रायपुर

बबिता ने पढ़ाई को ढाल और दिव्यांगता को ताकत बना जीती जीवन की जंग
03-Dec-2020 4:23 PM 59
बबिता ने पढ़ाई को ढाल और दिव्यांगता  को ताकत बना जीती जीवन की जंग

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 दिसंबर।
दिव्यांगता के बावजूद फौलादी हौसलों से स्वावलंबन की राह तलाशने वाली बबिता कन्नौजे मानती हैं कि संघर्ष हर किसी के जीवन का हिस्सा है इस नाते से दिव्यांगों  को  अपनी दिव्यांगता को कमजोरी नहीं बल्कि ताकत समझना चाहिए। 

 वर्तमान में संचालनालय कोष लेखा एवं पेंशन में सेवारत बबिता  के माता पिता मजदूरी कर जीवन यापन करते थे। डेढ़  साल की छोटी सी उम्र में दोनों पैरों के पोलियो ग्रस्त होने के  साथ साथ बबिता का जीवन की चुनौतियों से सामना हुआ। इस दौरान पिता के प्रोत्साहन ने उन्हें जीवन का हौसला दिया। 

समता कोलोनी स्थित विकलांग बालिका विकास गृह में उन्होंने पहली से आठवीं तक की तथा दानी स्कूल से 12 वीं तक की पढ़ाई की। बबिता कहती हैं पिता का मानना था कि पढ़ाई ही उसके जीवन के लिए  ढाल साबित होगा इसलिए आर्थिक दिक्कतों को उन्होंने मेरी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया। उनके सहयोग और प्रोत्साहन के कारण मैंने पॉलिटेक्निक कॉलेज से ऑफिस मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया। इसके साथ साथ प्राइवेटली एम कॉम किया । वर्ष 2011 में क्लर्क पद के लिए बतौर जनरल उम्मीदवार परीक्षा दी और इसमें सफलता हासिल की।  

बबिता ने बताया कि दोनों पैरों  से पोलियोग्रस्त होने के कारण वह चल फिर नहीं सकती थीं लेकिन उनके पिता ने कभी उनकी दिव्यांगता को उनके विकास के आड़े नहीं आने दिया। वह उसे साइकिल में बैठाकर स्कूल ले जाया करते थे। राजीव गांधी फांउडेशन से उन्हें सहयोग बतौर जब तीन पहिया  साइकिल मिली तब वह स्वतंत्र रुप से काम करने लगीं। वर्तमान में वह अपनी बेटी और पति के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही हैं। 

उन्होंने बताया कि विकलांग परिचय सम्मेलन के जरिए उनकी शादी हुई। उनके दिव्यांग पति अमित वर्मा शिक्षक हैं लेकिन उनके खुशहाल जीवन में दिव्यांगता कहीं बाधक नहीं है। बबिता कहती हैं दिव्यांगता के बावजूद हमने इसलिए शादी की ताकि हम एक दूसरे को समझ सकें। दिव्यांगता के बावजूद पढ़ाई को ढाल बनाने का मेरे पिता का दिया गया मूलमंत्र मेरे जीवन का संबल बना।  मैं चाहती हूं कि हर दिव्यांग अपनी दिव्यांगता को कमजोरी नहीं अपनी ताकत बनाए।

अन्य पोस्ट

Comments