संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 सितंबर : एक बच्ची की ईमानदार पहल की गूंज दुनिया भर के दिल और दिमागों में, इसे हमारा सलाम...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 सितंबर : एक बच्ची की ईमानदार पहल की गूंज दुनिया भर के दिल और दिमागों में, इसे हमारा सलाम...
Date : 21-Sep-2019

योरप का जो देश स्वीडन सबसे साफ देशों में से एक माना जाता है, जहां पर लोगों के खुश रहने की बहुत सी वजहें रहती हैं, लोग बहुत संपन्न भी हैं, देश को विकसित माना जाता है, वहां पर एक स्कूली छात्रा ने एक इतिहास रच दिया है। उसे गांधी की तरह रंगभेद का शिकार होकर दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन में लात-जूते नहीं झेलने पड़े थे, और न ही उसका देश हिन्दुस्तान की तरह किसी विदेशी सरकार का गुलाम था। लेकिन आज जिस अंदाज में धरती इंसान के लालच की गुलाम हो चुकी है, जिस तरह विकसित देश, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, और लापरवाह सरकारें धरती के मौसम को खत्म कर रही हैं, उसके खिलाफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पन्द्रह बरस की यह छात्रा ग्रेटा थनबर्ग स्कूल के सामने हड़ताल पर बैठी थी। वह अपने देश की सरकार का ध्यान तो खींचना चाहती ही थी, साथ-साथ वह दुनिया का ध्यान भी खींचना चाहती थी। उसका यह आंदोलन पिछले बरस से शुरू होकर अब न्यूयार्क में पहुंचकर पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है जहां अगले कुछ दिनों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिए दुनिया भर के नेता इक_ा हो रहे हैं। ग्रेटा को देखते हुए दुनिया भर के छात्रों ने तय किया है कि वे दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक दिन प्रदर्शन करेंगे। आज सुबह से अमरीका सहित योरप के बहुत से देशों की तस्वीरें खबरों और सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं जिसमें छात्रों के इस आंदोलन, फ्राईडेज फॉर फ्यूचर, के तहत बच्चे सड़कों पर हैं। 

इस बच्ची की कहानी दुनिया में एक बड़ा हौसला पैदा करने वाली है कि दुनिया को बचाने और बेहतर बनाने के लिए शुरुआत अपने से करनी चाहिए। इस बच्ची ने दुनिया के पर्यावरण का नुकसान पहुंचाने वाले सामानों का इस्तेमाल रोकने का काम अपने घर से शुरू किया, और अपने मां-बाप को शाकाहारी बनाया क्योंकि मांस तैयार करने में धरती का बहुत सारा पानी खर्च होता है। उसने अपने मां-बाप के हवाई सफर रूकवा दिए क्योंकि उनसे बहुत प्रदूषण होता है, और बड़ा ईंधन खर्च होता है। पिछले बरस इसी महीने में स्वीडन में चुनाव था, और ग्रेटा के साथ वहां के बहुत से छात्र-छात्राओं ने यह तय किया कि जब तक देश में जिम्मेदार सरकार न आए वे संसद के बाहर बैठकर आंदोलन करेंगे। इसके साथ-साथ इस छोटी सी लड़की ने एक बड़ा लंबा समुद्री सफर भी बोट से तय किया जो बिना ईंधन के ब्रिटेन से अमरीका तक गई। उस बोट पर कुछ और नौजवानों के साथ वह अकेली लड़की थी। आज उसकी प्रेरणा से पूरी दुनिया में जितनी बड़ी क्लाईमेट-स्ट्राईक हो रही है, वह अपने आपमें एक इतिहास है और उसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। 

अब इस मुद्दे पर आज लिखने की जरूरत यहां इसलिए लग रही है कि उसकी उम्र के या उससे बड़े भला ऐसे इतने लोग इस दुनिया में हैं जो कि दुनिया को बचाने के लिए एक जागरूकता के साथ अपनी निजी जिंदगी में फेरबदल करने को तैयार हैं, अपने स्वाद, अपने शौक, और अपने सुख को कुछ छोडऩे के लिए तैयार हैं? इस पर लिखने की जरूरत इसलिए भी है कि अगर दुनिया में एक अकेली लड़की भी किसी मुद्दे को लेकर एक ईमानदार अभियान शुरू करती है, तो वह दुनिया के एक सबसे बड़े आंदोलन में तब्दील हो सकता है। ऐसे बहुत से पहलू इस नाबालिग छात्रा के संघर्ष के हैं जिनके बारे में अलग-अलग देशों के किशोर-किशोरियों, और नौजवानों को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने-अपने दायरे में सचमुच ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जिससे कि धरती को बचने में मदद मिल सके? और यह भी कि क्या एक वक्त पूरी दुनिया को गांधी ने अहिंसा और किफायत की जो राह दिखाई थी, वह राह खुद हिन्दुस्तान में मिटा दी गई है, उसकी जगह गांधी के पदचिन्हों पर कांक्रीट की नई सड़क बना दी गई है ताकि किफायत के बारे में चर्चा भी न हो, और बाजार का कारोबार अधिक से अधिक बढ़ता चले? यह पूरा सिलसिला इक्कीसवीं सदी का एक नया इतिहास रच रहा है, और बताता है कि ईमानदार सोच की गूंज दुनिया भर में करोड़ों दिल-दिमाग से उठती है, और नेक काम में कोई भी अकेले नहीं है, अगर वह डटकर किया जाए। आज अमरीका जैसे अंतरराष्ट्रीय मवाली-कारोबारी देश दुनिया के मौसम को, पर्यावरण को बर्बाद करके अपना सुख तो जुटा ही रहे हैं, अपने कारोबार को भी बढ़ा रहे हैं, और इस काम को वे पूरी हिंसा और अश्लीलता के साथ कर रहे हैं। ऐसे अमरीका, और ऐसे कई दूसरे देशों की बर्बादी की आदतों को बदलने के लिए, वहां के नेताओं को झंकझोरकर जगाने के लिए एक बच्ची ने जो पहल की है, जो मुहिम शुरू की है, जो इतिहास रचते चले जा रहा है, उन सबको हमारा सलाम। 
-सुनील कुमार

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