संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 अक्टूबर : सोशल मीडिया पर जिंदगी, अपनी मर्जी की, या फिर...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 अक्टूबर : सोशल मीडिया पर जिंदगी, अपनी मर्जी की, या फिर...
Date : 19-Oct-2019

सोशल मीडिया पर जिंदगी, अपनी मर्जी की, या फिर...

एक जागरूक पाठक ने पिछले दिनों एक अखबारनवीस को फोन करके इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि गांधी जयंती पर इस बरस लोगों ने सोशल मीडिया पर मानो गांधी का बहिष्कार कर दिया है। लेकिन अखबारनवीस का तजुर्बा इससे ठीक उल्टा था, और उसकी नजर में इस बरस गांधी पर पहले से अधिक लिखा गया था। तजुर्बे का यह इतना बड़ा फर्क कैसे आया? दरअसल सोशल मीडिया खुली जगह पर एक बड़े बुलबुले की तरह रहता है जिसे जिस तरफ से देखा जाए, वह उसी तरफ के रंगों को अधिक दिखाता है, उसी तरफ की तस्वीर दिखाता है। होता यह है कि लोग, खासकर सोचने-समझने वाले लोग, दोस्तों का अपना दायरा अपनी विचारधारा और अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर तय करते चलते हैं। इसी आधार पर नए लोग जुड़ते जाते हैं, पुराने लोगों में से कुछ लोग घटते जाते हैं। और फिर इसके ऊपर फेसबुक या दूसरे सोशल मीडिया का अपना कम्प्यूटर एल्गोरिदम होता है जो आपकी पसंद-नापसंद को आपके बताए बिना भी समझते चलता है, और हिन्दी फिल्म के एक पुराने गाने की तरह काम करता है- जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे...।

सोशल मीडिया एक इतनी अधिक नियंत्रित दुनिया है कि जिसमें लोग अपने पसंद के लोगों से घिर जाते हैं, पसंद के मुद्दों से भी, और नापसंद लोगों को दूर रखना बड़ा आसान है उन्हें ब्लॉक करके, या उन्हें 30 दिनों के लिए नजरों से दूर करके। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की विचारधाराओं के बीच अच्छी बहस की गुंजाइश रहती है, तो वह कम ही लोगों के साथ, कम ही मामलों में रहती है। अधिकतर तो एक ही विचारधारा के लोग जुटने लगते हैं, और एक-दूसरे को सुहाती बातें करने लगते हैं, क्योंकि असहमति पर दूसरे लोगों की जो प्रतिक्रिया होती है, उसे बर्दाश्त करना भी आसान होता नहीं है। फिर यह भी है कि सोशल मीडिया लोगों की जिंदगी को एक खुली किताब की तरह भी सामने रख देता है, और हिन्दुस्तान में जिस तरह सरकारों का, सत्तारूढ़ लोगों का बर्दाश्त कम होते चल रहा है, उससे भी लोगों को अपने हमख्याल लोगों के बीच रहना अधिक महफूज लगता है कि उनमें से कोई सत्ता तक उनकी शिकायत नहीं करेंगे, और आज के वक्त में सत्ता महज सत्तारूढ़ पार्टी या मंत्री-अफसर नहीं होते, समाज के कोई भी ताकतवर तबके सत्ता की एक किस्म तो होते ही हैं। 

सोशल मीडिया ने एक तरफ जहां लोगों के लिए सोचने-समझने और बातचीत की पूरी दुनिया खोल दी है, वहीं दूसरी तरफ उसने लोगों को अपनी दुनिया का आकार, उसकी किस्म, उसके लोग छांटने का जो अभूतपूर्व मौका दिया है, वैसा तो इंसान के समाज में पहले कभी भी नहीं था। लोगों को न अपने रिश्तेदार छांटने मिलते थे, न ही अपनी क्लास के बाकी बच्चे, और न ही अड़ोस-पड़ोस। लोगों को अपनी स्कूल या कॉलेज की टीम के बाकी लोग भी छांटने का मौका नहीं मिलता था, और न ही अपने साथ काम करने वाले दूसरे लोग छांटने मिलते थे। लेकिन सोशल मीडिया ने लोगों को ऐसे परले दर्जे का छंटैल बना दिया है कि वे बात-बात को छांटते चलते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर लोगों को यह पसंद भी हासिल है कि वे किन शब्दों को देखना नहीं चाहते। फेसबुक पर कुछ दूसरे तरह का काबू हासिल है। मतलब यह कि लोग अपनी ही पसंद की दुनिया में जीते हैं, और नतीजा यह होता है कि किसी को लगता है कि सोशल मीडिया पर गांधी का बहिष्कार चल रहा है, किसी को लगता है कि मोदी का कीर्तन चल रहा है, किसी को लगता है कि गोडसे की स्तुति हो रही है, और किसी को लगता है कि किसी किस्म की नफरत फैलाई जा रही है।

लाखों बरस से इंसानों ने इस तरह के काबू को कभी देखा-सुना नहीं था। पिछले 50 हजार बरस से अधिक का इंसानों का ताजा इतिहास हाल के कुछ बरसों में, खासकर अभी के दस-बीस बरस में जिस तरह बदल गया है, उसके साथ लोग जी तो रहे हैं, लेकिन उन्होंने जीना सीख लिया है, या मान लेना भी कुछ गलत होगा। आज जिस तरह सामाजिक अंतरसंबंध बदल रहे हैं, लोगों की सोच को पल-पल हथौड़ा लग रहा है, या लोगों को सहलाया जा रहा है, वह सब भी बिल्कुल नया है। इंसान का दिमाग एकदम से ऐसे माहौल के लिए तैयार हो गया होगा, ऐसा माना नहीं जा सकता। इसलिए सोशल मीडिया से निजी सोच, निजी जीवन, और सामाजिक अंतरसंबंधों पर  क्या असर पड़ रहा है यह अंदाज लगाना आसान नहीं है। 

अभी-अभी हिन्दुस्तान के बाहर की एक महिला ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फेसबुक पर किसी राजनीतिक दल या नेता का प्रचार इतना आसान है कि फेसबुक की बनाई हुई नीतियों की कोई रोक वहां काम नहीं करती। उसने फेसबुक पर ही एक इश्तहार डलवाया जिसमें लिखा था कि फेसबुक और उसके मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दुबारा राष्ट्रपति बनाने के लिए अपना समर्थन दिया है। यह झूठा विज्ञापन देकर उसने साबित किया कि फेसबुक पर भुगतान करके कोई भी झूठी बात प्रचारित की जा सकती है। और आज जब लोग अपनी दुनिया को अपने बनाए हुए दायरे तक सीमित कर चुके हैं, तो वैसे में इस किस्म के नियंत्रित इश्तहारों से, जो कि कम्प्यूटरों की मेहरबानी से सीधे चुनिंदा लोगों तक पहुंचते हैं, दुनिया को काबू करना कितना आसान हो गया है। लोग समझ रहे हैं कि वे सोशल मीडिया पर अपनी दुनिया अपनी मर्जी से तय कर रहे हैं, और हकीकत यह भी है कि वहां पर भुगतान करके लोग दूसरों की सोच को इस तरह प्रभावित भी कर रहे हैं!

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