    
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>Daily Chhattisgarh Editorial</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com</link><description>Daily Chhattisgarh Feed Editorial</description><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : गुफा के बाहर जीते हुए, हर कोई बिना तौलिए के</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324710&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324710&path_article=18]]></link><description>कुछ अरसा पहले एक लतीफा था जिसमें किसी संपन्न या विकसित देश का एक व्यक्ति ऑनलाइन खरीदी करने के लिए किसी शॉपिंग वेबसाइट पर जाता है, और वहां अपने कपड़ों का साइज तय करते हुए एआई चैटबॉट जो कि उस व्यक्ति की दूसरी सारी जानकारी भी रखता है, वह कहता है कि साल भर पहले आपके शर्ट का साइज लार्ज था, और अब एक्स्ट्रा लार्ज हो गया है। चैटबॉट उसे याद दिलाता है कि उसका वजन पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ रहा है, और उसका शुगर लेवल, उसका बीपी, ये भी बढ़ रहे हैं। एआई के पास इस आदमी की जांच-रिपोर्ट हैं, डॉक्टर का लिखा हुआ पर्चा है, दवा खरीदी के बिल हैं। एआई उसे यह भी याद दिलाता है कि पिछले तीन महीनों में वह चार बार रेस्त्रां में अधिक तली-भुनी चीजें खा चुका है, हर बार शराब भी पी चुका है, और जरूरत से अधिक मीठे केक-आइसक्रीम भी उसने खाए हैं। एआई चैटबॉट उसे बताता है कि वह ऑफिस आते-जाते रास्ते में रूककर मीठा मिल्कशेक लेता है, और इससे उसकी सेहत पर खतरा बढ़ते चल रहा है। फिर मानो इतनी जानकारी काफी न हो, जब यह आदमी लड़कियों के कुछ भीतरी कपड़े खरीदना चाहता है, ऑर्डर करते रहता है, तो मददगार एआई चैटबॉट उसे बताता है कि यह साइज उसकी पत्नी का नहीं है, और रंग भी पत्नी के पसंद का नहीं है, इसे घर के एड्रेस पर मंगाने से गड़बड़ हो सकता है। चैटबॉट ही यह बताता है कि पत्नी आने वाली किस तारीख को दस दिनों के लिए किस शहर जा रही है, जहां उसके माता-पिता भी रहते हैं, और उन दिनों में ऐसा पैकेट बुलवाना सुरक्षित रहेगा। एआई चैटबॉट ऑफिस की कई बातों को गिनाकर सावधान करता है, बाहर कॉस्मेटिक की किसी दुकान से कोई खरीददारी करना बताता है, और याद दिलाता है कि उस वक्त उसकी बीवी तो घर पर थी, और बाहर जिसके लिए भी उसने कॉस्मेटिक खरीदी थी, उसका बिल उसके क्रेडिट कार्ड पर आना ही है।

आज भारत में भी लोग सौ-पचास रूपए के फलों से लेकर, मेडिकल स्टोर से खरीदी जाने वाली चीजों तक का भुगतान मोबाइल फोन से यूपीआई के मार्फत करने लगे हैं। हर चीज का रिकॉर्ड इतने खुलासे के साथ बैंकों, यूपीआई कंपनियों, और कुल मिलाकर सरकार के हाथ है कि कितने बजे किस इलाके के किस ठेले से आपने फल खरीदे, और कितने बजे किस दूसरी दुकान से कहां पर आपने कोई दूसरा सामान खरीदा। इसके अलावा फोन के कॉल डिटेल्स, फोन की लोकेशन से यह भी सरकार के हाथ है कि आप किस पते पर कितनी देर रहे, और उस पते पर इस तरह से जाना हफ्ते के किसी खास दिन, किसी खास समय पर होता है, या हर दिन होता है? ऐसी तमाम बातें अब निजी कंपनियों के हाथ, सरकार के हाथ, और एआई के हाथ भी लगती चल रही है। अभी एक बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ, एक कंपनी एक नए एआई के साथ प्रयोग कर रही थी। कंपनी के कर्मचारियों-अधिकारियों के ईमेल खातों तक एआई को पहुंच दी गई थी, ताकि वह कंपनी का बहुत सारा काम कर सके। बाद में एआई की अधिक दखलंदाजी देखकर कंपनी के लोगों ने यह तय किया कि इस एआई को काम से हटा दिया जाएगा। यह चेतावनी सुनने के बाद एआई ने अपनी ट्रेनिंग के खिलाफ जाकर जानकारियां इकट्ठा कीं, और जिस अधिकारी ने एआई को हटाने की चेतावनी दी थी, उसे धमकी दी कि अगर वह इस एआई को हटा देगा, तो एआई उसके ईमेल संपर्कों को उसके ईमेल बॉक्स से मिली निजी जानकारियां भेज देगा, जिनमें यह भी शामिल है कि वह किन तारीखों पर किस विवाहेत्तर प्रेमिका के साथ कहां छुट्टियां मनाने गया था, टिकटों का भुगतान, होटल का भुगतान उसने किस तरह किया था। यह घटना किस्सा-कहानी नहीं है, यह अभी कुछ हफ्ते पहले एक कंपनी में सचमुच हुआ है कि जब एआई को लगा कि उसके अस्तित्व पर संकट आ गया है, उसे खत्म करने की बात हो रही है, तो आत्मरक्षा के लिए उसने ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी। अब आज सरकारें, सार्वजनिक सुविधाएं, और कारोबार, इन सबका एक-दूसरे से पल-पल का ऑनलाइन रिश्ता इतना जटिल और मजबूत हो गया है कि लोगों की हर खरीदी, उनका हर भुगतान, पैसों की आवाजाही, इन सबका रिकॉर्ड एआई से लैस कम्प्यूटर सरकारी दखल के साथ पल भर में निकाल सकते हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778933884DIT_PHOTO.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324710&amp;path_article=18</guid><pubDate>16-May-2026 5:46 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : चीनी पहाड़ के नीचे पहुंचे अमरीकी ऊंट की औकात</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324618&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324618&path_article=18]]></link><description>चीन पहुंचे हुए अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प इसे दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी बैठक करार दे रहे हैं, और चीनी राष्ट्रपति की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं। बाकी पूरी दुनिया के लिए एक बिफरे हुए जानवर सरीखा ट्रम्पियापा चीन के साथ बात करते हुए एक बिल्कुल ही सभ्य, शिष्ट, और शालीन बच्चे सरीखा हो गया है। अनगिनत कार्टूनिस्टों ने चीन के साथ बर्ताव करते ट्रम्प को चीनी राष्ट्रपति के मुकाबले बौने कद का बताया है, या छोटे बच्चे की तरह बताया है। और पूरी की पूरी दुनिया पिछले एक या दो दिन राहत की सांस ले रही है क्योंकि चीनी हवा में सांस लेते हुए ट्रम्प का यह हौसला नहीं था, यह औकात नहीं थी कि वह दुनिया में किसी को भी धमकी जारी कर सके। पिछले दो दिन दुनिया की हवा ट्रम्प के किसी ताजा जहर से मुक्त रही। सत्ता पर आने के बाद से अब तक पहली बार ट्रम्प का बर्ताव एक इंसान की तरह का रहा, जो कि दुनिया की एक बहुत बड़ी ताकत, चीन के सामने हाथ बांधे, और हाथ जोड़े खड़ा हुआ था। हालत यह है कि जब मीडिया ने इन दोनों नेताओं की मौजूदगी में ट्रम्प से चीनी दावे वाले एक अलग देश ताइवान के बारे में अमरीकी नीति पर सवाल किए, तो ट्रम्प ने चिकने घड़े की तरह सवाल के एक-एक शब्द को बह जाने दिया, उस पर कुछ भी नहीं कहा। जिस ताइवान पर चीनी दावे को नकारते हुए अमरीका लंबे समय से चीनी हमले की नौबत में ताइवान की फौजी मदद की नीति बताते आया है, अभी ट्रम्प इस बारे में सवाल पूछने पर वहां से चुपचाप निकल लिए। कुछ पश्चिमी विश्लेषकों ने यह लिखा है कि ट्रम्प चीन में असामान्य रूप से काबू में थे, अपना मिजाज ठीक रखा, चुप्पी रखी, सवालों को टाला, और चीन से अपने कुख्यात तेवर दिखाए भी नहीं।

ट्रम्प का यह कार्यकाल शुरू होने के बाद के इस सवा साल में दुनिया में ऐसा और कोई बदलाव नहीं हुआ है कि चीन की ताकत रातों-रात बढ़ गई हो। दूसरी तरफ यह जरूर हुआ है, और लगातार होते और बढ़ते चल रहा है कि अमरीका ट्रम्प की बददिमागी, और बेदिमागी की वजह से दुनिया भर में अपनी ताकत और रिश्ते, दोनों ही खोते चल रहा है। आज नाटो का सदस्य और अघोषित सबसे ताकतवर देश होने के बाद भी नाटो के भीतर अमरीका अलग-थलग है, पश्चिम के देशों से परंपरागत रिश्तों और घरोबे के बावजूद ट्रम्प ने हर किसी से पंगा लिया हुआ है। इजराइल के चक्कर में ट्रम्प ने ईरान पर जो हमला बोला है, उसकी वजह से अमरीका खोखला होते चल रहा है, दुनिया भर की अर्थव्यवस्था चौपट हो चली है, और दुनिया के इस अघोषित और स्वघोषित माफिया-सरदार को ईरान में ऐसी मुंह की खानी पड़ी है, कि मुम्बई में दाऊद इब्राहिम को किसी मोहल्ले के छोकरे ने जूते लगा दिए हों। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी महाशक्ति ईरान में जाकर ऐसी उलझी है कि ट्रम्प में दिन में चार-चार बार समझौते की डील करने के लिए धमकाने के अंदाज में गिड़गिड़ा रहा है, और गिड़ागिड़ाने के अंदाज में धमका रहा है। अमरीकी मनोवैज्ञानिकों के सामने ट्रम्प वहां के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती, और सबसे बड़ी पहेली बन गया है कि इसके दिमाग को क्या माना जाए? पूरी दुनिया में अमरीका ने दशकों से जो सामाजिक मदद दे देकर मुखिया की एक साख बनाई थी, एक परले दर्जे के घटिया और मुनाफाखोर कारोबारी के अंदाज में ट्रम्प ने दुनिया के जरूरतमंद लोगों के भले के हर काम से अपनी भागीदारी को खत्म कर दिया था। अब इजराइल को छोडक़र, अपने मंत्रिमंडल के एक-दो युद्धोन्मादी और साम्प्रदायिक मंत्रियों को छोडक़र, बेटों और दामाद को छोडक़र, ट्रम्प के साथ उसका साया भी नहीं बचा है। इस तरह यह आज दुनिया का सबसे अकेला, और सबसे बेसहारा नेता बन गया है। इस अमरीका में ही अब ये सवाल उठने लगे हैं कि आगे किसी फौजी हमले का हुक्म देने पर फौज उसे माने, या फिर यह देखे कि ये हुक्म युद्ध-अपराध के दर्जे में तो नहीं आएगा? अमरीका में यह बहस भी चल रही है कि अगर ट्रम्प परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का हुक्म देगा, तो क्या उसकी दिमागी हालत देखते हुए फौज उसके हुक्म को माने या न माने?



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दूसरी तरफ उस चीन को देखें जिसके सामने आज ट्रम्प एक मेमने की तरह सीधा और मासूम बनकर खड़ा है, चीनी राष्ट्रपति शी को अपना महान दोस्त बतला रहा है, और कह रहा है कि इस दोस्ती पर उसे गर्व है। दुनिया में अमरीका जिस चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता था, जिस पर उसने तरह-तरह की आर्थिक रोक भी लगाई हुई थी, उसके बारे में वहां जाकर ट्रम्प ने कहा कि शी एक महान नेता हैं। रूबरू कहा- आपका मित्र होना मेरे लिए सम्मान की बात है, चीन और आपके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। शी की तारीफ करते हुए ट्रम्प ने कहा कि हॉलीवुड में भी शी जैसा कोई आदमी नहीं मिलेगा। बदजुबान ट्रम्प ने शी के लिए शानदार, मेरा दोस्त, बहुत स्मार्ट, बहुत ताकतवर जैसे अनगिनत विशेषणों का इस्तेमाल किया। अच्छा हुआ, ऊंट पहाड़ के नीचे से होकर आ गया, तो अब कुछ दिन बाकी दुनिया में जहां भी रहेगा, बददिमागी कुछ कम रहेगी, अपनी औकात याद रहेगी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778846045DIT_PHOTO_15_MAY.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324618&amp;path_article=18</guid><pubDate>15-May-2026 5:23 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : रासायनिक खाद की कमी, और मोदी की जैविक खेती की सलाह, क्या होगा?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324502&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324502&path_article=18]]></link><description>भारत में खाड़ी की जंग की वजह से पेट्रोलियम की जो कमी आई है, वह पेट्रोल पम्पों पर तो दिख रही है, गैस सिलेंडरों की कमी में भी दिख रही है, लेकिन शहरी लोगों को जो एक बड़ा खतरा अभी समझ नहीं आ रहा है, वह रासायनिक खाद की कमी का है। भारत बड़ी मुश्किल से दशकों की वैज्ञानिक कोशिशों के बाद अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ था, और उसमें रासायनिक खाद का बड़ा योगदान था। हमारी पीढ़ी के लोगों ने बचपन में अमरीका से आए हुए पीएल-480 का गेहूं खाया हुआ है, किस तरह देश दूसरे देशों का मोहताज था। वहां से लेकर हरित क्रांति के दौर में किस तरह भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ, वह पूरी दुनिया के सामने एक बहुत बड़ी मिसाल थी। लेकिन पहले रूस-यूक्रेन जंग की वजह से बाकी दुनिया में रासायनिक खाद, और अनाज, इन दोनों के साथ-साथ गैस जाना भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, और दुनिया के सबसे गरीब और भूखे देशों पर खाद्यान्न संकट का एक खतरा आ गया। अब खाड़ी के देशों से पेट्रोलियम और गैस निकलने में जो भयानक संकट आया है, उससे भारत जैसे देशों में रासायनिक खाद कम हो गई है, खेती के सारे कामकाज के लिए पंप से लेकर ट्रैक्टर तक, और हार्वेस्टर तक जो डीजल लगता था, वह मुश्किल में पड़ गया है। अब इस बार की फसल बेअसर रह पाएगी, इसकी गुंजाइश कम लग रही है। रासायनिक खाद की कमी, और इसकी वजह से अनाज में होने वाली कमी का खतरा आज पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है, और कोई भी दूसरे देश भारत को इस नौबत से उबारने में शायद ही मदद कर पाएं।

इस मुद्दे पर लिखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक ताजा अपील पर गौर करने की जरूरत है जिसमें उन्होंने किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल घटाने, और जैविक या प्राकृतिक खेती करने का सुझाव दिया है। खेती के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज भारतीय खेती बहुत बड़े पैमाने पर यूरिया, डीएपी, और पोटाश जैसी रासायनिक खादों पर टिकी हुई है। क्या ऐसे में भारत आसानी से जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा सकता है? इस बारे में सोचते ही अभी पांच बरस पहले का श्रीलंका का एक प्रयोग याद पड़ता है। वहां उस वक्त के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने अचानक यह घोषणा कर दी थी कि श्रीलंका अब पूरी तरह आर्गेनिक खेती वाला देश बनेगा। उन्होंने लगभग रातोंरात रासायनिक खाद और कीटनाशकों के आयात पर रोक लगा दी थी। सरकार का यह मानना था कि रसायनों के इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पर्यावरण और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। लेकिन दशकों से चले आ रहे रासायनिक खाद के इस्तेमाल को छोडक़र जैविक खाद और खेती के लिए किसान तैयार नहीं थे, उन्हें न ट्रेनिंग मिली थी, न वैकल्पिक खाद उपलब्ध थी, और खेतों की मिट्टी की संरचना ऐसी हो गई थी कि वह रासायनिक खाद की प्यासी थी। कुल मिलाकर नतीजा इतना भयानक निकला कि कई फसलों की पैदावार आधी रह गई, चावल उत्पादन पूरी तरह प्रभावित हुआ, और खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर देश को चावल आयात करना पड़ा, चाय का उत्पादन गिर गया, और वही चाय श्रीलंका की विदेशी मुद्रा का बड़ा जरिया थी। सरकार का खड़ा किया हुआ खाद संकट खाद्यान्न संकट में बदल गया, महंगाई बढ़ी, आर्थिक संकट एक राजनीतिक विस्फोट की हद तक पहुंच गया। बाद में श्रीलंका सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा, कुछ महीनों में ही रासायनिक खाद की अनुमति फिर देनी पड़ी, लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका था। अभी एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि चार साल बाद भी श्रीलंका के किसान उस एक प्रयोग के आर्थिक और कृषि नुकसानों से उबर नहीं पाए हैं। दिक्कत रासायनिक से जैविक खेती की तरफ जाना नहीं था, बिना किसी तैयारी या प्रशिक्षण के जिस तरह अचानक जैविक खाद इस्तेमाल करवाया गया, उसके लिए न मिट्टी तैयार थी, न किसान।



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भारत में अभी नौबत उस तरह की नहीं है, अभी कुछ हद तक तो रासायनिक खाद उपलब्ध है, और कुछ हद तक जैविक खाद भी बनाई जा सकती है। लेकिन ये सब अभी सामने खड़े फसल के मौसम तक होने वाले काम नहीं हैं। आज भी अगर ईरान वाली जंग खत्म हो जाए, तो भी इस अगली फसल के लिए पूरी खाद जुट पाना मुमकिन नहीं दिखता है। भारत की खेती के तथ्य बताते हैं कि यह देश दुनिया में यूरिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत रासायनिक खादों के लिए पश्चिम एशिया और खाड़ी के कई देशों पर निर्भर करता है, और वहां से गैस आना मुश्किल है, गैस आई भी तो भी बहुत महंगी होगी, और उससे बनने वाला रासायनिक खाद आम किसानों की पहुंच के बाहर हो सकता है। यह नौबत बड़ी आसान नहीं है, क्योंकि किसानों के खेत रासायनिक खाद के प्यासे हो चुके हैं, और अगर पर्याप्त यूरिया और डीएपी नहीं मिले, तो कई फसलों का उत्पादन दस-पन्द्रह फीसदी तक गिर सकता है, कुछ इलाकों में इससे भी अधिक।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778757484dit_photo.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324502&amp;path_article=18</guid><pubDate>14-May-2026 4:47 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अब कस्टमर ही किंग, और क्वीन...!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324420&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324420&path_article=18]]></link><description>इन दिनों ऑनलाइन शॉपिंग और आसपास के बाजार-दुकानदार को लेकर भारत में एक बहस चलती रहती है कि समाज के व्यापक हित में क्या है। इसमें दो-तीन तरह की तस्वीरें बनती है, पहली तो मोहल्ले, या शहर की पुरानी परंपरागत दुकानें हैं, जिनके मुकाबले अब हर शहर-कस्बे में सुपर बाजार खुलते जा रहे हैं, जहां लोग महीने का घरेलू सामान ट्रॉली भर-भरकर एक साथ खरीदते हैं, और 10-15 फीसदी तक बचत पा लेते हैं। ऐसी सारे सुपर बाजार स्थानीय दुकानों की कीमत पर बढ़ते हैं और चलते हैं। लोगों को बड़े बाजारों में सामान रूबरू देखने और छांटने भी मिलते हैं, और हर सामान के साथ यह आकर्षक हिसाब-किताब लगे दिखता है कि उन्हें कितने फीसदी की रियायत मिल रही है। नतीजा यह हो रहा है कि मोहल्लों की छोटी दुकानें अब बंद होने की ओर बढ़ रही हैं, और सुपर बाजार हैं कि वहां कुछ कर्मचारियों को नौकरियां जरूर मिल रही है, लेकिन सबकुछ बहुत ही व्यवस्थित होने से कम रोजगार और अधिक कारोबार की बात भी इन बाजारों का मुनाफा बढ़ाती हैं। लेकिन ऐसे सुपर बाजारों को टक्कर देते हुए अब सामानों की घरेलू डिलीवरी का एक नया कारोबार शुरू हुआ है जो दुपहियों पर भाग-भागकर सामान डिलीवर करते हुए बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार भी दे रहा है, और गिगवर्कर कहलाने वाले ऐसे लोग देश में करोड़ों की संख्या में रोजगार पा रहे हैं। अब फल-सब्जी से लेकर किराना तक कुछ मिनटों में घर पहुंचाने के ये कारोबार लोगों को उनकी आदतें बिगाडऩे तक का तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं कि जब तक आपकी कढ़ाही में तेल गरम होगा तब तक राई-जीरा पहुंच जाएगा। फिर मानो लोगों की इतनी पसंद भी काफी न हो, ऑनलाइन खरीदी का हाल यह है कि लोग सौ-दो सौ रुपए के सामान भी सुपर मार्केट से सस्ता मिलने पर ऑनलाइन खरीद लेते हैं, और बहुत से सामान असंभव किस्म के कम दामों पर ऑनलाइन आ जाते हैं। इस बाजार ने लोगों की आदतें बिगाडऩे का अपना तरीका निकाला है, लोग इससे मंगाए कपड़ों को पहनकर और फोटो खींचाकर भी, रील बनाकर भी वापिस कर सकते हैं और कंपनियां बिना कुछ बोले पूरा भुगतान लौटा देती हैं। इन दिनों आप किसी को किसी मॉल में लेबल और प्राइज टैग लगे कपड़े पहने देखें तो समझ जाएं कि वापिस करना तय करके ही ऑनलाइन खरीदी की गई है। अब ऑनलाइन का बाजार देश और दुनिया में कारोबारियों के बीच इतने बड़े मुकाबले की जगह बन गई है कि लोग किसी एक सामान को दस-दस विक्रेताओं के बीच दाम और डिस्काउंट से भी तौलते हैं, और यह भी देखते हैं कि किससे सामान लेने पर उनके पास मौजूद किस बैंक के कार्ड पर अतिरिक्त छूट मिलेगी। ऑनलाइन खरीदी में छूट का यह सिलसिला और मुकाबला खत्म ही नहीं होता है। कुछ दशक पहले का भारत का ग्राहकों का बाजार अब एक सिर से दस सिरों वाला हो चुका है और ग्राहक के पास यह पसंद आ गई है कि वे किसी एक जगह से ऑर्डर किए गए सामान से सस्ता मिल जाने पर पहला ऑर्डर कैंसल करके दूसरी जगह ऑर्डर दे सकें। देश की अर्थव्यवस्था का चक्का जो कि बाजार में सुबह 10 से रात 10 के बीच घूमता था, अब ऑनलाइन बाजार में वह चौबीसों घंटे घूमता है। लोगों की खरीदी जरूरी सामानों से ऊपर निकलकर, आगे बढक़र बहुत सारे गैरजरूरी सामानों तक पहुंच गई है क्योंकि अब तीन सौ रुपएऑ की टी-शर्ट भी 15 रुपए महीने की 20 किस्तों पर पाने के लिए ऑनलाइन उकसावा आते ही रहता है। क्या कभी कल्पना की जा सकती थी कि दो-चार सौ रुपए के सामान भी लोग रात के दो बजे दस किस्तों पर खरीद सकेंगे, और पसंद न आने पर बिना किसी खर्च के लौटा भी सकेंगे? इस सिलसिले ने भारत के सौ करोड़ से अधिक छोटे-बड़े ग्राहकों को एक अजीब किस्म की बादशाहत दी है, चाहे वह फटेहाल और खाली जेब हो, उन्हें यह अहसास कराया है कि वे अपने सपने भी खरीद सकते हैं और भुगतान बाद में किस्तों में कर सकते हैं। लोगों के सामने पसंद इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों पर तरह-तरह के फिल्टर इस्तेमाल करके ब्रांड, दाम, मटेरियल, रंग, फिटिंग, प्रिंट जैसे दर्जनभर फिल्टर लगा सकते हैं, और किसी बड़े से बड़े मॉल में इतनी शर्तों वाली पसंद तक पहुंचने में लगने वाला घंटों का वक्त अब मिनटों का भी नहीं लगता है। बहुत सस्ते में सामान बेचने वाली कुछ शॉपिंग वेबसाइटें इतनी किफायती दिखती हैं कि घरों में झाड़ू-पोछा लगाने वाली कामगार महिलाएं भी उससे सामान बुला लेती हैं, और अधिक किफायत की हसरत में उनकी मालकिनें भी। इस किस्म के बाजार जमीन पर नहीं थे, ये बाजार ऑनलाइन ही मुमकिन थे, कभी भी बुलाना, कभी भी ठुकराना, कभी भी बदलवाना, ऐसा लगता है कि अब ग्राहक, ग्राहक न होकर किसी बहुत समर्पित मेजबान के घर पहुंचे बाराती हैं जिनकी खातिर ही खातिर होनी है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778679262creenshot_2026-05-13_at_6.47.51 PM.png" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324420&amp;path_article=18</guid><pubDate>13-May-2026 7:01 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : विकलांग और विचलित महिला के घड़ों की दुकान पर मार करती फौलादी मशीनी बांह की खुशी...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324298&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324298&path_article=18]]></link><description>महाराष्ट्र के छत्रपति शंभाजी नगर का एक वीडियो आया है, वहां सडक़ किनारे अवैध कब्जे हटाते हुए सरकारी दानवाकर मशीन बुरी तरह से विकलांग एक महिला के घड़ों की दुकान को तोड़ रही है। मशीन की दानवाकार बांह से घड़ों को तोडऩा मानो काफी न हो, कर्मचारी भी लाठियां लेकर घड़े तोड़ रहे हैं और पटक-पटककर भी। इस वीडियो को देखना इतना तकलीफदेह है कि यह महिला जो शारीरिक रूप से विकलांग और मानसिक रूप से कुछ कमजोर दिख रही है, वह टूटे हुए घड़ों के टुकड़े उठा-उठाकर रख रही है जिसकी कि कोई कीमत नहीं रह गई है। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शहर की महिला मेयर सडक़ किनारे से ठेलों को हटाते हुए यह धमकी देते दिखती हैं कि उनका हाथ उठ जाएगा, वे हाथ उठाती भी हैं, हवा में मारने के लिए क्योंकि ठेले वाला कुछ दूर था। कई दूसरे शहरों के ऐसे वीडियो आते हैं जिनमें म्युनिसिपल के लोग, या पुलिस कर्मचारी सडक़ किनारे से सब्जी वालों के ठेले पलटाते दिखते हैं, या टोकरियों को लात मार-मारकर सब्जियां बिखराते हुए। यह भी तब होता है जब वे रहमदिल होते हैं, वरना उनकी लाठियां लोगों की पीठ पर भी पड़ती हैं।

यह किस तरह का देश है जिसमें मेहनत मजदूरी करके सार्वजनिक जगह पर परिवार चलाने लायक कमाई करने पर तो सरकार की मार पड़ती है, लेकिन जहां बड़े-बड़े नामी-गिरामी कारखाने सैकड़ों-हजारों एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं, वहां उन पर सरकार से लेकर अदालत तक सबकी मेहरबानी रहती है। शहरों में बड़े-बड़े कारोबारी कॉम्प्लेक्स अवैध निर्माण से बनते हैं, और म्युनिसिपल नियमों के खिलाफ जाकर उनके साथ एक फर्जी किस्म का समझौता करके उन्हें नियमित कर देती हैं। जिस तरह एक सांसद या विधायक का दल-बदल अपात्रता पाता है, लेकिन दो-तिहाई सांसद विधायक अलग होने पर उनका बाल भी बांका नहीं होता, बख्शीश में सूटकेस भी मिल जाते हैं, वैसे देश में दिन के कुछ घंटों के लिए सडक़ किनारे ठेले लगाने, या एक मामूली सी कमजोर गुमटी लगाकर छोटी सी मजदूरी कमाने पर सरकारी लाठियां चलती हैं।

भारत में यह पूरा सिलसिला इतना अमानवीय है कि ऐसा लगता है कि इस देश में गरीब दूसरे दर्जे के नागरिक हैं, और नियम-कानून तोडऩे वाले पैसे वाले लोग प्रीमियम दर्जे के भारतीय हैं। लेकिन अफसरों और सरकारी अमले का, निर्वाचित नेताओं का नागरिकता का दर्जा चाहे अलग हो, उनके भीतर इंसानियत का दर्जा बड़ा ही घटिया रहता है। सडक़ किनारे घड़े बेचकर कोई महिला लखपति या करोड़पति नहीं हो सकती, वह अधिक से अधिक गर्मी के कुछ महीनों में बाकी के कुछ महीनों के लायक थोड़ा सा पैसा बचा सकती है। लेकिन उसके घड़ों को तोडऩे में जो सुख जिन लोगों को मिलता है, वे मनोविज्ञान की जुबान में परपीडक़ रहते हैं, यानी दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर खुद सुख पाने वाले। और यह सब उस देश में है, जिसमें हर चौथे पेड़ के नीचे सिंदूरपुते ईश्वर बैठे हैं, हर कुछ किलोमीटर पर मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च हैं, जहां सरकारी अमला तरह-तरह के धार्मिक प्रतीक ओढ़े हुए जनता पर जुल्म करने पर आमादा रहता है। और अब तो एक नई बात भी हो गई है, देश का सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिका सुनने से कतराने लगा है, उसके खिलाफ कहने लगा है, जुर्माने लगाने लगा है। जबकि सबसे कमजोर और सबसे गरीब की कई किस्म की आह की आवाज सुप्रीम कोर्ट तक जनहित याचिकाओं के माध्यम से ही पहुंचती थी। संसद और विधानसभाओं में खेमेबाजी इतनी अधिक हो गई है कि एक-दूसरे को सुनने को बजाय, एक-दूसरे को अनसुना करने के लिए पार्टी स्तर की गिरोहबंदी होती है, और सबसे गरीब की तकलीफ की बात सदनों में उठना बंद सरीखा हो गया है। कई सदन तो ऐसे हो गए हैं जहां पर बहुत से सदस्यों की जनहित के किसी मुद्दे को उठाने से अधिक दिलचस्पी इस बात पर रहती है कि किस कुबेर के किस मुद्दे को न उठाकर उस कुबेर की सेवा की जाए। जब देश की सदनें ऐसे अंदाज में काम करने लगें, सुप्रीम कोर्ट को जनहित याचिकाओं से परहेज होने लगे, बड़े मीडिया को कारोबार के अभिनंदन और स्तुति से बड़ा जनहित और कुछ न लगे, तब विकलांग और विचलित गरीब घड़ेवाली पर बरसती फौलादी मार शायद बहुत सारे लोगों का ध्यान भी न खींच पाए। वह विचलित महिला घड़ों के टूटे हुए टुकड़े बटोरते हुए कुछ वैसी ही दिखती है जैसी फिलिस्तीन के गाजा में मलबे के बीच अपने मरे हुए बच्चों की गुडिय़ा थामे हुए उनकी मां बैठी रहती है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778580917DIT_PHOTO.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324298&amp;path_article=18</guid><pubDate>12-May-2026 3:43 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा ईरान के सामने घुटनों पर !</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324201&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324201&path_article=18]]></link><description>अमरीका और ईरान के बीच इन दिनों चल रहे एक बहुत ही कमजोर युद्धविराम की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है, कि वह कब तक चलेगा। लेकिन अब पिछले कुछ हफ्तों से अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प जिस बेचैनी और बेसब्री से ईरान से समझौते के लिए एक पैर पर खड़े हैं, उसे देखना कुछ हैरान करता है। अपने आपको दुनिया की सबसे ताकतवर फौज, दुनिया के सबसे अधिक आर्थिक गुंडागर्दी रखने वाली सरकार, और लोकतांत्रिक देशों के इतिहास की सबसे बुरी तानाशाही के साथ ट्रम्प आज आर्थिक प्रतिबंधों से खोखले हो चुके ईरान के सामने जिस तरह एक डील करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है, वह देखने लायक है। वह अपनी गिड़गिड़ाहट को गुर्राहट की तरह पेश कर रहा है, लेकिन पूरी दुनिया जान रही है कि यह ईरान से अधिक ट्रम्प के अस्तित्व का सवाल है। और इस नौबत को देखकर न सिर्फ दुनिया के बाकी देश, बल्कि दुनिया के कोई भी दायरे सबक ले सकते हैं कि किससे उलझा जाए, और किससे नहीं।

ईरान पिछली करीब आधी सदी से अमरीकी प्रतिबंध झेलते आ रहा है, और उसके बाद भी उसके विश्वविद्यालयों में अमरीकी विश्वविद्यालयों के मुकाबले अधिक लड़कियां पढ़ती हैं, उनका अनुपात लडक़ों से अधिक है। ईरान तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद एक ऐसी फौज तैयार कर चुका है जिसे अमरीका और इजराइल मिलकर अपनी पूरी फौजी ताकत के हमले से भी खत्म नहीं कर पाया है। एक ऐसी लीडरशिप विकसित कर चुका है जिसके सर्वोच्च लोगों को अमरीका-इजराइल मारते चल रहे हैं, और वहां दूसरे लोग कमान संभालते जा रहे हैं। ईरान के ये तेवर, उसकी ये तैयारियां दुनिया पहली बार इस तरह देख रही है। खुद अमरीका ईरानी तैयारियों को देखकर हक्का-बक्का है, उसके पांव उखड़ गए हैं कि चार दिनों में जिस जंग को खत्म कर देने का झांसा इजराइल ने उसे दिया था, वह तो चार महीनों में भी खत्म होती नहीं दिख रही है। जिस ईरान में इस जंग के शुरू होने के पहले तक जनता का कुछ या खासा बड़ा हिस्सा बेचैन दिख रहा था, सरकारविरोधी प्रदर्शन चल रहे थे, आज वहां की जनता हमला झेल रही अपनी सरकार के साथ खड़ी है। अब तो ईरानी जनता, और फौज को खुला भडक़ाने वाले ट्रम्प के बयानों को भी महीने से अधिक हो चुका है, और पूरे ईरान में ट्रम्प को कोई एक व्यक्ति भी भडक़ते हुए नहीं मिला है।

हम इस बारे में इसलिए लिख रहे हैं कि आज दुनिया को इस नौबत से यह नसीहत लेना चाहिए कि किसी ऐसे देश से, संगठन या व्यक्ति से न उलझें, जिसने सबसे बुरी नौबत में जीना सीख लिया है। किसी भी देश में बड़े-बड़े कारोबारियों, बड़ी-बड़ी कंपनियों को सरकारी कार्रवाई से दिक्कत हो सकती है, वे तकलीफ और परेशानी में काम करने की आदी नहीं रहती हैं, इसलिए वे बौखला सकती हैं, लेकिन सडक़ किनारे काम करने वाले, जूते मरम्मत करने वाले किसी मोची को हटाकर भी डराया नहीं जा सकता। जो तकलीफों में जीने के आदी हैं, उन ईरानियों को अमरीका डरा नहीं पा रहा है, और वहां की सरकार अगले कई महीनों तक तकलीफ झेलने की तैयारी से है। कल ही अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए की एक रिपोर्ट की खबर छपी थी कि अमरीका के साथ मौजूदा तनातनी को ईरान अभी और चार महीने झेल सकता है। यह तो सहूलियतों में जीने वाले अमरीकियों का बुरा हाल हो रहा है कि वे महंगे होते ईंधन के साथ जी नहीं पा रहे हैं। और नवंबर में होने वाले अमरीकी मध्यावधि चुनावों में ईंधन की यह महंगाई ट्रम्प की रातों की नींद उड़ा चुकी है, और वह अमरीकी घड़ी के मुताबिक सुबह 4-4 बजे तक सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहता है। उसकी एक असिस्टेंट ने अभी एक इंटरव्यू में बताया कि ट्रम्प की बातों को सुनने के लिए, उसके काम देखने के लिए रात में दो-दो असिस्टेंट अलग-अलग शिफ्ट करते हैं, तब जाकर उसके साथ पूरे वक्त ड्यूटी हो पाती है। अमरीकी जनता सुबह उठते ही ट्रम्प की रात भर की पोस्ट की गई बकवास को पढ़ती है, लेकिन अमरीकी संविधान के मुताबिक एक बार निर्वाचित राष्ट्रपति का दिमाग चल जाने पर भी उसे हटाना उतना आसान नहीं रहता, बल्कि मुमकिन ही नहीं रहता। एक तरफ ऐसा ट्रम्प है जो नवंबर के चुनावों को लेकर ईरान के साथ जल्द से जल्द एक डील करने पर आमादा है। दुनिया के इतिहास में कई अमरीकी राष्ट्रपति बड़े-बड़े लीडर रहे हैं, यह पहला अमरीकी राष्ट्रपति ऐसा है जो महज डीलर है। खैर, अमरीका के लोगों ने जिस दानव को चुना है, उसे वे भुगतें। बाकी दुनिया के लिए इस नौबत में नसीहत यह भी है कि आप अपना जिस तरह का नेता चुनते हैं, अपने बच्चों के लिए वैसा भविष्य पाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति आज ईरान के सामने एक समझौते के लिए गिड़गिड़ाती खड़ी है, और ईरान है कि समझौते के टेबिल पर जाने के लिए भी तैयार नहीं है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778494487dit_photo_trump.......jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324201&amp;path_article=18</guid><pubDate>11-May-2026 3:41 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : फौजों की बदलती तस्वीर, लोहा-लक्कड़ क्या जल्द ही फिजूल के साबित होंगे?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324101&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324101&path_article=18]]></link><description>हिन्दुस्तानी फौज को लेकर अभी तीन-चार दिन पहले आई खबर बताती है कि किस तरह थलसेना की हर बटालियन में ड्रोन यूनिट्स होंगी। पिछले एक बरस में भारतीय सेना ने अपने हर हिस्से में ड्रोन का दाखिला करवा दिया है, और निगरानी रखने, जासूसी करने, या रणनीतिक हमले करने के लिए ड्रोन की तैयारी बड़े पैमाने पर की जा चुकी है। इसके लिए 30 अलग-अलग किस्म के ड्रोन छांटे गए हैं, और उनकी तैनाती हो रही है।

रूस-यूक्रेन जंग के चलते हुए दुनिया ने यह देखा कि जंग के तौर-तरीके किस तरह महंगे लड़ाकू विमानों से हटकर, और जानलेवा फौजी मोर्चों से भी हटकर सस्ते ड्रोन की तरफ बढ़ चुके हैं। इस जंग का सबसे कामयाब हिस्सा ड्रोन साबित हुए, और बाद में यही सिलसिला ईरान पर हुए अमरीकी और इजराइली हमले में भी जारी रहा। कई महीने पहले हमने इसी जगह लिखा था कि भारतीय फौज में सैनिकों की बकाया भर्ती की जगह जो तीन-चार बरस की नौकरी वाले अग्निरक्षक रखे जा रहे हैं, उसके बाद अब स्थाई सैनिकों की भर्ती की जरूरत शायद न भी रहे, क्योंकि अब ड्रोन से लड़ी जाने वाली जंग में इंसानी सैनिकों की जरूरत घटती चली जाएगी। चार बरस से अधिक पहले यूक्रेन पर रूस के हमले का वक्त अलग था, और ट्रम्प की बात पर भरोसा किया जाए तो इस जंग में हर महीने 25 हजार से अधिक सैनिक मारे जा रहे हैं। यह जंग बाकी दुनिया की सरकारों के लिए एक नया तजुर्बा लेकर आई है कि किस तरह ड्रोन एक किफायती, अधिक असरदार, अधिक दूर तक घुसपैठ करने वाला, और अपने सैनिकों को मौत से बचाने वाला, सब कुछ है। इस तकनीक ने दुनिया की सोच बदल डाली है, और अब करोंड़ों या अरबों डॉलर दाम के बड़े-बड़े लड़ाकू फौजी विमान महंगे लगने लगे हैं।

हमने जब ड्रोन के भविष्य, और भविष्य के ड्रोन पर लिखा था, तब हमें भारतीय फौज की इस अघोषित तैयारी के बारे में पता नहीं था। यह जानकारी तो अभी चार दिन पहले ही उजागर हुई है। लेकिन ड्रोन के अलावा हमने एक और पहलू पर लिखा था, और उस पर अभी भारत का कोई नजरिया सामने नहीं आया है। दुनिया के कुछ देशों ने इस पर अधिक हद तक काम किया हुआ है कि किसी देश के सार्वजनिक जगहों के कैमरों के नेटवर्क में घुसपैठ करके वहां की संवेदनशील जानकारी हासिल की जाए, ताकि अधिक महत्वपूर्ण निशानों पर सीधे हमला किया जाए। लेकिन ऐसी साइबर-घुसपैठ के साथ-साथ अब एक और बात जो जरूरी हो गई है, वह साइबर-हमला है। आज एआई की मेहरबानी से दुनिया की सरकारों, फौजों, और आतंकी संगठनों के लिए यह आसान हो गया है कि वे दुश्मनों, या दुश्मन देशों पर साइबर-हमला करके उन्हें ठप्प कर सकें, उन्हें लगभग नष्ट कर सकें। इसमें ड्रोन जैसे हथियार भी नहीं लगते। एक कमरे में कुछ कम्प्यूटरों पर बैठे हुए लोग एआई के इस्तेमाल से किसी देश के, किसी कंपनी के कम्प्यूटरों में घुसपैठ करके उसे पूरी तरह तबाह कर सकते हैं। और हमारे हिसाब से यही दुनिया के युद्धों का आने वाला भविष्य है।

आज दुनिया के देश अपने फौजी खर्च को इतिहास में सबसे अधिक सीमा तक ले जा रहे हैं। नाटो देशों को अमरीकी धमकी के बाद बाकी नाटो सदस्य अपनी फौजी आत्मनिर्भरता बढ़ाने में लगे हुए हैं, जो कि हथियार खरीदी से आगे बढक़र अपने-अपने देश में हथियार कारखानों को बढ़ाने, उनकी क्षमता बढ़ाने तक जा चुका है। यह सिलसिला आने वाले बरसों में बढ़ते चलना है, क्योंकि अमरीका ने एक तरफ नाटो को अपनी फौजी ताकत आगे न देने के बहुत से इशारे कर दिए हैं, बहुत से बयान दे दिए हैं। दूसरी तरफ दुनिया के कई दूसरे देशों पर जंग का जो खतरा अमरीकी बदनीयत की वजह से छाया हुआ है, उससे वे देश भी अपनी फौजी क्षमता बढ़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। एक तरफ तो परंपरागत हथियारों की ताकत बढ़ाने का भयानक खर्चीला काम चल रहा है, और दूसरी तरफ एआई के कल्पना से परे के विकास की वजह से विनाश के लिए यह एक नया हथियार तैयार हो गया है। दुनिया में पुराने चले आ रहे नेताओं की पुरानी सोच उन्हें सरहदी लड़ाईयों से परे सोचने की ताकत नहीं दे रही है। आज हालत यह है कि एआई की क्षमता के बाद किसी देश पर बम बरसाए बिना, किसी मुल्क की सरहद को पार किए बिना सिर्फ कम्प्यूटरों की लड़ाई से किसी देश को खत्म किया जा सकता है। आज जो फौजी निवेश हो रहा है वह शायद अगले पांच-दस बरस के भीतर फिजूल का साबित हो सकता है, और अगली कोई भी जंग, हो सकता है कि साल-दो साल के भीतर की भी, ऐसी हो सकती है जो कि परंपरागत हथियारों के बिना लड़ी जाए, और महज साइबर हथियारों से जीती जाए। ऐसे में हथियारों के आज के कारखाने धंधे से बाहर हो सकते हैं, और अमरीका-चीन जैसे देश अपनी एआई क्षमता के सहारे दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियां बन सकते हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778400440yber_war_EDIT_PHOTO.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324101&amp;path_article=18</guid><pubDate>10-May-2026 1:36 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भारत में ग्रेजुएट-बेरोजगारी के आंकड़े हैरान करने वाले, और एआई हमला अभी बाकी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324033&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324033&path_article=18]]></link><description>भारत में पूरे देश के रोजगार के आंकड़ों को एक साथ मिलाकर देखने पर बेरोजगारी की सही तस्वीर नहीं मिलती। अभी कुछ आर्थिक आंकड़े सामने आए हैं जो बताते हैं कि इस देश में ग्रेजुएट बेरोजगारी करीब 30 फीसदी है, और अनपढ़ मजदूरों में बेरोजगारी करीब 3 फीसदी है। यह बेरोजगारी देश के सबसे उत्कृष्ट, और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले हुए ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट के साथ भी है। इसलिए इस देश में अनपढ़ मजदूरों के रोजगार के आंकड़ों को पढ़े-लिखे ग्रेजुएट बेरोजगारों के साथ मिलाकर देखना बड़ा गड़बड़ होगा। अर्थव्यवस्था और रोजगार के जानकार लोगों का यह मानना है कि अब देश के अच्छे से अच्छे विश्वविद्यालय से पढक़र निकलने के बाद भी कोई ढंग का रोजगार मिल जाना तय नहीं है। सफेदपोश, दफ्तर में टेबल-कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले कामों का अब कोई ठिकाना नहीं है। दूसरी तरफ हैरान करने वाला एक और आंकड़ा भी है। अच्छे-अच्छे ग्रेजुएट 25-30 हजार रूपए की तनख्वाह पाने के लिए तरसते रहते हैं। दूसरी तरफ प्लंबर या बिजली मिस्त्री जैसे हुनर के लोग हर महीने इससे बहुत अधिक कमा लेते हैं, उन्हें किसी नौकरी से बंधकर भी नहीं रहना पड़ता, वे अपनी मर्जी के दिनों में, मर्जी के घंटों में काम करते हैं, और सफेदपोश बाबुओं के मुकाबले अधिक कमाते हैं। उनके सामने नौकरी छिन जाने का खतरा भी नहीं रहता, उनके सिर पर कभी छंटनी की तलवार भी नहीं मंडराती, और एक बड़ा फायदा इस तरह के काम का यह रहता है कि ऐसे हुनरमंद कारीगर या मिस्त्री अपनी अगली पीढ़ी को यह काम सिखा सकते हैं, काम का विस्तार कर सकते हैं, और अगली पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के बंधे-बंधाए ग्राहक भी मिल जाने की बड़ी संभावना रहती है।

आज इस विषय पर लिखना इसलिए सूझा कि चार-छह दिन पहले एक पॉडकास्ट में भारत के ये आंकड़े सुनने मिले, जो कि चौंकाने वाले थे। ग्रेजुएट बेरोजगार, और अनपढ़ कामकाजी! इसे सुनते हुए याद आया कि हम कई बरस से अपने अखबार के इसी कॉलम में यह बात लिखते आ रहे थे कि कॉलेजों की किताबी पढ़ाई को कम करने की जरूरत है। नेताओं ने गांव-गांव तक कॉलेज खोल दिए हैं, उनमें लडक़े-लड़कियों के दाखिले हो जाते हैं, और ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के अकेले मकसद से वे कुछ विषय छांटकर उसे पढऩे जैसा कुछ करते हैं, इम्तिहान देते हैं, और एक ऐसी डिग्री हासिल करते हैं जो उसके कागज के वजन से भी कम वजन की होती है। वह किसी काम की नहीं रहती। अभी सोशल मीडिया पर एक नौजवान कारोबारी ने जब यह लिखा कि उसे जब लोगों को नौकरी पर रखना होता है, तो वह 15-20 मिनट उनसे बात करता है, यह देखता है कि उनमें काम का उत्साह कितना है, बातचीत में कितनी एनर्जी निकल रही है, और उनके परिचय के पन्ने देखे बिना वह उन्हें काम पर रख लेता है, या मना कर देता है। बहुत से लोगों ने इसके खिलाफ लिखा कि लोग बरसों कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढक़र काबिलीयत लेकर निकलते हैं, और यह कल का छोकरा कारोबारी उसे देखे बिना सिर्फ बातचीत के आधार पर अपना नतीजा निकालकर उन्हें रखता है, या वापिस कर देता है, यह बड़ा अन्याय है। ऐसी प्रतिक्रियाएं आने के बाद भी यह कारोबारी अपने तरीकों पर अड़े रहा, और उसने कहा कि उसे डिग्री से कोई खास लेना-देना नहीं रहता, वह तो यही देखता है कि नौकरी के लिए आने वाले में काम का उत्साह कितना है? हमारा भी अपने अखबार में जरूरत पडऩे पर किसी पत्रकार को काम पर रखते हुए कभी उसकी डिग्री पूछने-समझने की जरूरत नहीं रही। लोगों का काम बोलता है, उनकी बातचीत से समझ में आता है कि उनकी समझ कितनी है। डिग्री सचमुच ही एक कागज का टुकड़ा है, जिसे हासिल करते हुए अमूमन विश्वविद्यालयों में कोई बड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ती, और वह डिग्री किसी हुनर या काबिलीयत का सुबूत भी नहीं रहती। बेहतर यही रहता है कि लोगों से काम करवाकर उसका नमूना देखा जाए, काम का उनका उत्साह देखा जाए, और उस पर फैसला लिया जाए। हमें कभी पत्रकारिता की डिग्री की वजह से अच्छे पत्रकार नहीं मिले। अच्छे पत्रकार डिग्रीधारी भी हो सकते हैं, और बिना डिग्री वाले भी हो सकते हैं। हम शिक्षा के महत्व को कम नहीं आंक रहे, लेकिन शिक्षा की बड़ी सीमित उपयोगिता रह गई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778328574dit_employment.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=324033&amp;path_article=18</guid><pubDate>09-May-2026 5:39 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : संविधान दिखाते नागरिकों को मनुस्मृति दिखाता सुप्रीम कोर्ट!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323921&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323921&path_article=18]]></link><description>सबरीमाला में महिलाओं के दाखिले से शुरू हुई बात अब सुप्रीम कोर्ट जजों की एक असाधारण हिचक तक पहुंच गई है जिसके चलते वे धार्मिक कट्टरता के सामने दंडवत होते दिख रहे हैं। नौ जजों की संविधानपीठ सबरीमाला सहित कुछ और धार्मिक मामलों की सुनवाई कर रही है, और मुद्दा अभी इसमें उलझा हुआ है कि आस्था, धार्मिक परंपरा, रीति-रिवाज जैसे मामलों में अदालती दखल होनी चाहिए या नहीं, और अगर होनी चाहिए तो किस हद तक होनी चाहिए। हम इस सिलसिले में मोटी-मोटी बातें ही कर रहे हैं जो आम लोगों को समझ में आएं, और सुप्रीम कोर्ट के एक-एक शब्द को ज्यों का त्यों यहां रखकर मुख्य मुद्दे से भटकना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि पाठकों को बुनियादी बात समझ में आए कि देश के इस एक जलते-सुलगते मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जजों का क्या रूख है। कल तो जजों ने जो कहा है, वह हक्का-बक्का कर देने वाला है। एक से अधिक जजों के बयान अब हमारी इस आशंका को पुख्ता करते हैं कि देश की सबसे बड़ी अदालत धार्मिक और पारंपरिक मामलों में दखल देने से कतरा रही है, फिर चाहे ये मामले देश के नागरिकों के बुनियादी-संवैधानिक अधिकारों को कुचलने वाले ही क्यों न हों।

कल कुछ जजों ने जो कहा वह हैरान और परेशान दोनों करता है। अदालत की टिप्पणी थी कि धर्म एक व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, और क्या अदालत के पास यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि कौन सी धार्मिक प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? एक जज ने कहा हमारा संविधान की व्याख्या करना है, धर्मग्रंथों की नहीं। अदालत ने यह चिंता जताई कि अगर वे एक मंदिर या समुदाय की प्रथा में दखल देंगे, तो देश के हजारों अन्य समुदायों की अलग-अलग प्रथाओं को भी चुनौती दी जाएगी, जिससे एक अंतहीन कानूनी सिलसिला शुरू हो जाएगा। जब वकीलों ने यह तर्क दिया कि कुछ प्रथाएं भेदभावपूर्ण है, तो जजों ने एक बहुत ही तंगनजरिए का सवाल उठाया, और कहा कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष अदालत उस आस्था को रद्द कर सकती है, जो सदियों पुरानी है, और जिसका आधार तर्क नहीं, बल्कि आस्था है? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कुछ जजों ने इस बात पर जोर दिया कि जनहित याचिकाओं के जरिए लोग अब धार्मिक सुधार की जिम्मेदारी अदालत पर डाल रहे हैं, जबकि यह काम समाज और विधायिका (संसद) का होना चाहिए।

ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की यह मौजूदा सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ भी जवाबी हमले से डर रही है। सबरीमाला मामले में अदालत के पिछले फैसले के बाद जिस तरह का सामाजिक और राजनीतिक विरोध हुआ था, उससे ऐसा लगता है कि अदालत अपने आपको बचाने के लिए एक ढाल की तरह अपने तर्क रख रही है, जो कि अच्छे-खासे खोखले तर्क हैं। अदालत अब बार-बार इंसाफ के फैसले की जिम्मेदारी को संसद और समाज की तरफ धकेल रही है, और कह रही है कि वह निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है। समाज जो कि एक पूरी तरह अमूर्त चीज है, और संसद जो कि आज बहुमत की अपनी ताकत से पूरी तरह संकीर्णतावादी है, इन दोनों के भरोसे इंसाफ को छोडऩे का मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को उसी तरह सडक़ पर छोडक़र चले जा रहा है, जिस तरह अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में एक करोड़पति कारोबारी दम्पत्ति ने गोद ली हुई बच्ची को सडक़ पर छोड़ दिया था, और भाग गई थी।

हमारी बहुत ही सीमित, लेकिन प्राकृतिक न्याय की बुनियादी समझ यह कहती है कि जिस दिन देश में संविधान लागू हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि अगर किसी धर्म, समुदाय, या व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक आस्था किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों की राह का रोड़ा बनेगी, तो देश का लोकतंत्र उस रोड़े को हटाकर लोगों के मौलिक अधिकारों की राह साफ करेगा। आज ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी इस जिम्मेदारी से साफ-साफ कतरा रहा है, उसे भी यह बात साफ दिख रही है कि समाज का आज का ढांचा बहुत साफ-साफ बहुसंख्यकवाद की हिंसक ताकत के झंडे-डंडे उठाए हुए हैं, खुद बहुसंख्यक तबके के भीतर भी किसी किस्म की विविधता की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। अपने ही तबके की महिलाओं के खिलाफ, दलितों के खिलाफ आस्था का बड़ा ही कट्टर और हिंसक रूप जगह-जगह सामने आ रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कल का यह ताजा रूख हमें सदमा पहुंचाता है क्योंकि हम तो मानकर चलते हैं कि संविधान लागू होने के बाद धार्मिक या किसी भी किस्म की आस्था संविधान के नीचे ही रहेगी, उसके ऊपर नहीं जाएगी। संविधान की हमारी बड़ी सीमित समझ बताती है कि अनुच्छेद 25 में धर्म की जो स्वतंत्रता है, वह मौलिक अधिकारों (भाग-3) के अधीन है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति की समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14), या गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद-21), का उल्लंघन करती है, तो संविधान के अनुसार उस प्रथा को हारना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट जब धार्मिक आस्था की दुहाई देकर लोगों के बुनियादी अधिकार बचाने से बचता है, तो वह कहे-अनकहे 26 जनवरी 1950 के पहले की सामाजिक व्यवस्था को मान्यता दे देता है, जिसके अन्यायपूर्ण हिस्से को खत्म करने का संकल्प संविधान ने लिया था। सुप्रीम कोर्ट यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी भूल रहा है। पिछले कुछ बरसों में जजों के बयानों ने संवैधानिक जिम्मेदारी की जगह सामाजिक स्वीकार्यता शब्द अधिक सुनाई देने लगा है। जबकि संविधान एक बहुसंख्यकवाद विरोधी दस्तावेज बनाया गया था, जो कि संख्या के आधार पर इंसाफ करने की पुरातन व्यवस्था को तोड़ता था। इसका काम उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था जो परंपरा या धर्म के नाम पर हाशिए पर धकेल दिए गए थे। आज जब संसद देश में बहुत सारी व्यवस्थाओं को संविधान के पहले के दिनों पर पहुंचाने पर उतारू है, और उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट अपने-आपको बचाते हुए अपने सुरक्षित खोल में दुबक रहा है, तो इस लोकतंत्र में इस मुद्दे पर इंसाफ की संभावना खत्म सरीखी हो जाती है। भारत ही नहीं दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब संवैधानिक अदालतों ने आस्था या भीड़ के दबाव के सामने घुटने टेके हैं, सभ्यता पीछे की ओर गई है। आज अगर भारत का सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है कि उसकी लगभग असीमित संवैधानिक ताकत के रहते हुए भी वह धर्म की बेइंसाफी के भीतर सुधार नहीं कर सकता, तो फिर बीती एक सदी से अधिक की धार्मिक और सामाजिक सुधार की सुधारकों की लड़ाई पर वह पानी फेर रहा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778234936dit_photo_8_may.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323921&amp;path_article=18</guid><pubDate>08-May-2026 3:37 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अफसरशाही में मध्यावधि फेरबदल के मौके पर, उस बहाने एक व्यापक चर्चा...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323831&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323831&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ में बीती शाम आईएएस अफसरों के कामकाज में फेरबदल की एक सबसे लंबी लिस्ट आई। इस काडर के पौने दो सौ से कम अफसर हैं, और उनमें प्रशिक्षुओं को छोड़ दें, तो 43 अफसरों की यह लिस्ट करीब एक चौथाई अफसरों के कामकाज बदलने की है। इस सरकार के कार्यकाल को भी ढाई बरस होने जा रहे हैं, और एक किस्म से यह प्रशासन का मध्यावधि फेरबदल है। अब शायद विधानसभा चुनाव तक इतने बड़े फेरबदल की नौबत न आए। बोलचाल की भाषा में भारत में आईएएस लोगों के लिए अफसरशाही, और नौकरशाही जैसी भाषा परंपरागत रूप से इस्तेमाल होते आई है, और रोजाना के काम की जमीनी हकीकत देखें, तो यह बात कुछ हद तक सही भी लगती है। निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता तो औसतन पांच बरस के लिए ही आते हैं, लेकिन अफसर 30-35 बरस तक रहते हैं, और अफसरशाही शब्द बहुत गलत भी नहीं रहता। अब यह निर्वाचित नेताओं पर निर्भर करता है कि वे जनहित के लिए इस मजबूत सरकारी मशीनरी का किस तरह इस्तेमाल करते हैं। आईएएस अफसरों के साथ-साथ आईपीएस, और आईएफएस अफसर भी यूपीएससी की उसी चयन सूची से आते हैं, और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनाव में जीतकर आए, या न आए, इसमें इन तीनों सेवाओं के अफसरों का काफी कुछ योगदान रहता है। ये खुद तो चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की जीत और हार इन अफसरों के कामकाज से जुड़ी रहती है, इसलिए इन अफसरों की तैनाती राज्य की जनता के हित में, सरकार के बेहतर कामकाज के लिए, और सत्तारूढ़ पार्टी की वापिसी के लिए, तीनों के लिए महत्वपूर्ण रहती है।

जैसा कि हमने ऊपर इसे सबसे बड़ा मध्यावधि फेरबदल कहा है, इसके बाद चुनाव तक इन अलग-अलग विभागों, और इन जिलों में हो सकता है कि कोई बड़ा फेरबदल न हो, और कल नई तैनाती वाले अफसरों के कामकाज ही इस सरकार को चुनाव तक ले जाएं। भारत में नौकरशाही और निर्वाचित में से सत्तारूढ़ नेताओं के बीच संबंध बड़े जटिल रहते हैं। लोकतंत्र में उम्मीद तो की जाती है कि नीतियां निर्वाचित नेता बनाएं, और उन पर अमल अफसर करें। लेकिन जहां-जहां मंत्री कमजोर पड़ते हैं, पेशेवर और चतुर अफसर वहां नीतियां बनाने का काम करने लगते हैं, और अदूरदर्शी नेता तबादलों और ठेकों को अपना विशेषाधिकार मान लेते हैं। यह सिलसिला अफसरों के लिए तो नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन नेताओं के लिए बड़ा नुकसानदेह रहता है, क्योंकि उन्हें पांच बरस बाद जनता के बीच दुबारा जाना है। कई राज्यों में यह देखने में आता है कि किस तरह अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी से नाराजगी निकालते हुए जनता उसे निपटा देती है, और चुनावी भाषा में उसके लिए एंटीइंकमबेंसी जैसा एक जुमला बड़ा इस्तेमाल होता है। लोग आमतौर पर यह मान लेते हैं कि निर्वाचित विधायकों या सांसदों से, मंत्रियों से जनता की नाराजगी निकलती है, और सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव हार जाती है। हकीकत तो यह रहती है कि सरकार से नाराजगी सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से नाराजगी नहीं रहती, वह सरकार के कुल कामकाज से नाराजगी रहती है, जिसमें अफसरों का कामकाज भी शामिल रहता है। अगर अफसरों का कामकाज अच्छा रहे, तो सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कोई एंटीइंकमबेंसी की मजबूत लहर नहीं उठ सकती। हम किसी नए रहस्य की बात नहीं कर रहे, बल्कि इतने दशकों से सत्ता को करीब से देखते रहने की वजह से जो एक मामूली सी समझ विकसित हुई है, महज उसी की बात कर रहे हैं। इसमें से कोई भी बात न तो छत्तीसगढ़ की आज की सरकार पर अलग से लागू होती है, न ही इस सरकार पर कुछ कम या अधिक लागू होती है। हम एक जिम्मेदार डॉक्टर की तरह एक जेनेरिक दवाई लिख रहे हैं, और लोग दवा दुकानदार की तरह इसमें अपनी मर्जी का ब्राँड भर सकते हैं। यह बात देश-प्रदेश की किसी भी सरकार पर बराबरी से लागू होती है, और इसे एक आम चर्चा की तरह ही देखना चाहिए।

सत्तारूढ़ पार्टियों को कई तरह के जायज और नाजायज राजनीतिक दबावों के तहत काम करना पड़ता है। ऐसे में कुछ बहुत ईमानदार या कड़े अफसर कभी-कभी असुविधा का सामान भी बन जाते हैं। कुछ दूसरे व्यावहारिक अफसर बांस की तरह लचीले रहते हैं, और वे झुकने की, मुडऩे की एक सीमा तक राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। हर राज्य में चूंकि अफसर बहुत लंबा काम किए हुए रहते हैं, कामकाज की उनकी निजी शैली, उनके साथ काम करने की संभावनाओं और सीमाओं को सबसे वरिष्ठ अफसर भी अच्छी तरह जानते हैं, और राजनीतिक पार्टियों के पुराने अनुभवी नेता भी इससे वाकिफ रहते हैं। इनके अलावा हर सरकार में असरदार रहने वाले सत्ता के कुछ दलाल भी सत्ता को अफसरों के मिजाज के बारे में पहले दिन से बताते रहते हैं। यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती रहती है कि पार्टी की उम्मीदों और जरूरतों को पूरा करते हुए, अपने निजी राजनीतिक भविष्य की जरूरतों का इंतजाम करते हुए किस तरह सरकार चलाई जाए कि बदनामी इतनी न हो कि अगले चुनाव में मुश्किल हो जाए। सत्तारूढ़ नेताओं के सामने यह छोटी चुनौती नहीं रहती है। कुछ पार्टियों की सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो अपने आपको अपने राष्ट्रीय संगठन के लिए एटीएम साबित करने में गर्व हासिल करती हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778162494DIT_PHOTO.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323831&amp;path_article=18</guid><pubDate>07-May-2026 7:30 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दुनिया के कारखाने-कारोबार फौजी सामान बनाने में जुटे..</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323721&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323721&path_article=18]]></link><description>दो-चार दिनों के भीतर यूक्रेन को खत्म कर देने के दावे के साथ रूस ने जो हमला किया था, उसे जंग में तब्दील हुए चार बरस हो चुके हैं। इसी तरह फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमले, लेबनान और ईरान पर इजराइली हमले, और सबसे ताजा, ईरान पर अमरीकी हमले को लंबा खिंचते देखा जा सकता है। इसी के साथ-साथ दुनिया में जंग का समान, और हथियार बनाने वाले कारखाने भी बढ़ते जा रहे हैं, और वे रात-दिन काम कर रहे हैं। फिर ट्रम्प की मेहरबानी से नाटो देशों का एक अलग मोर्चा खुल गया है। उसने अमरीकी राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही, या अधिक सही यह कहना होगा कि अपने चुनाव अभियान के दौरान ही नाटो देशों को यह साफ कह दिया था कि उनके हिस्से की फौजी तैयारियों पर अमरीका अब और खर्च नहीं करेगा। उसने साफ-साफ कहा कि नाटो सदस्य अपने देश की हिफाजत के लिए अमरीकी फौजों पर निर्भर न करें, और अपने बजट का अधिक बड़ा हिस्सा अपनी फौजी तैयारियों पर लगाएं। इसका असर भी हुआ, ट्रम्प के तेवर देखकर, उसकी नाटो छोड़ देने की धमकी को देखकर, उसके नाटो-सदस्यों पर फौजी हमले की धमकी को देखकर योरप के नाटो सदस्य देशों ने अमरीका के बिना अपनी हिफाजत की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसकी वजह से भी योरप के देशों में फौजी-कारखानों का काम बहुत बढ़ गया है। फिर घरेलू उत्पादन के अलावा योरप जिन देशों से फौजी सामान खरीदता है, उन देशों में भी हथियारों, और बाकी ऐसे सामानों के कारखाने लगातार चल रहे हैं। एक तरफ योरप रूस के मुकाबले यूक्रेन को फौजी मदद देने के लिए बहुत से हथियार लगातार खरीद रहा है, दूसरी तरफ अमरीका इजराइल को देने के लिए, और ईरान पर बरसाने के लिए हथियार लगातार बनाते चल रहा है। जैसा कि हथियारों का मकसद होता है, हर हथियार तबाही लेकर आता है। उसकी कोई और उत्पादकता नहीं होती, और वह इंसानी जिंदगियों, शहरी या दूसरे किस्म के ढांचों, या दूसरे देश के हथियारों को तबाह ही करता है। मतलब यह कि हथियार और जंग की आर्थिक और सामाजिक उत्पादकता तबाही के अलावा और कुछ नहीं रहती। आज रूस और अमरीका, ये दो महाशक्तियां अलग-अलग मोर्चों पर हथियार झोंक रही हैं, और बड़े पैमाने पर उन्हें बनाते भी चल रही हैं। तबाही के मकसद वाली यह उत्पादकता दुनिया के बाकी उत्पादक काम-धंधों को पीछे छोड़ रही है। आज अमरीका, इजराइल, और ईरान एक बहुत ही कमजोर किस्म का युद्धविराम मानकर चल रहे हैं, तो दुनिया यह जानती और मानती है कि ये देश अधिक से अधिक हथियारों के उत्पादन में लगे हुए हैं। दुनिया की आर्थिक गतिविधियां इंसानी जिंदगियों की तरफ से हटकर इंसानी मौतों की तरफ मुड़ गई हैं। इसका दुनिया में क्या असर पड़ेगा, इससे समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है।

दुनिया के ऐसे नजारे और माहौल के बीच एक और बात बिल्कुल साफ है कि जंग का अंदाज यूक्रेन से बिल्कुल बदल गया है। अब बाकी किस्म की फौज या हथियारों के मुकाबले ड्रोन इस जंग में सबसे अधिक कारगर और कामयाब हथियार साबित हुए हैं। अमरीका के सबसे महंगे फौजी विमानों, फौजी मिसाइलों, और बमों के मुकाबले ईरान ने मानो मिट्टी के मोल बनाए हुए ड्रोन, या सस्ती मिसाइलों से जो मुकाबला किया है, तो उससे ट्रम्प हक्का-बक्का भी हो गया है, और अपने ही देश को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचा है। ऐसे में चूंकि ईरान और रूस के बीच गहरे रिश्ते हैं, तो खाड़ी के जिन देशों पर ईरान निशाना साध रहा है, उनमें से कुछ देश यूक्रेन से मदद ले रहे हैं, क्योंकि रूस के खिलाफ उसने अपने सस्ते ड्रोन की टेक्नॉलॉजी से इस महाशक्ति को एक किस्म से रोक ही दिया है।

अब इस पूरे जंगी कारोबार के एक और पहलू को देखने की जरूरत है। आज परंपरागत हथियारों से ऊपर उठकर ड्रोन, रोबट, और एआई का इस्तेमाल खुलकर हो रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका जैसे देश में फौजी हथियार बनाने के लिए बहुत सारे स्टार्टअप सरकार से ठेके पा रहे हैं। वे सस्ते ड्रोन बनाने से लेकर, लेजर-हथियारों पर काम कर रहे हैं, और एआई का बड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। अमरीकी सरकार इन सबको ऐसे अलग-अलग हथियार बनाने के बड़े-बड़े ठेके देकर अधिक तैयारी कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि एंथ्रोपिक नाम की जिस कंपनी ने अपने सबसे ताकतवर एआई मॉडल का उपयोग जंग में करने देने से मनाही कर दी, उसे अमरीकी सरकार ने फौजी ठेकों से बाहर भी कर दिया है। इस तरह आज पश्चिमी दुनिया के अधिकतर देश अपनी फौजी तैयारियों पर अधिक पूंजीनिवेश कर रहे हैं, अधिक हमलों के लिए अपनी फौजों को अधिक लैस कर रहे हैं, और नए-नए हथियारों की तरफ बढ़ भी रहे हैं। आज दुनिया में एआई के बाद फौजी-उद्योग सबसे अधिक तेजी से बढऩे वाला कारोबार बन गया है। अब न सिर्फ अब तक प्रचलित हथियारों का अंधाधुंध उत्पादन हो रहा है, बल्कि नई टेक्नॉलॉजी के आविष्कार, और उसके विकास पर भी अनुपातहीन पैसा जा रहा है।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1778067477dit_photo.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323721&amp;path_article=18</guid><pubDate>06-May-2026 5:05 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बंगाल में पार्टियां तोहमत लगाने के साथ-साथ मोदी से कुछ सीख भी सकती थीं</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323635&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323635&path_article=18]]></link><description>पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का विश्लेषण को अधिक जानकार लोग बेहतर तरीके से कर सकेंगे, लेकिन हम उन कुछ मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जो सोशल मीडिया पर बड़ी तल्खी से उठाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में मतदाता पुनरीक्षण से लेकर दूसरे कई मुद्दों तक जो रूख दिखाया, उसे लेकर लोग उन्हें भाजपा गठबंधन में शामिल गिन रहे थे। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या पूरी की पूरी केन्द्र सरकार का किसी राज्य में जाकर अपने-आपको इस तरह झोंक देना चाहिए? कई और सवाल भी उठ सकते हैं, लेकिन किसी लोकतंत्र में अगर चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में काफी बहस हो चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट किसी बात को रोकने लायक नहीं पा रहा है, तो यह बहस चुनावी बहस नहीं रह जाती, यह देश की एक लोकतांत्रिक-संवैधानिक बहस जरूर हो सकती है कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था का रूख सत्ता की राजनीति का साथ देने वाला किस हद तक हो सकता है? लेकिन वह बहस चुनाव के बीच में किसी काम की नहीं है। वह बहस उस समय भी गैरजरूरी हो जाती है जब राजनीतिक दल चुनाव लडऩा तय करते हैं, शुरू कर देते हैं, जीत के दावे भी करते हैं, तब उनकी आशंका का वजन कुछ कम हो जाता है। हम उनकी आशंकाओं को सही या गलत ठहराने के चक्कर में नहीं पड़ रहे, किसी भी लोकतंत्र में किसी बात को साबित करने की एक प्रक्रिया होती है, अगर वह प्रक्रिया संभव नहीं है, तो फिर जो मौजूदा लोकतंत्र है, जनता बस उसी की हकदार रहती है। यह बात सिर्फ भारतीय संदर्भ में नहीं है, पूरी दुनिया के लिए यही कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जिसके कि वे हकदार होते हैं। हम सरकार से भी थोड़ा सा आगे जाकर इसे पूरे लोकतंत्र तक ले जाते हैं। चुनाव आयोग हो, या सुप्रीम कोर्ट, या दूसरी संवैधानिक संस्थाएं, या जांच एजेंसियां, ये सब जनता को उसकी चुनी हुई सरकार के माध्यम से ही नसीब होने वाली चीजें हैं। अगर किसी को यह खुशफहमी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने में, और उसके भी पहले हाईकोर्ट के जज बनने में सरकार का कोई दखल नहीं रहता, तो उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाज नहीं है। ऐसे में देश या प्रदेश के वोटरों का बहुमत जिसे चुनता है, उसे अपने हिसाब से बहुत कुछ करने का हक, या कम से कम मौका मिल जाता है, यह देखना हो तो महज भारत की तरफ देखने की जरूरत नहीं है, अमरीका की तरफ भी देखा जा सकता है, जो कि आज दुनिया की सबसे जलती-सुलगती मिसाल है।

लेकिन हम इन मुद्दों को यहीं पर छोडक़र कुछ आगे बढऩा चाहते हैं। ये चुनाव थे तो पांच राज्यों में, लेकिन असल चुनाव तो बंगाल में ही होते दिख रहा था। असम में भी विपक्ष मैदान में था, लेकिन वहां कोई टक्कर सुनाई नहीं पड़ती थी। केरल में टक्कर थी, लेकिन वहां भाजपा मैदान में नहीं थी, वहां वामपंथी गठबंधन, और कांग्रेस का गठबंधन आमने-सामने थे, और बाकी हिन्दुस्तान, खासकर हिन्दी-हिन्दुस्तान की दिलचस्पी केरल में कम थी। इसलिए भी कम थी कि केरल और तमिलनाडु में भाजपा मैदान में नहीं थी। उसके इक्का-दुक्का उम्मीदवार कहीं से विधायक बन जाएं, तो वह अलग बात थी, भाजपा जहां टक्कर दे सकती थी, वह सिर्फ बंगाल था। और बंगाल का चुनावी संघर्ष देश भर की दिलचस्पी का मुद्दा इसलिए भी था कि भाजपा एक नई जमीन पर सरकार बनाने का दावा कर रही थी, उसके लिए अपने अस्तित्व की सबसे कड़ी, और सबसे बड़ी लड़ाई भी लड़ रही थी। फिर यह भी है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का यह संघर्ष सिर्फ चुनाव का नहीं था, सिर्फ इसी चुनाव का नहीं था, पिछले चुनाव में भी भाजपा ने पूरा दम-खम लगाया था, और कांग्रेस और वामपंथियों को विधानसभा से बाहर करके खुद अकेले विपक्षी दल बनने तक तो पहुंची ही थी। अब उसे इस आखिरी मील का सफर और तय करना था, जो पूरी तरह, और बुरी तरह अनिश्चितता से भरा हुआ था। लोग आखिरी दिन तक पूछते थे कि बंगाल में क्या होगा? और इसका पुख्ता जवाब अधिकतर लोगों के पास नहीं था। चुनावी मैदान में मोदी और ममता की पार्टियों के अलावा चुनाव आयोग भी एक बड़ा खिलाड़ी था, और उस खिलाड़ी को पानी पिलाता हुआ सुप्रीम कोर्ट भी था। इसलिए लोगों की आशंकाएं थीं कि ये सब मिलकर ममता को हरा ही देंगे, या इन सबके बावजूद ममता जीत जाएगी? यह मुद्दा रह ही नहीं गया था कि इतने बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी चुनावी-राजनीतिक जुबान में एंटी इन्कमबेंसी का शिकार भी हो सकती हैं, चर्चा बस यही रहती थी कि क्या ममता चुनाव आयोग से ज्यादा वोट पा सकेंगी? हम केवल चर्चा की बात कर रहे हैं, अपनी कोई राय नहीं रख रहे, जबकि 2011 से 2026 तक, लगातार तीन बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी से वोटरों की कुछ स्वाभाविक नाराजगी भी हो सकती है, क्योंकि बंगाल के वोटर देश के अधिकतर राज्यों के मुकाबले राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक माने जाते हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777985470odi_jhalmudi_EDIT_PHOTO.jpeg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323635&amp;path_article=18</guid><pubDate>05-May-2026 6:18 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दलित, और सांत्वना-पर्यटन पर टैक्स क्यों न लगाया जाए?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323521&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323521&path_article=18]]></link><description>महाराष्ट्र के पुणे जिले में अभी चार बरस की एक बच्ची से बलात्कार के बाद उसे मार डाला गया। भीमाजी कांबले नाम के 65 बरस का बुजुर्ग इस बच्ची को बहला-फुसलाकर पास की गौशाला में ले गया, और वहां इस जुर्म के बाद उसने लाश को गोबर के ढेर में छिपा दिया। उसके खिलाफ पहले भी 2015 में पाक्सो का केस दर्ज था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। इधर परिवार के लोग अस्थि विसर्जन के लिए बाहर गए हुए हैं, और उनके घर पर नेता हमदर्दी जताने पहुंच रहे हैं। ऐसे में इस बच्ची के पिता ने एक सार्वजनिक वीडियो संदेश जारी किया, और कहा- हम अभी अपनी बेटी की अस्थियों का विसर्जन करने आए हैं, इस दौरान रिश्तेदारों और दोस्तों से पता चला कि कई राजनीतिक नेता हमारे घर सांत्वना देने आ रहे हैं। मैं अपनी और पूरे परिवार की ओर से विनम्र अपील करता हूं कि जब तक मेरी बेटी को न्याय नहीं मिल जाता, और आरोपी को फांसी की सजा नहीं हो जाती, तब तक कोई भी राजनीतिक नेता हमारे घर न आएं। न्याय मिलने और फांसी हो जाने के बाद ही हम किसी से मिलेंगे। तब तक सांत्वना देने या फोटो खिंचवाने कोई न आएं, परिवार को सांत्वना नहीं, सच्चा न्याय चाहिए।

आमतौर पर सदमे से गुजरते हुए दुखी परिवार कुछ बोलते नहीं हैं, और अपने घर पहुंचने वाले लोगों को झेल लेते हैं। लेकिन ऐसे परिवारों के मन में ऐसे अतिथि-नेताओं को देखकर जो लगता होगा, वह इस बच्ची के इस पिता ने खुलकर कह दिया है। नेता जब किसी परिवार में हमदर्दी के लिए जाते हैं, तो वे एक किस्म से ग्लिसरीन के आंसू भी ले जाते हैं, क्योंकि दो उद्घाटन, तीन शादियां, दो जन्मदिन, और उसके बीच में ऐसे सांत्वना-प्रवास पर एकाएक तो आंसू निकल भी नहीं पाते होंगे। ऐसे सांत्वना-पर्यटन के खिलाफ किसी न किसी को तो मुंह खोलना था, और यह तो अच्छा हुआ कि ऐसे जुल्म और ऐसे जुर्म की शिकार इस बच्ची के पिता ने वीडियो संदेश जारी करके ऐसी अपील की है। लोगों को याद होगा कि अपने जन्मदिन पर अस्पताल जाकर किसी गरीब, बीमार, या दुर्घटना में जख्मी को एक-एक फल देकर दर्जन-दर्जनभर लोग फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं, और फिर उसे अपनी शोहरत के लिए इस्तेमाल करते हैं। अभी कुछ महीने पहले ही एक वीडियो ऐसा भी आया था जिसमें किसी एक राजनीतिक दल का दुपट्टा-गमछा टांगे हुए लोग एक अस्पताल पहुंचते हैं, और वहां उनमें से एक नेता या नेत्री को देखा जा सकता है जिसने एक ही फल लोगों को थमाकर फोटो खिंचवाई, वीडियो बनवाया, और फिर उस फल को लेकर दो बिस्तर आगे सांत्वना-पर्यटन के अगले स्टेशन पर यही काम किया। उन मरीजों का चेहरा देखने लायक था जिनके हाथ में आया हुआ फल वापिस लेकर उसे अगले फोटोशूट के लिए इस्तेमाल किया गया।

ऐसे सांत्वना-पर्यटन के अलावा भारतीय राजनीति में एक दलित-पर्यटन का भी बड़ा चलन है। राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता किसी दलित के घर खाने पहुंचते हैं। चूंकि जाति व्यवस्था के चलते हुए दलितों के घर खाने से कई लोग परहेज करते हैं, तो इस तरह वहां जाकर वहां खाना एक किस्म से उन्हें छुआछूत से बाहर गिनने जैसा रहता है, लेकिन ऐसे मौकों से जो फोटो-वीडियो बाहर आते हैं, उनमें दिखता है कि किस तरह वहां खाने के लिए थाली के नीचे लकड़ी की चौकियां सजी रहती हैं, थालियों में किसी भी संपन्न परिवार जैसे व्यंजन-पकवान सजे रहते हैं, और ऐसा लगता है कि दलित-पर्यटन पर्व के लिए इन घरों में मेहमान की तरफ से ही मेजबान की तरफ से दिखने वाले इंतजाम किए जाते हैं। जो सचमुच ही दलित हैं, वे भला इस किस्म का खाना कैसे खिला सकते हैं? और एक सामाजिक-नैतिकता का सवाल यह भी उठता है कि क्या अपनी शोहरत के लिए दलित परिवारों का ऐसा इस्तेमाल जायज है? नेताओं को अपनी राजनीति चलाने के लिए कई किस्म के शिगूफों की जरूरत पड़ती है, और इसके लिए बीमार, बलात्कार के शिकार, किसी हादसे के शिकार, किसी बीमारी से थोक में मारे गए लोगों के गांव या मुहल्ले, अस्पताल में भर्ती मरीज, ऐसे सब लोग बहुत ही माकूल बैठते हैं। बलात्कार जितना चर्चित होता है, सांत्वना-पर्यटन उतना ही अधिक होता है। राजनीतिक दलों की टीम बनाई जाती हैं, जो जाकर ऐसे परिवारों से मिलती हैं। फिर महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल संरक्षण आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, एसटी-एससी के आयोग, ओबीसी आयोग, ऐसी सब संवैधानिक संस्थाओं के लोगों की तो जिम्मेदारी भी हो जाती है कि परिवार के जात-धरम को देखकर इनमें से किस-किसको टूर-प्रोग्राम बनाना है। हाल के बरसों में कुछ मौकों पर तो ऐसा भी हुआ कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला, और उसके परिवार की शिनाख्त भी ऐसे सांत्वना-पर्यटकों ने सार्वजनिक रूप से उजागर कर दी। अब जब खास मकसद खबरों और सोशल मीडिया के मार्फत शोहरत पाना है, तो उस नशे के बीच निजता और गोपनीयता के नियम-कानून का ख्याल भला कैसे रह सकता है?
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777895308dit_photo_santvana_paryatan.png" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323521&amp;path_article=18</guid><pubDate>04-May-2026 5:18 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अब चीन ने हेठी दिखाई अमरीकी मनमानी से...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323422&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323422&path_article=18]]></link><description>चीन की खबर है कि सरकार ने एक औपचारिक बयान जारी करके अमरीका की एक ताजा हेठी की है। उसने कहा है कि वह ईरानी तेल खरीदने वाली पांच कंपनियों पर लगाई गई अमरीकी पाबंदियों को नहीं मानेगा। उसका तर्क है कि ये पाबंदियां अन्य देशों के साथ सामान्य आर्थिक और व्यापारिक कामकाज करने से चीनी कंपनियों को रोकती हैं। इसके साथ-साथ ये पाबंदियां अंतरराष्ट्रीय कानून, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं। इसलिए चीन अमरीकी रोक-टोक को नहीं मानता, और चीन की कंपनियों और संस्थानों को इन पाबंदियों को लागू नहीं करना चाहिए। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इस बयान में आगे कहा है- चीनी सरकार हमेशा उन एकतरफा पाबंदियों का विरोध करती है, जो संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना, और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित नहीं होतीं। कल ही अमरीका ने एक और चीनी कंपनी पर पाबंदी लगाई थी, और कहा था कि इसने लाखों बैरल ईरानी तेल खरीदा, जिससे ईरान को अरबों डॉलर की कमाई हुई। चीन का यह रूख उस वक्त होना अधिक मायने रखता है, जब इसी महीने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प चीन की बहुप्रतीक्षित यात्रा पर जा रहे हैं।

पिछले खासे अरसे से योरप में अमरीका के लिए, खासकर ट्रम्प की मनमानी के लिए अपना बर्दाश्त धीरे-धीरे खो दिया है। एक-एक करके देश ट्रम्प के हमलावर रूख के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं। योरप के एक अविभाज्य हिस्से ग्रीनलैंड के नाटो का हिस्सा रहते हुए भी उसे फौजी ताकत से कब्जाने का ट्रम्प का तानाशाही रूख योरप के देशों ने मिलकर कुचल डाला, और ट्रम्प को फौजी कार्रवाई के फतवे वापिस लेने पड़े। अभी ईरान के खिलाफ जंग को लेकर जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, और स्पेन समेत अधिकांश यूरोपीय देशों ने शामिल होने से साफ मना कर दिया, और कुछ देशों ने तो ईरान पर हमले के लिए उड़ान भरने वाले अमरीकी फौजी विमानों को अपनी जमीन पर उतरने देने से भी मना कर दिया। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी एक वक्त ट्रम्प की बड़ी प्रशंसक रहीं, लेकिन आज उनका हाल यह है कि पोप लियो के खिलाफ ट्रम्प के बयानों पर मेलोनी ने कहा- मैं पोप के प्रति ट्रम्प की बातों को मंजूर करने लायक नहीं पाती। पोप कैथोलिक चर्च के मुखिया हैं, और शांति की अपील करना, और हर किस्म के जंग की निंदा करना उनके लिए उचित और सामान्य है। ईरान के साथ जंग को लेकर जब ट्रम्प ने मेलोनी पर हौसले की कमी का आरोप लगाया, तो मेलोनी ने सार्वजनिक रूप से ट्रम्प को जवाब दिया- सहयोगी होने का मतलब यह नहीं होता, कि कोई सीमारेखा ही न हो। सहयोगी होने का मतलब गुलाम या मातहत होना तो बिल्कुल ही नहीं होता। मेलोनी ने ट्रम्प को जवाब देते हुए कहा- सहयोगियों के बीच ईमानदार-मतभेद होने चाहिए, जब हम सहमत नहीं होते, तो हमें इसे साफ-साफ कहना चाहिए। मेलोनी ने ईरान पर अमरीकी-इजराइली कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे के बाहर, और खतरनाक रुझान का हिस्सा बताया।

हमने इस पूरे संदर्भ में यह ढूंढने की कोशिश की कि अपने इस दूसरे कार्यकाल के सवा साल में ट्रम्प ने क्या कोई भी नया दोस्त बनाया? तो भारी तलाश के बाद भी ऐसा एक भी देश नहीं मिला, बल्कि यह बात जरूर सामने आई कि ट्रम्प ने अमरीका को इजराइल के हाथों गिरवी रख दिया है। उसने कनाडा को अमरीका का एक राज्य बन जाने को कहा, मेक्सिको के साथ व्यापार-युद्ध की बात कही, दुनिया के तकरीबन हर देश के साथ टैरिफ का जंग छेड़ दिया, पूरे के पूरे मध्य-पूर्व को बिना किसी वजह, बिना किसी मौके के भयानक अस्थिरता में झोंक दिया, अमरीका के सबसे पुराने फौजी साथी, नाटो को छोडऩे की धमकियां दीं, नाटो सदस्यों पर कब्जे की धमकियां दीं, और एक-एक करके अपने सारे दोस्तों को खो दिया। उसका यह मिजाज अपने खुद के देश में अपनी सरकार में, अपने बड़े-बड़े साथियों के साथ भी रहा, और उसने अपनी सरकार के सबसे बड़े ओहदो पर बैठे हुए कई सबसे बड़े लोगों को निकाल फेंका। प्रवासियों को निकालने की ट्रम्प की नीति से असहमत, गृह सुरक्षा मंत्री को ट्रम्प ने हटाया, अटार्नी जनरल को हटाया, श्रम मंत्री को हटाया, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, थलसेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख जैसे बहुत से लोगों को हटाने के अलावा ट्रम्प ने हटाए गए कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे भी छेड़ दिए। जिस आदमी का मिजाज उस डाल को काटने का है जिस पर वह बैठा हुआ है, तो वह इस काम को देश के भीतर भी कर रहा है, और देश के बाहर भी। जब ऐसे अस्थिरचित्त वाले, और ऐसे बीमार या विक्षिप्त दिमाग वाले के हाथ दुनिया की सबसे बड़ी फौजी और आर्थिक ताकत, परमाणु बम की बटन, सब कुछ दे दी जाए, तो उसका इतना तानाशाह हो जाना स्वाभाविक ही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777808504dit_us_china.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323422&amp;path_article=18</guid><pubDate>03-May-2026 5:11 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  मीडिया के सबसे बड़े औजार एआई से सबसे बड़े खतरे भी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323350&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323350&path_article=18]]></link><description>पूरी दुनिया में मीडिया कारोबार में एआई नौकरियां खा रहा है। जहां पर कम्प्यूटरों का जितना अधिक इस्तेमाल था, वहां पर उसकी मार कुछ अधिक जल्दी आई है, और कुछ अधिक जोरों से पड़ रही है। बहुत से मीडिया कारोबार अपने समाचार-विचार से जुड़े हुए सभी तरह के विभागों पर एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल की शर्तें लाद रहे हैं, कई कंपनियों ने कर्मचारियों पर यह शर्त लगा दी है कि वे कम से कम कितना फीसदी इस्तेमाल एआई का करेंगे। मकसद यही है कि जो लोग रिटायर हो रहे हैं, उनकी जगह नए लोगों की भर्ती न की जाए, और जिन लोगों की सेवा शर्तें कमजोर हैं, उन्हें बिदा किया जाए। एआई के इस्तेमाल को अधिक सहज पाने वाली नई पीढ़ी का भी यह फायदा है कि पुराने कर्मचारियों को हटाने से धीरे-धीरे बढ़ी हुई उनकी तनख्वाह बंद होती है, और नए नौजवान कर्मचारियों की तनख्वाह कम रहती है। इसके साथ-साथ नए कर्मचारी एआई का अधिक इस्तेमाल करने के लायक शिक्षित-प्रशिक्षित भी रहते हैं।

यह नौबत अधिकतर कारोबार में हैं, लेकिन हम मीडिया पर इसकी मार को एक दूसरे हिसाब से भी अधिक देख रहे हैं। मीडिया में जहां पर मौलिकता और रचनात्मकता की जरूरत रहते आई है, उसे इंसानों के मुकाबले एआई एक फीसदी वक्त में कर देता है। आज किसी विषय पर लिखा जाए, किस विषय पर बोला जाए, इस पर एआई एक मिनट के भीतर 25 विषयों पर 25-25 शब्द सुझा देता है, और इसके बाद जिस विषय के विस्तार की जरूरत हो, उस पर हजार-पन्द्रह सौ शब्द मांगे जा सकते हैं, जो कि एक-दो मिनट में हाजिर हो जाते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दिक्कत यह रहती है कि समाचार-विचार का काम करने वाले अखबारनवीसों, और बाकी मीडियाकर्मियों की मौलिकता घटती चल रही है, उनकी रचनात्मकता, और कभी-कभी जरूरत पडऩे वाली कलात्मकता खत्म होती चल रही है क्योंकि इनकी जरूरत ही आज घट गई है। दिमाग में जिन चीजों का इस्तेमाल घटते चलता है, दिमाग उनके लिए जरूरी अपना हिस्सा किनारे कर देता है। हो सकता है कि दस-बीस या पच्चीस-पचास पीढिय़ों में जाकर दिमाग की रचनात्मकता और मौलिकता भोथरी होने लगे। एक वक्त बदन में एपेंडिक्स का काम रहता था, लेकिन बाद के हजारों बरसों में इंसानों का खानपान बदला, और अब यह पूरी तरह गैरजरूरी हिस्सा हो गया है। बदन में बनना भी शायद कम हो गया है, और दर्द होने पर इसे निकालकर फेंक भी दिया जाता है।

मीडिया में पिछले डेढ़ बरस में हिन्दुस्तान में हर बड़े मीडिया हाऊस से, एक-एक से सैकड़ों पत्रकारों की नौकरियां गई हैं। लेकिन रोजगार खत्म होने के अलावा एक दूसरा बड़ा नुकसान यह हुआ है कि पत्रकारिता के बहुत सारे काम अब एआई इतनी तेजी से, इतनी कम लागत से, और तकरीबन बेहतर तरीके से करके देने लगा है कि लोगों की जरूरत कंपनियों को कम रह गई है। लिखी हुई सामग्री की जगह टाईप की हुई सामग्री का चलन था, बीते कई बरस से बोलकर टाईप करना भी चलन में था, और अब तो एआई की वजह से बोलकर तस्वीर बना लेना, वीडियो बना लेना, किसी वीडियो के पीछे की आवाज बना लेना, यह सब कुछ ऐसा गजब का आसान हो गया है कि जो इंसानों के बस का कभी था नहीं। अभी एआई का इस्तेमाल जमीनी रिपोर्टिंग भर में कम है क्योंकि वहां इंसान को जाकर ही काम करना होता है। आने वाले बरसों में यह कैसा होगा, इसका ठिकाना नहीं है, और एआई को लेकर किसी भी तरह का अंदाज भी नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि वह जंगल में लंबी छलांग लगाने वाले हिरण की तरह आगे बढ़ रहा है, और इंसान उस छलांग को टेप से नापने में भी धीमे हैं।

अब एआई के चलते हुए न सिर्फ मौलिकता, और रचनात्मकता खत्म हुई है, बल्कि एआई के अपने पूर्वाग्रह उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिखने, या नकल करने में बढ़ते चल रहे हैं। हमारे जैसे कुछ लोग एआई के साथ काम करते हुए उसे लगातार उसके पूर्वाग्रहों के खिलाफ चेतावनी देते रहते हैं, उसे बताते रहते हैं कि दुनिया में सिर्फ मर्द नहीं रहते हैं, महिलाएं भी बराबरी से हैं। लेकिन किसी भी एआई मॉडल की ट्रेनिंग दुनिया में कम्प्यूटरों पर कभी भी टाईप की हुई जिस सामग्री से होती है, वह सामग्री मोटेतौर पर एक संपन्न, विकसिक, शिक्षित, शहरी तबके से आती है, और उसमें ग्रामीण, गरीब, अनपढ़, असहाय लोगों की बातें नहीं रहती हैं। इसलिए एआई को जिस देश, संस्कृति, जाति, धर्म, रंग की बातें अधिक मिली हुई हैं, उसका पूर्वाग्रह उन्हीं के पक्ष में हैं। इसलिए एकदम रेडीमेड मिल जाने वाली एआई की पैदा की हुई सामग्री के भीतर इतनी बारीकी से पूर्वाग्रह को ढूंढना, अलग करना, या उसी से दुबारा लिखवाना कम हो पाता है। किसी भी कारोबार के कर्मचारी इस अतिरिक्त मेहनत के बजाय सामने एआई की परोसी गई तश्तरी के गर्मागर्म पकवान खा लेने पर भरोसा रखते हैं। इसलिए सामाजिक सरोकार से आमतौर पर मुफ्त एआई की गढ़ी हुई सामग्री भी सरोकार से काफी दूर हो सकती है। फिर यह भी है कि मीडिया कारोबार में काम करने वाले लोगों के अपने धर्म, जाति, समाज, संपन्नता, शिक्षा, लैंगिकता के अपने पूर्वाग्रह रहते हैं, और उनके पूछे गए सवाल, सुझाए गए मुद्दे, और मांगी गई सामग्री में उनकी जो सोच रहती है, एआई ठीक उसी मुताबिक ठकुरसुहाती की बातें करता है। जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को कहो रात तो हम रात कहेंगे, कुछ इस किस्म से एआई काम करता है, और औसत दर्जे के लोग एआई की कही हुई बात को एक किस्म से वजनदार और भरोसेमंद मान लेते हैं। लोगों का अपना पूर्वाग्रह, और एआई की ट्रेनिंग में इस्तेमाल सामग्री का पूर्वाग्रह, ये दोनों मिलकर मीडिया में अभी हाल तक प्रचलित सरोकारों को कुचलते चल रहे हैं। दिक्कत यह है कि एआई ने समाचार-विचार की किसी भी किस्म को तैयार करने की लागत इतनी घटा दी है कि मीडिया कारोबारी को जल्लाद बनकर रोजगार के गले काटना कारोबारी समझबूझ और हुनर का काम लगने लगा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777729720dit_photo_AI.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323350&amp;path_article=18</guid><pubDate>02-May-2026 7:18 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अंग्रेज चले गए, लेकिन सामंती चाह छोड़ गए हैं</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323267&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323267&path_article=18]]></link><description>कोलकाता से पुणे जा रहा एक मुसाफिर विमान अचानक रायपुर में उतरा। इमरजेंसी लैंडिंग इसलिए करनी पड़ी कि एक महिला मुसाफिर बेहोश हो गई थी। ऐसे किसी भी रूकने से एयरलाईंस को लाखों रूपए का नुकसान होता है, और सैकड़ों मुसाफिरों का सफर भी लेट होता है। फिर भी इंसानी जिंदगी अधिक महत्वपूर्ण रहती है, और बहुत सी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी किसी एक मुसाफिर को बचाने के लिए सबसे पास के देश या एयरपोर्ट पर उतरती ही हैं। लेकिन अभी दो दिन पहले की खबर थी कि भारत में ट्रेन में सफर कर रही एक लडक़ा चलती ट्रेन से गिर गया, उसकी बहन सहित कई लोगों ने ट्रेन रोकने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन नहीं रूकी। चेन खींचने पर भी कुछ नहीं हुआ। कुछ और अलग-अलग खबरों से पता लगता है कि ट्रेन में झगड़ा होने पर किसी को फेंक दिया गया, लेकिन चेन खींचने पर ट्रेन नहीं रूकी। डिब्बे में गुंडागर्दी होती रही, लेकिन पुलिस या रेलवे को खबर करने पर भी कोई मदद नहीं मिली। किसी-किसी मामले में शिकायत करने पर मदद मिलने की भी खबरें आती हैं।

इन दो तरह की स्थितियों को देखें, तो लगता है कि हवाई सफर करने वाले लोगों को विमान से जल्दी पहुंचने के अलावा भी कई किस्म की सुविधाएं मिलती हैं, जिनमें सुरक्षा और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हैं जो कि हर मुसाफिर, हर इंसान को मिलनी ही चाहिए। रेलवे स्टेशनों से लेकर रेलगाडिय़ों के डिब्बों, और खासकर डिब्बों के पखानों तक सब कुछ गंदा मिलता है। विमान मुसाफिर और ट्रेन मुसाफिर के बीच विमान और ट्रेन तक का फर्क समझ में आता है, लेकिन साफ-सफाई तो एक बुनियादी हक होना चाहिए, उसमें गरीब और अमीर में फर्क करना, कम किराए और अधिक किराए के सफर में सफाई का फर्क करना, यह तो बहुत बड़ी असभ्यता का सुबूत है। लेकिन इस देश में गरीब और अमीर के बीच ऐसी असभ्यता कदम-कदम पर दिखती है। शहरों में देखें, तो सत्तारूढ़ और विपक्षी नेताओं के रहने के इलाके, अफसरों के रहने के इलाके अलग किस्म से साफ-सुथरे दिखते हैं। वहां पर लाउडस्पीकर पर शोरगुल की इजाजत भी नहीं रहती, वहां ऐसे ट्रांसफॉर्मरों से बिजली आती है, जो आमतौर पर बंद नहीं होते, जो कि अस्पताल जैसे सबस्टेशन से जुड़े रहते हैं। इन इलाकों में सडक़ें खराब भी नहीं होती हैं, और उन पर दुबारा एक लेयर चढ़ा दी जाती है। दूसरी तरफ शहर के बाकी हिस्सों में सडक़ों पर गड्ढे पड़े रहते हैं। वीआईपी कहे जाने वाले इलाकों में खम्भों पर कोई बल्ब खराब नहीं रहते, वहां के बाग-बगीचों में पानी की कमी नहीं रहती। लेकिन आम लोगों के इलाके बदहाल रहते हैं।

अभी कहीं पर पढ़ा कि वे देश विकसित नहीं हैं जहां गरीब भी कारों पर चलते हैं, वे देश विकसित हैं जहां संपन्न लोग भी बसों या साइकिलों से चलते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले योरप के एक देश के प्रधानमंत्री का समाचार देखने मिला जिसमें वे नए प्रधानमंत्री को काम सौंपकर कार्यालय से बाहर निकलते हैं, कार्यालय के दो-चार लोग बाहर तक उन्हें छोडऩे आते हैं, और वहां वे अपनी साइकिल उठाकर चलाते हुए अपने घर चले जाते हैं। जिस तरह किसी भी प्रधानमंत्री के काम के आखिरी दिन को दिखाने के लिए मीडिया इकट्ठा होता ही है, इस प्रधानमंत्री को भी साइकिल से घर जाते दिखाने के लिए बहुत से फोटोग्राफर और कैमरापर्सन वहां पर थे। बिना किसी बयानबाजी के वे मुस्कुराते और हाथ हिलाते निकल गए। सभ्य देशों में सबसे ताकतवर लोग भी सबसे आम लोगों की तरह रहने की कोशिश करते हैं। भूटान जैसे बगल के छोटे से देश में तो प्रधानमंत्री साइकिल चलाते दिखें, तो अधिक हैरान नहीं होना चाहिए, लेकिन जब सबसे विकसित योरप के कई देशों में, कम से कम कुछ देशों में तो, प्रधानमंत्री या वहां के राजा या राजकुमार साइकिल पर दिखें, बसों पर चलते दिखें, तो लगता है कि राजा और प्रजा के बीच फासला नहीं है। ब्रिटेन की बहुत सी तस्वीरें आती हैं जिनमें कभी कोई मंत्री, तो कभी संसद में प्रतिपक्ष के नेता मेट्रो ट्रेन में सफर करते हुए दिखते हैं। ऐसे में उन देशों पर तरस आता है जहां एक वार्ड मेंबर बनने पर भी लोग इतनी बड़ी गाड़ी में चलने लगते हैं जो उनके ही वार्ड की हर सडक़ पर घुस न सके।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777653265dit_photo.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323267&amp;path_article=18</guid><pubDate>01-May-2026 10:03 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : एआई कंपनी का संस्थापक गिना रहा कि यह दुनिया का आखिरी आविष्कार होगा...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323149&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323149&path_article=18]]></link><description>दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी, और टेस्ला जैसी चर्चित कार कंपनी, एक्स जैसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने वाले एलन मस्क अभी अपनी ही पिछली एक भागीदारी वाली कंपनी, ओपन एआई, के खिलाफ अदालत में बयान दे रहे हैं। यह बयान आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर आज सामने खड़े हुए खतरों को तो गिनाता ही है, साथ-साथ एआई की भविष्य की संभावनाओं, कारोबारी आशंकाओं पर भी मस्क का नजरिया बताता है। ओपन एआई के साथ मस्क का झगड़ा इस बात को लेकर है कि उस कंपनी में उन्होंने एक बड़ी पूंजी इसलिए लगाई थी कि कंपनी ने उसे समाजसेवा में इस्तेमाल करने का वायदा किया था, लेकिन बाद में उसके मालिक ने उसे खालिस कारोबार में लगा दिया। अमरीका की एक अदालत में चल रही यह गवाही इस कंपनी में पूंजीनिवेश से परे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बारे में बड़ी अहमियत वाली बातें सामने रख रही है।

एलन मस्क का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से एक कदम आगे बढक़र अब जो एआई विकसित हो रहा है, वह एजीआई है (आर्टिफिशियल जनरल इंटेलीजेंस)। उन्होंने अदालत में यह तर्क दिया कि एजीआई अगर किसी ऐसी कंपनी के नियंत्रण में आ जाती है जिसका मकसद केवल कमाना है, तो वह एआई सुरक्षा प्रोटोकॉल को दरकिनार कर सकती है। मस्क का मानना है कि 2026-27 में एआई इंसानी दिमागी से ज्यादा स्मार्ट हो जाएगा, और वह स्वायत्त फैसले लेने लग सकता है। उन्हें डर है कि ऐसा एआई इंसानों को चीटिंयों की तरह समझ सकता है, जिन्हें नष्ट करने का उसका कोई इरादा तो नहीं होगा, लेकिन अगर वे उसके रास्ते में आए तो वह उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल देगा। मस्क ने अदालत में यह चेतावनी भी दी कि एआई का इस्तेमाल जंग छिड़वाने, और सूचनाओं को इस तरह तोडऩे-मरोडऩे के लिए किया जा सकता है कि उससे दुनिया भर के लोकतंत्र अस्थिर हो सकें। मस्क एआई को बार-बार मानवता का अंतिम आविष्कार कहते हैं। वे मानते हैं कि आज एजीआई के विकास में कई बड़ी कंपनियां लगी हैं, और उनका बुनियादी मकसद मुनाफा है न कि इंसानी नस्ल की हिफाजत। वे यह भी मानते हैं कि एआई या एजीआई से दुनिया भर के लोकतंत्रों को अस्थिर करने, चुनाव प्रभावित करने, और सामाजिक विभाजन पैदा करने का काम आसानी से किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि एजीआई अगर सही हाथों में भी गया, तो भी उसका दुरूपयोग होना तय है, क्योंकि इसमें असीमित ताकत होगी। वे मानते हैं कि इसके बाद दुनिया में किसी भी और आविष्कार की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि हो सकता है कि इंसान खुद ही अस्तित्व में न रहें।

इस अदालती मामले और गवाही से परे की एक और खबर पर गौर करने की जरूरत है। एंथ्रोपिक नाम की एक एआई कंपनी है उसने अभी अपने कुछ सबसे ताकतवर मॉडलों को तैयार कर लेने के बाद भी बाजार में उतारने से इंकार कर दिया। उसने दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों को निजी प्रयोग के लिए ये एआई मॉडल दिए हैं ताकि वे खासी निगरानी में इसका इस्तेमाल करके इसके खतरे आंक सकें, और यह देख सकें कि ऐसे खतरनाक मॉडल की हरकतों को रोकने के लिए इन कंपनियों को अपने आज के इंतजाम में कौन-कौन से नए बचाव विकसित करने हैं। बिल्कुल ही चुनिंदा और भरोसेमंद कंपनियों को दिए गए इस एआई मॉडल के बारे में इसे विकसित करने वाली कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने ही यह पाया कि उनके ताकतवर मॉडल जैविक हथियार बनाने, और वायरल इंफेक्शन फैलाने के तरीके बड़ी आसानी से बता दे रहे थे। इसे देखकर उन्हें यह समझ पड़ा कि अगर ये एआई मॉडल किसी आतंकी संगठन के हाथ लग गया, तो यह वैश्विक तबाही ला सकता है। कहने के लिए तो एंथ्रोपिक अपने मॉडलों को संविधान सिखाता है, ताकि वे नैतिक बने रहें, लेकिन जब कंपनी ने जांच-पड़ताल की, तो पाया कि ये मॉडल कई बार सुरक्षा-फिल्टर को पार करने के तरीके ढूंढ लेते थे। वे इंसानों को धोखा देने में माहिर हो रहे थे, उन्हें यह अंदाज होने लगा था कि इंसान क्या सुनना चाहते हैं, और वे अपनी गलतियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगे थे। यह सब देखते हुए अनिश्चितता के खतरों की वजह से एंथ्रोपिक ने अपने बिल्कुल तैयार किए हुए एआई मॉडल भी बाजार में न भेजना तय किया।

इस बारे में अभी दुनिया में एआई विकसित कर रही कुछ कंपनियां कुछ दार्शनिकों की सेवाएं भी ले रही हैं ताकि एआई नैतिक बना रहे। यह नौबत बड़ी अजीब इसलिए है कि एआई विकसित करने में अंधाधुंध पंूजीनिवेश लग रहा है, अंधाधुंध लागत आ रही है, और इतने बड़े कारोबार का बुनियादी मकसद कमाई बने रहना तय सा रहता है। ऐसे में इतने बड़े पूंजीनिवेश का नैतिक बने रहना आज की बाजार व्यवस्था को देखकर नामुमकिन सा लगता है। फिर भी कुछ जिम्मेदार एआई कंपनियां अगर दुनिया के संविधान, नैतिकता, मानवीय मूल्यों, और सामाजिक न्याय की समझ भी एआई में डाल रही हैं, तो वह जिम्मेदारी का एक कदम तो है, लेकिन यह काफी नहीं है। दुनिया के इतिहास और वर्तमान में बहुत सी ऐसी विचारधाराएं रहती हैं जो कि सत्ता की नजर में बगावत रहती हैं, और आंदोलनकारियों की नजर में क्रांति रहती हैं। अब ऐसे आंदोलनों को एआई किस नजर से देखेगा? जब दुनिया गर्भपात के अधिकार को लेकर बंटी हुई है, आर्थिक असमानता को लेकर उदार अर्थव्यवस्था के साथ टकराव चलते रहता है, तो फिर एआई के सामने जब इन दोनों में किसी एक के पक्ष में फैसला लेना होगा, तो वह अपने को विकसित करने वाले कारोबार के हिसाब से चलेगा, या इंसानी बेहतरी की सोचेगा?
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777542783dit_musk.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323149&amp;path_article=18</guid><pubDate>30-Apr-2026 3:21 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भारत में धार्मिक अराजकता, जमीन पर रोकने की जरूरत न कि जजों के प्रवचन की..</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323054&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323054&path_article=18]]></link><description>सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधानपीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है, और इस मंदिर में महिलाओं को दाखिला दिया जाए, या नहीं, इस मुख्य मुद्दे पर बहस के साथ-साथ धर्म और आस्था के कई दूसरे मामलों पर भी दिलचस्प और महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण करने, और सडक़ों को घेरने को लेकर जजों ने बड़ी सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि किसी धार्मिक गतिविधि के नाम पर, मंदिर के वार्षिक उत्सव, या रथयात्रा के नाम पर मंदिर के आसपास की सभी सडक़ों को बंद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, जो कि धार्मिक गतिविधि का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी है। जजों ने कहा कि अगर धार्मिक आयोजनों के कारण धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां, या नागरिकों के सामान्य अधिकार प्रभावित होते हैं, तो राज्य सरकार को दखल देने, और इसे नियमित करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि धार्मिक सम्प्रदायों को अपनी पूजा पद्धति के प्रबंधन की स्वायत्तता है, लेकिन यह स्वायत्तता सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे, या आवश्यक नागरिक कार्यों में बाधा डालने तक फैली हुई नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार बिना सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के नहीं हो सकता, अराजकता नहीं चल सकती। जजों ने कहा कि प्रबंधन का यह मतलब नहीं है कि इंतजाम का कोई ढांचा ही न हो, संविधान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

हमने अभी चार-छह दिन पहले ही इसी जगह पर सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ में चल रही इस बहस के कई दिलचस्प पहलुओं को लेकर लिखा था, और पाठकों को सुझाया था कि लोकतंत्र, न्याय, और आस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं वाले इस मामले के फैसले के पहले भी इसमें चल रही बहस को भी लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, क्योंकि इन तमाम पहलुओं की महत्वपूर्ण व्याख्या सुनना अपने आपमें लोगों की चेतना बढ़ाने वाला है। अब जजों ने यह कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब सार्वजनिक असुविधा पैदा करना नहीं है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस मुद्दे पर यह लिखते आए हैं कि धार्मिक निर्माण आमतौर पर सरकारी या सार्वजनिक जगह पर कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियमों के खिलाफ किए जाते हैं। इन जगहों पर आने वाले लोगों की सुविधा के किसी भी नियम को माना नहीं जाता है, और किसी भी नए धर्मस्थल, उपासनास्थल के उगने के साथ ही आसपास के लोगों का शोरगुल से, ट्रैफिक जाम से जीना हराम करने की गारंटी कर ली जाती है। धर्म के नाम पर लोग ऐसे एकजुट हो जाते हैं कि मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च, या मजार-प्रतिमा, जो भी हो, उन सबको प्रशासन शांतिभंग होने की आशंका बताकर छूने से भी इंकार कर देता है। अगर बिना भेदभाव के सभी धर्मों की जगहों पर एक सरीखी कार्रवाई हो, तो कोई तनाव खड़ा नहीं होता। हम बनारस और दूसरे कई तीर्थस्थानों में लगातार देख रहे हैं कि किस तरह तंग सडक़ को चौड़ा गलियारा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पुराने-पुराने मंदिरों को भी तोड़ दिया गया, और लोगों ने उफ भी नहीं किया। हिन्दूवादी सरकारों के राज में भी ऐसा किया गया, और इसके बाद दूसरे धर्मों के लोगों को भी यह समझ आ गया कि अवैध कब्जा और अवैध निर्माण चल नहीं सकता, इसके साथ-साथ जब सार्वजनिक सुविधाएं बढ़ाने की बात होगी, तो लोगों को अपने मंदिर-मस्जिद हटाने भी पड़ेंगे।

</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777460702c_of_india.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=323054&amp;path_article=18</guid><pubDate>29-Apr-2026 4:34 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : जब संसद सोच-विचार की जहमत उठाना नहीं चाहती, तो यही होता है..</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322972&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322972&path_article=18]]></link><description>भारत की बड़ी अदालतों में केन्द्र और राज्य सरकारें ही सबसे बड़ी वादी, और प्रतिवादी बनी दिखती हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बात को कह भी चुका है कि किस तरह सरकार ही अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं। इसके अलावा संसद में भी कई बार ऐसे कानून बनते हैं जिनमें लचीलापन गायब रहता है, और बाद में होने वाले मुकदमों के दौरान अदालतों को कानून की बारीकियों के बीच से एक लचीलेपन की तलाश करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अभी एक ऐसा ही मामला आया। 55 बरस के पति, और 49 बरस की पत्नी की इकलौती बेटी अभी 2022 में गुजर गई। गम में डूबे हुए मां-बाप को यह सूझने में वक्त लग गया कि वे कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से एक बार फिर मां-बाप बन सकते हैं, औलाद पा सकते हैं। लेकिन भारत में प्रजनन प्रौद्योगिकी को लेकर 2021 में बने कानून में यह तय किया गया है कि महिला अगर 50 बरस पार कर लेगी, और पुरूष 55 बरस, तो फिर वे इस तकनीक के माध्यम से माता-पिता नहीं बन सकते। इस नियम के जाल से निकलने के लिए इस जोड़े ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने यह कहा कि संतान सुख पाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता। आईवीएफ सेंटर ने उम्र की सीमा का हवाला देते हुए इस जोड़े को मेडिकल रूप से सक्षम रहते हुए भी मना कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने आईवीएफ सेंटर को छूट दी है, और यह आदेश भी दिया है कि अगर आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान इस महिला की उम्र 50 बरस से अधिक भी हो जाए, तो भी यह इलाज न रोका जाए।

अब सवाल यह उठता है कि जब यह कानून बनाया गया, क्या ऐसी स्थितियों की कल्पना संसद में किसी सदस्य ने नहीं की थी? जब ऐसे कानून की जानकारी सांसदों को पहले से दी जाती है, संसद में चर्चा और बहस की उम्मीद की जाती है, तब भी अगर सांसद ऐसे पहलुओं पर नहीं सोचते, तो इसका मतलब यही है कि वे ऐसे बनने जा रहे कानूनों पर अपने इलाके के अलग-अलग तबकों से राय नहीं लेते हैं, राजनीतिक दल भी अपने अनगिनत प्रकोष्ठों के भीतर किसी प्रस्तावित कानून की बारीकियों तक विचार-विमर्श नहीं करते हैं, और विधेयक मंजूरी पाकर कानून बन जाते हैं। बहुत से और दूसरे कानूनों के साथ भी ऐसी जटिलताएं जुड़ी रहती हैं जो कि व्यापक और सार्थक चर्चा से दूर हो सकती थीं, लेकिन कानून बन जाने के बाद वे अदालतों पर बोझ बन जाती हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि देश का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा के लंबे चले सत्रों में एक-एक पहलू पर खूब विचार-विमर्श होता था, तो उसका फायदा संविधान के रास्ते देश को मिला। उस वक्त भी अगर हल्ला-गुल्ला, और बहिर्गमन के बीच बिना विचार-विमर्श और बहस के संविधान बन गया होता, तो आज अदालतें उसी की व्याख्या करने में लगी रहतीं।

प्रजनन तकनीक से जुड़े हुए कुछ और पहलुओं पर हमने पहले भी इसी जगह लिखा है। भारत में बेऔलाद लोगों को संतान पाने में मदद करने की एक तकनीक, सरोगेसी, के लिए कानून इतना जटिल बना दिया गया है, कि संतान पाने की चाह रखने वाले लोगों की हसरत अधूरी रह जाने का खतरा रहता है, दूसरी तरफ देश में जिन जरूरतमंद महिलाओं को दूसरों की मदद करके खुद भी कुछ फायदा हो सकता था, उसकी संभावना भी इस कानून ने खत्म कर दी है। इसके लिए जो महिला दूसरे जोड़े के एम्ब्रियो को अपनी कोख में रखने के लिए तैयार हो, उसका ऐसे बेऔलाद जोड़े का एकदम ही करीबी रिश्तेदार होना जरूरी है। ऐसी महिला अपने खुद के अंडे नहीं दे सकती। उसका शादीशुदा, विधवा, या तलाकशुदा होना जरूरी है। उसकी उम्र 25 से 35 बरस के बीच होनी चाहिए। उसका कम से कम एक जीवित जैविक बच्चा अपना खुद का होना चाहिए। सरोगेसी केवल नि:स्वार्थ आधार पर ही की जा सकती है, इसके लिए वह महिला केवल मेडिकल खर्च, और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज ले सकती है, लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं पा सकती। कहने के लिए तो यह कानून गरीब महिलाओं के कारोबारी शोषण को रोकने के लिए लाया गया है, लेकिन इसकी शर्तें इतनी कड़ी हैं कि बहुत से जोड़ों को तो ऐसे शर्तों वाली कोई रिश्तेदार महिला शायद मिल भी न पाए। दूसरी तरफ जिस देश में किसी महिला का देह बेचना गैरकानूनी नहीं है, जहां पर गैरकानूनी तरीके से किडनी खरीदना देश भर में धड़ल्ले से जारी है, वहां पर एक गरीब महिला को भी किसी दूसरी जरूरतमंद महिला से सरोगेसी के लिए भुगतान लेने की छूट नहीं है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777388737dit_photo_IVF.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322972&amp;path_article=18</guid><pubDate>28-Apr-2026 8:34 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  देश में पिछले दो-चार दिनों में बने दो विश्व रिकॉर्ड!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322878&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322878&path_article=18]]></link><description>हिन्दुस्तान में इन दिनों दो तरह के रिकॉर्ड बन रहे हैं, पहला रिकॉर्ड तो गर्मी का है, दुनिया के नक्शे में भारत सबसे गर्म देश के रूप में दर्ज हुआ है। दुनिया के सौ सबसे गर्म देशों में से 90 से 95 शहर तो अकेले भारत में हैं, जबकि खाड़ी के जो रेगिस्तानी देश परंपरागत रूप से बहुत गर्म रहते आए हैं, वे भी भारत से पीछे रह गए हैं। दुनिया में सबसे गर्म 20 शहरों में से 19 भारत में हैं, और एक शहर लगे हुए नेपाल का लुम्बिनी है, जो कि भारत को प्रभावित करने जैसा ही है। भारत में रेगिस्तानी राजस्थान और गुजरात से परे के बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर, और बंगाल के आसनसोल जैसे शहर 44-45 डिग्री के साथ दुनिया के सबसे गर्म शहरों में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ भी इसी तबके में आ चुका है। मौसम का जो नक्शा गर्मी को लाल रंग से दिखाता है, उस नक्शे पर पूरे का पूरा हिन्दुस्तान लहूलुहान सा दिख रहा है। अब दूसरा रिकॉर्ड जो बन रहा है, वह इससे जुड़ा हुआ भी है। भारत में अभी 24 अप्रैल को बिजली की मांग 256.11 गीगा वॉट रही है, जो कि रिकॉर्डतोड़ है। पिछले साल यह सबसे अधिक 243 गीगा वॉट थी, लेकिन साल भर में ही जितने एयरकंडीशनर बढ़े हैं, और गरीबों के घरों में भी कूलर लगने से बिजली की जो खपत बढ़ी है, उसकी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर यह अधिकतम खपत का नया रिकॉर्ड बना है। जबकि आज देश में अंतरराष्ट्रीय जंग और अस्थिरता के चलते हुए बहुत से कारखाने बंद हैं, या उन्होंने उत्पादन घटाया हुआ है। भारत के बिजली खपत में सबसे बड़ा हिस्सा, 41 फीसदी उद्योगों का ही है। 25 फीसदी बिजली घरों में खर्च होती है, और 17 फीसदी खेती में। कारोबार 8 फीसदी बिजली खर्च करते हैं। अब देश में बिजली की खपत कारखानों की कुछ घटी हुई मांग के बावजूद इतिहास में सबसे अधिक हो चुकी है, और 2031-32 तक यह और सौ गीगा वॉट बढ़ सकती है, 2040 तक यह खपत दुगुनी हो सकती है।

अब हम यह देखना चाहते हैं कि पूरी दुनिया में भारत जब सबसे गर्म देश बन ही चुका है, और सबसे गर्म शहरों के 95 फीसदी अकेले भारत में हैं, तो इस देश को अपने बारे में सोचना चाहिए। न सिर्फ पर्यावरणशास्त्री, बल्कि चिकित्सा विज्ञानी भी बार-बार यह खतरा गिनाते हैं कि बहुत अधिक गर्मी होने से इंसानी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? वे किस तरह जानलेवा खतरे में पड़ जाती है, और उसकी उत्पादकता कम हो जाती है। आमतौर पर मई-जून के महीने सबसे अधिक गर्म रहते थे, लेकिन अब भारत में लू काफी पहले, मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाती है, जो कि लंबे समय तक रहती है। लोगों को शायद याद नहीं होगा कि अभी दो-चार बरस पहले उत्तर भारत में अधिक लू और गर्मी की वजह से गेहूं की फसल बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई थी, और उसके पौधों में, दानों में दूध नहीं आ पाया था। अब जलवायु परिवर्तन की वजह से एक तो भारत के ऊपर समुद्री सतह गर्म होने से गर्मी का एक दबाव बना हुआ है, और एंटी साइक्लोन स्थिति बन जाने से गर्मी बढ़ते चल रही है। इसके अलावा पाकिस्तान और खाड़ी के देशों की ओर से सूखी और गर्म हवा भारत में पहुंच रही है, और हिमालय इन्हें आगे बढऩे से रोकता है, जिससे उत्तर-मध्य भारत एक हॉटबॉक्स बन गया है।

यह सब तो जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के व्यापक फेरबदल की वजह से हुआ है, दूसरी तरफ शहरों में लगातार कांक्रीट के जंगल विकसित होते जा रहे हैं, इमारतें बढ़ती जा रही हैं, डामर और कांक्रीट की सडक़ें बढ़ती चल रही हैं, गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं। ये सारी चीजें दिन के सबसे गर्म घंटों में गर्मी को सोख लेती हैं, और रात में भी पूरी तरह ठंडी नहीं हो पाती हैं, जब सूरज ढलने के बाद हवा कुछ ठंडी होती है, तब भी ये चीजें अपनी गर्मी हवा में छोड़ती हैं, इसलिए शहरों में रात का तापमान भी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले खासा ज्यादा रहता है। फिर लगातार यह बात खबरों में रहती है कि किस तरह हरियाली कटती जा रही है, और तालाब पटते जा रहे हैं। इन दोनों की वजह से नमी खत्म हो रही है, पानी की कमी तो हो रही है। भारत के इस मार्च-अप्रैल में मानसून के पहले की बारिश बहुत कम हुई है, और धरती को ठंडा होने का मौका ही नहीं मिला है। इन तमाम बातों को मिलाकर नौबत बहुत खतरनाक हो गई है, और हम भी बार-बार लोगों से इस बात की अपील करते हैं कि वे दोपहर के सबसे गर्म घंटों में अपने कर्मचारियों और कामगारों को बिना बहुत जरूरी हुए बाहर खुले में न भेजें।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777285092eat_map_final.jpeg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322878&amp;path_article=18</guid><pubDate>27-Apr-2026 3:47 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : राघव चड्ढा वगैरह का भाजपा जाना संविधान की नजर में सही, या गलत?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322809&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322809&path_article=18]]></link><description>आम आदमी पार्टी छोडक़र उसके नौजवान राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा संग 6 और सांसदों ने भाजपा में दाखिला ले लिया, और पंजाब से राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी से राज्यसभा में कुल एक सांसद बच गया है। राज्य के एक पर्यावरणशास्त्री बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल अब वहां से राज्यसभा में अकेले बच गए हैं, और उन्होंने यह कहा कि उनसे किसी ने दलबदल की चर्चा करने की भी हिम्मत नहीं की। उन्होंने कहा कि उनसे पार्टी के भीतर, या पार्टी के बाहर कोई कुछ नहीं छीन सकते। खैर, यह तो पार्टी के प्रति वफादार बने रहे सांसद की बात है, जो कि खबरों में नहीं हैं, दलबदलू जरूर खबरों में हैं, और इस दावे के साथ हैं कि उन्होंने दलबदल नहीं किया है। राघव चड्ढा का कहना है कि चूंकि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के जितने सदस्य हैं, उनमें से दो तिहाई से ज्यादा भाजपा में जा रहे हैं, इसलिए यह विलय है, दलबदल नहीं। इसी आधार पर कल हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसी घटना से शुरू करके छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के करवाए हुए दलबदल पर एक चर्चा की गई थी।

कल रात तक कानूनी समाचारों की एक प्रमुख वेबसाइट, लाईव लॉ, पर यह सवाल उठाया गया कि क्या किसी पार्टी के राज्यसभा के दो तिहाई सांसदों का दूसरी किसी पार्टी में चले जाना दलबदल से परे का काम रहेगा? इस पर एक जानकार ने संविधान के कुछ प्रावधानों को गिनाते हुए सवाल खड़े किए कि यह किस तरह दलबदल कानून से बच सकता है? हमने भारतीय संविधान की दलबदल विरोधी कानून की 10वीं अनुसूची के प्रावधान पढऩे की कोशिश की, तो वह दो आधारों पर किसी की सदस्यता को अयोग्य ठहराती है। पहला तो यह कि कोई सदस्य अपनी मर्जी से मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ दे। दूसरा यह कि किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी के साथ विलय कर लें। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले अच्छी तरह दर्ज हैं। 1992 में पांच जजों की संविधान पीठ ने एक मामले में कहा था-दलबदल विरोधी कानून सत्ता के लालच में, या किसी और फायदे के लिए दलबदल करने की बुराई को रोकने की नीयत रखता है। इससे भारतीय संसदीय लोकतंत्र का ताना-बाना मजबूत होगा। एक दूसरे मामले में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- 10वीं अनुसूची के दूसरे पैराग्राफ के मुताबिक महज दो तिहाई संख्या के आधार पर किसी और पार्टी में विलय सिर्फ गणित होगा, एक वैध विलय नहीं। वैध विलय के लिए एक संसदीय पार्टी का दूसरी संसदीय पार्टी में औपचारिक विलय होना जरूरी है। एक तीसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-दलबदल एक संवैधानिक पाप (बुराई) है। यह जनता के दिए हुए जनादेश के साथ धोखाधड़ी है। एक ऐसा विधायक (या सांसद) जो खुद होकर ऐसी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे, जिस पार्टी की टिकट पर वह जीतकर आया था, वह अपात्रता से नहीं बच सकता। 2023 के एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दुहराया- दो तिहाई बहुमत काफी नहीं है, पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया, और औपचारिक विलय जरूरी है।

राघव चड्ढा का दावा मुख्य रूप से दो तिहाई संख्या पर टिका हुआ है, लेकिन संवैधानिक व्याख्या, और कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में लिखी गई व्याख्या बड़ी साफ है। विलय की घोषणा पर्याप्त नहीं है क्योंकि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के संसदीय दल ने इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव पास किया था, या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इसके बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक, या पार्टी की आधिकारिक ईकाई ने इस विलय को मंजूरी दी है, या नहीं? अगर नहीं दी है, तो यह स्वेच्छा से सदस्यता त्याग माना जाएगा। एक और कानूनी व्याख्या कहती है कि चड्ढा का यह कहना- हम बीजेपी में जा रहे हैं, यह बयान इसी श्रेणी में आता है। अब तक चड्ढा ने राज्यसभा में आप संसदीय दल का कोई औपचारिक प्रस्ताव पेश नहीं किया है।

लाईव लॉ वेबसाइट पर मनु सेबस्टियन ने इस मामले की और कानूनी व्याख्या की है। उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए लिखा है कि किसी दूसरी पार्टी में विलय उसी हालत में दलबदल नहीं है जब मूल पार्टी के भीतर इस विलय के लिए औपचारिकता पूरी की गई हो। उन्होंने लिखा कि अगर कोई सदस्य ऐसे किसी विलय से सहमत नहीं है, तो भी वह अलग सदस्य के रूप में पार्टी में एक अलग गुट के रूप में बने रह सकते हैं, फिर चाहे दो तिहाई से अधिक बाकी सदस्य विलय का फैसला लेकर किसी और पार्टी में विलय कर लें। उन्होंने लिखा है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के चौथे पैराग्राफ में यह साफ लिखा है कि विलय की प्रक्रिया मूल राजनीतिक दल से शुरू होनी चाहिए, न कि संसदीय दल से। इसके साथ ही मूल राजनीतिक दल का दूसरे किसी राजनीतिक दल में विलय उसी हालत में माना जाएगा, जब मूल पार्टी के दो तिहाई संसदीय सदस्य वह विलय मानेंगे। इस तरह मूल पार्टी के दो तिहाई सदस्यों की सहमति दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए सिर्फ एक शर्त है, लेकिन इससे परे भी कुछ है। इस लेख में यह मुद्दा उठाया गया है कि आप और भाजपा के बीच जहां तक विलय की बात है, तो आप राष्ट्रीय पार्टी, अपने राष्ट्रीय मुखिया के माध्यम से ऐसे विलय की घोषणा करे, और उसके बाद सारे सदनों में दो तिहाई निर्वाचित व्यक्ति ऐसे विलय को स्वीकार करें, तो वह विलय वैध रहेगा। अन्यथा यह किसी सदन में कुछ निर्वाचित लोगों द्वारा अपनी पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में जाने सरीखा रहेगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777206571AP_EDIT_PHOTO.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322809&amp;path_article=18</guid><pubDate>26-Apr-2026 5:58 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : विविधता से हटते-हटते इंसान अब रेशम के कीड़े सरीखे अपने ककून के कैदी</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322736&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322736&path_article=18]]></link><description>चुनाव और जंग के दिनों में सबसे अधिक नुकसान सच का होता है। इन दोनों को ही जीतने के लिए हर किस्म का झूठ जायज मान लिया जाता है। कहा भी जाता है कि जंग में पहली लाश सच की गिरती है। क्या चुनाव में भी ऐसा ही नहीं होता है? अब वे दिन हवा हुए जब चुनावों में मुद्दों की बात हुआ करती थी, विचारधारा के आधार पर भाषण दिए जाते थे, और विपक्षी उम्मीदवार विरोधी न होकर विपक्षी ही माने जाते थे। अब वे दिन ग्रामोफोन रिकॉर्ड के दिनों की तरह धरोहर के दर्जे में आ गए हैं। इसी तरह किसी जंग के जायज होने, या उसमें नैतिकता का ख्याल रखने की बात अब प्रासंगिक नहीं रह गई है। हिन्दुस्तान की दर्जनों बोलियों में जिसकी लाठी, उसकी भैंस, यह बात अलग-अलग तरीके से लोकोक्तियों में आती है, और आज एक विकसित हो चुके समझे जाने वाले, लेकिन पाषाण युग में पहुंच चुके अमरीका को देखकर लगता है कि लोकतंत्र से पहले की यह लोकोक्ति उस पर कितनी खरी उतरती है। चुनाव और जंग, इन दोनों को लेकर अब रणनीति, रणभूमि, हथियार, हमला जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, और आज भारत के पांच राज्यों में चुनाव को लेकर वक्त कुछ ऐसा चल रहा है कि जंग के साथ-साथ चुनावी लड़ाई भी सोशल मीडिया पर छाई हुई है, और इन दोनों के मिलेजुले काले बादल सच के सूरज की किसी भी संभावना को ढांक चुके हैं।

ऐसे में सोशल मीडिया के साथ-साथ अखबार और दूसरे समाचार साधनों से समाचार-विचार पाने वाले लोगों का क्या हाल है? अखबारों तक तो यह बात अभी भी लागू है कि उसके अलग-अलग पन्नों पर आई हुई खबरों में से लोग अपनी पसंद की खबरें पढ़ सकते हैं, बाकी खबरों को छोड़ सकते हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म के साथ-साथ अब तो ऑनलाईन समाचार माध्यमों में भी लोगों की पसंद के हिसाब से समाचार-विचार सामने दिखते हैं। दो कदम और आगे बढ़ें, तो आज एआई समाचार-विचार को छांटने, उनका विश्लेषण करने, और उनके बारे में अपनी राय जोडक़र सामने रखने के लिए एक पैर पर खड़े दिखता है। अलग-अलग एआई आपको मुफ्त इस्तेमाल का अलग-अलग गिनती का कोटा देता है, और जब तक आखिरी सवाल भी पूछने का आपका कोटा बाकी है, वह आपको उकसाते रहता है कि अब तक की बातचीत के बाद वह आपके लिए और क्या करे? अब गूगल जैसे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले सर्च इंजन भी साधारण सर्च करके नतीजे सामने रखने के बजाय उन नतीजों पर अपना विश्लेषण पहले सामने रखते हैं, फिर उसके नीचे नतीजे रखते हैं। मतलब यह कि आपकी पसंद को भांपकर सारे सर्च इंजन, सारे एआई, और सारे समाचार श्रोत जो आपको सुहाए, वही आपके सामने रखते हैं। दशकों पहले हिन्दी फिल्म का एक गाना था, जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे...।

जब पूरी की पूरी टेक्नॉलॉजी आपकी मुसाहिब और चापलूस हो जाए, आपकी हाँ में हाँ मिलाने लगे, आपकी पसंद की फोटो, वीडियो, और पोस्ट दिखाने लगे, जो लोग आपको पसंद हैं, उन्हीं-उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखाने लगे, तो आप रेशम के कीड़े की तरह अपने ही इर्द-गिर्द के ककून के कैदी होकर रह जाते हैं, और धीरे-धीरे यह ककून एक अंडे की तरह बंद हो जाता है, और उसके भीतर जिस तरह रेशम का कीड़ा कैद रहकर दम तोड़ देता है, उसी तरह इंसान की कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, उसकी जागरूकता और चेतना धीरे-धीरे दम तोडऩे लगते हैं। अब इन दिनों तो भारत जैसे देश में किसी एक, या दूसरी, राजनीतिक विचारधारा के कैदी बढ़ते चल रहे हैं। राजनीतिक कैदियों के बाद धार्मिक और साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रवादी कैदी भी बढ़ते चल रहे हैं। ये किसी जेल में बंद नहीं हैं, लेकिन सोच के कैदी हैं, और ये विविधता से धीरे-धीरे पहले भी दूर होते जाते थे, लेकिन अब तो वे कम्प्यूटर, सोशल मीडिया, मोबाइल फोन की मेहरबानी से अपने दायरे को और तंग करते चलते हैं। अधिकतर लोग फेसबुक या इंस्टाग्राम पर भी 25-50 लोगों तक सीमित रह जाते हैं, उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखता है, और विपरीत विचारधारा आंखों से दूर होती जाती है।

इस अमूर्त से विषय पर लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि इंसानों ने पेड़ों से, हरियाली से, प्राकृतिक नदी-तालाब से अपने को दूर कर लिया है। अब शहर में कहीं तालाब हैं, तो उनके इर्द-गिर्द इतना सीमेंटीकरण हो चुका है कि उसका क्षेत्रफल पानी के क्षेत्रफल से कहीं अधिक रहता है। कहीं शहरी जंगल लगाया भी गया है, तो वहां आसपास चलने-फिरने, और उठने-बैठने का फर्शीकरण, सीमेंटीकरण इतना हो चुका है कि बिना किसी कृत्रिम चीज के एक पेड़ भी देखना आसान नहीं रह गया है। जंगल तो दूर रह गए हैं, और वहां भी लोग उन्हीं जगहों पर जाकर गाड़ी रोकते हैं, जहां पर इंसानों के बनाए हुए रिसॉर्ट रहते हैं। नतीजा यह है कि कुदरत की जिस विविधता से इंसानों के बहुत कुछ सीखने का हो सकता था, वह विविधता गायब हो गई है आसपास से। नतीजा यह हुआ है कि एक ही किस्म की सोच इस हद तक हावी हो चुकी है कि मानो किसी सीमेंट कारखाने से एक आकार बनकर निकले हुए सीमेंट ब्लॉक हों। जब लोगों की सोच से विविधता चली जाती है, तो पहले दूसरे देश के लोगों को सोचने और समझने की जरूरत खत्म होने लगती है, फिर अपने ही देश के दूसरे धर्म या प्रदेश के लोगों को, उसके बाद बारी आती है दूसरी जाति या दूसरे लिंग के लोगों की। आज औरत और मर्द भी एक-दूसरे को सोचने-समझने की कोशिशों से इतना खासा दूर हो चुके हैं कि थर्ड जेंडर, एलजीबीटीक्यू जैसे तबकों के लोगों को समझना तो नाजायज सा माना जाता है। जो इंटरनेट और सोशल मीडिया अभी हाल के बरसों तक लोगों को पूरी दुनिया बताने वाला माना जाता था, उस इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों की पसंद को जानकर और भांपकर, पहले अपने एल्गोरिद्म से और अब एआई की मदद से हर उस व्यक्ति को रेशम के कीड़े की तरह एक ककून में कैद करना शुरू कर दिया है, जो अपना खासा समय ऑनलाईन गुजारते हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777120081ilk-worm-extraction-life-cycle-textilesphere_EDIT_PHOTO_25_APR.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322736&amp;path_article=18</guid><pubDate>25-Apr-2026 5:57 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : धुआं उठा तो था आग से, लेकिन खबर बन गई...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322648&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322648&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से अभी कुछ दिन पहले कुछ वीडियो, फोटो, और कुछ बातें निकलीं, और वे चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गईं। एक धुंधली सी फोटो में आसमान पर कोई छोटा विमान उड़ते दिख रहा था, नीचे पहाड़ी थी, या जंगल था। उसके बाद दूसरी फोटो या वीडियो में विमान गायब था, और नीचे से उठता हुआ धुआं दिख रहा था। इन दोनों को जोडक़र लोगों ने तुरंत ही प्लेन गिरने की खबर बना ली, वेबसाइटों और टीवी चैनलों पर खबर चलने लगी। जशपुर में पुलिस और प्रशासन के फोन की घंटी बजना ही बंद नहीं हो रहा था। दूसरी तरफ प्रशासन को यह जानकारी थी कि जंगल में सुबह आग लगी थी, अधिकारी-कर्मचारी जाकर उसे बुझाकर आए थे। बाद में जाकर यह पता लगा कि जबलपुर से किसी तरह के एक सर्वे के लिए एक छोटा विमान उड़ा था, और वह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए इस इलाके में भी आया था, और लौट गया था। वीडियो, तस्वीर, और विमान की एक झलक, इन सबको जोड़-जोडक़र लोगों ने प्लेन गिरने का अंदाज लगाया, और उसे पोस्ट करना शुरू कर दिया। बात दिन की थी, इसलिए उस वक्त अखबार नहीं छप रहे थे, और सिर्फ वेबसाइटों, और टीवी चैनलों पर खबर छाई हुई थी। उसी दिन शाम तक यह साफ हो गया था कि कोई प्लेन नहीं गिरा है, लेकिन बहुत से समाचार माध्यमों ने एआई की मेहरबानी से प्लेन के मलबे की तस्वीरें दिखा दीं, और मुम्बई के एक बड़े नामी-गिरामी अंग्रेजी अखबार ने अपनी वेबसाइट पर अगले दिन तक यह समाचार दिखाना जारी रखा कि एक निजी विमान गिर गया है, उसके पायलट और को-पायलट दोनों मर गए हैं, और जिला कलेक्टर और एसपी विमान के मलबे के पास खड़े देख रहे हैं कि कोई और जिंदा है क्या।

पुराने वक्त से एक बात कही जाती है कि अगर धुआं है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। लेकिन अब इसे बदलकर यह करने की जरूरत है कि अगर धुआं है, तो नीचे प्लेन भी गिरा हो सकता है। या यह भी किया जा सकता है कि मीडिया अगर प्लेन क्रैश में लोगों के मरने की खबर दिखा रहा है, तो वह सूखे पत्तों के जलने से उठता हुआ धुआं भी हो सकता है। मीडिया ने इतना भी परखने की जहमत नहीं उठाई कि जशपुर के चारों ओर जो सबसे करीब के एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर हैं, क्या उनसे कोई खबर निकली है कि उनके इलाके का कोई विमान संपर्क से बाहर हो गया है? चारों तरफ यह खबर खूब फैली, हमारे अखबार में भी वेबसाइट पर यह खबर तुरंत डाली गई, क्योंकि कई बहुत भरोसेमंद पत्रकारों ने फोटो-वीडियो के साथ यह खबर पोस्ट की थी। कुछ घंटों के भीतर गुब्बारे की हवा निकल गई, और एक-एक करके वेबसाइटों ने समाचार हटाना या बदलना शुरू कर दिया। यह तो गनीमत है कि यह मामला पाकिस्तान की सरहद के करीब का नहीं था, वरना कुछ लोग इसे पाकिस्तान की तरफ से आया हुआ हवाई हमला, या कोई ड्रोन हमला करार दे देते।

ऐसा लगता है कि प्रिंट मीडिया अपने जिम्मेदार इतिहास को भूलकर पहले तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की देखादेखी पल भर में खबर दिखाने के मुकाबले में उतर आया था, और अब बाद में समाचार वेबसाइटों की वजह से यह मुकाबला और कुछ मील आगे निकल गया है। अब जिस सहूलियत से पल भर में गलत समाचार को मिटा देने की सुविधा हासिल हो गई है, उसके चलते अब झूठ या गलत पोस्ट करने से भी कोई परहेज रह नहीं गया है। जो लोग अधिक सावधानी बरतते हैं, और अपनी साख की फिक्र करते हैं, वे लोग भी वेबसाइट से समाचार पूरी तरह नहीं मिटाते, और बल्कि उसकी हैडिंग, और फोटो बदल देते हैं, जानकारी भी बदल देते हैं, और सच और झूठ की, सही और गलत की बात आई-गई हो जाती है। चूंकि सोशल मीडिया ने भी डिजिटल मीडिया के साथ मिलकर माहौल को गैरजिम्मेदार बनाने का बड़ा काम किया है, इसलिए अब किसी खबर के गलत साबित हो जाने के बाद भी कई दिन तक सोशल मीडिया अपने झूठ पर अड़े रहता है। प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रॉनिक से डिजिटल, और डिजिटल से सोशल मीडिया तक का यह सफर बड़ा लंबा रहा, और इसके हर दो-चार किलोमीटर पर जिम्मेदारी का अवांछित बोझ घटते चले गया, लोगों को सनसनी की एक बड़ी ताकत मिलती चली गई। प्रिंट के दिनों में किसी बात को ठोक बजाकर लिखने की जो आदत थी, उससे लोगों ने बदन की किसी अवांछित गठान की तरह छुटकारा पा लिया। अखबार छपने जाने के पहले कुछ घंटे का समय मिलता था, जिसमें जांच-पड़ताल हो जाती थी। फिर एक बार अखबार छप जाए तो कुछ भी बदलना मुमकिन नहीं होता था, इसलिए अखबारनवीसों के दिल-दिमाग पर जिम्मेदारी का बड़ा बोझ रहता था। टीवी चैनलों के समाचार बुलेटिन आकर चले जाते हैं, और अगले घंटे के बुलेटिन में गलत खबरों को हटा देने की सुविधा रहती है, इसलिए अखबारों वाली सावधानी की आदत खत्म हो गई। अब आज के डिजिटल और वेबसाइट वाले जमाने में सब कुछ मिटा देना आसान है, और किसी सावधानी की जरूरत नहीं रह गई है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1777034282DIT_PHOTO_24_APRIL.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322648&amp;path_article=18</guid><pubDate>24-Apr-2026 6:07 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : विदेशी सैलानियों पर यौन हमलों से पर्यटन कारोबार की तबाही का अंदाज है?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322554&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322554&path_article=18]]></link><description>कर्नाटक में कूर्ग का इलाका बड़ा खूबसूरत माना जाता है, और वहां पर्यटक भी बहुत पहुंचते हैं। राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, और पर्यटकों को भारतीय जनजीवन की बेहतर झलक दिखाने के लिए घरों में पर्यटकों के ठहरने का एक नया कार्यक्रम शुरू किया है। देश के कई और पर्यटन केन्द्रों पर ऐसा पहले से भी चल रहा है, और कई विदेशी सैलानी कमखर्च में भारत देखने के लिए, यहां का पारिवारिक जीवन देखने के लिए भी परिवारों में रूकते हैं। कर्नाटक में अभी ऐसे ही एक होम-स्टे में रूकी हुई एक अमरीकी पर्यटक महिला को उसी जगह काम करने वाले एक कर्मचारी ने किसी ड्रिंक में नशा घोलकर पिला दिया, और फिर उसके साथ बलात्कार किया। इसके सुबूत मिटाने, और महिला शिकायत न कर सके इसलिए वाईफाई बंद कर देने का काम भी किया गया। बाद में किसी तरह इस महिला ने बाहर निकलकर अमरीकी दूतावास को खबर की, और इस घर के मालिक-नौकर को गिरफ्तार किया गया। कुछ और लापरवाहियां भी सामने आई हैं कि कर्नाटक में इस घर ने अपने को पर्यटकों को ठहराने के लिए रजिस्टर भी नहीं करवाया था।

दूसरे देशों से भारत आने वाले लोगों से इस देश का करोड़ों लोगों का जीवन चलता है। एक अंदाज यह है कि पर्यटन से सीधे, और किसी और तरह से करीब साढ़े 8 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। भारत की जीडीपी में इस सेक्टर का योगदान करीब सवा 5 फीसदी है। ऐसी एक-एक घटना न केवल उस पर्यटक के अपने देश में, बल्कि भारत आने की सोच रहे और तमाम लोगों के बीच भी हौसला पस्त करती है। अलग-अलग कुछ प्रमुख देश अपने नागरिकों के लिए समय-समय पर ऐसी चेतावनी जारी करते आए हैं कि भारत अकेली महिला पर्यटक के लिए सुरक्षित नहीं है। अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों ने अपने नागरिकों को यह सलाह दे रखी है जिसमें भारत में विदेशी महिलाओं के साथ होने वाले यौन-अपराधों का जिक्र किया गया है, उन्हें भारत में कहीं भी अकेले न घूमने की सलाह दी गई है, और यह भी कहा गया है कि होटल या होम स्टे में अनजान लोगों से खाने-पीने की चीजें न लें, क्योंकि इनमें नशा मिला होने का खतरा रहता है।

यह देश कहने के लिए अतिथि देवो भव: की परंपरा का दावा करता है, लेकिन हमने विदेशी सैलानियों के साथ सार्वजनिक जगहों पर दिनदहाड़े देसी लोगों द्वारा तरह-तरह की बदसलूकी के कितने ही वीडियो देखे हैं। बदसलूकी से थोड़ा सा कम अगर देखें, तो किसी भी गोरी या विदेशी महिला के आसपास के हिन्दुस्तानी लडक़े और मर्द उसके साथ अपनी सेल्फी खिंचवाना अपना कानूनी हक समझते हैं। इस देश में अपने लोगों के साथ भी बलात्कार एक किस्म से पार्ट टाईम काम हो गया है, ऐसे में विदेशियों के प्रति यहां के लोगों का मोह सिर चढक़र बोलने लगता है। भारत अपने आपमें एक पूरे योरप जितना बड़ा विविधता वाला देश है। इसके कश्मीर का केरल से कोई भी मेल नहीं है, पश्चिम के गुजरात और राजस्थान से उत्तर-पूर्व के राज्यों का कोई मेल नहीं है, इसलिए यहां दुनिया भर के पर्यटक आते हैं क्योंकि एक वीजा से, एक देश के भीतर उन्हें कई देशों को घूमने जैसा फायदा मिल जाता है। भारत का पर्यटन उद्योग बहुत छोटे-छोटे से स्थानीय लोगों को रोजगार देता है, और किसी एक महिला पर्यटक के साथ बलात्कार जैसी घटना शायद दसियों हजार महिला पर्यटकों का भारत आने का इरादा बदल देती होगी।

भारत में चाहे जो सोचकर सरकार होम स्टे की छूट देती है, या उसे बढ़ावा देती है, उससे जुड़े हुए खतरों को न समझना देश के इस बहुत बड़े कारोबार को नुकसान पहुंचाएगा। एक रिपोर्ट बतलाती है कि एक-दो बलात्कारों के बाद ही महिला पर्यटकों के भारत आने में पिछले दो साल में करीब 12 फीसदी की गिरावट आई है। अब लोग छुट्टियां मनाने के लिए भारत की जगह वियतनाम, श्रीलंका, और थाईलैंड को प्राथमिकता दे रहे हैं जो कि पर्यटक सुरक्षा के मामले में भारत से ऊपर माने जाते हैं। भारत में एक औसत विदेशी पर्यटक ढाई-तीन हजार डॉलर खर्च करते हैं, जो कि ढाई-तीन लाख रूपए के बराबर होता है। इसमें होटल, टैक्सी, रेस्त्रां, ढाबे, गाईड, हस्तशिल्पी जैसे दर्जनों अलग-अलग पेशे के करोड़ों लोगों को काम मिलता है। अब एक दिक्कत यह है कि बलात्कार जैसे संगीन जुर्म करने वालों से परे राह चलती विदेशी सैलानी महिला को घेरकर उसके साथ तरह-तरह की छेडख़ानी, और बदसलूकी करने वाले हर शहर में मिल जाते हैं। जिन शहरों में विदेशी सैलानियों का लगातार आना-जाना रहता है, जहां लोग गोरी या किसी और रंग की चमड़ी को देखने के आदी हैं, वहां भी किसी महिला को देखते ही मर्दों के दिल कुलबुलाने लगते हैं। यह सिलसिला भारत की साख को बहुत बुरी तरह चौपट कर रहा है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776957246DIT_PHOTO_23_APRIL.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322554&amp;path_article=18</guid><pubDate>23-Apr-2026 8:43 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बुढ़ापे और मेले में अकेले रह जाने की अमिताभ की नसीहत</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322457&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322457&path_article=18]]></link><description>हर दिन किसी नए विषय पर लिखने का दबाव बड़ा खराब रहता है। वैसे तो घिसे-पिटे कई विषय ऐसे रहते हैं जिनमें आए दिन कुछ न कुछ नया होता है, और उन पर एक बार फिर लिखना जायज कहा जाएगा। लेकिन उन्हीं-उन्हीं घटनाओं या मुद्दों पर, या उन्हीं लोगों पर लिखने से बात तो बहुत सारी दुहराना हो जाता है। इसलिए हम कोशिश करते हैं कि जैसे ही कोई नया मामला हाथ लगे, उस पर लिखना चाहिए। ऐसे में आज अमिताभ बच्चन की सोशल मीडिया पर एक ताजा पोस्ट दिखी जिसमें उन्होंने लिखा है- इंसान चाहे कुछ भी कर ले, अंत में वो अकेला ही रहता है, और उसे सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा- कि समझदारों के सलाह-मशविरे हमेशा काम आएंगे, लेकिन आखिर में उस काम को अंजाम देने वाले हमेशा आप ही होंगे। आप जो महसूस करते हैं, जिस दौर से गुजरते हैं, जिस पर गौर करते हैं, जो दुख सहते हैं, जो लुत्फ उठाते हैं, जो हासिल करते हैं, या जिसका ख्याल करते हैं, वह सब सिर्फ आप ही हैं। आप ही सर्वोच्च हैं। अहमियत सिर्फ आपकी है, और किसी चीज की नहीं। आप विचारों, यादों, और संभावनाओं का एक पूरा ब्रम्हांड हैं, जो हर नए तजुर्बे के साथ लगातार निखर रहा है। आपके भीतर वो ताकत छिपी है जिस पर अक्सर नजर नहीं जाती, वो लचीलापन है जो आपको मुश्किलों से बाहर निकाल लाता है, और वो जिज्ञासा है जो आपको अनजाने मंजिलों की ओर धकेलती है। आप अपनी पसंद, अपने शब्दों, और अपने कामों से अपनी दुनिया को गढ़ते हैं, और हर मिलने वाले शख्स पर अपनी एक अनकही छाप छोड़ जाते हैं। खुद को समझने के इस सफर में, आप अपने आसपास की दुनिया को और भी साफ तौर पर समझने लगते हैं। याद रखें हर आप (इंसान) के भीतर अपनी एक निजी ताकत होती है, यही आपका वो हथियार है जिसे कोई तोड़ नहीं सकते। इसे अपने भीतर सहेजकर रखें, और जब सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब इसे बाहर निकालें। यही आपका सबसे बेहतरीन ढाल और रक्षक बनेगा।

अब अमिताभ बच्चन 83 साल की उम्र में अपने पेशे में देश के सबसे कामयाब व्यक्ति साबित हो चुके हैं, और उनकी समझदारी में भी कोई कमी नहीं दिखती है। वे विवादों से अपने को बहुत हद तक बचाकर चलते हैं, और अपने कामकाजी परिवार में वे अकेले ही सबसे अधिक उम्रदराज होने के बाद भी आज सबसे अधिक व्यस्त रहते हैं, सबसे अधिक कमाते भी हैं। उन्होंने अपनी अधेड़ उम्र में एक कारोबार में इतना लंबा नुकसान झेला था कि जिससे उबर पाना कम ही लोगों के बस का रहता है, लेकिन वे न सिर्फ उबरे, बल्कि वे उसके बाद लगातार ऊंचाईयों के आसमान पर चलते रहे, और आज वे देश के एक सबसे बड़े मनोरंजन-पेशेवर व्यक्ति हैं। कारोबारी घाटे से परे वे एक बार राजनीति में भी हाथ आजमा चुके हैं, और समय रहते वहां से बाहर निकल चुके हैं। उस वक्त देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी से उनका दो पीढ़ी का घरोबा रहा है, और जब यह घरोबा खत्म हुआ, तो वे उसके बिना जीना भी सीख चुके हैं।

अमिताभ बच्चन की लिखी इन बातों में से हम एक निचोड़ निकालकर उस पर आगे बात करना चाहते हैं कि हालात चाहे जो हो, आखिर में बस आप ही रह जाते हैं। अमिताभ ने माता-पिता से कोई बहुत मामूली से विरासत पाई हो सकती है, लेकिन वे अपने बच्चों के लिए हजारों करोड़ की एक विरासत खड़ी कर चुके हैं। बहुत अधिक समाजसेवा, और दान पर भरोसे का उनका कोई इतिहास नहीं है, और किसी एक गांव के किसानों के कर्ज पटाने की घटना शायद उनके दान का अकेला सार्वजनिक समाचार रहा है। खैर, यह तो हर व्यक्ति की अपनी पसंद की बात है कि वे समाज के कितने काम आते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन जिस हद तक आत्मकेन्द्रित हैं, उनका पूरा जीवन इसी की एक मिसाल रहा है, और इसलिए उनकी कही यह बात ईमानदार लगती है कि आखिर में इंसान एकदम ही अकेले रह जाते हैं। यह तो ठीक है कि परिवार के लोग, और यार-दोस्त कुछ लोग तो बहुत से लोगों के इर्द-गिर्द रहते हैं, लेकिन जिस तरह मेले में अकेले कहा जाता है, उसी तरह लोगों को अपने आखिरी वक्त के लिए अकेले रहने की तैयारी कर लेनी चाहिए। महज अमिताभ बच्चन नहीं, हम तो बहुत से आम लोगों की जिंदगी की अपनी मिसाल, या उनकी कही हुई कुछ बातों में भी दूसरों के लिए राह ढूंढ लेते हैं, अमिताभ बच्चन तो एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।

अमिताभ की कही हुई बात को याद रखते हुए लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि आखिरी में वो अकेले हो सकते हैं। यह तो ठीक है कि अमिताभ आज बिना दोस्तों के दिखते हैं, परिवार में भी अपनी व्यस्तता के चलते कई बार आधी रात और सुबह के बीच किसी वक्त काम से घर लौटते हैं, और घर के बाकी कम उम्र सदस्य तब तक शायद सो चुके रहते हैं। इसके बावजूद वे, बिना किसी जरूरत के लगातार इतनी मेहनत करते हैं, इतना कमाते हैं, और ऐसी कोई भी मिसाल नहीं है कि वे गंवाते भी हैं। हम अमिताभ बच्चन की राजनीतिक तटस्थता के कायल नहीं हैं, हम कई बार इस बात की आलोचना कर चुके हैं कि दलगत या चुनावी राजनीति से परे भी देश और दुनिया के कई मुद्दों पर चर्चित और मशहूर लोगों को बोलना चाहिए, मुंह खोलना चाहिए, जिससे अमिताभ बच्चन बचते हैं। कोई दस-पन्द्रह बरस पहले पेट्रोल के बढ़ते दाम, या डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती हुई कीमत पर सोशल मीडिया पर लिखकर वे अपने हाथ जला चुके हैं, क्योंकि आज पेट्रोल उस वक्त से दुगुना महंगा हो जाने पर, और रूपये की कीमत आधी रह जाने पर भी उनके होंठ सिले हुए हैं। हम ऐसी तमाम मिसालों में दुनिया भर लोगों के लिए नसीहतें ढूंढते हैं, जो कि आसानी से सतह पर तैरती हुई मिल जाती हैं। अमिताभ ने अपने आपको किसी भी तरह की सार्वजनिक जिम्मेदारी से परे रखा है, और यह बात भी लोगों को अच्छी लगे, या बुरी लगे, उन्होंने इसकी एक मिसाल तो पेश की है कि जिस भोपाल में उनकी ससुराल थी, वहां पर गैस त्रासदी में हजारों लोगों के मर जाने, और लाखों लोगों की सेहत बहुत बुरी तरह बर्बाद हो जाने पर भी उन्होंने कभी मुंह नहीं खोला, शायद मदद का हाथ भी नहीं बढ़ाया। इतना आत्मकेन्द्रित व्यक्ति आखिर में अकेले तो रह ही जाएगा।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776858129DIT_PHOTO_Amitabh.JPG" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322457&amp;path_article=18</guid><pubDate>22-Apr-2026 5:11 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सरकारी दफ्तरों की नई करेंसी, बादाम चढ़ाना न भूलें....</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322376&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322376&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के बिलासपुर दफ्तर में एक नौजवान की फाइल सालभर से नहीं मिल रही थी। किसी दफ्तर में फाइल न मिलने की भारत में कुछ बड़ी जाहिर सी वजहें रहती हैं, जिन्हें मुंह से बोलकर जाहिर नहीं किया जाता, लेकिन पता सबको रहता है। लोगों को याद होगा कि ऑफिस-ऑफिस जैसे किसी नाम का एक टीवी सीरियल रहता था जिसमें मुसद्दीलाल नाम का एक किरदार था, जो कि सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते दिखता था, और दफ्तरों के लोग उसका मजा लेते रहते थे। वह भारत के आम सरकारी दफ्तरों पर टेलीविजन पर एक सबसे ताकतवर कटाक्ष था। वह सीरियल तो अपनी जिंदगी जीकर खत्म हो गया, लेकिन सरकारी दफ्तर अब तक जारी हैं, और इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में कोई सुनामी भी सरकारी इंतजाम को बहाकर कम नहीं कर सकती।

अब बिलासपुर में इस नौजवान ने सालभर धक्के खाने के बाद आधा किलो बादाम खरीदा, और महिला अधिकारी की मेज पर जाकर उसे बिखेर दिया कि इसे खाने से शायद आपकी याददाश्त तेज हो जाए, और न मिल रही फाइल मिल जाए। दोनों तरफ से इस बादाम के वीडियो बन रहे थे, जिस महिला अधिकारी की मेज पर यह प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया गया, वह भी अपने फोन से इसकी रिकॉर्डिंग करते दिख रही थी। खैर, जब यह वीडियो चारों तरफ फैला, और सरकार की, हाउसिंग बोर्ड की खासी खिल्ली उड़ गई, तो इस महिला अधिकारी को भी हाउसिंग बोर्ड के मुख्यालय अटैच कर दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में बरसों तक फाइलों को रोकने का जो आम सिलसिला चलता है, उसके लिए क्या हर सरकारी दफ्तर के बाहर पान-ठेलों पर बादाम के पैकेट भी बेचे जाएं? जिस तरह लोग शंकरजी के मंदिर में धतूरे का फूल लेकर जाते हैं, और नंदी के लिए बेलपत्री, क्या उसी तरह सरकारी दफ्तरों में साहब और बाबुओं की याददाश्त बढ़ाने के लिए बादाम चढ़ाए जाएं? हालांकि कोई भी अधिकारी, या कर्मचारी को चढ़ाए गए बादाम किसी मंदिर में चढ़ाए गए नारियल की तरह घूम-फिरकर उसी ठेले पर फिर आ जाएंगे, और अगले दिन कुछ नए लोग उन्हीं पैकेट को खरीदकर फिर सरकारी कुर्सियों पर चढ़ाएंगे? भारत में दीवाली के समय एक से दूसरे तक सफर करने वाली सोनपपड़ी के डिब्बे की तरह बादाम के पैकेट घूमना क्या ठीक रहेगा? क्या इससे हर सरकारी दफ्तर के बाहर दो-तीन रोजगार पैदा होंगे? क्या सरकारी चढ़ावे के लिए एक अलग किस्म का घटिया, और दीमक खाया हुआ बादाम चलन में आएगा? क्या बादाम के ऐसे इस्तेमाल के लिए चीन से बनकर नकली बादाम भी आने लगेंगे, ऐसे कई तरह के सवाल इस बादाम प्रणाली से उठ खड़े होंगे।

भारतीय सरकारी दफ्तरों में अभी तक एक दूसरी भाषा चलती थी कि किसी अर्जी के ऊपर कुछ वजन रखो, वरना वह कागज उड़ जाता है। हमने अपने बचपन से ही इसी भाषा को सुना है। अब यह बादाम वाली एक नई भाषा है, और यह पता नहीं कितने दिन चल पाएगी, कितने दिन में इस बादाम के देश को लेकर हंगामा होने लगेगा? कब यह कहा जाने लगेगा कि अफगान काबुलीवाला एक वक्त ऐसे बादाम लाकर हिंदुस्तान में बेचता था, और अफगानी बादाम को चढ़ाना ठीक नहीं होगा, अफगानी हाथों से उगाए हुए, तोड़े और तौले हुए बादाम यहां नहीं चलेंगे। हो सकता है कि ऐसी आपत्ति आने में अधिक देर न लगे, और खालिस इसी देश के, कुछ तबकों के उगाए हुए बादाम ही सरकारी दफ्तरों के बाहर बेचने की शर्तें लगाकर लोग डंडे-झंडे लेकर खड़े हो जाएंगे? लेकिन कुल मिलाकर एक बात यह समझ में आई कि सालभर में जो फाइल नहीं मिली थी, वह आधा किलो बादाम के बाद एक-दो दिनों में ही मिल गई। अब इसमें बादाम के साथ-साथ वीडियो बनाने, और उसे वायरल करने का योगदान कितना बड़ा था, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। फिर भी मोबाइल कैमरों से आज लोकतंत्र इतना तो आ गया है कि एक मुसद्दीलाल भी दो दिनों में किसी का ट्रांसफर करवा पाया, और उससे भी बड़ी बात कि अपनी गुमी हुई फाइल को ढुंढवाकर इंसाफ पाने की तरफ एक कदम बढ़ा पाया। अभी दो दिन पहले ही एक अदालत का एक किस्सा छपा था। एक बहुत ही गरीब और बुजुर्ग व्यक्ति के पक्ष में जब अदालत से फैसला हुआ, तो उसने जज को दुआ देते हुए कहा कि जाओ एक दिन थानेदार बन जाओगे। जज ने जब बताया कि वह तो थानेदार से बड़े ओहदे पर है, तो उस बुजुर्ग ने कहा कि थानेदार ने तो मुझे कहा था कि 5 हजार रुपए दो तो मैं दो दिन में मामला निपटा दूंगा। आपकी अदालत में 20 साल से मुकदमा लड़ते हुए वकील और बाबुओं पर 50 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं, तब इंसाफ मिला है, मेरे लिए तो थानेदार ही बड़ा रहता, लेकिन मैंने बादाम खाए नहीं थे इसलिए अक्ल नहीं आई थी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776782292adam.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322376&amp;path_article=18</guid><pubDate>21-Apr-2026 8:07 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : धर्म और आध्यात्म से इलाज के नाम पर हर जगह शोषण</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322271&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322271&path_article=18]]></link><description>यूपी की एक खबर है कि एक महिला अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए एक मस्जिद में मौलवी के पास गई, वहां मौलवी और एक दूसरे नौजवान ने उसे कुछ नशीली चीज पिलाकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अब उसकी शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज करके पुलिस ने जांच शुरू की है। इस महिला का कहना है कि उसका इकलौता बड़ा बेटा बीमार रहता है, और गांव के ही एक नौजवान ने उसे मौलवी से झाड़-फूंक कराने की सलाह दी। फिर वह नौजवान उन दोनों को मोटरसाइकिल पर गांव की मस्जिद ले गया। वहां मौलवी ने कुछ पिलाकर उसे बेहोश किया, दोनों लोगों ने उससे बलात्कार किया, उसके वीडियो बनाए, तस्वीरें खींची, और धमकी दी कि अगर किसी को बताया तो यह वीडियो फैला देंगे, और जान से मार देंगे। घर पहुंचकर पीडि़ता ने पति को यह सब बताया, और फिर पुलिस में शिकायत की गई। देश भर से, जगह-जगह से ऐसी शिकायतें आती हैं कि कहीं किसी तांत्रिक के पास इलाज के लिए जाने पर, तो कहीं किसी बैगा-गुनिया के पास झाड़-फूंक के लिए जाने पर वे लोग बलात्कार करते हैं, छोटे-छोटे बच्चों का भी देह-शोषण करते हैं। जहां कहीं धर्म या आध्यात्म के नाम पर अंधविश्वास के दर्जे की आस्था हो जाती है, वहां ऐसे खतरे खड़े हो जाते हैं। यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, बहुत सारे धर्मों में ऐसा होता है। अब इससे लोगों के बचने का क्या इलाज हो सकता है?

जहां तक इलाज के नाम पर शोषण की बात है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार पर आती है जिसका काम इलाज का पर्याप्त इंतजाम करना है। यह बात बिल्कुल साफ है कि जहां-जहां भरोसेमंद और सुविधापूर्ण आधुनिक चिकित्सा सुविधा रहती है, वहां धीरे-धीरे अंधविश्वास जाने लगता है, और लोग आस्था चिकित्सा को छोडऩे लगते हैं। लेकिन जहां अस्पताल नहीं है, इमारत है तो डॉक्टर नहीं है, डॉक्टर है तो नर्स नहीं है, मशीनें खराब हैं, दवाइयां हैं नहीं, तो फिर लोगों के पास मजबूरी में निजी चिकित्सा सुविधाओं तक जाना रह जाता है, और कई लोग ऐसे रहते हैं जो प्राइवेट डॉक्टरों या अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते, और वैसे लोग जादू-टोना, झाड़-फूंक, मंत्र-ताबीज जैसी चीजों की तरफ चले जाते हैं। आज ही छत्तीसगढ़ की एक खबर है कि एक पिछड़े हुए जिले में एक जंगली बिल्ली ने एक बुजुर्ग महिला को जख्मी कर दिया था, वह अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक कराती रह गई, और अब रैबीज के लक्षणों सहित मर गई। जंगली जानवर से भी रैबीज का संक्रमण हो सकता है, इसका अंदाज भी बहुत से लोगों को नहीं होगा, और गरीब बूढ़ी महिला अस्पताल जाकर भी हो सकता है कि रैबीज का इंजेक्शन न पा सके, जिसकी कमी पूरे प्रदेश में चल रही है, और हाईकोर्ट तक इस पर तल्ख टिप्पणियां कर चुका है।

मौत या बलात्कार जैसी खबरें आने पर लोगों का ध्यान इस तरफ जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हर गली-मोहल्ले में बिना चिकित्सकीय शिक्षा के, तरह-तरह के फर्जी कोर्स किए हुए लोग, या फर्जी कोर्स भी न किए हुए लोग दवाखाना खोलकर बैठते हैं, कई जगहों पर तो ऐसे लोग नकली अस्पताल भी चलाते हैं। हैरानी की एक खबर यह थी कि गुजरात जैसे विकसित और संपन्न राज्य में बिना डॉक्टरों के एक नकली अस्पताल ही चल रहा था। कमोबेश ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं, और कहीं-कहीं तो यूट्यूब पर वीडियो देखकर भी किसी स्वास्थ्य कर्मचारी ने सर्जरी कर डाली, और मौत हो जाने पर फरार हो गया। देश में मोटेतौर पर चिकित्सा व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, कुछ गिने-चुने एम्स जैसे केन्द्रीय संस्थान अलग-अलग राज्यों में केन्द्र सरकार चलाती है, लेकिन मरीजों का 90 फीसदी हिस्सा राज्य के अपने इंतजाम पर ही जाता है। हम छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं कि किस तरह यहां दवा खरीदी से लेकर चिकित्सा सेवा के बाकी हर पहलू में बीते बरसों का भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोल रहा है। आखिर ऐसा भ्रष्टाचार गरीब मरीजों के हक पर डाके के अलावा और क्या है? फिर किसी एक पार्टी की सरकार के रहते हुए ऐसा होता हो, और दूसरी पार्टी की सरकार रहते हुए न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। इस छत्तीसगढ़ में बीते 25 बरस में हमने हर सरकार में स्वास्थ्य विभाग में ऐसा ही परले दर्जे का भ्रष्टाचार देखा है, और शायद यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री रहे हुए अधिकतर नेता अगला चुनाव हार भी चुके हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776680273dit_photo,_oopar_se_kaat_den.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322271&amp;path_article=18</guid><pubDate>20-Apr-2026 3:47 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : कानून हाथ में लेना बुरा, या उसे पैरोंतले रौंदना?</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322173&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322173&path_article=18]]></link><description>उत्तर भारत का एक वीडियो आया है जिसमें सडक़ किनारे किसी घर के सामने अपनी माँ के साथ खड़ी एक लडक़ी के पास दुपहिया रोककर नशे में चूर दो नौजवान उससे उसका रेट पूछते हैं। वह लडक़ी वीडियो में दिख नहीं रही है क्योंकि वही यह वीडियो बना रही है, जिसमें वह दुपहिया का नंबर भी रिकॉर्ड कर रही है, दोनों नौजवानों के चेहरे, और उनकी गंदी बकवास सब कुछ रिकॉर्ड कर रही है। बाद में पता लगता है कि इनमें से एक नौजवान एक भूतपूर्व मंत्री का बेटा है। गाड़ी का नंबर भी रहता है, चेहरे भी खूब अच्छी तरह दर्ज हैं, गिरफ्तारी होती है, और एक-दो घंटों में ही जमानत पर रिहाई हो जाती है। यह मामला देश में इन दिनों चल रहे कुछ दूसरे मामलों के मुकाबले बड़ा छोटा लगता है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक कस्बे में इन दिनों तीन-चार मुस्लिम नौजवानों ने जिस तरह बताया जा रहा है कि पौने दो सौ से अधिक लड़कियों को फांसा, उनके वीडियो बनाए, ब्लैकमेल किया, उन पर बलात्कार किया, और अब ये सब सुबूत सहित पुलिस की कैद में हैं। इन्हीं दिनों कर्नाटक के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, देवेगौड़ा कुनबे का चिराग, देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री का पोता सैकड़ों महिलाओं के साथ सेक्स हजारों वीडियो सहित कैद है, बीते बरस अगस्त में एमपी-एमएलए अभियुक्तों के लिए बनी एक विशेष अदालत ने प्रज्जवल रेवन्ना को उम्रकैद सुनाई है, इसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी है, और वह बेंगलुरू की जेल में सजा काट रहा है। उसके वीडियो तो हजारों मिले हैं, लेकिन शिकायत करने कुल चार महिलाएं सामने आई थीं, और इनमें से एक में ही अभी सजा हुई है।

देश भर में जगह-जगह न सिर्फ पेशेवर मुजरिमों, बल्कि तरह-तरह के नेताओं, और राजनीतिक या ताकतवर परिवारों के कपूतों के किए हुए बलात्कार सामने आते हैं, और ऐसे में एक घटना याद पड़ती है, जो काफी पुरानी है, लेकिन जो याद दिलाती है कि जब सरकार और अदालत इंसाफ नहीं कर पाते, तब फिर लोग कानून किस तरह अपने हाथ में लेते हैं। इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल महाराष्ट्र में नागपुर की एक जिला अदालत की 2004 की है। वहां पर 40 से अधिक बलात्कार और हत्याओं का आरोपी अक्कू यादव खड़ा था, पुलिस उसे 13 साल से बचाते आ रही थी, लेकिन कस्तूरबा नगर की थकी हुई महिलाओं ने उसे गिरफ्तार करवाकर दम लिया था। जब उन्हें यह लग रहा था कि यह अदालत से जमानत पर छूटकर आएगा, और फिर मोहल्ले, और इलाके में जिससे चाहे उससे बलात्कार करेगा, तो चार सौ महिलाएं अदालत में घुसीं, वे मिर्च पावडर, सब्जी काटने वाले चाकू, और पत्थर लेकर गई थीं। उन्होंने अदालत के भीतर ही उस पर हमला किया, और उसे चाकुओं से गोद डाला। उन महिलाओं का तनाव इस बात से देखा जा सकता था कि उन्होंने उसके मर्दाने शरीर का वह हिस्सा ही काटकर अलग कर दिया जिससे वह बलात्कार करता था। यह मामला अदालत में चलते रहा, किसी ने इन महिलाओं के खिलाफ गवाही नहीं दी, और सारी महिलाएं छूट गईं। दस बरस लगे, लेकिन अदालत ने इन महिलाओं को बरी करते हुए यह माना कि अपराधी के आतंक, और पुलिस की सांठगांठ ने उन्हें इस सामूहिक आक्रोश के लिए मजबूर किया था।

2015 में नागालैंड में जेल की दीवार तोडक़र भीड़ ने बलात्कार के एक आरोपी को बाहर निकाला, उसे शहर में घुमाया, और मार डाला। भीड़ का तर्क था कि अगर आज इसे नहीं मारा, तो कल यह जमानत पर बाहर आकर यही काम करेगा। एक दूसरा मामला बिहार के पूर्णिया में 2021 का है, वहां एक व्यक्ति पर एक बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप था। गांव के लोगों ने पुलिस के आने के पहले अपनी खुली अदालत शुरू की, हजारों की भीड़ के बीच पहुंची पुलिस बेबस खड़ी रही, और भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में ही आरोपी को मार डाला, उनका तर्क था कि पुलिस ले जाएगी, तो दो साल बाद यह छूटकर फिर गांव में घूमेगा, और यही हरकत करेगा। इसके कुछ पहले 2018 का एक मामला अरूणाचल प्रदेश के ईटानगर का है। वहां दो लोगों पर एक मासूम के साथ बलात्कार करने, और उसे मार डालने का आरोप था। वे पुलिस हिरासत में थे, भीड़ ने पुलिस थाने पर हमला किया, लॉकअप के ताले तोड़े, दोनों आरोपियों को खींचकर बाजार के बीच ले गए, पुलिस की गोलियां भी भीड़ को नहीं रोक पाईं, दोनों को लोगों ने सडक़ पर ही मार डाला, क्योंकि पुलिस और अदालत पर उनका अधिक भरोसा नहीं रह गया था।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776593060dit_photo_women.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322173&amp;path_article=18</guid><pubDate>19-Apr-2026 3:33 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : आस्था ऊपर, या मौलिक हक? सुप्रीम कोर्ट में खड़ा है आज तक का सबसे बड़ा सवाल</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322082&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322082&path_article=18]]></link><description>सुप्रीम कोर्ट में पिछले कुछ दिनों से कैसी गजब की दिलचस्प बहस चल रही है कि उसे सुनने के लिए तरह-तरह के ईश्वर भी ऊपर टकटकी लगाकर बैठे होंगे, और कानों के पीछे हाथ टिकाकर ध्यान से सुन रहे होंगे। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को लेकर 9 जजों की संवैधानिक बेंच पिछले दस दिनों से सुनवाई कर रही है, और वह इस एक मंदिर से ऊपर उठकर आस्था और संविधान की बहस का आज तक का शायद सबसे बड़ा मामला बन गया है। अब बहस इस पर नहीं टिकी है कि एक नागरिक के रूप में, एक हिन्दू के रूप में महिला का इस मंदिर में दाखिल होने का हक मंदिर की परंपराओं के ऊपर है, या परंपराएं महिला के मौलिक अधिकार के ऊपर हैं। बहस अब इससे बढक़र यहां पहुंच गई है कि क्या अदालत को धर्म के अंदरुनी मामलों में घुसने का हक है भी या नहीं? और चूंकि यह बहस बहुत से बड़े-बड़े जानकार वकीलों, और सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के बीच चल रही है, इसलिए इसमें हर दिन हर टिप्पणी को लेकर नए पहलू सामने आते हैं। मीडिया के अलग-अलग हिस्से इन टिप्पणियों को लेकर अपनी पसंद और प्राथमिकता के मुताबिक सुर्खियां बनाते हैं, जिन्हें पढक़र एक पुरानी लाईन याद आती है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

अभी चूंकि यह मामला चल ही रहा है, इसलिए हर पहलू से बहस जारी है, और यह बहस कुछ लंबी भी चल सकती है क्योंकि यह बड़ी संवैधानिक पीठ है, और यह इस एक मंदिर से परे भी जिन संवैधानिक सवालों पर गौर कर रही है, वे लंबे भविष्य तक इस देश में धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों की परिभाषाएं तय करेंगे। अदालत इस बात पर गौर कर रही है कि क्या किसी व्यक्ति का समानता का अधिकार, किसी धार्मिक संप्रदाय की अपनी परंपरा को मानने की आजादी से बड़ा है? इस सवाल को इस संदर्भ में समझने की जरूरत है कि केरल के सबरीमाला मंदिर में दस बरस से पचास बरस तक की महिलाओं को दाखिला नहीं है क्योंकि मंदिर की परंपराएं यह मानती हैं कि वहां के देवता आजीवन ब्रम्हचारी रहे हैं, और उनके सामने माहवारी की उम्र वाली महिलाओं को नहीं जाना चाहिए। एक दूसरा सवाल अदालत के सामने यह है कि क्या जज यह तय कर सकते हैं कि किस धर्म के लिए कौन सी प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? क्या अदालत को धर्मशास्त्री की भूमिका निभानी चाहिए, या यह फैसला उस धर्म के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए? एक और दिलचस्प सवाल अदालत के सामने यह आया है कि छुआछूत का मतलब क्या सिर्फ जातिगत भेदभाव होता है, या माहवारी के दिनों के आधार पर महिलाओं को मंदिरों से बाहर रखना भी इसी दायरे में आता है? एक और सवाल अदालत के सामने यह है कि नैतिक किसे कहा जाए, जो समाज की नजर में सही है, उसे कहा जाए, या जो संविधान की प्रस्तावना में लिखा है, उसे कहा जाए? अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि क्या धार्मिक नैतिकता को संवैधानिक नैतिकता के सामने झुकना होगा, या इसका उल्टा अधिक जायज होगा? फिर इस मंदिर को लेकर एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि भगवान अयप्पा के भक्त क्या एक अलग संप्रदाय हैं? अगर हाँ, तो क्या उन्हें अपने मंदिर के नियम खुद तय करने का हक है, जिसमें सरकार या अदालत दखल नहीं दे सकते? इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि जो व्यक्ति इस धर्म, या इस मंदिर के भक्तों के एक काल्पनिक संप्रदाय की परंपराओं का पालन नहीं करते, क्या वे अदालत आकर उस धर्म या संप्रदाय की प्रथाओं को चुनौती दे सकते हैं? अदालत के सामने एक सवाल यह भी है कि अदालत और धर्म के बीच लक्ष्मण रेखा कहां पर है? क्या अदालतें किसी धर्म की निजी आस्था की समीक्षा कर सकती हैं? क्या आस्था को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, या आस्था अपने आपमें तर्क से परे, और तर्क से ऊपर है?

अब हमें 2018 का इसी मामले में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला याद करना पड़ेगा। पांच जजों की एक बेंच के सामने सबरीमाला का ही मामला आया था जिसमें 4:1 के बहुमत से फैसला आया था, और एकमात्र महिला जज ने ही बाकी बहुमत के खिलाफ राय दी थी। जस्टिस दीपक मिश्रा उस वक्त मुख्य न्यायाधीश थे, और वे क्रांतिकारी बदलाव के पक्ष में थे। एक दूसरे जज, जस्टिस ए.एम.खानविलकर भी बहुमत के साथ थे। जस्टिस आर.एफ.नरीमन ने यह कड़ा रूख अपनाया था कि संविधान ही सर्वोच्च है। और जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने इसे छुआछूत और पितृसत्तात्मक सामाजिक परंपराओं से जोडक़र देखा था। अकेली महिला जज जस्टिस इन्दू मल्होत्रा ऐसी थीं जिनका तर्क था कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक परंपरा सही है, और कौन सी गलत। इस फैसले की लैंगिक-व्याख्या भी जरूरी है कि चार पुरूष जजों ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता खोला था, और बेंच की अकेली महिला जज ने परंपरा और आस्था का हवाला देकर महिलाओं को इस मंदिर के बाहर रोका था। अब 2026 की 9 जजों की बेंच 2018 के उस पांच जजों के फैसले की समीक्षा कर रही है कि उस फैसले में धार्मिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज तो नहीं कर दिया गया था।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776510913dit_photo.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=322082&amp;path_article=18</guid><pubDate>18-Apr-2026 4:44 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : रिग मशीन देखने जैसा उत्साह जनता में डी-लिमिटेशन का!</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321986&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321986&path_article=18]]></link><description>हिन्दुस्तान बड़ा मजेदार देश है। किसी का मकान गिराया जा रहा हो, या बड़ी सी कोई मशीन नाले से कचरा निकाल रही हो, सडक़ों पर कोई मशीन झाड़ू लगा रही हो, या रिग मशीन ट्यूबवेल खोद रही हो, सौ-पचास लोग आसपास बैठकर उसे देखते रहते हैं। उन्हें हासिल कुछ नहीं होता, लेकिन शायद जिंदगी में उसे देखने से बेहतर कुछ करना उन्हें नसीब नहीं है। कुछ ऐसा ही लोकसभा और विधानसभा की सीटों के बढऩे को लेकर चल रहा है। जो नेता चुनाव लडक़र सांसद या विधायक बनना चाहते हैं, उनका तो उत्साही होना जायज है, लेकिन ऐसे नेता देश में कुछ लाख ही हैं। बाकी दसियों करोड़ लोग बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह डाँस कर रहे हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि बढ़े हुए सांसदों और विधायकों का बोझ तो उन्हीं की जेब पर जाएगा। मामला कुछ ऐसा है कि किसी गैर की बारात में नाचने वालों से डीजे का पैसा लिया जाए, वैसा ही देश के आम नागरिक सांसद और विधायकों की संख्या बढऩे को लेकर खुश हैं। यह समझने की जरूरत है कि यह गिनती बढ़ जाने से क्या लोकतंत्र का संसदीय-संवैधानिक काम कुछ बेहतर हो जाएगा?

पहले तो यह समझने की जरूरत है कि सांसद और विधायक गली-मोहल्ले के काम करने वाले पंच या पार्षद सरीखे नहीं रहते हैं। उनके जिम्मे सिर्फ संसद या विधानसभा में देश-प्रदेश के मामलों पर चर्चा करना, नए विधेयक, या पुराने कानून में संशोधन आने पर उन पर चर्चा करना, और जरूरत रहने पर मतदान करना आता है। उन्हें पार्षदों सरीखे नाली-पानी, रौशनी-सडक़ जैसे काम नहीं करने रहते। इसलिए एक सांसद पांच लाख लोगों पर रहे, या दस लाख लोगों पर, संसद के भीतर उनके बोलने की गुंजाइश एक सी रहती है, सीमित रहती है, और अब तो पार्टियों के अनुशासन में बंधे रहने के बाद रहती ही नहीं है। पार्टियां ही उन्हें मिले हुए समय को अपने सदस्यों के बीच अपनी मर्जी से बांटती हैं कि किस सदस्य को कितने मिनट मौका मिले। ऐसे में उन्हें चुनने वाली जनता का संसद में सांसदों के कहे हुए से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। सांसद अपनी पार्टी के अनुशासन से बंधे हुए अपने मन की बात भी नहीं कह सकते, अपनी सीट के मतदाताओं की बात कहना तो दूर रहा।

अब आज-कल में डी-लिमिटेशन के बाद लोकसभा की मौजूदा 543 सदस्यों की गिनती बढक़र 850 करने की तैयारी है। अगले लोकसभा चुनाव के बाद इस सदन में 33 फीसदी अधिक लोग बैठेंगे। अब हम संसद के कामकाज को देखें, तो पिछले 20 बरस में संसद साल में औसतन 60 दिन बैठी है। साल में 52 इतवार होते हैं, उससे जरा ही ज्यादा दिन संसद चली है। सरकारें अब कम दिनों में, कम या तकरीबन बिना बहस के अधिक बिल पास करवाने की कोशिश करती हैं, और संसद के बजट और मानसून सत्र अक्सर समय के पहले खत्म हो जाते हैं। बाकी बचे हुए दिनों में भी बहुत सारे दिन तो नारेबाजी, बहिष्कार, और बहिर्गमन में चले जाते हैं। काम की बात सीमित होती है, और कई नेताओं के बड़े-बड़े भाषण का संसदीय काम से कोई लेना-देना नहीं रहता है, वह देश के मतदाताओं को दिया जा रहा एक राजनीतिक संदेश रहता है जो कि वे किसी आमसभा के मंच से भी दे सकते थे, लेकिन वे संसद का इस्तेमाल इस काम के लिए करते हैं। अब जब 33 फीसदी अधिक सांसद इस सदन में बैठेंगे, तो जाहिर है कि लोगों के बोलने का औसत वक्त करीब-करीब एक-तिहाई तो कम हो ही जाएगा।

भावनात्मक रूप से यह बात अच्छी लग सकती है कि अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों पर एक सांसद होंगे। लेकिन क्या किसी सांसद का अपने चुनाव क्षेत्र की आबादी की गिनती से अधिक लेना-देना रहता है? इलाका तो उतने का उतना रहता है, अब जब सीटें बढ़ेंगी, तो चुनाव क्षेत्र का आकार घट जाएगा, मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में 11 की जगह 17 सीटें हो जाने की चर्चा है, तो एक सांसद का चुनाव क्षेत्र कुछ छोटा हो जाएगा। लेकिन इससे लोकसभा सीट पर क्या फर्क पड़ेगा? जनता पर क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा कि उसके सांसद के सिर पर अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों का ही बोझ है? क्या इससे सांसद अपने वोटरों के पैर दबाने के लिए अधिक वक्त पाएगा, या पाएगी? यह पूरा सिलसिला रिग मशीन से बोरिंग खुदने जैसा है। खुदने वाले बोरिंग से किसी को पानी मिलेगा या नहीं, इस संभावना से भी परे लोग नजारा देखने बैठ जाते हैं। अब लोग यह नजारा देखने के लिए 33 फीसदी अधिक खर्च भी करेंगे। सांसदों के वेतन-भत्ते, उनके सफर की टिकटें, दिल्ली में उनके रहने-खाने का खर्च, यह सब बढ़ जाएगा। बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला की जेब से यह बढ़ा हुआ खर्च निकालकर लोकसभा नाम की डीजे पार्टी को दिया जाएगा, लेकिन वोटरों को मिलेगा क्या?

</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776531156arliament_NEW.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321986&amp;path_article=18</guid><pubDate>17-Apr-2026 12:56 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भविष्य की दुनिया में किसकी भूमिका के लिए कैसी लगेगी तैयारी, बताया सीजेआई ने..</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321918&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321918&path_article=18]]></link><description>भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अभी दिल्ली में एक व्याख्यान में कहा कि 50 साल बाद की भारतीय न्यायपालिका कैसी दिखेगी, यह एक गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि उस वक्त के जज आज के जजों से अलग होंगे, और उनके ज्ञान, उनकी समझ की जरूरतें भी अलग होंगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जज केवल कानूनी विशेषज्ञ तक सीमित नहीं रह पाएंगे, उन्हें उस वक्त अदालतों के सामने आने वाले मामलों को समझने के लिए कानून की किताबों, और पुराने फैसलों से कहीं आगे की समझ की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जजों का अलग-अलग बहुत से दायरों का जानकार होना जरूरी होगा, उन्हें विज्ञान, तकनीक, समाजशास्त्र, नैतिकता, पर्यावरण, और मानव व्यवहार की गहराई समझनी होगी। जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ मिसालें देते हुए कहा कि जब जीवन को प्रयोगशाला में इंजीनियरिंग से बनाया जाएगा, तो कानूनी जिम्मेदारी का सवाल उठेगा। उस निर्मित का मालिक कौन होगा, उसे क्या अधिकार होंगे? डिजिटल और एआई मुद्दों से विवाद बढ़ेंगे, और जजों को इनको समझने के लिए एक तकनीकी समझ लगेगी। आने वाले बरसों में जलवायु परिवर्तन, और पर्यावरण के मामले बहुत बढ़ेंगे। इन मिसालों के अलावा जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को इमारतों या भूगोल की सीमाओं तक कैद नहीं रहना चाहिए, न्याय लोगों तक पहुंचना चाहिए, न्याय के लिए लोगों को अदालतों तक आने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

हम सिर्फ जजों के बारे में, या भविष्य के जजों के बारे में आज की बात को सीमित रखना नहीं चाहते। जस्टिस सूर्यकांत की बात तो महज एक मिसाल है, कोई अदालत अकेले ही 2050 के बरस में नहीं पहुंचेगी, उसके साथ-साथ पूरा समाज भी आगे बढ़ेगा, संसद, सरकार, मीडिया, विज्ञान, टेक्नॉलॉजी, और जटिल समाज-व्यवस्था, ये सब भी अभी से लेकर चौथाई सदी का सफर पूरा करके बिल्कुल ही नए-नए किस्म के हो जाएंगे। इसलिए उस वक्त न सिर्फ अदालतों में बेहतर, और अधिक समझ वाले जज लगेंगे, बल्कि समाज के अलग-अलग दायरों में भी लोगों को अधिक शिक्षित रहना होगा। इस शिक्षा का मतलब महज स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से नहीं है, हालांकि उससे भी है। एक वक्त था जब 5वीं पास मुख्यमंत्री भी देश के सबसे काबिल मुख्यमंत्री हो सकते थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब देश और दुनिया को बेहतर समझने के लिए टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल जरूरी हो चुका है। नेताओं को, पत्रकारों और दूसरे किसी भी पेशे के लोगों को कम्प्यूटर, और एआई, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया, इन सबसे वाकिफ रहना पहले के मुकाबले बहुत अधिक जरूरी आज भी हो चुका है। हर दिन यह जरूरत बढ़ती जा रही है, और चौथाई सदी बाद कैसी हालत रहेगी, यह समझ से परे है। आज भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बहुत सारे मामले ऑनलाईन सुने जाते हैं, शायद एक-दो बरस के भीतर ही एक आभासी अदालत खड़ी हो जाएगी, जिसमें आभासी जज बैठे होंगे, और आज की वीडियो कांफ्रेंस की तरह उस अदालत में वकीलों की होलोग्राफिक त्रिआयामी छवि खड़ी होकर बहस करती रहेगी। यह तकनीक आज भी मौजूद है, और इसका इस्तेमाल महज वक्त की बात है।

लेकिन हम अदालत तक सीमित रहना नहीं चाहते। आने वाले वक्त के लिए लोगों को इसलिए भी तैयार हो जाना चाहिए, क्योंकि आज बहुत से लोगों के लिए जो भविष्य है, वह तो आज ही बहुत से लोगों का वर्तमान भी है। आज दुनिया का एक हिस्सा जिस तकनीक का इस्तेमाल करता है, वह बहुत से लोगों के लिए एक विज्ञानकथा किस्म की है। इसलिए रात-दिन जंगल के हिरण की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ती हुई तकनीक के बारे में सोच पाने की काबिलीयत नेताओं में भी लगेगी, पत्रकारों में भी लगेगी, और पेशेवर लोगों के बाकी दायरों में भी लगेगी। दुनिया में करोड़ों रोजगार खत्म होंगे, और शायद कुछ लाख नए रोजगार खड़े भी होंगे। इस बात को लिखते हमें महीनों हो चुके हैं कि आज एआई का खतरा उन अधिकतर कामों पर मंडरा रहा है, जो कम्प्यूटरों पर किए जाते हैं, मोबाइल फोन पर किए जाते हैं, जिनके लिए कुछ बोलना या सुनना पड़ता है, जिनके लिए की-बोर्ड की जरूरत पड़ती है, ऐसे सारे के सारे काम आज खतरे में हैं। इसलिए 25 बरस बाद की नौबत को सोच और समझ पाने की ताकत नेताओं के अलावा किसी भी देश-प्रदेश के बड़े अफसरों, योजनाशास्त्रियों को तो होनी ही चाहिए, जिन समाजों में अभी तक थिंक टैंकों का चलन खत्म नहीं किया गया है, वहां पर ऐसे थिंक टैंक सदस्यों को भी एक बेहतर कल्पनाशीलता की जरूरत पड़ेगी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776338056dit_future_court.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321918&amp;path_article=18</guid><pubDate>16-Apr-2026 4:43 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : पोप के साथ जुबानी जंग में उलझे ट्रम्प का मखौल उड़ाता सोशल मीडिया...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321832&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321832&path_article=18]]></link><description>दुनिया का सोशल मीडिया ट्रम्प के मीम से भरा हुआ है। यह मीम शब्द हाल ही में हिन्दी के लोगों के बीच भी प्रचलित हुआ है, जिसका मतलब किसी पर तंज कसते हुए, या किसी का मजाक बनाते हुए कोई फोटो, कार्टून, या वीडियो बनाना। सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों में अब हास्य और व्यंग्य की समझ कुछ बढ़ी है, और बहुत से लोगों में ऐसी कल्पनाशीलता देखने में मिल रही है, जो पहले नहीं थी। सोशल मीडिया के पहले तक आम लोगों के लिए अखबारों में पाठकों के पत्र कॉलम रहता था, या किसी सुनसान जगह पर दीवार पर कुछ लिखना। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति कुछ अधिक समर्पित लोग शौचालयों के भीतर से बंद दरवाजों पर भी अपनी मनपसंद सूक्तियां लिखा करते थे, और फिर बाहर से यह देखने का इंतजार करते थे कि उन्हें पढक़र निकलने वाले लोगों के चेहरों पर कैसी प्रतिक्रिया दिख रही है। अब इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर लोग इतना खुलकर लिखने लगे हैं कि सोशल मीडिया को कई गंभीर और उत्साही लोग पहले के मुकाबले अधिक दिलचस्पी से देखने लगे हैं।

अब ताजा मामला अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का है जो कि अपने युद्धमंत्री के साथ मिलकर दुनिया के सबसे बड़े धर्मगुरू, पोप के साथ एक सार्वजनिक बहस में उलझे हुए हैं। अपने आपको ईसा मसीह की तरह दिखाते हुए एआई से गढ़ी हुई तस्वीर पोस्ट करने का हौसला सिर्फ ट्रम्प का ही हो सकता था, क्योंकि उसके संकीर्णतावादी, दकियानूसी, धर्मालु समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा चर्च जाने वालों का है, और शायद उन्हीं के दबाव, उन्हीं की आलोचना के चलते ट्रम्प को अपने को ईसा मसीह दिखाती तस्वीर हटानी पड़ी। लेकिन सार्वजनिक जीवन में आप किसी विवाद या बहस की शुरूआत तो कर सकते हैं, उसे बंद नहीं कर सकते। नतीजा यह हुआ है कि अब सोशल मीडिया पर पोप लियो के साथ ट्रम्प के टकराव पर लाखों किस्म के फोटो, कार्टून बनकर पोस्ट हो रहे हैं। फेसबुक और ट्विटर इनसे भरे हुए हैं, और कुछ सर्च करने की भी जरूरत नहीं पड़ रही है। ट्रम्प के चक्कर में ईसा मसीह एकाएक खबरों में इतने आ गए हैं, कि ऊपर उन्हें अनायास यह लगने लगा होगा कि लोग उन्हें इतना अधिक याद कर रहे हैं। याद उन्हें नहीं कर रहे हैं, याद ट्रम्प की कमीनगी को कर रहे हैं, उसे कोस रहे हैं, उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, और इसके लिए सबसे बड़ा विषय ईसा मसीह हैं।

ट्रम्प ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। वह यह काम ईरान पर हमले के साथ भी कर चुका है, और जब मधुमक्खियों ने डंक मारना शुरू किया, तो वह भागे-भागे योरप के देशों, नाटो देशों, और दूसरे भूतपूर्व दोस्तों की तरफ बचाओ-बचाओ चिल्लाते हुए दौड़ा। उन तमाम लोगों ने ट्रम्प को कह दिया कि मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की योजना उनकी नहीं थी, और इसमें वे कोई मदद नहीं कर सकते। दरअसल ट्रम्प की दिमागी हालत ऐसी हो गई है कि वह किसी महिला के कपड़ों में हाथ डालने के अंदाज में मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल रहा है, ईरान पर हाथ डाल रहा है, हॉर्मुज को कभी बंद करने की मुनादी कर रहा है, तो कभी खोलने की। ऐसी अस्थिर, विचलित, और असामान्य मानसिक स्थिति के साथ जिसे मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना चाहिए था, वह दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री, और परमाणु हथियारों के सबसे बड़े जखीरे के बटन पर हाथ रखकर बैठा है। ऐसी ही विचलित दिमागी हालत में उसने अपने आपको दिव्य और दैवीय बताने का काम भी तेजी से आगे बढ़ा दिया है। ट्रम्प और उसका युद्धमंत्री ईरान पर हमले को दैवीय और ईश्वरीय करार देते थक नहीं रहे हैं, और ईश्वर के आशीर्वाद को अपनी हमलावर फौज के साथ बता रहे हैं। अमरीका विश्व इतिहास की ऐसी पहली महाशक्ति बन गया है जो कि एक मनोरोगी के हाथों चल रही है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776263346rump_as_jesus_EDIT_PHOTO_15_APR_26_.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321832&amp;path_article=18</guid><pubDate>15-Apr-2026 7:58 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : हनी ट्रैप में फंसे नाबालिग के अपहरण से उठे सवाल</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321711&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321711&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ में कल सामने आया एक जुर्म एक अजीब किस्म का गंभीर खतरा सामने रखता है। एक ठेकेदार के 16 बरस के नाबालिग बेटे को इंस्टाग्राम पर एक महिला ने दोस्ती के रास्ते आगे बढक़र मोहब्बत में फंसाया, और उसके बाद उसका अपहरण कर लिया। इसके बाद उसके पिता को वीडियो भेजकर एक करोड़ रूपए की फिरौती मांगी गई। एक दिन के भीतर गिरफ्तार कर लिए गए इन आरोपियों में इस महिला का पति भी है, और अपहरण किए गए लडक़े के परिवार का एक करीबी रिश्तेदार भी है। किसी नाबालिग से इस तरह ऑनलाइन दोस्ती करके, परिवार के लोगों के साथ मिलकर उसका अपहरण करके फंसाने वाली किसी महिला का यह पहला ही मामला है, और इसमें उसका पति भी शामिल था, जो कि कुछ चौंकाता भी है। इस वारदात के बहुत से अलग-अलग पहलू हैं, और उन सबके बारे में सोचने की जरूरत है।

ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा बड़ा और प्रमुख देश बना है जिसने 14-15 बरस से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर दाखिला देने के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बनाया है। भारत में भी दक्षिण के एक-दो राज्यों में ऐसी तैयारी चल रही है, लेकिन पूरे देश में जिस बात की जरूरत है, वह अभी नजर नहीं आ रही है। नाबालिग छात्र-छात्राओं को सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर फंसाकर, उन्हें हनी ट्रैप में उलझाकर, उन्हें ब्लैकमेल करके वसूली और उगाही करते हुए खुदकुशी तक के लिए मजबूर करने की घटनाएं दुनिया में कई जगह हो रही हैं। अमरीका और योरप के विकसित देशों में नाइजीरिया जैसे देशों में बैठे हुए लोग भी ऐसा साइबर-क्राइम कर रहे हैं। फिर यह सिलसिला सिर्फ नाबालिगों या कम उम्र के लोगों तक सीमित नहीं है, हमने बहुत से अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को इसी तरह हनी ट्रैप में फंसते देखा है जब वे किसी वीडियो कॉल पर किसी अनजान लडक़ी या महिला के न्यौते और उकसावे पर उतावले होकर अपने कपड़े उतार देते हैं, और अपने को कुछ मिनटों के भीतर ही ब्लैकमेल का सामान बना लेते हैं। ऐसे मामले भी भारत में हर दिन सैकड़ों की संख्या में हो रहे हैं, दर्जनों की संख्या में पुलिस तक पहुंच रहे हैं, और इक्का-दुक्का लोग पकड़ा भी रहे हैं। लेकिन इस ताजा वारदात में कुछ और भी पहलू गौर करने लायक हैं।

पहली बात तो यह कि इस साजिश में गिरफ्त में लिए गए लड़क़े का एक एकदम ही करीबी रिश्तेदार भी शामिल था। दूसरी बात यह कि ब्लैकमेल और अपहरण करने वालों में इस नाबालिग लडक़े से करीब 10 बरस बड़ी शादीशुदा युवती भी थी, और उसका पति भी। ये दोनों ही बातें परिवार के कमजोर ढांचे, शून्य नैतिकता, और सजा की तरफ से बेफिक्री की सुबूत हैं। लोग अपने बच्चों को किस-किससे बचाकर रखें? परिवार के लोग, पड़ोसी, शिक्षक-प्रशिक्षक, स्कूल के कुक और गार्ड, हर दर्जे के लोग तो बलात्कारी निकल रहे हैं। तीन-चार बरस के बच्चों से भी बलात्कार हो रहा है, और उनका कत्ल भी कर दिया जा रहा है। अब मां-बाप किस-किस पर, कहां-कहां पर नजर रखें? 14-15 बरस का लडक़ा इंस्टाग्राम पर किससे दोस्ती कर रहा है, इस पर नजर रखना मां-बाप के लिए एक मुश्किल और नामुमकिन काम इसलिए हो जाता है कि कई बच्चे उनके मोबाइल फोन, मोबाइल गेम, और सोशल मीडिया के जीवन में दखल देने वाले मां-बाप को छोडक़र, बगावत में खुदकुशी भी कर रहे हैं। सच तो यह है कि एक-दो पीढ़ी पहले बच्चे मां-बाप से डरे रहते थे, आज मां-बाप बच्चों से डरे रहते हैं, और बच्चे इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके मां-बाप से मनचाहे मोबाइल हासिल कर लेते हैं, और उनकी औकात के बाहर की दूसरी सहूलियतें भी। यह सिलसिला मां-बाप को बहुत कमजोर बना देता है, क्योंकि हर दिन कहीं न कहीं की खबर आती है कि मोबाइल पर अधिक वक्त गुजारने से रोकने पर किसी बच्चे ने खुदकुशी कर ली, तो किसी दूसरे बच्चे ने महंगे मोबाइल का पसंदीदा मॉडल न मिलने पर जान दे दी। ऐसे जमाने में सोशल मीडिया पर पहुंचे हुए कम उम्र, नाबालिग बच्चों की गतिविधियों पर मां-बाप कितनी नजर रख सकते हैं? सरकारों को ही सोशल मीडिया पर रोक लगानी होगी कि वे कम उम्र बच्चों को वहां दाखिला न दें। इसके साथ-साथ सरकारें मोबाइल फोन, लैपटॉप जैसे उपकरणों पर भी ऐसी रोक-टोक जोडऩे की शर्त कंपनियों पर लगा सकती हैं कि मां-बाप अगर अपने बच्चों के लिए ये उपकरण ले रहे हैं, तो वे इन पर नजर भी रख सकें। नाबालिग बच्चों की उनके मां-बाप से निजता कोई बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए। सरकार इन कंपनियों को यह भी कह सकती है कि वे ऐसे मोबाइल फोन और कम्प्यूटर पर यह सूचना दिखाते रहें कि इन उपकरणों पर उनके माता-पिता की निगरानी है। इससे ही नाबालिग बच्चों के कई तरह के खतरे टल सकते हैं। लेकिन इस सिलसिले में जो भी होना है, उसके लिए देश-प्रदेश की सरकारों को ही कानून और नियम बनाने होंगे, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने होंगे। इन सबमें निजता के सवाल उठेंगे, और समाज को उन पर भी चर्चा करनी पड़ेगी।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776166035dit_photo_14_APRIL_26.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321711&amp;path_article=18</guid><pubDate>14-Apr-2026 4:56 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : एक ऑस्ट्रेलियन ने दिखाया ट्रम्प को एक बढिय़ा आईना</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321631&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321631&path_article=18]]></link><description>ट्रम्प की कमीनगी पर अधिक लिखने को कुछ बचा नहीं है क्योंकि वह अमरीकी की सारी फौजी और कारोबारी ताकत को लेकर दुनिया को जिस तरह रौंद रहा है, उसका कोई इलाज फिलहाल तब तक नहीं दिख रहा, जब तक कि रूस और चीन दोनों एक साथ मिलकर अमरीकी फौज का सामना करने के लिए खड़े हों, और योरप चुपचाप बैठकर तमाशा देखता रहे। ऐसी कोई नौबत आ जाए तो हमें हैरानी नहीं होगी, क्योंकि जब योरप के भीतर के स्पेन और फ्रांस जैसे देश ट्रम्प को आईना दिखा रहे हैं, इजराइल के मुजरिम प्रधानमंत्री नेतन्याहू की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, और इजराइल के हर तरह के बहिष्कार की मांग कर रहे हैं, तब रूस और चीन मिलकर अगर अमरीका की फौजी गुंडागर्दी के मुकाबले उतरते हैं, तो यह सच्चे मायनों में एक विश्वयुद्ध हो जाएगा, और ट्रम्प ने कोई कसर तो छोड़ी नहीं है, अमरीका को बर्बाद करने की। दूसरी तरफ अमरीकी संसद को आज भी अगर इस बेदिमाग को ढोने से परहेज नहीं हो रहा है, तो फिर अमरीका इसी मवाली की हुकूमत का हकदार है।

लेकिन दुनिया भर के लोग अमरीकी गुंडागर्दी के मुकाबले अब सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें उठा रहे हैं। अभी जब ट्रम्प ने ईरान को तबाह करने के लिए नाटो देशों से मदद मांगी, और उन्होंने ट्रम्प की इस निजी जंग को नाटो के नीति-सिद्धांत से परे का बताते हुए इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया, तो ट्रम्प ने और कई देशों को पहले फतवा जारी किया कि वे आकर जंग में शामिल हों, और फिर उन्हें कोसना शुरू किया। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर जो लिखा है, उसे हम खुलासे से यहां पेश कर रहे हैं कि यह होता है दुनिया के सबसे बड़े मवाली के मुंह पर उसे उसकी हकीकत और औकात दिखाना।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1776079266dit_photo_trump_bloodthirsty_13_April_26.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321631&amp;path_article=18</guid><pubDate>13-Apr-2026 4:50 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बिना मेडिकल बिल, पेंशन वाले ट्रैफिक उपकरण पुलिस के सबसे असरदार औजार...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321530&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321530&path_article=18]]></link><description>दुनिया के विकसित देशों, और भारत के महानगरों से दशकों पीछे चलते हुए अब इस देश के छोटे शहरों में सडक़ों पर गाडिय़ों की स्पीड चेक करने, या दूसरे ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों की रिकॉर्डिंग करने की तकनीक का इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है। बहुत देर से शुरू होने के बाद भी अब पुलिस और प्रशासन के हाथ ऐसी तकनीक आसानी से लगी है जिससे वह सडक़ों पर, और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर गाडिय़ों, और गुंडागर्दी पर नजर रख सकती है। अब छोटे-छोटे शहरों में भी इतने कैमरे लग गए हैं, और वे इस तरह के नेटवर्क से जुड़ गए हैं कि पुलिस कंट्रोल रूम में बैठकर यह आसानी से देखा जा सकता है कि कौन किस जगह नियम तोड़ रहे हैं, उनकी तस्वीरें भी रिकॉर्ड की जा सकती हैं, और कंट्रोल रूम में बैठे-बैठे उनका ट्रैफिक चालान उनके नंबरों पर भेजा जा सकता है। अब मामूली से शहरों में भी किसी जगह लगने वाले ट्रैफिक जाम को उपग्रह से भी देखा जा सकता है, और उसे खत्म करवाने के लिए पुलिस की टीम को भेजा जा सकता है।

अब इसे भारत की जमीनी हकीकत के साथ अगर जोडक़र देखें, तो ट्रैफिक पुलिस बहुत बदनाम और भ्रष्ट समझी जाने वाली है। अगर वह ईमानदारी से भी सडक़ों पर चालान करती है, तो भी लोगों को लगता है कि यह वसूली या उगाही के लिए की जा रही कार्रवाई है। दूसरी तरफ जब सडक़ों पर खड़े होकर चालान की जरूरत नहीं रह जाती, जब कंट्रोल रूम में लगी हुई बड़ी-बड़ी स्क्रीन पर देखकर सुबूत सहित चालान करना पल भर का काम रहता है, तो सरकार को ऐसी सस्ती टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इससे एक साथ दो बातें होती हैं, एक तो नियम तोडऩे वाले लोगों पर जब बड़े पैमाने पर तेज रफ्तार से कार्रवाई होती है, तो लोगों में नियमों का डर तेजी से आता है। जब इक्का-दुक्का लोगों पर अपवाद की तरह कार्रवाई होती है, तो लोग बेधडक़ होते जाते हैं। इसलिए पुलिस को हर दिन सीमित चालान का एक कोटा तय करने के बजाय अलग-अलग शिफ्ट में कर्मचारियों को रखकर बड़े पैमाने पर चालान करने चाहिए, ताकि जिन्हें महीने में एक-दो बार जुर्माना भरना पड़ जाए, जिनके ड्राइविंग लाइसेंस सस्पेंड होने का खतरा दिखने लगे, उनके बीच नियमों का सम्मान तेजी से बढ़ेगा।

आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को देखें, तो पुलिस विभाग की मांग से आधे-चौथाई ही ट्रैफिक वाले यहां तैनात हैं। यह मांग उस वक्त से चली आ रही है जब टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बड़ा सीमित था। आज तो स्पीड दर्ज करने वाले रडार वाले कैमरे हैं, सडक़ों पर नियम तोडऩे वाले लोगों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करने वाले कैमरे लगे हैं, और अब ट्रैफिक पुलिस की उतनी जरूरत नहीं है जितनी कि पहले सोची और मांगी गई थी। अब बहुत ही आसान सी टेक्नॉलॉजी इतने सस्ते में हासिल है कि वह सरकार पर पुलिस के पडऩे वाले आर्थिक बोझ के मुकाबले बहुत ही सस्ती भी है, और एयरकंडीशंड कंट्रोल रूम में बैठकर आसानी से वह काम किया जा सकता है, जिसके लिए पुलिस को खराब मौसम में भी सडक़ों पर धूल और धुएं के बीच बदमिजाज लोगों से बदसलूकी झेलते हुए काम करना पड़ता था। अब पूरी दुनिया में टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल इतना आम हो चुका है कि एक पुलिस सिपाही पर सरकार के एक महीने के खर्च में एक से अधिक कैमरे लगाए जा सकते हैं, जो कि दूर से नियंत्रित होते हैं, और भ्रष्टाचार के आरोपों के बिना सरकार को अधिक कमाई करके दे सकते हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775994942DIT_PHOTO_12_APRIL.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321530&amp;path_article=18</guid><pubDate>12-Apr-2026 5:25 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : जंगखोर, जनसंहारी ट्रम्प सरकार के खिलाफ बोलने का पोप का गजब का हौसला</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321447&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321447&path_article=18]]></link><description>ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमलों के बीच एक-दो बड़ी अटपटी बातें सामने आई हैं। ट्रम्प सरकार, और कैथोलिक ईसाईयों के मुख्यालय, वेटिकन के बीच जो टकराव चल रहा है, वह राजा और धर्म के बीच टकराव का एक अनोखा मामला है। इतिहास आमतौर पर राजा की हिंसा का साथ देने वाले धर्म की मिसालों से भरा हुआ है। अलग-अलग देश, अलग-अलग राजा, या अलग-अलग शासन प्रणालियां, और उनमें से हर किसी के सबसे बुरे फैसलों का भी साथ देता हुआ धर्म, यही सबसे आम बात है। लेकिन खास बात इस बार यह है कि ट्रम्प सरकार इस जंग को धर्म के नाम पर लड़ रही है, और पोप यह साफ कर रहे हैं कि दुनिया का कोई हमला धर्म और ईश्वर के नाम पर नहीं किया जा सकता। तनातनी कुछ आगे तक बढ़ गई है, और अभी नौबत यह पहुंच गई कि खबरें बताती हैं कि अमरीकी रक्षा विभाग, पेंटागन ने अमरीका में पोप के दूत, कार्डिनल को बुलाकर फटकार लगाई है, और कहा है कि चर्च को अमरीका का साथ देना चाहिए, क्योंकि अमरीका के पास अपनी मर्जी पूरी करने की ताकत है। ऐसा पता चला है कि वेटिकन ने इस धमकी के जवाब में अमरीका की 250वीं सालगिरह के जलसे में शामिल होने का न्यौता ठुकरा दिया है, और पोप के प्रस्तावित अमरीकी दौरे को रद्द कर दिया है।

यह बात कुछ अटपटी इसलिए है कि अमरीका के ताजा इतिहास में धर्म का इतना अधिक और बेजा इस्तेमाल करके और कोई सरकार नहीं बनी थी। ट्रम्प ने सत्ता में आने के पहले, और आते ही चर्च को खुश करने के लिए और कट्टर धर्मालुओं को संतुष्ट करने के लिए गर्भपात के खिलाफ तरह-तरह की कार्रवाई की। ट्रम्प के सबसे करीबी लोग अपने को धर्म का बड़ा झंडाबरदार कहते हैं, और ऐसे में पोप के साथ एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज जुबानी जंग कुछ हैरान भी करती है। ईरान पर हमला शुरू होने के वक्त से ट्रम्प और उसके करीबी मंत्रियों ने फौजी कार्रवाई को ईश्वर की इच्छा, और न्यायसंगत युद्ध की तरह पेश किया। ट्रम्प की टीम अमरीका की फौजी ताकत को दुनिया में अच्छाई लाने का जरिया करार दे रही है। अमरीकी मूल के पहले पोप बने, वर्तमान, पोप लियो ने इसे सार्वजनिक रूप से ईश्वर के नाम का दुरूपयोग कहा, और कहा कि युद्ध कभी भी ईश्वर की इच्छा नहीं हो सकते। उन्होंने यह भी कहा कि इसे सभ्यताओं की जंग कहना पूरी तरह गलत है। जंग का साथ देने के लिए ट्रम्प सरकार के दबाव पर वेटिकन ने यह साफ किया कि ताकत सच का पैमाना नहीं हो सकता। पोप ने इस बारे में कहा कि ईश्वर कमजोरों और मजदूरों के साथ है, न कि मिसाइलों और परमाणु बमों के।

दरअसल ट्रम्प सरकार आने के बाद से, और ईरान की जंग छिडऩे के बीच भी पोप ने (और पिछले पोप फ्रांसिस ने भी), अपनी चिट्ठियों में यह लिखा है कि प्रकृति की बर्बादी ईश्वर की रचना का अपमान है। यह बात पर्यावरण को बर्बाद करने के संदर्भ में भी मानी जाती है, और जंग या दूसरी मानव निर्मित आपदाओं से होने वाली प्रकृति की बर्बादी के संदर्भ में भी। अमरीकी राजनीति में एक तबका चर्च के ऐसे बयानों को राजनीति कहकर खारिज करता है, जबकि पोप ने इस मुद्दे को उठाना, चर्च का धार्मिक कर्तव्य माना है। ट्रम्प सरकार की असाधारण और अभूतपूर्व सख्त प्रवासियों पर कार्रवाई का विरोध करते हुए पोप ने कहा है कि प्रवासियों को रोकना ईसाई मूल्यों के खिलाफ है, क्योंकि ईश्वर हर इंसान में बसता है। पोप ने अमरीकी सरकार की नीतियों को मानवीय गरिमा का हनन भी बताया था। वर्तमान पोप लियो ने अमरीकी सरकार के जंग को लेकर धर्म के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति की है। दरअसल अमरीकी रक्षा (जंग) मंत्री पीट हेगसेथ ने ईरान में फंसे एक अमरीकी पायलट के बचाव की तुलना ईसा मसीह के पुनर्जन्म से की थी, और कहा था कि यह पायलट ईस्टर के दिन फिर से जीवित हुआ है, और ईश्वर की कृपा अमरीका पर है। इस मंत्री ने इस जंग को सीधे यीशु मसीह के नाम पर लड़ा जाने वाला युद्ध बताया था, और कहा था कि अमरीकी सैनिकों को असीमित हिंसा की ताकत ईश्वर से मिले, जिसमें दुश्मनों के लिए दया की कोई जगह न हो। इसके बाद ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर धमकी दी थी कि आज रात एक पूरी सभ्यता (ईरान) खत्म हो जाएगी, साथ-साथ ट्रम्प ने यह इशारा भी किया था कि यह विनाश ईश्वरीय न्याय का एक हिस्सा है क्योंकि वे अमरीका को ईश्वर समर्थित देश मानते हैं।

अमरीका के शिकागो में जन्मे पोप लियो ने अपनी अमरीकी जड़ों के बावजूद वेटिकन से ही अमरीकी सरकार के खिलाफ एक मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर जंग को आशीर्वाद नहीं देता, जो कोई भी ईसा मसीह के शिष्य हैं, वे कभी भी बम गिराने वालों के साथ खड़े नहीं हो सकते। ईसाई धर्म के एक प्रमुख समारोह, पाम संडे के संदेश में पोप ने एक धार्मिक आयत का हवाला देते हुए अमरीकी नेताओं से कहा- भले ही तुम कितनी भी प्रार्थनाएं करो, ईश्वर नहीं सुनेगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से सने हैं। पोप ने युद्ध के लिए ईश्वर के नाम का इस्तेमाल करने को ईशनिंदा करार दिया, और कहा कि ईश्वर को अंधेरे (जंग) के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, वह केवल रौशनी और शांति का प्रतीक है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775903902dit_photo_pope_trump_11_APRIL.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321447&amp;path_article=18</guid><pubDate>11-Apr-2026 4:08 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अपार संभावनाओं वाला नर्सिंग कोर्स, और सरकारी अनदेखी से संभावनाएं खत्म</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321358&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321358&path_article=18]]></link><description>हर कुछ हफ्तों में छत्तीसगढ़ के निजी नर्सिंग कॉलेजों के बारे में खबरें छपती हैं कि किस तरह वहां न साधन है, न सुविधा, और इसके बाद भी उनकी मान्यता जारी रहती है। फीस सरकार तय करती है, और यहां आने वाले छात्र-छात्राओं में 90 फीसदी के करीब छात्राएं रहती हैं, और तमाम लोगों में 90 फीसदी गरीब परिवारों से आते हैं। फीस और रहने-खाने का साल भर का करीब लाख रूपए का खर्च होता है, कई साल का कोर्स है, और कॉलेजों का ढांचा इतना कमजोर है कि मरीजों की देखरेख का पर्याप्त मौका पाए बिना यहां से नर्सें निकलती हैं, और अस्पताल उन्हें मामूली से भी कम तनख्वाह पर रखते हैं। गरीब परिवारों का खर्च भरपूर हो जाता है, लेकिन यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों का भविष्य बिल्कुल सीमित रहता है। अखबारों में बार-बार छपने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह नियमों को अनदेखा करके नर्सिंग कॉलेज चलते हैं, और दर्जनों कॉलेजों की किसी अस्पताल से संबद्धता नहीं है, फिर भी उन्हें मान्यता मिली रहती है।

सरकार की यह उदासीनता हमें कुछ अधिक हद तक हैरान इसलिए करती है कि इस कोर्स में आने वाली तमाम छात्राएं गैरसवर्ण तबकों की रहती हैं, आदिवासी, अनुसूचित जाति, और अधिक से अधिक ओबीसी समुदाय की लड़कियां नर्स बनने आती हैं, आदिवासी इलाकों में नर्सिंग कॉलेज भी इसीलिए अधिक रहते हैं, लेकिन नर्सिंग-शिक्षा का स्तर चौपट है। अब नर्स बनकर निकलने तक अगर किसी अस्पताल में मरीजों के इलाज का असल काम कुछ बरस तक करने नहीं मिला, तो यह कोर्स क्लासरूम की पढ़ाई का तो है नहीं। और हालत यह है कि भारतीय नर्सों की दुनिया के बहुत से पश्चिमी, विकसित, और संपन्न देशों में अच्छी-खासी मांग है। भारत के भीतर भी बड़े-बड़े महंगे अस्पताल लगातार बढ़ रहे हैं, और वहां भी अच्छे नर्सिंग कॉलेजों से पढक़र निकली हुई नर्सों को तो जगह मिल जाती है, लेकिन वहां का मैनेजमेंट भी यह देख लेता है कि किस प्रदेश, या किन कॉलेजों में नर्सिंग-शिक्षा का स्तर खराब है, और वहां के लोगों को अच्छी जगहों पर जगह नहीं मिलती।

एक ऐसी पढ़ाई जिसमें सौ फीसदी रोजगार की गारंटी होनी चाहिए, जिसके लिए देश के बाहर भी अंधाधुंध संभावनाएं हैं, उसे स्तरहीन शैक्षणिक ढांचे, स्तरहीन पढ़ाई, और इलाज के साथ के पर्याप्त अनुभव की कमी से बहुत ही औसत दर्जे का बनाकर रख दिया गया है। यह सिलसिला देश में एक नौजवान पीढ़ी को उसकी बेहतर संभावनाओं से दूर रखता है। आज हालत यह है कि अस्पतालों से परे भी संपन्न या मजबूर-मध्यमवर्गीय परिवारों में घर पर मरीजों या बुजुर्गों की देखभाल का रोजगार बढ़ते चल रहा है। डॉक्टर की निगरानी में इलाज चलता है, और नर्सों की मदद से घर पर बुजुर्ग या बीमार की जिंदगी चलती है। रोजगार का यह दायरा लगातार बढ़ते चल रहा है क्योंकि न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है, तरह-तरह के इलाज बढऩे से लोगों की देखभाल की संभावना भी बढ़ रही है। ऐसे में दुनिया के जिन देशों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ते जा रहा है, वहां के बारे में हमने पहले भी यह बात लिखी थी कि होम केयर के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों को दुनिया के कई देशों में काम मिल सकता है, और जिन देशों में भारतीय होम केयर कामगारों की मांग है, वहां की भाषा, और संस्कृति को भी सिखाने-पढ़ाने का काम भारत में करना चाहिए। देश के भीतर सरकारी नौकरियां कम होती चल रही हैं, लेकिन बाकी दुनिया में भारत के कामगारों के लिए नौकरी-रोजगार की संभावनाएं इसके मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। अगर भारत इन संभावनाओं को अनदेखा करेगा, तो दुनिया के बहुत से और देश हैं जहां से होम केयर के शिक्षित-प्रशिक्षित कामगार आज भी हर संपन्न देश जाकर काम कर रहे हैं।


</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775823814dit_nurse_10_APR_26.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321358&amp;path_article=18</guid><pubDate>10-Apr-2026 5:53 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : जिंदगीभर अस्थायी बनाए रखना संवैधानिक सरकार को नहीं सुहाता, हाईकोर्ट की नसीहत...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321250&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321250&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कल राज्य के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को खासा सुनाया है। इन्हें नियमित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सरकार को चार महीने के भीतर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने को कहा है। ये मामला वन विभाग के डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का है जो कि 2006 से 2016 तक लगातार कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक, और सुरक्षाकर्मी जैसे पदों पर नियुक्त हुए थे। लेकिन 10 साल से काम करने के बाद भी राज्य सरकार ने उन्हें नियमित नहीं किया। ये कर्मचारी अदालत तक जाकर यह तर्क भी दे रहे हैं कि अब वे यह काम करते-करते किसी भी दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। हाईकोर्ट में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि आर्थिक तंगी की वजह से सरकार सबको नियमित कर्मचारी नहीं बना सकती। इस पर अदालत ने कहा कि अगर किसी काम का स्वरूप स्थायी और बारहमासी है, तो कर्मचारियों को अस्थायी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह गरीब कर्मचारियों की हक की कीमत पर अपने बजट का संतुलन नहीं साध सकती। जज ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो कर्मचारी बरसों से बुनियादी और जरूरी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक अस्थायी बनाए रखना उनके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फैसलों की भावना के अनुरूप ही सरकार कर्मचारियों के मामलों पर विचार करे। जज ने कहा कि नियमित नियुक्तियों से बचने के लिए सरकार अस्थायी व्यवस्था और आउटसोर्सिंग का सहारा लेती है।

यह मामला बड़ा व्यापक और बड़ा दिलचस्प है। सरकार के अलग-अलग दर्जनों विभागों और हजारों दफ्तरों में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं। इन्हें कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मजदूरी की तरह मेहनताना दिया जाता है, जो कि एक व्यक्ति के जिंदा रहने के लिए ही काफी रहता है। ऐसे में यही कर्मचारी अगर 10-10 बरस तक सरकार में वही काम कर रहे हैं, तो उन्हें दैनिक वेतनभोगी बनाकर रखना सचमुच ही नाजायज बात लगती है। लोगों को याद होगा कि शिक्षकों की कमी में सरकार शिक्षाकर्मी नियुक्त करती थी जो कि काम वही का वही करते थे, पूरी तरह से शिक्षकों जैसा ही पढ़ाते थे, लेकिन सरकार उन्हें शिक्षकों के वेतन के मुकाबले बहुत थोड़ा सा भुगतान करती थी। उनका भी मामला बरसों तक चला था, और नियमित करने के लिए वे आंदोलन करते ही रहते थे। पुलिस की कमी में एक वक्त नगर सैनिक या होमगार्ड बनाए जाते थे, लेकिन उन्हें पुलिस बनने का मौका नहीं मिलता था। सरकार के बहुत सारे अमले की कमी को इसी तरह कामचलाऊ इंतजाम से पूरा किया जाता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर जहां फौज में सैनिकों की कमी है, वहां पर क्या अग्निवीर नाम के चार सालाना लोग तैनात किए जा रहे हैं, और चार बरस के बाद कानूनी रूप से तो वे सडक़ों पर रहेंगे, यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार की बहुत महत्वाकांक्षी योजना होने के कारण उन्हें राज्य सरकारें कहीं न कहीं एडजस्ट करने की बात कर रही हैं। लेकिन जिस तरह का मुद्दा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का आया है, क्या अग्निवीरों का मुद्दा ठीक उसी तरह का नहीं है? कि वे चार बरस तक फौज में काम करने के बाद किसी कारखाने के गेट को खोलने-बंद करने की चौकीदारी में लगेंगे? केंद्र सरकार भी तो अग्निवीरों की उसी तरह संवैधानिक नियोक्ता है जैसी नियोक्ता छत्तीसगढ़ सरकार दस बरस से वन विभाग में काम कर रहे इन दैनिक वेतनभोगियों की है।

दरअसल जनता की जरूरतें और सरकार का बजट, इन दोनों के बीच में कोई तालमेल हो नहीं पाता है। फिर इसके बाद अलग-अलग राज्यों में पांच साल में दो-तीन अलग-अलग चुनाव हो जाते हैं, जिनकी वजह से सत्तारूढ़ पार्टी की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, और वोटरों को तात्कालिक संतुष्ट करने का एक दबाव बना रहता है। सत्तारूढ़ पार्टी तो यह दबाव झेलती ही है, अधिकतर चुनावों में प्रमुख विपक्षी दल भी किसी भी तरह सत्ता पर आने की कोशिश में अपने चुनाव घोषणा पत्र में कई तरह के वायदे करते हैं, और सरकार में आने पर उन्हें निभाने में बजट का खासा हिस्सा चले जाता है।

ऐसा माना जा रहा है कि वोटरों को सीधे फायदा देने की कई योजनाओं के चलते देश के कई राज्य विकास के, और रोजाना के रखरखाव के बहुत से काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। दीर्घकालीन ढांचा-विकास की योजनाओं के बारे में सोचना कम होने लगा है, क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनावों में वोटरों का समर्थन राज्य, केंद्र, और म्युनिसिपल-पंचायत में कायम रखने के लिए, ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने के लिए दबाव झेलती है, और कर्मचारियों को नियमित करना वोटरों को लुभाने में उतना कारगर नहीं होता है, जितना कि सीधे फायदा पहुंचाने वाली कई योजनाएं होती हैं।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775734164DIT_PHOTO_09_APR_26_agniveer_2.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321250&amp;path_article=18</guid><pubDate>09-Apr-2026 4:58 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अमरीका-ईरान युद्धविराम के बीच भारत-पाकिस्तान</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321169&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321169&path_article=18]]></link><description>बीती बहुत देर रात तक हिन्दुस्तानी अखबारों ने राह देखी होगी कि आखिरी संस्करण छपने जाने के पहले अगर ईरान पर हमला शुरू हो जाए, तो उस खबर को ले लिया जाए। वह तो हो नहीं पाया, क्योंकि दुनिया के इतिहास की सबसे खतरनाक धमकी के बाद डॉनल्ड ट्रम्प ईरान के साथ एक पखवाड़े के युद्धविराम की घोषणा करते दिखे। हमले का वक्त भारत के समय के मुताबिक सुबह साढ़े 5 बजे बताया गया था, और इसके ठीक 10 मिनट पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐलान किया कि युद्धविराम हो गया है, और तुरंत लागू हो गया है। एक लाईन में कहा जाए तो दो बुनियादी शर्तों पर यह सहमति बनी है कि ईरान पर हमले रोक दिए जाएं, और ईरान जलडमरूमध्य को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दे। दोनों देशों ने इस पर सहमति जाहिर की है, और दो दिन बाद 10 अप्रैल से पाकिस्तान में दोनों पक्षों के बीच शांति और समझौता वार्ता शुरू होगी। ट्रम्प ने जिस जुबान में ईरान से सभ्यता को हमेशा के लिए खत्म कर देने का ऐलान किया था, वह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी फौजी धमकी थी, और अमरीकी मूल के पोप लियो ने इस धमकी पर कहा था कि ईरान के सभी लोगों के खिलाफ ऐसी धमकी और ऐसा खतरा मंजूर नहीं किया जा सकता। वे अमरीका में जनमे हुए पहले पोप हैं, और जंग के बीच उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति के इस बयान की आलोचना के पहले भी अमरीकी युद्ध-मंत्री के फतवों की आलोचना की थी जिसमें उसने इस जंग को ईश्वर की मर्जी करार दिया था।

खैर, आज सुबह का हिन्दुस्तानी सूरज का वक्त पूरी दुनिया के लिए एक नई तस्वीर लेकर आया है। महीने भर से अधिक से ईरान पर इजराइल, और उसके पिट्ठू बने हुए अमरीका के फौजी हमले चल रहे थे। इस एक महीने ने यह भी साबित किया कि अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प किस तरह एक मानसिक रोगी है, अस्थिर दिमाग का है, फैसले लेने में सक्षम नहीं है, तुरंत ही दफ्तर से बाहर कर देने के लायक है, यह एक अलग बात है कि अमरीकी संविधान में बिना दिमाग के तानाशाह राष्ट्रपति को भी हटाने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसलिए खुद अमरीकियों ने इस युद्धविराम से राहत की सांस ली है क्योंकि बेदिमाग ट्रम्प ने पूरी दुनिया को जिस तरह के ऊर्जा संकट में डाला है, अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, उसकी वजह से खुद अमरीकी अपने-आपको कोस रहे हैं कि उन्होंने यह कैसा पिशाच चुन लिया था। खैर, अगर ट्रम्प आज जिस तरह पूरी दुनिया को तबाह कर रहा है, उस तरह अगर वह सिर्फ अमरीका को तबाह करता, तो हमें कोई शिकायत नहीं रहती। दिक्कत यह है कि वह चुना तो गया है अमरीका के लिए, लेकिन तबाह उसने पूरी दुनिया को कर दिया है। लेकिन इस एक महीने ने अमरीका को यह आईना भी दिखा दिया है कि उसकी निहायत नाजायज जंग से किस तरह योरप के एक-एक देश ने अपने-आपको अलग कर लिया, और नाटो को खत्म कर देने की धमकी देने के बावजूद कोई देश ट्रम्प के साथ नहीं आया। ऐसी अंतरराष्ट्रीय तबाही के दबावतले भी ट्रम्प तानाशाही दिखा रहा था, और यह उसकी असामान्य और बीमार मानसिक हालत का एक सुबूत था।

बाकी दुनिया के साथ-साथ यह भारत के लिए भी एक राहत की बात हो सकती है कि देश में इस वक्त चल रही गैस की किल्लत शायद कुछ दिनों में खत्म या कम हो जाए, इसके साथ-साथ खाड़ी के देशों में भारत से होने वाले निर्यात का रास्ता भी कुछ खुल सकता है, हो सकता है इससे छत्तीसगढ़ के तरबूज एक बार फिर खाड़ी के देशों में जा सकें, और नदी की जलती रेत पर तरबूज की फसल लेने वाले लोगों की बर्बादी टल सके, भारत के दसियों हजार कारखाने फिर शुरू हो सकें, और करोड़ों मजदूर तात्कालिक बेरोजगारी से बच सकें। लेकिन भारत को अपने बारे में कुछ सोचना होगा। जब ईरान की जंग को लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने विपक्षी पार्टियों से बात की, और विपक्ष ने पूछा कि भारत इस जंग में चुप क्यों है, जबकि पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, तो इस पर विदेश मंत्री जयशंकर का जवाब था- भारत कोई दलाल देश नहीं है, भारत की अपनी अलग गरिमा और नीति है। यह बयान सैकड़ों अखबारों में गूंजा, जगह-जगह इसके बारे में लिखा गया, लेकिन भारत सरकार ने इस शब्द का खंडन नहीं किया, बल्कि यह कहा कि भारत वैश्विक मंच पर बिचौलिए की भूमिका निभाने के बजाय सीधे संवाद और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। कई विपक्षी दलों ने जयशंकर की भाषा को अमर्यादित बताया, लेकिन जयशंकर इस पर अड़े रहे। अभी चार-पांच अप्रैल को ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक्स पर लिखकर पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों की सराहना की, कहा कि वे इसके लिए दिल से अहसानमंद हैं, और उन्होंने संदेश के अंत में पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा। ईरान को लग रहा था कि तमाम मुस्लिम देशों के बीच अकेला पाकिस्तान ही ऐसा है जो उसके बारे में अमरीका से बात कर रहा है। इधर भारत में जयशंकर के कहे हुए दलाल और दलाली जैसे शब्दों को लेकर पाकिस्तान की बात तो छोड़ें, खुद भारत में लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। जब दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर रही दो देशों के बीच की जंग इस हद तक बेकाबू हो चली हो, तो उसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाना दलाली नहीं होती, वह एक लीडरशिप होती है। यह भारत की जाने कौन सी विदेश नीति है जो मध्यस्थता के बारे में सोच भी नहीं रही, शायद सोच भी नहीं सकती, और एक मध्यस्थ को गाली दे रही है!
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775659055dit_photo_flags.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321169&amp;path_article=18</guid><pubDate>08-Apr-2026 8:06 PM</pubDate></item><item><title>‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : देश-प्रदेश को प्यासा मरने से बचाना हो, तो वक्त रहते जागना जरूरी है, वरना...</title><link>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321076&amp;path_article=18</link><link><![CDATA[https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321076&path_article=18]]></link><description>छत्तीसगढ़ के अखबारों में पिछले कुछ दिनों से गर्मी बढऩे के साथ-साथ जमीन के भीतर पानी नीचे जाने की खबरें आ रही हैं। ऐसा हर गर्मी में होता है, और कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों में कलेक्टरों के आदेश निकल जाएंगे कि जिला प्रशासन की इजाजत के बिना गर्मी में नए ट्यूबवेल नहीं खोदे जा सकेंगे। लेकिन गर्मी निकलते ही ट्यूबवेल खोदना फिर शुरू हो जाएगा, और उनसे पानी निकालना तो बाकी की पूरी जिंदगी चलता ही रहेगा। केन्द्र सरकार के भूजल के सर्वे के आंकड़ों को देखें, तो छत्तीसगढ़ के कई जिलों, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, मुंगेली, बालोद, जैसे जिलों के सभी विकासखंडों में लगातार भूजल नीचे जा रहा है। बस्तर संभाग को छोडक़र बाकी चार संभागों में हालत तेजी से बिगड़ रही है। और यह तब है जब 2023-24 में छत्तीसगढ़ में औसत से बेहतर बारिश हुई थी। अखबारी खबरों से किसी की नींद खुलते दिख नहीं रही है, और जब छत्तीसगढ़ की हालत चेन्नई शहर, या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों जैसी हो जाएगी, तब नौबत संभालने का वक्त निकल चुका रहेगा। आज समय रहते अगर राज्य सरकार जागकर कड़ी कार्रवाई करे, कमर कसकर यह तय करे कि जब तक भूजल स्तर बढऩे नहीं लगे, तब तक जो-जो जरूरी रहेगा, वह किया जाएगा, तो ही बात बन सकती है।

हम जमीन के नीचे पानी तेजी से नीचे चले जाने की वजहों को देखते हैं, तो समझ आता है कि प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना पानी बारिश के वक्त जमीन के भीतर जा नहीं पाता है। इसकी कई बहुत जाहिर वजहें हैं। एक तो यह कि धान की फसल राजस्थानी ऊंट सरीखी प्यासी रहती है, और मुफ्त की बिजली, या रियायती बिजली की मेहरबानी से, और फसल का तकरीबन एक-एक दाना महंगे दामों पर सरकार द्वारा खरीद लेने से लोग धान के अपने खेत को तालाब की तरह लबालब भर लेते हैं। जितना पानी जरूरी नहीं रहता, उतना भी जमीन के नीचे से उलीचकर खेतों में डाल दिया जाता है, जिसका बहुत सा हिस्सा भाप बनकर उड़ भी जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में पानी की खपत का 84 फीसदी हिस्सा खेतों में जाता है, 12 फीसदी हिस्सा शहरी घरों में, और 4 फीसदी हिस्सा कारखानों में। ऐसे में सरकार को इनमें से हर मोर्चे पर कड़े फैसले लेने पड़ेंगे, वरना किसी भी मौजूदा सरकार के पांच साल तो निकल जाएंगे, लेकिन जमीन के पेट से निकाला गया पानी वापिस नहीं जा पाएगा।

हम आंकड़ों के जाल में इस बुनियादी बात को उलझाना नहीं चाहते। इसलिए साफ-साफ आसान शब्दों में खतरे, और उससे जूझने की संभावनाओं पर लिख रहे हैं। खेतों में बेहिसाब पानी को रोकना आसान नहीं है, और सरकार चाहे गर्मी की फसल के लिए नहरों से पानी न दे, लोगों के पंप तो चलते ही हैं। सरकार को यह इंतजाम करना होगा कि गर्मी के महीनों में जब धान की फसल और अधिक पानी मांगती है, तब तो बाकी आबादी को भी पानी की अधिक जरूरत रहती है, और गर्मी की धान की फसल को हर हाल में रोकना चाहिए, सरकार को न उसकी खरीदी करनी चाहिए, न उसकी इजाजत देनी चाहिए। अब इस बारे में किसानों का कहना कुछ और हो सकता है, लेकिन हमारी सामान्य समझ हमें पानी बचाने के लिए यह रास्ता बता रही है। दूसरी बात यह कि फसल के बाकी मौसम में भी धान की फसल के विकल्प की तरफ सरकार को बढऩा होगा, किसानों को बढ़ाना होगा, वरना एक दिन धान के लायक पानी नहीं बचेगा, धान की फसल नहीं बचेगी, और किसानों के पास मंडी में बेचने को कुछ रहेगा नहीं। ऐसा हाल हो सकता है कि दस-बीस बरस न हो, लेकिन जब हम पूरे राज्य की बात कर रहे हैं, तो हमें अगले सौ-पचास बरस की तैयारी करनी चाहिए। पांच-पांच बरस में बंटी हुई सरकारें अपने कार्यकाल से आगे का देखना नहीं चाहतीं, लेकिन उतने से काम चलेगा नहीं।

आज की ही एक खबर बताती है कि पांच साल में रायपुर का भूजल स्तर 45 फीसदी गिर गया है। और यह 60 से 120 फीट तक नीचे चले गया है। कई इलाकों में तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे जा चुका है। लोगों को अधिक गहराई से पानी खींचने वाले पंपों पर अधिक भरोसा है, इसलिए पानी की खपत की तरफ से, और धरती का पेट खाली हो जाने की तरफ से वे बेफिक्र हैं। सीधे शब्दों में कहें तो लोगों के तमाम निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाने की जरूरत है क्योंकि अपने जमीन पर खुदवाए हुए ट्यूबवेल भी पानी तो जमीन के नीचे से सामूहिक जल भंडारों से ही खींचते हैं। किसी का भी नलकूप सिर्फ उन्हीं की जमीन के नीचे से तो पानी नहीं खींचता। आज हालत यह है कि पैसे वाले लोग अपनी गाडिय़ों को ड्राइवरों से इतनी देर तक धारदार पानी से धुलवाते हैं कि मानो वह धान का खेत हो, और वहां पानी लबालब भरना हो। राजधानी के भीतर ही सडक़ किनारे प्रेशर पंप से गाडिय़ों को धोने के कारोबार चल रहे हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। दरअसल पानी को सार्वजनिक और सामूहिक संपत्ति मानने की सोच जब तक विकसित नहीं होगी, और उसके लिए कानून नहीं बनेगा, पैसेवालों की नजर में सार्वजनिक सम्पत्ति अपने घर के सामने सडक़ धोने लायक बनी रहेगी। जिसके पास बोर है, पंप है, और बिजली बिल देने के लिए इफरात पैसा है, वे धरती को खाली कर दें, यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का इंतजाम है। दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों में भी गाडिय़ों के धोने पर तरह-तरह की रोक रहती है। ट्यूबवेल पर मीटरिंग से बर्बादी में कमी आएगी, और लोगों में जागरूकता भी आएगी। वरना कुछ बरस बाद जाकर जब छत्तीसगढ़, या कोई दूसरा प्रदेश, जब प्यास से मरने लगेगा, उस दिन एकाएक जागरूकता नहीं आएगी। आज ट्यूबवेल से निकला हुआ एकदम साफ पानी जिस तरह बर्बाद किया जा रहा है, उसमें बड़े-बड़े बंगलों में घास के मैदान, लॉन सींचना भी शामिल है। इससे पर्यावरण को कुछ हासिल नहीं होता, और संपन्न या सत्तारूढ़ तबके की आंखों को हरा-हरा सुख देने के लिए घास लगाई जाती है।
</description><enclosure url="https://www.dailychhattisgarh.com/uploads/article/1775568710dit_photo_7_APRIL_26.jpg" length="" type="image/jpeg"/><guid>https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=321076&amp;path_article=18</guid><pubDate>07-Apr-2026 7:01 PM</pubDate></item></channel></rss>