संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 अक्टूबर : कश्मीर से आते हुए सेबों पर लिखी हुई भड़ास समझें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 अक्टूबर : कश्मीर से आते हुए सेबों पर लिखी हुई भड़ास समझें
Date : 17-Oct-2019

कश्मीर से जम्मू होते हुए नीचे पहुंचने वाले सेबों पर भारतविरोधी, पाकिस्तान समर्थक, और आजादी के नारे लिखे हुए मिले हैं। ट्रक भर-भरकर आने वाले ऐसे सेब दसियों लाख होते हैं, और उनमें से कुछ पर अगर ऐसा लिखा हुआ है, तो इसमें हैरानी की कोई बात इसलिए नहीं है कि वहां तो दीवारों पर भी ऐसे नारे देखने में आते रहे हैं, और अब चूंकि पिछले दो महीने से अधिक से वहां सुरक्षा बलों का ऐसा पहरा है कि दीवारों पर भी लिखने का मौका शायद न मिला हो, फोन और इंटरनेट बंद होने से भी शायद सोशल मीडिया पर भड़ास निकालने या विरोध करने का मौका न मिला हो, और बाकी हिन्दुस्तान के साथ अपने मन की बात बांटने का यह मौका कश्मीर के कुछ लोगों को शायद पहली बार मिला, और उन्होंने ऐसे संदेश भेजे। लोगों को याद रखना चाहिए कि समंदर के पानी में तैरकर आई हुई कई बोतलों में ऐसे संदेश रहते हैं जिन्हें दस-बीस बरस पहले दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में किसी ने लिखकर बोतल में बंद करके समंदर में छोड़ दिया हो, और वे किसी और कोने में जाकर लोगों को मिलते हैं। जेलों में बंद कैदी भी तरह-तरह के रास्ते निकालकर अपनी बात बाहर भेजते हैं, स्कूल-कॉलेज के हॉस्टलों में अगर बच्चों को कड़ी निगरानी में रखा जाता है, तो वे भी अपनी बात गुमनाम चि_ियों के रास्ते बाहर भेजते हैं। अभी-अभी बस्तर में नक्सल मोर्चे पर तैनात एक सीआरपीएफ जवान ने उत्तरप्रदेश में अपने परिवार की जमीन की दिक्कत गिनाते हुए अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, और उसके बाद उसकी शिकायत की जांच शुरू हुई है। 

जहां से लोगों को अपनी बात बाहर भेजने का हक नहीं रह जाता, वहां लोग तरह-तरह के रास्ते अपनाते हैं। लोगों ने यह देखा हुआ है कि हिन्दुस्तान में लोग नोटों पर किसी के बारे में कुछ लिखकर उसे चला देते हैं, या ताजमहल जैसी इमारत की दीवार पर, नदी के किनारे चट्टान पर, या किसी किले और महल में अपने दिल की बात लिखकर मोहब्बत का इजहार करते हैं, या पखानों के बंद दरवाजों के भीतर की तरफ खरोंचकर नफरत का इजहार। ऐसे में अगर कश्मीर के कुछ लोगों ने अपने मन की बात सेब पर लिखकर भेजी है, तो इसी आधार पर वहां के सेब का बहिष्कार करने का फतवा ठीक नहीं है। किसी प्रदेश को जब देश के लोग अपना मानते हैं, तो वहां के लोगों की भावनाओं को सुनना भी लोगों की जिम्मेदारी होती है। बिना हिंसा, बिना आतंक की धमकी के अगर ऐसी बात लिखकर कुछ लोग अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं, तो इसे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानना चाहिए, इसे हिन्दुस्तान के खिलाफ कोई धमकी मानना ठीक नहीं है। फिर इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किसी के सचमुच ही ऐसा लिखे बिना भी किसी साजिश के तहत, कश्मीर के लोगों को बदनाम करने के लिए, उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए भी एक मार्कर पेन की मदद से ऐसा करने वाले लोग भी हो सकते हैं। हर वक्त आंखों के सामने जो रहता है, जो दिखता है, उसे पूरी तरह सच मान लेना भी ठीक नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तान के हिमायती भी हमेशा से बने रहे हैं, और आतंकी भी रहे हैं जिनमें हो सकता है कि स्थानीय लोग भी हों। ऐसे लोग भी यह चाह सकते हैं कि कश्मीर को बाकी हिन्दुस्तान से काटकर, अलग-थलग करके कश्मीरियों को ऐसी बेबसी में लाया जाए कि वे एक अलग राज्य में, पाकिस्तान के साथ जुडऩे में अपना भला चाहें। इसलिए दो-चार सेब पर, या दो-चार सौ सेब पर ऐसी लिखी गई बातों को लेकर बवाल खड़ा करना ठीक नहीं है क्योंकि देश और समाज के व्यापक हित में यह जरूरी है कि साजिश की आशंका वाली ऐसी हरकतों को पहली नजर में ही सच न मान लिया जाए, और न ही यह माना जाए कि यह तमाम कश्मीरियों की सोच है। 

ऐसी छोटी-छोटी हरकतों को लेकर बड़ी-बड़ी नफरतें पाल लेना ठीक नहीं होगा। कश्मीर ही नहीं, बाकी हिन्दुस्तान में भी जब लोगों से बोलने, बात करने, लिखने का हक छीन लिया जाए, तो उनके मन की भड़ास किसी न किसी शक्ल में तो निकलेगी ही, और ऐसे नारे ऐसी भड़ास का एक अहिंसक जरिया है जिसे अधिक तूल नहीं देना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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