विशेष रिपोर्ट

 सारकेगुडा फर्जी मुठभेड़ में मरने वालों में खेलने वाले बच्चे भी थे
सारकेगुडा फर्जी मुठभेड़ में मरने वालों में खेलने वाले बच्चे भी थे
Date : 03-Dec-2019

सलमान रावी
नई दिल्ली, 3 दिसंबर । छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुडा में जून 2012 में सुरक्षाबलों के कथित नक्सल एनकाउंटर में 17 लोगों की मौत हुई थी जिनमें नाबालिग भी शामिल थे। इस मामले की जांच के लिए बनी जस्टिस वीके अग्रवाल कमिटी ने राज्य सरकार को बीते महीने रिपोर्ट सौंप दी।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि है कि मारे गए सभी लोग स्थानीय आदिवासी थे और उनकी ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई थी और न ही उनके नक्सली होने के सुबूत हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों को बहुत करीब से दहशत में गोली मारी गई जबकि सुरक्षाबल के जवान आपस की क्रॉस फायरिंग में घायल हुए। इस घटना के तुरंत बाद 2012 में बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने सारकेगुडा का दौरा किया था।
छत्तीसगढ़ के बीजापुर के सुदूर जंगली इलाके में स्थित सारकेगुडा के पुलिस कैम्प से लगी हुई नदी पर एक पुल है। ये पुल एक अघोषित सीमा है। पुल से पहले एक पुलिस थाना और अर्धसैनिक बलों का एक कैम्प है। कहा जाता रहा कि भारत सरकार का अधिकार क्षेत्र उस पुल की सीमा पर खत्म हो जाता है और पुल के उस पार माओवादियों की सामानांतर सरकार यानी जनताना सरकार का इलाका है। कोई पुलिसवाला इस पुल को अकेले पार करने का जोखिम नहीं उठा सकता था। बाहर से आए लोगों के लिए वहाँ जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
साल 2012 के 28 जून की आधी रात को खबर मिली कि सारकेगुडा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हुई है जिसमे कई माओवादी मारे गए हैं। छह पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी कही जा रही थी जिन्हें इलाज के लिए निकट के बड़े शहर भेज दिया गया था। आश्चर्य वाली बात थी कि मारे जाने वाले लोगों में 8 नाबालिग बच्चे भी थे।
ये इलाका सारकेगुडा थाने और पुलिस कैम्प लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर था और इस इलाके तक पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर का सफर करना होता था।
मैं रात में ही घटनास्थल के लिए निकल गया। तब तक मेरे फोन की घंटियाँ बजने लगीं। स्थानीय लोगों ने मुझे बताना शुरू किया कि ये मुठभेड़ माओवादियों के साथ हुआ ही नहीं है। वहां आसपास के ग्रामीण इलाके ही हैं। चूँकि आधिकारिक रूप से कुछ भी पता नहीं चल पाया इसलिए मैं घटनास्थल के लिए चलता चला गया। लगभग दोपहर के 12 बज रहे थे जब मैं सारकेगुडा थाने के पास पहुंचा। लेकिन वहां तक घने जंगलों से गुजरते हुए कच्चे रास्ते को तय करना बहुत मुश्किल काम था। रास्ते में सुरक्षाबलों और पुलिस के कई चेक पोस्ट मिले जो बंद थे।
पुलिसकर्मी हमें आगे बढऩे नहीं देना चाहते थे। जमकर तलाशियों का दौर शुरू हुआ और किसी तरह हम सारकेगुडा पहुँच पाए। पैदल पुल पार कर हम माओवादियों के जनताना सरकार के इलाके में पहुँच गए।
उस पेड़ की तस्वीर जिस पर कई गोलियां लगी। पेड़ पर लगकर लौटी गोलियां सुरक्षाबलों को भी लगी थीं। पुलिस के लोग गाडिय़ों को आगे जाने नहीं दे रहे थे। इस कारण गाड़ी वहीं छोड़ आगे का सफर पैदल तय किया।
राजपेंटा गाँव पहुंचे तो मातम छाया हुआ था। जगह-जगह गोलियों के खाली खोखे नजर आ रहे थे और लोगों में मातम। ग्रामीणों के आरोप थे कि हमारे पहुँचने से पहले ही पुलिस के अधिकारियों ने वहां पहुंचकर गाँव के लोगों को धमकाने का आरोप लगाया। उनका आरोप सीआरपीएफ के डीआईजी और स्थानीय थाने के अधिकारियों पर था।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के तत्कालीन छत्तीसगढ़ के आईजी जुल्फिकार हसन ने मुझे बताया था कि सुरक्षाबलों को खबर मिली थी कि सारकेगुडा से 10 किलोमीटर दूर सिलगर में माओवादी छापामारों के जमा होने की सूचना मिली थी। इस कारण अर्ध-सैनिक बल के जवान और स्थानीय पुलिस ने रात में ही अभियान शुरू किया था। उन्होंने बताया कि कुछ ही दूरी पर रात के अँधेरे में उन्होंने कुछ लोगों का मजमा देखा था। उन्हें लगा कि सब माओवादी वहीं जमा हैं। पुलिस का दावा था कि उन पर गोलिया चलीं जिसके बाद उन्होंने जवाबी कार्रवाई में गोलियां चलायीं। पुलिस ने घटनास्थल से हथियार बरामद होने का दावा भी किया था। मगर इस मामले का गंभीर पहलू यह था कि घटनास्थल से एक भी अत्याधुनिक हथियार बरामद नहीं किया गया था। 
कोट्टागुडा ग्राम के प्रधान ने घटना के बाद बीबीसी से बताया था कि स्थानीय आदिवासी बाशिंदों की बैठक चल रही थी। इस बैठक में वो आने वाले बीज पनडुम त्यौहार को किस तरह मनाया जाए? इस पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने बताया की ग्रामीण बात कर रहे थे और बच्चे भी वहां मौजूद थे जो खेल रहे थे और बातें सुन रहे थे।
उन्होंने बताया, उसी वक्त चारों तरफ से सुरक्षाबलों के जवानों ने सबको घेर लिया था। पूरा अँधेरा था। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि बैठक में कोई भी नक्सली नहीं मौजूद था। वो ये भी कहते हैं कि सुरक्षाबलों के जवान चारों तरफ से गोलियां चला रहे थे।
सारकेगुडा की कमला काका और उनके साथ गाँव में मौजूद आदिवासियों ने बीबीसी को बताया था कि सुरक्षा बलों के जवानों को माओवादियों की गोली नहीं बल्कि ख़ुद की गोलियां लगी हैं।
मैंने जो रेडियो रिपोर्ट की थी उसमें मैंने कमला काका का इंटरव्यू भी लिया था। वो कह रही थीं, हम सब बीच मैदान में बैठे थे। चारों तरफ से गोलियां चल रही थीं। वही गोलियां सुरक्षाबल के जवानों को आपस में लगी हैं। उनकी गोलीबारी में गाँव के बैल मरे, सूअर मरे। जो लोग भाग रहे थे उन पर सुरक्षाबलों के जवान गोलियां चला रहे थे। उन्हें खुद की गोलियां लगी हैं और वो कह रहे हैं माओवादियों ने गोलियां चलायीं हैं। बैठक में सिर्फ ग्रामीण थे।
कमला ने बताया था कि अँधेरे में पुलिसकर्मी इस तरह फैले हुए थे कि वो खुद पर ही गोलियां चला रहे थे। कई गोलियां पेड़ से टकराकर वापस सुरक्षा बलों के जवानों को ही लग रही थीं।
कमला के साथ-साथ कोट्टागुडा में मौजूद ग्रामीण, मारे गए बच्चों के बारे में बताते हुए सिसक-सिसक कर रोने लग रहे थे। वो कह रहे थे कि जो बच्चे मारे गए थे वो दरअसल वो बच्चे थे जो रोज पुलिस कैम्प में सुरक्षाबलों के जवानों के साथ फुटबॉल खेलते थे। उन्होंने कहा था, हमारे गाँव के सब बच्चों को सुरक्षाबलों के जवान पहचानते थे। उनसे रोज मिलते थे। फिर भी उन्हें मार दिया। हम सदमे में हैं।
कमला के अलावा इसी गाँव की शशिकला तेलम का भी आरोप था कि पुलिस ने उनके भाई इरपा रमेश को मार दिया। उनका कहना था कि पुलिस अगले दिन सुबह-सुबह जब गाँव आई तो रमेश अपनी झोपड़ी की खिडक़ी से झाँक रहा था।
इसी गांव के मुत्ता काका का आरोप है कि गाँव से ही पुलिस रमेश को उठाकर ले गयी थी। पहले रमेश की पिटाई की गयी और बाद में उन्हें गोली मार दी गयी।
वहीं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने जो घायल जवानों की मेडिकल रिपोर्ट बीबीसी को दी थी। उसमें सिर्फ एक जवान हवालदार के. राजन के पैर में छर्रे के जख्म की बात कही गई थी, जबकि बाकी के पांच जवानों के शरीर पर अत्याधुनिक हथियारों की गोलियों के जख्म थे। उन्हीं हथियारों के जो सिर्फ पुलिसवालों के पास ही रहते हैं।
जिन जवानों को अत्याधुनिक हथियारों की गोलियां लगीं उनमें कोबरा बटालियन के गयेंद्र सिंह, वहीदुल इस्लाम, अरुनव घोष, किशन कुमार और एसएस राणा शामिल थे जिनका इलाज रायपुर के अस्पताल में चला था।
इस मामले नें जब तूल पकडऩा शुरू कर दिया था तब कांग्रेस ने घटना से सम्बंधित अपनी रिपोर्टें में आरोप लगाए थे कि सारकेगुडा और कोट्टागुडा में मारे गए ग्रामीणों में आठ नाबालिग बच्चे हैं जिनकी उम्र 13 साल से लेकर 16 साल के बीच है। घायलों में भी तीन नाबालिग बच्चे हैं। उस वक्त छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विपक्ष में थी और उसने मामले की जांच अपने विधायक कवासी लखमा से करवाई। फिर जो रिपोर्ट उन्होंने पार्टी हाईकमान को भेजी उसमें घटना को एक मानवसंहार की संज्ञा दी गयी थी।
मजेदार बात है कि उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी और गृह मंत्री थे पी. चिदंबरम। चिदंबरम ने अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा था कि मरने वाले सभी लोग माओवादी ही थे। मगर पार्टी के अंदर से पैदा हो रहे दबाव के कारण वो कहने पर मजबूर हुए कि अगर किसी ग्रामीण की मौत हुई है तो वो इसके लिए खेद प्रकट करते हैं।
बाद में सामजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के दबाव में सरकार ने 11 जुलाई 2012 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय के सेवानिवृत जज वी।के अग्रवाल के नेतृत्व में एक जन आयोग का गठन किया।
नवम्बर के पहले सप्ताह में आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है जिसे राज्य की कैबिनेट और फिर विधानसभा में पेश किया जाना है। इसलिए रिपोर्ट में क्या कहा गया है, सरकार आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बता रही है।
लेकिन रिपोर्ट का अध्ययन करने वाले सरकार और पुलिस के सूत्र बताते हैं कि आयोग ने पूरे मामले को फर्जी मुठभेड़ पाया है क्योंकि सुरक्षाबल के बटालियन का नेतृत्व करने वाले डीआईजी एस इलांगो और डिप्टी कमांडेंट मनीष बर्मोला का कहना है कि उनके अपने हथियारों से एक भी गोली नहीं चलाई गई थी।
इसका मतलब ये हुआ कि ग्रामीणों की तरफ से गोली ही नहीं चलाई गयी थी। क्योंकि अगर ग्रामीणों की तरफ से गोली चली होती उस सूरत में अपने बचाव में सुरक्षाबलों ने गोली चलाई होती।
सारकेगुड़ा में मुठभेड़ की जगह पर बीबीसी संवाददाता सलमान रावी रिपोर्ट में मामले की जांच पर भी गंभीर सवाल उठाये गए हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रवक्ता ने बीबीसी संवाददाता अलोक पुतुल से कहा कि उनकी सरकार जल्द ही जस्टिस अग्रवाल की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए मामले में कड़ी कार्रवाई करेगी।(बीबीसी)
 

 

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