संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 अक्टूबर : अभिजीत बनर्जी की आलोचना के बहाने इस चूक पर चर्चा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 अक्टूबर : अभिजीत बनर्जी की आलोचना के बहाने इस चूक पर चर्चा...
Date : 22-Oct-2019

पश्चिम बंगाल की भाजपा के बारे में एक खबर है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने वहां के अपने नेताओं को नसीहत दी है कि नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के विचारों को लेकर उनकी आलोचना न करें। ऐसी खबर है कि पार्टी को लगता है कि बंगाल के लोग जिस नोबल विजेता पर गर्व कर रहे हैं, उसकी आलोचना से पार्टी का राजनीतिक नुकसान हो सकता है। कहने के लिए तो यह बात छोटी सी है, लेकिन आज देश के व्यापक संदर्भ में इस पर चर्चा करने की जरूरत है। अभिजीत बनर्जी के खिलाफ शुरूआत मोदी सरकार के एक प्रमुख भाजपा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने की जब उन्होंने अभिजीत बनर्जी का मखौल उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने कांगे्रस के चुनाव अभियान के एक प्रमुख नारे, न्याय नाम के कार्यक्रम को तैयार करने में सैद्धांतिक मदद की थी जिसे देश की जनता ने चुनाव में पूरी तरह खारिज कर दिया। नेताओं का एक-दूसरे के खिलाफ ओछा और नाजायज बोलना तो चलते रहता है, लेकिन दुनिया ने जिस अर्थनीति को महत्वपूर्ण मानते हुए उसके पीछे के तीन अर्थशास्त्रियों को नोबल पुरस्कार का हकदार माना, उसकी खिल्ली उड़ाकर भाजपा कुछ भी हासिल नहीं कर सकती। और फिर एक बात यह भी है कि देश के पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी और एनडीए को ऐतिहासिक जनसमर्थन मिलने से कांगे्रस की न्याय नामक योजना जनता ने खारिज कर दी ऐसा सोचना अपने-आपमें एक राजनीतिक अपरिपक्वता से किया गया अतिसरलीकरण है, और पीयूष गोयल जैसे परिपक्व को ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए।

किसी के विचारों से, किसी के सिद्धांतों से असहमति एक बात है, लेकिन उसे खारिज करते हुए किसी चुनाव के नतीजों को उसी एक बात से जोड़कर देखना एक बड़ी चूक है। चुनाव के नतीजे एक बहुत ही जटिल फैसला होते हैं, और मतदाताओं के सामने मौजूद विकल्पों के बीच से वे किन मुद्दों से कितना प्रभावित होते हैं, इसका अंदाज लगाना आसान नहीं होता। और फिर हिंदुस्तान के चुनाव पिछले बरसों में लगातार एक मैनेजमेंट का करिश्मा भी साबित होते आए हैं, इसलिए एक अर्थशास्त्री के सिर पर उसका घड़ा नहीं फोडऩा चाहिए। और फिर इस अर्थशास्त्री के साथ तो यह भी जुड़ा हुआ है कि वह दुनिया के गरीबों की मददगार अर्थनीतियों के लिए जाना जाता है। उसकी खिल्ली उड़ाना आत्मघाती ही हो सकता है। अभिजीत बनर्जी के पहले अमत्र्य सेन भी बंगाल के, गरीबों के अर्थशास्त्री रहे, नोबल विजेता रहे, लगातार गरीबों की भलाई की नीतियों और कार्यक्रमों के लिए जाने जाते रहे, और मोदी सरकार उनसे पूरी तरह असहमत रही। लेकिन उनकी खिल्ली उड़ाने से केंद्र सरकार या भाजपा का नुकसान छोड़कर और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद महज अभिजीत बनर्जी के बारे में लिखना नहीं है, आज हिंदुस्तान में लोगों को असहमति की वजह से बोलते हुए यह जरूर देखना चाहिए कि उनकी आलोचना नाजायज तो नहीं हो जा रही है? यह बात सावरकर को लेकर भी लागू होती है, और कई दूसरे लोगों को लेकर भी। आलोचना जहां नाजायज होती है, वहां वह आत्मघाती और प्रतिउत्पादक (काउंटरप्रोडक्टिव) हो जाती है। आज ही एक वरिष्ठ स्तंभकार ने इस बारे में लिखा है कि जनसंघ की आलोचना करते हुए इंदिरा ने कभी उसे हिंदू पार्टी कहकर नहीं कोसा, उसे बनियापार्टी कहकर कोसा। उनका मानना है कि यह इंदिरा की सोची-समझी रणनीति थी कि वे देश के हिंदुओं की विशाल आबादी को अपने बयानों से अपने खिलाफ करने की चूक नहीं कर रही थीं। चुनावी राजनीति पर आधारित भारतीय लोकतंत्र में सैद्धांतिक लड़ाई लड़ते हुए भी सामान्य समझबूझ को ताक पर धरना न अच्छी रणनीति हो सकती, न ही समझदारी।
-सुनील कुमार

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