संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 सितंबर : पूरे देश में एक जुबान की सोच नक्शे पर सरहदों को गाढ़ा लाल कर रही
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 सितंबर : पूरे देश में एक जुबान की सोच नक्शे पर सरहदों को गाढ़ा लाल कर रही
Date : 17-Sep-2019

हिंदी दिवस के पहले ही गृहमंत्री और भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने पूरे देश में एक भाषा हिंदी की वकालत करके मधुमक्खियों के खूब बड़े से छत्ते पर बड़ा सा पत्थर मार दिया, और बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक खुद भाजपा के नेता सफाई देते-देते, विरोध करते हुए हलाकान हो गए। अभी नए मोटर व्हीकल एक्ट को लेकर भाजपा राज्यों का विरोध खत्म हुआ नहीं था कि अब अमित शाह की हिंदी की वकालत ने करीब एक पखवाड़े में यह दूसरा बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

दरअसल हिंदुस्तान में भाषा विवाद में नया कुछ नहीं है। उत्तर भारत या भारत के हिंदीभाषी इलाकों से आने वाले नेताओं को बीच-बीच में अपनी मातृभाषा का कीड़ा काटता है, और वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी को थोपने पर आमादा हो जाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि अहिंदीभाषी प्रदेशों में उसका जमकर विरोध होने लगता है। यह बखेड़ा तकरीबन सालाना के रेट से खड़ा होता ही है, और इस बार चूंकि भाजपाध्यक्ष-गृहमंत्री खासे बड़े कद के, बड़े वजन के नेता हैं, और कश्मीर पर उनका ताजा-कड़ा रूख हाल का गवाह है, इसलिए लोगों के बीच उनकी बात एक धमकी की तरह तैर गई, और हिंदी से परे जीने वाले लोग हड़बड़ा गए कि क्या उनके प्रदेश भी कश्मीर की तरह काबू में कर लिए जाएंगे। 

दरअसल सालाना हिंदी दिवस का मौका बहुत से लोगों के लिए अपनी भावनाओं से हवा को भड़काने का रहता है। लोगों को हिंदी की सेवा करना याद आता है, हिंदी पर गर्व करना सूझता है, और जिनके पास गर्व के लायक कुछ भी नहीं रहता वे लोग दूसरी भाषाओं पर हमला करके, या अपनी हिंदी की स्तुति करके अपना सालाना जिम्मा पूरा करते हैं। इस पूरे भावनात्मक भाषाई उन्माद में इस बात को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाता है कि कोई भाषा महज एक औजार होती है, और उसका महत्व तभी साबित होता है जब उसके इस्तेमाल से कोई महत्वपूर्ण काम होता है, जब उस भाषा में उत्कृष्ट साहित्य रचा जाता है, विज्ञान या दूसरे विषयों की बेहतरीन किताबें लिखी जाती हैं, जब कारोबार की दुनिया में उस भाषा का इस्तेमाल नफे का होता है, तभी कोई भाषा सम्मान पाती है। अपने-आपमें भाषा अक्षरों, व्याकरण, और लिपि का एक टूलबॉक्स है, और जब इसके इस्तेमाल से लोग महत्वपूर्ण बनते हैं, लोग कामयाब बनते हैं, तो ही इस भाषा का सम्मान होता है।

इसलिए भाषा को लेकर एक भावनात्मक गौरवोन्माद पूरी तरह गैरजरूरी और नाजायज होता है क्योंकि वह महज भाषा के महज सतही इस्तेमाल से संतुष्ट हो जाने वाला रहता है, और उसके लिए कुछ अधिक बड़ा करने की जरूरत नहीं होती। कई बार तो किसी दूसरी प्रतिद्वंद्वी भाषा का विरोध, या उसे नीचा दिखाना भी काफी मान लिया जाता है, और अपनी भाषा के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं होती। एक नफरतजीवी राष्ट्रवाद की तरह दूसरी भाषाओं के विरोध के हमलावर तेवर कई लोगों को अपनी भाषा की कामयाबी की खुशफहमी दे जाते हैं। यह घटिया सिलसिला खत्म होना चाहिए। दूसरे देशों में बम फटने से अपने देश की अशांति का दाग कम नहीं होता। इसलिए लोगों को अपनी भाषा में अधिक कामयाबी हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए, और ऐसा होने पर ही कोई भाषा सम्मान हासिल कर सकती है, उसका गौरव बढ़ सकता है। आज अमरीका टूटी-फूटी किस्म की अंगे्रजी बोलकर भी दुनिया में सबसे कामयाब भाषा वाला देश इसलिए बन गया है कि वह दुनिया में सबसे कामयाबी वाला देश है। वरना सही व्याकरण वाले अंगे्रजों का देश ही सबसे कामयाब होता। 

भाषा को लेकर सालाना उन्माद हिंदुस्तान का नुकसान कर जाता है और देश के नक्शे पर राज्यों की सरहदों की लकीरें गाढ़ी होने लगती हैं, लाल रंग की होने लगती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए और हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेश अपनी भाषाओं और बोलियों को लेकर दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं। आज दुनिया के देश अपनी छोटी-छोटी आबादी को लेकर भी अपनी खुद की भाषा के साथ कामयाब हैं, और हम हिंदुस्तान में उन देशों से बड़े-बड़े प्रदेश लेकर उनकी अपनी भाषाओं के साथ नाकामयाब हैं, और देश में सबसे अधिक नाकामयाब हिंदी बोलने वाले प्रदेश हैं। उत्तर भारतीयों के बारे में अभी एक केंद्रीय मंत्री ने योग्यता की कमी की बात कह दी तो बड़ा बवाल हो गया। लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने अपनी अंगे्रजी की मामूली या बेहतर समझ के चलते दुनिया के दूसरे देशों तक जाकर वहां कामयाबी पाने का एक ऐसा काम किया है जिसे उत्तर भारतीय कभी नहीं कर पाए। इसलिए क्षेत्रीय उन्माद को परे रखकर हिंदीभाषी इलाकों को पहले तो दूसरी भाषाओं के राज्यों के मुकाबले अपने को सुधारना होगा, तब भी दूसरे राज्यों पर हिंदी थोपने का उनका कोई हक नहीं बनेगा। पूरे देश में एक भाषा की सोच देश को एक साथ बांधने की नहीं, देश के अलग-अलग प्रदेशों को अलग-अलग बांधकर बिठा देने की है, इससे भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति कहीं भी समृद्ध होने नहीं जा रहे।
-सुनील कुमार

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