विचार / लेख

क्या लोग थे वे भी?
16-Oct-2021 2:02 PM (77)
क्या लोग थे वे भी?

-मनोज श्रीवास्तव

 

मैं 1994-96 के बीच अविभाजित मंदसौर का कलेक्टर रहा था। तब अफीम तस्करी और उपभोग के विरुद्ध तब प्रशासनिक कार्रवाइयों के अलावा जो एक कार्य अपनी व्यक्तिगत रुचि के लिए किया था, उसमें से एक था अफीम पर दोहों का संग्रह। ये दोहे मारवाड़ी थे और मेरे समझाने से ज्यादा प्रभावशाली थे। यह वर्णन उनके लिये जो उसके सेवन को बड़ा हीरोइक समझते हैं।
लालां सेडो झर झरै, अखियाँ गीड अमाप।
जीतोड़ा भोगै नरक, अमली माणस आप।

जिसके मुंह से लार टपकती रहती है, नाक से सेडा (गंदा पानी) बहता रहता है और आँखों में अपार गीड भरे रहते हंै, ऐसा अमल का नशा करने वाला मनुष्य इस संसार में जिन्दा रहकर नरक ही भोग रहा है। (मारवाड़ी में अफीम को अमल या कुसुंबा कहते हैं)

और लोग उस नरक को पार्टी बोलते हैं। कमाल है। नरक में पार्टी होती है। फिर भी लोग उसे बदनाम करते हैं।

और अफ़ीम के सप्लायर को ‘केरो केरो’ झांकने वाला बताना तो कितना ग्राफिक लगता है-
अमलां हेलो आवियौ, कांधे बाल लियांह।
केरो केरो झाँकतो, ढेरी हाथ लियांह।

जब अमल लेने के लिए आवाज हुई तो अमलदार (अफीमची) जिसके कन्धों तक बाल थे, अमल की ढेरी हाथ में लिए टेढ़ा-टेढ़ा देखता हुआ पहुंचा। ढेरी मतलब यही पुडिय़ा।

और कितना अनप्रोडक्टिव, कितना बंजर, कितना उबाऊ जीवन होता है उन लोगों का जिनके पास पाने के लिए, उपलब्धि के लिए कुछ और नहीं है-सिवाय इस डोज़ के
मीठा माथै मन रमै, बेगो बावड़ीयोह।
बंदाणी जूवां चुगै, तपतां ताबड़ीयोह।।
प्रतिदिन अमल खाने वाला (बंदाणी) धूप में बैठा अपने कपड़ों से जुएँ निकाल रहा है। नशा करने का समय नजदीक आता जा था व पास में अफीम नहीं था। इसलिए किसी को अमल लाने के लिए भेजता है व निर्देश देता है कि मुंह में मिठास आने लगा है (अर्थात नशा पूरी तरह उतरने वाला है)अत: तू अफीम लेकर के जल्दी आना ।

वहाँ के लोक में अफीम बस चुका था। उनके सामाजिक धार्मिक संस्कारों में। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वे इसके कुप्रभावों को नहीं जानते। वे इसे नागझाग कहते थे-अहिधर मुख सूं ऊपणों, अह फीण नाम अमल। (यानी सर्प के मुख से जो झाग उपजा, वो अमल नाम से जाना गया)। यह शायद संस्कृत के ‘अहिफेन’ शब्द से उपजा है। वहाँ लोकगीतों में अफीम की हिस्सेदारी थी। मांगणियार के गीतों में अफीम की मनुहारें छाई रहतीं थीं और सगाई आदि में ‘अमल’ ऑफर किए जाने पर मुँह से ‘ना’ बोलना असभ्यता मानी जाती थी और उसे छूकर प्रणाम कर लेने से ही यह संकेत माना जाता था कि इसे मना किया जा रहा है।

आज तो दुर्गा नवमी का दिन है। इन नवरात्रों और होली पर ‘रंग देने’ की एक परंपरा वहाँ थी। रंग देते हुए अपनी अनामिका से हथेली में भरे हुए अफीम से छींटा दिया जाता था। वह अमल की बेला कहलाती थी और वह पवित्र अवसरों पर होती थी जब देवी-देवताओं को रंग दिया जाता था। करनी माँ की इष्ट देवी को रंग देते हुए यह कहा जाता था कि-  
तौ सरणै खटवन तणी लोहडय़ाली लाज। आवड़ करनी आप ने रँग इधका महाराज।

यानी तुम्हारी शरण में ही सारे समाज और वर्ण की लाज है। हे करनी, हे देवी आवड़ माँ आपको खूब खूब रंग है।

और यह माँ को रंग देना ऐय्याशी के लिए नहीं, शौर्य और वीरता को सेलिब्रेट करने के लिए होता था। तब के सेलेब्रिटी कुछ और हुआ करते थे-
जबर जितायो जैतसी कामर सूं कर जंग।
उण करनल री इष्ट जो वा वड़ आवड़ रंग।।

यानी बीकानेर के शासक राव जैतसी  को हुमायूँ के भाई कामरान मिर्जा से-युद्ध में कम संसाधन होने के बावजूद विजयी बनाने वाली करनी की इष्ट देवी माँ आवड़ को रंग है।
क्या लोग थे वे भी?

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