    
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>Daily Chhattisgarh Health-Fitness</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com</link><description>Daily Chhattisgarh Feed Health-Fitness</description><item><title>कंधों में अकड़न, पीठ-कूल्हे में दर्द, या खराब पोस्चर का अस्थमा से कनेक्शन, गोमुखासन से सुधरेगी सेहत </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324284&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324284&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 12 मई । आधुनिक जीवनशैली में लंबे समय तक बैठे रहने, कम शारीरिक गतिविधि और तनाव के कारण कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने इन समस्याओं के समाधान के लिए गोमुखासन की सलाह दी है। मंत्रालय के अनुसार, सांस लेने में दिक्कत, कंधों में अकड़न, शरीर की खराब पोस्चर और शरीर के निचले हिस्से में समस्याओं का संबंध अस्थमा से हो सकता है। मंत्रालय के अनुसार, बेचैनी समेत अन्य परेशानियां अक्सर मांसपेशियों में खिंचाव, तनाव और गतिशीलता की कमी के कारण होती हैं। आपका अस्थमा, कंधों में अकड़न, पीठ में कमजोरी, कूल्हे में दर्द या खराब पोस्चर भी टाइट मसल्स और कम मूवमेंट से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में इन समस्याओं को दूर करने और शरीर को संतुलित रखने के लिए आयुष मंत्रालय गोमुखासन के नियमित अभ्यास की सलाह देता है। आयुष मंत्रालय विश्व योग दिवस की तैयारियों के तहत आम लोगों को ऐसे सरल और प्रभावी योगासनों के बारे में जानकारी दे रहा है, जिन्हें घर पर आसानी से किया जा सकता है।

गोमुखासन उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो डेस्क जॉब करते हैं या लंबे समय तक एक ही मुद्रा में रहते हैं। गोमुखासन छाती को खोलने, कंधों और कूल्हों को अच्छी तरह स्ट्रेच करने व रीढ़ की हड्डी को बेहतर बनाने में मददगार है। यह आसन शरीर के संतुलन और आराम के लिए बेहद फायदेमंद है। इसका नियमित अभ्यास श्वसन स्वास्थ्य को सुधारता है और लंबे समय तक बैठे रहने या शारीरिक निष्क्रियता से पैदा हुए मांसपेशियों के तनाव को कम करने में मदद करता है। गोमुखासन के अभ्यास से शारीरिक व मानसिक फायदे मिलते हैं। इसके अभ्यास से छाती खुलती है, जिससे सांस लेना आसान होता है और अस्थमा जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। कंधों और पीठ की अकड़न दूर होती है। कूल्हों और निचले शरीर के जोड़ों की लचक बढ़ती है। रीढ़ की हड्डी सीधी होती है, जिससे पोस्चर सुधरता है। शरीर में तनाव कम होता है और मानसिक शांति मिलती है। हालांकि, गोमुखासन का अभ्यास सही तरीके से और उचित मार्गदर्शन में करना चाहिए। शुरुआत में अगर कठिनाई हो तो धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाएं। गर्भवती महिलाएं, घुटने या कंधे की गंभीर समस्या वाले व्यक्ति डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही करें। --(आईएएनएस
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778572287og.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324284&amp;path_article=6</guid><pubDate>12-May-2026 1:21 PM</pubDate></item><item><title>मौसम बदलते ही होने वाली एलर्जी से बचने के 9 तरीक़े</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323378&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323378&path_article=6]]></link><description>-अमांडा रगेरी

सबसे असरदार दवाओं से लेकर दिक्कत शुरू करने वाले सबसे आम कारणों तक, हम ऐसी वैज्ञानिक सलाह पर नज़र डालते हैं जो आपकी मौसमी तकलीफ़ों को कम कर सकती है.

सूरज चमक रहा है, फूल खिल रहे हैं- लेकिन दुनिया भर के लाखों लोगों की तरह, इस मौसम में आपको भी बार-बार छींक, खांसी और आंखों से पानी आने की समस्या हो सकती है.

दुनिया भर में क़रीब 40 करोड़ लोग एलर्जिक राइनाइटिस से पीड़ित हैं. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हवा में मौजूद एलर्जी पैदा करने वाले तत्व- जैसे पराग (पोलन), नाक के रास्तों को प्रभावित करते हैं. जब यह समस्या ख़ास मौसम में होती है, तो इसे हे फ़ीवर (Hay Fever) कहा जाता है.

उत्तर अमेरिका में इसे मौसमी एलर्जी भी कहा जाता है, क्योंकि इसके लक्षण कई तरह के पराग या एलर्जी पैदा करने वाले अन्य तत्व की वजह से हो सकते हैं.

हे फ़ीवर के मरीज़ों की संख्या और इसके लक्षणों की तीव्रता लगातार बढ़ती दिख रही है. इसका एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा है.

अच्छी बात यह है कि अब आपको यह परेशानी चुपचाप सहने की ज़रूरत नहीं है. पिछले कुछ सालों में हे फ़ीवर के इलाज के लिए कई नई और पहले से ज़्यादा असरदार दवाएं उपलब्ध हुई हैं.

साथ ही, रिसर्च से भी यह साफ़ हुआ है कि इन दवाओं का सही समय और तरीक़े से इस्तेमाल कैसे किया जाए.

यहां हम आपको ऐसे नौ तरीक़े बताते हैं जिनसे आप इस मौसम में ख़ुद को एलर्जी से बचा सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि कब डॉक्टर से संपर्क करना ज़रूरी है.

1. गोली के बजाय नेज़ल स्प्रे का इस्तेमाल करें

जैसे ही हल्की छींक या एलर्जी के लक्षण शुरू होते हैं, हम में से कई लोग क्लैरिटिन या बेनाड्रिल जैसी खाने वाली दवाओं का सहारा लेते हैं. लेकिन ये दवाएं नेज़ल स्प्रे के मुकाबले कम असरदार होती हैं.

ये पहले पचती हैं और फिर पूरे शरीर में फैलती हैं, जिससे नाक तक पहुंचने वाली दवा की मात्रा कम रह जाती है, जबकि असली ज़रूरत वहीं होती है.

वहीं, नेज़ल स्प्रे सीधे नाक में इस्तेमाल किया जाता है और तुरंत असर दिखाता है. यह सूजन को कम करने वाले कारणों पर सीधे काम करता है, जिससे नाक बंद होना, छींक आना और अन्य लक्षणों में बेहतर राहत मिलती है.

इसी कारण अब बच्चों और बड़ों दोनों के लिए नेज़ल स्प्रे को प्राथमिक उपचार यानी फ़र्स्ट लाइन ऑफ़ ट्रीटमेंट के रूप में सुझाया जाता है.

नेज़ल स्प्रे में सबसे ज़्यादा असरदार कॉर्टिकोस्टेरॉइड (corticosteroid) माने जाते हैं, उसके बाद एंटीहिस्टामीन (antihistamine).

लेकिन पिछले कुछ सालों में एक और बेहतर विकल्प सामने आया है- दोनों का मिला-जुला कॉर्टिकोस्टेरॉइड और एंटीहिस्टामीन स्प्रे. यह सबसे ज़्यादा प्रभावी साबित हुआ है और इसके साइड इफ़ेक्ट भी ज़्यादा नहीं होते.

इंपीरियल कॉलेज लंदन और यूके के रॉयल ब्रॉम्पटन अस्पताल में एलर्जी और श्वसन चिकित्सा के एमेरिटस प्रोफ़ेसर स्टीफन डरहम के अनुसार, अक्सर नेज़ल स्प्रे से आंखों के लक्षण भी अपने-आप ठीक हो जाते हैं. लेकिन अगर आंखों में खुजली बनी रहे, तो ओलोपैटाडीन (olopatadine) वाली आई ड्रॉप्स मददगार हो सकती हैं.

2. नाक खोलने वाले स्प्रे (डीकंजेस्टेंट) से बचें

हर नेज़ल स्प्रे एक जैसा नहीं होता. कई लोग बंद नाक से राहत पाने के लिए डीकंजेस्टेंट स्प्रे का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इससे समस्या और बढ़ सकती है.

डीकंजेस्टेंट स्प्रे जिनमें ऑक्सीमेटाज़ोलिन, फिनाइलएफ्रिन या ज़ाइलोमेटाज़ोलिन जैसे तत्व होते हैं, जो नाक की सूजन को कम करके काम करते हैं.

ये खून की नसों को सिकोड़ देते हैं, जिससे नाक के अंदर की सूजी हुई परत छोटी हो जाती है और आपको सांस लेने में आसानी होती है.

लेकिन अगर इनका लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाए- आमतौर पर 5 दिन से ज़्यादा, तो खून की नसें इस दवा पर निर्भर होने लगती हैं. फिर जब आप स्प्रे नहीं लेते, तो नाक की सूजन और ज़्यादा बढ़ जाती है.

इससे नाक पहले से ज़्यादा बंद होने लगती है, जिसे रीबाउंड कंजेशन कहा जाता है. ऐसी स्थिति में कई लोग अनजाने में स्प्रे का और ज़्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं. लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से नुक़सान और आदत पड़ने का ख़तरा भी हो सकता है.

3. अगर एंटीहिस्टामीन की गोली लेते हैं, तो सेकंड-जनरेशन दवा चुनें
अगर आप गोली लेने का फैसला करते हैं, तो नई पीढ़ी की दवाएं चुनें, जैसे सिटिरिज़िन (certirizine - Zyrtec), लोराटाडिन (loratadine - Claritin) या फेक्सोफेनाडिन (fexofenadine - Allegra). ये दवाएं ज़्यादा असरदार होती हैं और पुरानी दवाओं के मुकाबले कम नींद लाती हैं.

पहली पीढ़ी की दवाएं, जैसे डाइफेनहाइड्रामिन (Benadryl), क्लोरफेनिरामिन या डॉक्सिलामिन, अक्सर ज़्यादा सुस्ती और नींद का कारण बनती हैं.

एलर्जी से जुड़ी रिसर्च और शिक्षा पर केंद्रित एनजीओ यूफोरिया के उपाध्यक्ष और यूके स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज हॉस्पिटल लंदन में मानद सलाहकार एलर्जिस्ट और राइनोलॉजिस्ट ग्लेनिस स्कैडिंग कहते हैं, हालांकि कई बार लोग एक साथ गोली और नेज़ल स्प्रे दोनों लेने लगते हैं, लेकिन यह आमतौर पर पैसे की बर्बादी है. नेज़ल कॉर्टिकोस्टेरॉइड के साथ एंटीहिस्टामीन गोली लेने से ज़्यादा अतिरिक्त फ़ायदा नहीं मिलता.

4. एलर्जी का मौसम शुरू होने से पहले ही इलाज शुरू करें

अक्सर लोग तब दवा शुरू करते हैं जब लक्षण दिखने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना सही नहीं है. बेहतर परिणाम के लिए एलर्जी सीज़न शुरू होने से कुछ हफ्ते पहले ही नेज़ल स्प्रे का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए.

एक ट्रायल में पाया गया कि जिन लोगों ने पराग (पोलन) का मौसम शुरू होने से चार हफ्ते पहले स्प्रे इस्तेमाल करना शुरू किया, उन्हें उन लोगों की तुलना में ज़्यादा राहत मिली, जिन्होंने लक्षण आने के बाद इलाज शुरू किया.

5. दवा नियमित रूप से लें, भले ही उस दिन लक्षण न हों
डरहम कहते हैं कि जब लोग कहते हैं कि दवा काम नहीं कर रही, तो इसके पीछे आमतौर पर दो कारण होते हैं- या तो दवा सही तरीके से नहीं ली जा रही होती है, या नियमित रूप से नहीं ली जा रही होती है.

रोज़ एक ही समय पर दवा लें, चाहे उस दिन लक्षण हों या नहीं. साथ ही, दवा की सही मात्रा का पालन करना भी ज़रूरी है.

एक ट्रायल में पाया गया कि जिन लोगों ने कॉर्टिकोस्टेरॉइड और एंटीहिस्टामीन वाले स्प्रे का दिन में दो बार इस्तेमाल किया, उन्हें एक बार इस्तेमाल करने वालों से ज़्यादा फ़ायदा मिला.

6. नेज़ल स्प्रे सही तरीक़े से इस्तेमाल करें
सही दवा चुनने के बाद भी कई लोग नेज़ल स्प्रे ग़लत तरीके़ से इस्तेमाल करते हैं. आम ग़लती यह है कि लोग बोतल को नाक के अंदर बहुत ऊपर तक डाल देते हैं, सिर पीछे झुका लेते हैं, स्प्रे करते हैं और फिर ज़ोर से सूंघते हैं. इससे दवा नाक में रहने की बजाय गले की तरफ चली जाती है.

जबकि दवा को असर करने के लिए नाक के अंदर ही रहना ज़रूरी होता है.

इसके बजाय, नाक को हल्का ऊपर उठाएं और स्प्रे को इस तरह डालें कि उसका रुख़ उसी तरफ के कान की ओर हो. सही एंगल पाने के लिए आप उल्टे हाथ का इस्तेमाल कर सकते हैं.

स्प्रे को नाक के अंदर बहुत ज़्यादा नहीं डालना चाहिए- क़रीब 6 मि.मी., लगभग एक चौथाई इंच ही पर्याप्त है.

इसके बाद सिर को थोड़ा आगे झुकाएं और स्प्रे करें. कोशिश करें कि तुरंत नाक न साफ़ करें. इससे दवा नाक के सही हिस्से तक पहुंचती है और वहीं बनी रहती है, बजाय इसके कि तुरंत बाहर निकल जाए.

7. आई ड्रॉप्स का सही इस्तेमाल ज़रूरी
कई लोग सिर पीछे झुकाकर दवा सीधे आंख के ऊपर डालने की कोशिश करते हैं. लेकिन इससे अक्सर दवा बाहर निकल जाती है या आंख की सतह पर ठीक से फैल नहीं पाती.

इसके बजाय, सिर को एक तरफ झुकाएं, फिर आंख के अंदरूनी कोने में ड्रॉप डालें और हल्की पलक झपकाएं. इससे दवा आंख में बराबर तरीके से फैल जाती है और ज़्यादा असर करती है.

8. एलर्जी बढ़ाने वाले कारणों से बचें
दवा के अलावा, उन चीज़ों से दूरी बनाना भी ज़रूरी है जो एलर्जी बढ़ाती हैं. जैसे- खिड़कियां बंद रखना, यहां तक कि रात में भी, बाहर जाते समय सनग्लासेस या मास्क पहनना.

बाहर से आने के बाद अच्छी तरह हाथ-मुंह धोना या नहाना भी ज़रूरी है. ऐसा इसलिए क्योंकि पराग जैसे एलर्जी पैदा करने वाले तत्व आपके बालों और चेहरे पर चिपक जाते हैं. ये न सिर्फ़ आपको परेशान करते रहते हैं, बल्कि आपके बिस्तर और फ़र्नीचर तक भी फैल सकते हैं.

9. अगर परेशानी बनी रहे, तो डॉक्टर से संपर्क करने में देरी न करें
कई लोग हे फ़ीवर को आम मौसमी समस्या मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं. लेकिन ऐसा करना सही नहीं है और यह नुक़सानदायक भी हो सकता है.

यह समस्या कम समय और लंबे समय दोनों में आपकी जीवन गुणवत्ता, सांस लेने की क्षमता, नींद और बच्चों में पढ़ाई पर असर डाल सकती है.

अमेरिका के न्यू जर्सी में बाल एलर्जी विशेषज्ञ और बच्चों में एलर्जिक राइनाइटिस पर 2023 की एक समीक्षा के लेखक बैरी कोहेन कहते हैं, अक्सर लोग इसे यह कहकर टाल देते हैं कि अरे, ये तो बस नाक बहने की मामूली समस्या है, लेकिन अगर आप साल में तीन महीने तक भी इससे परेशान रहते हैं, तो यह एक गंभीर बात है.

अगर आप सही तरीके से इलाज कर रहे हैं और फिर भी राहत नहीं मिल रही, तो अपने फैमिली डॉक्टर से ज़रूर मिलें.

कुछ मामलों में यह हे फ़ीवर नहीं, बल्कि अस्थमा या सांस से जुड़ी कोई अन्य बीमारी भी हो सकती है.

यहां तक कि अगर यह हे फ़ीवर ही हो, तब भी कुछ लोगों को अन्य इलाज जैसे एलर्जन इम्यूनोथेरेपी से फ़ायदा मिल सकता है. यह इलाज लंबे समय तक गंभीर लक्षणों को कम करने में मदद करता है, जिससे आप बिना परेशानी के गर्मियों का आनंद ले सकें.

अहम जानकारी: इस लेख में दी गई सभी जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से है. इसे आपके अपने डॉक्टर या किसी अन्य स्वास्थ्य‑विशेषज्ञ की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. इस वेबसाइट की सामग्री के आधार पर किसी उपयोगकर्ता द्वारा किए गए किसी भी निदान के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है और न ही इसकी कोई क़ानूनी जवाबदेही है. बीबीसी यहां सूचीबद्ध किसी भी बाहरी इंटरनेट साइट की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है और न ही उन साइटों पर बताए गए या सुझाए गए किसी व्यावसायिक उत्पाद या सेवा का समर्थन करता है. अगर आपको अपने स्वास्थ्य को लेकर किसी भी तरह की चिंता हो, तो हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777785881exels-mojpe-4657018.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323378&amp;path_article=6</guid><pubDate>03-May-2026 10:54 AM</pubDate></item><item><title>तनाव, कब्ज और कमर दर्द से राहत दिलाता है कुर्मासन, पेट की चर्बी कम करने में भी लाभकारी </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322800&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322800&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 26 अप्रैल । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों की दिनचर्या इतनी व्यस्त हो गई है कि तनाव, चिंता, कमर दर्द, कब्ज और थकान जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। घंटों बैठकर काम करने, गलत खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी का असर सीधे शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। ऐसे में योग शरीर को फिट रखने और मानसिक शांति के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका बन चुका है। योग के कई ऐसे आसन हैं जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाने में मदद करते हैं। इन्हीं में से एक है कुर्मासन, जिसे अंग्रेजी में टॉरटॉइज पोज, यानी कछुआ मुद्रा, कहा जाता है। कुर्मासन संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें कुर्म का अर्थ कछुआ और आसन का अर्थ मुद्रा से होता है। इस आसन में शरीर की मुद्रा कुछ हद तक कछुए जैसी दिखाई देती है। यह आसन व्यक्ति को तनाव से दूर करके भीतर की शांति से जोड़ने का काम करता है। कुर्मासन का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाए। फिर पैरों को थोड़ा दूर करके घुटनों को हल्का मोड़ लें। धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए शरीर को आगे की ओर झुकाए और दोनों हाथों को घुटनों के नीचे से बाहर की तरफ निकाले। इसके बाद शरीर को और नीचे झुकाकर छाती और ठुड्डी को जमीन के करीब लाने की कोशिश करें। इस दौरान सांस सामान्य रखें। कुछ देर इस स्थिति में रहने के बाद धीरे-धीरे वापस सामान्य अवस्था में आ जाए। कुर्मासन शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है। यह आसन पीठ और रीढ़ की हड्डी में खिंचाव पैदा करता है, जिससे शरीर का लचीलापन बढ़ता है।

लंबे समय तक बैठकर काम करने वाले लोगों के लिए यह आसन काफी लाभकारी माना जाता है, क्योंकि यह पीठ और कमर की जकड़न को कम करने में मदद करता है। इसके नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है। कुर्मासन को पाचन तंत्र के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है। यह पेट की मांसपेशियों पर दबाव बनाता है, जिससे पाचन क्रिया बेहतर होती है। गैस, कब्ज और अपच जैसी समस्याओं में भी यह आसन राहत देने में मदद करता है। यह आसन पैंक्रियास को सक्रिय करने में मदद करता है, जिससे शरीर में इंसुलिन का संतुलन बेहतर हो सकता है। इसे मधुमेह से जूझ रहे लोगों के लिए भी लाभकारी माना जाता है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी कुर्मासन को बेहद प्रभावी योगासन माना जाता है। यह मन को शांत करने और तनाव कम करने में मदद करता है। लगातार चिंता और मानसिक दबाव महसूस करने वाले लोगों के लिए यह आसन राहत देने वाला साबित हो सकता है। इसका अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है और दिमाग शांत रहता है। कुर्मासन करते समय सावधानी बरतना जरूरी है। जिन लोगों को घुटनों, कमर, कंधे या रीढ़ की हड्डी में दर्द की समस्या है, उन्हें यह आसन बिना विशेषज्ञ की सलाह के नहीं करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं और गंभीर गठिया या सायटिका से पीड़ित लोगों को भी इससे बचने की सलाह दी जाती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777190970og.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322800&amp;path_article=6</guid><pubDate>26-Apr-2026 1:39 PM</pubDate></item><item><title>एस्पिरिन से कैंसर का ख़तरा कम होता है, जानिए कैसे</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322513&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322513&path_article=6]]></link><description>4,000 साल पुरानी यह दवा, जो आमतौर पर दर्द के इलाज में इस्तेमाल होती है, कुछ ख़ास तरह के ट्यूमर को बनने से रोकती है और उन्हें शरीर में फैलने से भी रोकती है.

ये ऐसे नतीजे हैं जो अब स्वास्थ्य नीतियों में भी बदलाव ला रहे हैं.

ब्रिटेन के रहने वाले निक जेम्स करीब 40-45 साल के हैं और फ़र्नीचर बनाने का काम करते हैं. उन्हें अपनी सेहत को लेकर पहली बार चिंता तब हुई, जब उनकी मां की मौत कैंसर से हो गई. इसके बाद उनके भाई और परिवार के कई दूसरे लोगों को भी आंतों का कैंसर हो गया. उन्होंने जेनेटिक टेस्ट करवाने का फैसला किया, जिसमें पता चला कि उनके अंदर एक ख़राब जीन है, जो लिंच सिंड्रोम नाम की बीमारी की वजह बनता है. यह बीमारी इस तरह के कैंसर होने का ख़तरा काफ़ी बढ़ा देती है.

जेम्स को मदद एक बिल्कुल अनपेक्षित जगह से मिली. वह पहले व्यक्ति बने जिन्होंने एक ऐसे क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा लिया, जिसका मकसद यह जांचना था कि आमतौर पर बिना पर्चे के मिलने वाली दर्द की दवा एस्पिरिन की रोज़ ली जाने वाली डोज़, क्या कैंसर होने से बचा सकती है.

लिंच सिंड्रोम से पीड़ित 10 से 80% लोगों को, जीन में म्यूटेशन के प्रकार के हिसाब से,ज़िंदगी में कभी न कभी आंतों का कैंसर हो सकता है. लेकिन जेम्स के मामले में अब तक सब कुछ ठीक दिख रहा है. न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के क्लिनिकल जेनेटिक्स के प्रोफ़ेसर जॉन बर्न ने इस ट्रायल की अगुआई की थी. वह कहते हैं, वह पिछले 10 साल से हमारे साथ एस्पिरिन ले रहे हैं, और अब तक उन्हें कोई कैंसर नहीं हुआ है.

यह बात सुनने में लगभग नामुमकिन लगती है, लेकिन काफ़ी समय से इसके संकेत मिलते रहे हैं कि यह दवा कोलोरेक्टल कैंसर के फैलने की संभावना को कम कर सकती है, या शायद होने से ही रोक सकती है. बीते एक साल में, कई ट्रायल्स और स्टडीज़ ने इस साक्ष्य को और मज़बूत किया है.

कुछ देशों ने तो अपनी मेडिकल गाइडलाइंस तक बदल दी हैं और जिन लोगों को सबसे ज़्यादा ख़तरा है, उनके लिए इस गोली को सुरक्षा की पहली लाइन में शामिल किया है (हालांकि विशेषज्ञ ज़ोर देकर कहते हैं कि ऐसा सिर्फ़ डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाना चाहिए).

और अब हम धीरे-धीरे यह भी समझने लगे हैं कि आख़िर ये क्यों इतनी असरदार है.

बहुत पुरानी जड़ें

हमारी सबसे पुरानी और सबसे असरदार दवाओं में से एक की कहानी में, ताज़ा खोजें, एक चौंकाने वाला नया मोड़ लेकर आई हैं.

उन्नीसवीं सदी के आखिर में, पुरातत्वविदों को प्राचीन मेसोपोटामिया के शहर निप्पुर, जो आज के इराक में है, से4,400 साल पुरानी मिट्टी की टैबलेट्समिली थीं. इनमें वनस्पति, जानवरों और खनिजों से बनी अलग अलग दवाओं की सूची दर्ज थी.

इनमें विलो (बेंत) के पेड़ से निकाले गए एक पदार्थ के इस्तेमाल के निर्देश भी शामिल थे. आज हम जानते हैं कि इसमें सैलिसिन नाम का रसायन होता है, जिसे शरीर सैलिसिलिक एसिड में बदल सकता है, और यह दर्द को शांत करने में मदद करता है.

इसकी बनावट आधुनिक एस्पिरिन, यानी एसीटाइलसैलिसिलिक एसिड, से काफ़ी मिलती जुलती है, लेकिन यह पेट मेंज़्यादा दिक्कतेंपैदा करने वाली होती है.दूसरी प्राचीन सभ्यताओं, जैसे मिस्र, यूनान और रोम, में भी इस नुस्खे का इस्तेमाल किया जाता था.

इस यौगिक पर आधुनिक शोध की शुरुआत 1763 में हुई, जब अंग्रेज़ पादरी एडवर्ड स्टोन नेरॉयल सोसाइटी को चिट्ठी लिखकरसूखी और पिसी हुई विलो की छाल के बुखार कम करने वाले गुणों के बारे में बताया.

करीब एक सदी बाद, वैज्ञानिकों ने सैलिसिलिक एसिड को कम नुक़सान पहुंचाने वाले सीटाइलसैलिसिलिक एसिड के रूप में तैयार करने में सफलता हासिल की, और इसे बायर नाम के ब्रांड के तहत बाज़ार में उतारा.

एक और सदी बाद, वैज्ञानिकों ने यह भी देखना शुरू किया कि एस्पिरिन के कुछ अनपेक्षित फ़ायदे दिल से जुड़ी बीमारियों को रोकने में भी हो सकते हैं. यह खून को पतला करके और प्लेटलेट्स को कम चिपचिपा बनाकर खून के थक्के बनने के ख़तरे को घटाती है.

इसी वजह से, यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस जैसी संस्थाएं दिल के दौरे या स्ट्रोक के ज़्यादा ख़तरे के दायरे में आने वाले लोगों कोरोज़ाना कम मात्रा मेंएस्पिरिन लेने की सलाह देती हैं.

1972 तक आते आते, इसके संभावित फ़ायदेकैंसर की रोकथाम तक भीपहुंच गए. चूहों पर किए गए एक चर्चित अध्ययन ने ध्यान खींचा, जिनमें ट्यूमर वाली कोशिकाएं डाली गई थीं. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पाया कि चूहों के पीने के पानी में एस्पिरिन मिलाने से कैंसर के पूरे शरीर में फैलने का ख़तरा, जिसे मेटास्टेसिस कहा जाता है, उन चूहों की तुलना में काफ़ी कम हो गया, जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी.

हालांकि इस खोज से काफ़ी उत्साह का संचार हुआ, लेकिन यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में ऑन्कोलॉजी और मेडिकल ट्रायल्स की प्रोफ़ेसर रुथ लैंगली कहती हैं, हालांकि तुरंत यह साफ़ नहीं हो पाया था कि इसका क्लिनिकल प्रैक्टिस पर क्या असर पड़ेगा.

और फिर यह भी साफ़ नहीं था कि यह दवा इंसानों में भी वही असर दिखाएगी या नहीं- इसलिए यह खोज किसी ज़िंदगी को बदल देने वाले इलाज की बजाय बस एक दिलचस्प लेकिन सीमित जानकारी बनकर रह गई.

2010 में एक अहम मोड़ आया, जब ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर पीटर रॉथवेल ने दिल से जुड़ी बीमारियों को रोकने के लिए एस्पिरिन पर पहले से मौजूद बहुत ज़्यादा डेटा को दोबारा खंगाला. अपने विश्लेषण में उन्होंने पाया कि यह दवा न सिर्फ़कैंसर होने के मामलों को कम करती है, बल्कि उसके फैलाव को भी रोकती है. इससे एस्पिरिन की बीमारी से लड़ने की ताक़त और इसके पीछे के कारणों को समझने में दोबारा रुचि पैदा हुई.

हालांकि एक बड़ी चुनौती यह है कि आम आबादी में साबित किया जाए कि एस्पिरिन कैंसर को रोक सकती है. आदर्श स्थिति में, शोधकर्ता लोगों की एक बड़ी संख्या को शामिल करते. आधे लोगों को एस्पिरिन दी जाती, और बाकी को एक नकली गोली (प्लेसिबो)- और फिर देखा जाता कि किनमें बीमारी की दर ज़्यादा है.

लेकिन कैंसर को विकसित होने में ही कई दशक लग सकते हैं, यानी ऐसा रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल पूरा होने में बहुत लंबा समय और बहुत ज़्यादा खर्च लगेगा. स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में सर्जरी की प्रोफ़ेसर एना मार्टलिंग कहती हैं, सच कहूं तो, यह लगभग नामुमकिन है.

इसी वजह से वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान ख़ास समूहों पर केंद्रित किया है, जैसे कि वे लोग जिन्हें पहले ही कैंसर हो चुका है, या जिनमें जेनेटिक कारणों से कैंसर होने का ख़तरा ज़्यादा है.


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776928651ownload_(2).jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322513&amp;path_article=6</guid><pubDate>23-Apr-2026 12:47 PM</pubDate></item><item><title>कंधों और पीठ की मांसपेशियों को लचीला बनाने में सहायक है अष्टांग नमस्कारासन</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322250&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322250&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 20 अप्रैल । 21 जून को होने वाले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से पहले लगातार आयुष मंत्रालय अच्छी सेहत और संतुलित जीवन के लिए लोगों को जागरूक कर रहा है। आयुष मंत्रालय की तरफ से योग के फायदे और उसे सही तरीके से करने की जानकारी दी जा रही है। मंत्रालय की तरफ से 365 डे योगा हैशटैग भी चलाया जा रहा है और देश के अलग-अलग राज्यों में मई के महीने में योग की कार्यशाला भी आयोजित की जाएंगी। अब मंत्रालय ने अष्टांग नमस्कारासन के फायदे बताए हैं, जिसे करने से शरीर संतुलित रहता है। आयुष मंत्रालय की तरफ से जारी पोस्ट के मुताबिक, अष्टांग नमस्कारासन संतुलन, शक्ति और समर्पण सिखाता है और हर कदम के साथ आंतरिक सामंजस्य के करीब लाता है। यह शरीर को स्थिर करता है और सांसों को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। इसके लिए पहले जमीन पर उल्टा लेट जाएं और ठोड़ी को जमीन पर टिका लें। पैरों को बिल्कुल सीधा रखें और कूल्हे वाले हिस्से को धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठाएं।

ध्यान रखें कि जमीन पर सिर्फ हाथ, ठोड़ी, छाती, पैर की उंगलियां और घुटने ही टिके होने चाहिए। कूल्हे वाला हिस्सा ऊंचा उठा होना चाहिए। इस पोज को कुछ देर होल्ड करके रखें और गहरी सांस लें। इस पोजीशन से सीधे कोबरा पोज में वापस लौटें और कमर पर खिंचाव महसूस करें। इस पोज को करने से कमर से लेकर कंधे की मांसपेशियों में आराम मिलता है और अकड़न कम होती है। अगर आप लंबे समय तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम करते हैं, तो यह आपके लिए लाभकारी रहेगा। अष्टांग नमस्कारासन सूर्य नमस्कार का छठा आसन है, जिसे आठ अंगों वाला आसन भी कहते हैं। इसमें शरीर के आठ अंगदोनों पैर के अंगूठे, दोनों घुटने, दोनों हथेलियां, छाती और ठोड़ी जमीन को स्पर्श करते हैं। यह योग शक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। अष्टांग नमस्कारासन करने से बाजुओं, कंधों और पीठ की मांसपेशियां मजबूत और लचीली बनती हैं और हड्डियों से चटचट की आवाज आने की परेशानी में भी राहत मिलती है। इसके साथ ही यह मांसपेशियों में रक्त का संचार भी ठीक करती है। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776669601og.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322250&amp;path_article=6</guid><pubDate>20-Apr-2026 12:50 PM</pubDate></item><item><title>गर्मियों में गन्ने का जूस हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं, इन बातों का रखें ध्यान </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322160&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322160&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 19 अप्रैल। गर्मियों का मौसम आते ही गन्ने के जूस की डिमांड बढ़ जाती है। इसका स्वाद मीठा और ताजगी भरा होता है, जिससे शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती है। कई लोग इसे सेहत के लिए अच्छा मानकर नियमित रूप से पीते हैं। लेकिन वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो हर चीज हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होती। गन्ने का जूस भी कुछ लोगों के लिए फायदेमंद होने के बजाय नुकसानदायक साबित हो सकता है। जिन लोगों को शुगर की बीमारी है, उनके लिए गन्ने का जूस खतरनाक है। गन्ने के जूस में ग्लूकोज और सुक्रोज की मात्रा काफी ज्यादा होती है। जब यह शरीर में जाता है तो तेजी से खून में शुगर का स्तर बढ़ा देता है, जिससे स्थिति जोखिम भरी हो सकती है। अचानक बढ़ा हुआ शुगर का स्तर थकान, चक्कर या अन्य समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए डॉक्टर आमतौर पर ऐसे मरीजों को मीठे पेय से दूरी बनाने की सलाह देते हैं। वहीं वजन कम करने वालों या जो पहले से मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए भी गन्ने का जूस सही विकल्प नहीं है।

गन्ने का जूस भले ही प्राकृतिक हो, लेकिन इसमें कैलोरी की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो फैट में बदल सकता है। इसके अलावा, मीठे पेय पदार्थ दिमाग में भूख बढ़ाने वाले संकेत भी भेजते हैं, जिससे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा खाना खाता है। इस कारण वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए गन्ने का जूस रुकावट बन सकता है। जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर होता है, उन्हें भी गन्ने का जूस सावधानी से पीना चाहिए। कई बार यह जूस खुले में तैयार किया जाता है। ऐसे में इसमें बैक्टीरिया या अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीव मिल सकते हैं। यह पेट में गैस, सूजन, दर्द या दस्त जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। गन्ने का जूस किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए नुकसानदायक है। इन बीमारियों से ग्रसित शरीर में पहले से ही शरीर से विषैले तत्वों को निकालना और पोषक तत्वों को संतुलित रखने जैसे कार्यों की क्षमता कम होती है। ऐसे में ज्यादा शुगर इन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। इससे शरीर में संतुलन बिगड़ सकता है और समस्या गंभीर रूप ले सकती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776583684ann.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322160&amp;path_article=6</guid><pubDate>19-Apr-2026 12:58 PM</pubDate></item><item><title>बच्चों के लिए संजीवनी है जायफल, आयुर्वेद से जाने सेवन से पहले की सावधानियां </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320625&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320625&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 2 अप्रैल । बदलते मौसम का प्रभाव बच्चों से लेकर बड़ों पर पड़ता है, लेकिन छोटे बच्चे बदलते मौसम की मार सबसे ज्यादा झेलते हैं। पेट खराब होना या सिर्फ जुकाम होना, ये समस्याएं बच्चों को सबसे अधिक परेशान करती हैं, लेकिन आयुर्वेद में कुछ ऐसे आराम उपाय बताए गए हैं, जिससे बिना किसी नकारात्मक प्रभाव के बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। आयुर्वेद में जायफल को इसका एक मात्र उपाय बताया है। आयुर्वेद में जायफल को वात-शामक, पाचक और मेध्य माना गया है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता से लेकर मस्तिष्क को पोषण देने में मदद करता है। इससे पेट से जुड़ी परेशानी जैसे गैस में भी आराम मिलता है, लेकिन उसके सेवन का तरीका बहुत कम लोग ही जानते हैं। आयुर्वेद में माना गया है कि किसी औषधि को उचित संस्कार देने से उसके गुण अधिक संतुलित और शरीर के लिए कोमल हो जाते हैं, क्योंकि जायफल स्वभाव से तीक्ष्ण माना जाता है। इसलिए बच्चों के लिए उसे इस प्रकार तैयार किया जाता था। पुराने समय से ही खासकर बच्चों के लिए जायफल को सीधे नहीं दिया जाता था।

पहले उसे दूध में उबाला जाता, फिर दही में रखा जाता और अंत में घी में पकाया जाता था। इसके बाद ही उसे दूध में घिसकर बच्चों को बहुत थोड़ी मात्रा में दिया जाता था। सबसे पहले जायफल को थोड़ी देर दूध में उबाला जाता है और फिर कुछ घंटों के लिए दही में थोड़ा दिया जाता है और आखिर में घी में पकाया जाता है। इससे जायफल की गर्म और तीखी तासीर कम होती है, और इसके औषधीय गुण भी बढ़ जाते हैं। इसके चुटकीभर सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, बैचेनी कम होती है। पेट से जुड़ी समस्याएं कम होती है और सर्दी और खांसी-जुकाम में आराम मिलता है। अगर बच्चा ठीक से सो नहीं पाता है, तब भी कम मात्रा में इसे बच्चों को दिया जाता है। यह तंत्रिक तंत्र को शांत करके बच्चों को गहरी नींद लाने में मदद करता है। ध्यान रखने वाली बात 6 महीने से कम उम्र के बच्चे को बिना चिकित्सक की सलाह के न दें और अगर बच्चे का पेट खराब है, तब भी इसे देने से बचें। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/17751238993.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320625&amp;path_article=6</guid><pubDate>02-Apr-2026 3:28 PM</pubDate></item><item><title>गर्मियों में करेले का सेवन फायदेमंद, डायबिटीज-पाचन की समस्याओं से दिलाएगा राहत </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320411&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320411&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 31 मार्च । गर्मी का मौसम शुरू होते ही पाचन संबंधी समस्याएं, ब्लड शुगर बढ़ना, थकान और कमजोरी आम हो जाती है। ऐसे में हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार गर्मी के मौसम में करेले का सेवन सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। औषधीय गुणों से भरपूर करेला शरीर की कई बीमारियों से बचाव करता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार, करेला विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, बीटा कैरोटीन, आयरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम और मैंगनीज जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से भरपूर होता है। गर्मियों में यह पेट को ठंडक देता है, पाचन क्रिया सुधारता है और शरीर की उष्णता को कम करता है। गर्मियों में करेले के सेवन से कई लाभ मिलते हैं। करेला ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में बहुत प्रभावी है। गर्मी में जब ब्लड शुगर बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है, तब करेले का जूस या सब्जी नियमित रूप से लेने से शुगर लेवल बैलेंस रहता है। साथ ही गर्मी में अपच, गैस, कब्ज और पेट दर्द की समस्या आम है। ऐसे में करेला पेट साफ रखता है और पाचन शक्ति बढ़ाता है।

करेले का जूस पेट दर्द में तुरंत राहत देता है। करेला प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है। यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी निकालता है और डिहाइड्रेशन से बचाता है। इसमें मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट गर्मियों में कमजोर पड़ रहे इम्यून सिस्टम को मजबूत रखते हैं। साथ ही करेला खून को शुद्ध करता है और मेटाबॉलिज्म तेज करके वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है। करेला न सिर्फ गर्मी की समस्याओं से बचाता है बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ रहने में भी मदद करता है। गर्मियों में करेले का जूस सुबह खाली पेट पीना सबसे अच्छा है। साथ ही करेले की सब्जी या सुखाकर भुना करेला भी लिया जा सकता है। जिन लोगों को किसी तरह की एलर्जी है, उन्हें डॉक्टर की सलाह से इसका सेवन करना चाहिए। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1774950333arela.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320411&amp;path_article=6</guid><pubDate>31-Mar-2026 3:15 PM</pubDate></item><item><title>क्या पीरियड लीव महिलाओं के लिए भेदभाव का नया कारण बन सकती है</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320307&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320307&path_article=6]]></link><description>सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने भारत में पीरियड लीव को लेकर पहले से जारी बहस को और तेज कर दिया है. हालांकि, जहां इसका प्रावधान है वहां भी इसका इस्तेमाल ना के बराबर होता है, इसका कारण समझते हैं.
डॉयचे वैले पर रीतिका का लिखा-

हाल की ही बात है जबसे भारतीय समाज में पीरियड्स पर पहले से खुलकर बात होने लगी है. ज्यादातर लोग अब इसे किसी बीमारी की तरह नहीं बल्कि एक सामान्य जैविक प्रक्रिया के रूप में समझने लगे हैं. लेकिन अब भी कई लोग मेंस्ट्रुएशन से गुजरने वाले नौकरीपेशा लोगों के लिए एक या दो दिन की अतिरिक्त पीरियड लीव का प्रावधान होने को गैरजरूरी या विशेषाधिकार मानते हैं.

हाल ही में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि अगर वे मेंस्ट्रुअल लीव से जुड़ा कानून बना देते हैं तो इससे महिलाओं के करियर पर असर होगा, उन्हें कोई नौकरी नहीं देना चाहेगा. मेंस्ट्रुअल लीव के विरोध में यह तर्क बार बार दिया जाता है कि अगर ये प्रावधान बना तो इससे कार्यस्थल पर पीरियड्स में छुट्टी लेने वालों के खिलाफ भेदभाव और बढ़ जाएगा. ध्यान देने वाली बात है कि प्रावधान बना देने के कारण होने वाले भेदभाव को लेकर कोई पुख्ता रिसर्च तो सामने नहीं आई है. लेकिन, यह जरूर है कि जहां यह सुविधा मिली हुई है वहां भी महिलाएं और लड़कियां इसका इस्तेमाल करने से कतराती हैं, और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह भेदभाव का डर होता है.



तमिलनाडु में 18 साल से अधिक उम्र की 955 छात्राओं पर 2023 में एक सर्वे हुआ. सर्वे में शामिल 82 फीसदी लोगों ने कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव की पॉलिसी इस मुद्दे को सामान्य बनाने में मदद करेगी, कार्यस्थल पर उनके प्रदर्शन को भी बेहतर करने में मदद मिलेगी. हालांकि, उनकी चिंताएं भी थीं कि इससे वर्कप्लेस पर उनके जेंडर के आधार पर पहले से ही मौजूद स्टीरियोटाइप और मजबूत हो सकते हैं.

24 साल की वर्षा कहती हैं, पीरियड्स के दौरान खासकर दूसरे दिन तो काम पर जाने का बिल्कुल मन नहीं होता. लेकिन अगर मेंस्ट्रुअल लीव मिलने भी लगी तो मुझे नहीं पता कि मैं कितना सहज महसूस करूंगी इसका इस्तेमाल करने में. मैं वर्कप्लेस पर कमजोर नहीं दिखना चाहती. वर्षा पटना के एक प्राइवेट स्कूल में बतौर टीचर काम करती हैं और पढ़ाई भी कर रही हैं. उनका मानना है कि बस कानून बना देने से मेंस्ट्रुअल लीव लेना आसान नहीं हो जाएगा. वह यह भी कहती हैं कि किसी भी पीढ़ी के लोग हों, चाहे जेनजी हो या बूमर, पीरियड्स पर खुलकर बात करने में कोई खास फर्क नहीं आया है.

1920केदशकसेशुरूहुईबहस2026मेंकितनीबदली

मेंस्ट्रुअल लीव के प्रावधान से महिलाओं के खिलाफ भेदभाव बढ़ने का तर्क 1920 के दशक से ही दिया जा रहा है. सोवियत यूनियन ने 1922 में मांओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए महिला कामगारों के लिए दो से तीन दिनों की मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी बनाई थी. लेकिन यह पॉलिसी पांच सालों के अंदर ही वापस ले ली गई थी. इसके पीछे पहली वजह थी कि महिलाएं इसका इस्तेमाल बिलकुल नहीं करती थीं. दूसरी वजह यह थी कि इस पॉलिसी के कारण कार्यस्थल पर उनके खिलाफ भेदभाव बढ़ने लगा था. कंपनियों को अपनी घटती प्रोडक्टिविटी की चिंता सताने लगी थी.

यह 1920 के दशक की बात है इसलिए उस दौरान पीरियड्स पर मौजूद रूढ़िवादी सोच को लेकर उतनी हैरानी नहीं होती. लेकिन करीब सौ साल बीत जाने के बाद भी यह रूढ़िवादी सोच मौजूद नजर आती है. जापान वह पहला देश था जहां 1947 में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को मेंस्ट्रुअल लीव देने की शुरुआत हुई थी. हालांकि, ये छुट्टियां पेड होंगी या अनपेड यह साफ नहीं किया गया. 2020 की एक रिसर्च बताती है कि जापान की केवल 30 फीसदी कंपनियों ने ही महिलाओं को मेंस्ट्रुअल लीव की पूरी या आधी सैलरी दी. यहां 1 फीसदी से भी कम महिलाएं इस लीव का इस्तेमाल करती हैं. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह भी कार्यस्थल पर भेदभाव बढ़ने का डर है.

दक्षिण कोरिया में, इन छुट्टियों का इस्तेमाल 2013 में 23 फीसदी के आसपास था जो 2017 में घटकर 19.7 फीसदी पर जा पहुंचा. पूरे यूरोपीय यूनियन में सिर्फ स्पेन में यह कानून मौजूद है और और इसका खर्च स्पेन की सरकार उठाती है. इसके बावजूद शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि2.6 करोड़ से अधिक के वर्कफोर्स वाले स्पेन में हर दिन पांच से भी कम लोग इस छुट्टी का इस्तेमाल करते हैं.

मेंस्ट्रुअललीवयानीकरियरकानुकसान?

रंजीता प्रियदर्शिनी पेड पीरियड लीव की फाउंडर हैं. वह ओडिशा से हैं और मेंस्ट्रुअल लीव के अधिकार के लिए एक बड़ा अभियान चला रही हैं. साल 2022 में जब वे ओडिशा की मेटल इंडस्ट्री में काम कर रही थीं, तब एक दिन पीरियड्स के तेज दर्द की वजह से उन्होंने अपने बॉस से आधे दिन की छुट्टी मांगी. हिचक की वजह से उन्होंने पीरियड्स शब्द का इस्तेमाल न करके इसे वीमन प्रॉब्लम बताया. इस पर उनके बॉस ने यहां तक कह दिया कि अगर मेरा बस चलता तो मैं औरतों को काम पर ही नहीं रखता. साथ ही कहा कि सरकारों ने औरतों को कुछ ज्यादा ही अधिकार दे दिए हैं.

वह बताती हैं, जब मैंने घर जाने की बात कही, तो उसे एक बहाना बताया गया और कहा कि इस्तीफा देकर चली जाओ. मैंने इस्तीफा देना मंजूर किया. ताज्जुब की बात यह थी कि मैं उस वक्त भी पीरियड्स के लिए जागरूकता का काम कर रही थीं. फिर भी उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए मैं अपने बॉस को अपनी सीट दिखाने ले गई जिस पर खून लगा था. आधे दिन की छुट्टी के लिए रंजीता को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी.

जेंडर के आधार पर कार्यस्थल पर मिलने वाले विशेषाधिकार अक्सर महिलाओं के करियर और आर्थिक विकास में सबसे बड़ी सजा बन जाते हैं. उदाहरण के तौर पर मैटरनिटी लीव लेने वाली महिलाओं को इन छुट्टियों के बदले एक पेनल्टी चुकानी पड़ती है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने इसे मदरहुड पेनल्टी का नाम दिया है. फोरम के मुताबिक 80 फीसदी जेंडर-पे गैप मदरहुड पेनल्टी के रूप में मौजूद है.

तमाम कोशिशों के बावजूद पीरियड्स आज भी एक निजी मुद्दा माना जाता है. मेंस्ट्रुअल लीव लेने का मतलब होता है काम करने की जगह पर अपने पीरियड्स पर होने की जानकारी साझा करना. रंजीता कहती हैं, हैरान करने वाली बात यह है कि मेंस्ट्रुअल लीव के मुद्दे पर मुझे लड़कियों से ही विरोध का सामना करना पड़ा. मुझे कहा गया कि अगर मुझे छुट्टी चाहिए तो मैं लूं, दूसरों को खींचने की क्या जरूरत है. उन लड़कियों के अंदर हिचक थी कि अब उन्हें बताकर पीरियड्स लीव लेनी पड़ेगी.

रूढ़िवादीसोचकानुकसानसिर्फमहिलाओंकोनहीं

मेंस्ट्रुअल लीव के प्रावधान ना होने और इस मुद्दे पर असंवेदनशीलता के नुकसान अर्थव्यवस्था को भी उठाने पड़ते हैं. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने 32,000 महिलाओं पर किए सर्वे में पाया कि पीरियड के दौरान या आसपास उससे जुड़े लक्षणों से गुजरने वाली महिलाएं 30 से 40 फीसदी कम कुशल महसूस कर रही थीं. अंग्रेजी में इसके लिए शब्द है - मेंस्ट्रुअल रिलेटेड प्रीसेंटीइज्म, यानी वह वक्त जब पीरियड्स के दौरान कम प्रोडक्टिव महसूस करते के बावजूद महिलाओं को प्रेजेंट रहना होता है. खासकर एंडोमेट्रिओसिस, प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर जैसी परेशानियों के साथ जीने वालों के लिए मेंस्ट्रुअल लीव का ना होना कामकाज को और मुश्किल बना देता है.

रंजीता ने साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया और यूएन जनरल असेंबली के दौरान 40 देशों के प्रमुखों को मेमोरेंडम भी सौंपा. वे अब तक भारत के 24 राज्यों की सरकारों से मिल चुकी हैं और उन्हें 384 सांसदों का समर्थन भी मिला है. 2025 मेंजब कर्नाटक सरकारमेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान लेकर आई तो इसके पीछे भी रंजीता प्रियदर्शिनी की कोशिशें ही थीं. वह यह भी कहती हैं कि मेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान लाना सरकारों की जिम्मेदारी है ना कि अदालतों की. भेदभाव के डर से ऐसे प्रावधानों को ना लाना कोई समाधान नहीं है.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1774859471w.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320307&amp;path_article=6</guid><pubDate>30-Mar-2026 2:01 PM</pubDate></item><item><title>एक ही सांस में पानी पीना पड़ सकता है भारी, किडनी पर पड़ सकता है बुरा असर </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320069&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320069&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 27 मार्च । भागदौड़ भरी जिंदगी में थकान होना लाजिमी है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि कई लोग थकान को मिटाने के लिए पानी की पूरी बोतल एक ही बार में खत्म कर देते हैं। खासकर युवा एक सांस में पूरा पानी पीने की आदत को मजेदार समझते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो यह आदत खतरनाक है। वैज्ञानिक रिसर्च के मुताबिक, हमारा शरीर पानी को धीरे-धीरे अवशोषित करता है। शरीर में मौजूद किडनी का काम खून को साफ करना और जरूरी तत्वों का संतुलन बनाए रखना होता है। किडनी के अंदर छोटे-छोटे फिल्टर होते हैं, जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है। जब हम एकदम से बहुत ज्यादा पानी पी लेते हैं, तो किडनी पर अचानक अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस दबाव के कारण किडनी को पानी को फिल्टर करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे लंबे समय में उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक बार में ज्यादा पानी पीना शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को भी बिगाड़ सकता है। शरीर में सोडियम और अन्य मिनरल्स का संतुलन बहुत जरूरी होता है। जब अचानक बहुत सारा पानी शरीर में पहुंचता है, तो यह संतुलन गड़बड़ा सकता है, जिससे चक्कर आना, कमजोरी या उल्टी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

कुछ मामलों में यह स्थिति गंभीर भी हो सकती है, जिसे मेडिकल भाषा में वाटर इंटॉक्सिकेशन कहा जाता है। इसके अलावा, पानी की कमी और गलत आदतें जैसे पेशाब को लंबे समय तक रोककर रखना भी शरीर के लिए नुकसानदायक है। जब कोई व्यक्ति बार-बार पेशाब रोकता है, तो इससे मूत्र मार्ग में बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ जाता है। यह धीरे-धीरे इंफेक्शन का रूप ले सकता है और अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो इसका असर किडनी तक पहुंच सकता है। गर्मियों के मौसम में प्यास ज्यादा लगना सामान्य बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक बार में बहुत सारा पानी पी लिया जाए। शरीर को पानी की जरूरत लगातार और संतुलित मात्रा में होती है। जब हम थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी पीते हैं, तो शरीर उसे बेहतर तरीके से उपयोग कर पाता है। इससे न केवल किडनी पर दबाव कम पड़ता है, बल्कि शरीर हाइड्रेट भी बना रहता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पानी हमेशा आराम से, बैठकर और घूंट में पीना चाहिए। इससे शरीर को पानी को अवशोषित करने का समय मिलता है और वह अपने सभी जरूरी कार्य सही तरीके से कर पाता है। --आईएएनएस
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1774600087EHT.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=320069&amp;path_article=6</guid><pubDate>27-Mar-2026 1:58 PM</pubDate></item><item><title>मासिक धर्म में अत्यधिक रक्तस्राव? आयुर्वेद से जानें उपाय और बचाव </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319878&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319878&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 25 मार्च । मासिक धर्म के दौरान अगर अत्यधिक या असामयिक रक्तस्राव को मेनोरेजिया कहा जाता है। इसे समझना जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ शरीर की कमजोरी ही नहीं, बल्कि जीवनशैली और खान-पान की आदतों से भी जुड़ा होता है। मेनोरेजिया या असामान्य रक्तस्राव को कंट्रोल करना मुश्किल नहीं है। सही खान-पान, स्वच्छता, हल्की एक्सरसाइज और आयुर्वेदिक घरेलू उपाय इसे नियंत्रित करने में काफी मदद करते हैं। आयुर्वेद में इसे कंट्रोल करने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे काफी कारगर माने जाते हैं। जैसे कि आंवला का जूस अगर गुनगुना करके गुड़ के साथ दिन में दो बार लिया जाए, तो यह रक्तस्राव को संतुलित करने में मदद करता है। इसी तरह कच्चे केले का पेस्ट गुड़ के साथ सेवन करना या यष्टिमधु यानी मुलेठी का पाउडर चावल के पानी के साथ लेना भी लाभकारी होता है।

कुछ लोग अशोका की छाल उबालकर दूध में मिलाकर पीते हैं, जिससे मासिक धर्म का समय नियमित रहता है और खून का बहाव नियंत्रित होता है। इन उपायों को लगभग 1-2 हफ्ते तक लगातार अपनाने की सलाह दी जाती है, या जब तक लक्षण कम नहीं हो जाते। इसके अलावा खान-पान और जीवनशैली पर ध्यान देना भी बहुत जरूरी है। गर्म और पौष्टिक भोजन, हल्का लेकिन संपूर्ण आहार, हरी सब्जियां, फलों, दूध और घी का सेवन करना लाभकारी होता है। महीने के दौरान साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, कपड़े और सैनिटरी पैड स्वच्छ हों और पानी का इस्तेमाल भी साफ पानी से ही करें। हल्की एक्सरसाइज और घरेलू कामकाज करना शरीर को सक्रिय रखता है और मासिक धर्म के दौरान थकान कम करता है। मासिक धर्म के दौरान कुछ गुस्सा, तनाव, झगड़ा या ज्यादा शारीरिक श्रम से बचें। हल्की पेट दर्द या शरीर में दर्द के लिए तुरंत दवा लेने की बजाय घरेलू नुस्खे अपनाएं, जैसे कि जीरा पाउडर को गर्म दूध में मिलाकर पीना या दर्द वाली जगह पर हॉट वॉटर बैग रखना। ज्यादा मसालेदार, तैलीय, भारी, खट्टा या नमकीन भोजन से परहेज करें। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1774422414k.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319878&amp;path_article=6</guid><pubDate>25-Mar-2026 12:36 PM</pubDate></item><item><title>हरी सब्जियों के शौकीन लोग पहले जान लें खाने का सही तरीका, आयुर्वेद में बताए गए हैं नियम </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319077&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319077&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 16 मार्च । हमारे बुजुर्ग हमेशा हरी सब्जियां खाने की सलाह देते हैं। हरी सब्जियों का सेवन हर उम्र के लिए लाभकारी है, क्योंकि उनके सेवन से पाचन में सुधार, मजबूत प्रतिरक्षा, और हृदय स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है, हालांकि इनके सेवन का तरीका बहुत कम लोगों को पता होता है। आज के समय में सैंडविच से नूडल तक में कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल किया जाता है जो पाचन को प्रभावित करती हैं। आयुर्वेद के अनुसार हरी सब्जी खाने का भी एक सही तरीका होता है, तभी शरीर को पूरा फायदा मिलता है। हरी पत्तेदार सब्जियां पोषण से भरपूर होती हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इन्हें कम मात्रा में और सही तरीके से पकाकर खाना चाहिए, क्योंकि कई हरी सब्जियां वात दोष बढ़ा सकती हैं और पचने में भारी होती हैं। इसके लिए आयुर्वेद में कुछ बेहतर तरीके बताए गए हैं, जिससे हरी सब्जियों की पौष्टिकता बनाए रखते हुए पाचन प्रक्रिया में सरलता लाई जा सकती है।

हरी सब्जियों को कच्चा खाने से बचें, खासकर पालक, शिमला मिर्च और गोभी (पत्तागोभी)। इन सब्जियों में परजीवी टेपवर्म पाया जाता है, जो पेट से लेकर मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके साथ ही कच्ची हरी सब्जियों में वात की अधिकता होती है। पकने के बाद सब्जियों में वात की अधिकता कम हो जाती है। इसलिए हरी सब्जियों को उबालें, फिर उनका अतिरिक्त पानी निचोड़ें और अंत में घी या तेल में हल्का भूनकर पकाएं। ध्यान रखने वाली यह भी बात है कि बुजुर्गों और बच्चों को हरी सब्जियों का सेवन कम करने दें। ऐसा इसलिए क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ शरीर में वात की अधिकता बढ़ती है और पाचन मंद पड़ जाता है। बच्चों का पाचन भी बड़ों की तुलना में कमजोर होता है। ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों दोनों को सही मात्रा और सही तरीके से सब्जियों का सेवन करने दें। हरी सब्जियों की तुलना में बुजुर्गों और बच्चों को तोरई, टिंडा, लौकी, परवल और कुंदरू अधिक मात्रा में दें। यह हरी सब्जियों जितनी ही पौष्टिक होती है। अगर बच्चे इन सब्जियों को कम पसंद करते हैं तो उन्हें आटे में मिलाकर पराठा या मीठे के रूप में भी दिया जा सकता है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1773647261alk.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=319077&amp;path_article=6</guid><pubDate>16-Mar-2026 1:17 PM</pubDate></item><item><title>कैलोरी बर्न से मसल्स गेन तक, जानें फिट रहने के लिए क्यों जरूरी है कंपाउंड मूवमेंट्स </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318581&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318581&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 10 मार्च । शरीर को स्वस्थ और दिमाग को सक्रिय रखने में व्यायाम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। आज के समय में अधिकतर लोग योग या सामान्य जिम वर्कआउट तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन फिटनेस विशेषज्ञों के बीच इन दिनों कंपाउंड मूवमेंट्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इसे पूरे शरीर की फिटनेस के लिए बेहद प्रभावी तरीका माना जाता है। सरल शब्दों में समझें तो कंपाउंड मूवमेंट्स ऐसे व्यायाम होते हैं, जिनमें एक ही समय पर शरीर की कई मांसपेशियां और जोड़ काम करते हैं। उदाहरण के लिए, स्क्वैट्स और डेडलिफ्ट जैसे मूवमेंट सिर्फ पैरों को ही नहीं, बल्कि पीठ और शरीर के मध्य हिस्से यानी कोर मांसपेशियों को भी मजबूत बनाते हैं। इसी तरह बेंच प्रेस, पुल-अप, ओवरहेड प्रेस और लंज जैसे व्यायाम कई मसल ग्रुप को मजबूत बनाते हैं।

इस तरह के व्यायाम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मांसपेशियां तेजी से मजबूत होती हैं और शरीर की ताकत भी बढ़ती है। साथ ही, जब शरीर के कई हिस्से एक साथ काम करते हैं तो ज्यादा कैलोरी खर्च होती है। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और वजन को नियंत्रित रखने में भी मदद मिलती है। अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक, व्यायाम का असर हमारे शरीर की कई प्रणालियों पर पड़ता है। इसमें हृदय, सांस लेने की प्रणाली, मांसपेशियां और हड्डियां, तथा शरीर की रोगों से लड़ने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली शामिल हैं। कंपाउंड एक्सरसाइज इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना देती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन अभ्यासों में शरीर के कई हिस्से एक साथ काम करते हैं। इससे शरीर एक समन्वित इकाई की तरह बेहतर तरीके से कार्य करता है। इसके विपरीत, आइसोलेशन एक्सरसाइज केवल एक मसल और एक जोड़ पर फोकस करती हैं।

साइंस कंपाउंड मूवमेंट्स को स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के लिए सर्वश्रेष्ठ मानता है। अध्ययनों से पता चलता है कि ये कंपाउंड मूवमेंट्स के दौरान कई बार अधिक वजन उठाना पड़ता है, जिससे मांसपेशियों की ताकत तेजी से बढ़ती है। कंपाउंड एक्सरसाइज ज्यादा कैलोरी बर्न करती हैं क्योंकि अधिक मसल्स सक्रिय होती हैं, जिससे मेटाबॉलिज्म बढ़ता है और वजन नियंत्रण आसान होता है। ये हृदय के लिए फायदेमंद है। एक महत्वपूर्ण लाभ हार्मोनल रिस्पॉन्स है। भारी कंपाउंड लिफ्ट्स जैसे स्क्वाट और डेडलिफ्ट टेस्टोस्टेरोन और ग्रोथ हार्मोन के स्तर को अस्थायी रूप से बढ़ाते हैं, जो मसल ग्रोथ में मदद करते हैं। कंपाउंड एक्सरसाइज से कार्डियो फिटनेस, बेंच प्रेस और स्क्वाट स्ट्रेंथ में ज्यादा सुधार होता है। कंपाउंड मूवमेंट्स इंटरमस्कुलर कोऑर्डिनेशन सुधारते हैं, जोड़ों की स्थिरता बढ़ाते हैं और रियल-लाइफ एक्टिविटीज जैसे उठाना, धक्का देना, खींचना के लिए शरीर तैयार करते हैं। शुरुआती लोगों के लिए बॉडीवेट स्क्वाट, पुश-अप, लंज और असिस्टेड पुल-अप जैसे कंपाउंड व्यायाम आदर्श हैं। एक्सपर्ट के अनुसार सही फॉर्म से शुरू करें, धीरे-धीरे वजन बढ़ाएं और इन्हें अपनी रूटीन में शामिल करें, तो शरीर फिट और मजबूत बनेगा। (आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1773126994deht.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318581&amp;path_article=6</guid><pubDate>10-Mar-2026 12:46 PM</pubDate></item><item><title>गर्मियों में अमृत है लौकी का जूस, जान लें बस सेवन का सही तरीका </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318112&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318112&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 3 मार्च । गर्मियों के मौसम की शुरुआत के साथ ही ठंडा और ताजगी से भरा जूस पीने का मन करता है, लेकिन हर फल का जूस सेहत के लिए अच्छा हो, यह जरूरी नहीं है। मौसमी या अनार का जूस भी रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ा देता है, क्योंकि सारा फाइबर छलनी में रह जाता है। फलों के बदले गर्मियों में लौकी के जूस का सेवन करना लाभकारी होगा, क्योंकि न तो यह रक्त में शुगर की मात्रा को बढ़ाता है और इसमें फाइबर भी भरपूर होता है। आमतौर पर लौकी का नाम सुनते ही लोग मुंह बना लेते हैं, लेकिन इसकी सब्जी से लेकर थेपले और जूस भी पौष्टिक गुणों से भरपूर होते हैं। सरल दिखने वाला यह पेय शरीर और हृदय के लिए गहराई से कार्य करता है। आयुर्वेद में लौकी को शीतल, लघु और पित्तशामक माना गया है। यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी को शांत करता है, पाचन को संतुलित करता है और आंतरिक शुद्धि में सहायक होता है। वहीं विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो लौकी में लो-कैलोरी और पोटेशियम और खूब सारा पानी होता है जो हृदय स्वास्थ्य और रक्तचाप संतुलन में सहयोगी भूमिका निभाता है। हालांकि जूस के सेवन का समय भी स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

अब जानते हैं कि कैसे लौकी का जूस घर में आसानी से बना सकते हैं। सबसे पहले ऐसी लौकी का चुनाव करें जो छोटी और ताज़ा हो। कई बार लौकी स्वाद में कड़वी भी निकल आती है। ऐसे में जांच करके ही चुनाव करें। लौकी को छीलकर मोटा-मोटा काट लें और इसमें दो टुकड़े खीरा, थोड़ा सा पुदीना और नींबू का रस मिलाएँ। इससे लौकी के जूस का स्वाद भी बढ़ जाएगा और पौष्टिक तत्व भी बने रहेंगे। जूस को रखें नहीं, जब पीना हो तभी निकाले क्योंकि यह बहुत जल्दी काला होकर खराब हो जाता है। लौकी के जूस का सेवन अगर सुबह ही किया जाए, तभी बेहतर है। सुबह लौकी के जूस का सेवन करने से शरीर डिटॉक्स होता है और सारी गंदगी बाहर निकल जाती है। यह पाचन अग्नि को तेज करता है और मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने का भी काम करता है। लौकी के जूस के नियमित सेवन से कब्ज, गैस और पेट फूलने की परेशानी भी कम होती है और भारीपन और सुस्ती से भी राहत मिलती है। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1772525024oki.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=318112&amp;path_article=6</guid><pubDate>03-Mar-2026 1:33 PM</pubDate></item><item><title>हाई बीपी और शुगर के लिए संजीवनी है सुबह की सैर, जानें क्या है सैर का सही तरीका</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317883&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317883&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 28 फरवरी । आज लगभग हर घर में हाई बीपी या शुगर से पीड़ित मरीज मिल जाता है। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों ही सुबह की सैर को संजीवनी मानते हैं। नियमित सैर इन दोनों बीमारियों को नियंत्रित रखने में दवा की तरह काम करती है। विज्ञान की बात मानें तो सुबह के वक्त शरीर बायोकेमिकल प्रक्रिया से गुजरता है, और जब सुबह शरीर को बाहर की ठंडी हवा लगती है तो नेचुरल इंसुलिन बनने लगता है। जब तेज-तेज कदमों से शुगर का मरीज सैर पर निकलता है तो मांसपेशियां रक्त से ग्लूकोज को बढ़ाकर ऊर्जा में परिवर्तित कर देती हैं। यह प्रक्रिया शरीर में शुगर की दवा की तरह काम करती है और पूरे शरीर में रक्त का संचार भी तेज होता है। इसके साथ ही सुबह की सैर करने से धमनियों में रक्त का प्रवाह तेज होता है और नाइट्रिक ऑक्साइड भी बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड रक्त धमनियों को आराम देता है, जिससे हाई बीपी में धमनियों पर प्रभाव कम होता है और हाई बीपी की परेशानी नियंत्रित रहती है। सुबह की सैर करने से शुगर के मरीजों की सेहत में बड़ा अंतर पाया गया है। एक शोध की मानें तो लगातार 3 महीने तक 30 मिनट की सैर से शुगर लेवल को कम किया जा सकता है।

इसके साथ सुबह की सैर दिल के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। सुबह की सैर से शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है और रक्त धमनियों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है। गुड कोलेस्ट्रॉल बीपी और हृदय रोग दोनों के लिए लाभकारी है। इससे हार्ट अटैक का खतरा कम हो जाता है। सुबह की सैर जरूरी है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सैर कैसे करनी है। सुबह की सैर का लाभ तभी मिलता है जब सैर ब्रह्म मुहूर्त में की जाए, क्योंकि उस वक्त वायुमंडल में भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन मौजूद होती है। बढ़ते दिन के साथ वायुमंडल में प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता जाता है, जो पूरे शरीर के लिए हानिकारक होता है। सैर करते वक्त ध्यान रखें कि तेज-तेज लंबे-लंबे कदमों से चलें, लेकिन हांफे नहीं। ऐसा करने से रक्त को पूरे शरीर में तेजी से पंप होने का मौका मिलेगा। कम से कम रोजाना 1 घंटे की सैर जरूरी है। अगर आप सैर की शुरुआत कर रहे हैं, तो पहले कम से कम आधे घंटे से करें और उसके बाद धीरे-धीरे समय और रफ्तार दोनों को बढ़ाएं। यह शरीर में ऊर्जा को भी बढ़ाने में मदद करेगी। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1772281292igh.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317883&amp;path_article=6</guid><pubDate>28-Feb-2026 2:15 PM</pubDate></item><item><title>सेबिया अमरूद : इम्युनिटी बढ़ाकर पाचन तंत्र को मजबूत करते में सहायक </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317092&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317092&path_article=6]]></link><description>प्रयागराज, 19 फरवरी । प्रकृति ने ऐसे कई फल-फूल दिए हैं, जो न केवल स्वाद में लजीज हैं, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद हैं। ऐसे ही एक फल का नाम सेबिया अमरूद है, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग प्रयागराज के प्रसिद्ध सेबिया अमरूद (सुर्खा अमरूद) को सेहत और स्वाद दोनों का बादशाह बताता है। यह अमरूद शहर की उपजाऊ मिट्टी और अनुकूल जलवायु में उगाया जाता है, जिसकी वजह से इसमें प्राकृतिक मिठास, हल्की खुशबू और अनोखा स्वाद होता है। साल 2007 में जीआई टैग प्राप्त यह फल सर्दियों के मौसम में खासा लोकप्रिय होता है और 100-150 रुपए प्रति किलो तक बिकता है। देश-विदेश में इसकी मांग बनी रहती है। सेबिया अमरूद की खासियत इसकी बाहरी हल्की पीली-हरी छाल और अंदर गहरा लाल या गुलाबी गूदा है। गूदा सेब जैसा दिखता और महकता है, इसलिए इसे सेबिया या सुर्खा नाम मिला।

मीठा और रसीला होने के कारण यह अन्य अमरूदों से अलग पहचान रखता है। प्रयागराज की मिट्टी इसमें विशेष पोषक तत्व प्रदान करती है, जो इसे मौसमी खजाना बनाती है। यह अमरूद न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि सेहत के लिए भी अत्यंत फायदेमंद है। इसमें विटामिन सी भरपूर मात्रा में होती है, जो संतरे से कई गुना ज्यादा है। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और सर्दियों में सर्दी-खांसी जैसी बीमारियों से बचाव होता है।

सेबिया अमरूद में फाइबर अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, कब्ज दूर करता है और आंतों को स्वस्थ बनाता है। इसके अलावा, सेबिया अमरूद दिल के लिए लाभकारी है। इसमें पाए जाने वाले पोटेशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स ब्लड प्रेशर नियंत्रित करते हैं, कोलेस्ट्रॉल कम करते हैं और हृदय रोगों का खतरा घटाते हैं। यह डायबिटीज के मरीजों के लिए अच्छा विकल्प है। यह कम कैलोरी और हाई फाइबर होने से वजन घटाने में सहायक होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है। एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को स्वस्थ रखते हैं, उम्र बढ़ने के प्रभाव कम करते हैं और सूजन घटाते हैं। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1771487533mrud.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=317092&amp;path_article=6</guid><pubDate>19-Feb-2026 1:22 PM</pubDate></item><item><title>दिन में दो-तीन कप कॉफी पीने से वृद्धावस्था में कम हो सकता है डिमेंशिया का खतरा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316285&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316285&path_article=6]]></link><description>( ईफ़ होजेनवोर्स्ट, लफबरो यूनिवर्सिटी )

लफबरो (ब्रिटेन), 10 फरवरी। वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिन में दो से तीन कप कॉफी पीने से डिमेंशिया होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है, लेकिन इससे अधिक मात्रा में कॉफी पीने से मस्तिष्क को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता।

एक व्यापक अध्ययन में 1,31,821 अमेरिकी नर्सों और स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल किया गया, जिनके स्वास्थ्य पर शुरुआती 40 साल की उम्र से लेकर 43 वर्षों तक नजर रखी गई। इस अवधि में 11,033 लोगों यानी करीब आठ प्रतिशत में डिमेंशिया हुआ। हालांकि, सीमित मात्रा में कैफीनयुक्त कॉफी या चाय पीने वालों में डिमेंशिया होने की संभावना कम पाई गई।

अध्ययन के अनुसार, 75 वर्ष या उससे कम आयु के लोगों में इसका प्रभाव सबसे अधिक देखा गया। रोजाना करीब 250-300 मिलीग्राम कैफीन (लगभग दो से तीन कप कॉफी) लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे अधिक कैफीन लेने से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिला।

अध्ययन में शामिल महिलाओं ने बताया कि शुरुआत में वे प्रतिदिन औसतन साढ़े चार कप कॉफी या चाय पीती थीं, जबकि पुरुषों के लिए कॉफी की औसत खपत ढाई कप थी। अधिक कैफीन लेने वाले प्रतिभागी अपेक्षाकृत कम उम्र के थे, लेकिन वे शराब का अधिक सेवन करते थे, धूम्रपान करते थे और अधिक कैलोरी लेते थे, जो डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं।

शोध में यह भी पाया गया कि कैफीन रहित कॉफी पीने वालों में स्मृति क्षय तेज़ी से हुआ। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लोग नींद की समस्या, उच्च रक्तचाप या हृदय संबंधी उन समस्याओं के बाद कैफीन रहित कॉफी की ओर रुख करते हैं, जो स्वयं संज्ञानात्मक गिरावट से जुड़ी हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि कैफीन मस्तिष्क में उस एडेनोसिन नामक रसायन को अवरुद्ध करता है, जो डोपामिन और एसिटाइलकोलाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को दबाता है। उम्र बढ़ने और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों में ये न्यूरोट्रांसमीटर कम सक्रिय हो जाते हैं और कैफीन इस गिरावट को कुछ हद तक रोक सकता है।

अध्ययन में यह भी कहा गया कि अधिक मात्रा में कैफीन लेने से नींद प्रभावित हो सकती है और चिंता बढ़ सकती है, जिससे मस्तिष्क को होने वाले लाभ कम हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 1908 में प्रतिपादित यर्क्स-डॉडसन नियम का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक उत्तेजना मस्तिष्क को कमजोर कर सकती है।

अन्य 38 अध्ययनों के विश्लेषण में भी समान परिणाम सामने आए, जिनके अनुसार कैफीन लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम, कैफीन न लेने वालों की तुलना में छह से 16 प्रतिशत तक कम पाया गया। इस व्यापक विश्लेषण में एक से तीन कप कॉफी को सबसे उपयुक्त मात्रा बताया गया।

शोधकर्ताओं ने हालांकि कहा कि कप की मात्रा अलग-अलग हो सकती है और कॉफी में कैफीन की मात्रा उसके प्रकार और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बहुत कम मात्रा में कैफीन सतर्कता और मनोदशा में सुधार कर सकती है और अधिक मात्रा हमेशा बेहतर नहीं होती।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा सिम्मी(द कन्वरसेशन)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1770706362ownload_-_2026-02-10T122236.126.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316285&amp;path_article=6</guid><pubDate>10-Feb-2026 12:22 PM</pubDate></item><item><title>तनाव, चिंता और हाई ब्लड प्रेशर पर कंट्रोल, धर्मचक्र मुद्रा दिल‑दिमाग को बनाए स्वस्थ</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316042&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316042&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 7 फरवरी । आज तनावपूर्ण जिंदगी में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। ऐसे में योग और ध्यान हमारे लिए एक वरदान साबित हो सकते हैं। इनमें से एक खास मुद्रा है धर्मचक्र मुद्रा, यह मुद्रा न केवल शरीर को मजबूत बनाती है, बल्कि मानसिक शांति, तनाव से मुक्ति और ध्यान बढ़ाने में भी मदद करती है।

धर्मचक्र मुद्रा के कई फायदे हैं। यह शरीर में ऊर्जा के निरंतर प्रवाह को बढ़ाती है और दिमाग की एकाग्रता को सुधारती है। इसके नियमित अभ्यास से सोचने और समझने की शक्ति बढ़ती है। यह हृदय की सेहत के लिए भी फायदेमंद है और हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।

इस मुद्रा को करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यह हमें खुश और संतुष्ट महसूस कराती है। नियमित अभ्यास से हमारी अंदर की शक्ति बढ़ती है और जीवन में दृढ़ता और आत्मविश्वास आता है।

धर्मचक्र मुद्रा न केवल शरीर और दिमाग को मजबूत बनाती है, बल्कि जीवन में संतुलन और स्थिरता लाने में भी मदद करती है। रोजाना 1015 मिनट करने से तनाव दूर रहता है। इससे ध्यान बढ़ेगा और दिल‑दिमाग स्वस्थ रहेगा।

धर्मचक्र मुद्रा का अभ्यास शुरू करने के लिए सबसे पहले शांत जगह पर बैठें। आप सुखासन या पद्मासन में बैठ सकते हैं। शरीर और चेहरे की मांसपेशियों को आराम दें। होंठ हल्के खुले रहें और दो‑तीन गहरी सांस लें। शुरू में ध्यान को स्थिर करना मुश्किल हो सकता है, इसलिए अपनी सांस पर ध्यान दें। सांस को गहराई से अंदर लें और धीरे‑धीरे बाहर छोड़ें।

अब हाथों को अंजलि मुद्रा में मिलाएं। धीरे‑धीरे उंगलियों पर ध्यान दें और उन्हें जोड़ें। बाएं हाथ की हथेली हृदय की ओर रखें। दाहिने हाथ को मोड़कर उसकी हथेली शरीर के विपरीत रखें। फिर बाएं हाथ की बीच की उंगली और दाहिने हाथ की उंगलियों को जोड़कर एक वृत्त बनाएं। इस मुद्रा में कम से कम दस मिनट बैठें। इस समय अपनी सांस और उंगलियों पर ध्यान केंद्रित करें। गहरी सांस लेने से आपका मन शांत होगा और ध्यान बढ़ेगा।

(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1770450715oga.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=316042&amp;path_article=6</guid><pubDate>07-Feb-2026 1:21 PM</pubDate></item><item><title>शरीर के एक प्रोटीन से होगा हड्डी रोगों का पूरा इलाज</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315647&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315647&path_article=6]]></link><description>उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर की हड्डियां कमजोर होने से ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां घेर लेती हैं. इससे निजात दिलाने के लिए वैज्ञानिकों ने शरीर के ही एक प्रोटीन से दवा बनाने पर रिसर्च की है.
डॉयचे वैले पररामांशी मिश्राका लिखा-

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे हीशरीर में कई बीमारियांघर करना शुरू कर देती हैं. महिलाओं के लिए ये मसला थोड़ा और पेचीदा हो जाता है क्योंकि उन्हें मेनोपॉज, हड्डियों की कमजोरी और कई अन्य परेशानियों से लगातार जूझना पड़ता है. इन्हीं परेशानियों में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां भी हैं, जो पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को परेशान करती हैं. ये दुनिया के सबसे आम और गंभीर हड्डी और जोड़ रोगों में शामिल है. इसके निदान के लिए अब वैज्ञानिकों ने शरीर के ही एक प्रोटीन से इसकी दवा बनाने का जतन किया है.

भारत की वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की लखनऊ में स्थित प्रयोगशाला सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) के शोधकर्ताओं ने एम्स नई दिल्ली और आईआईटी खड़गपुर संस्थानों के साथ मिलकर दो छोटी प्रोटीन-आधारित दवाएं (पेप्टाइड्स) विकसित की हैं. सीडीआरआई में कार्यरत रहे डॉ. नैबेद्य चट्टोपध्याय इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक हैं. उनके साथ शिवानी शर्मा, चिराग कुलकर्णी समेत कई अन्य वैज्ञानिक भी इस रिसर्च का हिस्सा हैं. डॉ. नैबेद्य बताते हैं कि ये पेप्टाइड्स ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस के इलाज को काफी आसान बना सकते हैं.

प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों में ये नई पेप्टाइड थेरेपी काफी सुरक्षित और प्रभावी साबित हुई हैं. विशेषज्ञों को इससे भविष्य में इन जटिल बीमारियों के इलाज में काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं.

हड्डी और जोड़ों केरोगकी बढ़ती समस्या

एम्स नई दिल्ली के बॉयोटेक्नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. रूपेश श्रीवास्तव बताते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी में हड्डियां कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं. इससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है.मेनोपॉज के बाद महिलाओंऔर गुर्दे की बीमारी वाले मरीजों को यह काफी प्रभावित करता है.

आंकड़ों की बात करें तो दुनिया में लगभग 20 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त हैं. भारत में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस दोनों ही रोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है. 50 वर्ष की उम्र के बाद 60 से 70 फीसदी महिलाओं में ऑस्टियोआर्थराइटिस के मामले देखने को मिलते हैं जबकि पुरुषों में ये मामले महज 40 फीसदी तक सामने आते हैं. खासकर रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद की महिलाओं और बुजुर्गों में इन रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

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इसके अलावा ऑस्टियोआर्थराइटिस की बीमारी मुख्य रूप से अधिक उम्र वाले लोगों या बुजुर्गों पर असर डालती है. इसके कारण मरीजों में विकलांगता होने का खतरा भी बना रहता है. इसमें जोड़ की कार्टिलेज धीरे-धीरे घिस जाती है, जिससे दर्द, अकड़न, सूजन और चलने-फिरने में कठिनाई होती है.डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं, वर्तमान में दोनों बीमारियों के लिए पूरी तरह से ठीक होने वाला इलाज नहीं मिल सका है. कुछ दवाएं हड्डी की मजबूती बढ़ाती तो हैं, लेकिन फ्रैक्चर को पूरी तरह रोक नहीं पातीं.

कई शोधों में कुछ नई दवाएं भी ईजाद की गई हैं जो हड्डी को मजबूत तो करती हैं, पर साथ ही उनके साइड-इफेक्ट दिल की बीमारी तक पैदा कर सकते हैं. ये दवाएं भी सीमित समय तक ही असर करती हैं. डॉ. नैबेद्य चट्टोपध्याय बताते हैं कि ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए बनी अब तक की कोई दवा रोग को उलट या ठीक नहीं कर सकती. अधिकांश उपचार केवल दर्द कम करते हैं, जोड़ों में आई कमजोरी या फ्रैक्चर के कारण हुए नुकसान को नहीं रोकते इसलिए अधिक प्रभावी और सुरक्षित उपचार की काफी जरूरत है.

शरीर का ही एक प्रोटीन निभाएगा दो भूमिकाएं

शोधकर्ताओं ने स्क्लेरॉस्टिन नामक प्राकृतिक प्रोटीन पर रिसर्च की. ये हड्डी की कोशिकाओं से बनता है. इसके बारे में डॉ. चट्टोपध्याय ने डीडब्ल्यू को बताया, ये दो अलग-अलग काम करता है. पहला, यह हड्डी बनने की प्रक्रिया को धीमा करता है जिससे ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियां कमजोर पड़ती हैं. दूसरा, हड्डी में होने वाली असामान्य वृद्धि को ये रोकता है और कार्टिलेज को बचाता है. इससे ऑस्टियोआर्थराइटिस की परेशानी कम होती है.

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डॉ. चट्टोपध्याय ने रिसर्च में पाया कि स्क्लेरॉस्टिन के अलग-अलग हिस्से इन प्रभावों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. यदि इन्हें अलग कर दोबारा बनाया जाए तो कई रोगों के इलाज में उपयोग किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि रिसर्च की आधुनिक तकनीकों से तीन छोटे पेप्टाइड बनाए गए. इनके नाम SC-1, SC-2 और SC-3 रखा गया. रिसर्च में दो पेप्टाइड्स का असर अधिक देखने को मिला. डॉ. चट्टोपध्याय बताते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस के लिए SC-1 पेप्टाइड ज्यादा असरदार रहा. इसने स्क्लेरॉस्टिन के हानिकारक प्रभावों को रोकने के साथ-साथ हड्डी को बढ़ाने का काम किया. साथ ही मजबूती को भी बढ़ाया. इस पेप्टाइड से हड्डी की संरचना में भी सुधार आया.

उसके अलावा रिसर्च में एक अन्य पेप्टाइड SC-3 का परिणाम ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए काफी सकरात्मक रहा. डॉ. नैबेद्य ने बताया कि हमारी रिसर्च में ये पेप्टाइड स्क्लेरॉस्टिन के सुरक्षात्मक पहलुओं को सामने लेकर आता है. साथ ही जोड़ों में होने वाले नुकसान को भी कम करता है. SC-3 पेप्टाइड हड्डी के असामान्य बढ़ाव को रोकते हुए कार्टिलेज को बचाता है.

कमजोर हड्डियों की कैसे मदद कर रहे पेप्टाइड

डॉ. चट्टोपध्याय बताते हैं कि मेनोपॉज की स्थिति और गुर्दे की बीमारी के कारण हड्डियों को होने वाले नुकसान पर SC-1 की स्थिति जानने के लिए एनिमल टेस्टिंग की गई. इसमें पता चला कि इस पेप्टाइड के उपयोग से हड्डियों की डेन्सिटी यानी घनत्व बढ़ा, हड्डी की संरचना में सुधार आया, हड्डियां मजबूत हुईं और टूटने की आशंका में भी कमी आंकी गई. डॉ. चट्टोपध्याय कहते हैं, हमारी रिसर्च में गुर्दे की बीमारी वाले जानवरों पर इसका परीक्षण करने पर पता चला कि इससे हड्डी का स्वास्थ्य और गुर्दे की कार्यक्षमता दोनों में काफी सुधार आया. एक खास बात ये भी है कि SC-1 पेप्टाइड छोटा और सरल है, इसलिए अन्य इलाज के तरीकों की तुलना में इससे दवा बनाना काफी सस्ता और आसान है.

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ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए बेहतर परिणाम देने वाले पेप्टाइड SC-3 को रिसर्च के दौरान उन जोड़ों में परखा गया जिनमें चोट लगी थी या सर्जरी के दैरान क्षतिग्रस्त हुए थे. वैज्ञानिकों को इसके काफी बेहतर परिणाम देखने को मिले. डॉ. चट्टोपध्याय ने बताया कि इस पेप्टाइड के उपयोग से कार्टिलेज को काफी फायदा हुआ. उनके टूटने में कमी आई. इसके अलावा जोड़ों के आसपास अनचाही अतिरिक्त हड्डी बनने से भी इस पेप्टाइड ने रोका. इसके अलावा कार्टिलेज के नीचे की हड्डी में संतुलन भी बेहतर हुआ.

डॉ. चट्टोपध्याय ने बताया कि कई बार हड्डियों को मजबूती देने वाली दवाओं को कई सप्ताह तक सीधे जोड़ में इंजेक्शन दिया जाता है. इस पेप्टाइड की दवा का असर कई हफ्तों के इंजेक्शनों से ज्यादा असरदार साबित हुआ. उनका कहना है कि शरीर के अंदर इन पेप्टाइड्स का काम काफी प्रभावी रहा. इन पेप्टाइड्स ने जोड़ों को अकड़ने और दर्द से बचाया, साथ ही प्राकृतिक कुशनिंग यानी हड्डी की सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया.

क्यों अधिक सुरक्षित है ये इलाज

डॉ. चट्टोपध्याय का कहना है कि अभी मौजूद दवाएं अक्सर महत्वपूर्ण प्रोटीन को पूरी तरह रोक देती हैं. जिससे गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं. इसके उलट ये पेप्टाइड्स दवाओं के तौर पर संतुलित तरीके से और कमजोर जगह पर पहुंच कर काम करते हैं. इसके चलते इम्यूनिटी कमजोर नहीं होने पाती. इसके अलावा इलाज के दौरान इन पेप्टाइड्स से तैयार हुई दवा लंबे समय तक और व्यापक रूप से उपयोग करना संभव है. वह कहते हैं, इस रिसर्च में अब तक का हर ट्रायल सफल रहा है. रिसर्च का अगला कदम ह्यूमन ट्रायल यानी मानव क्लिनिकल परीक्षण है. इसके जरिए इस दवा की सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जा सकती है.

आयु बढ़ने के साथ-साथ हड्डी और जोड़ के रोग तेजी से बढ़ रहे हैं. भारत में ये चुनौती और गंभीर है क्योंकि बढ़ती जनसंख्या में बुजुर्गों की संख्या भी अधिक हो रही है. इसके साथ ही मधुमेह (डायबिटीज) और गुर्दे की बीमारी के मामले बढ़ रहे हैं. ये रोग हड्डी स्वास्थ्य को और ज्यादा बिगाड़ते हैं. इस लिहाज से इन पेप्टाइड्ससे बनी दवाएं अगर ह्यूमन ट्रायल में सफल हो जाती हैं तो ये नई पेप्टाइड थेरेपी लाखों मरीजों का जीवन सुधार सकती हैं. इसके अलावा ये दवाएं इलाज को सस्ता बना सकती हैं और हड्डी और जोड़ चिकित्सा के अनुसंधान में भारत को अग्रणी बना सकती हैं.

डॉ. चट्टोपध्याय का कहना है कि रिसर्च का मानव परीक्षण सफल हुआ तो SC-1 और SC-3 दुनिया की पहली ऐसी दवाएं बन सकती हैं जो हड्डियों के नुकसान और फ्रैक्चर दोनों के लिए अचूक बाण का काम करेगी. वह कहते हैं, ये दवाएंशरीर के प्राकृतिक प्रोटीन पर आधारित हैं, इसलिए इनमें इम्यूनिटी के दबने या हृदय-सम्बंधी गंभीर साइड-इफेक्ट का खतरा बहुत कम पाया गया. हमारी इस रिसर्च के सकरात्मक परिणाम लाइलाज कही जाने वाले ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आएंगे.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1770107329w.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315647&amp;path_article=6</guid><pubDate>03-Feb-2026 1:58 PM</pubDate></item><item><title>प्राकृतिक दिनचर्या: स्वस्थ, संतुलित एवं तनावमुक्त जीवन की आधारशिला </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315637&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315637&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 3 फरवरी । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अपने शरीर और मन की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। देर रात तक जागना, अनियमित भोजन, मोबाइल और स्क्रीन पर ज्यादा समय और लगातार तनाव, ये सब धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में प्राकृतिक दिनचर्या हमें फिर से संतुलन की ओर ले जाती है।

यह कोई कठिन नियमों वाली व्यवस्था नहीं है, बल्कि प्रकृति की लय के साथ जीने का एक सहज तरीका है। प्राकृतिक दिनचर्या की शुरुआत सुबह से होती है। सूरज उगने से पहले उठना तन और मन दोनों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है। इस समय वातावरण शांत और शुद्ध होता है, जिससे मन एकाग्र रहता है। सुबह उठकर कुछ देर टहलना, योग करना, प्राणायाम या ध्यान करना पूरे दिन के लिए ऊर्जा और सकारात्मकता देता है। यह समय खुद से जुड़ने और दिन की योजना बनाने के लिए भी सबसे अच्छा होता है। शरीर की प्राकृतिक जरूरतों का सम्मान करना भी प्राकृतिक दिनचर्या का अहम हिस्सा है। भूख लगे तो खाना, नींद आए तो सोना और शौच-मूत्र को न रोकना जैसी छोटी-छोटी बातें दिखने में साधारण लगती हैं, लेकिन इन्हीं से अच्छा स्वास्थ्य बनता है। इन्हें बार-बार रोकने से शरीर में कई तरह की परेशानियां पैदा हो सकती हैं। साफ-सफाई पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है।

रोज सुबह और रात दांत साफ करना, जीभ की सफाई करना, नहाना और साफ कपड़े पहनना न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि मन को भी तरोताजा करता है। तेल से हल्की मालिश करने से शरीर की थकान दूर होती है और रक्तसंचार बेहतर होता है। यह एक तरह से खुद को समय देने का सुंदर तरीका है। भोजन के मामले में प्राकृतिक दिनचर्या हमें सादगी सिखाती है। समय पर, जरूरत के अनुसार और पौष्टिक भोजन करना चाहिए। बहुत ज्यादा तला-भुना, जंक फूड या देर रात खाना शरीर को भारी और सुस्त बना देता है। मौसम और अपनी क्षमता के अनुसार भोजन चुनना ही समझदारी है। पानी भी समय-समय पर पीते रहना चाहिए, न बहुत कम और न ही जरूरत से ज्यादा। शारीरिक गतिविधि और विश्राम, दोनों का संतुलन बहुत जरूरी है। रोज थोड़ा-बहुत व्यायाम शरीर को मजबूत बनाता है, वहीं रात में 6 से 8 घंटे की अच्छी नींद शरीर और दिमाग को पूरी तरह आराम देती है। दिन में बार-बार सोने की आदत से बचना चाहिए, जब तक कि शरीर इसकी मांग न करे। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1770102531ehat.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315637&amp;path_article=6</guid><pubDate>03-Feb-2026 12:38 PM</pubDate></item><item><title>तनाव दूर कर मांसपेशियों को मजबूत बनाता है प्रसारित पादहस्तासन, ये सावधानी भी जरूरी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315390&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315390&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 31 जनवरी । शारीरिक हो या मानसिक हर समस्या का समाधान योगासन में छिपा है। तन और मन दोनों को सेहतमंद रखने वाले ऐसे ही एक आसन का नाम प्रसारित पादहस्तासन या प्रसारित पादोत्तानासन है, जिसे वाइड-लेग्ड फॉरवर्ड बेंड भी कहा जाता है। यह आसन पैरों को फैलाकर आगे झुकने से शरीर की कई मांसपेशियों को गहरा खिंचाव देता है और मन को शांत करता है। योग विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है, तनाव कम करता है और पूरा शरीर सेहतमंद रहता है। मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा के अनुसार, प्रसारित पादहस्तासन अभ्यास के लिए योग मैट पर ताड़ासन पोज में सीधे खड़े हो जाएं। दोनों पैर जोड़कर, हाथ शरीर के साथ रखें। सांस अंदर लें और पैरों को 3-4 फीट (या अपनी ऊंचाई के अनुसार 4-5 फीट) दूर फैलाएं।

पैर समानांतर रखें, एड़ियां बाहर की ओर और पैर के अंगूठे थोड़े अंदर की ओर रखें। इस दौरान हाथों को कमर पर रखें। छाती को आगे की ओर रखें। सांस छोड़ते हुए कमर से आगे झुकें। इस दौरान सांस अंदर लें और धीरे से वापस आएं। प्रसारित पादहस्तासन के अभ्यास से शरीर को कई लाभ मिलते हैं। जांघों, कूल्हों और पीठ में गहरा खिंचाव मिलता है, जिससे लचीलापन बढ़ता है। रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है, पीठ दर्द में राहत मिलती है। पाचन क्रिया सुधरती है और कब्ज दूर होता है। मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है, तनाव, चिंता में लाभ मिलता है। पैर, टखने और कोर मसल्स मजबूत होते हैं। साथ ही थकान दूर होती है, मन शांत रहता है और ऊर्जा बढ़ती है। प्रसारित पादहस्तासन अभ्यास के दौरान सावधानियां भी जरूरी हैं। पीठ में गंभीर चोट, हाई या लो ब्लड प्रेशर, ग्लूकोमा, घुटने/कूल्हे की समस्या वाले लोग बिना योग विशेषज्ञ की सलाह के न करें। गर्भवती महिलाएं भी ध्यान रखें। यह आसन सुबह खाली पेट करने से अधिक फायदेमंद होता है। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1769844837oga.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315390&amp;path_article=6</guid><pubDate>31-Jan-2026 1:03 PM</pubDate></item><item><title>पेट में जलन और खट्टा स्वाद? हाइपर एसिडिटी से बचाव में कारगर हैं ये उपाय </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315294&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315294&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 30 जनवरी । अनियमित दिनचर्या और गड़बड़ खानपान की वजह से आज के समय में हाइपर एसिडिटी की समस्या आम बात बन चुकी है, जिसमें पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा सामान्य से ज्यादा बनने लगती है। इससे छाती या पेट में जलन, खट्टी डकार, मुंह में खट्टा स्वाद, मतली और गैस जैसी परेशानियां होती हैं। हाइपर एसिडिटी की मुख्य वजह मसालेदार, तला-भुना भोजन, तनाव, अनियमित जीवनशैली और ज्यादा देर भूखे रहना शामिल है।

आयुर्वेद में इसे अम्लपित्त कहते हैं। सही आदतों और घरेलू उपायों से इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने हाइपर एसिडिटी के बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को जागरूक करने के लिए एक सरल और प्रभावी आयुर्वेदिक गाइड जारी किया। मंत्रालय का कहना है कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर हाइपर एसिडिटी के लक्षणों से लंबे समय तक राहत पाई जा सकती है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है। हाइपर एसिडिटी तब होती है जब पेट में अम्ल (एसिड) की मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है। इससे पेट और छाती में जलन, ऊपरी पेट में भारीपन या तकलीफ, मतली, बेचैनी, मुंह में खट्टा स्वाद आना और कभी-कभी उल्टी जैसी शिकायतें होती हैं। ये लक्षण समय पर पहचानकर और जीवनशैली में सुधार करके आसानी से नियंत्रित किए जा सकते हैं।

इसके लिए एक्सपर्ट कुछ आसान और कारगर सुझाव देते हैं, जैसे भारी, बहुत मसालेदार, खट्टे और तीखे-गर्म भोजन से पूरी तरह परहेज, जंक फूड, प्रोसेस्ड और पैकेट वाले खाद्य पदार्थ न खाएं। लंबे समय तक भूखे या प्यासे न रहें, नियमित अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा भोजन करें। धूम्रपान और शराब का सेवन बिल्कुल न करें। रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, खासकर दिन में 8-10 गिलास। रात को समय पर सोएं और अच्छी नींद लें, अनियमित नींद पाचन को और बिगाड़ सकती है। तनाव, चिंता और मानसिक दबाव के लिए दिनचर्या में योग, ध्यान, प्राणायाम या हल्की सैर को शामिल करें। इन छोटे बदलावों से न केवल हाइपर एसिडिटी के लक्षण कम होते हैं, बल्कि गट हेल्थ (आंतों का स्वास्थ्य) भी बेहतर होती है। यह गाइड विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो बार-बार एसिडिटी, गैस, जलन या पेट संबंधी परेशानी महसूस करते हैं। हालांकि, यदि लक्षण लगातार बने रहें या बहुत तेज हों तो तुरंत चिकित्सकीय जांच कराएं। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1769759964elth.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315294&amp;path_article=6</guid><pubDate>30-Jan-2026 1:29 PM</pubDate></item><item><title>कंप्यूटर-लैपटॉप पर काम करने वालों को हर 30-45 मिनट में ब्रेक क्यों जरूरी? जान लें</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315180&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315180&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 29 जनवरी । आज के दौर में अधिकांश लोग लैपटॉप या कंप्यूटर पर घंटों काम करते हैं, जिससे गर्दन दर्द, सर्वाइकल की समस्या और पीठ दर्द आम हो गया है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, सही पोस्चर अपनाकर और कुछ आसान एक्सरसाइज से इन समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि लैपटॉप यूजर्स के लिए सबसे अच्छा तरीका है कि स्क्रीन को आंखों के लेवल पर रखें, जिससे गर्दन आगे की ओर झुकने से बचे। आदर्श पोस्चर में पीठ सीधी रखनी चाहिए, कंधे रिलैक्स्ड होने चाहिए और गर्दन को सपोर्ट मिलना चाहिए। कंप्यूटर स्क्रीन को आंखों के बराबर या थोड़ा नीचे रखें, ताकि सिर को ऊपर-नीचे न करना पड़े।

कीबोर्ड को ऐसे स्थान पर रखें कि हाथों की कोहनी लगभग 90-100 डिग्री के कोण पर रहे। डेस्क पर कीबोर्ड को थोड़ा नीचे या एल्बो लेवल के आसपास रखने से कंधे और गर्दन पर दबाव कम पड़ता है। लैपटॉप यूजर्स के लिए स्टैंड का इस्तेमाल करना सबसे बेहतर है, क्योंकि लैपटॉप की स्क्रीन आमतौर पर नीचे होती है, जिससे टेक नेक की समस्या होती है। एक्सपर्ट्स विशेष रूप से गर्दन की एक्सरसाइज को बहुत महत्वपूर्ण बताते हैं। रोजाना नेक रेंज ऑफ मोशन एक्सरसाइज करने से मांसपेशियां मजबूत होती हैं और लंबे समय तक काम करने की क्षमता बढ़ती है।

इन एक्सरसाइज में गर्दन को धीरे-धीरे आगे-पीछे, बाएं-दाएं घुमाना जैसी मूवमेंट शामिल हैं। एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि हर 30-45 मिनट में ब्रेक लें। उठकर थोड़ा टहलें और गर्दन की हल्की स्ट्रेचिंग करें। कुर्सी में सपोर्ट होना चाहिए और पैर फर्श पर सपाट रखें। यदि लैपटॉप पर काम ज्यादा है तो एक्सटर्नल कीबोर्ड और माउस का उपयोग करें। ये छोटे-छोटे बदलाव लंबे समय में दर्द से राहत दिलाते हैं। नियमित एक्सरसाइज से ऑफिस वर्कर्स की सेहत बेहतर रह सकती है। अगर दर्द ज्यादा हो तो डॉक्टर से सलाह लें। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1769672290was.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=315180&amp;path_article=6</guid><pubDate>29-Jan-2026 1:08 PM</pubDate></item><item><title>इस अधपके मशरूम को खाने से दिखने लगते हैं 'उड़ते हुए छोटे-छोटे हज़ारों लोग'</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=314743&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=314743&path_article=6]]></link><description>चीन में हर साल एक अस्पताल में ऐसे मरीज़ ज़रूर आते हैं, जिनको एक अजीब बीमारी होती है. इनको बहुत छोटे-छोटे परी जैसे लोग दिखने लगते हैं. ये इन्हें दरवाज़े के नीचे बची हुई जगह से जाते हुए, दीवारों पर चढ़ते हुए और फ़र्नीचर पर चिपके हुए नज़र आते हैं.

अस्पताल में हर साल ऐसे सैकड़ों मरीज़ आते हैं, जिन्हें यह अजीबो-गरीब शिकायत होती है. इसकी वजह एक मशरूम है, जिसका नाम लानमाओआ एशियाटिका है. यह मशरूम जंगलों में पाइन के पेड़ों के साथ मिलता है.

चीन के युन्नान प्रांत में यह मशरूम बाज़ारों में बिकता है, रेस्तरां के मेन्यू में होता है और घरों में जून से अगस्त के बीच के सीज़न में खाया जाता है. आसपास के लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं, क्योंकि खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है.

हालांकि, इस मशरूम को भले पसंद करके खाया जाता हो, लेकिन इससे जुड़ी सबसे ज़रूरी बात ये है कि इसे अच्छे से पकाकर खाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया तो हैलुसिनेशन शुरू हो जाते हैं, यानी भ्रम होना शुरू हो जाता है.

यूटा यूनिवर्सिटी और यूटा नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में बायोलॉजी के डॉक्टरेट छात्र कॉलिन डोमनाउर कहते हैं, युन्नान में एक मशरूम हॉट पॉट रेस्तरां में सर्वर ने 15 मिनट का टाइमर लगाया और चेतावनी दी, टाइमर बजने से पहले मत खाना, वरना छोटे लोग दिखने लगेंगे.

कॉलिन इस मशरूम पर रिसर्च कर रहे हैं, उनका कहना है कि यहां की संस्कृति में यह मशरूम और इससे जुड़ी हैलुसिनेशन की बीमारी आम है. लेकिन युन्नान और कुछ चुनिंदा जगहों के अलावा, यह मशरूम ज़्यादातर लोगों के लिए एक रहस्य ही है.

क्या है लिलिपुटियन हैलुसिनेशन्स?

कॉलिन डोमनाउर को इस मशरूम के बारे में पहली बार अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान अपनी माइकोलॉजी टीचर से पता चला. वह कहते हैं, बहुत अजीब लगा कि कोई मशरूम ऐसा हो सकता है जो लोगों को परी-कहानी जैसे भ्रम दिखाए. यह अलग-अलग संस्कृतियों और समय में रिपोर्ट हुआ हो. मुझे हैरानी के साथ जिज्ञासा भी हुई कि इसके बारे में और जानूं.

अब कॉलिन इस मशरूम की दशकों पुरानी पहेलियों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. वह यह जानना चाहते हैं कि कौन-सा केमिकल इसके कारण भ्रम पैदा करता है और इससे हमें इंसानी दिमाग़ के बारे में क्या सीख मिल सकती है.

फ़ंगस को ढूंढने और रिकॉर्ड करने वाली संस्था फ़ंगी फाउंडेशन की संस्थापक और डायरेक्टर गिउलियाना फ़ुरसी कहती हैं, इस साइकेडेलिक मशरूम के बारे में बहुत सी बातें सुनी गईं, बहुत लोगों ने इसे ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कभी नहीं मिला.

इस मशरूम का कुछ दस्तावेज़ों में ज़िक्र मिलता है. 1991 के एक पेपर में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के दो शोधकर्ताओं ने युन्नान के लोगों के केस बताए जो एक ख़ास मशरूम खाने के बाद लिलिपुटियन हैलुसिनेशन्स देखते थे. इसका मतलब है कि बहुत छोटे इंसान, जानवर या काल्पनिक जीव दिखना. यह नाम गुलिवर ट्रैवल्स किताब के छोटे लोगों वाले लिलिपुट द्वीप से आया है.

शोधकर्ताओं ने लिखा कि इस हैलुसिनेशन का शिकार हो चुके मरीज़ों ने बताया कि ये छोटे लोग हर जगह घूम रहे थे. ये आमतौर पर दस से ज़्यादा दिखते थे. वे कपड़े पहनते समय अपने कपड़ों पर और खाना खाते समय बर्तनों पर भी नज़र आते थे. आंख बंद करने पर ये और भी साफ़ दिखते थे.

पहले भी हुई है ऐसा मशरूम खोजने की कोशिश

इससे पहले 1960 के दशक में गॉर्डन वॉसन और रोजर हाइम ने भी पापुआ न्यू गिनी में कुछ ऐसे ही मशरूम के बारे में जाना था. इन दोनों ने साइलोसाइबिन मशरूम को पश्चिमी दुनिया में पहचान दिलाई थी.

वे एक ऐसे मशरूम की तलाश में थे जिसके बारे में 30 साल पहले आए मिशनरियों ने कहा था कि स्थानीय लोग इससे पागल हो जाते हैं. एक एंथ्रोपॉलजिस्ट ने इसे बाद में मशरूम मैडनेस कहा.

गॉर्डन और रोजर नहीं जानते थे कि वे जो खोज रहे थे, वह आज चीन से आने वाली रिपोर्टों से बहुत मिलता-जुलता था. उन्होंने मशरूम के सैंपल इकट्ठे किए और स्विस केमिस्ट अल्बर्ट हॉफ़मैन को भेजा. लेकिन हॉफ़मैन को इसमें कोई ख़ास रसायन नहीं मिला. टीम ने सोचा कि ये सिर्फ़ कहानियां हैं और आगे रिसर्च नहीं हुई.

2015 में जाकर शोधकर्ताओं ने इस मशरूम को आधिकारिक तौर पर लानमाओआ एशियाटिका नाम दिया, लेकिन इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं दी कि इन्हें खाने से हैलुसिनेशन हो जाता है.

इन पर रिसर्च कर रहे छात्र कॉलिन डोमनाउर का पहला लक्ष्य इस मशरूम की सही पहचान करना था. 2023 में वह पीक सीज़न में युन्नान गए. उन्होंने बड़े-बड़े मशरूम बाज़ार देखे और विक्रेताओं से पूछा कि कौन-सा मशरूम खाने से छोटे लोग दिखने लगते हैं? विक्रेताओं ने हंसते हुए ये ख़ास मशरूम दिखाए और कॉलिन ने लैब में जाकर उनके जीन की जांच की.

चूहों पर इसका टेस्ट हुआ. चूहों में भी ठीक उसी तरह के बदलाव देखने को मिले, जो इंसानों में देखने को मिले थे. पहले तो चूहे में बहुत उत्तेजना देखने को मिली और बाद में वह सुस्त हो गया और ज़्यादा नहीं हिला.

कॉलिन ने अफ़वाह सुनी थी कि फिलीपींस में भी ऐसे ही मशरूम होते हैं. ये साइज़ में छोटे और रंग में हल्के गुलाबी थे, जबकि चीन में पाए जाने वाले मशरूम बड़े और लाल होते हैं. लेकिन जेनेटिक टेस्ट से पता चला कि दोनों की प्रजाति एक ही है. दिसंबर 2025 में उनके सुपरवाइज़र पापुआ न्यू गिनी गए ताकि गॉर्डन और रोजर वाले मशरूम ढूंढ सकें, लेकिन ये नहीं मिले.

इस मशरूम को समझकर बन सकती हैं हैलुसिनेशन की दवा

खास बात यह है कि इस मशरूम से होने वाले हैलुसिनेशन का असर बहुत लंबा चलता है. आमतौर पर 12 से 24 घंटे और कभी-कभी हफ्ताभर तक अस्पताल में रहना पड़ता है. इतने लंबे असर और साइड इफ़ेक्ट्स (जैसे बेहोशी और चक्कर) की वजह से कॉलिन ने अभी तक खुद कच्चा मशरूम नहीं खाया.

इतने लंबे प्रभाव की वजह से शायद चीन, फिलीपींस और पापुआ न्यू गिनी में लोग इसे नशा करने के लिए खोजते हैं.

इस मशरूम का अध्ययन करने से वैज्ञानिक समझ सकते हैं कि दिमाग़ में ऐसे हैलुसिनेशन कहां से शुरू होता है. इससे शायद नए इलाज भी मिल सकें.

साल 1909 से 2021 तक 226 ऐसे केस रिपोर्ट हुए, जिनमें मरीज़ों ने मशरूम नहीं खाया फिर भी उन्हें छोटे लोग नज़र आ रहे थे. इन मरीज़ों में तिहाई लोग पूरी तरह ठीक नहीं हुए.

एथनो फार्माकोलॉजिस्ट डेनिस मैकेना कहते हैं, अब हम समझ सकते हैं कि दिमाग़ में ये हैलुसिनेशन कहां से शुरू होते हैं. इससे नई दवाएं बनने की संभावना है. हालांकि, यह अभी देखना बाकी है कि क्या इसका चिकित्सकीय इलाज में इस्तेमाल हो सकता है या नहीं.

वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि दुनिया में अभी तक 5% से भी कम फ़ंगस प्रजातियों की पहचान हुई है. जब ईकोसिस्टम लगातार घट रहा है, तब भी नई खोज की काफ़ी गुंजाइश है.

गिउलियाना फ़ुरसी कहती हैं कि फ़ंगस में बहुत बड़ा रासायनिक और दवा का ख़ज़ाना है. खोजने को और भी बहुत कुछ बाकी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1769254681BC.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=314743&amp;path_article=6</guid><pubDate>24-Jan-2026 5:08 PM</pubDate></item><item><title>यूरिन में बदलाव किडनी खराब होने का हो सकता है संकेत, नजरअंदाज करना हो सकता है खतरनाक </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=313407&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=313407&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 8 जनवरी । हमारी सेहत का सबसे अनमोल अंग किडनी है, जो शरीर से बेकार पदार्थों और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का काम करती है। अक्सर हम किडनी की हेल्थ को नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि इसका नुकसान धीरे-धीरे होता है और शुरुआती लक्षण लगभग दिखाई नहीं देते। किडनी की खराबी का पता चलने का सबसे आसान और शुरुआती तरीका यूरिन में होने वाले बदलाव हैं। यह एक ऐसा संकेत है जो किडनी के धीरे-धीरे खराब होने की चेतावनी देता है। यूरिन पास करने में झाग बनना किडनी की खराबी का सबसे आम संकेत माना जाता है। किडनी अगर ठीक से काम नहीं कर रही है, तो प्रोटीन को फिल्टर नहीं कर पाती और वह यूरिन में मिल जाता है। जब यह झाग ज्यादा और लगातार दिखाई दे, तो इसका मतलब है कि किडनी का फिल्टर सिस्टम कमजोर हो गया है।

हालांकि, हर झाग किडनी की समस्या की निशानी नहीं होती। कभी-कभी तेज एक्सरसाइज, बुखार या शरीर में पानी की कमी के कारण भी पेशाब में झाग दिख सकता है। इसलिए सिर्फ झाग देखकर घबराना सही नहीं है, बल्कि कुछ टेस्ट कराना जरूरी है। यूरिन डिपस्टिक टेस्ट एक आसान और शुरुआती स्क्रीनिंग का तरीका है। इसे आप घर पर भी कर सकते हैं। यह टेस्ट बताता है कि यूरिन में प्रोटीन मौजूद है या नहीं। हालांकि यह टेस्ट केवल एक संकेत देता है और प्रोटीन की मात्रा का सटीक आंकड़ा नहीं बताता। इसके अलावा यह एल्ब्यूमिन के स्तर के बारे में पूरी जानकारी नहीं देता। यह टेस्ट खासतौर पर डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन मरीजों में किडनी डैमेज जल्दी हो सकती है। किडनी के खराब होने का पता यूरिन एल्बुमिन-क्रिएटिनाइन रेशियो (यूएसीआर) से भी लगाया जाता है। अगर यह लगातार ज्यादा दिख रहा हो, तो यह खतरे की घंटी है। साथ ही अगर यूरिन में झाग ज्यादा हो, सूजन दिखाई दे, प्रोटीन और क्रिएटिनाइन बढ़ रहे हों या ब्लड प्रेशर संतुलित न हो, तो इसे हल्के में न लें। ये संकेत हैं कि आपकी किडनी को तुरंत ध्यान की जरूरत है। पेशाब में बदलाव को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। झागदार पेशाब, लगातार बदलती रंगत, खून या असामान्य गंध आदि शुरुआती संकेत हो सकते हैं। इन बदलावों को समझना और समय पर डॉक्टर से मिलकर टेस्ट कराना बहुत जरूरी है। किडनी की सुरक्षा के लिए पानी पर्याप्त मात्रा में पीना, संतुलित भोजन करना, अधिक नमक और तेल वाले खाने से बचना और नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच कराना जरूरी है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1767862971rin.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=313407&amp;path_article=6</guid><pubDate>08-Jan-2026 2:32 PM</pubDate></item><item><title>साधारण कमर दर्द हो सकता है स्लिप डिस्क का भी लक्ष्ण, जानें इसका उपचार</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311512&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311512&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 17 दिसंबर । आज की जीवनशैली में कमर दर्द होना आम बात है क्योंकि सारा काम कुर्सी पर घंटों बैठकर किया जाता है। ऐसे में पीठ और मांसपेशियों में दर्द और जकड़न हो जाती है, लेकिन हर दर्द सामान्य कमर दर्द नहीं होता है, ये स्लिप डिस्क की शुरुआत हो सकती है। स्लिप डिस्क एक ऐसी समस्या है जिसमें न तो ठीक से बैठा जाता है और न ही ज्यादा देर तक खड़ा रह सकते हैं। आयुर्वेद में स्लिप डिस्क को अस्थि मज्जा विकार कहा जाता है। डिस्क रीढ़ की हड्डियों के बीच में होती है। यह हड्डी की तुलना में नरम होती है, जिसका रोल रीढ़ की हड्डी को लचक प्रदान करना होता है। ये शरीर को लगने वाले झटकों से भी बचाती है। ऐसे में रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद डिस्क कई बार अपने स्थान से खिसक सकती है और ऊपरी हिस्सों की नसों पर दबाव डालती है, तो पीठ दर्द की समस्या होने लगती है। ये दर्द पीठ से शुरू होकर पैरों तक पहुंच जाता है और दर्द से परेशान इंसान कमर पकड़कर झुक कर चलने के लिए मजबूर हो जाता है।

स्लिप डिस्क होने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं, जिसमें लंबे समय तक बैठे रहना, ज्यादा वजन उठाना, हमेशा झुककर काम करना, मोटापा होना, लगातार वाहन को एक ही पोजीशन में चलाते रहना, झटका लगना और चोट लगना शामिल है। शुरुआती स्तर पर कुछ बदलाव करके दर्द में राहत पाई जा सकती है, लेकिन दर्द ज्यादा होने पर सर्जरी और फिजियोथेरेपी की सलाह डॉक्टर देते हैं। स्लिप डिस्क न हो या ज्यादा दर्द न बढ़े, उसके लिए कुर्सी पर बैठते समय नरम कुशन का इस्तेमाल करें और बीच-बीच में चलते-फिरते रहें, लगातार कुर्सी पर बैठने से परहेज करें। इसके अलावा, गर्म पानी से सिकाई और दर्द वाले हिस्से पर तिल के तेल से मालिश करें, जिससे रीढ़ की हड्डी के आसपास के हिस्से पर रक्त का संचार बने और दर्द में राहत मिले। इसके अलावा, कुछ आसन करके भी रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाया जा सकता है। इसके लिए कैट-काउ, चाइल्ड्स पोज, कोबरा पोज, ब्रिज पोज और मरकटासन जैसे आसन कर सकते हैं। ये रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाने में मदद करेंगे। ज्यादा दर्द होने पर डॉक्टर की सलाह और दवा जरूर लें। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765957636ehat.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311512&amp;path_article=6</guid><pubDate>17-Dec-2025 1:17 PM</pubDate></item><item><title>दादी-नानी के नुस्खों में खास मुलेठी, जानें कैसे गले और सांस की तकलीफ में देती है राहत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311413&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311413&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 16 दिसंबर । आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादा लोगों की दिनचर्या ऐसी बन चुकी है कि वे अपने लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं। सुबह उठना, जल्दी-जल्दी नाश्ता करना, दिनभर धूल-धुएं और प्रदूषण के बीच रहना और फिर रात को थककर सो जाना, इन सबका धीरे-धीरे असर सेहत पर पड़ने लगता है। सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलने लगता है और गले में हर वक्त भारीपन या अटकाव महसूस होता है, लेकिन लोग इसे मामूली थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं। जब यही परेशानी रोज का हिस्सा बन जाती है, तो चिंता बढ़ने लगती है। आयुर्वेद में सदियों से इन सभी समस्याओं का सरल और प्राकृतिक उपाय बताया गया है। आयुर्वेद के अनुसार, सांस और गले से जुड़ी समस्याएं तब बढ़ती हैं, जब शरीर में कफ बढ़ जाता है और श्वसन नलियों में सूजन या जकड़न आ जाती है। इस स्थिति में ऐसी औषधियों की जरूरत होती है जो कफ को संतुलित करें, सूजन को कम करें और गले को आराम दें।

इन्हीं गुणों के कारण मुलेठी को आयुर्वेद में एक खास स्थान दिया गया है। इसे संस्कृत में यष्टिमधु कहा जाता है, यानी ऐसी औषधि जिसका स्वाद मीठा हो और जो शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़े। मुलेठी का उपयोग भारत में बहुत पुराने समय से होता आ रहा है। दादी-नानी के घरेलू नुस्खों में गले की खराश, सूखी खांसी या आवाज बैठने पर मुलेठी देने की आदत आज भी कई घरों में देखी जा सकती है। आयुर्वेद का मानना है कि मुलेठी शरीर की अंदरूनी गर्मी को शांत करती है और गले की सूखी परत को नमी देती है। इसके अंदर मौजूद प्राकृतिक तत्व गले और सांस की नली में जमा सूजन को धीरे-धीरे कम करने में मदद करते हैं। जब सांस की नली में सूजन या बलगम जम जाता है, तो सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है और गले में भारीपन बना रहता है।

मुलेठी इस बलगम को हटाने का काम करती है। इसके नियमित और सीमित सेवन से सांस की नली खुलने लगती है और व्यक्ति को सांस लेने में राहत महसूस होती है। मुलेठी गले की अंदरूनी परत पर एक तरह की सुरक्षात्मक परत बनाती है, जिससे जलन और खराश कम होती है। आयुर्वेद के अनुसार, मुलेठी पूरे श्वसन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। बदलते मौसम में जिन लोगों को बार-बार खांसी, जुकाम या सांस की तकलीफ हो जाती है, उनके लिए यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करने में मददगार मानी जाती है। इसके प्राकृतिक तत्व शरीर को धीरे-धीरे संतुलन में लाने का काम करते हैं, जिससे समस्या बार-बार उभरने की संभावना कम हो सकती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765879585EHT.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311413&amp;path_article=6</guid><pubDate>16-Dec-2025 3:36 PM</pubDate></item><item><title>थकान, चक्कर, और नसों की कमजोरी का कारण है विटामिन बी12 की कमी, पूर्ति के लिए ये आहार जरूरी </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311303&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311303&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 15 दिसंबर । मानव शरीर कई तंत्रिकाओं और कोशिकाओं से मिलकर बना होता है, जिन्हें सुचारू रूप से चलने के लिए विटामिन और खनिजों की आवश्यकता है। वैसे तो शरीर में मौजूद हर विटामिन का अपना आवश्यक कार्य होता है, लेकिन विटामिन बी12 शरीर की तंत्रिकाओं और कोशिकाओं दोनों के लिए आवश्यक है। ये दिल से लेकर दिमाग की नसों को काम करने में मदद करता है। विटामिन बी12 मानव शरीर के लिए बहुत जरूरी है। ये लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण, डीएनए, मस्तिष्क और तंत्रिका कोशिकाओं के विकास में भी अहम भूमिका निभाता है। ध्यान रखने वाली बात ये है कि विटामिन बी12 की पूर्ति शरीर खुद नहीं कर पाता। यानी, शरीर विटामिन बी12 नहीं बनाता है और इसके शाकाहारी स्रोत बहुत कम हैं।

इसलिए शाकाहारी लोगों में विटामिन बी12 की कमी सबसे ज्यादा देखी जाती है। विटामिन बी12 की कमी शरीर के पूरे स्वास्थ्य के लिए भारी पड़ सकती है। इसकी कमी से कमजोरी महसूस होना, चक्कर आना, बार-बार थकावट की वजह से बुखार आना, सिर की नसों का दुखना, सिर में लगातार दर्द बना रहना, मुंह और जीभ में छाले होना, याददाश्त कमजोर होना हो सकता है। अगर लंबे समय तक विटामिन बी12 की कमी बनी रहती है तो शरीर की नसें कमजोर होना शुरू हो जाती हैं और खून भी गाढ़ा हो जाता है। अब सवाल है कितने विटामिन बी12 की जरूरत है। हर वयस्क के लिए रोजाना आहार में 2.4 माइक्रोग्राम की आवश्यकता होती है, जबकि गर्भवती महिलाओं में 2.6 माइक्रोग्राम और दूध पिलाने वाली माताओं को 2.8 माइक्रोग्राम की आवश्यकता होती है। विटामिन बी12 के शाकाहारी स्रोत बहुत कम हैं और शरीर में इसके सही अवशोषण का भी ध्यान रखना होता है।

इसके लिए दूध, दही, मक्खन, पनीर जैसी चीजों का सेवन करना चाहिए। ये चीजें सीधा पशुओं से मिलती हैं। इसके अलावा, फोर्टिफाइड अनाज और सोया मिल्क का इस्तेमाल करें। अगर आप मांसाहारी हैं, तो आहार में भरपूर विटामिन बी12 मिल जाता है। यदि आहार से विटामिन बी12 की कमी पूरी नहीं हो पा रही है, तो डॉक्टर की सलाह पर सप्लीमेंट जरूर लें क्योंकि विटामिन बी12 की कमी को नजरअंदाज करना भविष्य की बड़ी बीमारियों को न्योता देना है। समय पर जांच, सही आहार और जागरूकता जरूरी है। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765783156ehat.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311303&amp;path_article=6</guid><pubDate>15-Dec-2025 12:49 PM</pubDate></item><item><title>पाचन से वजन तक, सेहत का खजाना है भुना जीरा </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311225&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311225&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 14 दिसंबर। भारतीय रसोई का अहम मसाला जीरा सिर्फ स्वाद बढ़ाने वाला नहीं, बल्कि सेहत का असली खजाना है। आयुर्वेदाचार्य बताते हैं कि कच्चा जीरा जितना फायदेमंद है, उससे दोगुना फायदेमंद भुना जीरा होता है। पाचन, खून, वजन और हार्मोन संतुलन का आयुर्वेदिक रक्षक है, बशर्ते सही तरीके से सेवन किया जाए। आयुर्वेद में जीरे को दीपनीय यानी पाचन अग्नि बढ़ाने वाला और वात-कफ दूर करने वाला बताया गया है। चरक संहिता कहता है- जीरकं दीपनं श्रेष्ठं यानी यह श्रेष्ठ पाचक है। अगर सही तरीके से लिया जाए, तो यह पेट की समस्याओं से लेकर वजन नियंत्रण और ब्लड शुगर तक में फायदेमंद साबित होता है। जीरे में कमिनाल्डिहाइड, थाइमॉल, टेरपीन जैसे तत्वों के साथ आयरन, मैग्नीशियम और भरपूर एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं।

ये पाचन सुधारते हैं, गैस और सूजन कम करते हैं, साथ ही मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखते हैं। आधुनिक रिसर्च भी जीरे को ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में उपयोगी मानती है। महिलाओं के लिए यह आयरन का अच्छा स्रोत है, जो हीमोग्लोबिन बढ़ाता है और स्तनपान के दौरान दूध की गुणवत्ता सुधारता है। जीरा पानी वजन घटाने और डिटॉक्स के लिए रामबाण है। रात में एक चम्मच जीरा भिगो दें, सुबह उबालकर गुनगुना पीएं। इससे पाचन मजबूत होता है, पेट साफ रहता है, मोटापा और सूजन कम होती है। भुना जीरा पाउडर पाचन के लिए बेहतरीन है। भुना जीरा चूर्ण बनाकर भोजन के बाद चुटकीभर लें। यह गैस, खट्टी डकार और पेट दर्द में तुरंत आराम देता है। भूनने से इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण और बढ़ जाते हैं। जीरा, सौंफ और धनिया बराबर मात्रा में उबालकर पानी पीएं। यह हार्मोन बैलेंस करता है, पीरियड्स की समस्या और पेशाब के दौरान होने वाली जलन में फायदेमंद है।

छाछ में भुना जीरा और सेंधा नमक, काला नमक मिलाकर पीने से आंतें साफ होती हैं, कब्ज में राहत मिलती है। आयुर्वेद के अनुसार, कमजोर पाचन अधिकतर बीमारियों की जड़ है। भुना जीरा पाचन अग्नि को सक्रिय करता है, बिना एसिडिटी बढ़ाए। यह गैस बाहर निकालता है, दस्त रोकता है और कब्ज दूर करता है। साथ ही तनाव कम करता है और पेट की सूजन घटाता है। जीरा सिर्फ तड़का नहीं, बल्कि पाचन, खून, वजन और हार्मोन का प्राकृतिक रक्षक है। भुना जीरा फायदेमंद है, जिसे दिनचर्या में शामिल कर स्वस्थ रहा जा सकता है। हालांकि, कुछ सावधानी भी जरूरी है। दिन में एक या दो चम्मच से ज्यादा न लें, वरना पेट में जलन हो सकती है। गर्भवती महिलाएं सीमित मात्रा में ही इस्तेमाल करें। डायबिटीज में सहायक है, लेकिन दवा की जगह नहीं। -(आईएएनएस )
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765705491ira.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=311225&amp;path_article=6</guid><pubDate>14-Dec-2025 3:14 PM</pubDate></item><item><title>विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर केल, दिल से लेकर पाचन तक पूरे शरीर की करता है सुरक्षा</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310831&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310831&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 10 दिसंबर । अच्छी सेहत के लिए लोग अपनी थाली में तरह-तरह की चीजें शामिल करते हैं। अब इन तमाम चीजों में केल भी शामिल हो गई है। केल की सब्जी में भरपूर पोषण होता है। आयुर्वेद इसे शरीर को हल्का, पाचन को मजबूत और रक्त को शुद्ध करने वाली सब्जी मानता है। वहीं, विज्ञान का भी कहना है कि इसमें विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है। अमेरिकन नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, केल शरीर को नई ऊर्जा देने और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने में मदद करती है। इसमें विटामिन-के, विटामिन-ए, विटामिन-सी, कैल्शियम, फाइबर और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं, जो रोजमर्रा की थकान को दूर करते हैं।

केल में मौजूद विटामिन-के खून को जमने नहीं देता। यह हमारी हड्डियों को मजबूत बनाता है ताकि उम्र बढ़ने के साथ वे कमजोर न हों। वहीं विटामिन-ए आंखों की रोशनी, त्वचा की चमक और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, यह विटामिन शरीर को संक्रमण से बचाने में बड़ी भूमिका निभाता है। केल में मौजूद विटामिन-सी शरीर में एंटीऑक्सीडेंट के स्तर को बढ़ाता है, जो शरीर में बनने वाले हानिकारक तत्वों को खत्म करते हैं।

आयुर्वेद में केल को अस्थि-धातु पुष्टिकारक कहा गया है, यानी यह हड्डियों को मजबूत करने वाला आहार है। आयुर्वेद में कहा गया है कि जब शरीर में अम यानी शरीर की अशुद्धियां बढ़ती हैं, तो त्वचा मुरझाने लगती है, थकान बढ़ती है, और रोग जल्दी पकड़ लेते हैं। केल का नियमित सेवन इन अशुद्धियों को साफ करता है, जिससे शरीर हल्का, ऊर्जा से भरा और साफ महसूस होता है। दिल की सेहत के लिए भी केल फायदेमंद है। वैज्ञानिक शोध की मानें तो, केल में ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं जो खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं और रक्त वाहिनियों को लचीला बनाए रखते हैं। जब नसें लचीली रहती हैं, तो दिल को खून पंप करने में कम मेहनत करनी पड़ती है। यही वजह है कि केल हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी मदद कर सकता है।

पाचन के लिए भी केल किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें मौजूद फाइबर आंतों की सफाई करने में मदद करता है। आयुर्वेद में कहा गया है कि जब आंतें साफ रहती हैं, तो मन शांत और ऊर्जा दोगुनी रहती है। केल आंतों में अवांछित पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होता है, जिससे कब्ज जैसी आम परेशानियां दूर हो सकती हैं। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765361337EHAT.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310831&amp;path_article=6</guid><pubDate>10-Dec-2025 3:38 PM</pubDate></item><item><title>नींद न आने से हैं परेशान तो घर पर ये तरीके आजमाने से होगी शिकायत दूर </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310720&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310720&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 9 दिसंबर । दिनभर थकान के बाद भी रात को नींद न आना, बार-बार नींद टूटना और सुबह उठते ही चिड़चिड़ापन, ये लक्षण निद्रा विकार के हैं। आयुर्वेद इनसे निजात पाने के लिए कुछ आसान उपाय सुझाता है। निद्रा विकार से आज के समय में न जाने कितने लोग परेशान हैं। आयुर्वेद के अनुसार अनिद्रा (निद्रा विकार) का मुख्य कारण बढ़ा हुआ वात दोष, कमजोर पाचन अग्नि और मानसिक तनाव है। वहीं साइंस कहता है कि मोबाइल की नीली रोशनी, अनियमित दिनचर्या और तनाव मिलकर मेलाटोनिन हॉर्मोन को कम कर देते हैं, जो अनिद्रा की वजह बनते हैं। आयुर्वेद में बताया गया है कि सोने से पहले सिर्फ छोटे-छोटे काम करके गहरी और सुकून भरी नींद ली जा सकती है। ये उपाय आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों से प्रमाणित हैं।

सोने से कम से कम 1 घंटे पहले मन को पूरी तरह शांत करें। फोन, टीवी, लैपटॉप दूर रख दें। 4-5 मिनट गहरी और धीमी सांस लें। अगर दिनभर की चिंताएं दिमाग में घूम रही हैं तो एक कागज पर लिखकर उसे साइड कर दें। इससे मन हल्का होता है और नींद जल्दी आती है। आयुर्वेद कहता है शांत मन ही अच्छी नींद का पहला द्वार है। पैरों की हल्की मालिश या गुनगुना पानी पीएं। रात को सोने से पहले देसी घी, तिल के तेल या नारियल तेल से पैरों के तलुओं की 5-7 मिनट मालिश करें। इससे नसें शांत होती हैं। अगर मालिश नहीं करना चाहते हैं तो सिर्फ एक गिलास हल्का गुनगुना पानी पी लें। यह पाचन को शांत कर शरीर को रिलैक्स मोड में लाता है। रात में सोने से पहले कुछ गर्म पेय लेना फायदेमंद होता है।

सोने से 30-40 मिनट पहले हल्का गर्म हल्दी वाला दूध, अश्वगंधा या ब्राह्मी वाला दूध, तुलसी-अदरक की हर्बल टी। यह पेय तनाव कम करते हैं और शरीर को गहरी नींद के लिए तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त सोने वाले कमरे में हल्की रोशनी रखें। तापमान मौसम के हिसाब से नियंत्रित रखें। सोने से पहले लैवेंडर या चंदन की हल्की खुशबू का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। आयुर्वेद के सुझाए इन उपायों को नियमित रूप से अपनाने से नींद की गुणवत्ता में सुधार आता है। सुबह ताजगी और दिनभर एनर्जी बनी रहती है। हालांकि अगर अनिद्रा लंबे समय से है तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1765263404eht.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310720&amp;path_article=6</guid><pubDate>09-Dec-2025 12:26 PM</pubDate></item><item><title>शतावरी: सिर्फ महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी है वरदान</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310381&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310381&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 5 दिसंबर । आयुर्वेद में कई ऐसी औषधिया हैं, जिन्हें जीवनवर्धक माना गया है। ऐसी ही एक औषधि है शतावरी। शतावरी को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। कहीं इसे सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावरी और सरनोई भी कहते हैं। शतावरी महिलाओं के लिए अमृत की तरह काम करती है और पुरुषों के लिए भी उतनी ही लाभकारी है। शतावरी एक पौधा है, जिसकी जड़े गुणों से भरपूर होती हैं। शतावरी का सेवन शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है, महिलाओं की प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है, और पुरुषों के लिए भी वीर्यवर्धक है। इसके अलावा, शतावरी को अन्य रोगों की रोकथाम में भी इस्तेमाल करते आए हैं। शतावरी की तासीर ठंडी और स्वाद में मधुर होती है।

ठंडी तासीर होने की वजह से शतावरी शरीर के रूखेपन को कम करती है, शरीर में नमी बनाए रखती है, और हार्मोन को बैलेंस रखती है। शतावरी की जड़ का पाउडर स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए लाभकारी है। जिन माओं को डिलीवरी के बाद दूध आने में परेशानी होती है, अगर उन्हें दूध के साथ रात के समय शतावरी पाउडर दिया जाए तो मां के शरीर में दूध बनना शुरू हो जाता है। ये प्राकृतिक रूप से माओं में दूध की क्षमता को बढ़ाती है। इसके साथ ही प्रसव के बाद की कमजोरी में भी राहत देती है। जिन महिलाओं या लड़कियों को पीरियड में अनियमितता या हार्मोन असंतुलन की समस्या रहती है, उनके लिए भी शतावरी अमृत है। शतावरी महिलाओं में एस्ट्रोजन के स्तर में सुधार लाती है।

बता दें कि महिलाओं में एस्ट्रोजन के सही स्तर की वजह से ही गर्भावस्था ठीक से हो पाती है। अगर एस्ट्रोजन का स्तर कम है तो गर्भपात होने की संभावना ज्यादा रहती है। इसके लिए सुबह खाली पेट दूध के साथ शतावरी का सेवन करना चाहिए। वहीं जिन पुरुषों को कमजोरी महसूस होती है, शुक्राणु की कमी है या शीघ्रपतन जैसी समस्या होती है, वे भी शतावरी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए शतावरी के साथ अश्वगंधा और कौंच बीज को दूध में एक साथ उबालकर लेना चाहिए। इससे पुरुषों में वीर्यवर्धक होता है और शारीरिक कमजोरी दूर होती है। जिन महिलाओं और पुरुषों को बार-बार यूरिन इंफेक्शन का खतरा रहता है, यूरिन में जलन होती है, या यूरिन की बूंदें अपने आप टपक जाती हैं, उनके लिए भी शतावरी का सेवन लाभकारी है। इसके लिए दूध और शतावरी रात के समय लें। --(आईएएनएस)

</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1764919509atvari.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310381&amp;path_article=6</guid><pubDate>05-Dec-2025 12:55 PM</pubDate></item><item><title>भागदौड़ भरी जीवनशैली के स्ट्रेस से राहत दिलाएगा 'शशकासन' </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310199&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310199&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 3 दिसंबर । ऑफिस और घर के कामों में व्यस्त होने के कारण हमारी लाइफस्टाइल अनियंत्रित हो गई है और तनाव-चिंता एक दैनिक चुनौती बन गए हैं। ऐसे में योग करने से आंतरिक शांति दिलाने में मदद मिल सकती है। इन्हीं में से एक है शशकासन। यह एक अत्यंत सरल, सहज और मन को शांत करने वाला आसन माना जाता है। इसके रोजाना अभ्यास से न केवल रीढ़, कंधों और पीठ को आराम मिलता है बल्कि मानसिक तनाव भी बेहतर रहता है। शशकासन को अंग्रेजी में इसे रैबिट पोज भी कहा जाता है। शशक का अर्थ होता है खरगोश। जिस प्रकार एक खरगोश अपनी मांद में सिमटकर सुरक्षित महसूस करता है, उसी प्रकार यह आसन अभ्यासकर्ता को आराम और शांति का अनुभव कराता है।

इसे करने के लिए आप योगा मैट पर व्रजासन में बैठ जाएं (पैर मोड़कर बैठें और रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए)। अब गहरी सांस भरते हुए हाथों को ऊपर की ओर ले जाते हुए शरीर को धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाएं। अब माथे और हाथ की हथेलियों को जमीन पर लगाएं। इस पोजीशन पर अपनी सुविधा के अनुसार बैठकर नॉर्मल पोजीशन में आ जाएं। इस आसन को आप 10 से 15 मिनट तक दोहरा सकते हैं। आयुष मंत्रालय भी शशकासन का नियमित अभ्यास करने की सलाह देता है क्योंकि इसके नियमित अभ्यास मात्र से तनाव, चिंता और पाचन क्रिया में सुधार मिलता है और साथ ही यह पीठ की मांसपेशियों को भी आराम देता है। शशांकासन से रीढ़ की हड्डी पर खिंचाव होता है और लचीलापन आता है। इस आसन के नियमित अभ्यास से आपको पीठ की समस्याओं में आराम मिलता है। इसके नियमित करने से पेट के निचले हिस्से में रक्त प्रवाह और भी तेज हो जाता है। साथ ही, यह आसन मधुमेह और गैस के नियंत्रण के लिए एक बहुत ही अच्छा उपचार है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि आप गंभीर स्वास्थ्य समस्या, पीठ दर्द, चक्कर, या घुटनों की समस्या से जूझ रहे हैं, तो इसे करने से सावधानी बरतें या फिर करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। --(आईएएनएस)

</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1764745943ehat.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=310199&amp;path_article=6</guid><pubDate>03-Dec-2025 12:42 PM</pubDate></item><item><title>लो बीपी बन सकता है कई बीमारियों की वजह, इन घरेलू उपायों से मिलेगी राहत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309406&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309406&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 23 नवंबर । आमतौर पर लोगों के बीच धारणा होती है कि रक्त चाप का कम होना, यानी लो बीपी की तुलना में हाई बीपी ज्यादा खतरनाक होता है। हाई बीपी में ब्रेन स्ट्रोक और हार्ट अटैक की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन लो बीपी भी उतना ही खतरनाक होता है जितना कि हाई बीपी। लो बीपी की ज्यादा परेशानी दिमाग और हृदय तक के रक्त प्रवाह को बाधित करती है और शरीर में कई बीमारियों को जन्म भी देती है। लो बीपी की समस्या आजकल युवाओं में भी देखी जा रही है और उसके पीछे का कारण है खराब जीवनशैली। इसके अलावा, लो बीपी लंबे समय तक उपवास रखने, दवाओं के प्रभाव से, शरीर में पानी की कमी से, थकान, तनाव या अधिक गर्मी लगने से और थायराइड, हृदय या हार्मोनल असंतुलन की वजह से भी हो सकता है।

लो बीपी को अच्छी जीवनशैली और कुछ घरेलू तरीकों से मेंटेन किया जा सकता है। अगर चक्कर आना और थकान ज्यादा महसूस हो रही है तो बीपी भी लो हो सकता है। इसके लिए कई बार लोग 1 गिलास पानी में चुटकी भर सेंधा नमक डालकर लेते हैं। नमक से रक्त में सोडियम बढ़ता है, जो सीधा मस्तिष्क तक पहुंचकर रक्त के प्रवाह को बढ़ाता है। इसके अलावा, सौंफ और मिश्री का सेवन भी लाभकारी होता है। सौंफ और मिश्री का रोजाना सेवन शरीर की ऊर्जा बढ़ाता है और पाचन को भी सही रखता है। ये पेट में बनने वाले एसिड को भी कंट्रोल करता है। सुबह खाली पेट 10-12 किशमिश पानी का सेवन करना भी लो बीपी की समस्या से राहत देता है। इसके लिए रात के समय 10-12 किशमिश को पानी में भिगो दीजिए और सुबह खाली पेट सेवन करें। लो बीपी में मुनक्का और बादाम भी राहत देते हैं। रात को मुनक्के और बादाम को पानी में भिगोकर रखा जा सकता है, जिससे सुबह उनका सेवन किया जा सके। इसके साथ ही दालचीनी, अदरक, तुलसी के पत्ते और शहद का सेवन भी लो बीपी में राहत देता है। आमतौर पर सर्दियों में रक्त के गाढ़ा होने की संभावना गर्मियों की तुलना में ज्यादा रहती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1763887527p.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309406&amp;path_article=6</guid><pubDate>23-Nov-2025 2:15 PM</pubDate></item><item><title>लो बीपी बन सकता है कई बीमारियों की वजह, इन घरेलू उपायों से मिलेगी राहत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309405&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309405&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 23 नवंबर । आमतौर पर लोगों के बीच धारणा होती है कि रक्त चाप का कम होना, यानी लो बीपी की तुलना में हाई बीपी ज्यादा खतरनाक होता है। हाई बीपी में ब्रेन स्ट्रोक और हार्ट अटैक की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन लो बीपी भी उतना ही खतरनाक होता है जितना कि हाई बीपी। लो बीपी की ज्यादा परेशानी दिमाग और हृदय तक के रक्त प्रवाह को बाधित करती है और शरीर में कई बीमारियों को जन्म भी देती है। लो बीपी की समस्या आजकल युवाओं में भी देखी जा रही है और उसके पीछे का कारण है खराब जीवनशैली। इसके अलावा, लो बीपी लंबे समय तक उपवास रखने, दवाओं के प्रभाव से, शरीर में पानी की कमी से, थकान, तनाव या अधिक गर्मी लगने से और थायराइड, हृदय या हार्मोनल असंतुलन की वजह से भी हो सकता है। लो बीपी को अच्छी जीवनशैली और कुछ घरेलू तरीकों से मेंटेन किया जा सकता है। अगर चक्कर आना और थकान ज्यादा महसूस हो रही है तो बीपी भी लो हो सकता है।

इसके लिए कई बार लोग 1 गिलास पानी में चुटकी भर सेंधा नमक डालकर लेते हैं। नमक से रक्त में सोडियम बढ़ता है, जो सीधा मस्तिष्क तक पहुंचकर रक्त के प्रवाह को बढ़ाता है। इसके अलावा, सौंफ और मिश्री का सेवन भी लाभकारी होता है। सौंफ और मिश्री का रोजाना सेवन शरीर की ऊर्जा बढ़ाता है और पाचन को भी सही रखता है। ये पेट में बनने वाले एसिड को भी कंट्रोल करता है। सुबह खाली पेट 10-12 किशमिश पानी का सेवन करना भी लो बीपी की समस्या से राहत देता है। इसके लिए रात के समय 10-12 किशमिश को पानी में भिगो दीजिए और सुबह खाली पेट सेवन करें। लो बीपी में मुनक्का और बादाम भी राहत देते हैं। रात को मुनक्के और बादाम को पानी में भिगोकर रखा जा सकता है, जिससे सुबह उनका सेवन किया जा सके। इसके साथ ही दालचीनी, अदरक, तुलसी के पत्ते और शहद का सेवन भी लो बीपी में राहत देता है। आमतौर पर सर्दियों में रक्त के गाढ़ा होने की संभावना गर्मियों की तुलना में ज्यादा रहती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1763887326p.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309405&amp;path_article=6</guid><pubDate>23-Nov-2025 2:12 PM</pubDate></item><item><title>मांसपेशियां मजबूत, मन शांत और तनाव दूर, रोजना करें अधोमुख श्वानासन </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309245&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309245&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 21 नवंबर । अनियमित और भागदौड़ भरी दिनचर्या कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं को दावत देने जैसी है। हालांकि, योगासन और सही खानपान से तन के साथ मन को भी बेहतर बनाया जा सकता है। ऐसे कई आसन हैं, जिनके अभ्यास से न केवल शारीरिक समस्याओं को खत्म किया जा सकता है बल्कि आने वाली समस्याओं को भी रोका जा सकता है। यह मानसिक रूप से भी मजबूत बनाने में बेहद कारगर हो सकता है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय ऐसे ही एक आसन को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह देता है, वह है अधोमुख श्वानासन मुद्रा। अधोमुख श्वानासन को डाउनवर्ड फेसिंग डॉग पोज भी कहते हैं, जो आसान और प्रभावी योगासनों में से एक है।

इसे हिंदी में अधोमुख श्वान मुद्रा भी कहते हैं। यह आसन हर उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद है। अधोमुख श्वानासन पूरे शरीर को एक साथ सक्रिय करता है और अभ्यास से गजब का लाभ देता है। इसे करने की विधि भी बेहद सरल है, जमीन पर घुटनों और हथेलियों के बल बैठकर दोनों हाथ कंधों के बराबर और घुटने कूल्हों के बराबर रखकर इसके चरण को धीरे-धीरे आराम से करें। इस मुद्रा में 20 से 30 सेकंड तक रहना चाहिए। अधोमुख श्वनासन के रोजाना अभ्यास से मांसपेशियां होती हैं, यह आसन कंधों, बाहों, पीठ, पेट और पैरों की सभी मांसपेशियों को एक साथ मजबूत बनाता है। इस आसन के दौरान उल्टे वी आकार के कारण सिर की ओर रक्त प्रवाह बढ़ता है, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन मिलती है और सिर दर्द, थकान जैसी समस्याएं दूर होती हैं। मन शांत और एकाग्र होता है, तनाव, चिंता और अनिद्रा में यह आसन रामबाण की तरह काम करता है। ऑफिस में घंटों लगातार बैठने वालों के लिए भी यह आसन फायदेमंद है। इससे रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है, लंबे समय तक बैठने की वजह से जकड़ी हुई कमर और पीठ को यह खोल देता है और पाचन तंत्र को भी दुरुस्त करता है। पेट की मांसपेशियों पर दबाव पड़ने से कब्ज और गैस की समस्या में राहत मिलती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1763714729snm.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=309245&amp;path_article=6</guid><pubDate>21-Nov-2025 2:15 PM</pubDate></item><item><title>पीरियड्स की अनियमितता दूर करें: मालासन, उष्ट्रासन, धनुरासन और मत्स्यासन से मिलेगी राहत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308700&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308700&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 14 नवंबर । आज की तेज रफ्तार वाली जिंदगी में हर कोई तनाव में जिंदगी बिता रहा है। फिर चाहे वह काम का दबाव हो, परिवार, नींद की कमी, या असंतुलित खान-पान। इन सारी चीजों से हमें शारीरिक और मानसिक दोनों समस्या के साथ-साथ मासिक धर्म के दौरान भी दिक्कतें आ सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान अक्सर महिलाओं को पेट में तेज दर्द, भारी ब्लीडिंग, मसल्स में क्रैंप्स, अनियमित तारीखें और मूड में उतार-चढ़ाव जैसी स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।

कभी पीरियड्स पहले आते हैं, तो कभी देरी से आने पर कब्ज, स्ट्रेस और असहनीय दर्द होने लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती दिनों में अगर ऐसा हो रहा है, तो आप हेल्दी डाइट और योगासन से ठीक कर सकते हैं, लेकिन अगर समस्या ज्यादा है, तो आप डॉक्टर को दिखाएं। ऐसे में आप इन योगासन को करके राहत पा सकते हैं। मत्स्यासन: इसे फिश पोज भी कहते हैं। इसके नियमित अभ्यास से मासिक धर्म के दौरान होने वाली ऐंठन और दर्द में राहत मिलती है। यह पेट के निचले भाग में रक्त संचार को बेहतर बनाता है और पेट की मांसपेशियों की मालिश करता है, पाचन में सुधार करता है और कब्ज से राहत दिलाता है।

मालासन: यह आसन पीरियड्स के समय होने वाली ऐंठन को कम करने में मदद करता है और पेट के निचले भाग में मांसपेशियों को आराम दिलाता है, जिससे मासिक धर्म के दौरान होने वाली बेचैनी से राहत मिलती है। इसी के साथ ही यह ब्लोटिंग जैसी समस्याओं को भी कम कर सकता है। धनुरासन: आयुष मंत्रालय के अनुसार, धनुरासन के नियमित अभ्यास से प्रजनन अंगों को उत्तेजित किया जाता है, साथ ही रक्त संचार बेहतर होता है और मासिक धर्म चक्र भी बेहतर होता है। यह मुद्रा पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करती है, रीढ़ की हड्डी में लचीलापन लाती है और तनाव कम करती है।

उष्ट्रासन: इसे बैकबेंडिंग योगासन भी कहते हैं, जो स्पाइन को फ्लेक्सिबल बनाने में मदद करता है और एब्डॉमिनल ऑर्गन्स को एक्टिवेट करता है। वैसे तो योगासन करना एक बेहतरीन विकल्प है, लेकिन ज्यादा दिक्कत होने पर डॉक्टर की सलाह जरूर लें और योगासन भी किसी ट्रेनर की निगरानी में ही करें। शुरुआती अभ्यास में बहुत अधिक जोर न लगाएं और अभ्यास की अवधि धीरे-धीरे बढ़ाएं। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1763116983pp.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308700&amp;path_article=6</guid><pubDate>14-Nov-2025 4:13 PM</pubDate></item><item><title>चूना : बीमारियों का रामबाण इलाज, बिना ये जानें ना करें इस्तेमाल </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308004&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308004&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 6 नवंबर । चूना प्राचीन समय से चले आ रहे देसी नुस्खों का अहम हिस्सा है। पुराने समय में दादी-नानी कई बीमारियों में चूने का पानी या चूने का लेप इस्तेमाल करती थीं। आज भी गांवों में लोग इसे छोटे-मोटे रोगों के इलाज में अपनाते हैं। आइए जानते हैं चूने के कुछ परंपरागत घरेलू उपयोग। सबसे पहले, अगर बच्चों को उल्टी, दस्त या खट्टी डकारें आ रही हों तो रातभर भीगे चूने के पानी को छानकर थोड़ा-सा पानी में मिलाकर पिलाने से राहत मिलती है। वहीं, सूजन या गुम चोट में चूना और हल्दी मिलाकर लगाने से सूजन उतर जाती है और दर्द कम होता है। अगर आग से जलने पर घाव हो गया हो, तो चूने के पानी और नारियल तेल को मिलाकर फेंट लें। यह मिश्रण ठंडक देता है और घाव जल्दी भरता है।

इसी तरह बवासीर, फोड़े-फुंसियां या दाद जैसी समस्याओं में भी चूने का लेप फायदेमंद बताया गया है। हड्डियां कमजोर हों तो थोड़ी मात्रा में चूने का पानी नियमित पीने की सलाह दी जाती है, जिससे कैल्शियम की कमी पूरी होती है। पेट दर्द या अम्लपित्त (एसिडिटी) में भी चूने का पानी राहत देता है। कान से मवाद बहने या नाक से खून आने (नकसीर) पर भी इसका पानी अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल होता है। कहा जाता है कि चूना और दूध मिलाकर कान में डालने या पीने से ऐसे लक्षणों में सुधार आता है। गठिया और जोड़ों के दर्द में चूना, हल्दी और गुड़ का लेप बहुत असरदार माना गया है। वहीं, गिल्टी या ट्यूमर पर चूना और शहद का लेप बांधने से सूजन कम होती है। मस्से और तिल हटाने के लिए भी एक देसी तरीका है।

पान के डंठल पर चूना लगाकर मस्से की जड़ में लगाने से कुछ ही दिनों में मस्सा सूखकर गिर जाता है। अगर सिरदर्द हो तो चूना और नौसादर को सूंघना या घी में चूना मिलाकर सिर पर लेप लगाने से आराम मिलता है। पुराने वैद्य कहते हैं कि चूना सस्ता और असरदार है, लेकिन इसका इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा या गलत मात्रा नुकसान भी कर सकती है। इसलिए, अगर आप किसी रोग में चूना या चूने का पानी इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो पहले किसी अनुभवी वैद्य या आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरूर लें। -(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1762423569HUNNA.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=308004&amp;path_article=6</guid><pubDate>06-Nov-2025 3:36 PM</pubDate></item><item><title>शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए वरदान है आरोग्यवर्धिनी वटी, कई जड़ी बूटियों का है मिश्रण </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307909&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307909&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 5 नवंबर । कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं, जो शरीर के कई रोगों को एक साथ ठीक करने की क्षमता रखती हैं। आमतौर पर एक दवा लेकर एक ही रोग का इलाज किया जा सकता है, लेकिन आयुर्वेद में ऐसा नहीं है। आयुर्वेद के पास ऐसी कई वटी हैं, जो शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य का ध्यान रख सकती हैं। ऐसी ही एक वटी है आरोग्यवर्धिनी वटी। वटी शब्द से तात्पर्य है गोली। आरोग्यवर्धिनी की गोलियां एक नहीं, बल्कि अनेक रोगों का नाश करती हैं, क्योंकि इस वटी में कई जड़ी-बूटियों के गुण समाहित हैं। आरोग्यवर्धिनी वटी का इस्तेमाल सालों से विषैले पदार्थों को शरीर से निकालने, पाचन में सुधार और यकृत की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

आरोग्यवर्धिनी वटी में कई जड़ी-बूटियों के गुण शामिल हैं। इसमें त्रिफला (आमलकी, बिभीतकी, हरीतकी), शिलाजीत, शुद्ध गुग्गुलु, और चित्रक शामिल हैं। ये सभी जड़ी-बूटियां मिलकर एक आरोग्यवर्धिनी वटी बनाती हैं। आरोग्यवर्धिनी वटी कई बीमारियों से निजात दिलाने में सहायक होती है। अगर लिवर कमजोर हो गया है और सही तरीके से काम नहीं कर रहा है, तो इसके लिए आरोग्यवर्धिनी वटी सहायक है। ये लिवर को शुद्ध करने का काम करती हैं और शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालती हैं। ये पित्त को भी नियंत्रित करती है, जिससे फैटी लिवर की समस्या कम होती है। आरोग्यवर्धिनी वटी वजन को कम करने और पाचन प्रक्रिया को सुधारने में भी मदद करती है। ये वटी वसा को तोड़कर विषैले पदार्थों के साथ शरीर से निकालती है और शरीर में खराब वसा को जमने नहीं देती है। इससे पाचन की शक्ति में भी सुधार होता है और खाने में मौजूद पौषक तत्व शरीर तक अच्छे से पहुंच जाते हैं।

इसके अलावा, आरोग्यवर्धिनी वटी स्किन से जुड़े रोगों में भी फायदा देती है। वटी में मौजूद त्रिफला और शुद्ध गुग्गुलु मिलकर रक्त को शुद्ध करते हैं, जिससे स्किन और बाल दोनों ही चमकदार बने रहते हैं। आरोग्यवर्धिनी वटी मूत्र मार्ग में होने वाली सूजन को भी कम करता है। महिलाओं में मूत्र संक्रमण की समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है। ऐसे में आरोग्यवर्धिनी वटी का सेवन संक्रमण से बचाता है, लेकिन ध्यान रखें गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं आरोग्यवर्धिनी वटी का सेवन चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही करें। ये खास वटी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करती है, जिससे दिल संबंधी रोगों की संभावना भी कम होती है। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1762332279wi.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307909&amp;path_article=6</guid><pubDate>05-Nov-2025 2:14 PM</pubDate></item><item><title>योग की शक्ति: उत्तानपादासन से पेट की चर्बी घटाएं, तनाव को कम करने में भी कारगर </title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307590&amp;path_article=6</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307590&path_article=6]]></link><description>नई दिल्ली, 1 नवंबर । आजकल की व्यस्त जिंदगी में लोग स्वस्थ भोजन और सेहत का ध्यान रखना भूल जाते हैं। नतीजतन लोगों को कम वजन या अनियंत्रित वजन की शिकायत का सामना करना पड़ता है। साथ ही, डिप्रेशन और एंग्जाइटी बढ़ने लगती है। ऐसे में योग करना प्रभावी उपाय हो सकता है। उत्तानपादासन इन्हीं में से एक है। आयुष मंत्रालय की सलाह है कि उत्तानपादासन का रोजाना अभ्यास करने से पेट दर्द, अपच और दस्त जैसी शारीरिक समस्या कम खत्म होने लगती हैं। इसका नियमित अभ्यास उदर पीड़ा, अपच और अतिसार (दस्त) को दूर करने में सहायक है। यह उदर और पेल्विस की मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है। साथ ही यह अवसाद और चिंताओं से उबारने में भी सहायक है।

इसे करने के लिए फर्श में योगा मैट बिछा लें। फिर लेट जाएं और दोनों हाथ शरीर से सटाकर रखें। हथेलियां जमीन की ओर रखें और गहरी सांस लें और धीरे-धीरे पैरों को 30-45 डिग्री तक ऊपर उठाएं। 10-20 सेकंड तक होल्ड करें, फिर सांस छोड़ते हुए नीचे लाएं। शुरुआत में 3-5 राउंड करें, फिर धीरे-धीरे बढ़ाएं। सुबह खाली पेट करें तो ज्यादा फायदा होगा। यह आसन दिमाग को शांत करता है, नर्वस सिस्टम को बैलेंस करता है और स्ट्रेस लेवल भी कम करता है। यह ऑफिस की टेंशन या पढ़ाई के प्रेशर से जूझ रहे युवाओं के लिए मन को स्थिर रखने का बेहतरीन तरीका है। उत्तानपादासन को करने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, जिसका सीधा असर पाचन तंत्र पर पड़ता है। भोजन पचने की प्रक्रिया में सुधार आता है और गैस या कब्ज जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। जिन लोगों को रोज पेट साफ नहीं होता या जिन्हें खाने के बाद भारीपन लगता है, उनके लिए यह आसन बेहद फायदेमंद माना गया है। नियमित अभ्यास से 15 दिनों में फर्क दिखना शुरू हो जाएगा, लेकिन इस बात का खास ख्याल रहे कि गर्भवती महिलाएं और हर्निया या सर्जरी वाले मरीज इस आसन को करने से बचें या डॉक्टर से सलाह लें। --(आईएएनएस)
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1761981490og.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=307590&amp;path_article=6</guid><pubDate>01-Nov-2025 12:48 PM</pubDate></item></channel></rss>