संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 06 फरवरी : ...तो फिर वह महज ऐसे  ही लोकतंत्र की हकदार है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 06 फरवरी : ...तो फिर वह महज ऐसे ही लोकतंत्र की हकदार है
Date : 06-Feb-2020

...तो फिर वह महज ऐसे 
ही लोकतंत्र की हकदार है

हिन्दुस्तान इन दिनों कई किस्म के भाषणों से गुजर रहा है। संसद का शायद ही कोई ऐसा सत्र होता हो जिसमें लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी पूरी तरह से अवांछित और नाजायज बात न बोलते हों। कई बार तो पार्टी ने उनके बयान से अपने को अलग किया, कई बार उन्हें खुद अफसोस जताना पड़ा, लेकिन फिर भी वे अगले संसद सत्र का इंतजार करते हैं, और इसी दर्जे की कोई बात बोलने का भी। नतीजा यह होता है कि विपक्ष को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने के जितने मजबूत मुद्दे रहते हैं, वे अधीर रंजन चौधरी के पाकिस्तान, या मुस्लिम, या कश्मीर के बारे में कही गई बातों, या उनके विशेषणों और उनकी पौराणिक उपमाओंतले कुचलकर दम तोड़ देते हैं। यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। यह एक किस्म का भाषण हुआ। दूसरी तरफ संसद के बाहर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से लेकर केरल के भाजपा सांसद अनंत हेगड़े तक गांधी की स्मृति पर थूकने सरीखे बयान देने वाले बहुत सारे लोग हैं। इसके बाद नागरिकता को लेकर चल रहे आंदोलन पर लोगों को गद्दार कहने वाले, पाकिस्तानी कहने वाले नेताओं की भरमार है, और वे इतनी बड़ी तादाद में हिन्दुस्तानियों को पाकिस्तान भेजना चाहते हैं कि दिल्ली का पाकिस्तानी दूतावास उतनी वीजा अर्जियों पर फैसले भी नहीं ले पाएगा। फिर कुछ लोग गद्दारों को गोली मारना चाहते हैं, कुछ लोग शाहीन बाग की महिला आंदोलनकारियों को आत्मघाती-दस्ता बता रहे हैं। लेकिन ऐसी तमाम बयानबाजी के बीच हर कुछ हफ्तों में कांग्रेस के घोषित-अघोषित मुखिया राहुल गांधी भी कोई न कोई ऐसी बात कह बैठते हैं जिससे देश में असल मुद्दों पर बहस धरी रह जाती है, और लोग संसद के भीतर-बाहर इस पर उलझ पड़ते हैं कि क्या लोग सचमुच ही राहुल के कहे मुताबिक मोदी को लाठियां मारेंगे? 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आज यह समझना मुश्किल हो रहा है कि लोग अनर्गल कही जाने वाली बातें कर क्यों रहे हैं? महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने चाहे-अनचाहे एक साथ बैठने वाले कांग्रेस, एनसीपी, और शिवसेना के नेता बिना किसी वजह के कभी सावरकर का मुद्दा छेड़कर एक-दूसरे का जीना हराम करने लगते हैं, तो कभी इंदिरा गांधी के तस्करों से मेलजोल को बहस का मुद्दा बना रहे हैं। यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि भाजपा के इस सबसे पुराने एक सहयोगी दल शिवसेना को उससे अलग करके जब उसकी अगुवाई में यह सरकार बनानी ही थी, तो इसके बनते ही इस तरह की बातें क्यों छेडऩी चाहिए जिससे कि विवाद खड़ा होना तय हो। यह काम महाराष्ट्र में भाजपा करती तब तो ठीक था क्योंकि विपक्ष में बैठे हुए उसके पास सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार खड़ी करने की जिम्मेदारी है, और इसकी संभावना भी है। लेकिन गठबंधन की तीनों पार्टियां एक-दूसरे के साथ बंद कमरे में बात करना सीख नहीं पा रही हैं, और कहीं दिल्ली से किसी बखेड़े का बयान शुरू होता है, तो कहीं मुम्बई से। 

मीडिया का तकरीबन पूरा हिस्सा गैरजरूरी मुद्दों में उलझकर रह गया है, और सबसे अधिक हिंसक, सबसे अधिक अलोकतांत्रिक, और सबसे अधिक अश्लील बातों को सबसे अधिक जगह भी मिल रही है। कोई हैरानी नहीं है कि लोगों ने टीवी पर खबरें देखना कम कर दिया है जो कि मोटेतौर पर इसी किस्म के बयानों पर जिंदा समाचार-माध्यम है। अब जब लोगों को कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान मिलता है कि देशभक्ति का नशा मोदी जितना भी नहीं होना चाहिए कि वे इस चक्कर में शादी ही न करें, तो बिना बात के बहुत सारे बयान वायरस की तरह पैदा होने लगते हैं, और आगे बढऩे लगते हैं। यह सिलसिला थका देने वाला है। मीडिया का गैरजिम्मेदार हिस्सा इसी पर जिंदा है, और इसी से अपना पेट भर रहा है। जिन नेताओं को कहने के लिए कोई गंभीर बात नहीं होती, जिनके पास कोई तर्क नहीं होता, वे इसी किस्म की बातों से खबरों में बने हुए हैं, और बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि सत्ता के सामने जब बहुत से असुविधाजनक सवाल खड़े हो जाते हैं, तो वह सोच-समझकर ऐसे बखेड़े खड़े करवा देती है जिनमें दो-तीन दिन देश उलझकर रह जाता है, और असुविधा टल जाती है। अब देश की जनता अगर ऐसी बकवास को ही खबर मानकर चलती रहेगी, तो फिर वह महज ऐसे ही लोकतंत्र की हकदार है। 
-सुनील कुमार

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