संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अगस्त :  कश्मीर के हालात का सच और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अगस्त : कश्मीर के हालात का सच और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी
Date : 12-Aug-2019

कश्मीर के हालात को लेकर मीडिया में इतनी अलग-अलग तस्वीरें आ रही हैं कि यह लगता ही नहीं है कि वे एक देश के एक प्रदेश की हैं। पश्चिम का मीडिया कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन की जो तस्वीरें दिखा रहा है, और जो वीडियो दिखा रहा है, उसे हिन्दुस्तान के मीडिया का एक हिस्सा गलत बता रहा है, और हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी लोग उबल पड़ रहे हैं, और बीबीसी जैसे मीडिया-संस्थान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत का बड़ा मीडिया तकरीबन पूरा का पूरा केन्द्र सरकार की पेश की हुई तस्वीर को सामने रख रहा है, और देश के कुछ गिने-चुने पत्रकार ऐसे हैं जो कि कश्मीर जाकर वहां देखी हुई, और दर्ज की हुई एक अलग तस्वीर सामने रख रहे हैं। हकीकत इनके बीच जहां भी हो, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में मीडिया पर, संचार पर लगाई गई रोक के कैसे नुकसानदेह नतीजे होते हैं। 

कश्मीर से धारा 370 खत्म करने और उसे केन्द्र के मातहत एक प्रदेश बना देने का कश्मीर में जैसा विरोध होने का एक खतरा दिख रहा था, अब तक उतना बड़ा खतरा सामने नहीं आया है। अगर बीबीसी या न्यूयॉर्क टाईम्स की दिखाई जा रही तस्वीरें सही है, तो भी वे एक बड़े विरोध-प्रदर्शन को दिखा रही हैं, बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं दिखा रहीं, दोनों तरफ से किसी की हत्या करने या किसी मौत होने की खबरें नहीं हैं। पत्थरों से पटी हुई सड़कों की जो तस्वीरें दिख रही हैं, और पत्थर फेंकते हुए कश्मीरी नौजवानों के जो वीडियो दिख रहे हैं, उनमें से भरोसेमंद मीडिया में तो ये सही लगते हैं, लेकिन सतही मीडिया और सोशल मीडिया पर दुनिया के अलग-अलग देशों से छांटकर निकाले गए वीडियो और तस्वीरें चारों तरफ तैर रहे हैं। ऐसा झूठ महज कश्मीर के मामले में चल रहा हो ऐसा नहीं है, दूसरी तरफ पथराव कश्मीर में अभी पहली बार हो रहे हों ऐसा भी नहीं है। यह सब कुछ कश्मीर बरसों से झेलते आ रहा है, और वहां की एक पूरी नौजवान पीढ़ी पथराव का हिस्सा बने हुए बड़ी हुई है। इसलिए आज कश्मीर में हालात, वहां पर हिंसा, अभूतपूर्व नहीं हैं। वहां पर लगाई गई बंदिशें भी आज पूरे राज्य में फैली हुई जरूर हैं, लेकिन अभूतपूर्व नहीं है। कश्मीर ने इसके पहले भी कर्फ्यू देखा है, फोन-नेट पर रोक देखी है, और फौज तो हमेशा से देखी ही है। इसलिए कश्मीर, और बाकी देश दोनों के हित में यह है कि वहां की तस्वीर को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखा जाए। न तो केन्द्र सरकार की उपलब्ध कराई गई उन वीडियो-तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें एक चुनिंदा जगह पर आधा दर्जन चुनिंदा लोगों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बिरयानी खाते हुए, बात करते हुए दिख रहे हैं। और न ही ऐसी तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें सड़कों पर पथराव करते हुए नौजवान दिख रहे हैं। ऐसी दोनों ही किस्म की नौबतें न सिर्फ कश्मीर में, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में आती हैं, और सरकारें जनधारणा को अपने पक्ष में करने के लिए ऐसी तस्वीरें प्लांट भी करती हैं। 

इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर ने पिछले एक हफ्ते में हिंसा पर जिस काबू को दर्ज किया है, वह भी कम नहीं है। लोगों के मन में आग सुलग रही होगी, यह एक अलग बात है, लेकिन सरकार का यह जिम्मा होता है कि उस आग की लपटें किसी देश-प्रदेश को न जलाएं, किसी शहर-कस्बे को न जलाएं। इसलिए कश्मीर को लेकर आज मीडिया की रिपोर्ट एक तो बिल्कुल सही और सच्ची होनी चाहिए, दूसरी ओर वह सही संदर्भ में और फौज से लेकर हिंसा तक के तथ्यों को सही अनुपात में बताने वाली भी होनी चाहिए। लोगों को अपने विचारों के कॉलम में लिखना चाहिए, और खबरों के लिए आंकड़ों को, तथ्यों को, तस्वीरों और वीडियो को, विचारों की मिलावट के बिना खालिस रखना चाहिए, और खालिस पेश करना चाहिए। यही पत्रकारिता होती है, और यही बात लोकतंत्र के हित में भी होती है। 

जिन लोगों की आज कश्मीर की जमीनी हकीकत तक पहुंच नहीं है, चाहे वह सरकार के रोके हो, चाहे वह किसी और वजह से, उन्हें अटकलबाजी में नहीं पडऩा चाहिए, और अपने हाथ लगे चुनिंदा तथ्यों को, सरकार द्वारा पेश किए गए चुनिंदा तथ्यों को सोच-समझकर ही पेश करना चाहिए। सच इन दोनों के बीच कहीं पर हो सकता है, और जब तक मीडिया के हाथ ऐसे सच के सुबूत न लगें, उसे बिना स्रोत बताए कुछ पेश नहीं करना चाहिए। मीडिया और लोकतंत्र के बाकी तबकों को अपने विचार लिखने की हमेशा ही आजादी रहनी चाहिए, और विचारों पर आज कोई रोक है नहीं। इसलिए लोग पुख्ता तथ्यों के आधार पर सच लिखें, खुलकर लिखें, लेकिन सच के अलावा कुछ न लिखें, जो पुख्ता न हो उसे न लिखें, और आगे न बढ़ाएं।
-सुनील कुमार
 

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