संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 सितंबर : धर्म से बड़ा अराजक और हिंसक कौन ?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 सितंबर : धर्म से बड़ा अराजक और हिंसक कौन ?
Date : 13-Sep-2019

भोपाल में एक तालाब में गणेश विसर्जन के दौरान नाव पलटी और दर्जन भर लोगों की डूबकर मौत हो गई। आधा दर्जन लोग बचाए गए, और सरकार ने हर किसी को लाखों रूपए मुआवजा भी दिया। विसर्जन की नावों को आपस में बांट दिया गया था, और किसी ने लाईफ जैकेट नहीं पहना था। खबर बताती है कि यह घटना मध्यप्रदेश आपदा बचाव दल के मुख्यालय के पास हुई है। इधर कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ में जगह-जगह इस बात को लेकर तनाव हुआ कि बहुत से गणेश पंडाल में बिजली चोरी करके रौशनी की जा रही थी, और जब बिजली विभाग कनेक्शन काटने पहुंचा तो उसे घेर लिया गया, तनाव के बीच पुलिस मौजूदगी में चोरी को जारी रखा गया, तब बात आई-गई हुई। राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर एक मंदिर का अवैध निर्माण कई बरस पहले बढ़ते-बढ़ते चार-पांच मंजिल इमारत जितना हो गया, और रेलवे इसके खिलाफ मुकदमा लड़ते-लड़ते जीतकर अब उसे तोडऩे का आदेश पा चुका है, लेकिन वह राज्य सरकार का मुंह देख रहा है कि उससे मदद मिले तो मधुमक्खियों के इस छत्ते में हाथ डाला जाए।

धर्म के सार्वजनिक रूप को देखें, तो वह पूरी तरह, और बुरी तरह हिंसक हो चुका है, अराजक हो चुका है, और जगह-जगह वह जरा से तनाव पर साम्प्रदायिक हो जाने की कोशिश करता है। देश की जाने कितनी ही बड़ी-बड़ी अदालतों ने धार्मिक अवैध निर्माण के खिलाफ आदेश दिए हैं, और उन्हें कड़ाई से तोडऩे को कहा है, लेकिन कोई भी राज्य सरकार ऐसा करके अंधभक्तों को नाराज करना नहीं चाहतीं। नतीजा यह होता है कि सरकारी जमीन पर, सरकारी अहातों में धर्मस्थान बनते चलते हैं, और एक बार बन जाने के बाद उन्हें छूना मुश्किल होने लगता है। धर्म के कोलाहल को काबू में करना कोई अफसर नहीं चाहते, कोई नेता नहीं चाहते, और एक धर्म के शोरगुल करने वाले मिसाल के लिए दूसरे धर्म के लाउडस्पीकर गिनाकर अपना शोर जारी रखते हैं, जो इतना अधिक होता है कि उनके ईश्वर भी शायद प्रतिमा की देह छोड़कर, धर्मस्थल छोड़कर दूर चले जाते होंगे, ताकि चैन से रह सकें। 

भारतीय लोकतंत्र में कानून का राज वहां से शुरू होता है जहां पर धर्म की मनमानी की आगे जरूरत नहीं रहती। धर्म का कारोबार जहां तक बढ़ाना है, वहां तक कानून को पांव रखने नहीं मिलता। दो दिन पहले उत्तरप्रदेश के एक मंत्री ने यह खुला फतवा जारी किया है कि सरकार उनकी है, सुप्रीम कोर्ट उनका है, इसलिए राम मंदिर बनने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात में अनहोनी कुछ नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट का भी इतना हौसला नहीं दिख रहा है कि इसकी चर्चा करते हुए नाराजगी जाहिर करने से अधिक कुछ करे। कायदे की बात तो यह होती कि इस मंत्री को बुलाकर सजा सुनाई जाती ताकि देश में बाकी नेताओं को सबक मिलता, लेकिन अदालतें अब ऐसा हौसला शायद खोती जा रही हैं। धर्म ने हिन्दुस्तान की जिंदगी के एक बहुत बड़े, बिल्कुल ही बेजरूरत हिस्से को, और पूरी तरह नाजायज अंदाज में कब्जा कर लिया है। इस कब्जे के बाद आम लोगों की तो जुबान ही सिल जाती है क्योंकि संगठित धार्मिक गुंडों की अराजकता और हिंसा का विरोध करने की ताकत किसी एक इंसान में कैसे रहे जब बड़े-बड़े नेता, बड़ी-बड़ी अदालतें भी ऐसी मनमानी को अनदेखा करने में ही अपनी हिफाजत मानती हैं। जब ताकतवर तबका अनदेखा करने में भरोसा करता है तो फिर आम जनता को भी आंख और कान बंद करके घर बैठने में ही सुरक्षा है। धर्म का ऐसा आक्रामक रूख आगे चलकर उसी को खत्म करेगा क्योंकि दुनिया के बहुत से सभ्य देशों में धीरे-धीरे नास्तिकों की गिनती बढ़ती जा रही है। 
-सुनील कुमार

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