संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 अक्टूबर  : गरीबों के हिमायती अर्थशास्त्रियों को नोबल मिलने की नसीहतें...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 अक्टूबर : गरीबों के हिमायती अर्थशास्त्रियों को नोबल मिलने की नसीहतें...
Date : 15-Oct-2019

एक भारतवंशी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो के साथ एक अन्य अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को इस बरस का नोबल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें अर्थशास्त्र की उनकी सोच से दुनिया की गरीबी कम करने में मिली मदद की वजह से उन्हें इसका हकदार माना गया। भारत में जन्मे, कोलकाता में पढ़े, और फिर जेएनयू से अर्थशास्त्र पढऩे वाले अभिजीत बैनर्जी को दुनिया का यह सबसे बड़ा सम्मान मिलना अमरीका में उनके विश्वविद्यालयों के लिए गौरव की बात है जहां से उन्होंने पीएचडी की, और जहां वे पढ़ाते हैं। दूसरी तरफ जेएनयू को भी हाल के बरसों में देश का गद्दार होने की जो बदनामी बख्शी गई थी, उस पर भी बदनाम करने वालों को सोचने की नौबत है कि गरीबों की भलाई का अर्थशास्त्री इसी जेएनयू से निकला हुआ है, और जेएनयू के हमेशा के बागी तेवरों का प्रतिनिधि रहते हुए वह इंदिरा के राज में कुलपति विरोधी आंदोलन में दस दिन जेल में भी रह चुका है। अभिजीत बैनर्जी ने हाल ही के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी को चुनावी घोषणापत्र के लिए गरीबों की हिमायती आर्थिक नीतियां सुझाई थीं। उनके नाम से यह भी अच्छी तरह दर्ज है कि उन्होंने भारत की नोटबंदी की कड़ी आलोचना की थी, और आज भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर वे बहुत निराश भी हैं।

हम यहां पर उनके बारे में और अधिक लिखना नहीं चाहते लेकिन उनके बहाने से इस पर चर्चा जरूर चाहते हैं कि देश की अर्थनीति गरीबों के लिए हमदर्दी की कैसे होनी चाहिए, और इस तरह अभिजीत बैनर्जी की नीतियों को पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण माना गया है, और कई देशों में गरीबी से उबरने के लिए उनके सुझाए गए कार्यक्रमों पर अमल हुआ है, उनका फायदा देखने मिला है। यहां पर हम अभिजीत की चर्चा बंद करते हुए गरीबों की चर्चा पर बात आगे बढ़ाना चाहते हैं जिनका देश के साधनों पर पहला हक होना चाहिए। आज भारत की अर्थव्यवस्था बड़े औद्योगिक घरानों की हिमायती लग रही है, और उससे परे की एक बात यह भी है कि वह पूरी तरह बेकाबू भी लग रही है। हिन्दुस्तान की सरकार गिनाने के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पादन के नए तरीके से गढ़े गए आंकड़ों की मदद लेती है, लेकिन दुनिया के बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऐसे गढ़े हुए आंकड़ों से कोई लंबी मदद नहीं मिलती है। अभी कल ही इसी अखबार में हमने देश के एक अर्थशास्त्री का एक लेख छापा था जिसमें उन्होंने मोदी सरकार को सुझाया है कि नेहरू के मॉडल को कोसने के बजाय उसे नरसिंह राव-मनमोहन सिंह के खड़े किए हुए आर्थिक ढांचे को अपनाना चाहिए जिससे देश की आज की हालत सुधर सके। अपने किस्म के ऐसे बहुत से लेखों से परे इस लेख का एक महत्व यह भी है कि इसके लेखक देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं। उन्होंने खुलकर ऐसा आलोचनात्मक लेख लिखा है जिसके साथ इस बात को याद रखना चाहिए कि राजनीति में आने के पहले निर्मला सीतारमण पति के साथ ही एक ही संस्था में काम करती थी। दो दिनों में ये दो बातें ऐसी आई हैं जो कि देश की अर्थनीति और आर्थिक स्थिति दोनों पर कुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं। मोदी सरकार के नोटबंदी से लेकर दूसरे कई किस्म के फैसलों के आलोचक को नोबल पुरस्कार मिलना, और वित्तमंत्री के पति का केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों से गहरी सहमति रखना। अब यह तो सरकार के ऊपर है कि वह इन दोनों को देश के खिलाफ मानकर उनकी बातों को खारिज कर दे, या आज की देश की मंदी और बदहाली से जूझने के लिए निंदकों और आलोचकों की बात सुनकर उससे कुछ सीखने की कोशिश करे। 

कुल मिलाकर आज हालत यह है कि पूरी दुनिया में गरीबों की हालत बेहतर बनाने वाली आर्थिक नीतियों का सम्मान हुआ है, और यह निर्विवाद रूप से माना जा रहा है कि गरीबों को साथ-साथ ऊपर लाए बिना दुनिया, कोई भी देश-प्रदेश ऊपर नहीं आ सकते। पूरे देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का जोड़़ चाहे किसी देश को ऊपर जाता हुआ बता दे, लेकिन जहां आबादी का अधिकांश हिस्सा बदहाल हो, पिछड़ा हुआ हो, वहां पर जीडीपी जैसे आंकड़े कोई हकीकत नहीं बताते। अब यह मोदी सरकार पर है कि वह आलोचकों की बात सुनना चाहती है या नहीं, और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर है कि वे घर की बात सुनना चाहती हैं या नहीं। 
-सुनील कुमार

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