    
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>Daily Chhattisgarh Special-Report</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com</link><description>Daily Chhattisgarh Feed Special-Report</description><item><title>सितंबर 2027 तक आ सकते हैं नई जनगणना के आंकड़े</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322634&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322634&path_article=14]]></link><description> देश की सेल्फी में शामिल होने का वक्त-कार्तिकेया गोयल

छत्तीसगढ़ से खास चर्चा : डिजिटल जनगणना 2026

रायपुर (छत्तीसगढ़)। देश में लंबे अंतराल के बाद होने जा रही जनगणना 2026 इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक और अलग होगी। क्योंकि इस बार जाति जनगणना भी होने जा रही है। कोरोना काल के कारण टली जनगणना अब 16 साल बाद हो रही है और पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से संपन्न किया जाएगा। छत्तीसगढ़ से खास चर्चा में जनगणना एवं नागरिक पंजीयन निदेशक कार्तिकेय गोयल ने इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए नागरिकों से सक्रिय भागीदारी की अपील की।

उन्होंने बताया कि जनगणना दो चरणों में पूरी होगी। पहला चरण मकान सूचीकरण का होगा, जो 1 मई से 30 मई 2026 के बीच चलेगा। इसमें हर घर की पहचान और बुनियादी जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके बाद फरवरी 2027 में दूसरा चरण होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की विस्तृत जानकारी एकत्र की जाएगी। खास बात यह है कि पहली बार नागरिकों को स्वगणना यानी खुद ऑनलाइन फॉर्म भरने का विकल्प दिया गया है। हालांकि यह पूरी तरह ऐच्छिक है। जनगणना कर्मचारी घर-घर जाकर जानकारी जुटाएंगे। डिजिटल प्रणाली इस जनगणना की सबसे बड़ी खासियत है। अब कागज का उपयोग लगभग खत्म हो गया है और प्रगणक मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे। इंटरनेट न होने की स्थिति में भी ऐप डेटा सुरक्षित रखेगा और नेटवर्क मिलने पर स्वत: सर्वर पर अपलोड हो जाएगा। इस बदलाव से न केवल प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि आंकड़ों के विश्लेषण में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। उम्मीद है कि 2027 में जनगणना पूरी होने के छह महीने के भीतर ही प्रमुख आंकड़े सार्वजनिक कर दिए जाएंगे।

जनगणना को लेकर लोगों में फैल रही भ्रांतियों पर भी गोयल ने साफ संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नि:शुल्क है और इसके नाम पर किसी भी प्रकार का शुल्क लेना या देना गलत है। यदि कोई व्यक्ति पैसे की मांग करता है तो उसकी शिकायत तुरंत की जानी चाहिए। साथ ही, साइबर फ्रॉड से बचने के लिए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करने, कोई फाइल डाउनलोड न करने और किसी को भी भुगतान न करने की सलाह दी गई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777027711artikeya_Goel_IAS.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322634&amp;path_article=14</guid><pubDate>24-Apr-2026 4:18 PM</pubDate></item><item><title>नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच-रंजना चौबे</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320738&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320738&path_article=14]]></link><description> 2009 का दिन, जब ड्यूटी निभाते हुए शहीद हुए थे पति

रंजना चौबे से तृप्ति सोनी की खास बातचीत

रायपुर, 3 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। नक्सलियों के खात्मे को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन शहीदों की यादें भी ताजा हो गई हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इन्हीं में से एक आईपीएस अफसर विनोद चौबे भी थे। शहीद विनोद चौबे की पत्नी श्रीमती रंजना चौबे का दर्द छलक उठा। उनका कहना है कि नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच है।

जांबाज अफसर थे विनोद चौबे, जो वर्ष 2009 में नक्सली हमले में शहीद हो गए थे। घटना के 17 साल बाद उनकी पत्नी रंजना चौबे ने छत्तीसगढ़ से बातचीत में कई भावुक और महत्वपूर्ण पहलू साझा किए।

रंजना चौबे बताती हैं कि नक्सलवाद कोई नई समस्या नहीं थी, यह वर्षों से जारी थी, लेकिन पति की शहादत के बाद यह उनके जीवन से गहराई से जुड़ गई। वे कहती हैं कि जब भी नक्सलियों के मारे जाने, पकड़े जाने या आत्मसमर्पण की खबर मिलती है, तो उन्हें लगता है कि यह उनके पति सहित सभी शहीद जवानों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्हें संतोष है कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया।

शहादत वाले दिन को याद करते हुए वे बताती हैं कि सुबह उनकी अपने पति से बातचीत हुई थी। वे एक पारिवारिक कार्यक्रम में आने वाले थे, लेकिन बाद में उन्होंने बताया कि वे किसी जरूरी काम में व्यस्त हैं और नहीं आ पाएंगे। कुछ ही देर बाद टीवी पर खबर चली कि एसपी के ड्राइवर को गोली लगी है। उस समय पूरी जानकारी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के आने से सच्चाई सामने आई।

उन्हें बताया गया कि विनोद चौबे पहले एंबुश में फंसे लोगों को बचाने पहुंचे थे। इसके बाद लौटते समय जब उन्होंने देखा कि उनके जवान खतरे में हैं, तो वे दोबारा उन्हें बचाने के लिए वापस गए और इसी दौरान नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए।

रंजना चौबे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि शादी के बाद जब वे नारायणपुर में रहीं, तब नक्सल गतिविधियां बढ़ रही थीं। पुलिस जवान लगातार जंगलों में गश्त करते थे। कई बार भोजन तक की कमी होती थी और मुर्रा-चना खाकर काम चलाना पड़ता था। बाद में कांकेर में हालात इतने गंभीर थे कि घर के भीतर भी हथियार रखने पड़ते थे।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775219117SC_2758.MOV.00_00_21_07.Still001.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320738&amp;path_article=14</guid><pubDate>03-Apr-2026 5:55 PM</pubDate></item><item><title>पश्चिम एशिया युद्ध का असर : छत्तीसगढ़ से चावल निर्यात महंगा, ‘वार सरचार्ज’ का दबाव</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320638&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320638&path_article=14]]></link><description>छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट-शशांक तिवारी

रायपुर, 2 अप्रैल (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते छत्तीसगढ़ से चावल के निर्यात पर असर पड़ा है। बताया गया है कि शिपिंग यार्ड का किराया महंगा हो गया है और निर्यातकों को वार सरचार्ज तक देना पड़ रहा है।

छत्तीसगढ़ चावल का प्रमुख निर्यातक राज्य है। यहां से सालाना करीब 40 लाख टन चावल का निर्यात होता है, जिसमें ब्रोकन चावल भी शामिल है। मगर पिछले डेढ़ महीने से ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध की वजह से चावल निर्यात पर फर्क पड़ा है।

बताया गया कि युद्ध की चपेट में पूरा पश्चिम एशिया आ गया है। पश्चिम एशिया के देश चावल के प्रमुख आयातक हैं, लेकिन इन देशों को चावल निर्यात तकरीबन बंद है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख चावल निर्यातक अतुल अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में कहा कि पश्चिम एशिया में संकट की वजह से निर्यातकों को अलग तरह की समस्या से जूझना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया के देशों में बासमती चावल का निर्यात ज्यादा होता है, जबकि छत्तीसगढ़ गैर-बासमती निर्यातक राज्य है।

उन्होंने कहा कि युद्ध की वजह से छत्तीसगढ़ पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन अफ्रीकी देशों और रूस आदि, जहां छत्तीसगढ़ का चावल निर्यात होता है, वहां तक भेजना महंगा हो गया है। शिपिंग यार्ड और अन्य तरह का भाड़ा देना पड़ रहा है। कुल मिलाकर यह एक तरह का वार सरचार्ज है, जो पहले कभी नहीं था। अब निर्यात में करीब डेढ़ गुना तक खर्च करना पड़ रहा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775130187ICE_EX.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320638&amp;path_article=14</guid><pubDate>02-Apr-2026 5:09 PM</pubDate></item><item><title>सरेंडर कर चुके लोगों को रोजगार नहीं  मिला तो असंतोष पैदा हो सकता है...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320633&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320633&path_article=14]]></link><description> नक्सलवाद पर पूर्व डीजीने कहा

आरके विज से तृप्ति सोनी की खास बातचीत

रायपुर, 2 अप्रैल (छत्तीसगढ़) । छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर सरकार के ऐलान के बाद भले ही राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हों, लेकिन साढ़े 5 सौ से अधिक नक्सलियों के मारे जाने और ढाई हजार से अधिक के सरेंडर करने के आंकड़े सरकारी दावों को काफी हद तक मजबूती देते नजर आते हैं। इस पूरे मामले पर लंबे समय तक नक्सल मोर्चे पर काम कर चुके रिटायर्ड डीजी आरके विज का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे 20-25 सालों की लगातार मेहनत और रणनीति काम कर रही है। उन्होंने आगाह किया कि सरेंडर कर चुके लोगों को समय पर आर्थिक मदद और रोजगार नहीं मिला, तो असंतोष पैदा हो सकता है।

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को लेकर 31 मार्च की तय समयसीमा खत्म होने के बाद बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ से खास बातचीत में आरके विज ने कहा कि आज जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह लंबे समय की रणनीतिक कोशिशों का परिणाम है।

उन्होंने बताया कि शुरुआत में 31 मार्च की समयसीमा को एक राजनीतिक बयान के रूप में देखा जा रहा था, क्योंकि खुद सुरक्षा तंत्र से जुड़े लोग भी यह नहीं मानते थे कि माओवाद इतनी जल्दी कमजोर हो जाएगा। लेकिन मौजूदा हालात जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।

विज ने कहा कि वर्ष 2004 से 2010 के बीच नक्सलवाद अपने चरम पर था। इस दौरान नक्सलियों ने तेजी से विस्तार किया और बस्तर के अंदरूनी इलाकों से निकलकर महासमुंद समेत अन्य क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बना ली। संगठनात्मक रूप से भी वे मजबूत हुए,छोटे दस्तों से लेकर बड़ी कंपनियां और बटालियन तक गठित की गईं। उस समय गांवों में उनका प्रभाव गहरा था और भर्ती लगातार जारी थी।

हालांकि 2011-12 के बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई। विज ने कहा कि खुद नक्सलियों की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया कि उनका जनाधार घट रहा है और जितने नए लोग जुड़ रहे हैं, उससे ज्यादा संगठन छोड़ रहे हैं। इसके पीछे सरकारों द्वारा सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जाना एक प्रमुख कारण रहा।

उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारों के बावजूद नक्सलवाद के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहा। पुलिस थानों को सुदृढ़ किया गया, इंटेलिजेंस तंत्र को मजबूत किया गया, विशेष बलों का गठन हुआ और सरेंडर व पुनर्वास नीतियों में सुधार किया गया। राज्य गठन के समय जहां पुलिस बल की संख्या 22-23 हजार के आसपास थी, वहीं अब यह बढक़र 80 हजार से अधिक हो गई है। बटालियनों की संख्या में भी कई गुना वृद्धि हुई है और जवानों को जंगल युद्ध की विशेष ट्रेनिंग दी गई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775128463SC_274333.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320633&amp;path_article=14</guid><pubDate>02-Apr-2026 4:44 PM</pubDate></item><item><title> पीएससी : 2020 में भी हुआ था घोटाला</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=304232&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=304232&path_article=14]]></link><description>परीक्षा से पहले चेयरमैन को मिल गए थे पेपर, जांच में खुलासा

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 20 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। पीएससी घोटाले की परतें खुलने लगी है। अब तक की जांच में यह बात सामने आई है कि न सिर्फ 2021 बल्कि 2020 की राज्य सेवा भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी, और पेपर लीक किए गए। इसमें तत्कालीन चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी की दो बहू मीशा कोसले डिप्टी कलेक्टर और दीपा आडिल जिला आबकारी अधिकारी के पद पर चयन हुआ था। मीशा और दीपा की गिरफ्तारी के बाद निलंबन आदेश जारी हो सकता है।

सीबीआई ने पीएससी 2020 से 2022 तक परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने के पुख्ता साक्ष्य जुटाए हैं। इसमें तत्कालीन चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी, सचिव जीवन किशोर ध्रुव, और परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक की भूमिका प्रमाणित हुई है।

सीबीआई ने गुरुवार को पीएससी के तत्कालीन सचिव जीवन किशोर ध्रुव, और उनके पुत्र सुमित के साथ परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक के अलावा सुश्री मीशा कोसले, और दीपा आडिल को गिरफ्तार कर विशेष अदालत में पेश किया, और 22 सितंबर को सीबीआई की रिमांड में भेज दिया गया है।

सीबीआई ने अब तक की जांच को लेकर कई खुलासे किए हैं। यह बताया गया कि वर्ष-2020 की प्रारंभिक, और मुख्य परीक्षा से पहले पेपर पीएससी के तत्कालीन चेयरमैन को प्राप्त हुए थे। इसमें उनके रिश्तेदारों का चयन हुआ था।

इसके बाद पीएससी के वर्ष-2020-21 के माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के 171 पदों को भरने के लिए विज्ञापन जारी किए गए थे। ध्रुव के हस्ताक्षर से विज्ञापन जारी किए गए। जांच में यह पता चला कि पीएससी सचिव के पुत्र सुमित ध्रुव ने वर्ष-2021 की राज्य सेवा परीक्षा के लिए आन लाईन आवेदन किए थे। उन्होंने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण की, और फिर डिप्टी कलेक्टर के लिए चयनित हुए।

जांच में यह पाया गया कि पीएससी चेयरमैन सोनवानी, जीवन किशोर ध्रुव, सचिव, सीजीपीएससी और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के अन्य व्यक्तियों ने सीजीपीएससी में विभिन्न पदों पर रहते हुए, वर्ष 2020 से 2022 के दौरान परीक्षा और साक्षात्कार आयोजित किए और अपने बेटे, बेटी और रिश्तेदारों का चयन करवाया।

बताया गया कि चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी ने अपने बेटे नितेश सोनवानी को डिप्टी कलेक्टर, अपने बड़े भाई के बेटे साहिल सोनवानी को डीएसपी और अपनी बहन की बेटी सुनीता जोशी को श्रम अधिकारी के रूप में चयनित करवाना सुनिश्चित किया। वर्ष 2020 में टामन सिंह सोनवानी ने अपने बेटे नितेश सोनवानी की पत्नी मीशा कोसले को डिप्टी कलेक्टर, और अपने भाई की बहू श्रीमती दीपा आडिल को जिला आबकारी अफसर के रूप में चयनित करवाया।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1758366640SC_NAYA_RAIPUR.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=304232&amp;path_article=14</guid><pubDate>20-Sep-2025 4:40 PM</pubDate></item><item><title>अब गाइड लाइन दर से तय होगा संपत्ति कर, हर साल बढ़ोतरी भी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=303230&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=303230&path_article=14]]></link><description>नगरीय विकास विभाग बना रहा फार्मूला और नियम

लागू न करने वाले निकायों को नहीं मिलेगा वित्त आयोग का ग्रांट

छत्तीसगढ़ एक्सक्लूजिव : पी श्रीनिवास राव की रिपोर्ट-

रायपुर, 8 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। राज्य का नगरीय प्रशासन विभाग एरिया रेंटल वैल्यू जिसे सामान्य भाषा में संपत्ति कर कहा जाता है को जमीन की गाइड लाइन दर से जोड़ कर संशोधित करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए विभाग ने तैयार फार्मूले पर पहले निगमायुक्तों, सीएमओ से बैठकों के बाद दो दिन पहले महापौर, पालिका अध्यक्षों से रायशुमारी कर ली है। सब कुछ सामान्य रहा तो नए वित्त वर्ष से इसे लागू किया जा सकता है।

बताया गया है कि देश भर में यह एआरवी, गाइड लाइन दर से जोड़ दिया गया है। केवल छत्तीसगढ़ पिछड़ गया है। ऐसा न करने पर निकायों को केंद्रीय वित आयोग से मिलने वाले ग्रांट मुश्किल में पड़ेगा। इतना ही नहीं जिन निकायों में लागू नहीं होगा उसका ग्रांट दूसरे निकाय को दिया जा सकता है। बता दें कि आवास पर्यावरण विभाग जिस तरह से अमूमन हर वर्ष गाइड लाइन दर अधिसूचित करता है उसी तरह से एआरवी की दरें भी सालाना संशोधित हुआ करेंगी।

पूरे छत्तीसगढ़ में यह एआरवी हर निकाय वाले शहर में अलग-अलग है। इतना ही नहीं एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों में भी अलग-अलग है। मसलन सदर बाजार में यह 40 रुपये प्रति वर्ग मीटर है, तो स्वर्ण भूमि में एआरवी 10 रुपए है। वहीं कोरबा, भिलाई में 65-65 रूपए और अंबिकापुर में 2 रूपए। इसके चलते संपत्ति कर का भी बड़ा अंतर है। सदर बाजार रायपुर में 1000 वर्ग फीट का संपत्ति कर 40 हजार वार्षिक होता है तो स्वर्ण भूमि में 3200 वर्ग फीट का रहवासी मात्र 2000 रूपए प्रापर्टी टैक्स देता। इसी तरह से सुंदर नगर के बाशिंदे को यह 10 हजार रुपए पड़ता है। नगर पालिका, पंचायत की दर पर नजर डालें तो 0-5000 वर्ग फीट की जमीन, या बने मकान पर 15 रुपये, 7500 वर्ग फीट पर 17.50 रुपये है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1757349072antralaya.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=303230&amp;path_article=14</guid><pubDate>08-Sep-2025 10:01 PM</pubDate></item><item><title>तेलंगाना से बिजली की बकाया राशि वसूलने पॉवर कंपनी ने अब नियामक आयोग में लगाई याचिका</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=298659&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=298659&path_article=14]]></link><description>छत्तीसगढ़ ने हाईकोर्ट से केस वापस लिया

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 20 जुलाई (छत्तीसगढ़ संवाददाता )। तेलंगाना से बिजली की बकाया राशि वसूलने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य पॉवर कंपनी कानूनी कार्रवाई कर रही है। इस कड़ी में कंपनी ने पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, और अब याचिका वापस लेकर राज्य नियामक आयोग में याचिका लगाई है।

छत्तीसगढ़ पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के एमडी भीम सिंह कंवर ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि तेलंगाना से से बिजली की बकाया राशि वसूलने के लिए पहले हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, और फिर कानूनी परामर्श के बाद वापस लेकर राज्य नियामक आयोग में याचिका दायर की गई है।

बताया गया कि तेलंगाना से बिजली आपूर्ति के बाद भुगतान को लेकर पिछले छह साल से विवाद चल रहा था। रमन सिंह सरकार में तेलंगाना के साथ बिजली बेचने को लेकर समझौता हुआ था। जिसमें छत्तीसगढ़ बिजली बोर्ड अलग-अलग समय एक हजार मेगावाट तक बिजली आपूर्ति करती रही है। यह बिजली कोरबा के मड़वा प्लांट से दी जाती रही है। शुरुआत में सब कुछ ठीक चलता रहा। बाद में तेलंगाना बिजली बोर्ड ने बिजली बिल का भुगतान बंद कर दिया।

बताया गया कि बिजली बिल की राशि बढक़र 36 सौ करोड़ तक पहुंच चुकी है। पिछली सरकार ने भी बिजली बिल के भुगतान के लिए दबाव बनाया गया था। तब छत्तीसगढ़ राज्य पॉवर कंपनी, और तेलंगाना के अफसरों के साथ बैठक भी हुई थी। तेलंगाना बिजली की बकाया राशि 21 सौ करोड़ मान रहा है। बकाया भुगतान के लिए किस्तों में राशि देने पर तेलंगाना सरकार ने सहमति दी थी, लेकिन भुगतान नहीं हुआ। इसके बाद छत्तीसगढ़ पॉवर कंपनी ने बिजली आपूर्ति बंद कर दी।

छत्तीसगढ़ पॉवर कंपनी ने बिजली बिल की वसूली के लिए दबाव बनाया है, और हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बाद में हफ्ते भर याचिका को वापस लेकर छत्तीसगढ़ राज्य नियामक आयोग में दायर की है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=298659&amp;path_article=14</guid><pubDate>20-Jul-2025 6:01 PM</pubDate></item><item><title>अंबिकापुर-बरवाडीह रेल लाईन सर्वे, एसईसीएल ने खींचे हाथ</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294834&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294834&path_article=14]]></link><description>पत्र में कहा-फायदेमंद नहीं

50 बरसों में दो दर्जन से अधिक बार सर्वे

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 11 जून (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रस्ताव पर रेल मंत्रालय एक बार फिर अंबिकापुर-बरवाडीह (झारखंड) रेल लाईन बिछाने के लिए सर्वे करा रही है। मगर एसईसीएल पहले ही परियोजना पर असहमति दर्ज करा चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि इस रेल परियोजना के लिए पिछले 50 साल में दो दर्जन से अधिक बार सर्वे हो चुका है, लेकिन प्रस्ताव अधर में लटका रहा।

पिछले दिनों अंबिकापुर रेलवे स्टेशन के उद्घाटन मौके पर सीएम विष्णुदेव साय ने घोषणा की थी कि रेल मंत्रालय ने अंबिकापुर से बरवाडीह रेलवे लाईन के लिए फाइनल लोकेशन सर्वे को मंजूरी दे दी है। उन्होंने भविष्य में सरगुजा से रेल सुविधाओं का तेजी से विस्तार होने की बात भी कही। सीएम के बयान के बाद उक्त रेल लाईन निर्माण को लेकर हलचल शुरू हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि अंबिकापुर से बरवाडीह (झारखंड) रेलवे लाईन के लिए 1950 से 2016 तक दो दर्जन से अधिक बार सर्वे हो चुका है। मगर सर्वे के बाद भी आगे कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।

रेलवे से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अंबिकापुर से बरवाडीह (झारखंड) के लिए करीब दो सौ किलोमीटर रेल लाईन बिछाने का प्रस्ताव लंबित है। मगर आगे कोई कार्रवाई नहीं हो पाई, इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि यहां यात्रियों की आवाजाही कम रहेगी। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि प्रस्तावित रेल लाईन क्षेत्र में एक भी कोल ब्लॉक नहीं है। यही वजह है कि एसईसीएल ने भी परियोजना में रूचि नहीं दिखाई है।

एसईसीएल ने 3 अक्टूबर 2024 को एक आरटीआई के जवाब में साफ किया कि भविष्य में अंबिकापुर-बरवाडीह रेल लाईन में इन्वेस्टमेंट का कोई प्लान नहीं है। इस इलाके में एसईसीएल के कोई कोल ब्लाक नहीं है। छत्तीसगढ़ के पास इस संबंध में अंतर्विभागीय पत्र उपलब्ध हैं।

एसईसीएल ने 2021 में साफ कर दिया था कि यह रेल लाईन एसईसीएल के लिए अलाभकारी है। कुल मिलाकर एसईसीएल के हाथ खींचने की वजह से परियोजना पर काम आगे नहीं बढ़ पाया है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294834&amp;path_article=14</guid><pubDate>11-Jun-2025 4:59 PM</pubDate></item><item><title>हल-बैल-देशी बीज भूला किसान, अब तो बियासी-निंदाई का चलन भी खत्म, मिट्टी पोला करने रासायनिक खाद इस्तेमाल में</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294675&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294675&path_article=14]]></link><description>बांझ बीजों को बोने के बाद किसान हर साल उपचारित बीज खरीद रहा, गांवों में अब न घुरवा, न जैविक खाद

विकसित कृषि संकल्प अभियान में बताई जा रही वैज्ञानिक तकनीक

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट-उत्तरा विदानी

महासमुंद, 9 जून (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। अब छत्तीसगढ़ के खेतों में संकर नस्ल की धान लहलहा रही है। बांझ बीजों को कृषि विभाग ही उपलब्ध करा रही हैं। अब तो किसानों ने धान फसल की बियासी भी बंद कर दी है। ऐसे में धान के दाने हल्के हो रहे हैं और चावल निकालने के बाद अधिकांश दानें टूट जाती हैं। क्वालिटी हल्का होने के कारण बेचते समय काफी तादात में धान चला जाता है।

किसान सुरेश हठीले, रमेश देशमुख, गणेश देशमुख, हरगोविंद चंद्राकर, योगेश्वर चंद्राकर आदि का कहना है कि अब बैल नांगर के साथ बियासी का चलन खत्म हो चुका है और मजदूर भी नहीं मिलते। इसलिए खाद डालकर मिट्टी को नरम कर दिया जाता है। इससे धान के पौधे बड़े हो जाते हैं और अनुमान के मुताबिक पैदावार हो जाती है। लेकिन इस धान की क्वालिटी हल्की होती है।

गौरतलब है कि इस वक्त महासमुंद जिले में विकसित कृषि संकल्प अभियान की संकल्पना को साकार करने एवं किसान अनुसंधान और विज्ञान को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से जिले में विकसित कृषि संकल्प अभियान चलाया जा रहा है। कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के निर्देशानुसार 3 कृषि वैज्ञानिकों की टीम गठित की गई है। यह टीम 29 मई से प्रतिदिन जिले के 3 क्लस्टर गांवों में जाकर खरीफ 2025 में लगाई जाने वाली फसलों की उन्नत काश्त तकनीकों की जानकारी किसानों को दे रही है। जिले के कुुल 240 गांवों तक कृषि रथ पहुंचकर किसानों को नवीनतम तकनीक, फसल चक्र परिवर्तन एवं उन्नत बीज के बारे में जानकारी दे रहे हैं। साथ ही नवोन्वेषी किसानों द्वारा जानकारी साझा किया जा रहा ,जिसमें बियासी के बारे में जानकारी नहीं दी जा रही है। जबकि बियासी ही धान फसल की रीढ़ है।

कृषि की सबसे पुरानी तकनीक धान की बोनी-रोपा-बियासी-निंदाई-कटाई और मिंजाई है। कोई किसान अपने खेतों की बोनी करते हैं और कोई रोपा रखता है। धान के पौधे जब थोड़े से बड़े हो जाते हैं तो उसकी बियासी होती है। इस वक्त खेत में पानी रहता है। किसान हल नांगर के जरिए खेतों की दुबारा जोताई करते हैं। ऐसे में धान पौधों की जड़ें जमीन से टूूट जाती हैं। धान पौधों के टूटे हुए जड़ों को दुबारा मिट्टी में जमते ही वह तेजी से बड़ा होता है और उसके ढेर सारे कंसे निकलते हैं और उन्ही कंसों में जोरदार क्वालिटी के दानें आते हैं। इन दानों को दुबारा बोने पर उनमें पौधे उगते हैं। इस तरह साल-दर-साल किसानी का काम चलते रहता है।

किसान जब अपने खेत की बियासी करता है तो वह इसी दौरान वह खेत की निंदाई मतलब नींदा निकालने का काम भी कर लेता है। बियासी करते समय धान की चलाई मतलब जिस स्थान पर ढेर सारे पौधे हैं, उन्हें निकालकर उन स्थानों में रोपना होता है जहां इक्के-दुक्के पौधे हों। इस तरह खेत में चारों तरफ एक बराबर पौधे आ जाते हैं। लेकिन अब किसान ऐसा न करके बियासी से ठीक पहले डीएपी आदि रसायन डालकर खेतों की मिट्टी को नरम कर देते हैं। मिट्टी बजबजा जाती है और धान के पौधे बड़े हो जाते हैं। बालियां भी निकलती हैं लेकिन हल्की और बेस्वाद।

गांवों में किसान बियासी बंद करने को लेकर कई तरह की दलीलें देते हैं। कोई कहता है कि अब तो बैल और नांगर का चलन खत्म हो गया है, ट्रैक्टर से बियासी नहीं हो सकती। धान के पौधे जमीन के अंदर घुसकर गल जाएंगे। कुछ किसान मानते हैं कि पहले बाल बियासी में उतना ही फसल आता था कि जितना कि रोपाई में, लेकिन अब मजदूर कहां मिलते हैं।

सुुरेश हठीले का कहना है कि पहले के समय में अकरस का पानी गिरते ही जेठ महीने में खेत सुधारने का काम किया जाता था। इससे खेतों के खरपतवार खत्म हो जाते थे और मिट्टी भी नरम हो जाती थी। फिर बतर पाग आते ही खेतों में हल चला धान की बुआई होती थी। बियासी के बाद निंदाई करते थे। अब तो बियासी के साथ निंदाई भी कम ही करते हैं। खरपतवार को मारने के लिए खेतों दवा डाल देते हैं। बोनी से मिंजाई तक पूरे सीजन भर खाद का उपयोग होता है। अब गोबर के जैविक खाद देखने के लिए नहीं मिलता। अब गांवों में घुरवा नहीं हैं। लोग कचरे से खाद नहंीं बनाते।

इस तरह बदलते वक्त के साथ खेती करने का तरीका भी बदला है। पुरानी पद्धति को छोड़ किसान नई पद्धति से खेती करना सीख रहे हैं। पारंपरिक बीज और खाद का उपयोग छोड़ हाइब्रिड बीजों रासायनिक खादों के इस्तेमाल से लागत भी बढ़ रही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1749483265hoto_1_a.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294675&amp;path_article=14</guid><pubDate>09-Jun-2025 9:04 PM</pubDate></item><item><title>कभी इस गांव के कोई लडक़ी देना नहीं चाहता था...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294568&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294568&path_article=14]]></link><description>अवैध शराब के लिए बदनाम बेलडीह पठार अब शराबबंदी की राह पर

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

महासमुंद, 8 जून (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। जिले के ग्राम बेलडीहपठार एक समय में शराब बनाने-बेचने, यहां तक की उसकी आपूर्ति करने के नाम से क्षेत्र में कुख्यात रहा है। पर अब यहां की सूरत बदलने वाली है। अब यहां जिला पंचायत सदस्य कुमारी भास्कर की पहल पर एसडीएम, पुलिस, टीआई बसना, सरपंच,जनप्रतिनिधियों ने एक बैठक लेकर सर्वसम्मति से शराबबंदी का निर्णय लिया है। ग्रामीणों ने श्रीमद भागवत गीता, रामायण ग्रंथ को हाथ में रखकर बारी-बारी से शराबबंदी की शपथ ली है। खास बात यह है कि शराब को लेकर बदनाम इस गांव के लडक़ों को कोई लडक़ी देने तैयार नहीं होते थे।

बहरहाल, ग्रामीणों ने धार्मिक ग्रंथों को हाथ में लेकर ठान लिया कि अब इस गांव में न शराब बनेगी, न शराब बिकेगी। ग्रामीणों ने बैठक में निर्णय लिया है कि अब यह गांव में पूर्णत: शराबबंदी होगा। यहां ना ही कोई शराब बनायेगा और ना ही कोई बेचेगा और ना ही दूसरे गांव में कोई सप्लाई ही करेगा। श्रीमद भागवत एवं रामायण ग्रंथ पर हाथ रखकर एक.एक कर सभी ने शपथ ली। पूरे गांव में शराब बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले महुआ लाहन को एकजुट होकर नष्ट कर दिया।

इसके बाद गांव के लोगों ने जिला पंचायत सदस्य कुमारी भास्कर एवं अनुविभागीय पुलिस अधिकारी ललिता मेहेर,थाना प्रभारी बसना नरेन्द्र राठौर सहित सरपंच जगदीश सिदार एवं जनप्रतिनिधियों को गांव में आमंत्रित किया गया। उनके मार्गदर्शन में शासकीय प्राथमिक शाला में गांव के युवाओं ने ग्रामीणों की बैठक आयोजित कर सभी लोगों ने श्रीमद भागवत गीता एवं रामायण ग्रंथ में हाथ रखकर बारी-बारी से गांव में शराबबंदी करने की शपथ ली।

उन्होंने संकल्प लिया कि आज के बाद गांव में ना तो काई शराब बनायेगा ना ही कोई बेचेगा और न ही अन्य गांव में सप्लाई करेगा। अब से गांंव में पूर्णत: शराबबंदी होगी। अब शराब निर्माण के बजाय किसानी एवं अन्य व्यवसाय कर खुशहाली से यहां के लोग जीवन-यापन करेंगे।

जिला पंचायत सदस्य कुमारी भास्कर ने बेलडीहपठार के लोगों द्वारा शराबबंदी का निर्णय का स्वागत व समर्थन करते हुए कहा कि शराब से स्वास्थ्य खराब होता है, गांव, घर में झगड़ा-फसाद होते हैं। लडक़ों की शराब की लत लगने से बीमार होकर युवा अवस्था में मौत हो जाती है। शराब परिवार के नाश का कारण बनता है। यहां लोग अन्य व्यवसाय कर खुशहाली से जीवन-यापन करेंगे तो परिवार भी खुशहाल होगा।

श्रीमती भास्कर, एडिशनल एसपी अनंत कुमार साहू, एसडीओपी ललिता मेहर एवं थाना प्रभारी बसना नरेंद्र राठौर के मार्गदर्शन में ग्राम बेल्डीह पठार के ग्रामवासियों के साथ बैठक आहुत कर युवाओं द्वारा गांव को नशामुक्त करने की एक मुहिम शुरू की गई।

बैठक में सभी ने रामायण, श्रीमद् भागवत ग्रंथ पर हाथ रखकर बारी-बारी से शराब न बनाने व शराब नहीं बेचने का संकल्प लिया। श्रीमती भास्कर ने अभियान का शुभारंभ कर नशा मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के बारे में विस्तार से जानकारी दी और इस अभियान में अधिक से अधिक व लोगों को जुडऩे की अपील की। लमकेनी सरपंच जगदीश सिदार, सरायपाली सरपंच एवं पंचगण, गांव के वरिष्ठ जन, युवा लडक़े-लड़कियों तथा बसना थाना कर्मचारियों के साथ मिलकर घर-घर जाकर अवैध शराब निर्माण नहीं करने की समझाइश देते हुए महुआ पास लाहन को नष्ट किया गया।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1749383980hoto_6.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294568&amp;path_article=14</guid><pubDate>08-Jun-2025 5:29 PM</pubDate></item><item><title>शिक्षा अफसरों की लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे  अभ्यार्थी, बीएड शिक्षक बर्खास्त हुए थे, और अब डीएड...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294380&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294380&path_article=14]]></link><description>भर्ती की वैधता खत्म होने में 25 दिन बाकी, डीएड अभ्यार्थी धरना-प्रदर्शन के लिए मजबूर

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 6 जून (छत्तीसगढ़ संवाददाता) । यह एक ऐसा मामला है जिसमें पिछली सरकार में शिक्षा अफसरों की लापरवाही का खामियाजा बीएड-डीएड अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ रहा है। पहले नियुक्ति के बाद बीएड शिक्षकों को बर्खास्त होना पड़ा, और अब पात्र डीएड अभ्यार्थियों को नियुक्ति के लिए चक्कर काटना पड़ रहा है। खास यह है कि शिक्षकों की भर्ती की वैधता खत्म होने में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, और इससे हड़बड़ाए मंत्री-विधायकों के यहां रोज दस्तक दे रहे हैं। धरना-प्रदर्शन हो रहा है, और गिरफ्तारियां तक हुई। मगर सरकार की तरफ से नियुक्ति को लेकर कोई आश्वासन नहीं मिला है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बर्खास्त 26 सौ से अधिक बीएड सहायक शिक्षकों को प्रयोगशाला सहायक के पद नियुक्ति देकर आधी समस्या तो सुलझा लिया है लेकिन डीएड अभ्यर्थियों की नियुक्ति का मसला अभी हल नहीं हुआ है। बताया गया कि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया भूपेश सरकार के आखिरी साल में शुरू हुई थी तब करीब 12 हजार से अधिक पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इनमें से 6285 सहायक शिक्षकों के पद थे। सहायक शिक्षक पद के लिए बीएड अथवा डीएड की योग्यता निर्धारित कर दी गई थी।

विभाग से गलती यह हुई है कि सहायक शिक्षकों के लिए डिप्लोमा यानी डीएड के अलावा बीएड डिग्री को नियुक्ति के लिए मान्य कर दिया गया। इस पर डीएड धारी अभ्यर्थियों ने कोर्ट में याचिका लगाई। शिक्षक चयन परीक्षा जून को हो गई, और जुलाई में नतीजे घोषित कर दिए गए। बाद में राजस्थान के एक प्रकरण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश आया जिसमें कहा गया कि सहायक शिक्षक के लिए डीएड अनिवार्य है बीएड नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के परिपालन में एनसीटी ने सभी राज्यों को पत्र लिखा कि डिप्लोमा अनिवार्य है। मगर यहां चयनित बीएडधारियों को नियुक्ति दे दी गई थी। चार काउंसलिंग में 5301 शिक्षकों की नियुक्ति हुई। इनमें 2855 बीएड, और 2446 डीएड अभ्यर्थी थे। बाद में वर्ष 2024 दिसंबर को बीएड बर्खास्त कर दिया गया। छह महीने बाद बर्खास्त शिक्षकों को प्रयोगशाला सहायक बनाकर एडजस्ट कर दिया गया है। मगर डीएड शिक्षकों की भर्ती का मामला अटका पड़ा है।

साय सरकार ने बीएड शिक्षकों की बर्खास्तगी के बाद रिक्त 2615 पदों पर भर्ती के लिए काउसिंलिग की। पांचवें चरण की नियुक्ति प्रक्रिया में 1299 पदों पर नियुक्ति हो चुकी है। वर्तमान में 1316 पद खाली है। पूर्व के 984 पद रिक्त हैं इस तरह 2300 खाली पदों पर चयनित अभ्यार्थियों को काउसिंलिग होनी है मगर छठवें चरण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। कैबिनेट ने शिक्षा भर्ती की वैधता को एक जुलाई 2025 तक बढ़ाया था। इससे पहले भर्ती न होने की दशा में सूची अवैध मानी जाएगी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1749210441-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=294380&amp;path_article=14</guid><pubDate>06-Jun-2025 5:17 PM</pubDate></item><item><title>रायपुर-विशाखापटनम की दूरी सवा सौ किमी घटेगी, जून-26 से खुलेगा नया सिक्सलेन</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=292937&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=292937&path_article=14]]></link><description> बन रहा छत्तीसगढ़ का पहला टनल

छत्तीसगढ़ विशेष रिपोर्ट : शशांक तिवारी

रायपुर, 23 मई (छत्तीसगढ़ संवाददाता)।रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला सडक़ परियोजना के मुआवजा घोटाले की खूब चर्चा हो रही है, लेकिन सडक़ निर्माण कार्य भी रफ्तार से चल रहा है। बताया गया कि छत्तीसगढ़, ओडिशा, और आंध्रप्रदेश को जोडऩे वाली रायपुर-विशाखापटनम सिक्सलेन सडक़ का निर्माण कार्य अगले साल जून तक पूरा हो जाएगा। इस सिक्सलेन सडक़ से रायपुर से विशाखापटनम तक की दूरी 6-7 घंटे में तय की जा सकेगी। खास बात यह है कि कांकेर के पास सिक्सलेन टनल बन रहा है, जो कि 2.7 किमी लंबा है। यह छत्तीसगढ़ की पहला सडक़ टनल है।

रायपुर-विशाखापटनम सिक्सलेन सडक़ का निर्माण कार्य जून से शुरू हुआ था। रायपुर से विशाखापटनम तक दूरी 590 किमी है, लेकिन इस सडक़ के पूरा हो जाने पर रायपुर से विशाखापटनम की दूरी 464 किमी रह जाएगी। इस सिक्सलेन सडक़ का निर्माण अभनपुर के गांव झांकी से शुरू हुई है, और कोंडागांव के अंतिम गांव मंगारपुर से होकर ओडिशा के नवरंगपुर जिले से जुड़ेगी। छत्तीसगढ़ में कुल 124 किमी सडक़ का निर्माण हो रहा है। ओडिशा में 240 किलोमीटर, और फिर आगे आन्ध्रप्रदेश में सडक़ की लंबाई सौ किलोमीटर है। यह सडक़ नवा रायपुर से धमतरी, कांकेर, कोण्डागांव से होते हुए ओडिशा के नवरंगपुर, और कोरापुट जिले से गुजरेगी। आन्ध्रप्रदेश में सब्बावरम से होते हुए विशाखापट्टनम बंदरगाह में खत्म होगी। सडक़ का निर्माण कार्य एनएचएआई (राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण) कर रही है।

एनएचएआई के रिजनल ऑफिसर प्रदीप लाल ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि सडक़ का काफी कुछ काम पूरा हो चुका है। सितंबर तक ज्यादातर सडक़ का काम पूरा हो जाएगा। ओवरब्रिज का निर्माण कार्य चल रहा है। इसी तरह टनल का भी निर्माण कार्य प्रगति पर है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के हिस्से का पूरा कार्य जून के पहले होने की उम्मीद है। करीब 20 हजार करोड़ की इस योजना में छत्तीसगढ़ में सडक़ निर्माण की इस पूरी योजना पर 4 हजार 145 करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं।

बताया गया कि अभनपुर के निकट झांकी के आगे ओवरब्रिज का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। मगर आगे सडक़ का निर्माण पूरा हो चुका है। यह कुरूद होते हुए नगरी, और फिर आगे कांकेर जिले के दुधावा से होकर गुजर रही है। कांकेर से कोंडागांव के विश्रामपुरी इलाके से होते हुए मंगारपुरी तक जुड़ेगी। सडक़ निर्माण कार्य ज्यादातर पूरा हो चुका है। निर्माण से जुड़े एक अफसर के मुताबिक वर्तमान में फॉरेस्ट क्लीयरेंस आदि की वजह से विशेषकर कोंडागांव जिले में सडक़ निर्माण कार्य विलंब से हुआ है, लेकिन अब यहां भी सडक़ का कार्य तेजी से चल रहा है।

रायपुर-विशाखापटनम सडक़ छत्तीसगढ़ के जिन प्रमुख नगर-शहरों से होकर गुजर रही है उनमें नवा रायपुर, अभनपुर, कुरूद, कांकेर, और कोंडागांव हैं। अभनपुर से सिक्सलेन सडक़ की दूरी करीब 3 किमी है। इसी तरह धमतरी से सिक्सलेन के लिए 10 किमी की दूरी तय करनी होगी। कांकेर से दूधावा की दूरी करीब 30 किमी है। कुछ स्थानों पर सडक़ को ओपन किया गया है ताकि मुख्य शहर के लोग वहां तक पहुंच सके। झांकी के अलावा कुरूद, नगरी, दुधावा, कोसमी, विश्रामपुरी, और मंगारपुरी में सडक़ को जोड़ा गया है। कुछ जगहों पर जंगल आदि के कारण सडक़ निर्माण कार्य अधूरा है जिसे पूरा कर लिया जाएगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1748002434-1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=292937&amp;path_article=14</guid><pubDate>23-May-2025 5:43 PM</pubDate></item><item><title>दो सौ रीपा में गड़बड़ी, पर सिर्फ सरपंच दोषी!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=289209&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=289209&path_article=14]]></link><description>जांच कमेटी की रिपोर्ट आई, करोड़ों के घोटाले की पुष्टि, कार्रवाई के लिए सभी कमिश्नर को पत्र

छत्तीसगढ़ कीविशेष रिपोर्ट : शशांक तिवारी
रायपुर, 17 अप्रैल। (छत्तीसगढ़ संवाददाता) भूपेश सरकार की स्पेशल स्कीम ग्रामीण औद्योगिक पार्क (रीपा) की स्थापना में करोड़ों के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। जांच रिपोर्ट में करीब दो सौ से अधिक रीपा में गुणवत्ताहीन मशीन की खरीद से लेकर निर्माण कार्यों में गड़बड़ी की पुष्टि हुई है। दिलचस्प बात यह है कि इन तमाम गड़बडिय़ों के लिए सिर्फ सरपंच को ही दोषी ठहराया गया है। यानी करीब दो सौ सरपंचों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है जो कि अब पदमुक्त हो चुके हैं। यही नहीं, 90 फीसदी से अधिक रीपा तकरीबन बंद हो गए हैं।

भाजपा सदस्य धरमलाल कौशिक ने रीपा में भ्रष्टाचार के मामले को जोर-शोर से विधानसभा में उठाया था। इस पर पंचायत विभाग के मुखिया डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने सीएस की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच समिति की घोषणा की थी। प्रदेश भर में रीपा की पड़ताल के लिए अलग-अलग समिति बनाई गई। संभागवार सीनियर अफसरों को जांच का जिम्मा दिया गया। रायपुर संभाग के लिए प्रमुख सचिव निहारिका बारिक सिंह, दुर्ग में डॉ.कमलप्रीत सिंह, बस्तर में अंकित आनंद, और बिलासपुर में मुकेश बंसल व सरगुजा संभाग के विकास खंडों में रीपा की पड़ताल का जिम्मा सचिव स्तर की अफसर शम्मी आबिदी को दिया गया। जांच रिपोर्ट में भारी गड़बड़ी की पुष्टि हुई है।

रीपा परियोजना के प्रमुख भीम सिंह ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में रिपोर्ट पर सीधे कुछ नहीं कहा। उन्होंने कहा कि वो मीटिंग में हैं, और अभी कुछ नहीं कह सकते। दूसरी तरफ,पंचायत संचालनालय के एक उच्च पदस्थ अफसर ने बताया कि रिपोर्ट पर डिप्टी सीएम की सहमति के बाद सभी पांच संभागायुक्तों को जांच प्रतिवेदन भेजा गया है, और उनके यहां गड़बडिय़ों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। यह भी कहा गया कि रीपा में कहीं भी भुगतान लंबित है, और इसमें किसी तरह की गड़बड़ी न हो, तो भुगतान किया जा सकता है।

बताया गया कि प्रदेश भर में 292 रीपा की स्थापना की गई थी। हर विकासखंड में दो रीपा की स्थापना हुई। रीपा यानी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क (ग्रामीण औद्योगिक पार्क) की स्थापना का मुख्य मकसद ग्रामीण आबादी को रोजगार देना रहा है। फरवरी 2022 में रीपा की स्थापना की गई, और इसके लिए बजट में 441 करोड़ का प्रावधान किया गया। इसमें से 260 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, और 135 करोड़ का भुगतान रुक गया है।

सूत्रों के मुताबिक खर्च की प्रक्रिया तय थी। तीन एकड़ जमीन में रीपा का निर्माण किया जाना था, इसमेें एक करोड़ रुपए राशि निर्माण कार्यों, पचास लाख रुपए मशीनरी की खरीद, और बाकी राशि प्रचार-प्रसार व ट्रेनिंग में खर्च होना था। हरेक रीपा को दो करोड़ रुपए दिए गए। खास बात यह है कि निर्माण कार्यों से लेकर मशीनरी की खरीदी के लिए पंचायत को नोडल एजेंसी बनाया गया था। मगर कलेक्टर और जिला व जनपद सीईओ की मॉनिटरिंग का जिम्मा था। जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि मशीनों की खरीदी में भारी अनियमितता हुई है। दो-तीन एजेंसियों ने ही ज्यादातर जगहों पर मशीनों की सप्लाई की है, और ये मशीन बंद पड़े हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1744889581antralaya.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=289209&amp;path_article=14</guid><pubDate>17-Apr-2025 5:03 PM</pubDate></item><item><title>आंध्र की राजधानी के लिए चंद्रबाबू का सपना,  इस कार्यकाल में अमरावती में होगा अपना?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288947&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288947&path_article=14]]></link><description>-दिनेश आकुला की विशेष रिपोर्ट
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर अमरावती को राजधानी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। वे इस परियोजना के लिए 30,000 से 40,000 एकड़ अतिरिक्त भूमि अधिग्रहित करने की योजना बना रहे हैं। इस विस्तार का उद्देश्य अमरावती को एक वैश्विक पहचान वाला नगर बनाना है, जो अंतरराष्ट्रीय निवेश और प्रतिभा को आकर्षित कर सके।

2014 में राज्य विभाजन के बाद अमरावती को आंध्र प्रदेश की नई राजधानी घोषित किया गया था। बाद में वायएसआर कांग्रेस पार्टी (वायएसआरसीपी) सरकार ने इस परियोजना को रोक दिया और तीन अलग-अलग राजधानियों की योजना पेश की। लेकिन जून 2024 में सत्ता में लौटने के बाद नायडू ने अमरावती परियोजना को पुन: शुरू किया है। उनका उद्देश्य अमरावती को एम्स्टर्डम, सिंगापुर और टोक्यो जैसे अंतरराष्ट्रीय शहरों की तर्ज पर विकसित करना है।

इस परियोजना का बजट अब 65,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। केंद्र सरकार से 15,000 करोड़ रुपये, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक से 800-800 मिलियन डॉलर तथा हुडक़ो से 11,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता हासिल की गई है। इसके अलावा जर्मनी के केएफडब्ल्यू बैंक के साथ 5,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मदद के लिए भी बातचीत चल रही है।
राजनीतिक विश्लेषक राजेश के. का कहना है, नायडू अमरावती को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और कुशल कामगारों के लिए एक प्रमुख केंद्र बनाना चाहते हैं। उनकी योजना मजबूत शहरी संरचना और आर्थिक महत्वाकांक्षा का संगम है।

इस परियोजना की प्रमुख विशेषता नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा होगा, जो विजयवाड़ा हवाई अड्डे पर बढ़ते ट्रैफिक को कम करेगा और अमरावती की कनेक्टिविटी को बढ़ाएगा। इसके अलावा बड़े पैमाने पर बाहरी रिंग रोड, एक्सप्रेसवे और अमरावती को हैदराबाद, विशाखापत्तनम तथा मछलीपट्टनम से जोडऩे वाली मुख्य सडक़ों का निर्माण भी किया जाएगा।
आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एपीसीआरडीए) ने निर्माण कार्य के पुन: शुभारंभ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया है। उनके आगमन से केंद्र सरकार के मजबूत समर्थन का संकेत मिलता है, जो परियोजना की गति बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

नगर प्रशासन एवं शहरी विकास मंत्री पी. नारायण ने बताया कि हाल ही में सरकार ने 59 टेंडरों को मंजूरी दी है, जिनकी लागत 37,702 करोड़ रुपये है। ये टेंडर सडक़ें, पुल, बाढ़ नियंत्रण प्रणाली, जल आपूर्ति नेटवर्क, बड़े पार्क और हरित क्षेत्र जैसी मूलभूत संरचनाओं के निर्माण के लिए हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1744721749M_Shri_Nara_Chandrababu_Naidu.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288947&amp;path_article=14</guid><pubDate>15-Apr-2025 6:25 PM</pubDate></item><item><title>किराएदार थे, मालिक बन गए....</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288748&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288748&path_article=14]]></link><description>मालवीय रोड, हलवाई लाइन की 40 दुकानोंपर वक्फ बोर्ड का दावा, नोटिस जारी, हडक़ंप
छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट
रायपुर, 14 अप्रैल (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। शहर के पॉश इलाके की करोड़ों की कई संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने दावा ठोंका है। मालवीय रोड, और हलवाई लाइन की 40 दुकानों पर वक्फ बोर्ड ने अवैध कब्जा बताया है। बोर्ड का दावा है कि दुकानदार पहले किराएदार थे, जो बाद में मालिक बन गए। वक्फ बोर्ड ने सभी की रजिस्ट्री शून्य कर फिर से दुकानों को वक्फ बोर्ड के नाम चढ़ाने के लिए कलेक्टर, और एसएसपी को पत्र भेजा गया है। साथ ही दुकानदारों को भी नोटिस जारी किया गया है।

बताया गया कि रायपुर शहर के मध्य मालवीय रोड, और हलवाई लाइन की 40 दुकानें वक्फ की संपत्ति रही हैं। इनमें मालवीय रोड स्थित एवन बेकरी, लक्ष्मी इलेक्ट्रानिक्स, और सटी कई दुकानें हैं। इसी तरह हलवाई लाइन की कई दुकानें भी वक्फ की संपत्ति रही हैं। बाद में ये सभी दुकानें बिक गई। अब वक्फ की संपत्तियों को लेकर देशभर में विवाद चल रहा है, और केन्द्र सरकार ने कानून भी बनाया है। इन सबके चलते राज्य वक्फ बोर्ड हरकत में आई है, और सभी 40 दुकानदारों को नोटिस जारी किया गया है।

वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि मालवीय रोड, और हलवाई लाइन की 40 दूकानें वक्फ की संपत्ति है। दुकानदार, जो किराएदार थे वो मालिक बन गए हैं। वक्फ बोर्ड के पास इसका किरायानामा भी है। उन्होंने कहा कि फर्जी रजिस्ट्री हुई है। डॉ. राज ने यह भी बताया कि सरकारी रिकॉर्ड में अभी भी वक्फ के नाम है। वक्फ बोर्ड अध्यक्ष ने कहा कि कलेक्टर, और एसपी को वक्फ बोर्ड ने पत्र लिखा है, और सारे दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने रजिस्ट्री शून्य कर दुकानों को फिर से वक्फ बोर्ड के नाम करने का आग्रह किया है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1744616411-1.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288748&amp;path_article=14</guid><pubDate>14-Apr-2025 1:10 PM</pubDate></item><item><title>7 फुट लंबे आरटीसी कंडक्टर की तकलीफ पर सीएम रेवंत रेड्डी ने दिखाई संवेदना</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288046&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288046&path_article=14]]></link><description>ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर ने दिया कार्रवाई का भरोसा

विशेष रिपोर्ट : दिनेश आकुला

हैदराबाद, (तेलंगाना), 8 अप्रैल। हैदराबाद के मेहदीपटनम डिपो में कार्यरत 7 फुट लंबे कंडक्टर अमीन अहमद अंसारी की तकलीफ भरी ड्यूटी की कहानी अब सिर्फ बस की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उनकी रोज की जद्दोजहद-झुके सिर के साथ घंटों की बस यात्राएं, लगातार होने वाला पीठ और गर्दन का दर्द-अब सरकार तक पहुँच चुकी है।

अमीन अहमद अंसारी, जिनकी लंबाई 214 सेंटीमीटर (करीब 7 फ़ुट) है, हर दिन औसतन पाँच ट्रिप करते हैं। प्रत्येक बस की छत की ऊँचाई 195 सेंटीमीटर यानी करीब 6 फुट 4 इंच है। ऐसे में उन्हें हर सफर गर्दन झुकाकर पूरा करना पड़ता है। नतीजा-तेज पीठ और गर्दन का दर्द, नींद की समस्या और लगातार शारीरिक थकान।

उनकी इस परेशानी को सोशल मीडिया पर सबसे पहले उजागर किया एक्स हैंडल मंचोड़ू मणि ने। उन्होंने अंसारी की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, इस शख्स का नाम अमीन अहमद अंसारी है। ये हैदराबाद के चंद्रायनगुट्टा, शहीनगर में रहते हैं। इनके पिता काचिगुड़ा डिपो में हेड कांस्टेबल थे, जिनका 2021 में बीमारी के चलते निधन हो गया। अंसारी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत इंटरमीडिएट के बाद कंडक्टर की नौकरी मिली।

इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए तेलंगाना के परिवहन मंत्री पोनम प्रभाकर ने कहा, मुख्यमंत्री श्री रेवंत रेड्डी के सुझाव के अनुसार, अंसारी को आरटीसी में उनकी शारीरिक स्थिति के अनुसार कोई उपयुक्त कार्य दिया जाना चाहिए। उन्होंने इस ट्वीट को आरटीसी के एमडी वीसी सज्जनार को टैग करते हुए कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1744110421all_Man.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=288046&amp;path_article=14</guid><pubDate>08-Apr-2025 4:37 PM</pubDate></item><item><title>आरटीआई सूचना न दी, ढाई हजार अफसरों पर जुर्माना, 3सौ से ही वसूली!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287710&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287710&path_article=14]]></link><description>5 साल में साढ़े 4 करोड़ से अधिक की वसूली नहीं

रंजीत सिंह
मनेन्द्रगढ़, 5 अप्रैल (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। राज्य सूचना आयोग ने कानून की अवहेलना कर सूचना नहीं देने, या फिर जान-बूझकर देरी करने पर पिछले पांच साल में करीब 25 सौ अफसरों ने जुर्माना लगाया है। मगर 22 सौ से अधिक अफसरों से जुर्माना राशि वसूली नहीं गई है। यह राशि सवा चार करोड़ से अधिक है। आयोग के अफसरों ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर जुर्माना राशि वसूल करने के लिए कार्रवाई करने का आग्रह भी किया है।

राज्य सूचना आयोग के एक अफसर ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि आयोग के गठन के बाद से अफसरों से अब तक करीब दस करोड़ के जुर्माने की राशि वसूल की जानी है, लेकिन राज्य शासन द्वारा कोई ठोस पहल नहीं होने के कारण जुर्माना राशि वसूल नहीं हो पा रही है।

मनेन्द्रगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव ने सूचना नहीं देने पर आयोग से दंडित अफसरों और जुर्माना राशि को लेकर जानकारी मांगी थी। उन्होंने आयोग से वर्ष 1 जनवरी 2020 से फरवरी 2025 तक की जानकारी चाही थी।

2493 जन सूचना अधिकारियों पर जुर्माना, लेकिन...
राज्य सूचना आयोग ने बताया कि 1 जनवरी 2020 से 21 फरवरी 2025 तक 2493 जन सूचना अधिकारियों पर 4 करोड़ 81 लाख 77 हजार 188 रुपये का अर्थदंड (जुर्माना) लगाया गया। कारण था- सूचना ना देना, जानबूझकर देरी करना या अधिनियम की अवहेलना करना।

राज्य सूचना आयोग ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि इन अधिकारियों से वसूली कर राज्य सरकार के राजकोष में राशि जमा कराई जाए।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1743872319TI_logo.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287710&amp;path_article=14</guid><pubDate>05-Apr-2025 10:29 PM</pubDate></item><item><title>नहीं खुल पा रही नई शराब दुकानें</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287307&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287307&path_article=14]]></link><description>कहीं निर्वाचित प्रतिनिधियों का रोड़ा, तो कहीं ग्रामीण विरोध में
छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट
रायपुर, 2 अप्रैल (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सरकार ने एक अप्रैल से 67 नई देशी-विदेशी शराब दुकानें खोलने का फैसला लिया था, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते अब तक एक भी नई शराब की दूकान खुल नहीं पाई है। हालांकि आबकारी अमला स्थानीय लोगों से चर्चा कर शराब दुकानें खोलने के लिए प्रयासरत है। मगर इसमें सफलता नहीं मिल पाई है। कुछ जगहों पर तो जबरिया शराब दूकान खोलने के खिलाफ स्थानीय लोगों ने अदालत जाने की चेतावनी भी दे दी है।

प्रदेश में 674 देशी-विदेशी शराब दुकानें हैं। इनमें 166 देशी शराब की दुकानें हैं। नए वित्तीय वर्ष से 67 नई शराब दूकानें शुरू करने का फैसला लिया गया था। राज्य के सालाना बजट में इसकी घोषणा भी की गई थी। नई शराब की दूकानें एक अप्रैल से खोलने की योजना थी, लेकिन अब तक इसमें सफलता नहीं मिल पाई है। सबसे ज्यादा रायपुर जिले में ही शराब दुकानें खोलने का प्रस्ताव है।

आबकारी विभाग ने नई शराब दुकानों के लिए जगह चिन्हित की है। जिसमें 20 किमी के आसपास कोई शराब दूकान नहीं होना चाहिए। साथ ही आबादी भी 3 हजार होनी चाहिए। शराब दूकानों के लिए गांव भी चिन्हित कर लिए गए हैं। मगर स्थानीय विरोध को देखते हुए नई शराब दूकान खोलने में सफलता नहीं मिल पा रही है। यद्यपि पुरानी 674 दुकानें यथावत संचालित है।

नई शराब दुकानों के मसले पर एक आबकारी अफसर ने छत्तीसगढ़ चर्चा में बताया कि विभाग नई शराब दुकान खोलने के लिए प्रयासरत है। चूंकि पंचायतों में नए निर्वाचित प्रतिनिधि आ गए हैं, उनसे चर्चा चल रही है। कहीं सरपंच ने शराब दूकान खोलने के लिए सहमति दे दी है, तो कुछ जगहों पर जनपद के प्रतिनिधि असहमति जता रहे हैं। सरपंच, और जनपद सदस्य जहां सहमत हो गए हैं, वहां जिला पंचायत के प्रतिनिधि विरोध में हैं। कुल मिलाकर पंचायत प्रतिनिधियों के एकमत नहीं होने की वजह से शराब दूकान शुरू करने में दिक्कत आ रही है।

बताया गया कि रायपुर जिले के मंदिरहसौद, अभनपुर आदि इलाकों में तो नई शराब दूकान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी हुआ है। दुर्ग और अन्य जगहों पर भी विरोध हो रहा है। कुछ जगहों पर महिला समूह भी विरोध में सामने आ गए हैं। रायपुर जिले में तो एक-दो जगह पर सरपंच ने सहमति दे दी थी, लेकिन बाद में ग्रामीणों के विरोध के बाद शराब दूकानें खोलने का फैसला टल गया है। मंदिरहसौद के ग्राम खौली में तो नई शराब दूकान खोलने के खिलाफ ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में जाने का फैसला लिया है। इसके लिए आरटीआई से दस्तावेज भी जुटाए जा रहे हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1743664475G_LOGO-001.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=287307&amp;path_article=14</guid><pubDate>03-Apr-2025 12:44 PM</pubDate></item><item><title>प्रदेश की जेलों में ठूंस-ठूंसकर भरे हैं कैदी, रायपुर में क्षमता से दोगुने!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=285991&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=285991&path_article=14]]></link><description>साल भर में कैदियों के बीच मारपीट, यौन उत्पीडऩ के 97 प्रकरण

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 23 मार्च (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। प्रदेश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं। सबसे बड़ी जेल रायपुर में तो क्षमता से दोगुने से अधिक कैदी हैं। यही नहीं, जेलों में कैदियों के बीच मारपीट की घटनाएं सामने आ रही हैं। बताया गया कि रायपुर-बिलासपुर समेत प्रदेश की 9 जेलों में सालभर में मारपीट, और यौन उत्पीडऩ व अन्य तरह के कृत्यों के 97 प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

प्रदेश में केन्द्रीय, जिला और उपजेलों को मिलाकर कुल 33 जेल हैं। रायपुर का केन्द्रीय जेल प्रदेश में सबसे बड़ा है। बताया गया कि प्रदेश की जेलों में कैदियों की आवास क्षमता 14733 हैं। जबकि 18525 कैदी बंद हैं। रायपुर में 1586 आवास क्षमता है, और 3291 कैदी रहते हैं। यानी दोगुने से अधिक कैदी रहते हैं।

न सिर्फ रायपुर बल्कि बिलासपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा आदि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी पदस्थ हैं। बताया गया कि पिछले एक साल में प्रदेश के 9 जेल दुर्ग, अंबिकापुर, रायपुर, बिलासपुर, जिला जेल राजनांदगांव, बैकुंठपुर, राजमानुजगंज, महासमुंद, बलौदाबाजार, और सारगंढ़ जेलों में कैदियों के मारपीट, यौन उत्पीडऩ व अन्य तरह की 97 घटनाएं सामने आई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1742728053SCN2728.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=285991&amp;path_article=14</guid><pubDate>23-Mar-2025 4:38 PM</pubDate></item><item><title>सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले तेज हुई सूचना आयुक्तों की खोज, शीर्ष नौकरशाह रेस में</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=282857&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=282857&path_article=14]]></link><description> 4 मार्च को अगली सुनवाई, उसके पहले हलफनामा पेश करने का निर्देश

विशेष रिपोर्ट : राजेश अग्रवाल
रायपुर, 24 फरवरी (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक जनहित याचिका पर शपथ-पत्र देने से पहले छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश में रिक्त मुख्य सूचना आयुक्त व एक सूचना आयुक्त के खाली पदों पर भर्ती की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। फरवरी, 2024 में मुख्य सूचना आयुक्त की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया था, लेकिन सर्च तीन साल पहले सूचना आयुक्त के लिए मिले आवेदनों पर भी विचार करेगी।

सभी आवेदनों को सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुरूप सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है, जिससे मालूम होता है कि इन पदों के लिए प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने भी आवेदन किया है। ऐसे प्रमुख नामों में मुख्य सचिव अमिताभ जैन, सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. संजय अलंग, उमेश कुमार अग्रवाल, डॉ. आरपी मंडल, अमृत खलको सेवानिवृत्त आईपीएस दुर्गेश माधव अवस्थी, अशोक जुनेजा और संजय पिल्ले, भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी राघवेंद्र तिवारी, भानुप्रताप सिंह आदि शामिल हैं।

मालूम हो कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद एम के राऊत का कार्यकाल खत्म होने के बाद नवंबर 2022 से रिक्त है। पद पर भर्ती के लिए 5 सितंबर 2022 को पहली बार विज्ञापन निकाला गया था। इसके अलावा सूचना आयुक्त का एक पद और रिक्त होने वाला था, जिसका विज्ञापन भी निकाला गया। तब दोनों पदों के लिए102 आवेदन मिले थे। इस आवेदन के बाद किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। इसके बाद इन्हीं दोनों पदों के लिए फिर से विज्ञापन 7 फरवरी 2024 को निकाला गया। इसमें मिले आवेदनों पर विचार विमर्श कर 16 मार्च 2024 को नरेंद्र कुमार शुक्ला और आलोक चंद्रवंशी का सूचना आयुक्त पर चयन किया गया। इसके बाद रिक्त मुख्य सूचना आयुक्त व एक सूचना आयुक्त पद के लिए विज्ञापन निकाला गया। अभी जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें अब तक निकाले गए सभी विज्ञापनों से प्राप्त आवेदनों को शामिल करते हुए रिक्त सूचना आयुक्त के चयन का निर्णय लिया गया है। 29 नवंबर 2024 के विज्ञापन के आधार पर पहली बार अमिताभ जैन, आरपी मंडल, अशोक जुनेजा और डीएम अवस्थी ने आवेदन जमा किए हैं।

मालूम हो कि सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र और सभी राज्यों में मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में देरी पर एक रिट पिटीशन अंजली भारद्वाज की ओर से सन् 2018 में दायर की गई थी, जिसे एके सीकरी और एस अब्दुल नजीर की डिवीजन बेंच ने पीआईएल के रूप में सुनवाई की और 15 फरवरी 2019 में केंद्र तथा राज्यों के लिए नियुक्ति के लिए गाइडलाइन जारी की थी। बेंच ने निर्देश दिया था कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों को चुना जाना चाहिए जिनके पास विधि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क या प्रशासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव हो। शीर्ष न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों से की जानी चाहिए जो किसी राजनीतिक दल से संबद्ध न हों और न ही कोई अन्य लाभ का पद धारण कर रहे हों। चयन करते समय केवल वर्तमान या सेवानिवृत्त नौकरशाहों के आवेदनों को प्राथमिकता नहीं दिया जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में नवंबर 2022 को आवेदन मंगाये जाने के बावजूद मुख्य सूचना आयुक्त और एक आयुक्त की भर्ती नहीं की जा सकी, जबकि इसके लिए 102 आवेदन आए थे। इसके बाद 7 फरवरी 2024 को फिर से आवेदन मंगाए गए। इस बार 267 आवेदन आए। इस सूची में 14 आईएएस और आईपीएस एवं अन्य नौकरशाहों के आवेदन भी शामिल थे। इस बार दो सूचना आयुक्तों का चयन कर लिया गया- जिनमें नरेंद्र कुमार शुक्ला और आलोक चंद्रवंशी शामिल हैं। फिर भी मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का एक पद खाली ही रहा।

मालूम हो कि शुक्ला ने अपने आवेदन में सात मापदंड तय किए गए हैं उनमें विधि, विज्ञान, प्रशासनिक एवं प्रबंधन में अनुभव का उल्लेख किया था। दूसरे सूचना आयुक्त चंद्रवंशी ने विधि, विज्ञान, प्रशासकीय, प्रबंधन तथा समाजसेवा का किया था। वेबसाइट में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार सेवानिवृत्त डॉ. संजय अलंग, उमेश अग्रवाल, सेवानिवृत्त आईएफएस आशीष भट्ट, सेवानिवृत्त आईपीएस संजय पिल्ले का आवेदन भी चयन समिति के पास था। इन अधिकारियों ने अपने आवेदन में सिर्फ प्रशासनिक अनुभव का उल्लेख किया था।

सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ताजा कवायद इसलिये दिखाई दे रही है कि 4 मार्च 2025 को इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई है। उसके पहले छत्तीसगढ़ सहित सभी राज्यों के मुख्य सचिव और केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव को जवाब दाखिल करके बताना है कि उन्होंने क्या कदम उठाएं। उन्हें हलफनामा देकर बताना है कि मुख्य सूचना आयुक्त और आयुक्तों के रिक्त पदों पर चयन की प्रक्रिया कब तक पूरी कर ली जाएगी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की डिवीजन बेंच ने 7 जनवरी को निर्देश दिया था जितने आवेदन हैं, उन्हें वेबसाइटपर अपलोड करें, सर्च कमेटी का गठन करें एवं चयन के मापदंड को भी वेबसाइट पर अपलोड करें। इसके लिए एक सप्ताह का समय दिया गया था। छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग ने आवेदन अपलोड कर दिया है और सर्च कमेटी भी गठित कर दी गई है। हालांकि कोर्ट के निर्देश के मुबातिक चयन के मापदंड वेबसाइट पर दिखाई नहीं दे रहे हैं।

मालूम हो कि गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज पिंगुआ की अध्यक्षता में एक सर्च कमेटी गठित कर ली गई है, जिसमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की प्रमुख सचिव निहारिका बारिक, आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा तथा सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव अविनाश चंपावत सदस्य के रूप में लिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार 6 सप्ताह के भीतर रिक्त पदों पर चयन कर लिया जाना है। इसके बाद दो सप्ताह के भीतर नियुक्त पत्र भी जारी किया जाना है। 
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1740551501upreme-court_6.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=282857&amp;path_article=14</guid><pubDate>26-Feb-2025 12:01 PM</pubDate></item><item><title>तिरुमला मंदिर : भगवान बालाजी की संपत्ति और आय का राज</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=280931&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=280931&path_article=14]]></link><description> विशेष रिपोर्ट : दिनेश आकुला

तिरुमला स्थित श्रीवेंकटेश्वर स्वामी का मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी अत्यधिक संपन्न है। भगवान बालाजी की संपत्ति की कुल अनुमानित मूल्य लगभग 3 लाख करोड़ रुपये है, जो भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध कई बड़ी कंपनियों के बाजार पूंजीकरण से भी अधिक है। उदाहरण के लिए, टाटा मोटर्स, नेस्ले और बजाज फिनसर्व जैसी प्रमुख कंपनियों का बाजार पूंजीकरण लगभग 2.6 लाख करोड़ रुपये है, जबकि भगवान बालाजी की संपत्ति की मूल्यांकन 3 लाख करोड़ रुपये के करीब है।

तिरुमला मंदिर की सालाना आय : 1,400 करोड़ रुपये

तिरुमला के श्रीवेंकटेश्वर मंदिर का हंडी (दान पेटी) हर साल करीब 1,400 करोड़ रुपये की राशि एकत्र करता है। यह आंकड़ा सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाडिय़ों की वार्षिक आय से भी अधिक है। सचिन तेंदुलकर की आय लगभग 1,300 करोड़ रुपये प्रति वर्ष है, जबकि विराट कोहली की वार्षिक आय 1,000 करोड़ रुपये है। इस प्रकार, भगवान बालाजी का हंडी इन दोनों से भी अधिक धन एकत्र करता है।

भगवान बालाजी की संपत्ति के आय के स्रोत

तिरुमला मंदिर से भगवान बालाजी को प्राप्त होने वाली आय के स्रोत विविध हैं। इनमें भक्तों द्वारा की जाने वाली चढ़ौतियां, उनके द्वारा अर्पित बाल, फिक्स्ड डिपॉजिट्स पर ब्याज और मंदिर द्वारा चलाए जाने वाले ट्रस्टों से प्राप्त होने वाली चंदा शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टी टी डी) द्वारा चलाए जा रहे अन्य कार्यक्रमों और सेवाओं से भी भारी आय होती है।

सोने, चांदी और भूमि से लेकर अन्य संपत्तियां

टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी धर्म रेड्डी ने हाल ही में भगवान बालाजी की संपत्ति के बारे में जानकारी दी। इसके अनुसार, भगवान बालाजी के नाम पर विभिन्न बैंकों में 11,225 किलोग्राम सोना जमा किया गया है। इसके साथ ही भगवान के आभूषणों का वजन 1,088.62 किलोग्राम सोने और 9,071.85 किलोग्राम चांदी के रूप में है।

इसके अलावा, टीटीडी के पास 6,000 एकड़ वन भूमि और 75 स्थानों पर 7,636 एकड़ संपत्ति है। इनमें से 1,226 एकड़ कृषि भूमि है, जबकि 6,409 एकड़ भूमि गैर-कृषि उपयोग के लिए है।

मंदिर के अन्य आय स्रोत

टीटीडी ने भारत के विभिन्न हिस्सों में 71 अन्य मंदिरों को भी अपनी देखरेख में लिया है। इसके अलावा, टीटीडी के पास 535 अन्य संपत्तियां हैं, जिनमें से 159 संपत्तियां लीज पर दी गई हैं, जिससे मंदिर को हर साल 4 करोड़ रुपये की आय होती है। टीटीडी ने 169 अन्य संपत्तियों को लीज पर देने पर भी विचार किया है।

विवाह मंडपम और धार्मिक सुविधाएं

टीटीडी के पास 307 स्थानों पर विवाह मंडपम (विवाह स्थल) हैं, जिनमें से 29 मंडपम लीज पर दिए गए हैं और 166 अन्य मंडपम को लीज पर दिया गया है। इन मंडपों से टीटीडी को हर साल 4 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। इसके अलावा, टीटीडी का श्रीवाणी ट्रस्ट भी 97 मंडपों का संचालन करता है, जिससे 1,021 करोड़ रुपये का दान प्राप्त होता है।

तिरुमला का श्रीवेंकटेश्वर मंदिर एक अद्वितीय धार्मिक स्थल है, जो भगवान बालाजी की भव्यता और शक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर न केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि एक विशाल आर्थिक साम्राज्य भी है। भगवान बालाजी की चढ़ौतियां, दान और संपत्तियों से प्राप्त होने वाली आय इसे भारत के सबसे अमीर धार्मिक संस्थाओं में से एक बनाती हैं। तिरुमला मंदिर की संपत्ति और आय के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि यह मंदिर सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यधिक प्रभावशाली है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1739269528irumala_090615.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=280931&amp;path_article=14</guid><pubDate>11-Feb-2025 3:55 PM</pubDate></item><item><title> नक्सलगढ़ में चार दशक बाद लहराएगा तिरंगा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278206&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278206&path_article=14]]></link><description>मो. इमरान खान

भोपालपटनम, 25 जनवरी (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। बीजापुर जिले के धुर नक्सलगढ़ इलाके में देश कि आना बान शान कहे जाने वाला तिरंगा चार दशक बाद पहली बार बीजापुर जिले के उन बीहड़ इलाकों में लहराएगा। दर्जनभर कैंपों में गणतंत्र दिवस पर झंडा वंदन किया जाएगा। इन कैंपों के अंतर्गत करीब 40 गांव आते हैं, जहां पिछले चार दशक से कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं हुआ।

ज्ञात हो कि बीजापुर वह इलाका है जहां चार दशक से नक्सलवाद कि दसा झेल रहा अब धीरे-धीरे नक्सलियों के चंगुल से आजाद होने लगा है। लगातार पुलिस के द्वारा चलाए जा रहे बढे ऑपरेशन नें नक्सलवाद कि कमर तोड़ दी है। नक्सली अब बेक फुट में जा चुके है। आज देखेंगे तो बीजापुर के कुछ गांव बदलाव कि नई तस्वीरें सामने आने लगी है बिजली, पानी, सडक़ जैसे मुलभुत सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंचाई जा रही है। ऐसे कई इलाके है जहाँ कैम्प खुले है वहां उस गांव में पहली बार तिरंगा इस साल लहराएगा। नक्सलगढ़ में कई पुलिस कैम्प खुल गए है उन कैम्प कि बदौलत आज विकास अंतिम छोर को छू रहा है।

नक्सली कब्जे से आजाद हुई सडक़
जिले के नक्सलगढ़ तर्रेम पामेड़ सडक 25 साल बाद नक्सली कब्जे से आजाद हुई है यह काम फोर्स कि बदौलत होता हुआ दिखाई पढ़ है। कोरागुट्टा में फोर्स का डेरा लगते ही 25 सालों से बंद पड़े बीजापुर से तर्रेम होकर पामेड़ जाने वाले रास्ते को फिर से बहाल करा दिया गया है। फिलहाल इस मार्ग पर सडक़ निर्माण का काम चल रहा है। इस मार्ग के खुल जाने से अब लोगों को पामेड़ पहुंचने के लिए तेलंगाना होकर जाने की बाध्यता खत्म हो जाएगी और सौ किलोमीटर का फासला भी बच जाएगा।

25 बरस बाद यह सडक़ नक्सलियों के चंगुल से आजाद हुई है। कोरागुट्टा इलाका नक्सलियों के पीएलजीए का कोर क्षेत्र कहलाता है। बीजापुर से तर्रेम, कोंडापल्ली होकर पामेड़ जाने वाले इस रास्ते पर पिछले 25 सालों से आवागमन बाधित था। इलाके के लोगों को पामेड़ पहुंचने के लिए तेलंगाना राज्य के चेरला होकर पामेड़ जाना पड़ता था। क्षेत्र के लोग 210 किलोमीटर की दूरी तय करके बीजापुर से पामेड़ पहुंचते थे। छत्तीसगढ़ के आखिरी छोर पर बसा पामेड़ जहां जवानों से लेकर राशन तक हवाई मार्ग से पहुंचता था।

एक समय ताकतवर बटालियन का था कब्जा
नक्सलियों की सबसे ताकतवर बटालियन का गढ़ 25 बरस बाद उस पामेड़ को जोड़ती दोबारा बन रही है सडक़ मार्ग बहल करने पुलिस के आला अफसरों के साथ जवानों ने कमान संभाली है। मौके पर अफसरों ने बताया जहां कदम कदम पर प्रेशर आईईडी, बूबी ट्रेप और एंबुश का खतरा, चुनौतियों से कैसे पार पा रहे है जवान।

नक्सलवाद खात्मे का मास्टर प्लान
केंद्रीय मंत्री अमित शाह बस्तर में नक्सलवाद खात्मे की घोषणा के बाद सरकार सख्त कार्यवाही कर रही है। बस्तर में अब माओवाद के पांव उखडऩे लगे हैं। केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयास से बीते चार दशक से मुख्य रूप से माओवाद का दंश झेल रहे बीजापुर, सुकमा जिले के बीहड़ इलाके में सुरक्षा बलों की तेजी से बढ़ती दखल ने नक्सल संगठन को पूरी तरह से कमजोर कर दिया है।

जवान लड़ रहे आर पार की लड़ाई
नक्सल मोर्चे पर जवान किन विकट परिस्थितियों का सामना करते हुए ना सिर्फ माओवाद का खात्मा कर रहे हैं बल्कि अब तक सरकार और प्रशासन की पहुंच से दूर बीहड़ इलाकों में अभावग्रस्त आदिवासियों के जीवन कैसे बदलाव ला रहे हैं। जहां राशन के लिए बड़ी जद्दोजहद की जाती थी वह अब राशन पहुंचने लगा है।

डीआईजी कमलोचन कश्यप ने बताया कि बीते चार दशक तक माओवाद ने समूचे इलाके को कैसे अपने प्रभुत्व में रखा। कमलोचन का कहना है कि मौजूदा परिस्थियों में माओवाद संगठन को पूरी तरह से कमजोर कहना भूल होगी। इंटरडिस्टीक्ट इस कॉरीडोर को पूरी तरह से नियंत्रण में लेने वक्त लगेगा, इसमें जवानों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।

एसपी बीजापुर डॉ. जितेंद्र यादव ने बताया कि सरकार की पॉलिसी पर काम हो रहा है। एफओबी के जरिए ना सिर्फ नियंत्रण स्थापित करने में हम कामयाब हो रहे हैं बल्कि मूलभूत सुविधाएं मुहैया करा कर ग्रामीणों का विश्वास भी जीत रहे हैं। यह बदलाव की बयार है। अब इलाकों के बाशिंदें भी नक्सलवाद की गलत नीतियों को समझ रहे हैं।



</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1737793469hopalpatam-068.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278206&amp;path_article=14</guid><pubDate>25-Jan-2025 1:54 PM</pubDate></item><item><title>अर्शदीप सिंह में कुछ खास बात है </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278075&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278075&path_article=14]]></link><description>विशेष रिपोर्ट : दिनेश आकुला

अर्शदीप सिंह जैसा गेंदबाज बहुत कम है, जो पावरप्ले के साथ-साथ डेथ ओवर्स में भी अपनी कड़ी गेंदबाजी से विपक्षी टीमों को पस्त कर देता है। पिछले तीन सालों में एक भारतीय तेज गेंदबाज ने टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी धाक जमाई है, और वो नाम जसप्रीत बुमराह का नहीं, बल्कि अर्शदीप सिंह का है। बुधवार को कोलकाता में इंग्लैंड के शीर्ष क्रम को आउट कर अर्शदीप ने भारत के लिए टी20आईस में सबसे ज्यादा विकेट लेने का रिकॉर्ड तोड़ा। अब वो टी20आई में 100 विकेट लेने वाले सबसे तेज भारतीय तेज गेंदबाज बनने के करीब हैं। अगर शनिवार को चेन्नई में ये आंकड़ा छूते हैं, तो वो राशिद खान और संदीप लामिचाने के बाद यह मील का पत्थर हासिल करने वाले तीसरे सबसे तेज गेंदबाज बन जाएंगे।

अर्शदीप सिंह ने जुलाई 2022 में टी20आई डेब्यू के बाद से खुद को एक बेहतरीन, हरकिस्म की गेंदबाजी में माहिर खिलाड़ी साबित किया है। वो नए गेंद से स्विंग कराते हैं, अगर स्विंग न हो तो गेंद को सटीक तरीके से सीमित रखते हैं, और अंत के ओवर्स में शानदार डिफेंसिव गेंदबाजी करते हैं। यॉर्कर और बाउंसर उनकी गेंदबाजी का अहम हिस्सा हैं। यही वजह है कि अर्शदीप अब टी20आईस में पावरप्ले (42 विकेट) और डेथ ओवर्स (46 विकेट) के सबसे सफल गेंदबाजों में से एक बन गए हैं। इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20आई में भी वह दोनों ओवर्स में अपनी गेंदबाजी का जलवा दिखा गए। फिल साल्ट, जो पावरप्ले में तेज रन बनाने के लिए जाने जाते हैं, को अर्शदीप ने बिना कोई रन दिए आउट किया। उनकी गेंद इतनी अच्छी तरह से स्विंग हुई कि साल्ट गेंद पर जरा भी नियंत्रण नहीं रख सके और उसका एक अग्रसर एज सीधे विकेटकीपर के पास चला गया।

अर्शदीप और बेन डकेट के बीच उस मैच में एक दिलचस्प मुकाबला हुआ। डकेट ने पहले तो अर्शदीप को शॉर्ट फाइन पर शॉट खेलने की कोशिश की, लेकिन अर्शदीप ने गेंद को और बाहर की ओर फेंका और डकेट को पूरी तरह से मिस करवा दिया। फिर अगली गेंद पर अर्शदीप ने अपनी लंबाई थोड़ी कम कर दी, और डकेट से एक और अग्रसर एज निकालकर उसे आउट किया। जोस बटलर और हैरी बु्रक भी अर्शदीप की गेंदबाजी के सामने बेबस नजर आए और वह 3 ओवर में 10 रन देकर 2 विकेट लेकर बाहर लौटे। अंत में उन्होंने 19वें ओवर में शानदार स्लोअर और यॉर्कर गेंदबाजी से मैच को खत्म किया।

अर्शदीप की इन गेंदबाजी की विविधताओं और इनपर उनकी पूरी पकड़ उन्हें एक विशेष गेंदबाज बनाती है। जब जहीर खान और आशीष नेहरा ने संन्यास लिया था, तो भारत के चयनकर्ताओं ने नई लेफ्ट-आर्म सिमर की तलाश में कई नामों पर विचार किया था, जैसे जयदेव उनादकट, बरिंदर सरन, एस अरविंद, खलील अहमद और टी नटराजन, लेकिन अर्शदीप की गेंदबाजी की रेंज किसी के पास नहीं थी।

संजय मांजरेकर ने ईएसपीएनक्रिकइनफो के टाईम:आऊट शो में कहा, अर्शदीप ने आईपीएल में पंजाब किंग्स के लिए कठिन ओवर्स किए थे, और तब से वह काफी ध्यान आकर्षित कर रहे थे।

इंग्लैंड में पहली बार हमनें देखा कि वह नए गेंद से स्विंग भी कर सकते हैं, जो उनके लिए एक अतिरिक्त गुण था। पहले टी20आई में भी उन्होंने पिच से शानदार सीम मूवमेंट दिखाया। उन्होंने अच्छे से समझा कि पिच पर थोड़ी अधिक घुमाव है, इसलिए उन्हें लंबी गेंद नहीं फेंकनी चाहिए और ओपनर्स के लिए मुश्किलें खड़ी की।

वैश्विक स्तर पर भी, बहुत कम ही टॉप-टेल लेफ्ट-आर्म गेंदबाज हैं जो अर्शदीप की तरह नए गेंद से स्विंग और डेथ ओवर्स में कड़ी गेंदबाजी कर सकते हैं। ट्रेंट बाउल्ट पुराने स्कूल के नये गेंदबाज हैं, लेकिन वह डेथ ओवर्स में ज्यादा सफल नहीं रहे। मार्को जानसेन भी नये गेंद से अच्छा काम करते हैं, लेकिन अर्शदीप की तरह वह डेथ ओवर्स में कम रन लीक करने में माहिर नहीं हैं।

अर्शदीप ने भले ही डेथ ओवर्स में रन दिए हों, लेकिन उनका संयम उन्हें हमेशा वापसी करने का मौका देता है। दो साल पहले, न्यूजीलैंड के खिलाफ रांची में अंतिम ओवर में 7 (नो बॉल), 6, 6, 4 देकर उन्होंने भारत को कठिन स्थिति में डाला था, लेकिन दूसरे मैच में उन्होंने डेथ ओवर्स में 7 रन पर 2 विकेट लेकर अपनी वापसी का लोहा मनवाया। दिसंबर 2023 में, बेंगलुरु के छोटे मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने पहले तीन ओवर्स में 37 रन दिए, लेकिन अंतिम ओवर में उन्होंने नौ रन का बचाव करते हुए मैच पलट दिया।

अर्शदीप की वापसी करने की कला ने उन्हें आईपीएल 2025 की नीलामी में सात टीमों का ध्यान आकर्षित किया। अब भारतीय टीम मैनेजमेंट को लगता है कि ये गुण आगामी चैंपियंस ट्रॉफी के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

अर्शदीप सिंह ने टी20आई क्रिकेट में 25 साल की उम्र में अपनी पहचान बना ली है और 100 विकेट की दौड़ में उनका यह सफर उनके नाम को और भी बड़ा कर सकता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/17377153187c3a1b4-6de6-4c4c-9c04-7e5e1c6dcf65.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=278075&amp;path_article=14</guid><pubDate>24-Jan-2025 4:13 PM</pubDate></item><item><title>तिरुपति भगदड़ : यह त्रासदी कैसे रोकी जा सकती थी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=275655&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=275655&path_article=14]]></link><description>दिनेश अकुला

बुधवार को तिरुपति में हुई भगदड़ में छह लोगों की मौत हो गई और 40 से अधिक लोग घायल हो गए। यह दुखद घटना टाली जा सकती थी, और अब विशेषज्ञ और भक्त यह सवाल कर रहे हैं कि इसे कैसे रोका जा सकता था। तिरुमला के भगवान वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में वैकुंठ द्वार दर्शन एक लोकप्रिय आयोजन है, जो हर साल लाखों भक्तों को आकर्षित करता है। लेकिन अनुमानित भीड़ और मंदिर के विशाल संसाधनों के बावजूद, खराब योजना और भीड़ प्रबंधन की कमी ने इस आध्यात्मिक अनुभव को एक आपदा में बदल दिया। मुख्य समस्या टोकन वितरण प्रणाली में थी, जो अपर्याप्त योजना और उचित भीड़ नियंत्रण की कमी के कारण अराजक हो गई।

यह अराजकता वैकुंठ एकादशी की पूर्व संध्या पर हुई, जो तिरुमला मंदिर में एक महत्वपूर्ण उत्सव है। भक्तों का मानना है कि वैकुंठ द्वारम या मंदिर के उत्तरी प्रवेश द्वार से गुजरने से उन्हें दिव्य आशीर्वाद मिलता है और स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। इस विश्वास के कारण 10 दिनों के उत्सव के दौरान तिरुमला में लाखों भक्त आते हैं। सबसे व्यस्त दिनों में 2 से 3 लाख लोग एकत्र होते हैं, जिससे मंदिर प्रशासन के लिए भीड़ प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने वैकुंठ द्वार दर्शन के पहले तीन दिनों में 1.2 लाख टोकन वितरित करने की योजना बनाई थी, लेकिन यह व्यवस्था बड़ी संख्या में भक्तों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में विफल रही।

टोकन वितरण प्रक्रिया को सुधारने के लिए, तिरुपति के विभिन्न स्थानों जैसे विष्णु निवासम और एमजीएम हाई स्कूल में टोकन काउंटर स्थापित किए गए थे। तीन जनवरी को हजारों भक्त अपने टोकन प्राप्त करने के लिए सुबह से ही इन स्थानों पर एकत्र हो गए। शाम होते-होते, स्थिति तब खराब हो गई जब एक महिला को काउंटर से बाहर निकालने के लिए एक गेट खोला गया। भीड़ आगे बढ़ी, जिससे भगदड़ मच गई, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। टीटीडी के अध्यक्ष बी आर नायडू के अनुसार, भगदड़ तब हुई जब भक्त एक साथ आगे बढऩे लगे और कतारें टूट गईं।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने इस त्रासदी पर गहरा दुख व्यक्त किया। एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उन्होंने लिखा, तिरुपति में विष्णु निवासम के पास तिरुमला श्रीवारी वैकुंठ द्वार के दर्शन के लिए टोकन लेने के दौरान हुई भगदड़ में कई भक्तों की मौत की खबर से मैं स्तब्ध हूं। यह दुखद घटना मुझे बहुत परेशान कर रही है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा कि नायडू स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं और उन्होंने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं।

उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा की और अधिकारियों को घायलों को सर्वोत्तम चिकित्सा देखभाल प्रदान करने का निर्देश दिया। गृह मंत्री वंगलपुडी अनीता ने बड़े समारोहों के दौरान महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने सरकार से घायलों को उचित चिकित्सा देखभाल प्रदान करने का आह्वान किया। पूर्व टीटीडी अध्यक्ष भुमा करुणाकर रेड्डी ने प्रशासनिक विफलताओं के कारण इस घटना को जिम्मेदार ठहराया। उपमुख्यमंत्री के पवन कल्याण ने अपनी संवेदना व्यक्त की और तिरुपति जाने की योजना बनाई। आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स और शिक्षा मंत्री एन लोकेश नायडू ने कहा कि भगदड़ में जान गंवाने की घटना ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया है और उन्होंने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग की। पूर्व राज्य मंत्री वेलमपल्ली श्रीनिवास ने राज्य सरकार और टीटीडी पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि बेहतर योजना और समन्वय से इस त्रासदी को टाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि भक्तों की जरूरतों की बजाय वीआईपी सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करने से इस घटना में योगदान दिया गया।

कई भक्तों का मानना है कि यह त्रासदी टाली जा सकती थी अगर टीटीडी ने पोस्ट-कोविड टोकन वितरण प्रणाली को लागू किया होता, जो ऑनलाइन बुकिंग की अनुमति देती है और शारीरिक कतारों को कम करती है। पद्मावती पार्क होल्डिंग एरिया में एक भक्त ने कहा, अगर पोस्ट-कोविड टोकन सिस्टम का पालन किया जाता, तो यह त्रासदी टाली जा सकती थी। उचित भीड़ नियंत्रण के बिना शारीरिक टोकन वितरण की ओर अचानक बदलाव ने इस आपदा को जन्म दिया। टोकन काउंटरों पर भीड़ उमड़ पड़ी, और स्पष्ट संचार की कमी और खराब भीड़ प्रबंधन ने स्थिति को और बिगाड़ दिया।

वैकुंठ एकादशी उत्सव भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है, जिसके दौरान कई तीर्थयात्री वैकुंठ द्वारम से गुजरने के लिए तिरुमला आते हैं। तिरुमला मंदिर दुनिया के सबसे धनी धार्मिक संस्थानों में से एक है, जिसकी वार्षिक आय 1,365 करोड़ से अधिक है। वर्ष 2024 में, मंदिर ने 2.55 करोड़ से अधिक तीर्थयात्रियों का स्वागत किया। अपनी संपत्ति के बावजूद, मंदिर प्रबंधन भक्तों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सका। टीटीडी ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए 3,000 पुलिस कर्मियों और 1,550 कर्मचारियों को तैनात किया। उन्होंने सुबह 6:00 बजे से आधी रात तक पानी और भोजन की निरंतर आपूर्ति की भी व्यवस्था की। हालांकि, ये कदम विशाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

हालिया त्रासदी ने बड़े आयोजनों के प्रबंधन को लेकर मंदिर की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। टीटीडी बोर्ड अध्यक्ष की अध्यक्षता में तिरुपति में एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गई थी ताकि घटना का समाधान किया जा सके। भीड़ को नियंत्रित करने, भक्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और घायलों को चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के लिए उपाय किए जा रहे हैं।
भगदड़ ने महत्वपूर्ण वैकुंठ एकादशी उत्सवों पर एक साया डाल दिया है। जबकि यह उत्सव आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, भक्तों की सुरक्षा सबसे पहले होनी चाहिए। यह त्रासदी धार्मिक आयोजनों में बेहतर भीड़ प्रबंधन की आवश्यकता को उजागर करती है। ऑनलाइन टोकन बुकिंग प्रणाली को फिर से लागू करना काउंटरों पर भीड़ को कम करने में मदद कर सकता है। दर्शन के लिए विशिष्ट समय स्लॉट निर्धारित करना भक्तों के प्रवाह को प्रबंधित करने और भीड़भाड़ को रोकने में सहायक हो सकता है। अधिक सुरक्षा कर्मियों और निगरानी प्रणालियों का उपयोग करके भीड़ की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है और संभावित जोखिमों का समय रहते पता लगाया जा सकता है। आपातकालीन प्रोटोकॉल स्थापित करना और कर्मचारियों को भीड़भाड़ से निपटने के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक है। घोषणाओं, डिजिटल बोर्डों और स्वयंसेवकों के माध्यम से भक्तों को स्पष्ट निर्देश प्रदान करना अपेक्षाओं को प्रबंधित करने और घबराहट को कम करने में मदद कर सकता है।

यह घटना टीटीडी और आंध्र प्रदेश सरकार को भक्तों की सुरक्षा को अनुष्ठानिक कार्यक्रमों से ऊपर प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करनी चाहिए। मंदिर प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य भक्तों की भलाई सुनिश्चित करना होना चाहिए। कोई भी धार्मिक उत्साह मानव जीवन को खतरे में डालने का औचित्य नहीं ठहरा सकता।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1736426911irupati-stampede_2.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=275655&amp;path_article=14</guid><pubDate>09-Jan-2025 6:18 PM</pubDate></item><item><title>लाखों की ईनामी महिला नक्सली का समर्पण</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274246&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274246&path_article=14]]></link><description>साल के पहले दिन गढ़चिरौली पुलिस को मिली बड़ी कामयाबी

सीएम फडनवीस की मौजूदगी में मुख्यधारा में वापसी

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 1 जनवरी (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। साल के पहले दिन महाराष्ट्र के गढ़चिरौली पुलिस को नक्सल मोर्चे पर एक बड़ी कामयाबी मिली। बुधवार को लाखों रुपए की ईनामी महिला नक्सली तारक्का ने आत्मसर्मपण कर दिया।

तारक्का के सरेंडर का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि पुलिस ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस की मौजूदगी में उसे सरेंडर कराया। बताया जाता है कि एक बड़े कैडर की नक्सली तारक्का ने वापसी कर संगठन से मुंह मोड़ लिया। ऐसे में नक्सलियों की सांगठनिक जड़े कमजोर साबित होने लगी है।

मिली जानकारी के अनुसार तारक्का ने बीते दिनों गढ़चिरौली पुलिस के जरिए मुख्यधारा का रास्ता चुना है। स्टेट कमेटी मेंबर तारक्का की वापसी से पुलिस काफी उत्साहित है। उसके सरेंडर से नक्सल अभियान में पुलिस को काफी मदद मिलेगी। पुलिस ने तारक्का से नक्सलियों की भावी रणनीति को लेकर भी अहम जानकारी हासिल की है। तारक्का मूलत: गढ़चिरौली की रहने वाली है।

बताया जाता है कि बतौर नक्सली उसने 40 वर्ष से ज्यादा संगठन को दिया है। वह पोलित ब्यूरो मेंबर सोनू की पत्नी है।
62 वर्षीय तारक्का के नाम महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा और तेंलगाना में कई आपराधिक रिकार्ड है। खबर है कि गढ़चिरौली पुलिस ने तारक्का के नक्सल संगठन में प्रभावशाली कैडर होने के चलते मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस के समक्ष सरेंडर कराया है।

यह भी खबर है कि तारक्का के साथ दो और हार्डकोर नक्सलियों ने वापसी की है। पुलिस का कहना है कि आने वाले दिनों में कई बड़े नक्सली मुख्यधारा में लौट सकते हंै।
बताया जाता है कि तारक्का की वापसी के लिए नक्सल ऑपरेशन आईजी संदीप पाटिल, डीआईजी अंकित गोयल और एसपी नीलोत्पल काफी दिनों से प्रयासरत थे।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1735717135LACK_BOX_NS.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274246&amp;path_article=14</guid><pubDate>01-Jan-2025 1:27 PM</pubDate></item><item><title>अवैध पेड़ कटाई, अतिक्रमण-शिकार रोकने ईनाम, अब तक डेढ़ सौ धरे गए</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274021&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274021&path_article=14]]></link><description> ओडिशा-महाराष्ट्र सीमा के जंगलों तक ड्रोन से निगरानी

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट
रायपुर, 30 दिसंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व इलाके में अवैध कटाई, शिकार, और अतिक्रमण को रोकने के लिए वन विभाग की ईनामी योजना कारगर साबित हो रही है। इस कड़ी में अतिक्रमण, और अवैध कटाई की सूचना देने पर 50 हजार रूपए तक ईनाम दिया जा रहा है। विभाग की ईनामी योजना का प्रतिफल यह रहा कि अब तक डेढ़ सौ से अधिक शिकारियों, और तस्करों को हिरासत में लिया जा चुका है। यही नहीं, वन अमले ने ओडिशा, और महाराष्ट्र जाकर कार्रवाई की है।

ओडिशा के सीमावर्ती उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व इलाके में पिछले वर्षों में अवैध कटाई, जंगली जानवरों के शिकार और वनभूमि पर अतिक्रमण के दर्जनों मामले सामने आए हैं। इस पर कार्रवाई करने में वन अमला नाकाम भी रहा है। वन विभाग ने अतिक्रमण करने वालों, और तस्करों के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीएफओ वरूण जैन ने नई ईनामी योजना लाँच किया।

साल भर के भीतर यह योजना प्रभावी दिख रही है। इस योजना के चलते न सिर्फ शिकार बल्कि लकड़ी की तस्करी पर भी काफी हद तक अंकुश लगा है। योजना के तहत जंगली जानवरों के शिकार करने वालों या फिर उनका मांस बेचने वालों की सूचना देने पर पांच हजार रूपए तक ईनाम घोषित किया गया है। इसी तरह वृक्षों की कटाई, अतिक्रमण करने वालों को रंगे हाथों पकड़वाने पर 10 से 50 हजार रूपए तक ईनाम का ऐलान किया गया है। यही नहीं, ढाबों और आरामिलों में अवैध चिरान सप्लाई की सूचना पर पांच हजार का ईनाम घोषित किया गया है। ईनामी योजना से मुखबिरी तंत्र को सुदृढ़ बनाने में काफी मदद मिली है। ईनाम की राशि फोन-पे, गूगल-पे, या फिर बैंक खाते में सीधे दी रही है। सूचना देने वालों के नाम पूरी तरह गोपनीय रखे जा रहे हैं। इसके लिए डीएफओ/उपनिदेशक के वॉट्सऐप नंबर जारी किए गए हैं। इसकी पूरी जानकारी वनग्रामों में वॉल पेंटिंग कर दी गई है।

डीएफओ वरूण जैन ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि ईनामी योजना का अच्छा असर देखने को मिला है। अवैध गतिविधियों की छोटी-छोटी जानकारी वन अमले तक पहुंच रही है। उन्होंने बताया कि अब तक 35-40 एंटी पोंचिंग ऑपरेशन कर करीब डेढ़ सौ शिकारी-तस्करों को हिरासत में लिया गया, और अदालती कार्रवाई की गई है। जैन ने बताया कि ओडिशा के रायगढ़ा जिले में हाथी दांत तस्कर बरामद किए गए। इसी तरह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके से पेंगुइन सेल्क बरामद किए गए हैं।

वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक सीमावर्ती इलाके के जंगलों की ड्रोन से निगरानी की जा रही है। महाराष्ट्र, ओडिशा के वन अमलों और डीआरआई के साथ मिलकर संयुक्त अभियान छेड़ा गया है। ताकि न केवल टाइगर रिजर्व, बल्कि बाघ, हाथी, तेंदुआ, कॉरीडोर सुरक्षित रहे। इन इलाकों में रहने वाले चरवाहे मुखबिर बन रहे हैं। स्थानीय स्तर पर एक सम्मेलन कर सूचनातंत्र को मजबूत बनाने में उनकी भागीदारी पर चर्चा भी की गई है। बारनवापारा अभ्यारण्य इलाके में भी वन्यप्राणियों की सुरक्षा, और अवैध शिकार को रोकने के लिए रेंज स्तर पर गश्ती दल का गठन किया गया है। कुल मिलाकर ईनामी योजना के चलते शिकारियों, और तस्करों के खिलाफ जो जानकारी मिल रही है, वो पहले नहीं मिल पा रही थी। इससे वनों को सुरक्षित रखने में मदद मिल रही है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/17355603614-3.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=274021&amp;path_article=14</guid><pubDate>30-Dec-2024 5:36 PM</pubDate></item><item><title>रिश्वतखोरी के मामले बढ़े, इस बरस सबसे  ज्यादा 53 अफसर-कर्मी रंगे हाथों धरे गए...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273887&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273887&path_article=14]]></link><description> सर्वाधिक राजस्व कर्मी पकड़ाए

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट
रायपुर, 29 दिसंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। प्रदेश में रिश्वतखोरी के मामले बढ़ रहे हैं। इस साल 53 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए हैं, जो पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा है। रिश्वत लेने वालों में राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी सबसे आगे हैं।

एसीबी ने रिश्वतखोरी की शिकायतों पर कार्रवाई की है, और प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रिश्वत लेते 53 अधिकारी-कर्मचारी पकड़े गए हैं। इनमें राज्य प्रशासनिक सेवा के दो अफसर भी हैं।
पिछले पांच सालों में रिश्वतखोरी के प्रकरणों में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई है। इस दौरान कुल 124 अधिकारी-कर्मचारियों को एसीबी ने रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। इनमें सबसे ज्यादा राजस्व विभाग के हैं। राजस्व विभाग के एसडीएम से लेकर पटवारी तक कुल 36 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ाए हैं। इसके बाद स्कूल शिक्षा विभाग के 14, नगरीय प्रशासन के 6 और 8 कर्मचारी स्वास्थ्य विभाग के हैं। संचानालय में पहली बार डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अफसर रंगे हाथों गिरफ्तार हुए हैं।

जानकारी के मुताबिक वर्ष 2019 में 17 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ाए थे। वर्ष 2020 में यह संख्या बढक़र 22 हो गई। इसके बाद वर्ष 2021 में 14 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते एसीबी के हत्थे चढ़े हैं। वर्ष 2022 में 18 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ाए हैं। खास बात यह है कि वर्ष 2023 में रिश्वतखोरी के एक भी प्रकरण दर्ज नहीं किए गए थे। मगर वर्ष 2024 में 53 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार हुए हैं। इनमें राज्य प्रशासनिक सेवा के दो अफसर शामिल हैं।

पिछले पांच सालों में जिन अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी के प्रकरण दर्ज किए गए हैं, उनमें अनिल शर्मा सीएमओ अभनपुर, सब इंजी. सुरेश गुप्ता अभनपुर नगरीय प्रशासन, दीपक सिंह नामदेव जिला क्षेत्राधिकारी अंत्याव्यवसायी निगम सहकारिता, डॉ.अविनाश खरे स्वास्थ्य, मरिया नूसबेग स्कूल शिक्षा, नरेन्द्र बोरसे, पटवारी, बलौदाबाजार, रामअवतार दुबे राजस्व बिलासपुर, देवेश कुमार बघेल, उपसंचालक नगर निवेश, अब्दुल रऊफ खान, नगरीय प्रशासन, सत्यप्रकाश मधुकर, उपअभियंता नगरीय प्रशासन, आकांक्षा मेमन पटवारी, सुरेश कुर्रे श्रम, अमर दहायत पटवारी, मंजू एक्का सहायक ग्रेड-2 राजस्व, ए.आर. खान सहायक ग्रेड-1 स्वास्थ्य, धीरेन्द्र सिंह परिहार जेल प्रहरी, कोरबा, संतोष पांडेय स्टेनो कलेक्टर कार्यालय बैकुंठपुर, बी.आर.कैवत्र्य सहायक ग्रेड-3, एस.भट्टाचार्य रेलवे, बी.एल.साहू मुख्य लिपिक स्वास्थ्य, सुभाशीष सरकार रेलवे, सुमित्रा सिदार राजस्व, गिरवर कुशवाहा स्वास्थ्य, पटेल राम राजवाड़े स्कूल शिक्षा, श्रीमती लोचन साहू राजस्व, नवीन कुमार देवांगन समन्वय रूर्बन मिशन पंचायत, कपूरचंद साहू स्कूल शिक्षा, राजबहादुर सिंह राजस्व, अमन पालीवाल नगरीय प्रशासन, नितिन सिंह बैस सहायक संचालक ग्रामोद्योग, विनय कुमार सिन्हा सहायक ग्रेड-2, सरगुजा जल संसाधन, कमलेश कुमार मिरी नायब तहसीलदार जशपुर, दीपक कुमार यादव सहायक ग्रेड-3, पशु चिकित्सा, सुनील सिंह राजपूत उपयंत्री पंचायत एवं ग्रामीण विकास, युधिष्ठिर पटेल बरमकेला पटवारी, मनीष प्रभाकर शाखा प्रबंधक ग्रामीण बैंक महासमुंद, अनुज सिन्हा पटवारी सूरजपुर, सुनील कुमार अग्रवाल उपअभियंता बलौदाबाजार, विनय कुमार गुप्ता सीईओ जनपद सदस्य बलरामपुर, प्रमोद गुप्ता सहायक ग्रेड-2 स्कूल शिक्षा, किशोर मेश्राम स्कूल शिक्षा, गजेन्द्र चन्द्रवंशी राजस्व, कुलेश्वर गायकवाड़ मुख्य कार्यपालन अधिकारी बलौदाबाजार, मुकेश कुमार मिताई पटवारी, अमित कुमार गुप्ता पटवारी, डॉ.एन.के. अग्रवाल सहायक संचालक, रथराम बंजारे सहायक ग्रेड-2, सत्यनारायण साहू बलौदाबाजार स्कूल शिक्षा, मुनेश्वर राम सहायक ग्रेड-2 राजस्व, डी.डी.जायसवाल ईई पंचायत एवं ग्रामीण विकास, प्रमोद कुमार श्रीवास्तव पटवारी, शिवधर ओझा स्कूल शिक्षा विकास नारंग यातायात, हनी कश्यप क्लर्क, एन.एस.मरावी राजस्व, आर.बी. चौरसिया एसडीओ, आर.बी.सिंह, डी.के.आचार्य जल संसाधन, नीलकमल सोनी पटवारी जामुल, जुगेश्वर प्रसाद सहायक ग्रेड-2, भूपेन्द्र ध्रुव पटवारी धमतरी, रविशंकर खलको सहायक ग्रेड-2, मुकेश कुमार साव सब इंजीनियर, परमजीत सिंह गुरूदत्ता कृषि, उमाशंकर गुप्ता, सवित त्रिपाठी पशु चिकित्सा, गजेन्द्र गौतम, संजय कुमार, योगेश कोरी वन, करूण डहरिया सीईओ ग्रामीण विकास, राजेश मड़ावे एसडीओ पीएचई, रामगोपाल साहू राजस्व, आशुतोष तिवारी, अमित दुबे कैशियर, टी.आर. मेश्राम कार्यपालन अभियंता जल संसाधन, संतोष देवांगन राजस्व निरीक्षक, मिलन भगत वन, नीलेश्वर कुमार ध्रुव, बालकृष्ण चौहान आवास एवं पर्यावरण, अरविन्द गुप्ता, संकट मोचन राय, रमेश कुमार देशलहरे, राजेश्वर दास मानिकपुरी राजस्व, डी.सी.सोनकर नगरीय प्रशासन, देवेन्द्र स्वर्णकार उपअभियंता, भागीरथी खांडे, कविनाथ सिंह उइके, अबीरराम, धमरपाल दास सरगुजा, माधव सिंह एएसआई, विवेक कुमार परगनिया राजस्व खैरागढ़, विजय कुमार पटवारी पामगढ़, वेदवती दरियो टीआई महिला थाना रायपुर, खीरसागर बघेल नायब तहसील धमतरी, संकेत कुमेटी सहायक ग्रेड-2 नारायणपुर, सूरजकुमार नाग सहायक अधीक्षक, डॉ. वेणुगोपाल राव स्वास्थ्य, धर्मेन्द्र साहू, देवसिंह बघेल, सौरभ ताम्रकार, प्रभारी एसडीओ छुईखदान, हरीशंकर राठिया राजस्व, बृजेश कुमार मिश्रा पटवारी, गौतम सिंह आयाम, दिनेश कुमार उपसंचालक, हिमेन्द्र ठाकुर, लितिपुष्प लता बेक, नरेन्द्र राउतकर, वेदप्रकाश पांडेय, ओमप्रकाश नवरत्न, वीरेन्द्र पाण्डेय सरगुजा पटवारी, सत्येन्द्र सिन्हा पंचायत, रामायण प्रसाद पाण्डेय नगरीय प्रशासन, पुरूषोत्तम गौतम राजस्व, अरूण दुबे स्कूल शिक्षा, महेन्द्र ध्रुव पटवारी, टेकराम माहेश्वरी, एसडीएम, गौवकरण सिंह बघेल नगर सैनिक, देवकुमार सिंह, अश्वनी राठौर, धीरेन्द्र लाटा राजस्व, रामकृष्ण सिन्हा, संजय सिंह, श्रीनिवास एसईसीएल शामिल हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1735469214CB_RAIPUR.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273887&amp;path_article=14</guid><pubDate>29-Dec-2024 4:17 PM</pubDate></item><item><title>कैंसर रोधी दवा के रूप में संजीवनी चावल का ट्रायल शुरू</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273526&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273526&path_article=14]]></link><description>टाटा मेमोरियल अस्पताल के डॉक्टरों की सलाह पर डॉक्टर दंपति कौंदकेरा पहुंचा

महासमुंद के किसान ने खेतों में बोया था

-उत्तरा विदानी

महासमुंद, 27 दिसंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। कैंसर रोधी दवा के रूप में संजीवनी चावल का उपयोग अब शुरू हो चुका है। एक हफ्ते पहले रायुपर से महासमुंद पहुंचे एक डॉक्टर दंपति से इसकी शुरुआत हुई है। संजीवनी चावल की प्रजाति की खोज इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय रायपुर में हुई है और कौंदकेरा के किसान योगेश्वर चंद्राकर ने इसे अपने खेत के थोड़े से हिस्से में उगाने की शुरुआत की है। हाल ही में संजीवनी कैंसर अस्पताल रायपुर के डॉक्टरों की सुझाव पर डॉक्टर दंपति ने इसे दवा के रूप में शुरू किया है।

नाम न छापने की शर्त पर डॉक्टर दंपति ने बताया कि देशी-विदेशी की दवाईयां खाते-खाते लाखों खर्च हो गए, लेकिन मर्ज पूरी तरह ठीक नहीं हो रहा था। एलोपैथी इलाज से आराम तो मिलता था लेकिन कुछ दिनों के बाद समस्या फिर से उठ खड़ी होती थी। अब उन्होंने संजीवनी चावल की शुरुआत की है। यदि यह उनकी बीमारी ठीक करता है तो विश्व में यह पहली खोज होगी, जो कैंसर को जड़ से खत्म करेगा।

मालूम हो कि छत्तीसगढ़ ने पहले ही संजीवनी चावल की खेती के बारे में खबर प्रकाशित की थी। योगेश्वर चंद्राकर ने कौंदकेरा स्थित अपने खेत में इसे बोया था। इस खेती को देखने विदेश से कुछ वैज्ञानिक कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कृषि वैज्ञानिकों के साथ कौंदकेरा पहुंचे थे। एक महीने पहले ही संजीवनी धान पककर तैयार हुआ तो योगेश्वर चंद्राकर ने इसके बीजों को सहेजकर अपने घर में रख लिया।

अभी एक हफ्ते पहले ही यहां रायपुर निवासी एक डॉक्टर दंपति पहुंचे और चावल खरीदा। डॉक्टर दंपत्ति ने पहचान गुप्त रखने की बात कहते बताया-पत्नी को 4 साल पहले ओवेरियन कैंसर का पता चला। दो साल तक संजीवनी अस्पताल रायपुर से उच्च स्तरीय इलाज चला। एलोपैथी दवाईयां दी गई। आराम भी मिला, लेकिन कुछ दिनों के बाद फिर से लिंफनोड में कैंसर का लक्षण दिखने लगा। इसके बाद एम्स में मौखिक सलाह ली।

न्यूयार्क के डाक्टरों से भी लगातार सलाह लेते रहे। इससे पहले छत्तीसगढ़ केरिजनल और सेंटर डीके अस्पताल में इलाज जारी रहा। कीमो चलाकर देखा। एक साल तक ऐसा चला। कोई रिजल्ट नहीं आया। संजीवनी अस्पताल रायपुर से रंगीन सिटी स्केन में पता चला कि मर्ज घटने के बजाय बढ़ रहा है। तब जाकर संजीवनी अस्पताल के डॉक्टरों ने सलाह दी कि संजीवनी चावल का उपयोग दवा के रूप में लेने से कैंसर को जड़ से खत्म किया जा सकता है। इसके बीज राज्य के कुछ किसानों को उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से दिया गया है। वहां से चावल उपलब्ध हो सकता है।

इसके बाद डॉक्टर दंपति ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय जाकर इसकी पूरी जानकारी ली। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ अखबार में कौंदकेरा में इसकी खेती के बारे में पढ़ा था, इसलिए गांव को ढूंढते वहां गया और किसान योगेश्वर चंद्राकर से मुलाकात की। उनसे पैकेट बंद 100-100 ग्राम चावल के तीन पैकेट लिए और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डाक्टरों से डोज के बारे में जानकारी ली।

 उन्होंने बताया कि टाटा मेमोरियल अस्पताल के डॉक्टरों ने भाभा रिसर्च सेंटर की सलाह पर बताया है कि मरीज को लगातार दस दिनों तक 10-10 ग्राम चावल लेना है। चावल को पकाना नहीं हैं बल्कि इसे उबलते हुए पानी में भिगाना मात्र है। जब यह पूरी तरह भीग जाए तो इसे दो-दो चम्मच रोज कच्चा ही चबाकर खाना है। दस दिन तक लगातार इसे खाने के बाद अगले बीस दिन तक कोई दवा नहीं लेना है और बीस दिन बाद फिर से दस दिन ऐसा करना है। यह प्रक्रिया तीन महीने तक जारी रखना है। इस बीच कोई दवाई नहीं लेना है।

उन्होंने बताया कि यह केवल एक्सपेरीमेंट है। यदि इसका रिजल्ट वैज्ञानिकों के उम्मीद अनुसार आता है तो यह विश्व का पहला खोज होगा, जो कैंसर रोगियों के लिए वरदान साबित होगा।

इस मामले में इंदिरा गांधी एग्रीकल्चर कॉलेज रायपुर का कहना है कि संजीवनी चावल अभी ट्रायल में है। हमने इसके पेटेंट का सोचा है। टाटा मेमोरियल अस्पताल मुंबई में भी इसका पैकेट जा रहा है।

 कैैंदकेरा के किसान योगेश्वर चंद्राकर ने बताया कि मुझे खेती किसानी के भिन्न-भिन्न तरीके का बदलाव पसंद है। संजीवनी धान के बारे में भाभा रिसर्च सेंटर का पढ़ा तो इंदिरा गांधी कृषि केन्द्र रायपुर जाकर इसकी पूरी जानकारी ली। वहां के वैज्ञानिकों से सलाह लेकर बीज अपने साथ लाया और इस साल खेत में बो दिया। अभी नया बीज तैयार है। थोड़े से रकबे ही बोया था। इसका चावल मशीन से नहीं निकाला जाता, बल्कि मूसल आदि से कूटकर निकाला जाता है ताकि चावल का बाहरी आवरण बिल्कुल भी नष्ट न हो। इसके बाद इसे 100-100 ग्राम के पैकेट में बंद करके रख लिया और पहला किस्त अभी-अभी जारी किया हूं। यह अभी तो पूरी तरह नि:शुल्क है। यदि रिजल्ट अच्छा आता है आगे एक एकड़ में इसकी बोनी करने की इच्छा है। वास्तव में यदि सक्सेज होता है तो विश्व का पहला खोज होगा जो कैंसर रोधी है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1735287332hoto_1_b.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273526&amp;path_article=14</guid><pubDate>27-Dec-2024 1:45 PM</pubDate></item><item><title>दो हजार नक्सली, और 50 हजार सुरक्षाबलों के बीच लड़ाई निर्णायक मोड़ पर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273281&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273281&path_article=14]]></link><description> अगले छह माह बस्तर के अंदरुनी इलाकों में संघर्ष

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 25 दिसंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। बस्तर के अंदरुनी इलाकों में सुरक्षाबलों के करीब 50 हजार जवानों, और दो हजार नक्सलियों के बीच लड़ाई निर्णायक मोड़ पर है। लड़ाई जीतने के लिए स्थानीय लोगों का समर्थन जुटाने की भरपूर कोशिश चल रही है। इस कड़ी में प्रभावित इलाकों में युद्धस्तर पर विकास हो रहा है, और सडक़, बिजली, पेयजल, और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है। पुलिस अफसरों का मानना है अगले छह महीने काफी महत्वपूर्ण रहेंगे, और नक्सलियों की प्रतिक्रिया का जवाब देने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं।

केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलियों के सफाए का ऐलान कर चुके हैं। शाह इस सिलसिले में दो बड़ी बैठक ले चुके हैं। नक्सलवाद का केन्द्र बिन्दु छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका है, और सबसे ज्यादा नक्सली यहीं है। इसलिए यहां विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है। पिछले दो साल से नक्सलियों के खिलाफ व्यापक अभियान चला है, और इसमें 219 नक्सली मारे गए। करीब साढ़े 8 सौ गिरफ्तार हुए, और 802 ने आत्मसमर्पण किया है।

बस्तर के बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, व कांकेर, और कोंडागांव में नक्सली सक्रिय हैं। सबसे ज्यादा नक्सली बीजापुर, सुकमा, और दंतेवाड़ा में हैं। घने जंगल-पहाड़, और दुर्गम होने की वजह से अंदरुनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ाई आसान नहीं है। इन सबको देखते हुए नक्सलियों पर हमले के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर लोगों का समर्थन जुटाने के लिए अभियान चल रहा है। दुर्गम इलाके में स्थानीय लोगों का नक्सलियों के प्रति सकारात्मक रूख रहा है। इसलिए लड़ाई कठिन होती रही है। मगर अब स्थानीय स्तर पर लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए पुलिस ने सरकार के सहयोग से अभियान को सफलता मिली है। बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में आए हैं।

एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) विवेकानंद ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों के रहने वाले परिवार के हर सदस्य को किसी न किसी योजना का लाभ मिले, यह सरकार की कोशिश है। इसके लिए नियद नेल्ला नार योजना काफी अहम है।

उन्होंने कहा कि बीजापुर, और सुकमा के दुर्गम इलाकों के सडक़ बनाने के लिए बीआरओ भी जुट गई है। इससे पहुंचविहीन क्षेत्रों में आवागमन सुलभ हो पाएगा, और शासन की योजनाओं का लाभ वहां रहने वाले लोगों को मिल पाएगा।

नक्सल ऑपरेशन से जुड़े एक अफसर ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में सुरक्षाबलों के हौसले बुलंद हैं, लेकिन नक्सली जवाबी कार्रवाई करने के फिराक में भी है। इन सबको ध्यान में रखते हुए योजनाएं आगे बढ़ाई जा रही है। बस्तर में सीआरपीएफ के अलावा, बीएसएफ के साथ-साथ जिला पुलिस बल भी तैनात है। कुल मिलाकर 50 हजार से अधिक सुरक्षाबल मौजूद हैं। इन सबके बीच तालमेल काफी बेहतर हुआ है। यहां नक्सल ऑपरेशन की केन्द्रीय गृह मंत्रालय सीधे मॉनिटरिंग कर रही है।

सूत्र बताते हैं कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, और सुकमा के अंदरुनी इलाकों में करीब दो हजार नक्सली मौजूद हैं, इनमें से एक हजार पूरी तरह प्रशिक्षित हैं, बाकी एक हजार ज्यादा प्रशिक्षित नहीं हैं।

बताया गया कि बीजापुर और सुकमा में ही करीब दो साल के भीतर 50 हेलीपैड बनाए गए हैं। इनमें से कुछ हेलीपैड में नाईट लैंडिंग की भी सुविधा है। यही नहीं, घायल जवानों को उचित स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए एयर एंबुलेंस भी तैयार रखे गए हैं।

जानकारों का मानना है कि सब कुछ ठीक रहा तो जून तक बीजापुर, सुकमा, और दंतेवाड़ा के अंदरुनी इलाकों के नक्सलियों का सफाया हो सकता है। पुलिस अफसरों का कहना है कि बाकी राज्यों में सौ-दो सौ से ज्यादा नक्सली नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में संख्या हजार से ऊपर होने के कारण ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। राजनांदगांव के मानपुर-मोहला में तो नक्सल गतिविधियों पर तकरीबन काफी हद तक अंकुश लग गया है। यहां स्थानीय बल के अलावा आईटीबीपी के जवान तैनात हैं। बीजापुर में जून के बारिश शुरू हो जाती है। इससे पहले तक ऑपरेशन खत्म करने की तैयारी चल रही है। बहरहाल, बस्तर में आने वाले दिनों में नक्सलियों के खिलाफ भीषण लड़ाई होने के संकेत हैं।

शहरी नेटवर्क पर भी नजर

जांच एजेंसियां नक्सलियों के खुफिया नेटवर्क पर नजर रखी हुई है। पुलिस ने एक बड़े नक्सली प्रभाकर को गिरफ्तार किया था।

प्रभाकर पिछले दिनों दुर्ग आया था, और वहां अपना इलाज करा रहा था। अब पुलिस प्रभाकर जैसों से संपर्क रखने वालों की पतासाजी में जुट गई है। प्रभाकर से लगातार पूछताछ चल रही है। चर्चा है कि आने वाले दिनों में नक्सलियों के शहरी नेटवर्क का भी खुलासा हो सकता है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/173513096000.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273281&amp;path_article=14</guid><pubDate>25-Dec-2024 6:19 PM</pubDate></item><item><title>कौन बनेगा मुख्य सूचना आयुक्त?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273218&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273218&path_article=14]]></link><description> पिछली बार कई बड़े नाम हुए थे बाहर

विशेष रिपोर्ट : राजेश अग्रवाल

रायपुर, 24 दिसंबर (छत्तीसगढ़संवाददाता)। सर्वोच्च न्यायालय के 6 साल पुराने एक आदेश ने सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को न केवल बेहद पेचीदा और सरकारों को जवाबदेह बना दिया है बल्कि इसमें राजनीतिक नियुक्तियों और सिफारिशों की संभावना भी खत्म सी हो गई है। हालत यह रही है कि छत्तीसगढ़ में इस साल सूचना आयुक्त के दो पदों पर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों को भी इसी वजह से मौका नहीं मिल पाया।

मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर भी सरकार को तीसरी बार आवेदन मंगाना पड़ा है, जिसके लिए आवेदन करने की प्रक्रिया हाल ही में पूरी हुई है। छत्तीसगढ़ के मुख्य सूचना आयुक्त के पद से रिटायर्ड आईएएस एमके राउत नवंबर 2022 से रिटायर हो चुके हैं। उनकी जगह दो साल से खाली है। अब तीसरी बार फिर विज्ञापन निकालकर इस पद के लिए सरकार ने आवेदन मंगाए हैं। 29 नवंबर को जारी विज्ञापन में 16 दिसंबर को आवेदन की अंतिम तिथि रखी गई थी। हालांकि आवेदन करने वालों की सूची सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट पर अब तक डाली नहीं गई है। आवेदकों की सूची चयन प्रक्रिया शुरू होने के पहले कभी भी अपलोड की जा सकती है।

इस साल 2024 के मार्च माह में दो सूचना आयुक्तों का कार्यकाल खत्म हो गया। नई सरकार ने थोड़ी तत्परता दिखाई और जनवरी में ही इन पदों के लिए आवेदन मंगा लिए। सामान्य प्रशासन विभाग के सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ में दर्ज जानकारी के अनुसार सूचना आयुक्त पद के लिए 200 से अधिक लोगों ने आवेदन किया था, जिनमें से 58 ऐसे प्रशासनिक अधिकारी जो या तो सेवानिवृत्त हो गए थे, या बहुत जल्द होने वाले थे। इनमें आईएएस डॉ. संजय अलंग, उमेश कुमार अग्रवाल, आईपीएस संजय पिल्ले, आईएफएस आशीष कुमार भट्ट जैसे नाम भी शामिल हैं। चयन समिति ने इनके मुकाबले आलोक चंद्रवंशी और नरेंद्र कुमार शुक्ला का नाम फाइनल किया और उनको नियुक्ति दी गई। इनमें शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं, पर उनकी नियुक्ति की वजह यह थी कि उनका बायोडाटा सुप्रीम कोर्ट के मापदंडों के सबसे करीब था।

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका संख्या 436/2018, (अंजली भारद्वाज विरुद्ध केंद्र सरकार) के अपने निर्णय में सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देने का निर्देश दिया। था जस्टिस ए के सीकरी और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच ने निर्देश दिया कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों को चुना जाना चाहिए जिनके पास विधि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क या प्रशासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव हो। शीर्ष न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों से की जानी चाहिए जो किसी राजनीतिक दल से संबद्ध न हों और न ही कोई अन्य लाभ का पद धारण कर रहे हों। आदेश में यह भी कहा गया कि चयन करते समय केवल सेवानिवृत्त नौकरशाहों के आवेदनों को प्राथमिकता नहीं दें।

केंद्रीय सूचना आयोग में नियुक्तियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसमें प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता और एक मंत्री शामिल हों। इसी के अनुरूप छत्तीसगढ़ में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी समिति में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत और एक मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल शामिल थे।

हालांकि चयन के लिए रखी गई बैठक में डॉ. महंत किसी कारण से शामिल नहीं हो पाए थे। चंद्रवंशी और शुक्ला की नियुक्ति का निर्णय शेष दोनों सदस्यों ने लिया था। अब समिति में फेरबदल नहीं किया गया तो ये ही सदस्य निर्णय लेंगे। मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष तो रहेंगे ही, मंत्री को जरूर बदला जा सकता है।

मालूम हो कि, याचिका में उल्लेख था कि केद्रीय सूचना आयोग और राज्य के आयोगों में कई पद वर्षों से रिक्त चल रहे हैं और सरकारें इनमें नियुक्ति के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही हैं। शीर्ष न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि सूचना आयोगों में रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए ताकि आरटीआई अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन हो सके।

जिनके पास विधि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क या प्रशासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव हो ऐसे आवेदकों की तलाश ही सूचना आयुक्त के योग्य उम्मीदवारों की तलाश में देरी की एक वजह बन रही है। सूचना आयुक्त के विज्ञापन की तरह ही सामान्य प्रशासन विभाग ने मुख्य सूचना आयुक्त के पदों का विज्ञापन जारी करते हुए इसका स्पष्ट उल्लेख किया है कि आवेदक का इन सभी सातों क्षेत्रों में कोई न कोई योगदान होना चाहिए।

बीते मार्च में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के समय आवेदनों को शार्ट लिस्ट करते समय इन सभी बिंदुओं पर चेक लिस्ट बनाई गई थी। उदाहरण के लिए डॉ. अलंग को प्रशासन का अनुभव तो था लेकिन बाकी क्षेत्र- विधि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता-जनसंपर्क में अपनी सेवाओं का, यदि हो तो- उन्होंने आवेदन में इसका कोई जिक्र नहीं किया था। यही स्थिति दूसरे भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों की थी।

सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए नरेंद्र शुक्ला आईएएस होने के कारण प्रशासन में दक्षता रखते हैं। इसके अलावा वे विधि स्नातक हैं। उन्होंने अपने आवेदन के साथ पत्रकारिता तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में किए गए कार्यों का भी दस्तावेज दिया। इस तरह से सात बिंदुओं में से चार उनके अनुकूल रहे। इसी तरह दूसरे सूचना आयुक्त आलोक चंद्रवंशी के आवेदन में पत्रकारिता और जनसंपर्क को छोड़ शेष क्षेत्रों विधि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, सामाजिक क्षेत्र, प्रबंधन और प्रशासन के अनुभव का उल्लेख किया गया था। चेक लिस्ट की सात बिंदुओं में से पांच में उन्होंने अपने योगदान का विवरण दिया। हालांकि इनके अलावा भी कई आवेदक इसी तरह चार या पांच क्षेत्रों में अनुभव रखने वाले थे, पर संभवत: अनुभव के वर्ष कम या कार्यक्षेत्र इनके मुकाबले कम महत्व के थे, इसलिए उन्हें खारिज किया गया।

अब इन्हीं मापदंडों के आधार पर मुख्य सूचना आयुक्त का भी चयन होना है। चर्चा यह हो रही है कि एक बड़े अफसर, जो शीघ्र सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, उन्होंने भी इस पद के लिए आवेदन किया है। उनके मुकाबले में कोई दूसरा आवेदन नहीं आने पर नियुक्ति सुनिश्चित समझी जा सकती है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1735111304G_LOGO-001.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=273218&amp;path_article=14</guid><pubDate>25-Dec-2024 12:51 PM</pubDate></item><item><title>पूर्वी विदर्भ की सीटों में कहीं बेटी और पिता में मुकाबला तो कहीं टिकट लौटाकर बेटे को उतारा मैदान पर</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=268076&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=268076&path_article=14]]></link><description>0 विदर्भ की 62 सीटों में घमासान, फडऩवीस, पटोले, बावनफूले जैसे दिग्गज की साख दांव पर


 राजनांदगांव की सीमा पर छत्तीसगढ़ी गीतों से प्रचार

नागपुर-गोंदिया से लौटकर प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 17 नवंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। आगामी 20 नवंबर को नई सरकार चुनने जा रही महाराष्ट्र के विदर्भ की 62 सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों के बीच मुकाबला रोमांचक हो चला है। खासतौर पर पूर्वी विदर्भ की कई सीटों में राजनीतिक दलों ने सियासी सफलता के लिए रिश्तेदारों को भी एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतारने से परहेज नहीं किया है। वहीं राजनांदगांव जिले की सीमा से सटे गांवों में भाजपा-कांग्रेस समेत अन्य दलों के उम्मीदवार अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए छत्तीसगढ़ी गीतों का सहारा ले रहे हैं। छत्तीसगढ़ी आधारित चुनावी गीतों के जरिये राजनीतिक दलों को पासा पलटने का भरोसा है।

पूर्वी विदर्भ के गढ़चिरौली के अहेरी सीट में पिता-पुत्री एक-दूसरे के खिलाफ सियासी तलवार ताने हुए खड़े हैं। भाजपा ने इस सीट पर धरमराव बाबा आतराम को अधिकृत उम्मीदवार बनाया है तो शरद पवार की एनसीपी ने धरमराव की बेटी भाग्यश्री आतराम को खड़ा कर दिया है। इस सीट पर आतराम परिवार के दो और सदस्य अंबिश आतराम और दीपक आतराम भी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। इसी तरह उद्धव ठाकरे के सरकार में गृहमंत्री रहे नागपुर से सटे काटोल सीट से अनिल देशमुख ने अपने बेटे शलील देशमुख को शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से उम्मीदवार बनाया है।

पहले अनिल देशमुख के नाम का ऐलान किया गया था, बाद में उन्होंने बेटे को चुनाव लड़ाने के इरादे से अपना नाम वापस ले लिया। इस सीट की खासियत यह है कि अजीत पवार की पार्टी ने भाजपा से गठबंधन होने के बावजूद अनिल देशमुख नामक एक नया चेहरा सामने ला दिया है। जिससे यहां की लड़ाई रोमांचक हो चली है। अजीत पवार की पार्टी से लड़ रहे अनिल देशमुख खेतीहर मजदूर हैं।



इस बीच नागपुर जिले के सावनेर सीट में भी काफी गहमा-गहमी के साथ राजनीतिक लड़ाई चल रही है। इस सीट पर पूर्व मंत्री सुनील केदार ने अपनी पत्नी अनुजा केदार को कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतारा है। बीजेपी से आशीष देशमुख चुनाव लड़ रहे हैं। वह कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रंजीत देशमुख के पुत्र हैं। विदर्भ के कुछ और ऐसे जिले हैं, जहां कई बड़े राजनीतिक महारथी अपना भाग्य आजमा रहे हैं।



चंद्रपुर से सुधीर मुनगटीवार भाजपा से छठवीं बार किस्मत आजमा रहे हैं। मुनगटीवार वर्तमान महाराष्ट्र सरकार में बतौर वन मंत्री हैं। उनका पहली बार चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के संतोष रावत से मुकाबला है।

इस बीच विदर्भ के दिग्गज नेता पूर्व सीएम देवेन्द्र फडऩवीस, महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना भाऊ पटोले और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनफूले भी चुनाव मैदान में हैं। फडऩवीस नागपुर के दक्षिण-पश्चिम सीट से किस्मत आजमा रहे हैं। इसी तरह साकोली विधानसभा से पटोले भी जीत की उम्मीद लेकर लड़ रहे हैं। पटोले को मुख्यमंत्री का चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। उसी तरह कामठी विधानसभा से चंद्रशेखर बावनफूले भी चुनाव लडक़र विधानसभा में जाने जोर लगा रहे हैं।

राजनांदगांव जिले की सीमा से सटे गोंदिया और आमगांव सीट में भी रोमांचक लड़ाई छिड़ी हुई है। गोंदिया सीट से भाजपा के विनोद अग्रवाल और कांग्रेस के गोपालदास अग्रवाल के बीच दिलचस्प लड़ाई नजर आ रही है। महाराष्ट्र के आखिरी छोर वाले आमगांव देवरी विधानसभा सीट आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। इस सीट पर भाजपा ने संजय पुराम को उम्मीदवार बनाया है। पुराम 2014 में भी विधायक रहे हैं। हालांकि विधानसभा 2019 के चुनाव में वह पराजित हुए थे। कांग्रेस के नए चेहरे के रूप में राजकुमार पुराम को उतारा है। चुनावी तैयारी और नतीजों को लेकर कई राजनीतिक पंडितों और पत्रकारों की नजर है।

नागपुर के एक प्रतिष्ठित अखबार के रिजनल एडिटर संजय देशमुख ने छत्तीसगढ़ को बताया कि चुनावी रण में पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए कई अहम योजनाओं के जरिये अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही है। जिसमें लाड़ली बहना योजना और किसानों को कर्ज माफी जैसे मुख्य योजना शामिल है। इसी तरह चंद्रपुर के वरिष्ठ पत्रकार संजय तुमराम ने छत्तीसगढ़ से कहा कि इस बार का चुनाव काफी रोमांचकारी हो चला है। वजह यह है कि मौजूदा सरकार के कामकाज के आंकलन के आधार पर जनता वोट कर सकती है। कांग्रेस और एनसीपी भी सत्ता वापसी में जोर लगा रही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1731830839jn__5_(4).JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=268076&amp;path_article=14</guid><pubDate>17-Nov-2024 1:37 PM</pubDate></item><item><title>20 साल बाद तेंदूपत्ता नीति में बदलाव बस्तर में संग्रहण का सरकारीकरण...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=267121&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=267121&path_article=14]]></link><description> खरसिया उपचुनाव के बाद अर्जुन सिंह ने बदली थी नीति

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट- शशांक तिवारी

रायपुर, 8 नवंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सरकार तेन्दूपत्ता नीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। खबर है कि तेन्दूपत्ता के करीब 19 फीसदी हिस्से का सरकारीकरण किया जाएगा। यानी बस्तर की सवा सौ से अधिक समितियों में तेन्दूपत्ता संग्रहण का काम सीधे सरकार की एजेंसी लघु वनोपज संघ करेगी। चर्चा है कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर तेन्दूपत्ता नीति में बदलाव किया जा रहा है। खास बात यह है कि लघु वनोपज संघ उन इलाकों में तेन्दूपत्ता संग्रहण का काम करेगी, जो कि नक्सल प्रभाव से काफी हद तक मुक्त हैं। जबकि धुर नक्सल इलाकों में तेन्दूपत्ता संग्रहण का काम व्यापारियों के मार्फत होगा।

सरकार तेन्दूपत्ता नीति में करीब 20 साल बाद बदलाव करने जा रही है। इससे पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में वर्ष-1988 से राज्य बनने तक तेन्दूपत्ता कारोबार का सरकारीकरण चलता रहा है। गौर करने लायक बात यह है कि अविभाजित मध्यप्रदेश में खरसिया उपचुनाव के बाद तेन्दूपत्ता के कारोबार में ठेकेदारी प्रथा को खत्म कर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तेन्दूपत्ता कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उस वक्त तेन्दूपत्ता के कारोबार से दिग्गज भाजपा नेता लखीराम अग्रवाल का परिवार सीधे जुड़ा था। यह माना जाता है कि भाजपा के तेन्दूपत्ता कारोबारियों को झटका देने के लिए सरकारीकरण किया गया था जो कि खरसिया उपचुनाव में अर्जुन सिंह के खिलाफ थे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जोगी शासनकाल में पहली बार तेन्दूपत्ता नीति में बदलाव किया गया था, और वर्ष-2003 में पहली बार अविभाजित दंतेवाड़ा जिला (बीजापुर, दंतेवाड़ा, और सुकमा) में तेन्दूपत्ता संग्रहण का काम व्यापारियों के लिए खोल दिया गया। बाद में भाजपा सरकार बनने के बाद तेन्दूपत्ता कारोबार की सरकारी व्यवस्था को बंद कर दिया गया, और संग्रहण का काम व्यापारियों के मार्फत होने लगा।

सरकार ने तेन्दूपत्ता संग्रहण के लिए नीति बनाई हुई है, और 55 सौ रूपए प्रति मानक बोरी की दर से संग्राहकों से तेन्दूपत्ता खरीदी होती है। अब सरकार इस व्यवस्था में बदलाव कर रही है। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक वन विभाग, और लघु वनोपज संघ के आला अफसरों ने मिलकर नई नीति बनाई है। नई नीति के संदर्भ में अगस्त महीने में मुख्य सचिव अमिताभ जैन की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई थी।

कहा जा रहा है कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर बनाई गई है। केन्द्र सरकार राज्य के सहयोग से पूरे इलाके को नक्सलमुक्त करने के लिए व्यापक अभियान छेड़ा हुआ है। ऐसे में धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास से जुड़ी कई योजनाओं पर काम चल रहा है। इसकी केन्द्र सरकार सीधे मॉनिटरिंग कर रही है।

सूत्रों के मुताबिक नई तेन्दूपत्ता नीति में अग्रिम विक्रय (व्यापारियों के मार्फत संग्रहण) और विभागीय संग्रहण-गोदामीकरण, दोनों व्यवस्था रहेगी। तेन्दूपत्ता का संग्रहण लघु वनोपज सिर्फ बस्तर संभाग की 129 समितियों में करेगी। बाकी बस्तर और राज्य के बाकी संग्रहण इलाकों की 773 समितियों में अग्रिम व्यवस्था के अंतर्गत तेन्दूपत्ता का संग्रहण किया जाएगा। यानी यहां व्यापारियों के मार्फत संग्रहण की व्यवस्था यथावत रहेगी। खास बात यह है कि बस्तर के अलावा दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा व रायपुर संभाग के कई जिलों में तेन्दूपत्ता का संग्रहण होता है। संग्रहण कार्य से करीब 13 लाख आदिवासी परिवार जुड़े हुए हैं।

कहा जा रहा है कि लघु वनोपज संघ ने जिन 129 समितियों में संग्रहण के लिए बीड़ा उठाया है, उनमें बीजापुर की 5, दंतेवाड़ा की 3, जगदलपुर की 15, सुकमा की 12, कांकेर की 20, भानुप्रतापपुर की 28, दक्षिण भानुप्रतापपुर की 25, नारायणपुर की 5, कोंडागांव की 9, और केशकाल की 5 समितियां हैं। बस्तर में 216 प्राथमिक सहकारी समिति हैं, जिनमें से 129 में ही लघु वनोपज संघ की खरीदी होगी। इन समितियों में तेन्दूपत्ता संग्रहण का लक्ष्य 3 लाख 7 हजार 2 सौ मानक बोरा है जो कि कुल संग्रहण लक्ष्य 16 लाख 72 हजार मानक बोरा है। यानी 18.4 फीसदी की ही लघु वनोपज के माध्यम से संग्रहण किया जाएगा। तेन्दूपत्ता की नई नीति को कैबिनेट की बैठक में रखा जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद लघु वनोपज संग्रहण के लिए प्रशासनिक तैयारी करेगा। तेन्दूपत्ता संग्रहण का कार्य मार्च से शुरू होकर जून तक चलता है। चर्चा तो यह भी है कि जिन इलाकों में संग्रहण के काम में दिक्कत आएगी, वहां व्यापारियों को दिया जा सकता है। बहरहाल, विभाग जल्द ही नई नीति का ऐलान करेगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1731066063TTT.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=267121&amp;path_article=14</guid><pubDate>08-Nov-2024 5:12 PM</pubDate></item><item><title>जल-जंगल, जमीन, का नारा नक्सलियों का शिगूफा,  वक्त के साथ बदल रही बस्तर की फिजा- आईजी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=264029&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=264029&path_article=14]]></link><description> 5 साल में खुले 117 कैंप, 20 में से 6 हजार वर्ग किमी तक सिमटे नक्सली
छत्तीसगढ़ से विशेष बातचीत- प्रदीप मेश्राम
रायपुर, 13 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। बस्तर रेंज आईजी सुंदरराज पी. यह मानकर चल रहे हैं कि नक्सल समस्या के खात्मे के लिए पुलिस सिर्फ मुठभेड़ पर भरोसा नहीं कर रही है। बार-बार नक्सलियों से समर्पण के जरिये मुख्यधारा में लौटने की अपील की जा रही है। आईजी का मत है कि जल-जंगल और जमीन पर आदिवासियों का नारा नक्सलियों का शिगूफ़ा मात्र रह गया है। वक्त के साथ बस्तर की फिजा बदल रही है। बस्तर के अंतिम छोर पर बसे लोग भी आगे बढऩा चाहते हैं।

0 - हाल ही में दंतेवाड़ा-नारायणपुर बार्डर में हुई अब तक की सबसे बड़ी मुठभेड़ पर आपका क्या कहना है ?
00 - पुलिस हर मोर्चे पर पूरी ताकत लगाकर नक्सलियों का सामना कर रही है। दंतेवाड़ा-नारायणपुर बार्डर मुठभेड़ में मिली सफलता पुलिस के बढ़ते हौसले का परिणाम है। ऐसे आपरेशन आगे भी होते रहेंगे।

0 - आईजी के तौर पर आप बस्तर में किस तरह का बदलाव देखते हैं?
00- बीते पांच वर्षों में बस्तर के सातों जि़लों में व्यापक बदलाव हुए हैं। हमने कोर नक्सल इलाकों में सबसे पहले सडक़ों का जाल बिछाया। जिसमें बासागुड़ा-जगरगुंडा, बीजापुर से मिरतूर, सिलेगर से पूवर्ती, भेज्जी से चिंतागुफा, चिंताराम से किस्टाराम जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में सडक़ें बनाई। पुलिस की मौजूदगी में कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव इलाकों में भी सडक़ें बनाई गई है। यह बदलाव का पहला चरण है।

0- सुरक्षा कैम्पों को लेकर नक्सली मुखर रहते हैं कि कैम्प आदिवासियों के हित में नहीं हैं, इस पर आप क्या कहेंगे।
00- सुरक्षा कैम्पों के कारण ही आज बस्तर में शांति व अमन कायम हो रहा है। नक्सली आदिवासियों को ढ़ाल बनाकर अपने मंसूबों को पूरा करते हैं। अब बस्तर का हर बाशिंदा नक्सलियों के चाल-चरित्र को समझ गया है।

0- जल-जंगल-जमीन की बस्तर में क्या स्थिति है। तेजी से औद्योगिकीकरण के खिलाफ नक्सली क्यों है?
00- जल-जंगल-जमीन नक्सलियों के लिए एक शिगूफा मात्र है। नक्सलियों की दोहरी नीति उनके सफाए के साथ खात्मे की ओर है। आदिवासियों को भी आगे बढऩे का मौका मिलना चाहिए। औद्योगिकीकरण का विरोध के पीछे नक्सलियों का स्वार्थ है।

0- भीतरी इलाकों में पुलिस की इमेज कैसी रह गई है?
00- बस्तर की जनता के साथ पुलिस का रिश्ता प्रगाढ़ होता चला जा रहा है। भीतरी इलाकों में पुलिस की साख अब बदल गई है। पुलिस मानवीय दृष्टिकोण के तहत पिछड़ेपन के शिकार गांवों को अपने जरिये बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा रही है। पुलिस अपने कैम्पों में प्रसूति से लेकर अन्य चिकित्सकीय कार्यों में भी लोगों की मदद कर रही है।

0- लगातार मुठभेड़ों से नक्सली क्या बैकफुट पर हैं। क्या ऐसा लगता है कि यह समस्या चंद दिनों की है?
00- मैं कह सकता हूं कि पुलिस का वर्चस्व अब बस्तर के हर इलाके में है। पिछले 5 सालों में बस्तर के 7 जिलों के 20 हजार वर्ग किमी से नक्सली सिर्फ 6 हजार वर्ग किमी तक सिमटकर रह गए हैं। कोर एरिया कमेटी में सिलसिलेवार खुल रहे कैम्प से नक्सलियों में भगदड़ की स्थिति ही है। यह समस्या जल्द ही सुलझ जाएगी।

0- नक्सलग्रस्त बस्तर में विकास के रास्ते कैसे खुलेंगे?
00- नक्सलियों की स्थिति कमजोर होने के साथ समाप्ति की ओर भी बढ़ रही है। बस्तर एक खूबसूरत इलाका है। इसकी अपनी संस्कृति और वातावरण है, जो कि पर्यटन के लिहाज से पर्यटकों के लिए एक मुफीद वजह है। पर्यटन के साथ-साथ भीतरी इलाकों में बन रही सडक़ों से ट्रांसपोर्टिंग और मैनपावर बढ़ेंगे। एनएमडीसी का उद्योग बस्तर की आर्थिक ताकत को मजबूती देगा। यह तमाम बातें है जो विकास के द्वार खोलने के लिए काफी है।

0- नक्सलियों के लाल गलियारे पर आपका क्या कहना है?
00- नक्सलियों का लाल गलियारा अब एक सपना रह गया है। वजह यह है कि बस्तर में इनकी जड़ें कमजोर हो गई है। भर्तियां नहीं होने से नक्सली संगठन लडख़ड़ा रहा है। वहीं बस्तर के नक्सलियों के साथ तेलुगू कैडर के नक्सल नेताओं का सौतेला व्यवहार सर्वविदित है। पिछले कुछ सालों से नक्सलियों के तेलुगू कैडर के शीर्ष नक्सली अलग-अलग खत्म हो गए हैं। कुल मिलाकर लाल गलियारा तैयार करना दूर की सपना मात्र है।

0- बतौर आईजी आपकी ओर से जनता के लिए क्या संदेश है?
00- बस्तर की जनता बेहद भोली-भाली और शांतिप्रिय है। नक्सल विचार से उनका मोहभंग होने लगा है। जनता से लगातार हम बातचीत कर एक उन्मुक्त माहौल बनाकर मुख्यधारा में साथ चलने की अपील करते रहे हैं। निश्चिततौर पर नक्सलियों से जनता अब रिश्ता बनाने में रूचि नहीं है। आने वाला भविष्य बस्तर के लिए काफी उज्जवल है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1728889721astar_IG_Sundarraj_P_(2).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=264029&amp;path_article=14</guid><pubDate>14-Oct-2024 12:38 PM</pubDate></item><item><title>अबूझमाड़ से निकले छात्र की पहली उड़ान और जापानी बुलेट ट्रेन</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263586&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263586&path_article=14]]></link><description> नारायणपुर के दुर्गम इलाकों में बढ़ रही पढ़ाई

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट-नारायणपुर से लौटकर प्रदीप मेश्राम

रायपुर 10 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। बस्तर के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के नारायणपुर जिले में पढ़ाई बढ़ाने की प्रशासन की मुहिम को पुलिस की मदद से रफ्तार मिलने के बाद अपनी काबिलियत से अबूझमाड़ के एक छात्र ने विदेशी जमीं पर कदम रखा। पोटा केबिन से पढ़ाई शुरू करने वाले इस छात्र को विदेश भेजने में पुलिस और प्रशासन साझेदार रहे।

नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के रहने वाले छात्र शबीर वड्डे का गांव टिकोनार नक्सलगढ़ के रूप में जाना जाता है। नक्सल डर के साए में रहने वाले इस गांव में महज 5 परिवार ही रहते हैं। तीस लोगों की आबादी वाले इस गांव से निकलकर शबीर ने नारायणपुर के पोटा केबिन में दाखिला लिया। विज्ञान में रूचि रखने की वजह से शबीर ने जापान के नोकोया विश्वविद्यालय में एक विज्ञान प्रदर्शनी में शामिल होने का मौका हासिल किया।



इस साल 16 जून से 22 जून को हुए विज्ञान प्रदर्शनी में शामिल होने वाले शबीर बस्तर रेंज से एकमात्र छात्र थे। शबीर के लिए यह चयन कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। शबीर ने पहली बार हवाई सफर का अनुभव हासिल किया। वहीं पहली विदेश यात्रा की खुशी जापान के बुलेट ट्रेन की सवारी से दुगनी हो गई। वर्तमान में 12वीं में अध्ययनरत शबीर को जापान की सफल यात्रा के लिए पुलिस और प्रशासन ने आवश्यक दस्तावेज को तैयार करने में मदद की।

खास बात यह है कि शबीर का गांव पूर्ण रूप से निरक्षर है। नक्सल आतंक के चलते प्रशासनिक मशीनरी का गांव में दखल शून्य है। ऐसे में इस होनहार छात्र ने विदेशी जमीन पर अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में भाग लेकर अबूझमाड़ में एक नए उत्साह का माहौल बनाया है।

इधर नारायणपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में अध्ययनरत अबूझमाड़ के कई छात्र-छात्राएं तालीम को लेकर काफी गंभीर है। धौड़ाई और ओरछा क्षेत्र के विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा के साथ व्यावहारिक ज्ञान को विद्यार्थियों ने चुना है। अबूझमाड़ के विद्यार्थी खेल, संगीत, चिकित्सा, इंजीनियर और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। हालांकि नक्सलियों के आतंक के चलते विद्यार्थी अपना नाम छुपाने पर जोर देते हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर कुतुल, अतलानार, सोनपुर, ओरछा क्षेत्र के कई विद्यार्थी बताते हैं कि शिक्षा से ही वह तरक्की की ओर जा सकते हैं। तालीम लेने के बाद उनके जीवन में कई बदलाव आए हैं।

माना जाता है कि इन विद्यार्थियों ने परोक्ष या परोक्ष रूप से नक्सल दंश को झेला है। छात्राएं भी शिक्षा के रास्ते अपना सुनहरा भविष्य गढऩे के लिए पूरी शिद्दत के साथ पढ़ रही हैं। बताया जाता है कि अबूझमाड़ से निकले इन छात्रों को आगे बढ़ाने के लिए सभी तरह की सहूलियत भी दी जा रही है। बहरहाल अबूझमाड़ के गांवों में शिक्षा से बदलाव की बयार चलने लगी है।


शिक्षा से ही बदलाव संभव - आईजी
बस्तर रेंज आईजी सुंदरराज पी. ने नारायणपुर के भीतरी इलाकों में शिक्षा के बदौलत हो रहे परिवर्तन को लेकर कहा कि शिक्षा से ही बदलाव संभव है। उन्होंने कहा कि प्रशासन के साथ पुलिस संयुक्त रूप से शिक्षा को लेकर अभियान चला रही है। जिसके अपेक्षित नतीजे सामने आ रहे हैं। विद्यार्थियों की समझ और बौद्धिक क्षमता में बढ़ोत्तरी इस बात का द्योतक है कि भविष्य अबूझमाड़ के होनहार छात्रों का है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1728563141arrayanpur____Sabir_Vadde.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263586&amp;path_article=14</guid><pubDate>10-Oct-2024 5:55 PM</pubDate></item><item><title>कैंपों से सुरक्षित बस्तर के गांवों में खड़े हुए पीड़ीएस, अस्पताल और स्कूल</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263248&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263248&path_article=14]]></link><description> पुलिस कैपों में प्रसूति और आपातकालीन चिकित्सा

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट-बड़ेसेट्टी कैंप से लौटकर प्रदीप मेश्राम

रायपुर, 8 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में आमतौर पर खुलने वाले सुरक्षा कैंप अक्सर पुलिस-ग्रामीणों की नोंक-झोंक की वजह से सुर्खियां बंटोरते रहे है, लेकिन एक पहलू यह भी है कि पुलिस कैपों ने बीहड़ इलाकों में एक सुरक्षित माहौल तैयार कर दिया है। परिणामस्वरूप गांवों में पीडीएस, अस्पताल और स्कूल भवनें खड़ी होने लगी है।



सुकमा से लगभग 40 किमी दूर बड़ेसेट्टी में तकरीबन तीन साल पहले खुले कैंप नेे एक बड़े हिस्से से नक्सल प्रभाव को लगभग खत्म कर दिया है। फरवरी 2021 में इस कैंप का नक्सल दबाव में ग्रामीणों ने महीनों विरोध करते आंदोलन किया था। नक्सलियों की इस रणनीति का जवाब देने पुलिस ने ग्रामीणों से नजदीकियां बढ़ाकर कैंप खुलने के फायदे गिनाए।

देर से सही बड़ेसेट्टी में अब पीड़ीएस भवन बनकर तैयार हो गया है। वहीं अस्पताल भवन निर्माणाधीन है। पीडीएस भवन में सप्ताह के एक दिन निश्चित तारीख में दूर-दराज से ग्रामीण सरकारी राशन ले रहे हैं। फूलबगड़ी थाना के अधीन बड़ेसेट्टी में कैंप खुलने से महज तीन साल पहले शीर्ष नक्सल नेताओं और कमांडरों का प्रभाव रहा। कैंप खुलने के करीब छह माह के भीतर बड़ेसेट्टी क्षेत्र के 22 सौ की जनसंख्या को नक्सल आतंक से जहां निजात मिली। वहीं आपातकालीन चिकित्सकीय सुविधा भी आसानी से मिलनेे लगी।



कैंप के प्लाटून कंमाडर देवेन्द्र धीवर ने छत्तीसगढ़ को बताया कि कैंप खुलने से अब वनवासी खुद को महफूज मान रहे हैं। कैंप में दवाई से लेकर आपात चिकित्सकीय सुविधा भी प्रदान की जाती है। गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्थिति में कैम्पों की सहायता से वाहन उपलब्ध कराकर हायर सेंटर भेजा जा रहा है।

बताते हैं कि ग्रामीणों का अब कैपों को लेकर नजरिया भी बदला है। भले ही ग्रामीण खुलकर कैपों के हिमायती नहीं है, लेकिन गांवों में बुनियादी जरूरतों की परेशानी दूर होने से परिवर्तन दिख रहे हैं। कैंप खोलने के बाद अंदरूनी इलाकों में दौड़ रहे आटो और सवारी गाडिय़ों से मीलों पैदल चलने की मजबूरी से भी ग्रामीणों को छुटकारा मिला है।



बड़ेसट्टी में पढ़ाई को लेकर भी एक उन्मुक्त माहौल बन गया है। बोलचाल से हिचकने वाले ग्रामीण भी अब जवानों से बतियाते दिख जाते हैं। कैंपों की सुरक्षा में तैनात जवान भी ग्रामीणों के बदले रूख के बीच गांवों की पारंपरिक धार्मिक आयोजनों में शरीक हो रहे हैं। बहरहाल कैपों से भीतरी गांवों की बदलती आबो हवा के बीच बड़सेट्टी जैसे कुछ नए कैंप खोलने का पुलिस का अभियान बदस्तूर जारी है।



सुरक्षा कैंप ग्रामीणों के लिए - आईजी
बस्तर में कैंपों को लेकर आईजी सुंदरराज पी. ने कहा कि कैंप ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए है। साथ ही बुनियादी सुविधाओं के लिए कैंप प्रशासन के साथ सहायक की भूमिका में है। निश्चित तौर पर बस्तर में कैपों के खुलने से सुरक्षा के लिए एक बेहतर परिस्थिति बनती दिख रही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1728379620astar_Badesetti__05_Oct_(1).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=263248&amp;path_article=14</guid><pubDate>08-Oct-2024 2:57 PM</pubDate></item><item><title>आईआईटी की तर्ज पर प्रदेश में खुलेंगे 5 सीजीआईटी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262625&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262625&path_article=14]]></link><description>नए शिक्षा सत्र से दाखिला, हर लोकसभा में एक

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 4 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। छत्तीसगढ़ में भले ही इंजीनियरिंग कॉलेजों की आधे से अधिक सीटें खाली रह गई हैं लेकिन सरकार आईआईटी की तर्ज पर नए इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की तैयारी कर रही है। सरकार ने नए शिक्षा सत्र से पांच लोकसभा क्षेत्र में सीजीआईटी (छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी) खोलने जा रही है।

तकनीकी शिक्षा सचिव एस भारतीदासन ने छत्तीसगढ से चर्चा में कहा कि नए शिक्षा सत्र से रायपुर, कवर्धा, जगदलपुर, रायगढ़, और बस्तर में सीजीआईटी शुरू करने की तैयारी है। इसकी तैयारी चल रही है।

तकनीकी शिक्षा विभाग ने नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की दिशा में कार्रवाई शुरू कर दी है। भाजपा ने अपने विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में आईआईटी की तर्ज पर हर लोकसभा क्षेत्र में एक सीजीआईटी खोलने का वादा किया था। नए सीजीआईटी खोलने के मसले पर सीएम विष्णुदेव साय के साथ तकनीकी शिक्षा विभाग के अफसरों की बैठक भी हो चुकी है। रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में दो इंजीनियरिंग कॉलेज खोले जाएंगे। इनमें से एक जशपुर जिले में हो सकता है। अगले दो साल में प्रदेश के सभी लोकसभा क्षेत्रों में सीजीआईटी शुरू करने की सरकार की योजना है। कुल मिलाकर 11 लोकसभा क्षेत्र में 12 सीआईटी खोलने का प्रस्ताव है।

सूत्रों के मुताबिक पांच लोकसभा क्षेत्र में सीजीआईटी खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी भी मिल गई है। यहां कॉलेज बिल्डिंग, और अन्य सुविधाएं जुटाने पर भी तेजी से काम चल रहा है। कहा जा रहा है कि पहले चरण में अस्थाई रूप से उस लोकसभा क्षेत्र के पॉलीटेक्निक कॉलेज की बिल्डिंग को लेकर सीजीआईटी शुरू किया जाएगा। नए शिक्षा सत्र यानी 2025 अप्रैल में यहां प्रवेश के लिए कार्रवाई भी की जाएगी।

बताया गया कि शिक्षकों की नियुक्ति, और ब्रांच आदि को लेकर विचार-विमर्श चल रहा है। कहा जा रहा है कि शिक्षकों की नियुक्ति अस्थाई तौर पर की जाएगी। इसके अलावा अन्य सुविधाएं जुटाने के लिए वित्तीय स्वीकृति ली जा रही है। सरकार के अफसरों का कहना है कि सीजीआईटी उच्च तकनीकी गुणवत्ता संस्थान के रूप में विकसित किया जाएगा। हालांकि प्रदेश में इंजीनियरिंग को लेकर विद्यार्थियों में रूझान कम देखने को मिला है।

प्रदेश में कुल 32 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। इनमें से तीन इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर, बिलासपुर, और जगदलपुर में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। बाकी तीन जगहों पर स्वशासी और 26 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। कुल मिलाकर 11 हजार 116 इंजीनियरिंग की सीटें हैं। इनमें से 3939 सीटें भर पाई है। बाकी सीटें खाली रह गई है।

पिछले कुछ सालों में आधा दर्जन से अधिक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बंद भी हो चुके हैं। इसके अलावा सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी शिक्षकों की कमी है। ऐसे में नए इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने पर क्या स्थिति रहेगी, इस पर इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। मगर सरकार से जुड़े सूत्रों का दावा है कि ये सभी संस्थान उत्कृष्ट रहेंगे, और ऐसे में यहां प्रवेश के लिए विद्यार्थी आकृष्ट होंगे। यहां पीईटी के माध्यम से प्रवेश दिया जा सकेगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1728040558antralaya.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262625&amp;path_article=14</guid><pubDate>04-Oct-2024 4:46 PM</pubDate></item><item><title>हर 5 किमी में सुरक्षा कैंप और सडक़ों के फैलते जाल से सिमटते नक्सली</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262553&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262553&path_article=14]]></link><description> हिरौली कैंप और गंगालूर-नेलसनार रोड़ जवानों की शहादत की गवाह

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट : बीजापुर के गंगालूर से लौटकर-प्रदीप मेश्राम

रायपुर, 3 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। नक्सलियोंं के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में बस्तर के दुर्गम इलाकों में सिलसिलेवार खुल रहे सुरक्षा कैंप और सडक़ों के फैलते जाल से नक्सलियों की जड़ें हिल रही हैं। कैंप खोलने और सडक़ बनाने पुलिस की रणनीति कारगर साबित हो रही है। बीजापुर जिले के गंगालूर से तकरीबन 15 किमी दूर हिरौली में पुलिस ने कैंप की शुरूआत कर नक्सलियों को चुनौती दी है। हिरौली कैंप खोलना पुलिस के लिए आसान नहीं रहा। कैंप खुलने के बाद विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) फंड से हिरोली-कांवडगांव के लगभग 1.53 किमी का सडक़ निर्माण किया गया। बीजापुर की जिला निर्माण समिति ने जान जोखिम में डालकर पहली बार इस इलाके के अंदरूनी गांव के लिए डामरयुक्त सडक़ 50 लाख की लागत से तैयार किया गया। इस कैंप में सीआरपीएफ को तैनात किया गया है। साथ ही युवा जवानों की कोबरा टीम नक्सलियों के लिए मुस्तैद है।

बताया जाता है कि कैंपों के जरिए पुलिस नक्सल समस्या का सफाया करने के लिए अलग-अलग तरीका अपना रही है। मसलन गांवों की बुनियादी समस्याओं का हल तलाश कर ग्रामीणों से नजदीकी बढ़ाने व नक्सल आतंक से मुक्त कराने पर जोर दे रही है। हिरौली कैंप की शुरूआत के खिलाफ नक्सलियों ने ग्रामीणों को ढाल बनाकर महीनों आंदोलन को हवा दी थी।



पुलिस का दावा है कि नक्सली कैंपों का विरोध कर अपनी साख को बनाए रखना चाहते हैं। कैंप खुलने के बाद अब कांवडग़ांव और आसपास के इलाकों में नक्सली गतिविधि कम हुई है। कंैप खुलने से आसमान से नजर रखने के लिए जवान हाई-डेफीनेशन के ड्रोन का उपयोग कर रही है। ड्रोन के उपयोग को लेकर भी नक्सली कई तरह के भ्रांति फैलाकर ग्रामीणों को बरगला रहे हैं। इसी तरह गंगालूर-नेलसनार जाने वाली मार्ग में पुलिस को कई जवानों की शहादत झेलनी पड़ी। इस मार्ग के निर्माण होने से नक्सलियों के ठिकाने अब सुरक्षित नहीं रह गए।

गंगालूर के बाद पुलिस अब सडक़ों को आधार बनाकर अंदरूनी इलाकों के पिछड़ेपन को दूर करने तेजी से आगे बढ़ रही है। बताया जाता है कि गंगालूर और नेलसनार के बीच रास्ता बनने से दंतेवाड़ा और बीजापुर की सरहद पर नक्सल घुसपैठ में कमी आने की संभावना है। इस सडक़ पर कई दफे मुठभेड़ के अलावा विस्फोट की घटनाएं हुए। सडक़ निर्माण के दौरान तैनात जवानों पर नक्सलियों ने जानलेवा हमला किया। कई जवानों की शहादत का गवाह बना यह मार्ग अब भी निमार्णाधीन है। इस मार्ग से करीब 5 किमी दूर स्थित हिरौली कैंप तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं रहा। इसी तरह नेलसनार की ओर बढ़ते गंगालूर से शुरू हुए इस मार्ग में अब डामर बिछने से सडक़ चमचमाती दिख रही है।



बताया जाता है कि नक्सलियों ने कच्चे मार्ग को पक्की सडक़ बनाने का पुरजोर विरोध किया था। निर्माण के दौरान सडक़ से टिफिन बम और आईईडी कई बार जवानों ने गश्त के दौरान बरामद किया। इसके बावजूद पुलिस ने रोड़ बनाने और कैंप खोलने की मुहिम को बरकरार रखा। हिरौली कैंप खोलकर पुलिस ने अपना इरादा जाहिर कर दिया है। साथ ही सडक़ बनाने को एक अभियान के रूप में लिया है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1728025495ijapur_Photos--Rjn___Abhisekh_Yadav___26-09-2024_(4).JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262553&amp;path_article=14</guid><pubDate>04-Oct-2024 12:34 PM</pubDate></item><item><title>सीएम की फटकार के बाद राजस्व प्रकरणों के निपटारे में तेजी, पर बस्तर-बिलासपुर में अब भी गति नहीं</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262223&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262223&path_article=14]]></link><description>प्रदेश की कमिश्नरी में 15 हजार प्रकरण लंबित

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट

रायपुर, 2 अक्टूबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सीएम विष्णुदेव साय की फटकार के बाद राजस्व प्रकरणों के निराकरण में थोड़ी तेजी आई है। फिर भी बस्तर, और बिलासपुर कमिश्नरी में राजस्व प्रकरणों के निपटारे में देरी हो रही है। बस्तर में तो सितंबर माह में एक भी प्रकरण नहीं निपटे हैं। हाल यह है कि प्रदेश की कमिश्नरी में अब भी 15 हजार राजस्व प्रकरण लंबित हैं।

प्रदेश में राजस्व प्रकरणों की सुनवाई में देरी हो रही है। सीएम ने कलेक्टर कॉन्फ्रेंस में इस पर नाराजगी जताई थी, और समय सीमा के भीतर राजस्व प्रकरणों के निपटारे के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके बिलासपुर, और बस्तर कमिश्नरी में राजस्व प्रकरण की सुनवाई समय पर नहीं हो रही है। बिलासपुर कमिश्नर नीलम नामदेव एक्का के हटने के बाद से रायपुर कमिश्नर महादेव कांवरे बिलासपुर के भी प्रभार में हैं।

बताया गया कि सितंबर माह में बस्तर में एक भी प्रकरण नहीं निपटे हैं। जबकि बिलासपुर में 9 प्रकरणों का निपटारा हुआ है। सबसे ज्यादा दुर्ग में 61 प्रकरण निपटे हैं। रायपुर कमिश्नरी में 47, और सरगुजा में 8 प्रकरण ही निपट पाए हैं। कुल मिलाकर 7 महीने में बस्तर में 26, बिलासपुर में 10, दुर्ग में 445, रायपुर में 116, और सरगुजा में 101 प्रकरणों का निराकरण हुआ है।

बताया गया है कि प्रदेश में सबसे ज्यादा 6089 प्रकरण सरगुजा संभाग में लंबित हैं। जबकि रायपुर में 3278, दुर्ग में 1072, बिलासपुर में 2924, और बस्तर में 1631 प्रकरण लंबित हैं। प्रदेश की कमिश्नरी में कुल मिलाकर 14994 प्रकरण लंबित हैं। कुल मिलाकर अभी भी राजस्व प्रकरणों का निपटारे की रफ्तार काफी धीमी है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1727856886ishnudev_sai.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=262223&amp;path_article=14</guid><pubDate>02-Oct-2024 1:45 PM</pubDate></item><item><title>गोला-बारूद की नहीं, बस्तर के स्कूलों में बच्चों की गूंज रही आवाज</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261956&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261956&path_article=14]]></link><description> आजादी के बाद पहली बार बीजापुर के कांवडग़ांव में बच्चे पढ़ रहे

बीजापुर के कांवडग़ांव से लौटकर - प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 30 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। दक्षिण बस्तर के दुर्गम जिले बीजापुर के नक्सल प्रभाव वाले कांवडग़ांव गांव में गोला-बारूद के बजाय स्कूल में बच्चों के ककहरे की आवाज गूंज रही है। आजादी के बाद पहली बार खुले प्राथमिक स्कूल में बच्चे अब प्राथमिक शिक्षा की बुनियाद समझ से रूबरू हो रहे हैं। अस्थाई रूप से बांस से निर्मित स्कूल में भले ही गिनती के बच्चे बुनियादी शिक्षा हासिल कर रहे हैं। हालांकि नक्सल खौफ से खुलकर कोई भी खुशी का इजहार नहीं कर रहा है। गांव में स्कूल का मुंह देखने के लिए ग्रामीणों को 70 बरस से ज्यादा का वक्त लग गया।

बीजापुर मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर कांवडगांव में पुलिस की मदद से प्रशासन ने प्राथमिक स्कूल की नींव रखी। इस साल जुलाई में खुले स्कूल में कुल 35 बच्चे इमला सीख रहे हैं। कांवडग़ांव नक्सलियों के कब्जे में रहा है। 300 की जनसंख्या वाला यह गांव अब तक निरक्षर रहा है। गांव की मौजूदा पीढ़ी ने स्कूल का कभी रूख नहीं किया।



स्कूल का पट खुलते ही आंगनबाड़ी और प्राथमिक स्कूल के बच्चों को विश्राम सिंह प्रजापति और एक अनुदेशक तालीम दे रहे हैं। स्कूल के पहले सत्र की शुरूआत से पहले बस्तर पुलिस को बारूद से भरे कांवडग़ांव के कच्चे रास्ते को पक्की सडक़ में बदलने के लिए कई दफे नक्सलियों से भिडऩा पड़ा।



स्कूल के शिक्षक प्रजापति ने छत्तीसगढ़ को बताया कि आजादी के बाद पहली बार स्कूल खुलने से शिक्षा-दीक्षा के लिए बच्चों के हाथ कॉपी-पुस्तक देखकर सुखद माहौल बना है। कांवडग़ांव का इतिहास नक्सली आतंक के चलते काफी डरावना रहा है। नक्सलियों के कई बड़े कैडर कांवडग़ांव में आए दिन धमकते रहेे हंै, जिस जगह पुलिस की मदद से प्रशासन ने स्कूल का बांस से निर्मित ढांचा तैयार किया है। वहां नक्सलियों की बैठकें और फरमान जारी होता था। स्कूल के जगह को पत्थर के शिलालेख से घेरा गया है। शिलालेखों में हार्डकोर नक्सलियों की मौत की वजह और उनके नक्सल संगठन को दिए योगदान का जिक्र है।

बताया जाता है कि नक्सली मारे गए साथियों के योगदान को ग्रामीणों के लिए खुद को एक त्याग के रूप में पेश करते हंै, ताकि गांवों में बसे ग्रामीणों का संगठन से मोह भंग न हो। स्कूल प्रारंभ होने पहले बस्तर पुलिस की निगरानी में 8 किमी दूर कांवडगांव के कच्चे रास्ते पर पक्की सडक़ का निर्माण किया गया है।



एक ग्रामीण ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि गांव में दाखिल होने से पहले एक बेरियर में लोगों को सवाल-जवाब देना पड़ता था। यानी नक्सली नए चहेरों को सघन जांच के बाद ही गांव में प्रवेश की अनुमति देते थे। पुलिस ने स्कूल खोलने से पहले गांव में नक्सलियों के ठिकानों को ध्वस्त किया। कांवडगांव में अब पीडीएस भवन, जल-जीवन मिशन की पानी टंकी और आंगनबाड़ी का नया भवन निर्माणाधीन है। कांंवडगांव में स्कूल खोलने से शिक्षा का एक उन्मृक्त माहौल बनने से पुलिस अपनेे अभियान को अगले गांव की ओर ले जाने की तैयारी कर रही है।



नक्सलियों को जवाब देने शिक्षा अहम हथियार- आईजी
सुरक्षा के साथ शिक्षा को लेकर पुलिस का एक सकारात्मक अभियान चलाने को लेकर बस्तर रेंज आईजी सुंदरराज पी. का कहना है कि नक्सली नहीं चाहते कि बस्तर के लोग शिक्षित हो। नक्सली सिर्फ वनवासियों को ढ़ाल बनाकर अपने स्वार्थो की पूर्ति कर रहे हैं, इसलिए हमने नक्सलियों के हिंसक रवैये का जवाब देने के लिए शिक्षा को हथियार बनाया है। जिसके बेहतर नतीजे भी सामने आ रहे हैं। पुलिस का शिक्षा के प्रति अभियान आगे भी जारी रहेगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1727691939ijapur_Photos--Rjn___Abhisekh_Yadav_(3).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261956&amp;path_article=14</guid><pubDate>30-Sep-2024 3:55 PM</pubDate></item><item><title> राइस मिल अब और नहीं...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261739&amp;path_article=14</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261739&path_article=14]]></link><description> 500 मिलें लग चुकीं, नई पर रोक लगाने मिलर्स का आग्रह

छत्तीसगढ़ की विशेष रिपोर्ट
रायपुर, 27 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। प्रदेश में पिछले पांच बरस में करीब पांच सौ नई राइस मिलें खुलीं हैं। हाल यह है कि कई मिलर्स को 60 दिन मिलिंग के लायक धान नहीं मिल पा रहा है। इस पर राइस मिल एसोसिएशन ने सरकार से नई राइस मिल को अनुमति नहीं देने का आग्रह किया है। साथ ही राइस मिल खोलने के लिए सब्सिडी खत्म करने का आग्रह किया है।
प्रदेश में राइस मिलों की संख्या 27 सौ से अधिक हो चुकी है। इसमें से तो पांच सौ राइस मिल पिछले पांच साल में खुलीं हैं। भूपेश सरकार ने राइस मिल उद्योगों को प्रोत्साहित किया था। पिछड़े क्षेत्रों में मिल लगाने पर करीब 60 लाख तक सब्सिडी दे रही है।

सरकार की नई नीति के बाद अब और मिल लगाने के लिए आवेदन आ रहे हैं। इस राइस मिल एसोसिएशन ने चिंता जताई है, और उद्योग सचिव से मिलकर सब्सिडी खत्म करने का आग्रह किया है।

राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में कहा कि राइस मिलर्स अब परेशान हो रहे हैं। नई मिलें बड़ी संख्या में लग चुकी हैं। इसकी वजह से कई मिलर्स को 60 दिन मिल चलाने लायक धान नहीं मिल पा रहा है। इन सबको देखते हुए सरकार से आग्रह किया गया है कि मिल लगाने के सरकारी सब्सिडी खत्म किया जाए, अथवा नई मिल लगाने की अनुमति नहीं दी जाए।

दूसरी तरफ, उद्योग विभाग के एक अफसर ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में कहा कि अभी सी और डी कैटेगरी वाले इलाकों में मिल लगाने पर 60 लाख तक सब्सिडी दी जाती है। हालांकि अभी नई मिल लगाने पर रोक, या फिर सब्सिडी खत्म करने कोई प्रस्ताव नहीं है। फिर भी मिलर्स की मांग पर विचार किया जा सकता है।

प्रदेश में इस बार 1 करोड़ 45 लाख मीट्रिक टन धान खरीद हुई थी। उस अनुपात में अभी 2 लाख मीट्रिक टन धान का उठाव होना बाकी है। जबकि मिलर्स ने धान के उठाव के एवज में अभी 24 लाख टन चावल जमा नहीं कराए हैं। इसके लिए उन्हें नोटिस जारी किया जा रहा है।

रोक हटी, 35 लाख टन चावल-ब्रोकन निर्यात होता है...
केन्द्र सरकार ने चावल के निर्यात पर रोक को हटा दिया है। साथ ही उसना चावल के निर्यात पर ड्यूटी 20 से घटाकर 10 फीसदी कर दी है। छत्तीसगढ़ से हर साल करीब 35 लाख टन चावल-ब्रोकन का निर्यात होता है।

सरकार के इस फैसले से राईस मिलरों ने खुशी जताई है। पिछले तीन साल से अरवा चावल के निर्यात पर बैन लगी हुई थी। अब बैन को हटाने से निर्यात पहले की तरह सामान्य हो पाएगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1727532626R-1.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=261739&amp;path_article=14</guid><pubDate>28-Sep-2024 7:40 PM</pubDate></item></channel></rss>