2010 में सचिन तेंदुलकर आईपीएल के प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट बने थे। उन्होंने उस सीजऩ में 47।53 के औसत और 132।61 के स्ट्राइक रेट से 618 रन स्कोर किए थे। ये आईपीएल में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था।

आज कैसे बल्लेबाज होते?

उन्होंने कहा कि गेंद को बार-बार बाउंड्री लाइन के बाहर भेजने का आत्मविश्वास हासिल करने के लिए, आपको पिच के मिज़ाज के मुताबिक़ लगातार कोशिश करते रहना होगा। हर पिच अलग तरह की होती है। आपको ख़ुद को पिच के हिसाब से खेलने के लिए ढालना पड़ता है। मैं अपने ज़हन और खेल को पिच का मिज़ाज भांपकर बदल लेता।

मैंने सचिन तेंदुलकर के जितने भी इंटरव्यू लिए, हर बार यही अहसास हुआ कि आप ऐसे शख़्स से बात कर रहे हैं, जिसकी नस-नस में क्रिकेट समाया हुआ है।

वैसे तो अंग्रेज़ी के हृद्गह्म्स्र शब्द का हिंदी में मतलब पढ़ाकू होता है। मगर, सचिन तेंदुलकर के मामले में आपको याद रखना होगा कि उनकी सारी पढ़ाई क्रिकेट के खेल और क्रिकेट के मैदान को लेकर थी।

यही वजह है कि वो कहते हैं कि वो आज के दौर की ज़रूरत के मुताबिक़, हर गेंद पर रन बनाने का कोई न कोई तरीक़ा तलाश ही लेते।

जब सचिन को वनडे मैचों में पारी की शुरुआत करने को कहा गया था, तो उन्होंने यही तो किया था।

अभिषेक शर्मा ने ब्रॉडकास्टर से की ये गुज़ारिश, अगली बार से मैं चाहता हूँ।

अपने वनडे मैचों के करियर के पहले दस वर्षों में सचिन तेंदुलकर, अपने दौर के ज़्यादातर खिलाडिय़ों से कहीं ज़्यादा स्ट्राइक रेट (86।78) से रन बना रहे थे। इस दौरान उन्होंने 24 शतक और 44 अर्थशतक लगाए थे।

एक दिन मुंबई के पूर्व ओपनर ज़ुबिन भरूचा और अब राजस्थान रॉयल्स टीम के हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर से किसी और मसले पर बात हो रही थी।

जब सचिन तेंदुलकर के एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर आईपीएल के फॉर्मैट में ढल जाने का सवाल उठा, तो ज़ुबिन ने ठहाका लगाया। उन्होंने कहा कि ये तो सवाल ही बेमानी है।

भरूचा ने घंटों आईपीएल मैचों में बल्ले की चोट से गेंदों को उड़ते देखा है।

वो कहते हैं कि हां, गेंद को कोई भी मार सकता है। एबी डिविलियर्स, केविन पोलार्ड या कोई और। ये सब बहुत बढिय़ा खिलाड़ी हैं। लेकिन, सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाज़ी की ख़ास बात यही है कि वो किसी भी दौर में होते, कामयाब बल्लेबाज़ ही होते। फिर चाहे वो अपने दौर के पहले होते, या उसके बाद।
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